Jun 22, 2017

पतंजलि के 6 उत्पादों पर लगा प्रतिबंध, रामदेव नहीं कर पाए मीडिया मैनेज

मेडिकल जांच में फेल होने पर लगा प्रतिबंध, पहले भी 4 दवाएं हो चुकी हैं प्रतिबंधित। सवाल यह कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक, वह भारत में लाभदायक कैसे...

काठमांडू, जनज्वार। नेपाल सरकार ने मेडिकल जांच में गडबड़ी पाए जाने पर बाबा रामदेव और योगी बालकृष्ण के मालिकाने वाले पतंजलि के 6 उत्पादों को 21 जून से नेपाल में प्रतिबंधित कर दिया है। नेपाल के मीडिया के मुताबिक इससे पहले पतंजलि के 4 और उत्पाद माइक्रोबॉलॉजिकल जांच में असफल पाए जाने पर प्रतिबंधित हो चुके हैं।


ये सभी उत्पाद पतंजलि आयूर्वेद लिमिटेड और आयूर्वेदिक मेडिसिन कंपनी द्वारा नेपाल में उपलब्ध कराए जा रहे थे। पतंजलि के जिन उत्पादों को सरकार ने प्रतिबंधित किया है, वे हैं आमला चूर्ण, दिव्य गशर चूर्ण, बकूची चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, अश्वंगंधा चूर्ण और अदिवा चूर्ण।

नेपाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जांच में अधिकारियों ने पाया कि दवा के तौर प्रचारित ये उत्पाद तय मानकों से बहुत अलग हैं और इनके इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। ये सभी उत्पाद माइक्रोबॉयलॉजिकल टेस्ट में फेल हुए हैं।

इसी के मद्देजनर कल 21 जून को प्रतिबंधित किए जाने बाद विभाग ने तत्काल उत्पादों को बाजार से वापस मंगाने का आदेश संबंधित अधिकारियों को दे दिया है।

पतंजलि के खिलाफ नेपाल सरकार ने यह कार्यवाही '1978 ड्रग एक्ट की धारा 14' के तहत किया है।

वहीं भारत में इन दवाओं की धूम मची हुई है। रामदेव इन दवाओं के प्रचार पर हर महीने करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च कर रहे हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा इनके सही—गलत दावों को खूब प्रचारित कर रहा है, क्योंकि विज्ञापन का दबाव है।

यही कारण है कि रामदेव के अपनी कंपनी के उत्पादों से संबंधित तमाम अविश्वनीय दावों पर भी मीडिया समवेत स्वर में कोई सवाल नहीं उठा पाता। भारत में वह मीडिया मैनेज कर लेते हैं।

भारत में हाल ही सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से पता चला है कि आयूर्वेद के 40 फीसदी उत्पाद मानकों से नीचे हैं, जिसमें पतंजलि के उत्पाद भी है।

भारत में वर्ष 2013 से 2016 के बीच 82 आयूर्वेदिक उत्पादों की जांच हुई, जिसमें मानकों की जांच में 32 फेल हुए। फेल होने वालों में पतंजलि दिव्य आंवला जूस और शिवलिंगी बीज दोनों ही शामिल थे।

पर भारत में असल समस्या सरकार की है। सरकार योग गुरु रामदेव की अंधसमर्थन करती है। वह उनका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में करती है, जबकि रामदेव अपने सही—गलत दावों पर सरकार का इस्तेमाल उसकी चुप्पी के रूप में करते हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी और पूरा मंत्रिमंडल रामदेव के योग, दवाओं और उनके आर्थिक उभार के आगे नमस्तक है।

ऐसे में सवाल ये है कि जो दवा नेपाल के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, वह भारत के लोगों को स्वास्थ्य लाभ कैसे दे सकती है।

एक बार जांच की मांग तो की ही जानी चाहिए क्योंकि मुनाफे की हवस न किसी सरकार की वफादार होती है न जनता की।

मध्य प्रदेश के 15 मुस्लिम युवाओं पर दर्ज देशद्रोह का मुकदमा वापस

18 जून को लंदन में आईसीसी चैंपियंस ट्राॅफी में भारत की हार के बाद मोहद के निवासियों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि कुछ लोगों ने भारत की हार का जश्न मनाया है...

विष्णु शर्मा की रिपोर्ट 

मध्य प्रदेश के मोहद में पुलिस ने तीन दिन पहले पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने के आरोप में जिन 15 मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया था उन पर से राजद्रोह का मामला वापस ले लिय है। बुरहानपुर जिले के एसपी आरआर परिहार ने मीडिया को बताया कि गिरफ्तार किए गए युवाओं पर राजद्रोह का आरोप साबित करना मुश्किल है।


आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की हार पर मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में आतिशबाजी कर पाकिस्तान के समर्थन और भारत के खिलाफ नारे लगाने के आरोप में 15 युवकों को गिरफ्तार किया गया था. सभी के खिलाफ देशद्रोह का प्रकरण भी दर्ज किया गया था.

गौरतलब है कि एक आरोपी के पिता ने राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं राष्ट्रीय और राज्य अल्पसंख्यक आयोगों को पत्र लिख कर इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था, जिसके बाद पुलिस ने राजद्रोह की धाराएं हटा लीं।

18 जून को लंदन में आईसीसी चैंपियंस ट्राॅफी में भारत की हार के बाद मोहद के निवासियों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि कुछ लोगों ने भारत की हार का जश्न मनाया है। रिपोर्ट पर कार्रवाही करते हुए पुलिस ने इन युवाओं को गिरफ्तार किया था।

मध्य प्रदेश में पिछले तीन सालों में साम्प्रदायिक सदभाव कम हुआ है और टकराव की घटनाएं बढ़ी हैं। इसका कारण है कि लगातार तीन बार प्रदेश में सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी को आगामी चुनोवों में अपने प्रदर्शन को लेकर संशय होने लगा है। और इसलिए उसे साम्प्रदायिक तानव का सहारा लेना पड़ रहा है। 

पिछले साल अक्टूबर में राजधानी भोपल के समीप एक जेल से कथित तौर पर फरार होने की कोशिश करने वाले 8 कथित सीमा कार्यकर्ताओं की इंकाउण्टर की पुलिसिया कहानी पर भी सवाल उठे थे। इनकाउंटर के बाद ऐसे वीडियों सामने आए थे जो पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते थे। 

आमतौर पर साम्प्रदायिक सदभाव वाली छवि रखने वाले प्रदेश के ‘मामा’ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर जैसे से संकट के बादल घिरते जा रहे हैं उनके चहरे पर से भी ‘मामियत’ का नकाब उठता जा रहा है। 2014 के बाद, शिवराज सिंह चौहान खुद को पार्टी में लगातार अकेला पा रहे हैं। मध्य प्रदेश भाजपा में उनकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई है। 

पिछले आम चुनाव के बाद पार्टी का नरेन्द्र मोदी विरोधी खेमा यह आशा कर रहा था कि मोदी-शाह के कमजोर पड़ते ही शिवराज सिंह चौहान एक विकल्प के रूप में उभरेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मोदी-शाह खेमे ने राष्ट्रीय राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में कर लिया। और तो और, व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच ने शिवराज की डोर इसी जोड़ी के हाथों में थमा दी है। 

लोग बताते हैं कि हाल के किसान आंदोलन के दौरान भी मुख्यमंत्री की कार्य क्षमता पर पार्टी के अंदर ढेरों सवाल उठाए गए। इन तमाम वजहों से शिवराज को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताते लगी है। आगामी विधानसभा चुनाव तक वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जिससे प्रदेश की राजनीति में उनकी दावेदारी कमजोर हो और उनके विरोधियों का स्वर मुखर हो। 

लगता यह भी है कि वे भी सुषमा स्वराज और अन्य नेताओं की तरह ही मोदी-शाह मानकों पर आगे चलने को राजी हो गए हैं। उनके भविष्य का तो पता नहीं लेकिन प्रदेश की राजनीति के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।

आप पंजाब के विधायकों की विधानसभा में मार्शल्स से झड़प

दो महिला विधायकों को चोट आई, एक विधायक की पगड़ी गिरी

अकाली और आप के विधायक हुए एकजुट, पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल पहुंचे देखने, आम आदमी पार्टी ने ट्वीटर पर जताया ऐतराज

चंडीगढ़। आज पंजाब विधानसभा में जोरदार हंगामा हो गया जब आप के विधायक सुखपाल खैरा ओर लोक इंसाफ पार्टी के विधायक सिमरनजीत सिंह बैंस विधानसभा में घुसने की कोशिश कर रहे थे। ये दोनों विधायक विधानसभा के इस सत्र से सस्पेन्ड कर दिए गए हैं। फिर भी ये विधानसभा में घुसने की कोशिश कर रहे थे।



पुलिस ने इन दोनों को रोकने की कोशिश की। किसी कंफयूजन के चलते विधानसभा के भीतर इन दोनों विधायकों के निलंबन को वापस लेने को लेकर हंगामा हो गया। आप के विधायक वेल तक पहुॅंच गए। इसके बाद मार्शलों ने विधायकों को बाहर निकालने की कोशिश की। जिसमें धक्कामुक्की में आप की दो महिला विधायकों को चोट लग गई और आप के एक विधायक की पगड़ी गिर गई।

शोर बढ़ता देख अकाली दल के विधायकों ने भी आप का समर्थन करते हुए विधानसभा सत्र का बायकाट कर दिया और वो भी विधानसभा से बाहर आ गए।

आप की दो महिला विधायकों को अस्पताल ले जाया गया। जंहा पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल ने आकर उनसे मुलाकात की। उन्होंने आज का दिन लोकतंत्र के लिए काला इतिहास बताया।

Jun 21, 2017

प्रिंसिपल खुद ही कर गयी विश्वविद्यालय टॉप, ​अब होगी एफआईआर दर्ज

बिहार से एक कदम आगे निकला यूपी, रिपोर्ट सार्वजनिक होने में लग गए एक साल, पर मामले के असल दोषियों यानी कॉलेज प्रबंधन और विश्वविद्यालय प्रशासन का किया जा रहा बचाव
जनज्वार, गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बहुचर्चित टॉपर कांड में जांच समिति ने पाया कि इस कांड की सरगना रेशमा देवी महाविद्यालय की प्रिंसिपल नीलम पांडेय ही हैं। प्रिंसिपल नीलम पांडेय अपना नाम बदलकर शिवांगी पांडेय बनीं और अपने ही परीक्षा केंद्र से 2016 में बीए में विश्वविद्यालय टॉप कर गोल्ड मेडलिस्ट बनीं।

टॉपर फर्जीवाड़े कांड में गठित चार सदस्यीय जांच समिति की 20 जून को जारी हुई रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 की बीए टॉपर शिवांगी पांडेय और रेशमा देवी महाविद्यालय अमवां सोहनरियां, जिला देवरिया की कार्यवाहक प्रिंसिपल और केंद्राध्यक्ष डॉ. नीलम पांडेय एक ही हैं। प्राचार्य ने ही साजिशन अपना नाम बदलकर दोबारा स्नातक की डिग्री लेने के लिए इस कांड को अंजाम दिया था।
प्रो.चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में गठित जांच समिति की सिफारिशों को विश्वविद्यालय की परीक्षा समिति ने मानते हुए फैसला किया है कि रेशमा देवी कॉलेज प्रशासन को एक सप्ताह के भीतर प्राचार्य नीलम पांडेय के विरुद्ध एफआइआर दर्ज करानी होगी और उसकी एक कॉपी हफ्तेभर के भीतर विश्वविद्यालय को सौंपनी होगी। ऐसा न करने पर रेशमा देवी महाविद्यालय को 2019 तक किसी भी परीक्षा के लिए केंद्र नहीं बनाया जाएगा।
इस पूरे प्रकरण पर जांच समिति के अध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र कहते हैं कि प्रदेश में जिस तरह से शिक्षा घोटाले सामने आ रहे हैं उन पर लगाम लगना बहुत कठिन है। नीलम पांडे उर्फ शिवांगी प्रकरण में एक प्राचार्य इस घटिया हरकत तक इसलिए उतरीं क्योंकि उन्हें स्नातक में अपने नंबर बढ़ाने थे, क्योंकि नंबर बढ़ने के बाद उनका बीटीसी में एडमिशन हो गया था। अगर वह यूनिवर्सिटी टॉप नहीं करतीं तो शायद यह मामला खुलता भी नहीं। प्रदेशभर में न जाने कितने लोग दूसरों के नाम पर परीक्षा दे रहे हैं।
चितरंजन मिश्र का मानना है कि इस तरह के मामले शिक्षा के लगातार निजीकरण के चलते सामने आ रहे हैं। सरकार शिक्षा को निजी हाथों में सौंप रही है, तो शिक्षा माफिया भी पैर पसार रहा है। जाहिर तौर पर निजी हाथों में जाने के बाद वो वही करेगा जिसमें उसका लाभ होगा।
जांच समिति की रिपोर्ट में देरी की वजह में प्रोफेसर चितरंजन कहते हैं कि पिछले वर्ष सितंबर 2016 में गठित हमारी समिति ने जनवरी 2017 में ही अपनी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी को सौंप दी थी, मगर उपकुलपति के रिटायरमेंट के चलते रिपोर्ट खुल नहीं पाई। नए वाइस चांसलर के आने के बाद उन्होंने परीक्षा समिति की मीटिंग रखी और जांच समिति की रिपोर्ट खुली है।
गौरतलब है कि रेशमा देवी महाविद्यालय की शिवांगी पांडेय ने डीडीयू के 2015-16 सत्र में स्नातक के कला संकाय में टॉप किया था, जिसे विश्वविद्यालय के 35वें दीक्षांत समारोह में गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया जाना था, जिसके लिए उनकी खोजबीन की गई। अगर शिवांगी पांडे ने विश्वविद्यालय टॉप नहीं किया होता तो शायद यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा ही रह जाता और वो आराम से बीटीसी की डिग्री ले चुकी होतीं। 
हालांकि फर्जीवाड़े में संलिप्त प्राचार्य पिछले वर्ष ही कॉलेज से निलंबित कर दी गई थीं और मामले की शुरुआती पड़ताल के बाद शिवांगी पांडेय उर्फ नीलम पांडेय का स्वर्ण पदक भी निरस्त कर दिया गया था।
स्ववित्तपोषित और वित्तविहीन महाविद्यालय एसोसिएशन से जुड़े डॉ. चतुरानन ओझा कहते हैं, शिक्षक नेताओं और समाचार पत्रों द्वारा लगातार इस मुद्दे को उठाया गया, जिस कारण विश्वविद्यालय को मज़बूरनकर जांच कमेटी बिठानी पड़ी। मगर सारा ठीकरा प्राचार्या डॉ नीलम पांडे पर फोड़कर खेल के प्रायोजक प्रबंधक और विश्वविद्यालय प्रशासन को बचाया जा रहा है। सवाल तो यह भी है न कि प्राचार्य को यदि अनुबंध के अनुरूप वेतन भुगतान किया जा रहा होता तो उसे प्राइमरी का मास्टर बनने के लिए गलत काम नहीं करना पड़ता।
हालांकि घटना के बाद आरोपी नीलम पांडेय ने पूरी जांच व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि मेरा नाम जान—बूझकर फर्जीवाड़ा घोटाले में जोड़ा जा रहा है। चूंकि कॉलेज की वेबसाइट पर मुझसे संबंधित सारी जानकारी उपलब्ध है तो किसी ने साजिश के तहत मुझे फंसाया है। मैं बेकसूर हूं और इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। आखिर एक प्राचार्य एक समय में दो जगह कैसे मौजूद हो सकता है?  

सिनेमा के मोदी युग का स्वागत है

आशा की जानी चाहिए कि मधुर अपने पूर्व के सिने निर्माताओं से आगे निकलेंगे और उनकी यह फिल्म भी पेज थ्री, फैशन, जेल, सत्ता, कोर्पोरेट जैसी फिल्मों की तरह भारतीय समाज के एक ऐसे पक्ष को सामने लाएगी, जिसकी जानकारी अब तक देश के बुद्धिजीवियों के छोटे हिस्से को है...

तसनीम खान

समाज में होने वाले परिवर्तन सबसे पहले उसकी राजनीतिक भाषा में दर्ज होते हैं और फिर उस समाज की संस्कृति अथवा लोकाचार में दिखाई पड़ते हैं।

पिछले 70 सालों से भारतीय सिनेमा भारत के बदलते स्वरूप का सबसे प्रमाणिक दस्तावेज है। 1950-60 के दशक में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों से प्रेरित भारतीय समाज हो या 1970 का बागी हिन्दुस्तान या 1990 में परंपरा को तोड़ता भारत, भारतीय सिनेमा में सभी आयामों को दर्ज कर लेने की अनूठी क्षमता है।

आजाद भारत के इतिहास में वर्ष 2014 भारतीय समाज में परिवर्तन के एक चक्र के पूरा होने के रूप में याद किया जाएगा। हम देख सकते हैं कि तीन साल पहले आजादी का बिगबैंग अंततः थम ही गया। बुझी हुई राख में फूंंक मारने से उड़ने वाली धूल को आग मानना एक तरह का बचपना है। लाख कोशिश करने पर भी बीता ज़माना वापस नहीं आने वाला।

मधुर भण्डारकर की आने वाली फिल्म इंदू सरकार सिनेमा के मोदी युग में प्रवेश की खुली घोषणा है। ये फिल्म लोकतंत्र भारत के उस कालखण्ड से संबंधित है, जिसे राजनीति और राजनीतिक विज्ञान की भाषा में आपातकाल कहा जाता है। मधुर भण्डारकर की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि मधुर अपने पूर्व के सिने निर्माताओं से आगे निकलेंगे और उनकी यह फिल्म भी पेज थ्री, फैशन, जेल, सत्ता, कोर्पोरेट जैसी फिल्मों की तरह भारतीय समाज के एक ऐसे पक्ष को सामने लाएगी, जिसकी जानकारी अब तक देश के बुद्धिजीवियों के छोटे हिस्से को है।

यह छोटा सा बुद्विजीवी वर्ग इसकी याद करता था और असंख्य प्रतीकों का हवाला देकर इस दौर की बुराईंयो को बताता था। कम से कम इस फिल्म के बाद 'अघोषित आपातकाल' जैसे मुहावरों को समझाना आसान होगा।

मोदी युग से पहले के दौर में भी भारतीय इतिहास पर आधारित साहित्य रचा गया है। लेकिन सभी निर्माता इतिहास को सीधे संबोधित करने से डरते रहे। भारत में हिस्टारिकल या ऐतिहासिक कालखण्ड पर आधारित सिनेमा निमार्ण की पुरानी परंपरा है। लेकिन निर्माताओं ने इतिहास को कभी सामने से संबोधित नहीं किया।

1959 की सम्राट पृथ्वीराज चौहान, 1960 की मुगले आजाम, 1965 में शहीद और इन फिल्मों के पहले और बाद में कई फिल्में बनी जिनमें रचनात्मक स्वतंत्रता (आर्टिस्टिक फ्रीडम) के नाम पर इतिहास के साथ हास्यास्पद स्तर तक छेड़छाड़ की गई। पिछले दिनों आई दम लगा के हैशा, बजरंगी भाईजान, बाजीराव मस्तानी, बाहूबली आदि फिल्मों में जहां मोदी युग की एक धुंधली सी झलक दिखाई देती है वहीं मधुर की इंदू सरकार एक स्पष्ट लकीर खींचने का काम करती है। ऐसा इसलिए संभव हुआ है कि इस सरकार की तरह साहित्य रचने वालों के अंदर भी इस सरकार के लंबे समय तक बने रहने का आत्मविश्वास आया है। इस ‘टिके रहने के विश्वास’ को युग कह कर परिभाषित किया जा सकता है।

भारतीय फिल्म जगत में आपातकाल को सीधे कठघरे में खड़ा करने वाली यह पहली फिल्म होगी। पूर्व में ‘समानांतर सिनेमा’ में इस विषय पर काम हुआ लेकिन सीधे तौर पर इस पर सवाल नहीं उठाया गया। शायद इसलिए भी कि समानांतर सिनेमा अक्सर केन्द्रीय फिल्म बोर्ड द्वारा प्रायोजित रहीं। आज भी फिल्म निर्माण क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है और सरकार का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव बना हुआ है। इसलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर फिल्म भी बनाई जा सकी है।

हम तो बस इतनी ही उम्मीद कर सकते हैं कि मधुर भण्डारकर ने अपने से पूर्व के सिने निर्माताओं की गलत परंपरा से सबक लिया होगा और उनकी इंदू सरकार राजनीतिक प्रोपोगेंडा से उपर उठा कर पूर्ववर्ती पेज थ्री या फैशन जैसी कालजयी रचना होगी।

(तसनीम खान लोयड लाॅ कालेज, ग्रेटर नोएडा में सहायक प्राध्यापक और जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली से सिनेमा पर पीएचडी कर रहीं हैं।)

आप से कुमार की विदाई लगभग तय!

बर्खास्त न करके कुमार को पहले पार्टी की सबसे पावरफुल कमेटी पीएसी और नेशनल एक्सक्यूटिव जिसे एनई कहते हैं, उससे निकाला जाएगा। जिसके बाद कुमार खुद—ब—खुद पार्टी छोड़ देंगे.....

दिल्ली से स्वत्रंत कुमार की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

आखिर वह घड़ी नजदीक आ ही गई जिसका बहुत से लोगों को इंतज़ार था और बहुत से लोग विश्लेषण कर रहे थे। जी हां, कुमार विश्वास की आम आदमी पार्टी से विदाई लगभग तय है!

पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कुमार को पार्टी से बर्खास्त न करके उन्हें पहले पार्टी की सबसे पावरफुल कमेटी पीएसी और नेशनल एक्सक्यूटिव जिसे एनई कहते हैं, उससे निकाला जाएगा। जिसके बाद कुमार खुद—ब—खुद पार्टी छोड़ देंगे। इसी रणनीति के तहत पार्टी की ओर से उन पर आक्रमण कराए जा रहे हैं।
उधर कुमार भी ये बात समझ गए हैं कि अब पार्टी में वो बहुत ज्यादा दिन के लिए नहीं हैं। वो ये इंतज़ार कर रहे हैं कि पार्टी खुद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे, ताकि वो खुद पार्टी के वालंटियर्स की आवाज़ उठाने पर शहीद कहलाएं और उन्हें पार्टी के वालंटियर्स की सिमपेथी मिल जाए।
अब कुमार से जुड़े पार्टी के सोशल मीडिया के वालंटियर्स खुद के शहिद होने की घोषणा कर रहे हैं। कुमार का घोर समर्थक माने जाने वाले पार्टी के सोशल मीडिया के वालंटियर रहीश खान ने मनीष सिसोदिया के साले संजय राघव के ट्वीट को कोट करते हुए लिखा है कि चांडाल चौकड़ी ने कुमार भाई को पार्टी से बाहर निकालने की तैयारी कर ली है।
सूत्रों से ये भी पता चला है कि संजय सिंह ने कल 20 जून को कुमार के साथ मीटिंग की थी। दरअसल पार्टी में यह पहले से होता आया है जिसे बाहर किया जाता है उसके घर एक बार संजय सिंह बात करते हैं। योगेंदर यादव, पंजाब के छोटेपुर को निकालने से पहले भी संजय सिंह ने उनके घर जाकर बात की थी।
पार्टी के बड़े नेता कुमार से इस बात पर भी नाराज़ हैं कि वे लगातार अपने इंटरव्यू में, अपनी बाईट में पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं। पार्टी नेताओं पर सवाल उठाते हैं और खुद को सही और सच का साथ देने वाला होने की अपनी अच्छी इमेज बनाने की कोशिश करते हैं।  तो दूसरी तरफ कुमार के विरोध में खडे वालंटियर्स सीधे तौर पर बोल रहे हैं कि खुद को शहीद का दर्जा देने की तैयारी चल रही है। इसमें मनीष सिसोदिया के साले संजय राघव का ट्वीट प्रमुख है।
कुमार से सहानुभूति रखने वाले पार्टी के सोशल मीडिया के वालंटियर्स को पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा रहा है। आम आदमी पार्टी को कवर करने वाले पत्रकारों को भी इस बात की जानकारी है कि पार्टी कुमार को बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी कर चुकी है। यह कब और कैसे होगा, बस इसी का सभी को इंतज़ार है।

योग वाले बच्चों को बुलाया रात 2 बजे और 3 बजे तक एनेक्सी पहुंचेंगे पत्रकार

प्रधानमंत्री के सुरक्षा के मद्देनजर आया फरमान, किसान करेंगे सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 'विरोध का योगासन।' पर असल सवाल यह कि रातभर जागने और बिना नित्य क्रिया से निवृत्त हुये योग होगा तो कैसे होगा?

कल लखनऊ के रमाबाई पार्क में हुए रिहर्सल में हो चुके हैं 21 लोग बेहोश। बेहोश में होने वालों में 15 बच्चे शामिल

जनज्वार, लखनऊ। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर लखनऊ के रमाबाई अम्बेडकर पार्क में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हजारों लोगों के साथ योग के आसन करेंगे।


इस योगासन क्रिया में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में बच्चों को भी तैयार किया गया है। पीएम के साथ योग करने वाले स्कूली बच्चों को रात 2 से 3 बजे के बीच अपने अपने केंद्रों पर रिपोर्ट करने को कहा गया है।

गौरतलब है कि सोमवार को राज्यपाल व सीएम की मौजूदगी में योग दिवस की रिर्हसल के दौरान भी बच्चों को रात तीन बजे बुलाया गया था। जैसे ही सुबह धूप होने लगी तो बच्चों को चक्कर आने लगा। पानी मांगने पर पानी नहीं मिला, जिसके कारण तबीयत बिगड़ गयी। रिर्हसल के दिन गर्मी व अत्यधिक भीड़ के चलते 21 लोग बेहोश हुये थे जिसमें 15 बच्चे थे। प्रशासन ने प्राथमिक चिकित्सा के बाद बेहोश होने वालों को घर पहुंचाया।

प्रधानमंत्री की सुरक्षा के चलते योग कार्यक्रम के कवरेज के लिये पत्रकारों को रात तीन बजे एनेक्सी में बुलाया गया है। जहां से पत्रकारों को कार्यक्रम स्थल पहुंचाया जाएगा। कार्यक्रम स्थल एनेक्सी से तीन किलोमीटर की दूरी पर है।

जबकि किसान हाइवे पर योगासन कर राज्य और केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करेंगे। किसान 'विरोध का योगासन', किसान उत्पीड़न के बढ़ रहे मामलों की तरफ ‘राष्ट्रऋषि’ पीएम मोदी का ध्यान खींचने के लिये करेंगे। यह योगासन राजधानी लखनऊ की सीमा से जुड़े राजमार्गों पर होगा।

भाकियू के टिकैत गुट के जिला अध्यक्ष हरिनाम सिंह के अनुसार पीएम का योग कार्यक्रम खत्म हो जाने के बाद राजधानी की सीमा से जुड़ने वाले लखनऊ फैजाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर सफेदाबाद क्रासिंग के समीप, लखनऊ हरदोई राष्ट्रीय राजमार्ग में मलिहाबाद तहसील क्षेत्र, लखनऊ सुल्तानपुर व रायबरेली राष्ट्रीय राजमार्ग पर गोसाईगंज व मोहनलालगंज सीमा और लखनऊ सीतापुर हाईवे पर बीकेटी सीमा में एकत्रित भाकियू कार्यकर्ता किसानों को उत्पीड़न से छुटकारा दिलाने की मांग पर पीएम मोदी का ध्यान दिलाने को बड़ी संख्या में एकत्रित हो कर राजमार्ग का रास्ता जामकर योग आसन लगा कर गांधीवादी आंदोलन का नजारा पेश करेंगे। वैसे प्रशासन ने किसान नेताओं को राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों का आवागमन बाधित न करने की सख्त ताकीद दी है।

पूर्व घोषित कार्यक्रम में बदलाव करते हुए भाकियू पीएम के योग कार्यक्रम खत्म हो जाने के बाद सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक योग करेंगे। पहले भाकियू ने राष्ट्रीय राजमार्ग बाधित कर पीएम के कार्यक्रम के साथ रास्ता जाम कर योग करने का एलान किया था, प्रशासन की दबाव में कार्यक्रम बदलना पड़ा।

गुजरात पुलिस ने बलात्कार पीड़िता को कहा, जाओ पहले कास्ट सर्टिफिकेट लेकर आओ

एक महिला पुलिसकर्मी मामला दर्ज करवाने आई। वह पीड़िता को एक अंधेरे कमरे में ले गई और उसे चांटे मारकर धमकाया कि यदि बलात्कार का मामला दर्ज करवाया तो तुझे और तेरे मां-बाप को जेल में डाल देंगे...

गुजरात से दलित नेता जिग्नेश मेवानी की प्रेस विज्ञप्ति 

गुजरात के बनासकांठा जिले के डिशा तहसील के बुराल गांव की 18 साल की दलित लड़की जब स्वच्छता अभियान के सारे नारों के बावज़ूद घर पर टॉइलेट नहीं होने के चलते खुले में शौच करने गई तब दबंग जाति के एक आदमी ने उसका बलात्कार किया।

10 जून की दोपहर 12 बजे दलित लड़की के साथ यह घटना घटी। पीड़िता ने घर जाकर अपने माँ बाप को यह बात बताई। दोपहर के 2 बजे पीड़िता, उसके माता-पिता और बराल गांव के कुछ लोग डिशा रूरल पुलिस थाने में मामले की एफआईआर दर्ज करवाने गए, तो थाना इंचार्ज मौजूद नहीं थे। डयूटी पर बैठे पुलिस स्टेशन ऑफीसर ने कहा पीड़िता से कहा कि थाना इंचार्ज (पुलिस इंस्पेक्टर) वापस आएंगे तो उसके बाद ही कार्रवाई होगी।
पीड़िता, उसके माता पिता और गांव के लोग पुलिस के सामने मामला दर्ज करने के लिए गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। मजबूरन पीड़िता के माता-पिता ने लोकेल एडवोकेट मघा भाई को थाने बुलाया। वकील ने पुलिस से कहा कि मामला इतना संगीन है, लड़की का बलात्कार हुआ है और आप पुलिस इंस्पेक्टर का इंतजार कर रहे हो, यह कैसे चलेगा? वकील से कहने के बावजूद इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पुलिस स्टेशन ऑफिसर ग़लबा भाई ने कहा कि इंस्पेक्टर साहब आपको धानेरा तहसील के एक चार रास्ते पर मिलेंगे। बलात्कार पीड़िता दलित लड़की अपने मां-बाप और गांव के लोगों के साथ रोती-गिड़गिड़ाती हुई धानेरा हाईवे पर पहुंची और पुलिस इंस्पेक्टर को अपनी आपबीती सुनाई। सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर डी. डी. गोहिल ने कहा - बलात्कार हुआ और तू दलित है? तो जाओ जाकर पहले अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट लेकर आओ।
रिपोर्ट दर्ज न किए जाने पर पीड़ित लड़की अपने मां—बाप के साथ 24 किलोमीटर दूर अपने गांव वापस गई और कास्ट सर्टिफिकेट लेकर पुलिस थाने पहुंची। फिर जो हुआ वह और भी भयानक था। बगल के पुलिस थाने की शर्मिला नाम की एक महिला पुलिसकर्मी मामला दर्ज करवाने आई। वह पीड़िता को एक अंधेरे कमरे में ले गई और उसे चांटे मारकर धमकाया कि यदि बलात्कार का मामला दर्ज करवाया तो तुझे और तेरे मां-बाप को जेल में डाल देंगे।
इतना सब होने के बाद भी आईपीसी की धारा 376 (रेप) के बजाय 354 (सेक्सुअल एब्यूस) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। पीड़िता के बार—बार कहने के बावजूद उसकी मेडिकल जांच नहीं करवाई गई।
यानी कुछ भी करके मामले को रफादफा करने की कोशिश की गई। यहाँ उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही बीजेपी के कुछ नेता नालिया सैक्स रैकेट में संलिप्त पाये गए थे। इस मामले से गुजरात पुलिस और बीजेपी के नेताओं का वास्तविक चरित्र उजागर हुआ था। यह भी उल्लेखनीय है कि गुजरात में 2004 में 24 दलित महिलाओं का बलात्कार हुआ था, जो आंकड़ा 2014 में 74 तक पहुंच गया है।
पाटीदार समाज की नेता रेशमा पटेल और चिराग पटेल, बनासकांठा के चेतन सोलंकी समेत दलित संगठनों से जुड़े लोगों और समाजसेवियों ने आज एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर कहा कि 25 जून की शाम के 6 बजे तक यदि धारा 376 के तहत मुकदमा दर्ज नहीं किया गया और यदि थाना इंचार्ज के सामने एट्रोसिटी एक्ट की धारा 4 के तहत कार्रवाई नहीं की गई तो 26 जून को सुबह 11 बजे बनासकांठा जिले की बनास नदी के उपर का ब्रिज और हाईवे बंद करवा देंगे।
बलात्कार के मामले में किसी भी लापरवाही को हम सहन नहीं करेंगे। साथ ही ऐलान किया कि गुजरात सरकार तैयारी कर ले हमें रोकने की, हम तैयारी कर लेंगे रास्ता रोकने की।