Jun 17, 2011

प्रचंड पर रॉ से सम्बन्ध का संदेह


जनमुक्ति सेना के कमांडरों के बैठक में अधिकांश ने प्रचंड के फैसले को आत्मसमर्पण कहा और पार्टी के उपाध्यक्ष किरण ने १८ सूत्रीय विरोध पत्र प्रस्तुत किया,जिसमें भारतीय गुप्तचर संस्थान (RAW) से प्रचंड के सम्बन्ध बनाने का भी उल्लेख है...

विष्णु शर्मा  

नेपाल की माओवादी पार्टी के अंदर विवाद लगातार तेज होता जा रहा है. अब  वहां  की माओवादी पार्टी एक संयुक्त इकाई कम और तीन गुटों का नीतिगत (टेक्टिकल) गठबंधन अधिक दिखाई पड़ती है. प्रचंड के लाइन के खिलाफ कभी बाबुराम और कभी किरण ‘नोट ऑफ डीसेंट’ लिखते हैं. इसीलिए  पार्टी ने निर्णय लिया है कि तीनों धड़े अपने अपने समर्थकों की मीटिंग कर सकते है, उन्हें अपने विचार से अवगत करा सकते है. अब स्थति यह है कि गुटों की बैठक पार्टी की बैठक से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. कई बार तो इन बैठकों के कारण पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक भी रद्द हो जा रही हैं.

लाइन के इस संघर्ष में बाबुराम और किरण के गुट लगातार मजबूत हो रहे है और प्रचंड का प्रभाव कमजोर होता जा रहा है. अपनी साख को बचाने के लिए प्रचंड को पार्टी के अंदर ऐसे बहुत से समझौते करने पड़ रहे हैं,  जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. कभी बाबुराम को भारत समर्थक कहने वाले घोर प्रचंड समर्थक भी आज बाबुराम को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखने से नहीं झिझक  रहे है.

एनेकपा के अध्यक्ष प्रचंड और उपाध्यक्ष किरण : सिर्फ असहमति
अभी हाल में प्रचंड के करीबी माने जाने वाले बर्ष मान पुन ने कहा है कि प्रचंड प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते और माओवादी की ओर से बाबुराम भट्टराई को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. इस टिपण्णी  का सीधा मतलब पार्टी के भीतर लगातार मजबूत हो रहे उपाध्यक्ष किरण के खिलाफ (प्रचंड और बाबुराम ) का ‘संयुक्त’ मोर्चा बनाना है. नेपाल की राजनीती में प्रचंड एक क्रांतिकारी  नेता से कंफ्लिक्ट मैनेजर  के स्तर में आ गए है. प्रचंड के लिए प्रधान मंत्री बनने से अधिक जरूरी माओवादी पार्टी का अध्यक्ष बने रहना है और इसलिए बाबुराम को अपने पक्ष में रखना आवश्यक है.

फिर भी पार्टी को बचा पाना मुश्किल होता जा रहा  है. किरण ने जिस तरह से खुद की लाइन को प्रस्तुत किया है उसमें  समझौते की गुंजाईश नहीं दिखती. हाँ किरण की एक कमजोरी जरुर है कि प्रचंड को समझौतावादी मानने के बावजूद पार्टी के भीतर बने रहने की उनकी कार्यशैली है, जिसपर  अभी से  प्रश्न उठने लगे है.आगामी दिनों में किरण पर पार्टी से अलग होने का जबरदस्त दवाब बनेगा. यदि तब भी वह पार्टी में बने रहते है तो संभव है की दूसरी पीढ़ी के नेता अपने लिए नया रास्ता तलाशें. एक दौर में उनके साथ रहे मातृका यादव ने अभी हाल में अपने एक साक्षात्कार में उन्हें ‘गोलचक्करवादी’ बताया था. यदि किरण  कोई ठोस निर्णय नहीं लेते तो मातृका की बात की पुष्टि करते नज़र आयेंगे.

प्रचंड पर लगे आरोप  '18 विचलन ' के   दस्तावेज जनज्वार के पास हैं , प्रस्तुत है उनमें से कुछेक 
  • राजनीतिक स्तर पर प्रचंड  दक्षिणपंथी सुधारवाद और राष्ट्रीय आत्मसमर्पणवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं  
  • प्रचंड भारतीय गुप्तचर संस्थान (RAW) के सीधे संपर्क में हैं
  • प्रचंड धन, ताकत और अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नैतिक और अनैतिक क्रियाकलाप कर सकने की प्रवत्ति रखते हैं
  • अन्य संसदीय पार्टियों के साथ समझौता कर ऐसा संविधान बनाने की मंजूरी दे दी है जो रूप और सार में घोर प्रतिक्रियावादी है
  • प्रचंड ने जानबूझ कर पार्टी में आर्थिक हिसाब को कभी होने नहीं दिया और अपने निजी हितों के लिए संसाधनों का इस्तेमाल किया हैं
  • प्रचंड के भीतर फासिस्ट प्रवृत्ति  का विकास हुआ है

हालाँकि किरण के समर्थक पूर्व माओवादी नेता मातृका की बात से सहमत नहीं है. उनका मानना है कि जल्दबाजी में पार्टी से अलग होना गलत होगा.पार्टी में रहकर प्रचंड की लाइन को सरेआम  करना सही नीति है. और जहाँ तक पार्टीका सवाल है वह किसी एक की बपौती नहीं है. समर्थकों के  तर्कों से स्पष्ट है कि किरण के पास भी अभी क्रांति की कोई ठोस योजना नहीं है और इसलिए पार्टी में रहकर प्रचंड-बाबुराम की लाइन का विरोध करना उन्हें ठीक लगता है. लेकिन उनके करीबी कुछ नेता मानते है कि जितना लंबा समय वे पार्टी में रहेंगे उतना ही प्रचंड मजबूत होंगे.

जबकि मौजूदा समय में प्रचंड की  अपनी कोई लाइन नहीं है, बल्कि वे कभी बाबुराम और कभी किरण के समर्थन में खुद को खड़ा करते है.पार्टी का बहुसंख्यक हिस्सा उन्हें अपने नेता के रूप में नहीं देखता. हाल में जनमुक्ति सेना के कमांडरों की बैठक में अधिकांश ने प्रचंड के फैसले को आत्मसमर्पण  कह कर आलोचना की थी. साथ ही  किरण ने अपने समर्थकों के बीच ‘प्रचंड के 18 विचलन’ नाम से एक दस्तावेज़ बांटा  है. इस दस्तावेज़ के दुसरे बिन्दु में लिखा है कि ‘राजनीतिक स्तर पर दहाल दक्षिणपंथी सुधारवाद और राष्ट्रीय आत्मसमर्पणवाद का प्रतिनिधित्व करते है’. इसी दस्तावेज़ में  कहा गया है कि प्रचंड भारतीय गुप्तचर संस्थान  (RAW) के  सीधे संपर्क में है,  जिसका साफ़ मतलब है कि  प्रचंड और RAW के बीच  संबंध  हैं.

पार्टी संगठन के स्तर पर इस दस्तावेज़ के 18वे बिंदु में कहा गया है कि ‘प्रचंड धन, ताकत और अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नैतिक और अनैतिक क्रियाकलाप कर सकने की प्रवत्ति रखते है. और इसी के चलते उन्होंने अन्य संसदीय पार्टियों  के साथ समझौता  कर ऐसा संविधान बनाने  की मंजूरी दे दी है जो रूप और सार में घोर प्रतिक्रियावादी है.’ आगे दस्तावेज़ कहता है कि प्रचंड  ने जानबूझ कर पार्टी मेंआर्थिक हिसाब को कभी होने नहीं दिया और अपने निजी हितों के लिए संसाधनों का इस्तेमाल किया है. दस्तावेज़ में एक जगह कहा गया है कि प्रचंड के भीतर फासिस्ट प्रवत्ति का विकास हुआ है.

इस विवाद के बीच 15 जून 2011को होने वाली स्थाई समिति की बैठक ‘तैयारी की कमी’ का कारण बता कर रद्द कर दी गई.कयास लगाया जा रहा है कि प्रचंड ने ऐसा आलोचना के डर से किया. उन्हें इस बात का आभास हो गया है कि पार्टी के साथ अब जनसेना में भी उनकी लाइन के विरोध में स्वर तेज होते जा रहे हैं. आगे वे अपने बचाव में क्या तर्क देंगे यह देखना जरूरी होगा.आज तक उन्होंने खुद को क्रांति के अगुवा के बतौर और बाबुराम को संशोधनवादी और किरणको अतिवामपंथी के रूप में लोगों  के सामने प्रस्तुत किया है.

क्रांति की लाइन को न छोड़ने के चलते ही अब तक लोग उन्हें एक समझदार नेता मानते आये है. एक ऐसा नेता जो कभी दक्षिणपंथी और कभी वामपंथी लाइन लेते हुए भी क्रांति को हमेशा केंद्र में रखता है. यदि अबकी बार उनके तर्क बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं  को क्रांति की भावना के खिलाफ  नज़रआते है तो उनकी प्रासंगिकता  पर भी सवाल उठ सकता है.




जुलाई में आपके बीच होगी 'हैलो बस्तर'



जनज्वार.युवा और जनपक्षधर पत्रकार राहुल पंडिता की 'हेल्लो बस्तर: दी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ माओईस्ट  मूवमेंट' माओवादी आन्दोलन के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालने वाली महत्वपूर्ण किताब है. इस आन्दोलन के नेतृव से सीधे संपर्क कर राहुल जानने का प्रयास करते हैं  कि कैसे क्रांति में विश्वास रखने वाले चंद लोग 1980 में मध्य भारत के बस्तर क्षेत्र में प्रवेश करते हैं  और  एक शक्तिशाली आन्दोलन खड़ा करते हैं, जिसे आज भारत सरकार आतंरिक सुरक्षा का  सबसे बड़ा खतरा मानती  है.

यह किताब उन कारणों को तलाशती है जिसकी वजह से आज यह आन्दोलन भारत के 10 राज्यों में गरीब और हाशिए पर खड़े लोगों  की ओर से भारतीय सुरक्षा तंत्र पर  प्राणघाती हमले कर रहा है. यह लाल क्षेत्र में रहने वाले माओवादी छापामारों और आदिवासी जनता के जीवन पर अभूतपूर्व ढंग से प्रकाश भी डालती है.

जमीनी स्तर पर रिपोर्ट और माओवादी पार्टी के महासचिव गणपति और पोलित ब्यूरो सदस्य  कोबाद गाँधी सहित अनेक माओवादी नेताओं से लंबी बातचीत पर आधारित यह पुस्तक, प्रत्यक्ष अनुभव और साहस  का उल्लेखनीय उदाहरण है.

इस पुस्तक का दो शब्द (afterword) दिल्ली के तिहार जेल में बंद माओवादी नेता कोबाद गाँधी ने लिखा है. यह किताब आप पाठकों के लिए जुलाई के प्रथम सप्ताह से  दुकानों पर  उपलब्ध होगी.

पैंतीस साल से बंद है मुस्लिम हत्याकांड की चाबी

खास खबर 
पैंतीस  साल पहले मुजफ्फरनगर गोली कांड उर्फ मुस्लिम नसबंदी कांड के लिए गठित आयोग की जांच इसलिए सार्वजनिक नहीं हो सकी क्योंकि वह दस्तावेज जिस बक्से में बंद हैं, उसकी चाबी खो गयी है...


डा. संजीव 

जनसंख्या वृद्धि कम करने के लिए हमारे देश में नसबंदी का आयोजन आम है,लेकिन 35  साल पहले जैसा नसबंदी कैंप उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के खालापार  में लगा था,उसको याद कर आज भी लोकतंत्र शर्मशार होता है। साथ में हकीकत भी सरेआम होती है कि अल्पसंख्यकों के मामले में न्याय महज एक संयोग और मजाक से अधिक कुछ नहीं है। गौरतलब है कि अल्पसंख्यक हित का ढोल बजाने वाली पार्टी कांग्रेस की आपातकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बड़े पुत्र संजय गांधी के इशारे पर 16 अक्टूबर 1976 को खालापार में 35 मुसलमानों को पुलिस वालों ने मार डाला था, जब वे बड़जोरी से किये जो रहे नसबंदी की मुखालफत कर रहे थे।

मुजफ्फरनगर गोली कांड उर्फ मुस्लिम नसबंदी कांड के इतने वर्षों बाद पीड़ितों की आंखों का पानी सूख गया है, पर इंसाफ की उम्मीद आज भी उनकी आंखों में टिमटिमा रही है। 16 अक्टूबर 1976 से अबतक पैंतीस साल का अरसा बीत गया,लेकिन अब तक न तो किसी नेता ने और न किसी सरकार ने उनकी सुध ली है। यह बात अलग है कि सरकार ने गोलीकांड के बाद जांच आयोग का गठन किया और आयोग ने जांच पड़ताल भी की, लेकिन आयोग के कागजात तीस सालों से एक अलमारी में बंद पड़े हैं और राजनीतिक दलों के लिए भी अब यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। पीड़ितों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि इस कांड के गुनाहगारों को कानून के कटघरे में आज तक खड़ा नहीं किया जा सका है। उल्लेखनीय है कि   मुजफ्फरनगर कलेक्ट्रेट परिसर में जांच आयोग की रिपोर्ट जिस बक्से में बंद है, उसकी चाबी तीस साल पहले खो गयी थी।

1977 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने इमरजेंसी के मुद्दे के साथ नसबंदी कांड पर भी कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया था। ‘नसबंदी कांड’तब प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया था। मुसलमानों ने कांग्रेस के खिलाफ वोट देकर जनता पार्टी को जिताया था। लेकिन इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि गोलीकांड के पीड़ित परिवारों को आज तक न्याय तो दूर,मुआवजा और रोजगार तक नहीं मिला। मामले की जांच कर रहे आयोग के कागजात 30 साल से एक अलमारी में बंद पड़े हैं। इस गोलीकांड में 35 लोग मारे गये थे लेकिन आज तक इस मामले के दोषियों का पता ही नहीं चल पाया है।

हालत यह है कि जांच आयोग बैठने के बाद भी न तो किसी को मुआवजा मिला और न ही किसी को रोजगार। पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि उनके साथ उस समय बड़ा मजाक हुआ जब प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार में इमरजेंसी के पीड़ितों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर उन्हें सम्मानित किया और आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। इस मामले में समाजसेवी और इस घटना के गवाह मनेश गुप्ता,मुफ्ती जुल्फिकार का कहना है कि यह घटना प्रशासनिक भूल का नतीजा था। कुछ दिन बाद यहां संजय गांधी का दौरा था। उनके परिवार नियोजन के एजेंडे में नसबंदी के केसों की संख्या बढ़ाने के लिए ही पुलिस जोर जबरदस्ती का सहारा ले रही थी। पुलिस लोगों को पकड़कर नसबंदी के लिए मजबूर कर रही थी। समय के साथ लोग इस नसबंदी कांड को भूलते गये लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि इन मुद्दों पर राजनीतिक रने वाले नेता चुनावों में सफल होकर सांसद, विधायक बनने के बाद पीड़ितों के जख्मों पर आज तक मरहम लगाने में आखिर कामयाब नहीं हो पाये।

शहर के खालापार का नसबंदी गोलीकांड प्रदेश  ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रहा। 18 अक्टूबर,1976को पुलिस ने जबरन नसबंदी का विरोध कर रहे लोगों को गोलियों से भून डाला। जनता पुलिस के बीच हुए टकराव में जनता पुलिस की थ्री नोट थ्र्री गोली का मुकाबला पत्थरों से कर रही थी। इस गोलीबारी में 35लोगों की मौत हुई थी। मरने वालों में मौहम्मद सलीम (18), इलियास (14), इकबाल (12), रहमत (25), देवेन्द्र कुमार (25), जीत कुमार (26), जुल्फिकार, इंतजार, शब्बीर उर्फ बारू रियासत (25), जहीर अहमद उर्फ कालू रहमत, सईद, जमषेद (18), सत्तार (18), सुक्का खेड़ी फिरोजपुर, सिद्दीकी (18), शेर अहमद (16), नफीस (18), अब्दुल (16), मंजूर (16), मौहम्मद इब्राहिम (24), निजामुद्दीन (23), मौहम्मद हबीब (25), के अलावा 12 अन्य लोग मारे गये थे। इतने ही लोग घायल हो गये थे। इमरजेंसी के कारण इस घटना ने आग में घी का काम किया था। इमरजेंसी हटने के बाद जब 1977 में आम चुनाव हुए तो कांग्रेस के विरोध में मुस्लिम लामबंद हो गये थे।

नसबंदी कांड प्रदेश के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर जनता पार्टी का प्रमुख चुनावी मुद्दा था। इसी कारण उसके पक्ष में लहर चली और कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सभी सीटें हार गई। रायबरेली में इंदिरा गांधी और अमेठी से संजय गांधी को भी हार का मुंह देखना पड़ा था। मुजफ्फरनगर से जनता पार्टी के टिकट पर सईद मुर्तजा इसी मुद्दे पर चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे थे। उस समय नई सरकार बनने के बाद लोगों को उम्मीद बंधी थी कि पीड़ितों को न्याय व मुआवजा व रोजगार मिलेगा। सरकार ने मामले की जांच के लिए आयोग का गठन किया था। आयोग ने मामले की जांच के बयान लिए गए लेकिन कुछ समय आगे बढ़ने के बाद ही मामला ठंडा पड़ गया।

यही कारण है कि मिश्र आयोग की जांच के फाइल-पत्रावली, कागजात और लोगों की गवाही जिले के रिकार्ड रूम की एक अलमारी में पिछले 30 साल से ताले में बंद है। इसकी चाभी भी मिश्र आयोग के सचिव अपने साथ ले गये थे। उस समय यह सीलबंद अलमारी खालापार कांड के नाम से जानी जाती थी। कागजात किस हालत में है इसकी सुध किसी न नहीं ली है। खालापार के फक्करशाह चौक में बर्फ बेचकर अपने परिवार का गुजारा करने वो मौहम्मद राशिद   ने बताया कि इस कांड में उनके पिता जमाल मारे गये थ। मोनू के भाई सत्तार भी पुलिस की गोली के शिकार हुए थे। दर्जी वाली गली के अशरफ घायल हुए थे। इन सभी पीड़ित परिवारों को आज भी इंसाफ मिलने का इंतजार है, लेकिन इंसाफ मिलेगा कब किसी को नहीं पता।


Jun 16, 2011

मंगर- शनिचर की पैदाईश में पतरू दूबे की भूमिका


मंगर-शनिचर की पहली वार्ता आपके सामने है। यह वार्ता हर मंगर-शनिचर को आपके बीच होगी...

गजराज

एक हैं शनिचर और दूसरे हैं मंगर। सुनने में ये दिन से लगते हैं,मगर हैं ये दोनों आदमी। नाम घरवालों ने क्या सोचकर रखा था,पता नहीं,लेकिन काम ये दोनों कुछ खास करते नहीं। सिवाय फोटलचरी के। इन्होंने फोटलचरी कब शुरू की,इस बारे में भी किसी को साल या तारीख का पता नहीं। इनके गांव वाले कहते हैं ये दोनों सबकी बखिया उधेड़ते हैं। हालांकि इनकी बखिया उधेड़न प्रवृति में गांववालों को कोई ज्यादती नजर नहीं आती। गांववाले कहते भी हैं, ‘दो-चार आदमी बखिया उधेड़ने वाले न रहें तो गांव से बुद्धि चली जायेगी।’

यानी गांव में बुद्धि बचाने का जिम्मा मंगर और शनिचर पर है। अब इस यानी को थोड़ा और विस्तार दे डालें तो उपर्युक्त दोनों महानुभाव ग्रामीण बुद्धिजीवी हुए। और इनका परिचय हुआ, ‘फोटलचरी देने वाले मंगर और शनिचर जाने-माने ग्रामीण बुद्धिजीवी हैं।’ हां, यह दीगर बात है कि वर्गों और जातियों में बंटे भारतीय समाज में इस पदवी के आते ही एक और नया वर्ग पैदा हो जायेगा। साथ ही शहरी बुद्धिजीवियों पर संकट आन पड़ेगा। ऐसा इसलिए होगा कि अब तक फोटलचरी पर एकतरफा कब्जा शहरी बुद्धिजीवियों का रहा था। चाहे फिर वह परवल को सीताफल का छोटा रूप समझने के गहरे ज्ञान से लबरेज ही क्यों न रहे हों।

ऐसे में अब थोड़ी बात ‘फोटलचरी’ शब्द की उत्पत्ति पर। बेसिकली यह शब्द भोजपुरी का है और अंग्रेजी के ‘फोकट और लेक्चर’  शब्द के मिश्रण से तैयार हुआ है,जिसका शब्दशः  अर्थ फोकट में  लेक्चर होता है। इस शब्द का गहरा रिश्ता पतरू दूबे से है,जिनकी बातों को सुनकर भोजपुरी क्षेत्र के ग्रामीणों ने इस शब्द को ईजाद किया था। गांव के बुजुर्गों के मुताबिक भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में आ गयीं थीं और उन्होंने ‘बातें कम, काम ज्यादा’ का नारा दिया था।

यह नारा रेडियो और सरकारी दफ्तरों की दीवारों के जरिये ग्रामीणों के बीच पहुंच रहा था और विश्लेषण  पतरू दुबे के जरिये। पतरू दूबे की राय में इंदिरा गांधी का दिया गया नारा आदमी को बैल बनाने वाला था और बुद्धि को हरकर पूरे देश को सिपाही और फौजी। अब जरा उस मौके की बात कर लें जब पहली दफा ‘फोटलचरी’ शब्द का प्रयोग हुआ था। रोज की तरह उस दिन भी डेढ़ सौ फिट गहरे गड़े सरकारी नल ‘इंडिया मार्का’ के पास जो कि गोरखपुर ग्रामीण बैंक की ओर से फंडेड था, वहां पर पतरू दूबे को लोग सुनने के लिए जुटने लगे थे। जुटने वालों में बच्चे,जवान, किशोर, बूढ़े, बेटियां और भौजाइयां सब जुटा करतीं, इसलिए कि पतरू दूबे चीज ही ऐसी थे।

पतरू दूबे का व्यक्तिगत परिचय - जाति ब्राह्मण, इलाका-पूर्वी उत्तर प्रदेश, मां-बाप बचपन में चल बसे, एक बीबी,चार बच्चे समेत दो बीघा जमीन। दो बीघा जमीन से इतना हो जाता कि परिवार की हड्डी न गलती और लोग उन्हें खुश होकर कभी-कभी हड्डी राजा कहते। पतरू दूबे जब धारा प्रवाह बोलने लगते तो उनकी कमर में बंधी अधटंगी धोती पर उनका हाथ जाता और धीरे-धीरे धोती ऊपर की ओर उठने लगती। बस इसी मौके का इंतजार बच्चों को रहता। बच्चे पीछे से पतरू दूबे खोदकर खिलखिलाते हुए भाग लेते। पतरू दूबे पीछे मुड़कर बस इतना कहते, ‘दुर बुरबक’।

उस दिन पतरू दूबे जैसे ही अभी ‘इंदिरा गांधी’ बोले थे कि डेढ़ सौ फिट गहरे नल पर पीने का पानी भरने आया एक रिटायर्ड सूबेदार बोल पड़ा,‘अरे ई क्या फोटलचरी झाड़ते रहते हो,पहले छह गज धोती का इंतजाम तो कर लो,फिर इंदिरा-विंदीरा करना।’ सूबेदार के मुंह से निकला ‘फोटलचरी’ शब्द गांव के लोगों को पसंद आ गया और अब भोजपुरी क्षेत्र में पतरू दूबे के हर नये संस्करण को ‘फोटलचरी देत बाटें’ कहा जाता है।

इस शब्द का पतरू दूबे पर व्यक्तिगत क्या असर हुआ इस बारे में उनके एक मित्र जो कि अब बुजुर्ग हो चुके हैं, कहते हैं ‘मरने से पहले, पतरू कई बार कहता रहा कि सूबेदार सत्ता का प्रतिनिधि था और हम जनता के। उसकी बातें ‘कानून’ थीं और हमारी ‘फोटलचरी’, जानते हो क्यों? इसलिए कि वह कानून बनाता रहा और हम उसके कानून पर फोटलचरी देते रहे,उसे मजबूत करते रहे।’ 

इस घटना से हिंदी के कशी  केंद्रित उपान्यासकार काशीनाथ सिंह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने एक उपन्यास में लिखा, ‘विचारों में जीने वाले चूतिया होते हैं।’ कहने का तात्पर्य यह कि चूतियों की दूसरी जमात मंगर और शनिचर के रूप में फिर उस गांव में एक बार पैदा हो गयी है, जो फोटलचरी देते हैं और सबकी बखिया उधेड़ते हैं।

जारी...  

 
(लेखक ‘फोटलचरी’विधा के पहले भारतीय संकलनकर्ता हैं। नीचे कमेंट बॉक्स के जरिये उनसे संपर्क, सुझाव और शिकायत  का रिश्ता बनाया जा सकता है।)
 
 

Jun 15, 2011

अनशनकारी संत की मौत से फिर खुली सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की पोल


टीवी चैनल्स पर अपनी आभा बिखेरने के शौकीन कई संत तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, रामसेतु, गऊ व गंगा बचाओ जैसे आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाने वाली भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता भी अपने वोट साधने के उद्देश्य से बाबा रामदेव के आगे-पीछे होते दिखाई दे रहे थे...

निर्मल रानी

स्वामी निगमानंद
हरिद्वार स्थित मातृ सदन के संत स्वामी निगमानंद गंगा नदी की रक्षा का संकल्प निभाते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए। मातृ सदन हरिद्वार स्थित संतों का वह आश्रम है जो समय -समय पर गंगा नदी की स्वच्छता व पवित्रता की खातिर और उसे प्रदूषण व पर्यावरण के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए समय-समय पर संघर्ष करता रहता है। मातृ सदन से जुड़े संत मीडिया प्रचार, आर्थिक सहायता अथवा राजनैतिक सर्मथन के बिना ही गंगा नदी की स्वच्छता एवं निर्मलता को बरकरार रखने के अभियान में लगे रहते हैं।

यहां के संतों ने गंगा नदी में हो रहे अवैध खनन को रोकने का संकल्प लिया है। जो लोग गत दो तीन दशकों से हरिद्वार, ऋषिकेश तथा गंगा के आसपास के किनारे के क्षेत्रों से इत्तेफाक रखते हैं वे जानते होंगे कि कुछ समय पहले तक गंगा नदी के दोनों ओर स्टोन क्रशर माफिया ने अपने अनगिनत क्रशर लगा रखे थे। यह क्रशर गंगा नदी में बह कर आने वाले तथा नदी के किनारे के पत्थरों को तोड़-पीस कर अपना व्यापार चला रहे थे।

परिणामस्वरूप ऐसे सभी क्षेत्रों में हर समय आकाश में धूल मिट्टी उड़ा करती थी तथा अवैध खनन के कारण गंगा नदी भी अपने प्राकृतिक स्वरूप से अलग होने लगी थी। यह मातृ सदन के संतों के संघर्ष का ही परिणाम था कि उन्होंने अनशन,धरना तथा आमरण अनशन तक करके सरकार व न्यायालय का ध्यान बार-बार इस ओर आकर्षित किया। इसके परिणामस्वरूप तमाम स्टोन क्रेशर बन्द भी कर दिए गए।
लेकिन कुछ ऊंची पहुंच रखने वाले क्रशर मालिक अभी भी अवैध खनन का अपना धंधा जारी रखे हुए थे। इन्हीं क्रशर को बंद कराने के लिए मातृ सदन के संत निगमानंद ने 2008 में आमरण अनशन किया था। 73 दिनों के इस आमरण अनशन के कारण वे उस समय भी कोमा में चले गए थे। उसी समय से उनका शरीर काफी कमज़ोर हो गया था तथा शरीर के कई भीतरी अंगों ने काम करना या तो बंद कर दिया था या कम कर दिया था। लेकिन मानसिक रूप से वे चेतन दिखाई देते थे। अपनी इस अस्वस्थता के बावजूद गंगा रक्षा अभियान का उनका संकल्प बिल्कुल पुख्ता था। 

वर्ष 2008 के अनशन के बाद भी जब गंगा को प्रदूषित करने व क्षति पहुंचाने वाले कई क्रेशर बंद नहीं हुए तो 19 फरवरी 2011 से वे अपनी अस्वस्थता के बावजूद पुन: अनशन पर बैठ गए। उनके जीवन का यह अंतिम गंगा बचाओ आमरण अनशन 27अप्रैल को उस समय समाप्त कराया गया जब उत्तराखंड राज्य की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। अनशन के 68वें दिन हुई संत निगमानंद की इस गिरफ्तारी का कारण राज्य सरकार द्वारा उनकी जान व स्वास्थ की रक्षा करना बताया गया और उन्हें स्वास्थ लाभ के लिए हरिद्वार के जि़ला अस्पताल में भर्ती कराया गया। जब यहां भी उनका स्वास्थय नहीं सुधरा तब उन्हें देहरादून के जौली ग्रांट स्थित हिमालयन इंस्टिच्यूट हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया गया। यहां वे 2 मई 2011 से पुन: कोमा में चले गए। इसी के साथ-साथ उनकी चेतना भी जाती रही।
अस्पताल द्वारा उनके स्वास्थ के संबंध में 4 मई को जारी की गई रिपोर्ट में चिकित्सकों द्वारा इस बात का भी खुलासा किया गया कि उनके शरीर में कुछ ज़हरीले पदार्थ पाए गए हैं। इस रिपोर्ट के बाद मातृ सदन के संतों व उनके समर्थकों को इस बात का संदेह होने लगा कि संत निगमानंद जैसे आमरण अनशनकारी को ज़हर देकर मारने का प्रयास किया जा रहा है। और आखिरकार आमरण अनशन के कारण शरीर में आई कमज़ोरी, चेतन अवस्था का चला जाना तथा शरीर में ज़हरीले पदार्थों का पाया जाना जैसे सिलसिलेवार घटनाक्रमों ने इस महान एवं समर्पित संत को 13 जून को हमसे छीन लिया। यह भी एक अजीब इत्तेफाक है कि संत निगमानंद का निधन जिस हिमालयन इंस्टिच्यूट हॉस्पिटल देहरादून में हुआ उसी अस्पताल में योग गुरु बाबा रामदेव भी अपने विवादित अनशन के परिणामस्वरूप आई कमज़ोरी के चलते भर्ती थे।

रामदेव के उसी अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान वहां तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का तांता लगा हुआ था। टी वी चैनल्स पर अपनी आभा बिखेरने के शौकीन कई संत तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, रामसेतु, गऊ व गंगा बचाओ जैसे आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाने वाली भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता भी अपने वोट साधने के उद्देश्य से बाबा रामदेव के आगे-पीछे होते दिखाई दे रहे थे। इनमें से कोई भी साधु-संत, कोई भी भाजपाई नेता अथवा उत्तराखंड सरकार का कोई भी प्रतिनिधि संत निगमानंद से मिलने व उन्हें देखने की तकलीफ उठाना नहीं चाह रहा था। 

संतों या नेताओं से क्या शिकवा किया जाए उन्हें देखने व उनकी आवाज़ को बुलंद करने के लिए तो वह मीडिया भी नहीं पहुंचा जोकि उसी अस्पताल के बाहर 24 घंटे डेरा डाले हुए था तथा बाबा रामदेव की सांसें व उनके पल्स रेट गिन रहा था। कुछ लोगों का तो यह भी आरोप है कि हिमालयन हॉस्पिटल में बाबा रामदेव जैसे वीआईपी एवं पांच सितारा अनशनकारी के भर्ती होने की वजह से ही पूरे अस्पताल का ध्यान रामदेव के स्वास्थय की देखभाल की ओर चला गया। इसी कारण तीमारदारी की अवहेलना का शिकार निगमानंद ने दम तोड़ दिया। उस अस्पताल में भर्ती और भी कई मरीज़ों व उनके परिजनों ने इस बात की शिकायत की कि रामदेव के वहां भर्ती होने के कारण उनके मरीज़ों की देखभाल ठीक ढंग से नहीं हो पा रही थी।
संत निगमानंद की मौत ने एक बार फिर कई प्रश्रों को जन्म दे दिया है। पहला सवाल तो यह कि हमारे देश में धर्म रक्षा,गऊ रक्षा, गंगा रक्षा तथा भारतीय राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा करने का दावा करने वाला एक विशेष संगठन तथा राजनैतिक दल जोकि स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रहरी बताता है उसके सदस्यों व प्रतिनिधियों ने गंगा रक्षा का संकल्प लेते हुए स्वयं इस प्रकार के आंदोलन क्यों नहीं किए? दूसरा सवाल यह है कि उत्तराखंड में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने गंगा की तथा पर्यावरण की रक्षा के निहित संतों की मांग को मानते हुए तत्काल उन स्टोन क्रेशर तथा खदानों में हो रहे अवैध खनन को बंद क्यों नहीं कराया? और इन सबसे प्रमुख बात यह कि राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल बाबा रामदेव से मिलने जिस समय हिमालयन हॉस्पिटल पहुंचे उस समय भी संत निगमानंद उसी अस्पताल में भर्ती थे तथा अपनी जिन्दगी की अंतिम सांसें गिन रहे थे। 

मुख्यमंत्री निशंक ने रामदेव से तो मुलाकात की, परंतु उसी अस्पताल में भर्ती संत निगमानंद की उन्होंने कोई खबर ही नहीं ली। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी गऩीमत था। लेकिन मुख्यमंत्री निशंक ने बाबा रामदेव से मिलने के बाद उनके स्वास्थय को लेकर एक झूठा बवंडर खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने यह तक कह डाला कि स्वामी रामदेव किसी भी समय कोमा में भी जा सकते हैं। उनका रक्तचाप भी बहुत अधिक ऊपर व बहुत अधिक नीचे जा रहा है। जबकि रामदेव की सेहत पर पल-पल नज़र रखने वाले चिकित्सकों ने साफ कर दिया था कि रामदेव के कोमा में जाने जैसी कोई समस्या नहीं है।
कितने आश्चर्य की बात है कि गंगा की रक्षा का संकल्प लिए हुए जो संत उसी अस्पताल में कोमा में जा चुका है तथा अचेत अवस्था में अपनी जिन्दगी की आखरी सांसे ले रहा है उस संत के स्वास्थय, उसके कोमा में जाने तथा उसके आमरण अनशन के कारणों की तो मुख्यमंत्री निशंक को इतनी भी परवाह नहीं कि वह उससे मिलने के लिए अपने बहुमूल्य समय में से कुछ पल निकाल सके। 

रामदेव जैसे राजनैतिक संत से मिलने के लिए तो मुख्यमंत्री हिमालयन अस्पताल तक जा पहुंचे लेकिन जो संत वास्तव में भारतीय संस्कृति का प्रतीक समझी जाने वाली गंगा नदी की रक्षा के संकल्प को लेकर अपनी जान की बाज़ी लगाए बैठा है उससे मिलने का उनके पास कोई समय नहीं? आखिर यह कैसा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और साधु-संतों की प्रतिष्ठा, मान-मर्यादा व उनकी गरिमा की रक्षा की यह कैसी बातें?
तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी बताया जा रहा है कि उत्तराखंड का खनन मफीया प्रदेश की सरकार के साथ अपनी खुली सांठगांठ रखता है। बताया जा रहा है कि इस सांठगांठ के पीछे का कारण भ्रष्टाचार तथा मोटी रिश्वत है। और इसी भ्रष्टाचार के चलते सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, गंगा रक्षा,साधुसंत सम्मान जैसे ढकोसलों और यहां तक कि गंगा को बचाने के लिए दी गई एक त्यागी संत की जान की कुर्बानी तक की अनदेखी कर दी गई। अब तो यह आम लोगों को ही सोचना होगा कि तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का वास्तविक चेहरा क्या है और अपनी राजनैतिक ज़रूरतों के अनुसार जनता को वरगलाने के लिए समय-समय पर यह कैसा रूप धारण करते हैं।



लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.




Jun 14, 2011

सुलगती हुई ज़मीन


सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जन सुनवाई का रास्ता अख्तियार किया, ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके...

अजय प्रकाश

जमीन अधिग्रहण के खिलाफ देश में व्यापक होते विरोध को देखते हुए अब सरकार संसद के अगले मानसून सत्र में सन् 1894 से चले आ रहे अंग्रेजों के जमाने के भूमि अधिग्रहण विधेयक को नया प्रारूप देने जा रही है। नये प्रारूप को लेकर सोनिया गांधी के अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की ओर से कई सुझाव केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख को लगातार पहुंच रहे हैं, जिससे उन्हें लोक कल्याणकारी भूमि अधिग्रहण कानून बनाने में सहूलियत हो। इन सुझावों में जमीन मालिकों को नीलामी दर से छह गुना कीमत दिये जाने, ग्राम सभा को निर्णायक अधिकार देने और 75 फीसद प्रभावितों की सहमति के बाद ही अधिग्रहण की अनुमति जैसे मुद्दों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भूमि अधिग्रहण मामलों में एनएसी कार्यसमूह के संयोजक हर्ष मंदर के शब्दों में कहें तो "सरकार ने अधिग्रहण में अगर उपर्युक्त तीनों प्रावधान शामिल कर लिये तो इस कानून में एक गुणात्मक परिवर्तन होगा।' सरकार और उसके सहयोगी अधिग्रहण कानून को किस रूप में लागू करेंगे, यह तो आने वाले सत्र में पता चलेगा, लेकिन पहले से मौजूद कानूनों में जनता की भागीदारी कितनी हो पा रही है, उसे देखने पर कुछ और ही कहानी सामने आती है।


 
ताजा मामला झारखंड के सिंहभूमि जिले का है, जहां 26 मई को जादूगोड़ा इलाके में भाटिन यूरेनियम माइंस के बीस साल पूरे होने पर एक्सटेंसन के लिए एक जन सुनवाई हुई। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) के अधिकारियों ने क्षेत्र में माइक से प्रचार किया कि सुनवाई स्थानीय फुटबाल मैदान में होगी, लेकिन जन सुनवाई कॉरपोरशन कर्मचारियों के कॉलोनी में हुई।


सुनवाई के दौरान ग्रामीणों, मीडिया और जनांदोलनों से जुड़े लोगों ने जाने का प्रयास किया तो सुरक्षा बलों और निजी गार्डों ने उन्हें रोक दिया। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जन सुनवाई पूरी हो गयी। साथ ही 29 वर्ष और कंपनी के लीज को बढ़ाने का फैसला बगैर प्रभावितों की सहमति के ले लिया गया।

गौरतलब है कि यह एकतरफा फैसला एजेंसी क्षेत्र में लिया गया जो पहले से ही पेसा ऐक्ट के तहत आता है, जहां ग्राम सभा और लोगों की सहमति से ही अधिग्रहण या कंपनी चलाने का अंतिम निर्णय होता है। झारखंड आर्गेनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम के संयोजक जगत मांडी कहते हैं, "यह बर्ताव तब किया गया जब इस क्षेत्र में नयी कंपनी नहीं बनानी थी बल्कि एक्सटेंशन लेना था। अधिग्रहण और विस्थापन तो पहले ही हो चुका था।'

यह अंधेरगर्दी सिर्फ आदिवासी इलाकों में ही नहीं है, बल्कि इसकी चपेट में दिल्ली जैसे शहर भी हैं। दिल्ली में कचरे से बिजली पैदा करने पर तुली सरकार के सामने जब क्योतो प्रोटोकॉल के नियमों के कारण अड़चन पैदा हुई तो उसने जनसुनवाई का रास्ता अख्तियार किया ताकि सहदेव विहार में जिंदल ग्रुप के कचरा बिजली उत्पादन केंद्र को लगवाने का रास्ता साफ हो सके।

टॉक्सिक वाच संस्था के गोपाल कृष्ण कहते हैं, "कचरा से बिजली पैदा करने के दिल्ली में हो चुके असफल प्रयोगों के बावजूद सरकार नहीं मानी तो उसने केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड को इस काम में लगाया, जिसने सिर्फ दो कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाली जनसुनवाई करके संयंत्र लगाने की मंजूरी दे दी। सरकार की इस धूर्तता की जानकारी हमें सूचना अधिकार कानून की मदद से मिली।'

देश के दो हिस्सों के ये दो उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि पहले से बने कानूनों पर अमल की क्या स्थिति है। हालांकि एनएपीएम से जुड़े भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन के संयोजक रूपेश वर्मा को अधिग्रहण कानून में हो रहे बदलावों में किसानों के लिए कुछ राहत दिखती है। उनके मुताबिक, "जो अधिकार अबतक जिलाधिकारी के हाथ में बंद थे, वे ग्रामसभा को मिलेंगे तो जमीनों की अबाध लूट की रफ्तार थमेगी।'

एनएपीएम से जुड़ी मेधा पाटकर भी अधिग्रहण कानून में होने जा रहे बदलावों को सकारात्मक रूप में देखती हैं। एनएसी की अरुणा राय के अनुसार, "सरकार अगर सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जमीन लेगी तो व्यापक विचार विमर्श होगा और निजी अधिग्रहण के लिए 75 फीसद प्रभावितों की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी।'

सरकार अपनी जरूरतों के लिए किस तरह जमीन अधिग्रहण कर रही है, इसका एक उदाहरण न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीपीआइएल) की ओर से हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट के खातिर अधिगृहित की जा रही जमीन का मामला है। फतेहाबाद कलेक्ट्रट पर पिछले एक वर्ष से किसान संघर्ष समिति जमीन होने वाले कब्जे के विरोध में धरना दे रही है। अबतक धरना स्थल पर आने वाले दो किसानों की मौत भी हो चुकी है।

समिति के अध्यक्ष हंसराज सिवाच कहते हैं, "हम लोग हस्ताक्षर करके कितनी बार प्लांट के लिए जमीन नहीं देने की बात कह चुके हैं। जापान में आई सूनामी के बाद परमाणु संयंत्रों से रिसाव की घटना के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी सरकार जिद पर कायम है।' हरियाणा की इस छवि के उलट फिक्की ने भूमि अधिग्रहण को लेकर हरियाणा को मॉडल के रूप में पेश किया है।

फिक्की के नवनियुक्त महासचिव ने भूमि अधिग्रहण के बारे में राय है कि "हम प्राकृतिक संसाधनों की ऑनलाइन नीलामी और अधिग्रहण के हरियाणा मॉडल अपनाने के पक्ष में हैं।' महासचिव के मुताबिक, हरियाणा में परियोजनाओं के लिए कंपनियां सीधे किसानों से 70 फीसद जमीन खरीदती हैं और सरकार मात्र 25 प्रतिशत जमीन पर कब्जा कर परियोजना के लिए कंपनी को हस्तांरित करती है। इसके अलावा हरियाणा के उन जिलों में जो एनसीआर जोन में आते हैं वहां 33 साल तक प्रति एकड़ 15 हजार रुपये के हिसाब से जमीन मालिक को देने और प्रभावित परिवारों को नौकरी देने का प्रावधान है।

इस बारे में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख का कहना है कि "नये अधिग्रहण कानून में निजी मालिकान और सरकार की जमीन मालिक से सीधी खरीद का औसत 70 20 का रखें या 80 20, का अभी इस पर सहमति बननी बाकी है।' फिक्की महासचिव के दावे के बरक्स किसानों के पक्ष को देखें तो दोनों मेल नहीं खाते। हरियाणा के अंबाला जिले में बन रहे "मॉडर्न इंडस्ट्रियल टाउनशिप' के लिए अधिग्रहीत की जा रही 280 एकड़ जमीन को लेकर मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा का दावा है कि इसकी मंजूरी एक लाख किसानों ने हस्ताक्षर के जरिये दी है, लेकिन किसान संघर्ष समिति बाखालसा ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया है।

अधिग्रहण को लेकर दूसरा विवाद सोनीपत राजीव गांधी एजुकेशन सिटी को लेकर है। 2006 में अधिग्रहीत की गयी इस इलाके की भूमि के बारे में सरपंच ओम सिंह कहते हैं, "सरकार को हमने पूरी जमीन देने का वायदा कभी नहीं किया था, इसलिए एक भी किसान ने अधिग्रहण के बदले आज तक मुआवजा नहीं लिया है।' जमीन अधिग्रहण के विशाल क्षेत्रों में खनन के वे क्षेत्र भी हैं जहां लोग लगातार अपने जल, जंगल और जमीन से उजड़ने को मजबूर हैं। उजड़ने का खौफ और पूंजीपतियों को सुविधा देने वाले अधिग्रहण कानूनों की वजह के किसान-आदिवासी विद्रोह कर रहे हैं और माओवादी प्रभाव क्षेत्रों को मजबूती दे रहे हैं। इसके बावजूद सरकार अधिग्रहण नीतियों को बदलने को तैयार नहीं दिखती है।

हाल ही में योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने खनन क्षेत्रों की रॉयल्टी बढ़ाये जाने के सवाल पर कहा है कि "खनन का धंधा बड़े निवेश और जोखिम का है। खनन कंपनियों के मुनाफे में स्थानीय लोगों की भागीदारी से विदेशी निवेशक बिदक जायेंगे और निवेश के भविष्य पर भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा।' खनन के लिए विशेष जोन के रूप में ख्यात छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नया अतिक्रमण भारतीय सेना अपना ट्रेनिंग कैंप खोलकर करने जा रही है। एजेंसी एरिया का यह क्षेत्र, जो कि पेसा कानून के तहत आता है, अब तक हुए इस अधिग्रहण की जरूरतों से बेमेल है। सेना ट्रेनिंग स्कूल के लिए सरकार अबूझमाड़ में 4 हजार वर्ग मीटर जमीन का अधिग्रहण करने जा रही है हालांकि इसके लिये स्थानीय आदिवासियों से कोई सहमति नहीं ली गयी।

अबूझमाड़ क्षेत्र में सेना के कैंप बनाये जाने का कारण यह है कि माओवादी इलाका है, जहां सरकारी तंत्र काम नहीं करता। माओवादियों से निपटने के इस नये तरीके पर इस क्षेत्र के जानकार और पूर्व कमीश्नर बीडी शर्मा दो स्तरों पर चिंता जाहिर करते हैं। पहली बात यह कि "जो आदिवासी भाषा ही नहीं समझेंगे, उनके जमीन का अधिग्रहण सरकार कैसे करेगी? दूसरी बात यह कि अंडमान के उदाहरण को देखें तो अंग्रेजों के समय की अठारह जनजातियों में से वे ज्यादातर जनतातियां खत्म हो गयीं जो बाहरियों के संपर्क में आयीं।'

गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, "अगर सेना अबूझमाड़ के क्षेत्र में अधिग्रहण कानूनों को ताक पर रखकर प्रशिक्षण केंद्र बनाने में सफल हो भी जाती है तो यह एक ऐसा आत्मघाती कदम होगा जिसमें सुरक्षा बलों और आदिवासियों की पीढ़ियां एक दूसरे का खून बहाती रहेंगी।'

मानसून सत्र में पेश होने जा रहे अधिग्रहण कानून के विचार से किसी को ऐतराज नहीं होगा क्योंकि अंग्रेजी शासन काल से चले आ रहे अधिग्रहण कानून में लोकतंत्र की मूल भावना के मुताबिक बदलाव जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि किसानों- आदिवासियों के प्रतिनिधियों के भागीदारी के बगैर जो प्रस्ताव तैयार हुआ है उससे कोई ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून कैसे बना सकता है, जिसके के बाद इन तबकों में रोष न हो।



द पब्लिक एजेंडा से साभार.



थाने में नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार


जनज्वार : दस जून 2011 को लखीमपुर (खीरी) के थाना निघासन में चौदह वर्षीय नाबालिग लड़की सोनम के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और उसके बाद उसकी हत्या की घटना को संज्ञान में लेते हुए मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) का पांच सदस्यीय जांच दल ने 11 जून 2011 को घटनास्थल का दौरा किया।

इस टीम में पीयूसीएल के उत्तर प्रदेश संगठन सचिव शाहनवाज आलम, राजीव यादव, मानवाधिकार कार्यकर्ता रवि शेखर, स्वतंत्र पत्रकार और जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी के संयोजक विजय प्रताप तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के  प्राध्यापक शरद जायसवाल शामिल थे।

टीम ने जांच के दौरान पीड़ित पक्ष के परिजनों और आसपास के लोगों से मुलाकात कर घटना के बारे में जानकारी हासिल की। पुलिस अधिकारियों से मिलकर मामले के बारे में पूछताछ करने की कोशिश की गयी, लेकिन उनका रवैया असहयोगात्मक रहा।

मृतक सोनम की मां तरन्नुम ने बताया कि शुक्रवार को दिन में करीब ग्यारह बजे उनकी चौदह वर्षीय बेटी सोनम और पांच वर्षीय पुत्र अरमान भैस चराने गए थे। उनकी भैंस थाने के अंदर घुस गई, जिसको लेने सोनम थाने के अंदर गई। वहां पुलिस वाले उसे मेस के अंदर घसीटते हुए ले गए। उसके बाद सोनम के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसे थाने के पीछे भिलोर के पेड़ पर लटका दिया।

सोनम की मां ने जांच दल को बताया कि अरमान ने यह बात जब उसे बतायी तो वह दौड़ती हुई सोनम की लाश के पास पहुंची। वहां सोनम की लाश पेड़ से लटक रही थी। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। उसके शरीर पर चोटों के कई निशान और जाँघों के बीच से बहता खून बलात्कार की पुष्टि कर रहे थे।

मृतक सोनम के शोक संतृप्त परिजन
 सोनम की हालत देखकर उसकी माँ चिल्लाने लगी, तो पुलिस वालों ने उसे गाली देते हुए कहा कि यहां क्यों शोर मचा रही हो, तुम्हारी लड़की ने आत्महत्या की है। लाश लेके यहां से भाग जाओ, नहीं तो तुमको बहुत मार मारेंगे। सोनम की मां तरन्नुम ने आगे बताया-‘मैं अपनी बेटी की लाश लेकर रोती-चिल्लाती अपने घर पहुंची, जहां काफी भीड़ इकट्ठा हो गई। इसी दौरान एसओ निघासन, एसडीएम तथा सादी वर्दी में सीओ साहब पहुंचे। मैंने और वहां मौजूद बाकी लोगों ने जब दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की तो पुलिसवाले मुझे धमकाने लगे और कहने लगे कि तुम्हारी लड़की ने आत्महत्या की है, इसलिए कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा।’

पुलिसवाले घर पर ही लाश का पंचनामा भरने लगे, जिसका लोगों ने जमकर विरोध किया और पुलिस प्रशासन के विरुद्ध नारे लगाने लगे। लोगों का बढ़ता गुस्सा देखकर पुलिस वाले मुकदमा दर्ज करने के लिए तैयार हो गए। तरन्नुम के मुताबिक उसके घर पर जो पंचनामा भरा गया था, उसे पुलिस वालों ने फाड़ दिया। उसने अपने बेटे अरमान के बताए गए हुलिए के अनुसार दरोगा वीके सिंह, सिपाही एसके सिंह तथा फालोवर रामचंद्र के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करने के लिए तहरीर दी, लेकिन पुलिस वालों ने उसकी तहरीर लेने से मना कर दिया। उससे कहा गया कि मुकदमा अज्ञात में दर्ज करवाना हो तो करवा लो, नहीं तो मामला यहीं खत्म कर देंगे। सोनम की मां के मुताबिक उसने दबाव में मजबूरन पुलिसवालों के कहे अनुसार लिखी तहरीर पर अंगूठा लगा दिया।

जांच दल ने जब सोनम के भाई पांच वर्षीय अरमान से बातचीत की तो उसने बताया, ‘मैं अपनी दीदी के साथ भैस चरा रहा था तो भैंस थाना परिसर में चली गई। हम लोग उसे लेने गए, तभी कुछ पुलिसवाले आए जिनमें से एक ने मेरे सिर पर बंदूक तानकर चुप रहने को कहा और दीदी को अंदर कमरे में घसीटते हुए ले गए। काफी देर बाद पुलिस वालों ने दीदी को पेड़ से लटका दिया और मुझे वहां से भगा दिया।’ वह वहां से भागकर घर आया और अपनी मां से सारी बात बतायी। 

सोनम के पिता इन्तजाम अली कहते हैं, ‘अरमान ने जिन पुलिस वालों के बारे में बताया उसके मुताबिक वे तीन लोग दरोगा वीके सिंह, सिपाही एसके सिंह और फालोवर रामचंद्र हैं।

जांच दल ने घटना के बारे में पूछताछ कर मामले के बारे में पुलिस का पक्ष तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्रथम सूचना रिपोर्ट की नकल प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस वालों का व्यवहार असहयोगात्मक और अभद्रतापूर्ण रहा।

इस वीभत्स घटना के बारे में स्थानीय लोगों से भी बातचीत की गयी। सबसे चौंकाने वाली बात सोनम के साथ हुए बलात्कार और हत्या की घटना में पुलिस की संलिप्तता को स्पष्ट करती है कि पुलिस इस पूरे मामले को आत्महत्या के रुप में प्रचारित करने में जुटी हुई है। इसके लिए वह तथ्यों को छुपाने, तोड़ने-मरोड़ने में लगी हुई है। यहां तक कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी जारी नहीं किया गया है।

इस तथ्य की पुष्टि बारह जून 2012 के अमर उजाला की यह खबर भी करती है जिसमें लिखा है ‘देर शाम साढ़े सात बजे शव का अंतिम संस्कार निघासन कस्बे में कर दिया गया। इसके बाद भी पुलिस मुखिया ने पोस्टमार्टम न मिलने की बात कही है। वहीं सीएमएस डॉक्टर एचटी हुसैन ने अमर उजाला को बताया कि रिपोर्ट पोस्टमार्टम के कुछ देर बाद भेज दी गई थी। इसकी कापी एसपी कार्यालय को भेजी गई।' 
लखीमपुर पुलिस स्टेशन

वहीं दूसरी ओर दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान में बारह जून 2011को ‘पीएम रिपोर्ट से उलझी गुत्थी रेप की पुष्टि नहीं’ शीर्षक से छपी खबर में लिखा है कि ‘‘दिनभर हुए बवाल के बाद देर शाम जब डॉक्टरों ने पीएम रिपोर्ट पुलिस को सौंपी तो उस रिपोर्ट में बालिका के साथ रेप करने की कहीं पुष्टि नहीं हुई। पीएम रिपोर्ट आने के बाद अब ये मामला और उलझ गया है।’’

समाचार पत्रों के अवलोकन से यह भी पता चलता है कि सोनम की मां तरन्नुम की तहरीर पर अज्ञात लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ है। साथ ही पुलिस अधीक्षक लखीमपुर (खीरी) ने घटना के समय ड्यूटी पर तैनात ग्यारह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।

गौरतलब है कि  सोनम के पिता इन्तजाम अली फेरी लगाकर अपना और अपने परिजनों का भरण-पोषण करते हैं। इस दौरान वे निर्माणाधीन निघासन थाने में बतौर मजदूर काम करने लगे थे, जिसमें उन्हें रोजाना मजदूरी मिल जाती थी। इंतजाम अली का घर थाने से लगा हुआ था, इसलिए ठेकेदार ने उन्हें सामान की रात में रखवाली के लिए चौकीदार के रुप में भी काम दे रखा था। घटना वाले दिन इंतजाम अली घर पर नहीं थे, वे अपनी बड़ी बेटी रुक्सार की शादी के कार्ड बांटने अपने ससुराल गए थे।

जांच दल के निष्कर्ष

  • नाबालिग सोनम के साथ बलात्कार और हत्या पुलिसकर्मियों ने थाना परिसर निघासन में की।
  • बलात्कार और हत्या को छिपाने के लिए दोषी पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या का केस बनाने के लिए शव को पेड़ से लटका दिया।
  • बलात्कार और हत्या की घटना को छिपाने और विधिक प्रक्रिया से बचने के लिए थाने के परिसर में पेड़ से लटके सोनम के शव को पुलिस कस्टडी में न लेकर दोषी पुलिसकर्मियों ने सोनम की मां को डरा-धमकाकर शव के साथ भगा दिया।
  • दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए एसओ निघासन, एसडीएम निघासन और सीओ निघासन ने सोनम की मां को डराया-धमकाया तथा नामजद प्रथम सूचना रिपोर्ट न दर्ज कर अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट कराने के लिए मजबूर किया।
  • दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए पोस्टमार्टम का निष्कर्ष आने के बावजूद उसे जारी नहीं किया गया, जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट की सत्यता पर संदेह पैदा करता है।

जांच दल की संस्तुति

  • थाना परिसर में बलात्कार के बाद सोनम की हत्या की निष्पक्ष जांच किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या जनपद न्यायाधीश से करायी जाय।
  • सोनम के परिजनों को उचित मुआवजा तथा सुरक्षा राज्य सरकार से मुहैया कराय जाये।
  • सोनम के बलात्कार और हत्या में लिप्त दोषी पुलिसकर्मियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाये।
  • राज्य सरकार को निर्देशित किया जाय कि मानवाधिकार आयोग तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डीके बसु केस में जारी किए गए निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाना सुनिश्चित कराए। 


Jun 13, 2011

कैसे रुकेगा इन रजनियों का शोषण!


कुछ समय तक तो रजनी के करनाल निवासी ससुरालियों ने भरपूर मान-सम्मान दिया। पति भी उससे प्यार करता था। इस बीच रजनी के दो बच्चे हो गए। फिर अचानक न जाने क्यों रजनी से परिवार वालों का मन भर गया और ससुराली वाले आए दिन मारपीट करने लगे...


जगमोहन रौतेला

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के सपने लगातार दरकते जा रहे हैं। राज्य से रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले लोगों की संख्या पहले के मुकाबले लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य के पानी और जवानी का उपयोग राज्य हित में करने की रणनीति आज भी नहीं बन पायी है। इस सबके बीच एक दु:खद और शर्मनाक बात यह है कि महिला सशक्तीकरण के नारों के बीच यहां की बेटियां भी सुरक्षित नहीं हैं।

एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दो हजार लड़कियां ऐसी हैं जिन्हें गृहस्थ जीवन की खुशहाल जिंदगी के नाम पर आज भी दूसरे राज्यों में बदहाल और जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर किया जा रहा है। इनमें से अधिकतर लड़कियों को हरियाणा, मुजफ्फरनगर,  मेरठ और गाजियाबाद आदि स्थानों में ब्याह कर ले जाया जा रहा है।

कुछ को शादी के बहाने ले जाकर जिस्म के धंधे में धकेला जा रहा है, तो कुछ जो थोड़ी किस्मत वाली होती हैं किसी की रखैल बनकर रह जाती हैं। यह सिलसिला पिछले कई दशकों से जारी है। राज्य बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि महिला सशक्तीकरण के चलते यहां की स्थिति में सुधार होगा, मगर हालात जस के तस बने हुए हैं।

राज्य में ताजा मामला उत्तरकाशी जिले के नौगांव का सामने आया है। इस गांव की रजनी को लगभग चार साल पहले ब्याह कर करनाल (हरियाणा) ले जाया गया। कुछ समय तक तो रजनी के करनाल निवासी ससुरालियों ने भरपूर मान-सम्मान दिया। पति भी उससे प्यार करता था। इस बीच रजनी के दो बच्चे हो गए। फिर अचानक न जाने क्यों रजनी से परिवार वालों का मन भर गया और ससुराली वाले आए दिन मारपीट करने लगे। पांच अप्रैल 2011  का दिन रजनी के जीवन में तूफान लेकर आया, जब उसके ससुरालियों ने रात के अंधेरे में उसे मारपीट कर घर से बाहर निकाल दिया।

अपने सात माह के मासूम बच्चे के साथ रजनी ने काली अंधेरी रात खुले आसमान के नीचे बितायी। दो साल के बड़े लडक़े को ससुरालियों ने अपने ही पास रख लिया। अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत रजनी ने करनाल के जिला लघु सचिवालय के अधिकारियों से की, जिन्होंने उसे जिला महिला संरक्षण अधिकारी सविता राणा के पास भेजा, जिन्होंने रजनी को सुरक्षा के लिहाज से एम.डी.डी. अनाथ आश्रम में भेज दिया और उसके ससुरालियों को सम्मन जारी किया।

करनाल के शिव कॉलोनी निवासी सत्यपाल सिंह ने अपने पुत्र पवन कुमार का विवाह चार साल पहले रजनी से किया था। ससुराल में कुछ दिन की इज्जत के बाद जब रजनी से मारपीट होने लगी तो एक दिन गुस्से में उसके ससुर सतपाल सिंह ने उसे एक ऐसी कड़वी सच्चाई से अवगत कराया, जिसे सुन कर रजनी के पैरों तले की जमीन खिसक गई।

रजनी के ससुर ने बताया कि उसे ब्याह कर नहीं, बल्कि बीस हजार रुपये में उसके मां-बाप से खरीद कर लाया गया था। रजनी को अपने ससुर की बातों पर यकीन नहीं हुआ। जब उसने अपने पति पवन कुमार से सच्चाई जाननी चाही तो अपने पिता की बात के विपरीत पवन ने कहा कि उसे ब्याह कर ही लाया गया है, लेकिन जिस तरह रजनी को अकारण घर से मारपीट कर निकाल दिया गया, उससे इस बात को बल मिलता है कि रजनी को खरीदकर ही ले जाया गया था।

यह एक कटु सत्य है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नवजात लड़कियों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। इसका एक बड़ा और शर्मनाक कारण कन्या भ्रूण हत्या भी है। लड़कियों को जन्म देने से रोकने वाला यहां का समाज अपने परिवार के तथाकथित वंश को चलाने के लिए उत्तराखण्ड, पश्चिमी बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और बिहार से गरीब परिवारों की गरीब लड़कियों को कथित शादी करके ले जाता है। इन लड़कियों से शादी करने के एवज में वह लडक़ी के मां-बाप और बातचीत करवाने वाले परिवार के नजदीकी लोगों को पैसा भी देता है, ताकि भविष्य में कोई कानूनी अड़चन आने पर वह अपना मुंह बंद रखें।

अपना कथित वंश चलाने के लिए तथाकथित शादी करके लायी जाने वाली लड़कियों में से अधिकांश को लडक़े पैदा और उसके कुछ बड़ा होने पर रजनी की तरह ही ठोकर खाने को घर से बाहर कर दिया जाता है। ये लड़कियां आर्थिक तंगी और अपने मायके के रास्तों के बारे में अनजान होने से मायके भी नहीं लौट पाती हैं। कुछ मायके लौट भी गयी तो गरीब मां-बाप उसके कथित ससुरालियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर पाते।

लड़कियों को कथित ब्याह के लिए खरीदने में मदद करने वाले कई गिरोह भी सक्रिय हैं। ऐसे ही कुछ गिरोहों के लोगों को पिछले दिनों टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा और चम्पावत में पकड़ा भी जा चुका है, लेकिन रजनी जैसे शर्मनाक घटनाक्रम रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।



पाक्षिक पत्रिका 'जनपक्ष आजकल' से साभार.