Apr 28, 2017

सरकारी दिवसों के बूते न पुस्‍तकें बचेंगी, न भारतीय भाषाएं

बिखरती पुस्‍तकों की दुनिया

जिस हिन्‍दी के गाने, संगीत, शब्‍द हर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दुनियाभर के लोगों का मन मोह लेते  हों, घर—बाहर, बाजार, केरल से लेकर आसाम, अरुणाचल, कश्‍मीर तक जिस भाषा के बूते लोग जुड़ते हों, वह सरकारी दरवाजों पर पहुंचते ही भिखारी, दयनीय बना दी जाती है... 

प्रेमपाल शर्मा


23 अप्रैल दुनियाभर में पुस्‍तक दिवस के रूप में घोषित है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की विश्‍व संस्‍था ने सारी दुनिया में किताबों की महत्‍ता को मानते हुए एक दिन किताबों के लिए रखा है जिससे दुनियाभर के नागरिक किताबों के महत्‍व को समझ सकें। पढ़े, लिखें और उसमें अपना योगदान करें। पुस्‍तक दिवस में कापी राइट आदि भी शामिल है। 

दुनियाभर के मनीषियों के इन कदमों का मानव जाति की सुख समृद्धि शांति के लिए बडे़ दूरगामी प्रभाव हैं। अपनी अपनी मातृभाओं के लिए 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस, योग दिवस, जल, वातावरण जैसे कई दिवस इसीलिए मनाए जाते हैं।

संयुक्‍त राष्ट्र के चार्टर से बंधे होने के कारण मनाते तो हम भी हैं, कई संस्‍थान, सरकारें आयोजन भी करती हैं लेकिन यह एक रीति से ऊपर क्‍यों नहीं उठ पाता? किताबों की महत्‍ता जितनी भारत जैसे अविकसित, अर्धशिक्षित देश के लिए है उतनी तो अमेरिका, यूरोप की भी नहीं। कहने की जरूरत नहीं शिक्षा, ज्ञान को जन जन तक पुस्‍तकें तो ही पहुंचायेंगी। यह तो सभ्‍यता का वाहन है। इसलिए पुस्‍तकों की दुनिया का सबसे बड़ा आविष्‍कार कहा जाता है। क्‍या रामायण, कुरान, बाईबिल आज जिंदा रह पाते यदि इन्‍हें पुस्‍तकों के रूप में संरक्षित नहीं किया होता? 

हमारी भारतीय मनीषा, ग्रंथ भी बार बार पुस्‍तकों, विद्या को पूज्‍य रूप में स्‍वीकार करते हैं। कई त्‍यौहारों पर्व पर पुस्‍तकों को पूजा भी जाता है लेकिन मौजूदा समाज क्‍या वाकई उनके महत्‍व को समझ पा रहा है? मैं एक–दो उदाहरणों से बात को रखूंगा। 

फरवरी मार्च के महीने ज्‍यादातर विश्‍वविद्यालयों, सरकारी संस्‍थानों में कुछ-कुछ बजट को ठिकाने लगाने, कुछ अकादमिक सरगर्मी के होते हैं। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के एक कॉलिज में शिक्षा संस्‍कृति के आसपास के विषय का सेमिनार था। अच्‍छी बात यह भी कि उन दिनों पूरा कॉलिज सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों, नाटक, नृत्‍य, पेन्टिग्‍स, कविता, भांगड़ा से लेकर खेल के कार्यक्रमों में तरबतर था। 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस था। मैंने सुझाव दिया कि अच्‍छा हो अपनी भाषा- हिन्‍दी पंजावी-उर्दू की किताबों का एक स्‍टॉल भी लगा दिया जाए और उसकी महत्‍ता भी बताई जाए। यूएन का घोषित दिवस है अच्‍छी तरह मनाया जा सकता है। 

विशेषकर जब कॉलिज में हजार-पांच सौ विद्यार्थी हों तो और भी बड़ी बात है वरना आजकल ऐसे दिवस मनाने के लिए राजभाषा सप्‍ताह की तरह लोगों को पकड़—पकड़कर लालच देकर शामिल किया जाता है। प्राचार्य हिन्‍दी की थीं उन्‍होंने लगभग अनसुना कर दिया। फिर समझाया तो बोली जो प्रकाशक किताबें लगायेगा, यहां बेचेगा वो हमारे लिए क्‍या करेगा-बदले में। 

इस सौदेबाजी से कोई भी चौंक सकता है। उन्‍होंने खुद ही कहा-वे हमारे बच्‍चों के आई कार्ड बनवा दें या कोई और मदद कर दें तो किताबों की स्‍टॉल लगा सकते हैं। मुझे कहना पड़ा कि मेरा कोई प्रकाशक जानने वाला नहीं है आप जिसे चाहे बुलायें। मैं तो बस मातृभाषा की सार्थकता के बारे में कह रहा हूं। आखिर मातृभाषा दिवस यूं ही चला गया। 

ऐसा ही एक अनुभव एक मंत्रालय का। कुछ वर्ष पहले सोचा कि पुस्‍तक दिवस पर कुछ अच्‍छी किताबें कर्मचारियों को दी जाएं। राजभाषा विभाग तुरंत तैयार, लेकिन जब बांटते वक्‍त किताबों का बंडल खोला तो न उसमें प्रेमचंद थे न टैगौर न, गांधी, नेहरू। कुछ कुंजीनुमा किताबें उन्‍होंने अपने किसी कमीशन के तहत मंगा ली थी। 

सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं रोजाना की जिंदगी में यानि की वही पुराना जुमला-आप घोड़े को तालाब के किनारे खींच तक ला सकते हो, पानी नहीं पिला सकते। यू एन घोषित करे या भारत सरकार, हमारे सारे दिवसों की यही नियति बन चुकी है। जरूरत है तो समाज को चेताने की कि किताबें क्‍यों जरूरी हैं? क्‍यों शिक्षा में सिर्फ पाठयक्रम की चंद किताबों से काम नहीं चलने वाला? 

हर मां-बाप और शिक्षक को किताबों का महत्‍व बताने की जरूरत है। पुस्‍तकालय को समृद्ध करने की कि इनके बिना शिक्षा ज्ञान के किनारों तक भी नहीं पहुंच सकते। लेकिन सबसे मुश्किल यही काम है। विशेषकर पढ़े लिखे मध्‍यम वर्ग को समझाना क्‍योंकि उन्‍हें भ्रम है कि वे सब समझते हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइस्‍टाइन ने इन्‍हीं को इशारा करके कहा है कि किसी भी नए ज्ञान की वाधा ऐसे ही लोगों का पूर्व ज्ञान और अभिमान है।


पुस्‍तक दिवस के बहाने बार बार इसी भूमिका को पहचानने, जानने और परखने की जरूरत है। लेकिन वक्‍त के साथ बदलने की जरूरत भी है। अब केवल पिछले पांच सात सौ साल से चली आ रही जिल्‍द को ही पुस्‍तक न माना जाए। अब उसके अनेकों रूप हैं। कम्‍पयूटर पर, किंडल पर। नाम पुस्‍तक ही है। प्रयोजन भी वही तो सिर्फ कागज पर छपी पुस्‍तक हठ का  क्‍यों?दुनिया भर में इस नए रूप का स्‍वागत हो रहा है। इसी उपयोगिता के कारण एक मुटठी में बंद उपकरण और उसमें चार-छ: सौ किताबें। अनेकों भाषाओं की। 

आप विदेश यात्रा पर हैं या पहाड़ की सैर या किसी सेमिनार में इतना बोझ न लाद सकते, न जरूरत। पूरी नयी पीढी़ इसका आनंद ले रही है। कभी हाथ से लिखी किताब होती थी, फिर छपाई शुरू हुई। हर रूप में किताब ने दुनिया को बदला है। वस एक ही शर्त कि किताबों के बिना काम नहीं चलने वाला और पश्चिमी सभ्यता ने इसे समझ लिया है। अब बारी हमारे जैसे पूर्व उपनिवेश देशों की है।

इसी से एक बड़ा प्रश्‍न और जन्‍म लेता है। कौन सी किताबें? किस भाषा में? किस विषय की। यहां सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष अपनी भाषा का है। शिक्षा का बुनियादी शब्‍द। पढ़ने का जो आनंद अपनी भाषा में होता है वह परायी में नहीं। इसलिए विदेशी भाषा यदि जरूरत हो तो हम सीखें, सिखायें लेकिन मातृभाषा की कीमत पर नहीं। दुर्भाग्‍य से हिन्‍दुस्‍तान जैसे पूर्व गुलाम देशों में आज यही हो रहा है और इसलिए पूरी नयी पीढ़ी किताबों से दूर भाग रही है। हर स्‍कूल, कॉलिज में बच्‍चों, छात्रों पर अंग्रेजी माध्‍यम लाद दिया गया है। लादने की यह प्रक्रिया पिछले 20 वर्षों में शिक्षा के निजीकरण और ग्‍लोलाइजेशन की आड़ में और तेज हुई है और उसी अनुपात में पुस्‍तक पढ़ने की संस्‍कृति में कमी आई है।

हमारे लोकतंत्र में कुछ शासक भी पिछले दिनों ऐसे आये जो आक्‍सफोर्ड, केंब्रिज, वाशिंगटन को ज्‍यादा जानते हैं बजाए इस देश, उसकी भाषा, संस्‍कृति को। इसलिए जब तक अंग्रेजी एक विषय के रूप में छठी के बाद पढ़ाई जाती रही नुकसान नहीं हुआ। माध्‍यम बनाने से शिक्षा भी चौपट हुई, किताबें पढ़ने की रूचि, अभिरूचि भी। बच्‍चे रटते जरूर हैं लेकिन किताबों की तरफ उस आनंद से नहीं देखते जैसा हम सब ने अपने अपने बचपन में प्रेमचंद, रवीन्‍द्र, गोर्की को अपनी अपनी भाषाओं में सारी दोपहरी फिर सूरज छिपने तक या फिर ढिबरी, लालटेन जलाकर पढ़ा था। किताबों की इसी दुनिया ने पूरी दुनिया को हमें इतना मोहक दिखाया, बनाया।

किताबों की संस्‍कृति बढ़ाने के लिए इस बुनियाद पर काम करने की जरूरत है। यह कोई नयी बात नहीं है। आजा़दी के बाद देश के सभी कर्णधारों में अपनी अपनी भाषा, संस्‍कृतियों के लिए यह भावना थी और उसके विकास, संवर्धन के लिए प्रयास भी किए गए। 1964- 1966 में गठित कोठारी आयोग और भारतीय भाषाओं के पक्ष में उनकी सिफारिशों इसी दिशा में बढ़ाने का प्रयास था। समान शिक्षा और अपनी भाषाओं में। 

वर्ष 1968 में संसद ने भी माना इन सिफारिशों को।फिर उल्‍टा क्‍यों हुआ?  बहुलता वाद, बहु भाषावाद के ऊपर अकेली अंग्रेजी क्‍यों हावी होती गयी? कौन सी पार्टी सत्ता में थी? इन सब कारणों से जहां हिन्‍दी के बड़े बड़े पत्र धर्मयुग, दिनमान डूबते गए, बडे़ बड़े लेखक भी सिकुड़ कर तीन सौ के संस्‍करणों तक आ गए। जब अपनी भाषा की किताबें बिकेंगी ही नहीं तो लिखेगा भी कोई क्‍यों? सामाजिक विषयों की किताबें अपनी भाषा में दरिद्रता का एकमात्र यही कारण है। 

इतिहास के पन्‍ने पलटकर देखने पर यह संतोष होता है कि आज़ादी के वक्‍त लगभग हर भारतीय भाषा का साहित्‍य ज्‍यादा समर्थ पठनीय था। जाने माने समाज शास्‍त्री, लेखक, इतिहासकार पार्थो चटर्जी ने एक लेख में लिखा है कि उन्‍नीसवी सदी के अंत में बंगला में समाज विज्ञान, विज्ञान की किताबें मूल बंगला में पहले लिखी गयी हैं, उनका अंग्रेजी में अनुवाद बाद में हुआ और इसके पीछे कोई सरकारी प्रश्रय संरक्षण नहीं था। सब निजी प्रयास थे। ज्ञान को फैलाने की तमन्‍ना थी। कुछ कुछ यही अनुभव हिन्‍दी का है। नागरी प्रचारणी, महावीर प्रसाद द्विवेदी,  प्रेमचंद, रामचंद शुक्‍ल प्रमृति विद्वानों ने अपने अपने बूते भाषा पुस्‍तकों की दुनिया को समृद्ध किया है।

सबक यह भी कि केवल सरकारी आयोजन, ग्रांट, वजीफे से ही संस्‍कृति के स्रोत जिंदा नहीं रहते । कई बार तो बर्बाद ही करते हैं। ऐसा नहीं कि सरकार या स्‍कूल इस गिरावट से अनभिज्ञ हैं। इसे चाहे यूएन के आदेशों का पालन कहिए या दुनियाभर के शिक्षाविदों की बातें, आग्रह कि लाइब्रेरी, पठन—पाठन की दुनिया को बढ़ावा दिए बिना वांछित अकादमिक स्‍तर तक नहीं पहुंचा जा सकता। 

कुछ वर्ष पहले संभवत: एनसीईआरटी या माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड की पहल पर केन्‍द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने कुछ पहल भी की थी जिसमें देशभर में  6000 पुस्‍तकालय खोलना आदि भी शामिल था। सीबीएसई के स्‍कूलों में पाठयक्रम में भी साहित्‍य की किताबें –प्रेमचंद, मंटो, रवीन्‍द्र शेक्‍सपियर को पढ़ने  की छूट दी थी ओर उसका आकलन यानि नंबर भी। बड़ज्ञ अच्‍छा लगा जानकर लेकिन स्‍कूलों में वह कभी उस रूप में लागू नहीं हुआ। कुछ स्‍कूलों ने इसी आड़ में अंग्रेजी की कुछ और नीरस किताबें बच्‍चों को थमा दीं। पैसे भी कमाए। लेकिन बच्‍चों ने उन्‍हें नहीं पढ़ा। 

गलती स्‍कूलों की भी उतनी नहीं है जितनी अंग्रेजी की तरफ लालच से देखते अभिभावकों की। वे खुद अंग्रेजी की किताबों की मांग करते हैं। अंग्रेजी ठीक करने का ऐस दौरा पड़ा हुआ है कि मैट्रो, एयरपोर्ट, रेलवे स्‍टेशन पर न हिन्‍दी की किताबें दिखती न कोई पढ़ता हुआ। क्‍या अस्‍सी के आसपास हमें गुलशन नंदा, इब्‍ने सफी कोई पढ़ने देता था? लेकिन आज ऐसी ही प्रेमकथा की किताब हॉफ गर्ल फ्रेंड-चेतन भगत मां बाप बच्‍चों को खरीद कर पढ़ने के लिए इसलिए ला रहे हैं कि अंग्रेजी तो ठीक हो जाए। सारी नैतिकता चली गई चूल्‍हे में। इसलिए पुस्‍तक संस्‍कृति पर बात करते हुए भाषा के इस प्रश्‍न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अब जिस पीढी़ ने पहली क्‍लास से कॉलिज, इंजीनियरिंग कॉलिज, मेडिकल, लॉ या किसी भी पाठयक्रम में अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाई की है अपनी अंग्रेजी को विदेशी विश्‍वविद्यालयों में दाखिले की खातिर, अंग्रेजी नावेल, फिल्‍में, सेमिनार सुन सुनकर मांजा है, उसे क्‍या भारतीय संस्‍कृति, अपनी भाषा, संस्‍कृत की विरासत के एकाध इंजेक्‍शन से बदला जा सकता है? यह सूखे पेड़ की पत्तियों पर पानी छिड़कने से ज्‍यादा नहीं है। पानी की जरूरत जमीन और उनकी जड़ों को है और यह जड़ है स्‍कूली, माध्‍यमिक और उच्‍च शिक्षा में अपनी भाषा। अंग्रेजी या दूसरी भाषाएं भी हों, लेकिन उच्‍च शिक्षा में पहुंचने पर। उससे पहले नहीं।

आश्‍चर्य की बात है कि जिस हिन्‍दी के गाने, संगीत, शब्‍द हर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दुनियाभर के लोगों का मन मोह लेते  हों, घर बाहर बाजार केरल से लेकर आसाम, अरूणाचल, कश्‍मीर तक जिस भाषा के बूते लोग जुड़ते हों, वह भाषा सरकारी दरवाजों पर पहुंचते ही कैसे भिखारी, दयनीय बना दी जाती है। संकेत साफ है- सरकारी दिवसों के बूते न पुस्‍तकें बच सकती, न भारतीय भाषाएं। 

मंडी हाउस के मैट्रो के अंदर आक्‍सफोर्ड बुक्‍स ने लगभग बीस किताबों के सुदंर विज्ञापन लगा रखे हैं। सभी अंग्रेजी में। लेकिन कई उनमें से हिन्‍दी, बांगला, मलयालम की किताबों के अनुवाद भी हैं। अच्‍छा संकेत है पुस्‍तकों को पढ़ने को प्रेरित करने का लेकिन क्‍या हिन्‍दी का भी कोई प्रकाशक या लेखक ऐसा करने की पहल करेगा?  

ऐसा नहीं कि भारतीय भाषाओं में  अच्‍छा नहीं लिखा जा रहा, कारण वे सब हैं जो पूरी शिक्षा संस्‍कृति और सरकार पर हावी है। पुस्‍तक संस्‍कृति को यदि बदलना है तो लेखक, प्रकाशक, अभिभावक, शिक्षक सभी को अपनी अपनी भूमिकाओं पर पुर्नविचार करना होगा। 

Apr 27, 2017

रमेश लोधी की हत्या में आपकी पुलिस किसे बचा रही है योगी जी!

लाश लावारिश थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था.....

रमेश लोधी की संदिग्ध हालात में हुई मौत पर परिजनों से पूछताछ करता जांच दल
नन्हे पहलवान नहीं रहे. वह लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके के गांव मजरे फतहापुरवा के निवासी थे. वह मामूली आदमी थे लेकिन उनकी मौत की खबर इसलिए ख़ास है क्योंकि वह उस रमेश लोधी के चाचा थे जिसकी पिछली 7 अप्रैल को रहस्यमय तरीके से मौत हुई थी। वही इस मामले के प्रमुख पैरोकार भी थे. नन्हे स्वाभाविक मौत नहीं मरे. पुलिस ने पहले उनका भतीजा छीना और फिर इंसाफ मांगने पर उनका जीना मुहाल कर दिया। ख़ास बात यह भी कि उन्होंने उन चार लोगों को बेकसूर माना था जिन्हें पुलिस ने उनके भतीजे रमेश की हत्या के मामले के आरोपी के बतौर जेल भिजवा दिया.  

यह मामला मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की घोषणा को भी ठेंगा दिखाती है, क्योंकि योगी ने इसे अपनी सरकारी की प्राथमिकताओं में शुमार किया है। यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि नन्हे पहलवान ने अपने भतीजे की हत्या के मामले में एसएसपी समेत मुख्यमंत्री के जनता दरबार में भी इंसाफ की गुहार लगायी थी, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला।    
         
इंसानी बिरादरी, रिहाई मंच और इंसाफ अभियान संगठनों से जुड़े लोगों ने इस पूरे मामले की छानबीन एक जांच दल के जरिए की, जिसके नतीजे पुलिस को ही कटघरे में खड़ा करते हैं. जांच दल के मु​ताबिक भतीजे की पुलिस हिरासत में हुई मौत ने नन्हे पहलवान को बुरी तरह झकझोर दिया था. घरवालों की मर्जी के खिलाफ पुलिस उसका शव पोस्टमार्टम हाउस से सीधे भैंसाकुंड ले गयी थी, जहां विद्युत शव गृह में उसे फूंक दिया गया. घरवाले चाहते थे कि शव पहले उनके गांव ले जाया जाये लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी. 

रमेश लोधी की मौत शक के घेरे में है. उसकी हत्या के आरोप में जेल में बंद लोगों के परिजनों और पड़ोसियों के मुताबिक़ 6-7 अप्रैल की रात कोई सवा बजे इंदिरा नगर के दायरे में शामिल हो चुके चांदन गांव के सुनसान कोने में स्थित कय्यूम के घर चोर घुसा था. आहट से घरवालों की नींद टूट गयी, शोर से पड़ोसी भी जाग गये और रमेश लोधी पकड़ा गया. उसकी थोड़ी बहुत पिटाई हुई और 100 नंबर पर उसके पकड़े जाने की सूचना दे दी गयी.

पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, लेकिन उसने पानी-मिट्टी से सने चोर को अपने वाहन में बिठाने से परहेज किया और चोर को गोमती नगर थाना पहुंचाने की जिम्मेदारी कय्यूम और उसके पड़ोसी अकील पर लाद दी. मोटरसाइकिल पर दोनों के बीच चोर बैठा. पड़ोसी होने के नाते दूसरी मोटरसाइकिल से इरफान और बबलू भी साथ हो लिये. रात ढाई बजे तक चारों अपने घर वापस भी लौट आये. यही चारों बाद में रमेश के हत्यारोपी बना दिये गये. चारों गरीब परिवार से हैं और अपने घरों के मुखिया भी हैं. उनके जेल चले जाने के चलते उनके परिवार भीषण तंगी से गुजर रहे हैं.

पुलिस कहती है कि उसने चोर को अपने कब्जे में लिया था, लेकिन वह उसकी पकड़ से भाग निकला. उसे बहुत खोजा गया लेकिन वह हाथ न आया. दूसरे दिन सुबह तकरोही से सटी मायावती कालोनी के पास लावारिस लाश मिली. 100 नंबर पर इसकी सूचना मिलने पर पुलिस आयी और उसे मेडिकल कालेज ले कर चली गयी. उसे लावारिश घोषित कर दिया गया.

नन्हे पहलवान कहते रहे कि रात कोई 3.30 बजे पुलिस उनके घर आयी थी और उनसे रमेश लोधी के बारे में पूछताछ की थी. लेकिन यह नहीं बताया कि आखिर इतनी रात में की जा रही पूछताछ के पीछे माजरा क्या है. अगले दिन यानी 7 अप्रैल को कोई 11.30 बजे पुलिस फिर गांव आयी और उनसे मोबाइल पर एक धुंधली सी तसवीर पहचानने को कहा. नन्हे पहलवान और फिर रमेश की मां सताना समेत घर के दूसरे सदस्यों और पड़ोसियों ने भी उस तसवीर को नहीं पहचाना, तो भी पुलिस ने नन्हे पहलवान पर पोस्टमार्टम हाउस चलकर लाश की पहचान करने का दबाव बनाया.

नन्हे पहलवान ने लाश को देखते ही उसकी पहचान अपने भतीजे के तौर पर कर दी. इसके बाद पुलिस ने रहस्यमयी मुस्तैदी दिखायी और लाश को फ़टाफ़ट फुंकवा दिया. इस बीच सूचना पाकर रमेश की बहन बिंदेश्वरी सीधे भैंसाकुंड पहुंची थी और उसने लाश को गांव ले जाने की ज़िद पकड़ी। उसने पुलिस की इस जल्दबाजी के पीछे किसी साजिश की आशंका भी जतायी, लेकिन उनकी आवाज अनसुनी कर दी गयी. 

शवदाह के समय मौजूद लोगों ने कुछेक पुलिसवालों को फोन पर किसी को कुछ ऐसा भरोसा दिलाते हुए सुना कि सब ठीक हो जायेगा सर, कि काम पूरा हो गया सर. शव दाह के फ़ौरन बाद पुलिस नन्हे पहलवान को थाने पर पहुंचने का आदेश देकर चलती बनी. थाने में समझौते की बात चल रही थी और उनसे किसी कागज़ पर अंगूठे का निशान लिया जाना था. इस बीच वह दवा लेने बाहर निकले. इस बहाने उन्होंने किसी वकील से संपर्क साधा और उसकी सलाह पर वापस थाने जाने के बजाय सीधे अपने घर चले गये.

इसके बाद पुलिस कैलाश लोधी के पीछे पड़ गयी जो नन्हे थाने से मेडिकल की दुकान तक ले गये थे. पुलिस को लगा कि नन्हे पहलवान के थाना वापस न लौटने के पीछे कैलाश लोधी का हाथ है. पुलिस ने उन्हें धमकाया, लगातार उनका फोन घनघनाया और रिस्पांस न मिलने पर उनके घर भी धमक गयी. उन्हें भी डर है कि पुलिस उन्हें कभी भी फंसा सकती है.

इस डर की छाया नन्हे पहलवान की अंतिम यात्रा के दौरान भी दिखी. इस मामले पर सबने जैसे खामोशी ओढ़ रखी थी. एक नौजवान के मुताबिक सुबह नन्हे पहलवान बहुत उदास थे और कह रहे थे कि अब कुछ नहीं होनेवाला. पुलिस बच निकलेगी और चार लोग पुलिस के गुनाह की सजा भुगतेंगे, उन बेचारों के घर बर्बाद हो जायेंगे. 

ढेरों सवाल हैं. लोगों का बयान है कि चोर को थाने ले जाया गया था. क्यों न माना जाये कि थाने में उसकी बेरहम पिटाई हुई जिससे वह लाश में बदल गया. खुद को बचाने के लिए पुलिस ने उसकी लाश सड़क किनारे फेंक दी और फिर लावारिश लाश की बरामदगी दिखा दी. तो फिर पुलिस देर रात नन्हे पहलवान के घर रमेश लोधी के बारे में पूछताछ करने क्यों और किस आधार पर गयी थी. 

सवाल यह भी कि लाश लावारिश थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था. यह झूठी बात क्यों फैलायी गयी कि रमेश शादीशुदा था, कि उसकी पत्नी उसकी इन्हीं आदतों के चलते छह माह पहले उसे छोड़कर जा चुकी थी. जबकि रमेश अविवाहित था और हिंदू समाज में अविवाहित को जलाने की नहीं, दफनाये जाने की परंपरा रही है. तो क्या शवदाह और उसमें जल्दबाजी के पीछे पुलिस की मंशा अपने गुनाहों के सबूत मिटाने की थी. पुलिस किस बात का समझौता कराना चाहती थी और क्यों. नन्हे पहलवान के हमदर्दों के खिलाफ पुलिस ने निशाना क्यों साधा. ऐसा माहौल क्यों बनाया कि लोग चुप रहें, कि इसी में अपनी भलाई समझें.

जांच दल ने मांग की है कि मुख्यमंत्री और एसएसपी को भेजी गयी नन्हे पहलवान की अर्जी के मुताबिक़ फ़ौरन कार्रवाई हो और पुलिस की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए जाएं. जांच दल में इंसानी बिरादरी के आदियोग और वीरेंद्र कुमार गुप्ता, रिहाई मंच के अध्यक्ष शोएब मोहम्मद, महासचिव राजीव यादव और अनिल यादव, इंसाफ अभियान की गुंजन सिंह, विनोद यादव और परवेज सिद्दीकी शामिल थे।

Apr 26, 2017

हलाला में इतना मजा क्यों आ रहा है मर्दो!

धार्मिक मान्यताओं, वोटबैंक की राजनीति से उठकर सबको ये मानना होगा कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मान्यताएं और चलन महिलाओं की गरिमा और उनके हक के खिलाफ हैं, इन पर जितनी जल्दी हो सके रोक लग जानी चाहिए.....

मनोरमा


तीन तलाक और हलाला का मसला इन दिनों सुर्खियों में है, खासतौर से हाल ही में इसके विरोध और मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के संदर्भ में दिए गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान के बाद से। 

मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में से एक रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ द्वारा ग्यारह मई को तलाक, हलाला और बहु-विवाह की संवैधानिक स्थिति पर सुनवाई होने वाली है, ऐसे में इन मसलों पर बहस और चर्चा का बाजार पूरे देश में गर्म है। बहुत संभावना है कि जल्द ही सरकार की ओर से  मुस्लिम पर्सनल लॉ में आवश्यक बदलाव लाकर तीन तलाक को खत्म कर दिया जाएगा। 

लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। देश की पूरी राजनीति का इन दिनों इसके समर्थन और विरोध में ध्रुवीकरण हो चुका है। राजनीतिक दलों के अपने एजेंडे हैं और उनका कोई भी रुख मुस्लिम महिलाओं और समाज की बेहतरी से ज्यादा अपने वोटबैंक की चिंता में है। दूसरी ओर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऐसे ही तमाम संगठन जहां अब भी मुस्लिम शरीआ कानूनों में दखलअंदाजी के खिलाफ हैं, वहीं मुसलमान महिलाओं का एक बड़ा तबका तीन तलाक और हलाला जैसे प्रावधानों को खत्म किए जाने के पक्ष में है।

बहरहाल, तीन तलाक और निकाह हलाला पर चल रही बहस ने एक खास मानसिकता के लोगों को धार्मिक आधार पर टिप्पणियां करने, मुस्लिम औरतों का उपहास और भौंडा मजाक करने का भी मौका दे दिया है, क्योंकि हलाला उनके लिए मजा लेने की चीज है। तीन तलाक मसले पर बहस के बाद से सोशल मीडिया पर हलाला को लेकर ऐसी ही उपहास करने वाली हलाला सेवा मुफ्त में देने के प्रस्तावों के साथ ढेरों टिप्पणियां पढ़ी जा सकती हैं। 

गौरतलब है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला से अगर उसका पूर्वपति फिर से शादी करना चाहता है तो उसे निकाह हलाला करना होता है, जिसके तहत महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से निकाह करना होता है,शारीरिक संबंध बनाना होता है और फिर उससे तलाक मिल जाने पर उसका पहला पति उससे दुबारा शादी कर सकता है। बहुत से मामलों में दूसरे पति के तलाक नहीं देने पर मामला बिगड़ भी जाता है इसलिए इसके तोड़ में 'हुल्ला' प्रथा का प्रचलन हुआ है, जिसके तहत मौलवी उसी पुरुष से विवाह करवाते हैं जो निश्चित तौर पर तलाक दे देता है। 

इन दिनों 'हुल्ला' के तहत विवाह करने वाले पुरुष इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं, सोशल मीडिया पर उनके पेज हैं और ये उनकी कमाई का भी जरिया है। दरअसल, निकाह हलाला का प्रावधान इसलिए बनाया गया था ताकि कोई भी पुरुष सोच—समझकर तलाक दे, गुस्से में नहीं, लेकिन ये कबीलाई और पुरुष बर्चस्ववादी मानसिकता के तहत ही था जिसमें औरत और उसका जिस्म पुरुष की संपत्ति और उसकी इज्जत होता है। 

हलाला के तहत किसी की पत्नी का अन्य पुरुष से विवाह और शारीरिक संबंध उनके लिए एक सजा के तौर पर ही था। जाहिर है आधुनिक समाज के मानकों पर इस तरह की प्रथाएं बहुत त्रासद हैं, इन्हें जितनी जल्दी हो सके खत्म किया जाना चाहिए।   

इस मामले में केन्द्र सरकार की काउंसिल माधवी दीवान ने स्पष्ट किया है कि बहुविवाह का किसी विशेष धार्मिक मान्यता से कोई लेना देना नहीं है, यह एक सामाजिक चलन रहा है और सदियों पहले से ग्रीक, रोमन, हिंदू, यहुदियों, पारसी सभी धार्मिक समुदाय में प्रचलित था। तीन तलाक और हलाला प्रथा भी अपने समय का सामाजिक चलन थी और उस समय के सुविधा के अनुसार विकसित व प्रचलित हुई थी। इसलिए संविधान की धारा 25 या धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत इनके संरक्षण का तर्क नहीं दिया जा सकता, ये दोनों अलग बातें हैं।
   
हालांकि कहा जाता है कि इस्लाम में औरतों को बराबरी का दर्जा हासिल है और शादी से लेकर तलाक तक उनके हकों की पूरी तरह से हिफाजत की गई है। मसलन, औरत की रजामंदी के बगैर निकाह नहीं हो सकता, उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए मेहर का प्रावधान है और तलाक के जवाब में औरतों के पास खुला का विकल्प है जिसके तहत वो काजी के पास जाकर तुरंत अपनी शादी से मुक्त हो सकती हैं, खुला में इद्दत जैसी अवधि का भी पालन नहीं करना पड़ता है। 

इसके अलावा तलाक के बाद भी औरतों को लगभग तीन महीने की अवधि बगैर किसी अन्य पुरुष के संपर्क में आए बिताना होता है ताकि इस अवधि में उसके गर्भवती होने का पता चला तो संतान को उसका हक मिल सके। लेकिन जमीनी सच कुछ और है और पुरुषों के अनुकूल है उन्हें ‘तलाक-उल-सुन्नत’ और ‘तलाक-ए-बिदात’ का हक हासिल है। पहले प्रावधान के तहत तलाक के बाद तीन महीने इद्दत की अवधि होती है जिसमें पति पत्नी 40 दिन तक साथ ही रहते हैं, सुलह नहीं होने पर फिर तलाक दिया जाता है और फिर 40 दिन साथ रहने की अवधि होती है इसके बाद भी सुलह नहीं होती तो अंतिम तलाक मुकर्रर हो जाता है। जबकि ‘तलाक-ए-बिदात’ के तहत एक मुस्लिम पति अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ शब्द बोलकर तलाक दे सकता है, ज्यादातर मामलों में पुरुषों द्वारा इसी का फायदा उठाया जाता है। 

शायद यही वजह है कि शाहबानो से लेकर अब शायराबानो ने इंसाफ के लिए अदालत के दरवाजे पर दस्तक दी है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास नहीं। तीन तलाक कैसे मुस्लिम महिलाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ है, इसे हाल के कुछ मामलों से समझा जा सकता है। इसी महीने आगरा में एक महिला को दो बेटियों को जन्म देने के कारण फोन पर तलाक मिल गया और एक ताजा मामले में राष्ट्रीय स्तर की नेटबॉल खिलाड़ी शुमेला जावेद को उसके पति ने फोन पर केवल इसलिए तीन बार 'तलाक' कह दिया क्योंकि उन्होंने एक बच्ची को जन्मक दिया है।

अमरोहा में अपने माता पिता के साथ रह रही शुमेला ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से इस मामले की जांच करने और कार्यवाही करने का अनुरोध किया है। इसी तरह के एक और मामले में  गाजियाबाद की दो बहनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फोन पर तलाक मिलने के बाद मदद की गुहार की है, सउदी अरब में काम करने वाले उनके पतियों ने भी उन्हें फोन पर ही तलाक दे दिया था। शाहजहांपुर की एक लड़की को पहले फेसबुक पोस्ट पर तीन बार तलाक लिखकर तलाक दिया गया, फिर बाद में बाद में एसएमस के जरिए। 

तलाक का ये तरीका न सिर्फ देश के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि लैंगिक बराबरी के आधुनिक मूल्यों के भी। पूरे विश्व के 25 से ज्यादा इस्लामी देशों में तलाक शरीया कानूनों के तहत मान्य नहीं है, बल्कि इसके लिए अलग से कानून बनाया गया है। भारत में कानूनी बहस के दायरे में यह मुद्दा पिछले साल फरवरी में तब आया जब जब तीन तलाक की एक पीड़िता शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 1985 में शाहबानो मामले ने तीन तलाक के मसले को राष्ट्रीय बहस के दायरे में लाया था, जब बासठ साल की उम्र में पांच बच्चों की मां शाहबानो को उनके वकील पति ने 1978 में तलाक दे दिया था। तीन साल बाद शाहबानो ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया, सुप्रीम कोर्ट ने  अप्रैल 1985 में उनके पति को अपनी 69 वर्षीय पत्नी को प्रति माह 179 रुपये 20 पैसे गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। 

तत्कालीन सरकार ने अगर वोटबैंक की राजनीति से हटकर मुस्लिम समाज पर दूरगामी असर करने वाला दूरदर्शी फैसला लिया होता, तो आज ये नौबत ही नहीं आती। सामाजिक और राजनीतिक दोनों लिहाज से वो दौर आज से ज्यादा अनुकूल था ऐसे फैसलों के लिए, लेकिन मुस्लिम समुदाय के यथास्थितिवादियों को अदालत का फैसला मंजूर नहीं था और युवा व आधुनिक विचारों वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी डर गए। उन्होंने आरिफ मोहम्म्द खान जैसे नेताओं की अनदेखी कर कांग्रेस के बाकी हिंदू मुसलमान नेताओं के साथ मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड की बात मानना ज्यादा अनुकूल समझा और 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित करके सु्प्रीम कोर्ट के 23 अप्रैल, 1985 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत परित्यक्त या तलाकशुदा महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है, यह मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों में कोई विरोधाभास नहीं है। 

जाहिर है यह कितनी बड़ी भूल या गलती थी आज तीस साल बाद इसका मूल्यांकन बेहतर किया जा सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज देश भर की हजारों मुस्लिम महिलाएं इसके विरोध में सरकार पर दबाव बना रही हैं, इस प्रथा को खत्म करने की मांग पर मुखर होकर बोल रही हैं और देशभर में हस्ताक्षर अभियान चला रही हैं।

दरअसल, धार्मिक स्वतंत्रता की पैरोकारी के बावजूद आधुनिक समाज के लिए नियम कानून आधुनिक समय के तकाजों के अनुसार ही होने चाहिए। मसलन, धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सती प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को चलते रहने नहीं दिया जा सकता था और अंतरजातीय, अंतरधार्मिक व प्रेमविवाह को अमान्य नहीं किया जा सकता था, इसलिए आजादी से पहले और बाद में भी आवश्यक संशोधन करके हिन्दू विवाह अधिनियम में कुप्रथाओं को हटाकर आधुनिक मूल्यों को शामिल किया गया, जिसमें कानूनी तलाक का प्रावधान भी शामिल है।

शादी के तौर तरीके, रीति रिवाजों किसी भी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के तहत होना ठीक है, लेकिन तलाक लेने या देने के लिए एक ही जैसा कानून होना चाहिए। साथ ही धार्मिक मान्यताओं, वोटबैंक की राजनीति से उठकर सबको ये मानना होगा कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मान्यताएं और चलन महिलाओं की गरिमा और उनके हक के खिलाफ हैं, इन पर जितनी जल्दी हो सके रोक लग जानी चाहिए।

Apr 24, 2017

अनाथालय ने किया एचआईवी पीड़ित बच्ची को मेनहोल साफ करने को मजबूर

गैर सरकारी संगठन एजीएपीई संचालित कर रहा था एड्स पीड़ितों के इस अनाथालय को

सीवर से गन्दगी बाहर निकालती एचआईवी पॉजिटिव बच्ची
एचआईवी पॉजीटिव लोगों के साथ हमारा समाज किस हद तक निर्मम हो सकता है, इसका जीता—जागता उदाहरण मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में दिखा। समाज में तो उनके साथ भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाएं देखने को मिलती ही हैं, उनके संरक्षण के लिए बनी जगहों पर भी उनके साथ कम दुर्व्यहार नहीं किया जाता। वीडियो में दिखा कि हैदराबाद के एक अनाथालय के सुपरवाइजर और वॉर्डन ने एचआईवी पॉजीटिव बच्ची को किस तरह सीवर साफ करने के लिए मजबूर किया।

हिन्दुस्तान टाइम्स के हवाले से छपी एक खबर के मुताबिक इस घटना के सोशल मीडिया पर छा जाने के बाद हैदराबाद पुलिस ने अनाथालय के सुपरवाइजर और वार्डन को गिरफ्तार किया। वीडियो में दिखा कि एक एचआईवी पीड़ित बच्ची मेनहोल साफ करने के बाद किस तरह गंदगी से भरे एक डिब्बे के साथ अपने हाथ बाहर निकाल रही है। उससे जल्दी से गंदगी साफ करने का निर्देश दिया जा रहा है, साथ ही मेनहोल के पास उसकी मदद के लिए चार—पांच अन्य बच्चियां भी दस्ताने पहने दिखाई दे रही हैं। इस घटना के बाद आरोपों—प्रत्यारोपों का दौर—दौरा शुरू हो चुका है। बाल अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक पार्टियां गैर सरकारी संगठन एम्बेसडर आॅफ गुडविल फॉर एड्स पेसेंट एवरीवेयल (एजीएपीई),जिसके संरक्षण में गायत्रीनगर के पास यह अनाथालय चल रहा था, पर कठोर कार्रवाई की मांग करने लगे हैं। 


हमारे देश में ऐसी शर्मसार करने वाली घटनाएं तब दिखाई दे रही हैं, जबकि देश में पहले से हाथ से गंदगी साफ न करने को लेकर कई कानून पारित कर दिए गए हैं और मैनुअल स्केन्विंगिंग को प्रतिबंधित किया गया है, जिससे कि ऐसी घटनाएं न दिखाई—सुनाई दें और न ही इस तरह कोई किसी को गंदगी साफ करने के लिए मजबूर कर सके। 

आंध्र प्रदेश बाल अधिकार संघ ने इस घटना के खिलाफ नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के साथ मिलकर एक याचिका दायर की है, जिसमें एक एचआईवी पॉजिटिव लड़की को मैनहोल साफ करने के लिए मजबूर करने के लिए अनाथालय के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है।

चाइल्ड राइट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पी आचुता राव के मुताबिक अनाथालय में मौजूद 235 अनाथ बच्चों, जो कि सभी एचआईवी पॉजिटिव हैं, और छात्रावास के अधिकारियों ने बच्चों को मज़दूरी, सफाई कार्यों के अलावा घर के अन्य काम करने के लिए मजबूर किया हुआ था।

Apr 22, 2017

15 पदक जीतने वाले राजबली की बैंक की धोखाधड़ी के चलते मौत

दलित खिलाड़ी राजबली का जमा किया अपना ही पैसा नहीं दिया बैंक ने, करनी थी उनको बेटी की शादी, डीएम के हस्तक्षेप का भी नहीं पड़ा था बैंक पर असर, मरने के बाद दे गया बैंक 60 हजार रुपए

राजबली के इन सम्मान पदकों को रखने के लिए एक बक्सा तक उपलब्ध नहीं करा पायी सरकार

खेलों में 15 पदक जीतकर देश का मान बढ़ाने वाले ओलम्पियन राजबली का दिल का दौरा पड़ने से 9 अप्रैल को निधन हो गया। निधन का कारण था अपने खून—पसीने की कमाई को बैंक से न निकाल पाना, जो बेटी की शादी के लिए बैंक में जमा करके रखे हुए थे।

दस स्वर्ण, पांच रजत और एक कांस्य पदक जीतकर पैरा ओलंपियन खेलों में देश का नाम रोशन करने वाले दलित राजबली के इस तरह निधन से सरकार की खिलाड़ियों के प्रति असंवेदनशीलता और बेरुखी भी साफ झलकती है। 

बेटियों के भविष्य के लिए उन्होंने किसी तरह अपना पेट काटकर सहकारी बैंक में 60 हजार रुपए जमा किए हुए थे। एक बेटी की शादी तय की हुई थी, उसी के लिए सहकारी बैंक में पैसा निकालने गए। मगर ऐन शादी के मौके पर जब सहकारी बैंक पैसे निकालने में रोड़े अटकाने लगा और वे अपना पैसा निकालने में कामयाब नहीं हो पाए तो उनकी तबीयत बिगड़ गयी और दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गयी। मौत के बाद सहकारी बैंक अपना पल्ला झाड़ने के लिए जरूर उनके घर आकर पैसा दे गया।

उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के रुद्रपुर स्थित पिपरा कछार के मूल निवासी राजबली लंबे समय से बदहाली और गुमनामी की जिंदगी बसर करते हुए किसी तरह अपना जीवन—यापन कर रहे थे। कानपुर की एक मिल में नौकरी करते थे, मगर मिल की नौकरी भी चली गयी तो गांव में ही आकर बस गए। दलित राजबली की अपनी कोई संतान नहीं थी, दो लावारिश लड़कियों को गोद लेकर पाल रहे थे। उन्हीं बेटियों और पत्नी के साथ वह मेहनत—मजदूरी करके मुफलिसी में किसी तरह जीवन जी रहे थे। गांव में उनके पास मात्र 5 कट्ठा जमीन थी, जिससे सालभर खाने के अन्न तक पैदा नहीं हो पाता था।

पैरा ओलंपिक में इतने सारे गोल्ड जीतने वाले एक दलित खिलाड़ी का बदहाल जीवन और सरकारी तंत्र की बेरुखी से हुई मौत को देख साफ हो जाता है कि हमारा तंत्र देश का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ियों को अच्छा जीवन स्तर और रोजगार देना तो दूर, गरीबी रेखा से भी नीचे जीवन स्तर जीने को मजबूर कर देता है। 

दोनों पैरों से विकलांग राजबली ने 1981 में जापान में आयोजित पैरा ओलंपियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। यहां उन्होंने तैराकी और गोला श्रेपण प्रतियोगिता में दो स्वर्ण जीते। सम्मान स्वरूप पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मानित किया था। 

सरकार की खिलाड़ियों के प्रति बेरुखी इस बात से भी झलकती है कि पैरा ओलम्पियन गेम्स में कभी स्टार रहे राजबली को वह उसके सम्मान पदकों को रखने के लिए एक बक्सा तक उपलब्ध नहीं करा पायी। उन्होंने प्लास्टिक के झोले में समेटकर देश का मान बढ़ाने वाले पदक सुरक्षित रखे हुए। समय—समय पर मात्र कोरे सम्मान के लिए उनका नाम याद किया जाता रहता था, मगर उनका जीवन स्तर गरीबी रेखा से कभी भी ऊपर नहीं उठ पाया।

Apr 21, 2017

प्रशांत भूषण लडेंगे तमिलनाडू के किसानों का मुकदमा

प्रधानमंत्री आवास के सामने नंगा प्रदर्शन कर चुके तमिलनाडू के सूखाग्रस्त किसानों का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण लडेंगे। ​दिल्ली के जंतर—मंतर पर 38 दिनों से धरना दे रहे किसानों से मुलाकात के बाद उन्होंने यह फैसला किया। 

 
स्वराज अभियान के अध्यक्ष प्रशांत भूषण पहले से देश के सूखाग्रस्त किसानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल किए हुए हैं। उनकी याचिका पर सर्वोच्च अदालत में लगातार सुनवाई चल रही है। अदालत कई दफा राज्यों को नोटिस कर चुकी है। किसानों को लेकर अदालत का रूख सकारात्मक है।

प्रशांत भूषण किसानों को यह मुकदमा बिना फीस लिए लड़ेंगे जैसा कि वह जनहित के कई मसलों पर करते आए हैं। 

तमिलनाडू के किसान सदी के सबसे भयंकर सूखे के दौर से गुजर रहे हैं। सूखे की मार और कर्ज़ के बोझ के तले दबे करीब 100 किसान जंतर—मंतर पर 38 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। वे मरे हुए किसानों और उनके परिजनों की खोपड़ियां लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

पर किसानों की मांग पर मोदी सरकार कोई कान नहीं दे रही है। किसानों के मसले पर बहरापन का नाटक कर रही सरकार को सुनाने के लिए इन किसानों जमीन पर खाना खाया और प्रधानमंत्री आवास के सामने नंगा होकर भी प्रदर्शन किया पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई है।

किसानों के मुताबिक उनपर 50 हज़ार से पांच लाख तक का कर्ज़ है. उनका कहना है, 'दिखावे के लिए सरकार ने छोटे किसानों की मदद की लेकिन ज़्यादातर किसानों को कोई मदद नहीं मिली. हमारी मांग है कर्ज़ माफ़ हों और नए कर्ज़ दिए जाएं कि वो किसानी कर सकें।'

प्रशांत भूषण के अनुसार, 'सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद सरकार की इतनी हिम्मत नहीं कि वह करोड़पति कर्जदारों का नाम सार्वजनिक कर सके पर किसान नंगा होकर सरकार के दरवाजे पर प्रदर्शन करते हैं, प्रधानमंत्री उनका कोई जिक्र तक नहीं करते हैं।'

वह आगे कहते हैं, 'मैं तमिलनाडू के किसानों के मसले पर 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर ​कर चुका हूं। जहां देश में सभी सरकारें किसानों से आंख चुरा रहीं हैं, वहीं स्वराज इंडिया किसानों की हर लड़ाई में साथ है।' 

राष्ट्रवादी बनने के बीस असरदार तरीक़े

देश में जबसे राष्ट्रवाद की लहर आई है तबसे बहुतेरे मौकापरस्त नेता, अभिनेता, व्यापारी, शिक्षक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता स्वत:स्फूर्त तरीके से राष्ट्रवादी बनने की जुगत में जुट गए हैं। ऐसे में उनसे बहुत सी गलतियां हो जा रही हैं। उन्हें असली राष्ट्रवादी पकड़ कर नकली—नकली बोल बेइज्जत कर दे रहे हैं। 

इससे बचने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने 'राष्ट्रवादी बनने के बीस असरदार तरीके' खोज निकाले हैं। जनज्वार राष्ट्रवादी हित में इन नुस्खों को साझा कर रहा है। 


1-जोर जोर से नरेंद्र मोदी ज़िंदाबाद बोलें। बीच बीच में योगी ज़िंदाबाद और गांधी मुर्दाबाद बोलते रहें।

2-जो आपसे तर्क करे उसे कांग्रेसी और कम्युनिस्ट कहें।

3-सार्वजनिक रूप से टीका चंदन करें और ग्रुप में गांजा जलाकर पढ़े लिखों के साथ गांधी-नेहरू-अम्बेडकर का मजाक उड़ाते हुए धुआँ छोड़ें। आख़िर ये सब विदेशी जो थे।

4-कोई अगर कहे की "हमें अपने संविधान से प्रेम है" तो उसे सिक्युलर कहें ।

5-एसी में बैठकर बीसलेरी  पीते हुए अपने लिए ठेके और प्रोजेक्ट जुगाड़ें और वर्तमान सरकार की प्रशस्ति करते रहें।

6-हर समस्या के लिए आरक्षण को दोष दें....महंगे होटल के कमरे में बैठकर ब्राह्मण विमर्श करें...जाति आधारित आरक्षण समर्थकों को देशद्रोही करार दें।

7-योग,ध्यान, प्राणायाम के गुण गाएं लेकिन सुबह 9 बजे से पहले न उठें...रात को भारत की दारू पीकर ट्रम्प ज़िंदाबाद का नारा लगाएं और सुबह किसी यूनिवर्सिटी में वबाल का प्लान बनाएं। 

8-मालदा पर खूब चिल्लाएं और पहलू खान पर मनोज तिवारी का पवित्र संगीत सुनें.. बीच बीच में गोडसे को मानवतावादी बताकर नेहरू के शांति अभियान को मनुष्यता के लिए घातक बताएं।

9-भारत के क्रिकेट जीतने पर हल्ला मचायें और फिर स्वदेशी स्वदेशी चिल्लाएं।

10-सड़क पर पान थूककर स्वच्छ भारत अभियान को सफल बताएं और साथ में ये भी जोड़ें कि फैली हुई गंदगी और स्वच्छता  समस्या के जिम्मेदार नेहरू हैं ।

11-वर्तमान सरकार की रोज़ वंदना करें और बताएं कि सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ।

12-गोडसे को महात्मा माने और गांधी को दुष्ट आत्मा और हिटलर-मुसोलिनी को पुण्यात्मा जरूर मानें।

13-अभिव्यक्ति के अधिकार पर दिन रात चिंता व्यक्त करें..सेमीनार में व्याख्यान देते हुए सरकार को उदारवादी कहें और कहीं कोई सरकार के ख़िलाफ़ बात करे तो पत्थर फेंके, डंडे चलाएं।

14-गौ सेवा का दावा करें भले घर मे गाय पालने की हिम्मत न हो।

15- यत्र नार्यस्तु पूज्यंते का पाठ करें और जो स्त्री पब्लिक स्पेस में आपके ख़िलाफ़ बोले उसे मां बहन की गाली देते हुए बलात्कार की धमकी दें।

16-गीता,रामायण,महाभारत वेद कभी न पढ़ें...लेकिन इनसे फ़र्ज़ी श्लोक चेंप कर अपनी बात सही साबित करने की कोशिश करें। बक़रीद पर अहिंसक हो जाएं और हिन्दू बलि परम्परा पर आंख मूंद लें।

17-सुबह उठकर फेसबुक पर सरकार की जी भर के आरती करें और जो आपसे सहमत न हो उसे तुरन्त माँ बहन की गाली से अभिषेक करें।

18-किसी सामाजिक काम में हिस्सा न लें लेकिन दिन रात खुद को राष्ट्रभक्त साबित करें।

19-विचार करें या न करें कुछ पढ़ें या न पढ़ें लेकिन हर जगह खुद को सर्व ज्ञाता  पढ़ा लिखा और  सबसे सुलझा और समझदार साबित करते रहें...इसके लिए व्हतसेप से प्राप्त फ़र्ज़ी ज्ञान यहां वहां चेंपते रहें।

20- देश की बात करते रहें, विदेशी माल चरते रहें।

चुनाव सड़क, सफाई, स्वास्थ्य का पर मुद्दा आतंकवाद, राष्ट्रवाद, हिंदू—मुसलमान

 सोचने पर मजबूर कर देंगे दिल्ली एमसीडी चुनाव के मुद्दे 

जनज्वार। परंपरागत रूप से स्थानीय निकाय के चुनावों में नाली, पानी, सड़क, सफाई, स्वास्थ्य और सहुलियतें मुद्दा हुआ करती हैं। लोग पार्षदों को इस आधार पर वोट करते हैं कि उनको मच्छर, बदबू, प्रदूषण, अतिक्रमण, बीमारी, अशिक्षा और खराब सीवर सिस्टम से कौन पार्टी बचाएगी। 



पर अबकी दिल्ली एमसीडी चुनाव में ऐसा नहीं है।  

दिल्ली एमसीडी 'म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन आॅफ दिल्ली' चुनाव में तीन तलाक, हलाला, कश्मीर में आतंकवाद, वहां के प्रदर्शकारियों से सेना का बर्ताव, योगी का रोमियो स्क्वायड, गोहत्या पर गोरक्षकों की पहल, राष्ट्रवाद और देशद्रोह की बहस आदि मुद्दा बना हुआ है। 

जागरूक वोटरों का एक तबका सीरिया में बच्चों की हत्या, अमेरिका द्वारा अफ​गानिस्तान में  गिराया  गया 10 हजार किलो का बम और पाकिस्तान में कुलभूषण जाधव को दी गयी फांसी के फरमान पर भी बहस कर तय कर रहा है कि दिल्ली एमसीडी चुनावों में किस पार्टी को वोट दिया जाए।  

यही वजह है कि कोई पार्षद जनता के बुनियादी मुद्दों सड़क, पानी, सफाई, स्वास्थ्य आदि पर ज्यादा फोकस कर बात नहीं कर रहा है। अलबत्ता जो पार्टी और पार्षद जनता की बुनियादी जरूरतों पर ज्यादा केंद्रीत कर वोट मांग रहे हैं उनकी जनता के बीच कोई चर्चा नहीं है या है भी तो इस रूप में कि 'उनकी बात ठीक है पर वह टक्कर में नहीं हैं।' 

उदाहरण के तौर पर योगेंद्र यादव के नेतृत्व वाली 'स्वराज पार्टी' को लिया जा सकता है। स्वराज पार्टी अपने 211 पार्षद प्रतिनिधियों के माध्यम से लगातार जनता के ​बुनियादी मुद्दों पर फोकस किए हुए है। आप या कांग्रेस की तरह वह स्थानीय मुद्दों से जरा भी इधर—उधर नहीं हो रही। स्वराज पहली ऐसी पार्टी है जिसने पर्यावरण को दिल्ली की मूल सवालों में शामिल किया है। 

पर 'साफ दिल और साफ दिल्ली' के नारे साथ एमसीडी चुनाव में उतरी स्वराज पार्टी के बारे में पत्रकारों की आम राय है कि मुश्किल से इस पार्टी का खाता खुल पाएगा और ज्यादातर जगहों पर प्रतिनिधियों की जमानत जब्त होगी। सर्वे एजेंसियों का भी यही आकलन है। 

सवाल है कि दिल्ली जैसे प्रोफेशनल शहर का यह हृदय परिवर्तन हुआ कैसे? क्यों वोटरों को जीवन की बुनियादी सुविधाओं की सरकारों से मांग और उनका पूरा कराने का अधिकार रोमांचित—आंदोलित नहीं करता, क्यों उन्हें आंदोलन का सारा आनंद राष्ट्रवाद, कश्मीर, राष्ट्रवाद और हिंदू—मुस्लिम विभाजन पर आने लगा है ?   

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ​पीयुष पंत की राय में, 'भाजपा के राष्ट्रवादी शोर—सराबे ने पिछले कुछ चुनावों से लोगों का माइंडसेट चेंज कर दिया है। एक के बाद एक भाजपा की जीत लोगों की इस समझ को मजबूत कर रही है कि बेकारी, गरीबी, अशिक्षा, महंगाई हमारी किस्मत है और मुद्दे जिनसे उन्हें निपटना है वह देशद्रोह, राष्ट्रवाद और हिंदू—मुसलमान हैं।' 

चार एमसीडी चुनाव कवर कर चुके वरिष्ठ पत्रकार अनिरूद्ध शर्मा कहते हैं, 'भाजपा उत्तर प्रदेश में जिस राह जीती है वह उसी को यहां भी आजमा रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव राज्य के सवालों—समस्याओं से ज्यादा आतंकवाद, कश्मीर, राष्ट्रवाद, हिंदू—मुस्लिम और केंद्र की उपलब्धियों पर केंद्रीत रहा। एमसीडी चुनावों में कौन पार्टी बहुमत पाएगी इस पर कुछ कहने की बजाए मैं यह कहना चाहुंगा कि 'पब्लिक परसेप्शन' में भाजपा जीती हुई दिख रही है।'