मुख्यमंत्री जब अपना सम्बोधन कर रहे थे तब केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के राज्यमंत्री धनसिंह उन्हें अवाक होकर देख और सुन रहे थे....
जगमोहन रौतेला
उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र रावत ने केन्द्रीय मानव संशाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत को उस वक्त आइना दिखा दिया, जब कल 12 जून 2017 को पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में ये लोग गाउन पहनकर कर बैठे थे.
पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में गाउन पहने केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल और अन्य
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत जब समारोह में पहुँचे तो उन्होंने गाउन को फिरंगियों की पोशाक बताते हुए उसे पहनने से इंकार कर दिया. अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी दीक्षांत समारोह के लिए क्यों नहीं भारतीय पोशाक तय कर पाए. गाउन हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक भी बन गया है. इसे अब उतार दिए जाने का वक्त आ गया है.
त्रिवेंद्र रावत ने पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के कुलपति से कहा कि अगली बार जब भी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह हो तो वह भारतीय पोशाक में हो. मुख्यमंत्री जब अपना सम्बोधन कर रहे थे तब केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के राज्यमंत्री धनसिंह उन्हें अवाक होकर देख और सुन रहे थे. दोनों को शायद आभास भी नहीं रहा होगा कि जिस गाउन को पहनकर वे मंच में बैठे हैं, उसके खिलाफ ही मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत इस तरह की टिप्पणी ही नहीं करेंगे, बल्कि गाउन पहनने से इंकार तक कर देंगे. समारोह में राज्यपाल केके पॉल भी गाउन पहने हुए थे.
इस मामले में मुख्यमंत्री रावत अपने राज्यमंत्री के ऊपर भारी पड़ गए. उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा राज्य मंत्री बनने के बाद से ही डॉ. धनसिंह रावत वन्दे मातरम, विश्वविद्यालयों, डिग्री कॉलेजों में सौ फीट का तिरंगा फहराने व डिग्री कॉलेजों में यूनिफार्म लागू किए जाने जैसे बयान देकर पिछले दिनों बेहद चर्चा में रहे हैं. इन बातों के समर्थन में वह इससे देशभक्ति का जज्बा पैदा होेने, छात्रों के अनुशासित होने और पढ़ाई में गुणवत्ता आने की बात करते रहे हैं.
मगर विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में गाउन व हैड पहनने की विदेशी परम्परा की ओर उनका ध्यान नहीं गया और इस मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने बाजी मार ली. मुख्यमंत्री के सम्बोधन के जवाब में विश्वविद्यालय के कुलपति ने भरोसा दिलाया कि अगला दीक्षांत समारोह भारतीय वेशभूषा में ही होगा. समारोह में राज्यपाल केके पॉल भी गाउन पहने हुए थे.
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सेनाधिकारियों के यहां काम करे बंधुआ मजदूर, 143 ने जमा किया एफिडेविट
जनज्वार। आर्मी फोर्स ऑफिसर्स के घरों में बेगारी करते-करते मजदूर परिवारों की तीन पीढ़ियां गुजर गईं। एडवांस के रूप में मिलता है मजदूरों को केवल एक कमरा। मजदूर काम नहीं कर पाते तो उनके बच्चों से लिया जाता था जबरन काम। पहले अंग्रेजों के घरों में की गुलामी फिर हिंदुस्तानी ऑफिसरों के बने गुलाम।
नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर ने दिल्ली के इंडिया गेट के समीप बसे प्रिंसेस पार्क में लगभग 3 एकड़ की जमीन पर बने 205 टूटे—फूटे घरों जिन्हें सर्वेंट रूम कहा जाता है, के मजदूरों से बात की तब पता चला की दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों से आर्मी अफसरों के घरों में कई दशकों से गुलामी (बंधुआ मजदूरी) करवाई जा रही है। गुलाम मजदूरों की संख्या 143 है।
काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि आर्मी अफसरों के ऑफिस और घरों में इन मजदूरों से गुलामों की तरह काम कराया जाता है। मजदूर यहां घरेलू कामगार, सफाई मजदूर, माली और धोबी के रूप में काम करते हैं।
हर परिवार का एक मेंबर अफसरों की गुलामी करता जिसे बेगारी कहते हैं, जबकि संविधान के आर्टिकल 23 में बेगारी एक गैरक़ानूनी अपराध है। काम के बदले मजदूरो को कोई भी दाम (वेतन, मजदूरी, तनख्वाह) नहीं मिलता है। मजदूरों के पास दिल्ली में रहने को घर न होने व गरीबी की वजह से मजदूर, मालिक और मेस कमेटी के चंगुल में फंसे हैं। इन मजदूरों की गुलामी का इतिहास आजादी के 2 साल पहले शुरू ही शुरू हो गया था।
आजादी से पहले 1945 में कुछ दलित लोगों से प्रिंसेस पार्क में ही चौकीदारी का काम करवाया जाता था। गुलामी के शिकार हुए इन मजदूरों ने बताया की किसी समय में प्रिंसेस पार्क अंग्रेजों के घोड़े का अस्तबल हुआ करता था. धीरे-धीरे मजदूर काम की तलाश में आते गए और प्रिंसेस पार्क की मेस कमेटी के जाल में फंसते गए और बंधुआ मजदूरी प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 1976 के पारित होने पर भी उन्हें आजादी नहीं मिली।
लाजू (बदला हुआ नाम) नामक एक महिला ने बताया की उसका जन्म ही गुलामी की चार दीवारों में हुआ। पहले उसने अपने नाना को फिर माता-पिता और अपने पड़ोस के कई लोगों को गुलामी करते हुए देखा है। अपनी बंधुआ बनने की कहानी कहते हुए लाजू कहती है, 'माँ की एवज में आये दिन मालिकों के घर बंधुआ मजदूरी करते करते—करते बचपन में ही घरेलु कामगार बन गई।
लाजू गुलामी में ही ब्याही गई। पहली गुलामी मालिक और दूसरी गुलामी पति की करनी पड़ी। बंधुआ मजदूरी की शिकार लाजू तब फूट-फूट के रोने लगती है वह बताती है, 'गर्भपात के समय में भी मालिक और उनकी पत्नी ने मुझ पर रहम नहीं किया। पहले घर का पूरा काम कराया फिर उसे बड़ी मुश्किल से दवा लेने जाने दिया। कई बार मालिकों से परेशान होकर आत्महत्या का भी प्रयास किया।'
तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं इस हालत में, इस एक छत के भरोसे
रेखा देवी (बदला हुआ नाम) के अनुसार वो एक एक सफाई कामगार है। रेखा की सास ने जिंदगीभर गुलामी करके अपनी बहू को विरासत में ये गुलामी की नौकरी दे दी। जब बेगारी का ठीकरा रेखा के सर फोड़ा गया तो उसने एक बार काम का मेहनताना मांगने की हिम्मत की, किन्तु उसको मेस कमेटी की ओर से मिली धमकी ने फिर से उसे उस उदास मौसम की तरफ धकेल दिया जहाँ दास बनकर ही जीना था।
रेखा के मुताबिक, मालिकों द्वारा बताए काम को पूरा न करने और रेस्ट कर सो जाने की स्थिति में मालिकों द्वारा उसे इतना पीटा गया कि उसका हाथ ही टूट गया। मेस कमेटी ने रेखा की कोई सहायता नहीं की, उल्टा रेखा को ही पुलिस कार्रवाही से यह कहके रोक लिया की तुम्हारे घर पर ताला लगाने जा रहे है।
रेखा कहती हैं, एक छत की मज़बूरी गुलामी में जीने को मजबूर करती रही। आज भी रेखा एक गुलाम की भांति मेस कमेटी के आदेश पर सफाई के काम को कर रही है।
कपड़े धुलाई का काम करने वाली अनुमति देवी बताती हैं, हम मजदूर बाद में हैं, पहले मजबूर है और यही हमारी गुलामी का प्रमुख कारण है। हमारी पीढ़ियां गुजर गईं सेना मालिकों की गुलामी करते-करते।
अनुमति उम्मीद जताते हुए कहती हैं, 'प्रधानमंत्री ने जब सबको आवास देने की बात की तो एकाएक हमें लगा की हमें जब घर मिल जायेगा तो शायद उस दिन हमारी मुक्ति होगी, लेकिन वो दिन आज तक नहीं आया। पता नहीं कौन सी योजना है जिससे बेघर और गरीबों को घर मिलता है।'
अनुमति देवी सेना अधिकारियों के कपड़े धोते और प्रेस करते करते बूढी हो चुकी हैं। अनुमति कहती हैं, 'पहले पति कमा के मेरा पेट भरता था अब बेटा भरता है। मैं आज भी बेगारिन हूँ और इन अमीरों की सेवा करती हूं। यदि पेट भरने के लिए मालिकों के भरोसे रह जाते तो अब तक भूख से मर जाते। हमें हमारे काम का आज तक कोई दाम नहीं मिला। एक टूटी छत देकर हमसे हमारी मज़बूरी का फायदा उठाकर काम लिया गया। अगर हमारे काम का हमें भी दाम मिलता तो आज हमारा भी महल जैसा घर बन गया होत।'
गौरतलब है कि हाल ही में रक्षा मंत्रालय की ओर से एक फरमान जारी कर बंधुआ मजदूरों को उनके घर खाली करवाकर उनको भगाया जा रहा है।
मोनिका नामक कामगार ने बताया कि प्रिंसेस पार्क में म्यूजियम बनने जा रहा है। मोनिका पूछती हैं, 'जिन्दा इंसानों को उजाड़कर सरकार शहीदों की याद में म्यूजियम बना रही है। यही है हम मजबूर कामगारों के जिंदगी की कीमत और यही है हमारे लिए सामाजिक न्याय।'
नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर के संयोजक ने बताया कि उन्होंने ईमेल करके उपायुक्त और चाणक्यपुरी उपखंड अधिकारी को शिकायत पत्र भेजा है और बंधुआ मजदूरों के मुक्ति एवं पुनर्वास की मांग की है। किन्तु प्रशासन की कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। गोराना ने शिकायत की एक प्रति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजी है।