Jun 15, 2017

फर्जी मुठभेड़ करने वाले जवानों को डीजीपी ने पार्टी करने के लिए दिए 1 लाख रुपए

देश की सुरक्षा—व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार है कि किसी राज्य के डीजीपी ने एक अादिवासी की हत्या करने पर जवानों को मुर्गा—भात खाने और जश्न मनाने के लिए 1 लाख रुपए का ईनाम दिया हो, वह भी फर्जी मुठभेड़ के बदले। 

गिरिडीह से रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट 

मोतीलाल बास्के : जब वह राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू की विधि व्यवस्था में लगे थे 
झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना अंतर्गत जैन तीर्थावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल पारसनाथ पर्वत की तलहटी में स्थित आदिवासी गांव ढोलकट्टा के समीप 9 जून को माओवादियों व सीआरपीएफ कोबरा के बीच मुठभेड़ होती है। मुठभेड़ की ही शाम में पुलिस दावा करती है कि मुठभेड़ में एक दुर्दांत माओवादी को मार गिराया गया। 

मारे गए आदिवासी के पास से पुलिस एक एसएलआर व गोली समेत कई चीजें दिखाती है। 10 जून को झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय हवाई मार्ग से मधुबन पहुंचते हैं और ‘भारत माता की जय’ ‘सीआरपीएफ की जय’ के नारे के उद्घोष के बीच गिरिडीह एसपी बी वारियार को एक लाख रूपये मुठभेड़ में शामिल जवानों को बड़ी पार्टी देने के लिए देते हैं और अलग से 15 लाख रूपये इनाम देने की घोषणा भी करते हैं। इस खबर को झारखंड के तमाम अखबारों के तमाम एडिसन में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।

मुठभेड़ में मारे गए क्या सच में दुर्दांत माओवादी थे?
इस सवाल का जवाब 11 जून को मिल गया, जब मारे गये आदिवासी की पहचान उजागर हुई तो पता चला कि जिसे मारकर प्रशासन अपना पीठ खुद ही थपथपा रहा है और जिसकी हत्या का जश्न भी अब तक प्रशासन मना चुका है, दरअसल वह एक डोली मजदूर था, जो कि तीर्थयात्रियों को डोली पर बिठाकर अपने कंधे पर उठाकर तीर्थस्थल का भ्रमण कराता था और साथ ही पारसनाथ पर्वत पर स्थित चंद्र मंदिर के नीचे एक छोटा सा होटल भी चलाता था, जिसमें डोली मजदूर चावल-दाल व सत्तू खाया करते थे। 

उस डोली मजदूर का नाम मोतीलाल बास्के था। वह धनबाद जिला के तोपचांची प्रखंड अंतर्गत चिरूवाबेड़ा का रहने वाला था, लेकिन कुछ दिन से अपने ससुराल गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत ढोलकट्टा में ही रहकर प्रखंड से पास किया गया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने आवास को बनवा रहा था। 

कौन है मोतीलाल बास्के 
9 जून को वह ढोलकट्टा से पारसनाथ पर्वत स्थित अपनी दुकान ही जा रहा था, लेकिन हमारे देश के ‘बहादुर’ अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ कोबरा ने उसकी हत्या करके उसे दुर्दांत माओवादी घोषित कर दिया और उसकी हत्या का जश्न भी सरकारी खजाने से मनाया। अब जबकि यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि मृतक मोतीलाल बास्के एक डोली मजदूर था और डोली मजदूरों के एकमात्र संगठन मजदूर संगठन समिति का सदस्य भी था, उसकी सदस्यता संख्या 2065 है। 
मारे जाने के बाद छपी यह खबर 


एक आदिवासी होने के नाते वह आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी का भी सदस्य था और 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित मारांड. बुरु बाहा पोरोब में विधि व्यवस्था का दायित्व भी संभाला था, जिसमें झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के बतौर शामिल हुई थीं। मृतक मोतीलाल बास्के को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनाने के पैसे भी मिले हैं, जिससे वे मकान बना रहे थे।

माओवादी बताकर मोतीलाल बास्के की हत्या पुलिस द्वारा कर दिए जाने का सच पारसनाथ पर्वत के अगल-बगल के गांवों में पहुंचते ही आम लोगों में गुस्सा बढ़ने लगा और 11 जून को मधुबन के हटिया मैदान में मजदूर संगठन समिति ने एक बैठक कर मोतीलाल बास्के का सच सबके सामने उजागर किया। इस बैठक में आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए और 14 जून को वहीं पर महापंचायत करने का निर्णय लिया गया। 

धीरे-धीरे फर्जी मुठभेड़ का सच बाहर आने लगा। 12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन की एक टीम ने अपने गिरिडीह जिला सचिव के नेतृत्व में मृतक के परिजनों से मुलाकात करते हुए इस फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच व दोषी पुलिसकर्मियों को सजा देने की मांग के साथ 15 जून को पूरे जिला में प्रतिवाद दिवस मनाने की घोषणा की, साथ ही मृतक की पत्नी को 5 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की। 

13 जून को झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतागण ढोलकट्टा जाकर मृतक के परिजनों से मुलाकात की व मृतक की पत्नी की बात झारखंड के विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से करायी, जिसमें उन्होंने उनको न्याय दिलाने का वादा किया। 14 जून को मधुबन में आयोजित मजदूर संगठन समिति के महापंचायत में सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों के साथ-साथ झामुमो, झाविमो, भाकपा (माले) लिबरेशन, आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी व स्थानीय तमाम जनप्रतिनिधि- जिला परिषद सदस्य, प्रखंड प्रमुख व कई पंचायत के मुखिया शामिल हुए। 

महापंचायत ने इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ 17 जून को मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में उपायुक्त के समक्ष धरना, 2 जुलाई को पूरे गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस व 3 जुलाई को गिरिडीह बंद की घोषणा की। 15 जून के अखबारों में भाकपा (माओवादी) का बयान भी आया कि मोतीलाल बास्के उनके पार्टी या पीएलजीए का सदस्य नहीं है।

सवाल यही कि आदिवासियों के ही राज्य में आदिवासी हत्या पर जश्न  

फर्जी मुठभेड़ के बाद प्रदर्शन करते पार्टियों के लोग और स्थानीय जनता 
उलगुलान के सृजनकार महान छापामार योद्धा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस 9 जून को ही फर्जी मुठभेड़ में एक आदिवासी मजदूर की हत्या को माओवादी हत्या के रुप में पूरे झारखंड के तमाम अखबारों ने अपने तमाम एडीसन में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी, लेकिन अब जबकि यह साबित हो चुका है कि मृतक मोतीलाल बास्के माओवादी नहीं था, तो सभी अखबारों ने इन तमाम समाचारों को गिरिडीह के पन्नों में ही कैद कर रखा है। 

तमाम अखबारों ने डीजीपी द्वारा एसपी को एक लाख रुपये हत्यारों को पार्टी देने की खबरों को प्रमुखता से छापा था, लेकिन आज कोई अखबार यह सवाल नहीं कर रहा है कि आखिर एक ग्रामीण आदिवासी की हत्या का जश्न क्यों और कब तक?

फर्जी मुठभेड़ की घटना को अब एक सप्ताह होने को हैं, लेकिन देश के मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों व न्यायपसन्द नागरिकों के कानों पर अब तक जूं भी क्यों नहीं रेंग रही? उनके लिए एक आदिवासी की हत्या और हत्यारे पुलिस अधिकारियों के द्वारा हत्या का जश्न मनाना कोई बेचैनी का सवाल क्यों नहीं बनता?

केजरीवाल के दो चेलों की वाट्सअप चैट, बताएगी कैसी राजनीति हो रही आप में

दोनों नेता अरविंद केजरीवाल के ही बागवानी के दो फूल हैं, जिसे पानी—खाद डालकर अरविंद ने अपने हाथों से सींचा है...

दिल्ली से स्वतंत्र कुमार की रिपोर्ट 



दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी अपनी किसी और नीति पर कायम रहे या न रहे, लेकिन वह शुरुआत से ही अपने ही नेताओं के खिलाफ साजिश रचने, उन्हें निपटाते रहने की परंपरा पर लगातार कायम है। माना जाता है कि केजरीवाल के लिए जो भी नेता चुनौती बनता है, या उन्हें लगता है कि उनकी राजनीतिक सल्तनत पर कोई हक जमा सकता तो उसे नितटा देने में पूरी पार्टी को लगा देते हैं। 

अबकी भी यही हो रहा है। अरविंद केजरीवाल ने दो लोगों को ढंग से निपटाने का ठेका पार्टी पदाधिकारियों को दे रखा है। जिनको निपटा देना है, वे हैं कपिल मिश्रा और कुमार विश्वास। मिश्रा और विश्वास वही लोग हैं जिनका एक समय में इस्तेमाल अरविंद ने स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को निपटाने के लिए किया था। गौरतलब है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण आम आदमी पार्टी के संस्थापकों और बड़े नेताओं में शामिल रहे हैं। 

कपिल मिश्रा के खुलासों को हाशिए पर डालने और कुमार विश्वास की छवि को कार्यकर्ताओं में धुमिल करने की जिम्मेदारी अरविंद केजरीवाल टीम की ओर से ओखला विधायक अमानतुल्लाह खान को दी गयी है। मतलब मोर्चे पर अमानतुल्लाह हैं, जबकि पीछे से दिल्ली आप के पूर्व मुखिया दिलीप पांडेय, पार्टी खजांची दीपक वाजपेयी, मनीष सिसौदिया के साले संजय राघव समेत दर्जनों पार्टी पदाधिकारी परोक्ष—प्रत्यक्ष रूप से जुटे हुए हैं। 

कल हुए एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा आज ओखला क्षेत्र के विधायक अमानतुल्ला खान के खिलाफ ओखला के बाटला हाउस इलाके में धरना देंगे। कपिल मिश्रा के मुताबिक यह धरना बाटला हाउस में रहने वाली एक 70 वर्षीय वृद्ध महिला के घर पर कब्जा किए जाने को लेकर है। मिश्रा का कहना है कि महिला के घर पर विधायक अमानतुल्ला के इशारे पर कब्जा हुआ है। ​कब्जा करने वाले विधायक के लोग हैं। 

पर असल ये बात ये नहीं है, बल्कि बात है कपिल मिश्रा और अमानतुल्लाह के बीच हुई 13 नवंबर की रात वाट्स्अप चैट, जिसे थोड़ी देर के लिए कपिल मिश्रा ने ट्वीटर पर लगाया पर बाद में हटा दिया। 

मगर जनज्वार के पास वह पूरी बातचीत है जिसको पढ़कर आपको पता चल जाएगा कि असल में ये दोनों नेता किस स्तर के हैं और इनका असल मकसद क्या है? साथ ही आपको फैसला करने में भी आसानी होगी कि आम आदमी पार्टी किस राह पर है, क्योंकि दोनों की नेता अरविंद केजरीवाल के ही बागवानी के दो फूल हैं, जिसे पानी—खाद डालकर अरविंद ने अपने हाथों से सींचा है!  





Jun 13, 2017

पेशाब-पाखाने की छुट्टी मांगने पर जाती है नौकरी, यूनियन बनाने की कोशिश हुई तो भेज दिया जेल

मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है .... 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में पिछले कुछ महीनों से मजदूर अपनी यूनियन पंजीकृत करवाने के लिए और मैनेजमेंट से अपने काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर संघर्षरत हैं. 31 मई 2017 को कंपनी के गेट पर बीते कई दिनों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर पुलिस ने मैनेजमेंट की शिकायत पर पहले लाठीचार्ज किया और फिर उन्हें हिरासत में ले लिया. इन सभी के ख़िलाफ़ रोहतक के संपला थाने में एफ़आईआर दर्ज की गई है, जिनमें यूनियन लीडरों को मुख्य आरोपी नामित किया गया है.

फ़ाइल फोटो  
आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा प्राइवेट लिमिटेड एक जापानी कम्पनी है, जो 2011 से आई.एम.टी. रोहतक में स्थित अपनी फैक्ट्री में टोयोटा, मारुती, होण्डा आदि नामी गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के लिए 'डोर लॉक' एवं 'इनसाइड-आउटसाइड हैंडल' जैसे पार्ट्स बनाती है. इस फैक्ट्री में करीब 450 मज़दूर काम करते हैं. इन्हें 8000—10000 रुपए मासिक वेतन मिलता है. 

आइसीन ऑटोमोटिव हरियाणा मज़दूर यूनियन के अनुसार, काम के दौरान मजदूरों को पानी व पेशाब के लिए मना किया जाता है, उनके साथ गाली—गलौज की जाती है और महिला मज़दूरों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है.

कम वेतन और काम की बुरी परिस्थितियों के चलते मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपनी यूनियन को पंजीकृत करेंगे और अपनी मांगों को मैनेजमेंट के सामने रखेंगे. 20 मार्च 2017 को उन्होंने यूनियन के पंजीकरण के लिए श्रम विभाग में अर्जी दी. 26 मार्च को मजदूरों ने अपना मांगपत्र कंपनी को दिया. पर न तो कंपनी मैनेजमेंट और न ही प्रशासन की तरफ से मजदूरों की कोई खबर ली गई या सुनवाई की गई. 

उल्टा 25 अप्रैल को कंपनी ने रोहतक सिविल कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया और यूनियन लीडरों और सदस्यों को फैक्ट्री गेट के अन्दर आने से रोकने और फैक्ट्री परिसर के 1000 मीटर तक कोई धरना या शामियाना लगाने से रोकने के निर्देश मांगे. 

26 अप्रैल को सिविल जज ने अंतरिम आदेश दिए की फैक्ट्री परिसर के अन्दर और फैक्ट्री गेट से 400 मीटर दूरी तक मजदूर धरने पर भी नहीं बैठ सकते. 3 मई को कंपनी ने मोर्चे की अगुवाई कर रहे 20 मज़दूरों को काम से निकाल दिया. बाकि मज़दूरों ने जब इसका विरोध किया तो कंपनी ने उन्हें एक "अंडरटेकिंग" थमा दी और यह शर्त रख दी कि इस पर हस्ताक्षर करके ही वे काम पर वापस आ सकते हैं. कंपनी के मनमाने बर्ताव के विरोध में मज़दूर 3 मई से कंपनी के गेट के बाहर बैठकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे हैं .

इस बीच 12 मई को मजदूरों की यूनियन पंजीकरण की अर्जी खारिज हो गई. यूनियन लीडरों का कहना है कि अर्जी को बेबुनियाद कारणों से खारिज किया गया है. जहां कारण बताया गया है कि यूनियन के चार सदस्य कानूनी परिभाषा में अनुसार “मजदूर” नहीं हैं, वहां लीडरों का कहना है की ये बात उनके वेतन रसीद से झूठ साबित होती है. जहाँ कारण बताया गया है कि यूनियन के कुल सदस्य कंपनी के कुल मजदूर संख्या के 10 प्रतिशत से भी कम है, वहां लीडरों का कहना है की कंपनी ने यह संख्या षड्यंत्र के तहत बढ़ाकर बताई है.
  
30 मई को चल रहे सिविल मुक़दमे में जज ने एक और निर्देश दिया की यूनियन के सदस्य फैक्ट्री परिसर में न तो घुसेंगे, न उसके 200 मीटर के दायरे में कोई धरना करेंगे, न नारे लगाएंगे, न घेराव करेंगे, न रास्ता रोकेंगे. कंपनी द्वारा दिए गए तथ्यों जैसे मजदूरों द्वारा फैक्ट्री संपत्ति को नुक्सान पहुँचाया गया और उत्पादन धीमा किया गया, की पड़ताल किये बिना और संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने के बुनियादी हकों को नकारते हुए फैसला कंपनी के पक्ष में सुना दिया गया. 

31 मई को सुबह से ही मज़दूर अपने परिजनों के साथ अपनी अनसुनी मांगों को उठाने हेतु फैक्ट्री के बाहर धरने पर बैठे थे. मैनेजमेंट की शिकायत पर हरियाणा पुलिस वहां एकत्रित हो गई, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, उन्हें हिरासत में ले लिया और उन पर सांपला थाने में मुकदमा दर्ज़ कर दिया. एफ़.आई.आर. के अनुसार मज़दूरों पर आरोप है कि वे गैरकानूनी रूप से खतरनाक हथियार (यानी झंडे) लेकर एकत्रित हुए, रास्ता रोका, कंपनी के गेट को जाम कर दिया, कंपनी के स्टाफ को धमकी दी और चोट पहुंचाई. 425 लोगों को, जिनमें मजदूर, उनके परिजन और कुछ कार्यकर्ता भी शामिल थे, रोहतक के सुनारियन जेल में बंद कर दिया और मजिस्ट्रेट को अर्जी देने पर ही 6 जून तक सभी को बेल पर छोड़ा गया.

मज़दूरों के काम की परिस्थितियों से सम्बंधित मांगों को लेकर कंपनी प्रबंधन और श्रम विभाग की उदासीनता उनके रवैये से स्पष्ट है. मजदूरों के यूनियन बनाने के बुनियादी हक़ के संघर्ष को विफल बनाने में पुलिस और न्यायपालिका भी अपना पूरा योगदान दे रही है . एक तरफ मज़दूरों को संगठित होने से रोकने के लिए प्रबंधन ने 20 मज़दूरों को सीधा निष्कासित कर दिया और बाकियों से अंडरटेकिंग देने की शर्त रख दी। उनकी मांगों के बारे में कोई पहल न कर गेट पर बाउन्सरों को तैनात किया गया. सिविल कोर्ट में यूनियन के सदस्यों को बाहर निकालने के लिए मुकदमा कर दिया और फिर 31 मई को उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई. 

दूसरी तरफ प्रशासन, ख़ास तौर से श्रम विभाग की तरफ से मज़दूरों की मांगों के लिए प्रबंधन पर कोई दबाव नहीं बनाया गया है. प्रबंधन का मनोबल बढाते हुए पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज किया, उन पर मुकदमा दर्ज किया और कई दिनों तक गिरफ्तार करके रखा. साथ ही सिविल कोर्ट ने मजदूरों को फैक्ट्री के आसपास प्रदर्शन करने से भी रोक दिया है.

हरियाणा में आईसीन, होण्डा, मारुती, ओमाक्स आदि कंपनियों के संघर्षों से स्पष्ट पता चलता है की आज भी मजदूरों के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए संगठित होने के मूलभूत अधिकार को हासिल करना कितना मुश्किल है. 

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) ने संघर्षरत मज़दूरों के खिलाफ दर्ज मुक़दमे एवं गिरफ्तारी की निंदा करते हुए मांग है मजदूरों पर दर्ज झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ. मजदूरों की यूनियन को तुरंत पंजीकृत किया जाये। साथ ही श्रम विभाग मैनेजमेंट से मजदूरों की मांगें मनवाने के लिए उचित कार्यवाही करे.

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री को किया शर्मसार

मुख्यमंत्री जब अपना सम्बोधन कर रहे थे तब केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के राज्यमंत्री धनसिंह उन्हें अवाक होकर देख और सुन रहे थे....

जगमोहन रौतेला

उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र रावत ने केन्द्रीय मानव संशाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत को उस वक्त आइना दिखा दिया, जब कल 12 जून 2017 को पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में ये लोग गाउन पहनकर कर बैठे थे. 

पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में गाउन पहने केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल और  अन्य 
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत जब समारोह में पहुँचे तो उन्होंने गाउन को फिरंगियों की पोशाक बताते हुए उसे पहनने से इंकार कर दिया. अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी दीक्षांत समारोह के लिए क्यों नहीं भारतीय पोशाक तय कर पाए. गाउन हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक भी बन गया है. इसे अब उतार दिए जाने का वक्त आ गया है. 

त्रिवेंद्र रावत ने पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के कुलपति से कहा कि अगली बार जब भी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह हो तो वह भारतीय पोशाक में हो. मुख्यमंत्री जब अपना सम्बोधन कर रहे थे तब केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व प्रदेश के राज्यमंत्री धनसिंह उन्हें अवाक होकर देख और सुन रहे थे. दोनों को शायद आभास भी नहीं रहा होगा कि जिस गाउन को पहनकर वे मंच में बैठे हैं, उसके खिलाफ ही मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत इस तरह की टिप्पणी ही नहीं करेंगे, बल्कि गाउन पहनने से इंकार तक कर देंगे. समारोह में राज्यपाल केके पॉल भी गाउन पहने हुए थे.

इस मामले में मुख्यमंत्री रावत अपने राज्यमंत्री के ऊपर भारी पड़ गए. उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा राज्य मंत्री बनने के बाद से ही डॉ. धनसिंह रावत वन्दे मातरम, विश्वविद्यालयों, डिग्री कॉलेजों में सौ फीट का तिरंगा फहराने व डिग्री कॉलेजों में यूनिफार्म लागू किए जाने जैसे बयान देकर पिछले दिनों बेहद चर्चा में रहे हैं. इन बातों के समर्थन में वह इससे देशभक्ति का जज्बा पैदा होेने, छात्रों के अनुशासित होने और पढ़ाई में गुणवत्ता आने की बात करते रहे हैं. 

मगर विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में गाउन व हैड पहनने की विदेशी परम्परा की ओर उनका ध्यान नहीं गया और इस मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने बाजी मार ली. मुख्यमंत्री के सम्बोधन के जवाब में विश्वविद्यालय के कुलपति ने भरोसा दिलाया कि अगला दीक्षांत समारोह भारतीय वेशभूषा में ही होगा. समारोह में राज्यपाल केके पॉल भी गाउन पहने हुए थे.

Jun 12, 2017

समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की निगाह में छोटा कैसे है

अगर गरीबों की तादाद ज्यादा है, तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे हैं। अखि‍र इस करोड़पति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की.... 

कुमार मुकुल

देश के तमाम छोटे—बड़े मीडिया समूह एक खबर चला रहे हैं कि 'आईआईटी में समोसे बेचने वाले का बेटा'। यह क्‍या तरीका है खबरें बनाने का। कल को अमित शाह जैसे राजनीतिज्ञ इसे 'बनिये का बेटा बना आईआईटीयन' कह सकते हैं। जब वे गांधी को बनिया कह सकते हैं, तो फिर उनसे और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है। 


आखिर यह मीडिया राजनीतिज्ञों की भ्रष्‍ट भाषा को अपना आधार क्यों बना रहा है। यह प्रवृत्ति इधर बढती जा रही है। किसी भी सफल युवा को उसके आर्थिक हालातों के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करना, जैसे जरूरी हो गया है। समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की नजर में छोटा क्‍यों है। केवल पैसे वालों के ही बेटे क्‍यों बढ़ें आगे। 

जाति, पेशे, धर्म, गरीबी आदि के आधार पर बांटने की राजनीतिज्ञों की बीमारी को मीडिया आखिर क्‍यों हवा दे रहा। एक ओर गुड़, तेल, चूरन बेचने वाले रामदेव को मीडिया योगीराज बताता है, जबकि रामदेव खुद अपना टर्नओवर (मुनाफा) बताते हुए खुद को मुनाफाखोर घोषित करते हैं। 

अगर वाकई यह लोकतंत्र है तो यह सहज होना चाहिए कि गरीब आदमी जिसकी संख्‍या ज्‍यादा है, उसको हर जगह ज्‍यादा जगह मिलनी चाहिए। खबर तो यह होनी चाहिए कि इस बार भी मुट्ठीभर अमीरजादों ने तमाम पदों पर कब्‍जा कर लिया।

संसद में साढ़े चार सौ के आसपास करोड़पति हैं। यह सवाल बार-बार क्‍यों नहीं उठाया जाता कि भारत में अगर गरीबों की तादाद ज्यादा है, तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे हैं। अखि‍र इस करोड़पति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की।

सिसौदिया के साले ने विश्वास के पीए को कहा कायर, कुमार के पीए का आरोप आप नेता कराते हैं विश्वास के खिलाफ खबरें प्लांट

सबकुछ ठीक नहीं आप में, कपिल के बाद अब विश्वास को निपटाने की तैयारी में जुटे हैं अरविंद के अपने 

कपिल मिश्रा कुमार विश्वास के घर के बाहर बैठे करते रहे ट्वीट पर मिलना तो दूर, कुमार के घर के दरवाजे भी नहीं खुले कपिल के लिए.  लेकिन आप समर्थक कथित मीडिया ने करा दी मुलाकात 

आप की आंतरिक कहानी कहती, दिल्ली से स्वतंत्र कुमार की रिपोर्ट 

जिन लोगों को ये लग रहा है कि आम आदमी पार्टी में पड़ी फूट खत्म हो चुकी है तो उन्हें ये गलतफहमी हैं। कल आम आदमी पार्टी से निष्काषित मंत्री व विधायक कपिल मिश्रा जब कुमार विश्वास के घर धरना देने पहुँचे तो कुमार घर पर नहीं थे और कुमार के घर के दरवाजे कपिल के लिए नहीं खुले। 


हालांकि कभी कपिल हर दूसरे दिन कुमार के घर जाते थे। कुमार के ना होने पर उनका घर के अंदर बैठ कर इंतज़ार भी करते थे। लेकिन आज न दरवाजा खुला न मुलाकात हुई पर पार्टी के सूत्रों से किसी ने ये ख़बर प्लांट करा दी कुमार की कपिल के साथ मीटिंग हो गई है और अब दोनों मिलकर नया आंदोलन चलाएंगे। 

खास बात ये है कि यह खबर एक उस पोर्टेल पर चली जिसे प्रो आप माना जाता है और दूसरे ऐसे पोर्टल पर चली जिसकी पार्टी के कुछ लोग तारीफ कर रहे थे( इस तारीफ का दावा किसी ओर ने नहीं कुमार के एक खास शिष्य ने ट्वीट करके बताई)।

खबर के ब्रेक होते ही कुमार के साथ रहने वाले उनके प्राइवेट पी ए शैल ने ट्वीट कर तंज़ कसा कि हमें पता है किसने ये खबर प्लांट करवाई है और इसके पीछे कौन हैं। 

इस ट्वीट के आते ही पार्टी के नवनियुक्त खजांची दीपक वाजपेयी का ट्वीट आ गया बताओ कौन है वो। उसका नाम बताओ जिसने ये खबर प्लांट करवाई है। 

खैर शैल का जवाब तो नहीं आया पर सोशल मीडिया पर आप की चल रही इस लड़ाई में डिप्टी चीफ मिनिस्टर मनीष सिसौदिया के साले साहब संजय राघव भी कूद पड़े और बोलने लगे ये शैल तो कायर है, डरपोक है ये किसी का नाम नहीं ले सकता।

इसके अलावा कुमार को लेकर पार्टी में उठी चिंगारी अभी राख नही हुई है क्योंकि कल ही अमानतुल्ला खान के पार्टी द्वारा कई कमेटियों का चेयरमैन बनाने पर लगे पोस्टर औऱ उसमें अरविंद केजरीवाल की तारीफ इस बात का इशारा कर रहे हैं कि कुमार के विरोधियों को पार्टी में कितना मान सम्मान मिल रहा है। कल ही हुई राजस्थान के वालंटियर्स के साथ कुमार की मीटिंग ओर उसमे बैठे मनीष दोनों के चेहरे देख कर कोई भी पढ़ सकता था कि इन दोनों के बीच बचपन वाली दोस्ती कहीं नहीं दिख रही। 

कवि अक्सर लोगों की आंखें और चेहरे पढ़ कर अपनी कविता पढ़ते हैं। पर कुमार ये भूल गए कि उनका चेहरा भी पढा जा सकता है। कुमार के चेहरे पर तनाव और गुस्सा साफ देखा जा सकता था (एक फोटो को छोड़ कर जब वो मंच छोड़ कर वालंटियर्स के बीच बैठे हैं)। 

ऐसे में ये समझ रहे हैं कि कुमार को राजस्थान देकर लड़ाई को समाप्त कर दिया गया है तो वो भूल कर रहे हैं। दरअसल पार्टी का गुजरात का चुनाव लड़ना पक्का नहीं है तो कुमार को राजस्थान भेजकर वहां का चुनाव लड़वाने का मतलब कुमार के सर पर भी एक हार का ठिकरा फोड़ कर उन्हें पार्टी से किनारे लगाना हैं। 

इसकी जड़ पंजाब चुनाव ही है क्योंकि पंजाब की हार के बाद ही कुमार ने वहांचुनाव की कमान संभाल रहे दुर्गेश पाठक ओर संजय सिंह के ख़िलाफ बोलना शुरू किया था। और उन्हें हार की जिम्मेदारी लेने के लिए भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दवाब डाला था।

Jun 10, 2017

तैयारी की स्ट्रीट लाइट के सामने, रियाज किया दरवाजे पर और टॉप कर गयी जिला

सफलता की कहानियां तो बहुत पढ़ते हैं आप, पर इस बेटी की इच्छाशक्ति देख आप दांतों तले अंगुलियां दबा लेंगे। इलाज के अभाव में मरे पिता की लाश पड़ी थी दरवाजे पर, हिम्मत नहीं थी कि परीक्षा केंद्र तक जाए, लेकिन विराट कोहली के उदाहरण ने उसे किया था इंस्पायर....

संजीव चौधरी

मुजफ्फरनगर। शुक्रवार 9 जून, 2017 को उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् की बोर्ड की हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं का परिणाम आया है, जिसके बाद कहीं ख़ुशी कहीं गम देखने को मिला। आज के भौतिक युग में जहां तमाम सुख—सुविधाओं के बाद भी कई सम्पन्न घरानों के बच्चे परीक्षा में ज्यादा अंक प्राप्त नहीं कर पाते, वहीं एक ऐसी प्रतिभा भी है जिसने गरीबी और मुफलिसी के बाद भी अपने मृतक पिता का सपना साकार किया है। मीनाक्षी ने गरीबी के चलते स्ट्रीट लाइट की रौशनी में पढ़कर इंटर की परीक्षा में न केवल अपना विद्यालय टॉप किया, बल्कि जनपद में दूसरा स्थान प्राप्त किया है।

अपनी माँ  के साथ मीनाक्षी 
मुजफ्फरनगर जिले के गांव अलमासपुर निवासी ऋषिपाल की बेटी मीनाक्षी शर्मा लाला जगदीश प्रसाद सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कालेज की 12वीं की छात्रा है, जिसने बोर्ड की परीक्षा में 500 में से 459 अंक पाकर अपना विद्यालय तो टॉप किया ही है, साथ में जनपद में भी दूसरा स्थान प्राप्त कर अपने मृतक पिता का भी सपना साकार किया है। मीनाक्षी बहुत गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है। उसके पिता की बीमारी के चलते और गरीबी के कारण इलाज के अभाव में उसी दिन मौत हो गयी थी, जिस दिन मीनाक्षी की अंग्रेजी विषय की परीक्षा थी। 

मीनाक्षी ने बताया उसके पिता रिक्शा चलाकर परिवार का पालन—पोषण करते थे। इसी बीच बीमारी के दौरान इलाज समय से ना करा पाने की वजह से उन्होंंने दम तोड़ दिया। पिता की मौत के बाद परिवार पर मानो आसमान टूट पड़ा और इसी मुफलिसी में मीनाक्षी ने स्ट्रीट लाइट की रौशनी और किवाड़ का ब्लैक बोर्ड बनाकर पढाई की।

मीनाक्षी कहती हैं, मेरे 90.8 प्रतिशत अंक आये हैं इस बात की ख़ुशी भी है, लेकिन पापा का गम भी है। आज मेरी फोटो तमाम पेपरों में छपी है, मगर यह सब देखने के लिए मेरे पापा जिंदा नहीं हैं। वो चाहते थे कि मेरा फोटो अखबार में छपे। पिता की मौत के बारे में बताते हुए वो कहती है, उन्हें सैप्टिक हो गया था। डॉक्टर ने हमें इसके बार में बताया नहींं। हमने सोचा ऐसे ही छोटी—मोटी फुंसी हैं ठीक हो जायेगी। बाद में जब हम उन्हें एसडी हॉस्पिटल लेकर गए तो सेप्टिक का पता चला। 

हमारी आर्थिक हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि हम उन्हें मेरठ ले जाते। हम उन्हें डॉक्टर अंसारी के पास लेकर गए। उन्होंने कहा दवाई दे देता हूं वो ठीक हो जाएंगे। हम उन्हें वापस घर लेकर आये तो उन्होंने सुबह अपनी पहली डॉज ली और फिर थोड़ी देर बाद उनकी डेथ हो गयी। 

जब पिता की मौत हुई उस वक्त मेरे दो पेपर रह रहे थे। मेरे पापा नानाजी के साथ काम भी करते थे। उन्होंने रेड़ा और रिक्शा भी चलाया। दरवाजे को ब्लैकबोर्ड क्यों बनाया? के जवाब में मीनाक्षी कहती हैं, गेट पर इस वजह से लिखा क्योंकि मेरा सब्जेक्ट मेथ था। उसमें एक सवाल करो तो पेज भर जाता है, तो काफी कॉपी यूज होती थी। 

ज्यादा कॉपी भरने पर मम्मी ने कहा बोर्ड पर लिख लो इसलिए मैंने दरवाजे को ब्लैकबोर्ड बना लिया। स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई की। रात को बेट्री चार्ज करा लेते थे तो उससे पढ़ती थी, सुबह 4 बजे से मोबाइल से पढ़ती थी।

मेरे नंबर अच्छे आए हैं, मगर मुझे थोड़ी ज्यादा की उम्मीद थी। इंग्लिस में मेरे नंबर कम आये हैं, क्योंकि उसी दिन मेरे पापा एक्सपायर हुए थे। पापा मुझसे कहते थे कि विराट कोहली के पापा जब एक्सपायर हुए थे, तो उसने अपने पापा को नही देखा था, वो देश के लिए खेल रहे थे। पापा की इस बात से मुझे सीख मिली और मैंने रोने के बजाय पापा की इस बात को गांठ बांध लिया। आगे क्या करने का विचार है? पूछने पर वो कहती है बीएससी करूंगी, फिर एमएससी और फिर यूजीसी नेट करके प्रोफेसर बनूंगी।

मीनाक्षी की सफलता पर उसकी मां पूजा शर्मा कहती हैं, ख़ुशी है, पर थोडा दुःख भी है। दुःख इसके पापा की तरफ से है कि वो नहीं रहे। उनका सपना था कि मेरी बेटी का फोटो न्यूज़ पेपर में छपे। आज इस लड़की ने अपने पापा का सपना पूरा किया है, लेकिन वो नही हैं। सारे रिश्तेदार मीनाक्षी की सफलता से बहुत खुश हैं। उनके न रहने से हमें आर्थिक कठिनाइयां आएंगी, पर मैं बिटिया की पढ़ाई रुकने नहीं दूंंगी। कुछ भी करूंगी उसके लिए। 

मैं मिडडे मील में काम करती हूं, मगर उसमें भी बहुत कम पैसा मिलता है, आगे अब कुछ और काम करने के लिए भी सोचना पड़ेगा। फिलहाल तो हमारा परिवार मीनाक्षी के नानाजी पर ही निर्भर है आर्थिक तौर पर। मगर वो भी बूढ़े हो रहे हैं।

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दिल्ली में डिस्टेंस एजूकेशन के केवल 1 प्रतिशत विद्यार्थी हुए पास

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 99 फीसदी बच्चे फेल हो गए ...

दिल्ली में इस बार पत्राचार से दसवीं की परीक्षा देने वाले 62000 विद्यार्थियों में से 60750 विद्यार्थी फेल हो गए हैं। आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने इस परीक्षा परिणाम को केजरीवाल सरकार की गलत शिक्षा नीति का नतीजा बताया है। इसके खिलाफ रविवार, 11 जून, 2017 को जंतर मंतर पर विद्यार्थी अपने माता—पिता और रिश्तेदारों के साथ धरना प्रदर्शन करेंगे। 

आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन का कहना है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 60750 बच्चे असफल हुए। गलत शिक्षा नीति के चलते इतने सारे विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। इन नीतियों के खिलाफ ही विद्यार्थियों ने धरना प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
  
आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने केजरीवाल सरकार से मांग की है कि सभी फेल विद्यार्थियों को री-टेस्ट का मौका दिया जाए। री-टेस्ट में पास होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में ग्यारहवीं में एडमिशन दिया जाए साथ ही री-टेस्ट में फेल होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में दसवीं कक्षा में एडमिशन दिया जाए।

आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने सभी असफल विद्यार्थियों और उनके माता—पिता से अपील की है वे ज्यादा से ज्यादा तादाद में आकर इस धरने को सफल बनाएं जिससे केजरीवाल सरकार की आंखें खुलें और वो अपनी गलत शिक्षा नीति की तरफ ध्यान दे।

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