Nov 19, 2016

चीन के लिए अपने नागरिकों को उजाड़ेगा पाकिस्तान

बिजली व्यवस्था के नाम पर पाकिस्तान चीन से महंगे दाम पर बिजली खरीदेगा। साथ ही यहां के स्थानीय उद्योगों को तबाह कर देगा...

प्रदीप श्रीवास्तव

जनज्वार। पाकिस्तान के गिलगिट क्षेत्र में 46 सौ करोड़ रुपए की लागत से चाइना पाक इकोनाॅमिक काॅरिडोर का निर्माण किया जा रहा है। निर्माण कार्य 2018 तक में पूरा हो जाएगा। इससे चीन पाक के पश्चिमी हिस्से के बंदरगाह ग्वादर से जुड़ जाएगा। माना जा रहा है कि इससे पाक का तेजी से विकास होगा। लेकिन, इसके निर्माण को लेकर विरोध तेज हो गया है। स्थानीय निवासी अपने व्यापार व संस्कृति के तबाह होने के खतरे से डरे हुए हैं।

पाकिस्तान के बंदरगार से जोड़ने के लिए चीन 3,218 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कर रहा हैं। इसे नया सिल्क रूट भी माना जा रहा है। इस सड़क से झिंगजियांग पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जुड़ जाएगा। पूरा कवायद इसलिए की जा रही है कि वर्तमान में चीन को तेल पाने के लिए 16,000 किलोमीटर लंबा सफर तय करना पड़ता हैं, जिसमें खर्च के साथ ही समय बहुत लगता है। 

कई बार तीन माह से ज्यादा समय बाद तेल देश में पहुंचता है। जबकि नए रास्ते से यह दूरी पांच हजार से भी कम हो जाएगी। इसमें समय व खर्च की बहुत बचत होगी। तेल सहित दूसरे माल की लागत भी बहुत कम हो जाएगी। इसके लिए दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में 21 प्रकार के समझौते हुए हैं। 

चीन सीधे इस्लामाबाद के रास्ते कतर, दुबई और अबुधाबी से जुड़ जाएगा। एशियन डेवलपमेंट बैंक के अनुसार नए रूट देश में उद्योगों व व्यापार का तेजी से विकास होगा। लेकिन द डाॅन में छपी दनार्थपोल डाटा काॅम की रिपोर्ट के अनुसार इससे पूरा क्षेत्र उजड़ जाएगा। सबसे ज्यादा नुकसान यहां के स्थानीय निवासियों को होगा। इस रोड पर बिजली की व्यवस्था के नाम पर पाकिस्तान चीन से महंगे दाम पर बिजली खरीदेगा। साथ ही यहां के स्थानीय उद्योगों को तबाह कर देगा। 

सांस्कृतिक परिवेश भी चीन के आवाजाही के कारण समाप्त हो जाएंगे। 73 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में लोगों को विस्थापित किया जाएगा। पाक की आर्थिक हालात ऐसी है कि विस्थापित लोगों को बसाने की कोई योजना नहीं बनाई गई है। 

Nov 18, 2016

प्रधानमंत्री मोदी को जो 55 करोड़ मिला, क्या वह कालाधन नहीं है?

सबूत पहुंचा जांच एजेंसियों के पास, पर सरकार समर्थित पत्रकारों ने साधा मौन, एक ही सवाल कि कौन बांधे बिल्ली की गले में घंटी

देश की प्रमुख पांच जांच एजेंसियों को स्वराज अभियान के अध्यक्ष और वकील प्रशांत भूषण ने भेजा पत्र, पर सभी जगह छायी है चुप्पी। सबूतों के आधार पर वकील का दावा कि पार्टी कोषाध्यक्ष और भाजपा मुख्यमंत्रियों को मिला है करोड़ों का कालाधन


प्रधानमंत्री मोदी जब 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने की देश को सूचना दे रहे थे, उससे बहुत पहले सु्प्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण देश की प्रमुख आधा दर्जन से अधिक सरकारी जांच एजेंसियों को लिखकर बता चुके थे कि न सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ने ​बल्कि देश के अन्य तीन और मुख्यमंत्रियों ने करोड़ों का कैश उद्योगपतियों से वसूला है। प्रशांत भूषण ने जिन एजेंसियों को डाक्यूमेंट्स भेजे हैं, उनमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा कालेधन को लेकर बनाई गई दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम, निदेशक सीबीआई, निदेशक ईडी, निदेशक सीबीडीटी और निदेशक सीवीसी शामिल हैं।

मासिक अंग्रेजी पत्रिका कारवां में छपी रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की ओर से किए गए रेड के जो डाक्यूमेंट्स दिल्ली के पत्रकारों और नौकरशाहों के दायरे में घूम रहे हैं उनके मुताबिक, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी को सुब्रत राय के सहारा इंडिया ग्रुप से जुड़े किसी 'जायसवाल जी' ने करोडों रुपए कैश में दिए।



पत्रिका को हाथ लगे डाक्यूमेंट्स से साफ है कि 30 अक्टूबर 2013 और 29 नवंबर 2013 को गुजरात सीएम, मोदी जी के नाम से 13 ट्रांजेक्शन हुए। इन ट्रांजेक्शन से पता चलता है कि 13 ट्रांजेक्शन में 55.2 करोड़ रुपए मोदी जी और गुजरात सीएम के नाम से दिए गए। हालांकि पत्रिका का यह भी मानना है कि यह बहुत साफ नहीं हो पा रहा है कि ट्रांजेक्शन 13 हुए या 9 ट्रांजेक्शन में 40.1 करोड़ रुपए जमा किए गए। 

इसके अलावा सहारा ग्रुप से जुड़े जायसवाल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी करोड़ों के रुपए कैश में दिए। करोड़ों का कैश लेने वालों में भारतीय जनता पार्टी की कोषाध्यक्ष शायना एनसी भी शामिल हैं।

इस रिपार्ट का विस्तृत खुलासा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रणोंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि कारवां और इकॉ​नॉमिक एंड पॉलिटिकल ​वीकली पत्रिका ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से मिले सबूतों के आधार पर सभी नेताओं को सफाई के लिए ईमेल किया है। पर 17 नवंबर को किए गए ईमेल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी कोषाध्यक्ष शायना एनसी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित में से किसी ने अबतक नहीं दिया है।

प्रधानमंत्री से लेकर तीन—तीन मुख्यमंत्रियों द्वारा कैश में करोडों का कालाधन लेने के इस मामले का खुलासा इनकम टैक्स की डिप्टी डाइरेक्टर अंकिता पांडेय ने किया था। इन कागजातों पर उनके अलावा भारत सरकार के दूसरे अधिकारियों के भी दस्तखत हैं। इस मामले में जब पत्रिका ने 3 नवंबर को संपर्क किया तो अंकिता पांडेय का जवाब था, 'मैं लंबी छुट्टी पर हूं और मैं वह आधिकारित व्यक्ति नहीं हूं जो डाक्यूमेंट्स की सत्यता को लेकर कोई बयान दे।' फिलहाल यह डाक्यूमेंट देश के तमाम पत्रकारों और सरकार अधिकारियों के पास है।


असल में कहानी है क्या

वेबसाइट 'जनता का रिपोर्टर' का दावा है कि अक्टूबर 2013 से नवम्बर 2014 में क्रमशः सहारा और आदित्य बिड़ला के ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे पड़े थे ।

यहां से आयकर अधिकारियों को दो महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले थे । जिनमें सरकारी पदों पर बैठे कई लोगों को पैसे देने का जिक्र था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी शामिल था ।

बिड़ला के यहां से जब्त दस्तावेज में सीएम गुजरात के नाम के आगे 25 करोड़ रुपये लिखा गया था। इसमें 12 करोड़ दे दिया गया था । बाकी पैसे दिए जाने थे ।

इसी तरह से सहारा के ठिकानों से हासिल दस्तावेजों में लेनदारों की फेहरिस्त लम्बी थी । जिसमें सीएम एमपी, सीएम छत्तीसगढ़, सीएम दिल्ली और बीजेपी नेता सायना एनसी के अलावा मोदी जी का नाम भी शामिल था ।

मोदी जी को 30 अक्टूबर 2013 से 21 फ़रवरी 2014 के बीच 10 बार में 40.10 करोड़ रुपये की पेमेंट की गई थी । खास बात ये है कि तब तक मोदी जी बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके थे ।

सहारा डायरी की पेज संख्या 89 पर लिखा गया था कि 'मोदी' जी को 'जायसवाल जी' के जरिये अहमदाबाद में 8 पेमेंट किए गए ।

डायरी की पेज संख्या 90 पर भी इसी तरह के पेमेंट के बारे में लिखा गया है । बस अंतर केवल इतना है कि वहां 'मोदी जी' की जगह 'गुजरात सीएम' लिख दिया गया है, जबकि देने वाला शख्स जायसवाल ही थे।

मामला तब एकाएक नाटकीय मोड़ ले लिया जब इसकी जांच करने वाले के बी चौधरी को अचानक सीवीसी यानी सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का चेयरमैन बना दिया गया । प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी ।

इस साल 25 अक्टूबर को प्रशांत भूषण ने सीवीसी समेत ब्लैक मनी की जांच करने वाली एसआईटी को सहारा मामले का अपडेट जानने के लिए पत्र लिखा । ख़ास बात यह है कि उसी के दो दिन बाद यानी 27 अक्टूबर को दैनिक जागरण में 500-1000 की करेंसी को बंद कर 2000 के नोटों के छपने की खबर आयी । बताया जाता है कि के बी चौधरी ने वित्तमंत्री अरुण जेटली को इसके बारे में अलर्ट कर दिया था।

उसके बाद सहारा ने इनकम टैक्स विभाग के सेटलमेंट कमीशन में अर्जी देकर मामले के एकमुश्त निपटान की अपील की । जानकारों का कहना है कि कोई भी शख्स इसके जरिये जीवन में एक बार अपने इनकम टैक्स के मामले को हल कर सकता है । और यहां लिए गए फैसले को अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती है । साथ ही इससे जुड़े अपने दस्तावेज भी उसे मिल जाते हैं । जिसे वह नष्ट कर सकता है । अदालत या किसी दूसरी जगह जाने पर यह लाभ नहीं मिलता । चूंकि मामला पीएम से जुड़ा था इसलिए सहारा इसको प्राथमिकता के आधार पर ले रहा था ।

बताया जाता है कि सेटलमेंट कमीशन में भी मामला आखिरी दौर में था । भूषण ने 8 नवम्बर को फिर कमीशन को एक पत्र लिखा । जिसमें उन्होंने मामले का अपडेट पूछा था ।

शायद पीएम को आने वाले खतरे की आशंका हो गई थी । जिसमें उनके ऊपर सीधे-सीधे 2 मामलों में पैसे लेने के दस्तावेजी सबूत थे । उनके बाहर आने का मतलब था पूरी साख पर बट्टा । मामले का खुलासा हो उससे पहले ही उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जिसकी आंधी में यह सब कुछ उड़ जाए । नोटबंदी का फैसला उसी का नतीजा था ।

इसे अगले साल जनवरी-फ़रवरी तक लागू किया जाना था । लेकिन उससे पहले ही कर दिया गया । यही वजह है कि सब कुछ आनन-फानन में किया गया । न कोई तैयारी हुई और न ही उसका मौका मिला । यह भले ही 6 महीने पहले कहा जा रहा हो लेकिन ऐसा लगता है उर्जित पटेल के गवर्नर बनने के बाद ही हुआ है । क्योंकि नोटों पर हस्ताक्षर उन्हीं के हैं । छपाई से लेकर उसकी गुणवत्ता में कमी पूरी जल्दबाजी की तरफ इशारा कर रही है ।

Nov 16, 2016

7 हजार करोड़ की कर्जमाफी का मजा मार रहे पूंजीपतियों की सूची हुई सरेआम

पढ़िए एक—एक नाम, जानिए कौन —कौन पूंजीपति हैं भाजपा सरकार की निगाहों में कर्जमाफी के जरूरतमंद। जरूरतमंदों में सबसे ऊपर विजय माल्या, भक्तों की सरकार ने  भगोड़े का माफ किया 12 सौ करोड़ 

ये सिर्फ दस बड़े सुरसा हैं, शेष को नीचे देखिये                                                                                                            साभार - डीएनए 


भारत सरकार के प्रमुख बैंक स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने जिन 63 पूंजीपतियों की 7 हजार 16 करोड़ रुपए कर्ज के माफ किए हैं, उनकी विधिवत सूची मीडिया में आ गयी है। इस खबर का सबसे पहले अंग्रेजी अखबार डीएनए ने खुलासा किया है। मीडिया में आई सूची में भारत सरकार ने सबसे ज्यादा कर्ज भगेडू और भ्रष्ट पूंजीपति विजय माल्या का माफ किया है। स्टेट बैंक ने जिन पूंजीपतियों के कर्ज माफ किए हैंं, उनकी कुल संख्या 100 है, पर 63 की माफी कुल कर्ज का 80 प्रतिशत है। 

गौरतलब है कि भारत सरकार के सबसे ख्याति प्राप्त बैंक ने जून 2016 में बैड लोन के नाम पर कर्ज के 48 हजार करोड़ रुपए नहीं वसूलने या उन्हें माफ करने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद विपक्षी पार्टियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसान संगठनों ने सवाल भी उठाया कि एक तरफ तो सरकार और निजी क्षेत्र के बैंक हजार—चार हजार बकाए पर वसूली का दबाव बनाकर किसानों को आत्महत्या तक मजबूर करते हैं, जबकि सरकार जनता की गाढ़ी कमाई का 48 हजार करोड़ रुपए माफ कर रही है। 

स्टेट बैंक ने इसी क्रम में भारतीय पूंजी​पतियों के भी कर्ज माफ किए थे जो दशकों से चुका नहीं पा रहे थे। उस समय सूची नहीं आई थी पर लोगों को लग रहा था कि सरकार अपने चहतों की कर्जमाफी सबसे पहले करेगी। हालांकि जिन पूंजीपति घरानों के कर्ज माफ किए गए हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो ​दिवालिया घोषित हो चुका है। 

7 हजार करोड़ की कर्जमाफी वाली सूची आने के बाद भाजपा की केंद्र सरकार पर पहला सवाल यही उठ रहा है कि क्या सरकार के पहले पसंदीदा पूंजीपति शराब व्यापारी विजय माल्या ही थे, जिनका सबसे ज्यादा 12 सौ करोड़ भारत सरकार के बैंक ने माफ किया है। 

अरबों की सरकारी लूट और टैक्स चोरी के आरोपी और भगोड़ा विजय माल्या को देश से भगाने का आरोप पहले ही मोदी सरकार पर लगता रहा है। माना जाता है कि सरकार की ओर से मिले लूप होल के ​जरिए ही विजय माल्या जेल जाने की बजाए देश से भाग गया। 

63 पूंजीपतियों के 7 हजार करोड़ की कर्जमाफी मौजूदा संसद सत्र में सरकार के लिए गले की फांस बन सकती है। वैसे भी सरकार ने आम जनता को कालेधन पर अंकुश की उम्मीद दिखाकर पिछले हफ्ते भर से एटीएम और बैंकों के गेटों पर लाइन में खड़ा कर रखा है। 

देश को  ईमानदार बनाने की उम्मीद में जनता सौ—दो सौ के लिए लाइन में खड़ी है और यहां सरकार लाइन लगाकर पूंजीप​तियों की कर्जमाफी कर रही है. 

Nov 15, 2016

सोनम गुप्ता की बेवफाई का इतिहास

सोनम गुप्ता के बेवफाई का इतिहास बहुत पुराना है। वह दशकों से भारतीय मर्दों का दिल तोड़ते चली आ रही है। हद तो यह है कि उसकी बहनें भी इस काम में एक के बाद एक लगी रहीं और बेचारा मासूम मर्द मोहब्बत की कटोरी लिए लहूलुहान होता रहा है...  


इस बार सोनम गुप्ता नए नोट पर अवतरित हुई। उसकी बेवफाई के चर्चे बिल्कुल नए और ताजे नोट पर हुए। घंटों की लंबी लाईन और कई दिनों के प्रयास के बाद मिल रहे नए 2 हजार वाले नोट पर 'सोनम गुप्ता बेवफा है', लिखना किसी के प्यार में गहरे गिरने से कम नहीं है। शायद यही वजह थी कि ऐतिहासिक रूप से सोनम गुप्ता अपनी बेवफाई के लिए इस बार चर्चित हुई। इससे पहले उसकी चर्चा कभी नहीं हुई। देखते ही देखते लाखों लोगों ने सोनम गुप्ता का हैशटैग लगाना शुरू ​कर दिया, सोशल मीडिया पर संदेश शेयर करने लगे, किस्से—कहानियां कहने लगे, तंज कसने लगे और कहकहे भी खूब लगे।

पर हर बार की तरह अबकी भी सोनम गुप्ता मौन ही रही। चुपचाप अपने बेवफाई के किस्से चौक—चौराहों, गलियों—नुक्कड़ों, घरों—दफ्तरों और स्कूलों—कॉलेजों में सुनती रही। सुनाकर आनंद लेने वालों को देखती रही। बिल्कुल भी बोल नहीं सकी, क्योंकि उसका इतिहास ही बदनामी, बेवफाई और चुप्पी का रहा है।

इस बार जो नया था वह यह कि सोनम गुप्ता, शीला या मुन्नी की तरह किसी फिल्म या गाने में रचित चरित्र नहीं थी, बल्कि अबकी समाज ने ही उसकी फिल्म बना दी। एक-एक से स्क्रिप्टिंग हुई, तरह- तरह का अंदाजे बयां आजमाया गया।

ऐसे में वह अपनी उन बहनों पर तरश खा रही थी, जो उससे पहले बेवफाई या वफाई के लिए चौक—चौराहों पर चर्चा का विषय बनी, मर्दवादी मजावाद का केंद्र बनीं। मगर उन्होंने एक बार भी ऐतराज नहीं किया, ​बल्कि चुपचाप और बचके बेवफा—बेवफा की छेड़खानी देखते—सुनते रहीं।

सोनम को याद है 'मोनिका माई डार्लिंग' के बाद का दृश्य। एक फिल्म के गाने में यह बोल आने के बाद मोनिका नाम की लड़कियां मोहल्ले की प्रेमिकाएं हो गयीं। सबकी उनपर बराबर की दावेदारी हो गयी। जो मुँह उठाया वही स्कूल, कॉलेज, मंदिर या कहीं भी आते—जाते कुछ छींटाकशी कर दिया। उसे सुनने में अच्छा लगे या बुरा सबने उसे अपना डार्लिंग बना लिया।

उसके बाद 'मीरा की मोहन' की बारी आई । यह फिल्म 1990 के दशक में आई थी। मीरा नाम की लड़कियों का निकलना दूभर हो गया था। मौका पाते और हल्की छूट देखते ही मर्द बोल पड़ते 'मीरा को मोहन कब मिलेगा।' परिवार के बाहर के मर्दों के लिए यह बहुत सामान्य कमेंट था, पर परिवार और खुद मीरा नाम की लड़कियों पर क्या गुजरती थी, यह हमारा संस्कृतिवान समाज खूब समझता होगा।

राज कपूर 'बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं' गाकर लाखों का धंधा कर ले गए, पर गांवों से लेकर शहरों तक में जन्मीं राधाओं को लोगों ने धंधा करने वाली लड़कियों से बहुत अलग नहीं संबोधित किया। संगम को संभोग की उपमा दी और राधा नाम होना ही शर्मिंदगी का सबब बन गया ।

शीला की जवानी, मुन्नी बदनाम हुई और चिकनी चमेली तो सबको याद होगी कि ऐसे गानों के बाद इन नामों को लड़कियों को सार्वजनिक रूप से कितना शर्मशार होना पड़ता था। यह गाने हाल ही में आए थे और 'शीला की जवानी', गाने को लेकर महिला संगठनों ने विरोध भी जताया था। इसी तरह भोजपुरी गाना 'पिंकिया के दीदी हमके प्यार करे द', गाना बजने पर कई शादियों में मारपीट और गोली चलने तक कि खबरें आईं।

इन सारे सिलसिलों के बाद अबकी बारी सोनम गुप्ता की है। ऐसे में सवाल है कि क्या सिनेमा के गानों या फिल्मों में नाम लेकर कहानियां लिखना या गाने बनाना गलत है। क्या ऐसे गानों पर प्रतिबंध लगना चाहिए, जैसा कि कई बार प्रयास भी हुए हैं?

लेकिन यह गड़बड़ी अगर सिनेमा से आती है तो सोनम गुप्ता का गुनहगार कौन है। उसे कौन नोट पर लिख—लिख लाखों में शेयर और करोड़ों में चर्चा कर रहा है। कौन है जो उन नामों की लड़कियों को बिना वजह परेशान कर रहा है, मजाक और छींटाकशी का साधन बनाकर उन्हें तनाव और निराशा में डाल रहा है। आखिर कौन है वह।

क्या आप नहीं चाहेंगे कि उन्हें पहले ताकिद की जाए, उनका विरोध हो? अगर हां तो इसकी शुरुआत सिनेमा हाल से हो या अपने 10 बाई 10 के कमरे से, जहां से हमारे अपने लोग इस कदर यौन कुंठा की गंदगी में डूबे हैं कि उन्हें सोनम गुप्ता की ​बेवफाई के कहकहे मनोरंजन का साधन जान पड़ रहा है और आनंद पाने के इस महामार्ग पर हम और हमारे सभी अपने चल पड़े हैं।

सोचना तो होगा हमें कि 'सोनम गुप्ता बेवफा है' के हैशटैग और वायरल संदेश के पीछे हमारी कौन से महान संस्कृति काम कर रही है, जहां हममें से किसी को कुछ बुरा नहीं लग रहा है? साथ ही सवाल यह भी है कि क्या इस रोगी मन और मनोरंजन के रहते हम भारत को स्वस्थ्य सांस्कृतिक देश बना पाएंगे? 

Nov 9, 2016

पहले कालेधन को समझिए फिर फैसले पर उछलिए

विस्तार से जानिए क्यों मोदी ने क्यों उठाए होंगे कदम। पढ़िए युवा पत्रकार महेंद्र मिश्र का बिंदुवार विश्लेषण

बाजार से 500 और 1000 के नोटों को वापस लेने का फैसला स्वागत योग्य है। पहली नजर में इसमें फायदा होता जरूर दिख रहा है। लेकिन एक तरह का अतिरेक भी है कि काला धन सिर्फ 500 और 1000 के नोटों के रूप में है। यह मानना कालेधन को नहीं समझने जैसा है।

देश में काले धन का बड़ा हिस्सा अब रीयल स्टेट, जमीन, सोना और बेनामी संपत्तियों के तौर पर है। कारपोरेट, नौकरशाह और राजनेताओं के बड़े हिस्से का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। अगर कुछ देश में है तो वो कैश की जगह दूसरी संपत्तियों के रूप में है। एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंकों का धन को विदेशी खातों में जमा करने में सहयोग का पहले ही खुलासा हो चुका है।

अगर नोटों के बदलने से काला धन समाप्त होता तो यह प्रयोग एक नहीं दो बार हो चुका है। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने 500, 1000, पांच हजार और 10 हजार के नोटों को बंद करने का काम किया था। लेकिन उसका क्या नतीजा निकला? क्या उससे भ्रष्टाचार रुक गया या फिर कालाधन खत्म हो गया?

यूपीए के शासन के दौरान भी 500 के नोटों में बदलाव किया गया था। हां उसके लिए इतना हो-हल्ला नहीं मचाया गया। इस मामले में भी बताया जा रहा है कि 500 और 1000 के नोटों को बदलने की तैयारी रिजर्व बैंक ने चार साल पहले ही शुरू कर दी थी। और अब जब उसका काम पूरा हो गया और उसे लागू करने का समय आया तो मोदी जी ने उसे इंवेट में बदल दिया, जिसके वो माहिर खिलाड़ी हैं। यूपीए के शासन में इस तरह के फैसलों की घोषणा रिजर्व बैंक के गर्वनर करते थे। यहां गर्वनर की बात तो दूर वित्तमंत्री तक कहीं नहीं दिखे। सारा श्रेय मोदी लेने सामने आ गए।

फैसले का बड़ा असर परंपरागत व्यवसायियों पर पड़ेगा जिन्होंने अपने घरों या ठिकानों में नोटों की गड्डियां जमा कर रखी थीं। लेकिन उससे ज्यादा मार उस हिस्से पर पड़ेगा जो अभी भी बैंक की पहुंच से दूर है। या उसका किसी बैंक में कोई खाता नहीं है। रकम के तौर पर उसके पास बड़ी नोटे हैं। उसके लिए जिंदगी उजड़ने जैसी बात है। बाकी आम जनता के लिए अगले आने वाले कई महीने दुश्वारियों से भरे होंगे। जिनको अपने रोजमर्रा के जीवन में इसके चलते तमाम संकटों का सामना करना पड़ेगा।

लिक्विड मनी या फिर कैश के तौर पर पैसे की कमी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों इसके बड़े हिस्से का निवेश रियल स्टेट और नये चैनलों में हुआ था। लेकिन ये दोनों सेक्टर भी अब संकट के दौर से गुजर रहे हैं। उनमें मंदी है। यानी बाजार में लिक्विड मनी है ही नहीं। अगर बिल्डरों के पास पैसा होता तो वो निर्माण की प्रक्रिया जारी रखते और ब्लैक मनी रखने वाले भी फ्लैटों की बेनामी खरीदारी कर रहे होते।

समझने की बात यह है कि इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा नुकसान उस हिस्से की होने की आशंका है जो अभी तक बीजेपी का परंपरागत आधार रहा है। यानी देश का वैश्य समुदाय। लेकिन पूरे कारपोरेट क्लास की मोदी के पक्ष में गोलबंदी ने इस घाटे की भरपाई कर दी है। और मोदी जी को पता है कि देश की हवा के रुख को मोड़ने में कारपोरेट सक्षम है। ऐसे में भविष्य के एक बड़े लाभ के लिए छोटी कुर्बानी कोई मायने नहीं रखती है।

अगर तात्कालिक लाभ के तौर पर देखा जाए। तो उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनावों में बीजेपी को इसका फायदा हो सकता है। दरअसल तमाम दूसरी पार्टियां जो कारपोरेट फंडिंग से ज्यादा स्थानीय कैश और छोटे व्यापारियों की सहायता पर निर्भर होती हैं। उनके लिए बड़ा संकट खड़ा होने जा रहा है। जबकि बीजेपी ने या तो इसकी पहले से तैयार कर रखी है। या फिर किसी लिक्विड कैश की जरूरत से ज्यादा उसे कारपोरेट का सहयोग हासिल है। अडानी और अंबानी के हेलीकाप्टर और जहाज उनकी सेवा में होंगे। और पैसे के लिहाज से भी उनकी एक नेटवर्किंग है। जो धन को गंतव्य स्थानों तक पहुंचाने का काम करेंगे।

नरेंद्र मोदी अगर सचमुच में गंभीर होते तो उनके पास विदेशी बैंकों के खाताधारकों की सूची है और उनके खिलाफ सीधे कार्रवाई कर उस रकम को वापस लाया जा सकता है। लेकिन वो हिस्सा कारपोरेट का है या फिर उनके अपने सबसे ज्यादा करीबियों का। इसलिए सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है।

ऊपर से 2000 के नोट जारी करने की बात कुछ समझ में नहीं आयी। इससे अगर ब्लैक मनी के बनने के स्रोत बने रहे तो फिर जितना पैसा किसी शख्स ने 20 सालों में बनाया होगा उतना अगले चार सालों में बना लेगा। यानी कालाधनधारियों के लिए एक नई संभावना भी खोल दी गई है। ऐसे में पूरी कवायद का नतीजा ढाक के तीन पात सरीखा होगा। तात्कालिक तौर पर भले ही इसमें वाहवाही मिल जाए लेकिन आखिरी तौर पर यही आशंका है कि यह एक और एक और जुमला न साबित हो।

सम्बंधित खबर -  तुगलकी फैसला पर स्वागतयोग्य

तुगलकी फैसला पर स्वागतयोग्य

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं।


तरुण शर्मा  


मंगलवार की शाम प्रधानमंत्री मोदी जब सेना के तीनों प्रमुखों के साथ बैठे तो एकबारगी लगा कि ये बेमौसम बरसात क्यों? मुल्क पर ऐसी क्या इमरजेंसी आ गयी कि देश के मुखिया को सेना प्रमुखों के साथ बैठना पड़े। ​फिर लगा कि संभव है मोदी सरकार की तमाम मोर्चों पर जारी असफलताओं के मद्देनजर वह पाकिस्तान पर हमले का कोई नया जुमला छोड़ें। 

भक्तों को छोड़ व्यापक जनता में यह पूर्वग्रह इसलिए भी है कि सरकार और भाजपा हर वादे के बाद उसे जुमला, कहानी या ऐवें ही बोल दिया था, कह देती है।

लेकिन इन तमाम अटकलों और आकलनों को परे ढकेलते हुए जब मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करने की अचानक घोषणा कर दी तो देश हतप्रभ रह गया। यह एक फैसला ऐसा था जिसकी खबर मोदी कैबिनेट तक को नहीं थी, यहां तक कि बैंकों को भी नहीं। यही वजह है कि बीजेपी के छोटे—बड़े नेता अभी भी हैंगओवर में हैं कि ये क्या हुआ कि जिसकी उनको भनक ही नहीं थी। 

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं। 

आप इस फैसले को तुगलकी कह सकते हैं। पर बेहद गोपनीयता और सही समय पर लिए गए इस फैसले के बाद उत्साह और बेहतरी की उम्मीद से जिस तरह देश भर गया वह जरूर 'ऐतिहासिक' था।  ऐसे में किसी के पास कुछ ठोस कहने को नहीं है पर आम आदमी खुश है कि चलो एक फैसला मोदी सरकार ने ऐसा किया है जिसके साथ हमारी भी बराबर की भागीदारी बनती है।

अब बात संशय पर। हो सकता है कि सरकार जैसा अभी कालेधन योजना पर नकेल कसने के जो कसीदे पढ़ रही है, वैसा कल को न हो। यह भी दिखावा मात्र बनकर रह जाए। दूसरी योजनाओं और सुधारों की तरह फेल हो जाए और कागजी साबित हो। पर हमारा सवाल यह है कि अभी से इस नकारात्मक चाह में खुद को पतले क्यों करते जाना है? अभी तो गलत नहीं लग रहा है। हां, गरीबों-मजदूरों की व्यापक आबादी को जरूर कुछ ​दिन मुश्किल के गुजारने होंगे, क्योंकि उनका जीवन कैश पर ही चलता है। 

पर आप यह भी तो देखिए कि कौन-सा ऐसा सुधार होता है जिसमें लोगों को मुश्किल नहीं झेलनी पड़ती है। याद है न आपको दिल्ली मेट्रो। कितनी मुश्किल झेलनी पड़ी दिल्ली वालों को। बहुत लोग अपने घरों से उजड़े, उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट होना पड़ा। पर आज सुविधा कौन उठा रहा है, घंटों की उमस और जाम से भरी दूरियों को मिनटों में कौन पूरा कर रहा है।  

इस फैसले पर तमाम तरह की बहस और चर्चाएं मीडिया और समाज में चल रही है आम आदमी व मध्यमवर्ग इस मुद्दे पर पुरजोर समर्थन के साथ मोदी की पीठ ठोकता नजर आ रहा है वहीं हैरत की बात यह है कि व्यवसाय के तमाम कालेधन के गढ़ शिक्षा व सवास्थ्य माफिया, प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट कारोबारी, राजनीति से जुड़े हुए दलाल  इस पर खामोश हैं। वहीं कुछ वामपंथी  जिसके पास कालाधन तो क्या अपना खर्चा उठाने लायक पैसे नहीं है बिना तथ्य व जानकारी के फेसबुक पर मोदी विरोध व आलोचना की अपनी दैनिक दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं. 

सरकार के इस फैसले से उम्मीद है प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कालेधन से गतिमान और संचालित होती है पर नकेल लगेगी और जनता को अपेक्षाकृत सस्ता आवास उपलब्ध होगा। घरेलू व्यापार जिसका एक बड़ा हिस्सा कालेधन से चलता है व्यापार  में नकदी की कमी दूर करने के लिए कीमतें कम करने के लिए मजबूर होगा और कालाबाजारी पर रोक लगेगी। 

इस फैसले के अलग-अलग पहलू हैं जिनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए. इसमें एक बड़ा सवाल है कि कुछ दिनों के लिए आम आदमी को इससे असुविधा होगी. नकदी संकट के चलते उसे दैनिक लेनदेन व रोजमर्रा की जरुरी चीजों की खरीद में परेशानी आएगी। आम आदमी की नकदी समस्या  पर .ध्यान देने के बजाए धैर्य से काम ले।  मीडिया के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता में फ़ालतू की हड़बड़ी और खलबली पैदा करने कि बजाए  कालाधन सफ़ेद करने के तरीके खोज रहे कालाधन सरगनाओं की तिड़कमों का पर्दाफ़ाश करे और ये सुनिश्चित करे कि भ्रष्ट राजनीतिक नेतृत्व और कालेधन के व्यापारी बैंकिंग व्यवस्था में सांठ गाँठ से न दिखने वाला कोई सेफ पैसेज खोज लें।   

Nov 8, 2016

यह भाजपा की परिवर्तन रैली का वीडियो है, किसी मुजरे का नहीं

वीडियो देख  सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि मोदी जी क्या ठुमकों के सहारे उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाएंगे।  लोग यह भी जानना चाह रहे हैं कि पाकिस्तानी मुजरे वाले डांस स्टाइल से आरएसएस के लोगों को इतना लगाव क्यों है



समाजवादी पार्टी की ओर से 3 नवंबर को जो रथयात्रा शुरू हुई है उसको चुनौती देने के लिए कल से भाजपा अध्यक्ष ​अमित शाह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश भाजपा ने परिवर्तन यात्रा शुरु की। कल परिवर्तन यात्रा का पहला दिन था। पर यात्रा के पहले ही दिन स्थानीय नेताओं को मनोबल इस कदर गिरा हुआ था कि नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए बार डांसरों के ठुमकों का सहारा लेना पड़ा। 

घर में दाना नहीं और आप थाली की पूछते हो

बांदा से आशीष सागर ​दीक्षित की रिपोर्ट  

शोभा देवी : भाजपा जीतने के बाद इन्हें कार देगी !                                              फोटो : आशीष सागर  

शोभा देवी कहती हैं, 'जब घर में अन्न ही नहीं तो थाली—परात का क्या कहूं। हमने सीमेंट के बोरे को ही बर्तन मान लिया है। 10 साल पहले पति की आत्महत्या के बाद बेटियों की शादी के बीच कभी इतना हुआ ही नहीं कि एक परात खरीद सकूं। यह चावल स्कूल वाले दे देते हैं, वह न दें तो हम खाए बिना ही मर जाएं।' 

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के पड़ोई गांव की शोभा देवी के पति किशोरी ने 6 जुलाई 2006 को अवसाद के कारण आत्महत्या कर ली थी। किशोरी साहू की आत्महत्या का कारण तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट नंदन चक्रवती द्वारा किशोरी की बेटी पर बदचलनी का आरोप लगाना था। सिटी मजिस्ट्रेट के इस वाहियात बयान के बाद लोग किशोरी के परिवार पर छींटाकशी करने लगे थे, जिससे वह अवसाद पीड़ित हो गया और निराशा में आत्महत्या कर ली थी।

गांव वाले कहते हैं कि कर्ज और फांकाकशी में मरे किसान किशोरी की हाय ऐसी लगी कि सिटी मजिस्ट्रेट खुद एड्स की बीमारी से मरा। यह अधिकारी किसानों के राहत चेक भी खा जाता था।

शोभा देवी के मुताबिक, 'गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे कई बार कम आते हैं या खाना नहीं खाते हैं। फिर मिड डे मिल में बना खाना बच जाता है तो वे लोग हमें बुला लेते हैं। चावल मेरा परिवार तभी खा पाता है जब मिड डे मिल वाले देते हैं।' 

शोभा के पति किशोरी को मरे दस वर्ष हो चुके हैं पर उनकी पत्नी शोभा की माली हालत में तनिक भी सुधार नहीं आया है. उनकी 6 बेटियां थीं। उनमें से पांच की शादी उन्होंने कर दी है। एक उन्हीं के साथ गांव में ही रहती है।   

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड में किसान आत्महत्या नई बात नहीं है. ये अंतहीन कहानी अपने स्याह पन्नों से हर रोज एक नया अध्याय लिख रही है. पिछले एक दशक में 5 हजार किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं और ये हालात तब हैं जब सरकारें मुआवजे और पैकेज से बुन्देली किसान को खुशहाल करने का दंभ भरती है. 

12 नवम्बर को लगने वाली लोक अदालत में बैंकों ने लामबंद होकर 13  हजार किसानों को चुनौती देने की रणनीति तैयार कर ली है। अगर इस धमकी आयोजन के बाद कुछ किसान डरके,या  निराश हो के आत्महत्या कर लें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इन किसानों पर 22 करोड़ रुपया कर्जा बकाया है।