Oct 21, 2016

एक दलित शिक्षिका का सुलगता सवाल

क्या हम अपनी बेटियों के साथ बलात्कार होने का इन्तजार करें ?

भंवर मेघवंशी

यह जलता हुआ सवाल राजस्थान के पाली जिले की एक दलित शिक्षिका का है ,जो कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय सोजत सिटी की संस्था प्रधान है .शोभा चौहान नामकी यह सरकारी अध्यापिका  एक बहादुर सैनिक की बेटी है और बाबासाहब से प्रेरणा लेकर न्याय के लिए अनवरत लड़ने वाली भीमपुत्री है .उनके विद्याालय में पढने वाली चार दलित नाबालिग लड़कियों ने उन्हें 15 मार्च की शाम 8 बजे बताया कि उनके साथ परीक्षा के दौरान 12 और 14 मार्च 2016 को परीक्षक छैलसिंह चारण ने परीक्षा देते वक़्त अश्लील हरकतें की .

छात्राओं के मुताबिक – शिक्षक छैलसिंह ने उनमें से प्रत्येक के साथ पेपर देने के बहाने या हस्ताक्षर करने के नाम पर अश्लील और यौन उत्पीड़न करने वाली घटनाएँ की .आरोपी अध्यापक ने उनके हाथ पकड़े ,उन्हें मरोड़ा ,लड़कियों की जंघाओं पर चिकुटी काटी और अपना प्राइवेट पार्ट को बार बार लड़कियों के शरीर से स्पर्श कर रगड़ा .इतना ही नहीं बल्कि चार में से एक लड़की को अपना मोबाईल नम्बर दे कर कहा कि छुट्टियों में इस नम्बर पर बात कर लेना .में तुम्हें पास कर दूंंगा .ऐसा कह कर उसने उक्त लड़की को वहीँ रोक लिया ,लड़की बुरी तरह से सहम गई .बाद में दूसरी छात्राओं के आ जाने से उसका बचाव हो सका .

निरंतर दो दिनों तक हुयी यौन उत्पीडन की वारदात से डरी हुई चारों लड़कियां जब कस्तूरबा विद्यालय पहुंची तो उन्होंने हिम्मत बटोर कर अपने साथ हुई घटना की जानकारी संस्था प्रधान श्रीमती शोभा चौहान को रात के 8 बजे दे दी.गरीब पृष्ठभूमि से आकर पढाई कर रही इन दलित नाबालिग छात्राओं के साथ विद्या के मंदिर कहे जाने वाले स्थल पर गुरु के द्वारा ही की गई इस घृणित हरकत की बात सुनकर शोभा चौहान स्तब्ध रह गई .उन्होंने तुरंत उच्च अधिकारीयों से संपर्क किया और फ़ोन पर मामले की जानकारी दी .

15 मार्च को केजीबी संस्था प्रधान शोभा पीड़ित छात्राओं के साथ परीक्षा केंद्र पंहुची ,जहाँ पर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी नाहर सिंह राठोड की मौजूदगी में केन्द्राध्यक्ष से बात की ,आरोपी शिक्षक को भी तलब किया गया .शुरूआती ना नुकर के बाद आरोपी शिक्षक छैलसिंह ने अपनी गलती होना स्वीकार कर लिया
.
लेकिन आरोप स्वीकार कर लेने से पीड़ित छात्राओं को तो न्याय नहीं मिल सकता था और ना ही ऐसे घृणित करतब करने वाले दुष्ट शिक्षक को कोई सजा ,इसलिये संस्था प्रधान शोभा चौहान ने इस मामले में कानूनी लडाई लड़ने का संकल्प ले लिया ,शोभा ने आर पार की लडाई का मानस बना लिया था और इसमें उनकी सहयोगी थी एक शिक्षिका मंजू तथा चारों पीड़ित दलित छात्राएं .बाकी कोई साथ देता नजर नहीं आ रहा था ,पर शोभा चौहान को कानून और व्यवस्था पर पूरा भरोसा था,उन्होंने संघर्ष का बीड़ा उठाया और न्याय के पथ पर चल पड़ी .अगले दिन वह क्षेत्र के उपखंड अधिकारी के पास लड़कियों को लेकर पंहुच गई .उपखंड अधिकारी ने ब्लाक शिक्षा अधिकारी को जाँच अधिकारी नियुक्त किया.प्रारम्भिक जाँच में शिक्षा विभाग ने भी शिक्षक छैलसिंह को दोषी पाया

.दूसरी तरफ संस्था प्रधान शोभा चौहान ने शाला प्रबंध कमिटी की आपातकालीन मीटिंग बुलाई ,जहाँ पर आरोपी शिक्षक के खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज कराने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से लिया गया ,विभाग ने भी आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने हेतु निर्देशित कर दिया .ऐसे में संस्था प्रधान होने के नाते श्रीमती शोभा छैलसिंह के खिलाफ पुलिस थाना सोजत में मुकदमा क्रमांक 83 /2016 अजा जजा अधिनियम की धारा  3 (1 ) (3 ) (11 ) तथा पोस्को एक्ट की धारा 7 व 8 के तहत दर्ज करवा दिया .

मुकदमा दर्ज होते ही मुसीबतों का अंतहीन दौर शुरू हो गया ,पीड़ित छात्राओं के परिजनों और रिश्तेदारों को डराया धमकाया जाने लगा .उनको संस्था प्रधान के विरुद्ध उकसाया जाने लगा .राजनितिक दलों के लोगों द्वारा छेड़छाड़ करनेवाले शिक्षक के समर्थन में माहौल बनाया गया .जाँच को प्रभावित करने की भी कोशिस की गई ,मगर शुरूआती जाँच अधिकारी भंवर लाल सिसोदिया ने पूरी ईमानदारी से जाँच की .पीड़ितों के बयान कलमबद्ध किये तथा उनकी विडिओ रिकोर्डिंग की .मगर आरोपी पक्ष ने अपने जातीय रसूख का इस्तेमाल किया गया और कोर्ट में होने वाले धारा 164 के बयान लेने में जान बुझ कर देरी करवाई गई ,दो तीन बार चक्कर कटवाए और अंततः न्यायलय तक में बयान देते वक़्त पीड़ित दलित छात्राओं को धमकाया गया .

 चार में से तीन लड़कियों को कोर्ट में अपने बयान बदलने के लिए मजबूर कर दिया गया मगर एक लड़की ने बहादूरी दिखाई और किसी भी प्रलोभन और धमकी के सामने झुके बगैर वह अपने आरोप पर अडिग रही ,फलत जाँच अधिकारी सिसोदिया ने मामले में चालान करने की कोशिस की .जैसे ही आरोपी शिक्षक को इसकी भनक मिली कि जाँच उसके खिलाफ जा रही है तो उसने राजनीतिक अप्रोच के ज़रिये 8 मई को जाँच सिरोही जिले के पुलिस उपाधीक्षक तेजसिंह को दिलवा दी ,जो की आरोपी के स्वजाति बन्धु थे .इस तरह न्यायालय में 164 के बयान लेने वाला न्यायाधीश अपनी जाति का और अब जाँच अधिकारी भी अपनी ही जाति का मिल जाने पर जाँच को मनचाहा मोड़ देते हुए मामले में फाईनल रिपोर्ट देने की अनुशंषा कर दी गई .

परिवादी शिक्षिका शोभा चौहान को जब इसकी खबर मिली तो उन्होंने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और मामले की जाँच पुलिस महानिदेक कार्यालय जोधपुर के एएसपी केवल राय को सौंप दी गई .जहाँआज भी जाँच होना बताया जा रहा है .इतनी गंभीर घटना की 7 माह से जाँच हो रही है ,आज तक ना चालान पेश हुआ है और ना ही आरोपी की गिरफ्तारी .

न्याय की प्रत्याशा को हताशा में बदलते हुए यह जरुर किया गया कि शोभा चौहान का स्थानांतरण सोजत से जोधपुर कर दिया गया ताकि वह मामले में पैरवी ही ना कर सके ,हालाँकि शोभा चौहान हार मानने वाली महिला नहीं है,उन्होंने कोर्ट से स्टे ले लिया और आज भी उसी आवासीय विद्यालय में बतौर संस्था प्रधान कार्यरत है .उन्हें भयभीत करने के लिए दो बार भीड़ से श्रीमती शोभा चौहान पर हमले करवाए जा चुके है ,उनके चरित्र पर भी कीचड़ उछालने का असफल प्रयास हो चूका है ,मगर शोभा है कि हार मानना जानती ही नहीं है ,वो आज भी न्याय के लिए हर संभव दरवाजा खटखटा रही है .न्याय का संघर्ष जारी है .

उनको दलित शोषण मुक्ति मंच तथा अन्य दलित व मानव अधिकार संगठनों का सहयोग भी मिला है ,कामरेड किशन मेघवाल ,जोगराज सिंह ,तोलाराम चौहान तथा स्टेट रेस्पोंस ग्रुप के गोपाल वर्मा सहित कुछ साथियों ने इस मुद्दे में अपनी भूमिका निभाई है ,लेकिन जितना सहयोग समुदाय के जागरूक लोगों से मिलना चाहिए ,उतना नहीं मिला है .हाल ही में राज्य के कई हिस्सों में इसको लेकर ज्ञापन दिये गए है .

नाबालिग दलित छात्राओं के साथ यौन उत्पीडन करने वाले शिक्षक छैलसिंह को सजा दिलाने के लिए कृत संकल्प बाड़मेर के उत्साही अम्बेडकरवादी कार्यकर्ता जोगराज सिंह कहते है कि हमें हर हाल में इन दलित छात्राओं और दलित शिक्षिका शोभा चौहान को न्याय दिलाना है.

वर्तमान हालात यह है कि सभी पीड़ित चारों दलित छात्राएं इस घटना के बाद से पढाई छोड़ चुकी है .संस्था प्रधान शोभा चौहान अकेली होने के बावजूद सारे खतरे झेलते हुए भी लडाई को जारी रखे हुये है और आरोपी शिक्षक का निलंबन रद्द करके उसकी वापस नियुक्ति कर दी गई है .

बाकी लड़कियों ने भले ही दबाव में बयान बदल दिये है मगर कस्तूरबा विद्यालय की एक शिक्षिका मंजू देवी और एक छात्रा जिसके माँ बाप बेहद गरीब है ,वह इस लडाई में संस्था प्रधान शोभा चौहान के साथ खड़ी हुई है ,यही संतोष की बात है .

अटल इरादों की धनी ,निडर और संघर्षशील भीमपुत्री श्रीमती शोभा चौहान की हिम्मत आज भी चट्टान की भांति कायम है ,वह बिना किसी डर या झिझक के कहती है कि दोषी शिक्षक के बचाव में लोग तर्क देते है कि छेड़छाड़ ही तो की ,बलात्कार तो नहीं किया ना ? फिर इतना बवाल क्यों ?

इस तरह के कुतर्कों से खफा शोभा चौहान का सबसे यह सवाल है कि – “  क्या हम इन्तजार करें कि हमारी बेटियों के साथ बलात्कार हो ,तभी हम जागेंगे, तभी हम बोलेंगे ,तभी हम कार्यवाही करेंगे ?

क्या वाकई हमें इंतजार करना चाहिए ताकि  शिक्षण संस्थानों में हो रहे भेदभावों और यौन उत्पीड़नों के चलते कईं और रोहित वेमुला व डेल्टा मेघवाल अपनी जान गंवा दें और शोभा चौहान जैसी भीमपुत्री इंसाफ की अपनी लडाई हार जाये ? अगर नहीं तो चुप्पी तोडिये और सोजत शहर के कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय की नाबालिग दलित छात्राओं को न्याय दिलाने में सहभागी बनिये .

-       भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है ,उनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है )

आदिवासियों के गांवों को माओवादियों ने नहीं सीआरपीएफ ने फूंका — सीबीआई

सीबीआई ने कहा पुलिस अधिक्षक कल्लूरी के आदेश में पर हुई थी हत्या और बलात्कार। आदिवासियों के सैकड़ों घरों को भी फूंक दिया था सुरक्षाबलों ने। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा, करो माओवादियों से शांतिवार्ता

सुप्रीम कोर्ट के सामने आज सीबीआई ने कहा कि 2011 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में जो तीन गांव फूंक कर तबाह कर दिए गए थे उन्हें 'कांबिंग आॅपरेशन' के नाम पर सुरक्षा बलों दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधिक्षक एसआरपी कल्लूरी के आदेश पर जला दिया गया था। पुलिस अधिक्षक के आदेश में पर तबाह किए गए इन गांवों में सुरक्षा बलों ने तीन आदिवासियों की हत्या और तीन महिलाओं का बलात्कार भी किया था।

सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, 'मैनें पुलिस और सीआरपीएफ पर इल्ज़ाम लगाया था कि पुलिस ने आदिवासियों के तीन गांवों को आग लगा दी थी, तब सरकार ने कहा था आग नक्सलवादियों ने लगाई है , आज सीबीआई की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट मे पेश हुई है। सीबीआई ने कहा है कि आग पुलिस सीआरपीएफ और विशेष पुलिस अधिकारियो ने लगाई और आग लगाने का आदेश पुलिस अधीक्षक कल्लूरी ने दिया था।'

गौरतलब है कि इस गांव की बलात्कार पीड़ित महिलाओं का वीडियो यू ट्यूब पर डालने के कारण पुलिस ने आदिवासी पत्रकार लिंगा कोड़ोपी के मलद्वार में मिर्च लगा डन्डा घुसा दिया था और ढाई साल तक जेल मे डाल दिया था। अब सीबीआई की रिपोर्ट मे सच्चाई सामने आने के बाद आईजी कल्लूरी की गिरफ्तारी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के जज मदन बी लोकूर और आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने सरकार ने जोर देकर सलाह दी है कि छत्तीसगढ़ में हो रही हिंसा को लेकर माओवादियों से शांतिवार्ता करें। केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसीटर जेनेरल को तुशार मेहता को कहा कि वह नागालैंड और मिजोरम के ​भी विद्रोही गुटों से शांतिवार्ता की पहल करे। मेहता ने कोर्ट से वादा किया है कि वह इस बारे में सरकार के उच्चस्तरीय प​दाधिकारियों से बात करेंगे। मेहता ने कोर्ट के समक्ष माना कि पुलिसिया कार्रवाई विद्रोहियों से निपटने का दीर्घकालिक उपाय नहीं हो सकता।

जो अपनी महिलाओं के नहीं हो सके, उनका देश क्या खाक होगा

यह और कुछ नहीं, गुंडई है। खुलेआम गुंडई! पहले आप घर में करते थे, अब चौराहों पर चौड़े होकर कर रहे हैं। धर्म, परिवार, समाज और सियासत का वास्ता देकर अपनी औरतों को आपने सदियों तक चुप कराया । पर वो चुप नहीं हुईं ? वह खड़ा होने का साहस कर गयीं। तो अब आप सड़क और सरकार के सामने सरेआम नंगा हो उतर आए हैं।

आप किसी के अधिकार को खत्म करने को लेकर धरना—प्रदर्शन कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों को मजबूर कर रहे हैं कि लोकतंत्र में आपकी औरतों की अधिकार बहाली की वे मुखालफत करें। आप कौम के नौजवानों तक को मुर्ख बना रहे हैं कि यह धर्म पर हमला है, औरत को अधिकार देने की पहल नहीं। 

हद तो यह कि इन मूर्खताओं के बावजूद आप धर्मं और खुद को प्रगतिशील कहते हैं? महान ईस्लाम और मुसल्लम ईमान वाले मुसलमान होने की बात कहते हैं? हद तो यह है कि जब आपके धर्म में औरतों की हालत पर बहस हो रही है तो आप कभी कूद कर हिन्दू धर्म की तो कभी किसी और धर्म की गंदगी उभार कर अपनी गलाजत को सही ठहराने की तरकीब तलाशते हैं. आपकी चिंता यह नहीं होती कि अपनी गन्दगी दूर कर दूसरे की मोरियों को उभार कर पूरे समाज से औरतों के दोयम स्थिति को ठीक  किया जाये बल्कि आप अपनी टट्टी ढंकने के लिए दूसरे की टट्टी उभार देते हैं और सोचते हैं बच गया धर्म,  हो गए हम मुसलमान। 

आखिर आप भारत को कैसा लोकतंत्र बनाना चाहते हैं जो औरतों के जुल्म को धर्म के चिलमन में जायज ठहरा दे।

पर दिक्कत क्या है कि ऐसा सिर्फ आप औरतों के लिए चाहते हैं। अपने लिए पैमाना आपका बिल्कुल अलग है। क्या यह ठीक वैसी ही गुंडई है नहीं है जैसी आपके साथ हिंदूवादी और सरकार करती है। तब तो आप चाहते हैं कि मुल्क आपके साथ खड़ा हो जाए, तब आपको मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और बराबरी के सवाल चतुर्दिक नजर आते हैं। तब आपको लगता है देश में संविधान की सरकार नहीं चल रही, संघियों की शाखा जारी है।

मगर आप अपनी महिलाओं के मामले में सरे राह डंडा लिए खड़े हैं और आधुनिक होते समय में आप दम ठोंककर कहते हैं — वह हमारी औरते हैं, उनका फैसला हम करेंगे...लोकतंत्र नहीं, सरकार नहीं। फिर यही भाषा आपके लिए हिंदू धार्मिक कट्टरपंथी, उन्मादी और दंगाई बोलें तो देश क्यों बोले? क्यों आपके साथ धर्मनिरपेक्षता का ढोल बजे और क्यों कोई कहे कि देश सबका है, क्यों न कहे कि यह देश हिंदुओं का है।

ऐसे में यह याद रखिए कि जो कौम और जिनके नुमाईंदे अपनी महिलाओं के साथ नहीं खड़े हो सकते, जो अपनी आधी आबादी के हक में नहीं हो सकते, उन्हें यह सोचने और चाहने का कोई हक नहीं कि पूरा देश उनके हक—हकूक के साथ खड़ा हो जाए, धार्मिक उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करे। 
अगर यह देश और इसका लोकतंत्र मुसलमान मर्दों के दबाव में झुक जाता है और तीन तलाक जैसे अमानवीय धार्मिक प्रथा को बरकरार रखने के लिए मजबूर होता है तो यह सिर्फ मुस्लिम औरतों की हार नहीं होगी। यह हार आप मर्दों की बड़ी होगी क्योंकि इससे आप हिंदूवादियों को वह लॉजिक देंगे जिससे वह सांस्थानिक स्तर पर  दशकों तक साबित करते रहेंगे कि आप कितने लोकतंत्र विरोधी, धार्मिक दकियानूस और स्त्री विरोधी हैं।

Oct 20, 2016

भाजपा आपको भटका रही है और आप भटकने के एक्सपर्ट बनते जा रहे हैं

पिछले दो दशकों से जनसंघर्षों की अगुवाई कर रहे हिमांशु कमार का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए...

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत सरकार ने गरीबों को राशन मिलने के तरीके में कुछ बदलाव किये हैं। अब गरीबों के लिए दो नए नियम बनाये गए हैं।

पहला तो यह की राशन उसी को मिलेगा जिसके पास आधार कार्ड होगा। अब आधार कार्ड तो उसी का बन सकता है जिसके पास पहले से कोई पहचान पत्र हो। लेकिन जो लोग फुटपाथ पर रहते हैं, ट्रांसजेंडर, बेघर और प्रवासी मजदूर हैं इनके पास कोई पहचान पत्र नहीं हैं, इसलिए इनका आधार भी नहीं बनेगा .

और इनका आधारकार्ड नहीं बनेगा तो इन्हें राशन भी नहीं मिलेगा, जबकि सस्ते राशन की ज़रूरत तो सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को है। यानि जिन लोगों को राशन की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उन्हें ही सरकार नें धक्के मार कर बाहर खदेड़ दिया है। इसके अलावा सरकार नें राशन दुकानों में अंगूठे और उँगलियों के निशान के मार्फत ही राशन देने का नियम बना दिया है।

अब जो मजदूर पत्थर ढोने का काम करते हैं या अमीरों के घरों में बर्तन साफ़ करने वाली महिलायें हैं, उनकी उँगलियों के निशान घिस जाते हैं या सर्दियों में उंगलियों की खाल फट जाती हैं। इन हालातों में दूकान पर दी गयी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती, बुढापे में झुर्रियां पड़ने से भी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती।

इसकी वजह से मजदूर, महिलायें और बुजुर्ग लोग कई किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं और मशीन के द्वारा उँगलियों के निशान ना पहचाने जाने पर खाली हाथ वापिस चले जाना पड़ता है। कई महीनों तक राशन ना देने के बाद दुकानदार लिख देता है की यह व्यक्ति राशन लेने नहीं आता है। क्योंकि सरकार द्वारा दूकान वालों को यही आदेश दिया गया है, इसके बाद ऐसे लोगों के राशन कार्ड रद्द कर दिए जाते हैं।

जाहिर है लाखों गरीबों का राशन लेने का हक सरकार साजिश करके मार रही है। एक तरफ अंबानी जैसे धनिकों को पैसे के बल पर सारे देश की आबादी की दाल से मुनाफा कमाने और तीन गुना कीमत कर देने की सहूलियत दी जा रही है। वहीं जान—बूझ कर गरीब को राशन की दूकान से भगा कर बाज़ार से सामान खरीदने की साजिश पर काम चालू है ताकि गरीब मजदूर की जेब से भी मुनाफ़ा निकाल कर तिजोरी में डाला जा सके।

हम सरकार को चुनौती देते हैं कि सरकार में दम है तो गरीब जनता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति कर के दिखाए। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे काल्पनिक मुद्दों पर सारे देश का ध्यान भटकाने की साजिश बंद करी जाय। चुनाव भी देश की गरीब जनता के मुद्दे पर लड़ कर दिखाइये।

देश की गरीब जनता की बात कोई नहीं सुन रहा है। भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए, अगर आप भाजपा के मुद्दों पर बहस में फंसेंगे तो वो आपको अपने मैदान में पीट कर भगा देंगे। इन संघियों को अपने मैदान में घसीट कर लाइए,
ये यहाँ मार खायेंगे कि ये हिन्दुओं की नहीं अमीरों के गुलामों की सरकार है।

घटिया होती पत्रकारिता का जिन्हें गम है सिर्फ वही पढ़ें

इस लेख को उन पत्रकारों को जरूर पढ़ना चाहिए जो सच को सामने लाने के लिए खुद में हलचल महसूस करते हैं और मानते हैं कि उनमें पत्रकारिता की धारा बदल देने का माद्दा है...

प्रेम से बोलो जय भारत माता की  

शेखर गुप्ता
पाकिस्तानी पत्रकार अौर टिप्पणीकार प्राय: कहते हैं कि जब विदेश और सैन्य नीतियों की बात आती है तो भारतीय मीडिया उनके मीडिया की तुलना में सत्ता के सुर में अधिक सुर मिलाता है। कड़वा सच तो यह है कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकार (ज्यादातर अंग्रेजी के) साहसपूर्वक सत्ता प्रतिष्ठानों की नीतियों व दावों पर सवाल उठाते रहे हैं। इनमें कश्मीर नीति में खामी बताना तथा अातंकी गुटों को बढ़ावा देने जैसे मुद्‌दे शामिल हैं। इसके कारण कुछ पत्रकारों को निर्वासित होना पड़ा (रजा रूमी, हुसैन हक्कानी) या जेल जाना पड़ा (नजम सेठी)।

भारतीय पत्रकारों की अपनी दलील है : भारत में कहीं ज्यादा असली लोकतंत्र है व सेना राजनीति से दूर है, इसलिए तुलना अप्रासंगिक है। जहां जरूरत होती है, हम सवाल खड़े करते ही हैं। श्रीलंका सरकार के खिलाफ लिट्‌टे को पहले ट्रेनिंग व हथियार देने में सरकार का अंध समर्थन करने (इंडिया टुडे ने 1984 में मुझे यह स्टोरी ब्रेक करने दी थी। इंदिरा गांधी ने तब मुझे राष्ट्र विरोधी कहा था।) और बाद में भारतीय शांतिरक्षक बल के द्वारा वहां हस्तक्षेप करने के समर्थन का भारतीय मीडिया पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।

किंतु यह परिपाटी अब बदल रही है और यह सिर्फ उड़ी हमले के बाद नहीं हुआ जब इंडिया टुडे के करण थापर ही एकमात्र एेसे पत्रकार थे, जिन्होंने सवाल उठाया कि कैसे चार गैर-सैनिक ब्रिगेड मुख्यालय की सारी सुरक्षा को चकमा देने में कामयाब हुए। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लौ आलोचनात्मक आकलन करने वाले एकमात्र रिटायर्ड जनरल थे। वे उन पांच ब्रिगेड में से एक के कमांडर थे, जो 1987 के अक्टूबर में सबसे तेज गति से जाफना पहुंची थीं। वह भी न्यूनतम नुकसान के साथ।

मैं स्वीकार करूंगा कि बदलाव करगिल के साथ हुआ। करगिल युद्ध तीन हफ्तों के इनकार के बाद शुरू हुआ। पाकिस्तानियों ने इनकार किया कि वे वहां मौजूद हैं, हमारी सेना ने इतनी गहराई और विस्तार में हुई घुसपैठ से इनकार किया। जनरलों के पहले जर्नलिस्ट वहां पहुंच गए। वहां पत्रकारों और सैन्य इकाइयों में एक-दूसरे के लिए फायदेमंद रिश्ता स्थापित हो गया। अंतिम नतीजा सबके लिए अच्छा रहा : भारत की विश्वसनीयता बढ़ी, क्योंकि इसने स्वतंत्र प्रेस को रणभूमि में बेरोक-टोक पहुंचने की अनुमति दी।

सेना को यह फायदा हुआ कि उसके असाधारण पराक्रम की कहानियां पूरे देश में पहुंचीं। इस सारी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण खबर रह गई : इतने सारे पाकिस्तानी इतने भीतर तक कैसे घुस आए, हमें इसका पता लगने में इतना वक्त क्यों लगा, हमने इसकी आधे-अधूरे मन से (छोटे गश्ती दलों का इस्तेमाल कर) पड़ताल क्यों की या ऐसे विमान क्यों इस्तेमाल किए, जो कंधे से चलाई जा सकने वाली मिसाइलों का निशाना बन सकते थे, जबकि बेहतर विकल्प मौजूद थे।

नतीजा यह हुआ कि किसी की बर्खास्तगी नहीं हुई। स्थानीय ब्रिगेड कमांडर सशस्त्र बल न्यायाधीकरण में भेजे गए और बच गए। युवा अफसरों व सैनिकों की वीरता की खबरें देकर हमने ठीक ही किया, लेकिन राजनीतिक व सैन्य प्रतिष्ठानों को अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाही चाहे न भी कहें, बहुत बड़ी अक्षमता के साथ बच निकलने देकर ठीक नहीं किया। सैन्य कमांडरों की नाकामी से बढ़कर खतरनाक कोई नाकामी नहीं होती और यही वजह है कि परम्परागत सेना जवाबदेही पर इतना जोर देती है। इस बीच भारतीय मीडिया को ताकत बढ़ाने वाले तत्व (फोर्स मल्टीप्लायर) के रूप में सराहना मिल रही थी।

हम उस पल में डूब गए, लेकिन गलत छाप भी छोड़ गए : पत्रकार देश के युद्ध प्रयासों के आवश्यक अंग हैं, उसकी सेना की शक्ति बढ़ाने वाले कारक। वे दोनों हो सकते हैं, लेकिन सच खोजने की चाह दिखाकर, सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरलों पर चीखकर नहीं या चंदमामा शैली के सैंड मॉडल के साथ स्टूडियो को वॉर रूम में बदलकर नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहां सिरिल अलमिडा और आयशा सिद्दीका नहीं हैं, जो ‘शत्रु’ के प्रवक्ता घोषित होने का जोखिम मोल लेकर कड़वा सच बोलने को तैयार हों। भारतीय न्यूज टीवी सितारों (मोटतौर पर) का बड़ा हिस्सा स्वेच्छा से प्रोपेगैंडिस्ट बनकर रह गया है।

जब पत्रकार अपने लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की परिभाषा स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रश्नों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। बेशक उड़ी और बाद की घटनाएं इस लेख की वजह हैं। इसने मीडिया को दो ध्रुवों में बांट दिया है, एक तरफ अत्यंत प्रभावी पक्ष उनका है, जो न सिर्फ कोई प्रश्न नहीं पूछते बल्कि वे दावे करने में सरकार व सेना से भी आगे निकल जाते हैं। इन दावों को भरोसेमंद बनाने के लिए रात्रिकालीन कमांडो कवायद के ‘सांकेतिक’ फुटेज का इस्तेमाल किया जाता है। साफ कहें तो कोई भी विश्वनीयता के साथ यह बताने की स्थिति में नहीं है कि तीन हफ्ते पहले हुआ क्या था। या तो हमारी सरकार तथ्यों को गोपनीय बनाए रखने में माहिर हो गई है या हम पत्रकारों ने उन्हें खोजना बंद कर दिया है।

दूसरी तरफ बहुत ही छोटा और सिकुड़ता ध्रुव है, खुद को दूसरों से बेहतर समझने वाले संदेहवादियों का। वे सरकार के किसी दावे पर भरोसा नहीं करते, लेकिन कोई तथ्य नहीं रखते, खोजकर कोई बड़ा धमाका नहीं करते। वे बहुत ही मार्मिक ढंग से सरकार से अपने दावों की पुष्टि करने वाले सबूत देने को कहते हैं। पत्रकारिता महाविद्यालय में जाने वाले हर युवा को सिखाया जाता है कि सरकार छिपाती है और पत्रकार को खोजना होता है। यहां हमारे सामने संदेहवादी खेमे में सबसे उदार, श्रेष्ठतम शिक्षा पाए, प्रतिष्ठित, ख्यात सेलेब्रिटी पत्रकार हैं, वे धमाकेदार खबर खोजते नहीं, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की मांग करते हैं।

 वे खबर नहीं प्राप्त कर सकते, लेकिन वे मानक तय कर देते हैं, जिनका दूसरों को पालन करना ही चाहिए। एक समूह कहता है, आप मुझे जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा में भरोसा करता हूं, मुझे सबूत नहीं चाहिए। दूसरा कहता है, आप जो भी कह रहे हैं, उसमें किसी बात पर मुझे भरोसा नहीं है, इसलिए सैन्य अभियान को सार्वजिनक करें वरना मैं मान लूंगा कि आप झूठ बोल रहे हैं। अब यह न पूछें कि मैं क्यों कह रहा हूं कि भारतीय पत्रकारिता आत्म-विनाश के पथ पर है। जब यह नारा लगाने को कहें : ‘प्रेम से बोलो, जय भारत माता की’ तो कौन भारतीय इसमें दिल से शामिल नहीं होना चाहेगा, लेकिन यदि आप आपकी सरकार को मातृभूमि और राष्ट्र मान लें तो आप पत्रकार नहीं, भीड़ में शामिल एक और आवाज भर हैं।
(दैनिक भास्कर से साभार)

Oct 17, 2016

मुस्लिमों से ज्यादा है हिंदुओं में एक से अधिक पत्नी रखने का रिवाज

दिल्ली के मुखर्जी नगर में प्रमोद कुमार झा आईएएस की तैयारी करते हैं। हमारी उनसे मुलाकात दिल्ली के लक्ष्मीनगर में एक मित्र के यहां दावत पर हुई जिसमें कई लोग भागीदार थे। प्रमोद ने बताया कि वह दो बार प्री दे चुके हैं और अबकी उम्मीद है कि वह चुन लिए जाएंगें। चुने जाने को लेकर वह इसलिए भी आश्वस्त हैं कि उन्होंने परीक्षा और साक्षात्कार पास करने के सभी तरीकों को सीख लिया है और उनका सामान्य ज्ञान बहुत दुरुस्त है। वहां मौके पर मौजूद दूसरे मित्र भी बताने लगे कि प्रमोद का सामान्य ज्ञान वाकई कमाल का है।

हमने जानना चाहा कि अगर आप कल को देश के किसी महत्वपूर्ण पद पर काबिज हो जाएंगे तो पहला सुधार क्या करना चाहेंगे? प्रमोद ने तपाक से कहा, 'कल का पता नहीं पर अभी होता तो मुस्लिम धर्म में तीन तलाक का प्रावधान एक झटके में खत्म कर देता।' जब उनसे यह जानने की कोशिश की गयी, ऐसा क्यों, उनका जवाब था, 'ये तीन बार तलाक बोल के दूसरी औरत की जिंदगी बर्बाद करते हैं। एक से अधिक बीवियां ऐसे रखते हैं मानो औरत नहीं बकरी हों।'

बातचीत आगे बढ़ी तो हमने जानना चाहा कि आपके इस दावे का आधार? पहले तो हमारी बात को उन्होंने मजाक में लिया पर हमने आधार जानने पर जोर दिया तो वह कहने लगे कि इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं, आधार का क्या मतलब है? मेरे साथ गए सहयोगी मित्र ने कहा कि आपको समुद्र तल की उंचाई जानने के लिए तथ्य की जरूरत पड़ती है पर इतने बड़े सामाजिक दावे के लिए कहते हैं, तथ्य का क्या मतलब है? कहीं तो कोई स्रोत होगा आपकी जानकारी का, कहीं आपने पढ़ा होगा, कहीं लिखा होगा।

वह और उनकी तरफदारी कर रहे मित्र सकते में आ गए। उनके सामान्य ज्ञान का आधार नहीं मिल रहा था। जो जानकारी इस देश के करोड़ों के लिए आम है, उसके पक्ष में वह सबूत नहीं दे पा रहे थे। जिरह होने लगी तो बात निकली कि यह आंकड़ा तो सेंसेक्स से पता चलेगा। फिर वह और उनके मित्र गूगल पर जुट गए। बड़ी देर तक जुटे रहने के बाद उन्होंने जो पाया, वह उनके सामान्य ज्ञान को बदल गया।

आप भी पढ़िए और देश को तथ्यों के साथ खड़ा कीजिए, पूर्वग्रहों के साथ नहीं।

हमारा पूर्वाग्रह इतना तगड़ा है कि हम लोग अपने ही सरकार के आंकड़े को एक बार झांक कर नहीं देखते कि एक से अधिक पत्नी रखने के मामले में मुस्लिम मर्द पांचवे नंबर पर आते हैं। पहले पर आदिवासी, दूसरे पर जैन, तीसरे पायदान पर बौद्ध, चौथे पर हिंदू हैं।

धर्म और समुदाय आधारित शादियों को लेकर भारत सरकार द्वारा आखिरी सर्वे 1961 में हुआ था। उसके बाद कोई सर्वे सरकार कराने का साहस नहीं करा सकी, क्योंकि इन आंकड़ों के परिणाम बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने वाले थे। इसके अलावा कोई सर्वे कभी हुआ ही नहीं, इसलिए बहुपत्नी प्रथा को समझने का सबसे आधिकारिक तरीका यही हो सकता है।

आबादी के हिसाब से एक करोड़ हिंदुओं ने एक से अधिक पत्नी रखी तो मुस्लिमों में 12 लाख मर्दों ने। हिंदूवादी आदिवासियों को भी अपना ही मानते हैं। अगर उनको भी साथ ले ​लिया जाए फिर यह अनुपात दुगुना हो जाएगा।

बहुपत्नी प्रथा का चलन जातियों और समुदायों के हिसाब से
आदिवासी - 15.25 प्रतिशत
बौद्ध - 7.9 प्रतिशत
जैन - 6.7 प्रतिशत
हिंदू - 5.8 प्रतिशत
मुस्लिम - 5.7 प्रतिशत 

स्रोत - सेंसस 1961

Oct 15, 2016

हत्या के 4 दिन बाद भी नहीं गया कोई सवर्ण झांकने

गांव में पहले भी हो चुकी एक दलित की हत्या 

नरेंद्र देव सिंह की रिपोर्ट

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के करडिय़ा गांव में एक दलित को सवर्ण जाति के एक व्यक्ति ने चक्की छू लेने की सजा उसकी गर्दन काट के दी। मामला सुर्खियों में आ गया। राष्टï्रीय मीडिया ने भी इसे जोर शोर से प्रसारित किया लेकिन अभी भी इस गांव के असली सच सामने नहीं आये हैं।

सोहन राम की पत्नी से बात करते बामसेफ के सदस्य

असल में हुआ क्या था
सोहन राम 5 अक्टूबर को कुंदन सिंह भंडारी की चक्की में गेहूं पिसाने गया था। एक स्कूल टीचर ललित कर्नाटक ने सोहन राम द्वारा चक्की छू लिये जाने पर उसे अपवित्र करने की बात कह कर उस पर जातिसूचक गालियों के साथ चिल्लाने लगा। ललित ने कहा, 'तूने नवरात्र में चक्की को अपवित्र कर दिया।' और इसी बात पर तैश में आकर ललित ने सोहन की दराती से गर्दन काट कर हत्या कर दी।

केस वापस लेने का दबाव
करड़िया का दौरा कर लौटे बामसेफ से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार आर्या ने बताया कि पीडि़त परिवार ही नहीं बल्कि यहां रहने वाले अन्य दलित परिवार भी भय में ही जी रहे हैं। कई बार पीडि़त परिवार को केस वापस लेने की धमकी दी गयी है। सबसे अमानवीय पहलू यह सामने आया कि सोहन की हत्या के बाद से चार दिन तक उस परिवार में कोई भी सामान्य जाति का व्यक्ति संवेदना व्यक्त करने के नाम पर झांकने तक नहीं आया।

मनोज आर्या के मुताबिक, 'जब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा इस घर में पहुंचे तब उस गांव के प्रधान ने पहली बार ​दलित परिवार के घर में कदम रखने की जहमत उठायी।'

मृतक सोहन की गर्भवती पत्नी बीना देवी कहती हैं, 'पति की हत्या के बाद परिवार को केस वापस करने की धमकी दी गयी।' बीना रोते हुए कहती हैं, 'सोहन के मरने पर मेरे घर वाले आए थे और कह रहे थे कि इस गांव के दलितों में जितना खौफ है वो कहीं और नहीं देखा।' आरोपी ललित अपनी भाभी की हत्या के मामले में भी अभियुक्त रह चुका है।

हत्या का एफआईआर 15 साल बाद भी नहीं
मृतक सोहन के परिवार के एक रिश्तेदार की भी हत्या हो चुकी है। ग्रामीणों ने बताया कि ​सोहन के रिश्तेदार इसी गांव में रहते थे और उसकी भी हत्या पन्द्रह साल पहले सवर्ण जाति के लोगों ने कर दी थी। इस मामले की आज तक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुयी है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि जातिवाद की ये नृशंस घटना इस गांव में हाल फिलहाल की घटना है। यह यहां का चलन है और ये हत्या उसकी पराकाष्ठा।

पंद्रह परिवार के पास दो नाली जमीन
यहां शादी ब्याहों के निमंत्रण में सवर्णों और दलितों में दूरी रहती है। अंर्तजातिय विवाह तो सोचना भी पाप है। यहां दलितों के पन्द्रह परिवार के पास केवल दो नाली (लगभग आधा बीघा) जमीन है। ये लोग सवर्णों की जमीन पर ही मजदूरी करते हैं। यहां रहने वाले दलितों का साफ कहना है कि उन्हें दिन भर मजदूरी के बाद भी कभी पचास तो कभी सौ रूपये ही थमा दिये जाते हैं। जहां तक पुलिस व्यवस्था की बात है तो वो कितनी लचर या कहें सवर्णों की गोद में बैठी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि इस परिवार को सुरक्षा दिये जाने का दावे पुलिस महकमा कर रहा है लेकिन पुलिस तभी आती है जब कोई नेता उस घर तक जाता है। इस गांव में लगभग जितने परिवार सवर्णों के हैं उतने ही परिवार दलितों के भी हैं। मतलब संख्याबल में दलित कम नहीं हैं लेकिन सदियों से किये जा रहे जाति प्रथा के जुल्मों ने इन्हें इतना खोखला कर दिया है कि लोग सही से मुंह तक नहीं खोल पा रहे हैं।

सीएम की मदद की हकीकत
सीएम हरीश रावत ने यहां आकर पीडि़त परिवार को 12 लाख 62 हजार रूपये की मदद देने की घोषणा की। लेकिन इसमें से 5 लाख 62 हजार रूपये समाज कल्याण विभाग इस तरह के मामले में ही पहले से ही देता है। सरकार ने इस रकम को भी सीएम की मदद में जोड़ लिया।

Oct 14, 2016

आपको याद है वह 13 वर्ष की लड़की

हिंदी में पहली बार आया जैन धर्म के पाखंड सिलसिलेवार सच
                                एक भुक्तभोगी ने लिखी है जैन धर्म के पाखंड की असल कथा
                               जानिए कैसे हुई आराधना समदरिया की मौत, कैसे है यह हत्या
श्रेणिक मुथा

अक्सर ऐसा होता है कि हमारे आस-पास हुई कोई विचलित कर देने वाली घटना हमें उससे जुड़े अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों की याद दिला देती है। आराधना समदरियाकी मौत ने मेरे लिए ऐसा ही किया। मैं अपनी कहानी को इस तरह बयाँ नहीं करना चाहता कि ये सारी बात मेरे ही इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाए लेकिन मुझे लगता है कि इस घटना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए ये शायद ज़रूरी होगा कि मैं ये बताऊँ कि जो कुछ भी हुआ उसे मैं किस तरीक़े से देखता हूँ और उस पर मेरी प्रतिक्रिया क्या है।

मेरे बड़े होने के दौरान मेरे साथ वो सब कुछ हुआ जो किसी भी धार्मिक जैन परिवार में होता है, ना सिर्फ़ आस्था के स्तर पर बल्कि धर्म की पालना के तौर पर भी। धर्म की इस दुनिया में मेरा प्रादुर्भाव किस तरह हुआ इसकी पड़ताल कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि उस वक़्त की कोई यादें मेरे पास बची नहीं है। लेकिन जो कुछ यादें बाक़ी हैंमैं उन्हीं में से कुछ को फिर से टटोलना चाहता हूँ।

जिस बिल्डिंग में मेरा बचपन बीता वहाँ सिर्फ़ मारवाड़ी जैन परिवार ही रहा करते थे। उनमें से सिर्फ़ एक मराठा था; जो कि उस बिल्डिंग का मालिक भी था। मैं जिस घर में रहताथा वो किराए पर लिया गया था और वो भी 1960 से। जब मैं अपनी यादों को टटोलने की कोशिश करता हूँ या उन बातों को याद करता हूँ जोकि अक्सर घर पर की जाती थीं तो  सा कोई भी लम्हा याद नहीं आता जिसमें कहीं भी ‘धोंडी बा’ का कभी कोई ज़िक्र हुआ हो। हमारे घर के मालिक होने के बावजूद एक अलग धर्म और जाति का होने की वजहसे हमारे घर की बात-चीतों में कहीं भी उनके लिए कोई जगह नहीं थी। हम सिर्फ़ उन्हीं लोगों के बारे में बात करते थे, उन्हें अपने घर बुलाते थे और उनके यहाँ जाना हमें पसंद थाजो हमारे ही धर्म और जाति के थे।और आज भी मेरे परिवार या समुदाय के लिए ये सब बदला नहीं है।

घर की चारदीवारी से बाहर, धर्म के साथ मेरे पहले जुड़ाव की याद तब की है जब मुझे ‘पूजा’ करने के लिए एक मंदिर ले जाया गया। जैन धर्म किसी भगवान/भगवानों में विश्वासनहीं करता, ये मुझे बहुत बाद में पता चला। लेकिन फिर भी इस धर्म में भी इसके अपने ‘भगवान’ हैं जिनकी पूजा की जाती है। मुझे नहलाया गया और नए कपड़े पहनाए गएजोकि सिर्फ़ इसी मौक़े के लिए अलग से रखे गए थे (उस दिन भी और उसके बाद हर दिन)। 

मैं ना तो इन कपड़ों को पहनकर खा सकता था और ना पेशाबघर जा सकता था क्यूँकि ऐसा करने पर ये कपड़े प्रदूषित हो जाते और मेरे बाक़ी कपड़ों की ही तरह हो जाते। ये कहना तो ज़रूरी ना होगा कि इस मंदिर में सिर्फ़ वही लोग आते और पूजा करते थेजो हमारे ही सम्प्रदाय के थे।

जब मैं कोई सात-आठ बरस का हुआ तो पर्यूशन (आठ दिन का एक उत्सव जो महावीर जयंती के दिन ख़त्म होता है) पर्व मेरे लिए पूजा करने और धर्म को समझने और अपनेअनुभव

पर्यूशन ‘चातुर्मास’ की शुरुआत के लगभग दो महीनों बाद आता है। चातुर्मास मानसून के चार महीनों के साथ पड़ता है। जैन धर्म की प्रथाएँ कोई मैकडॉनल्ड के मेन्यू से कमनहीं! एक व्यक्ति इनमें से किसी भी ‘कॉम्बो’ को चुन सकता है चातुर्मास के पालन के लिए-

दुविहार - दिन के समय जितना चाहे खा सकते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद 10 बजे तक सिर्फ़ दवाई और उबला हुआ पानी ही ले सकते हैं। (कुछ जैन मुनियों के अनुसार 12 बजेतक पानी पिया जा सकता है।)

तिविहार - दिन के समय जितना चाहे खा सकते हैं लेकिन सूर्यास्त के बाद 10बजे तक सिर्फ़ उबला हुआ पानी ही पी सकते हैं।

चौविहार - दिन के समय भोजन खा सकते हैं लेकिन सूर्यास्त के बाद ना तो पानी पी सकते हैं और ना खाना खा सकते हैं।

ब्यासना - दिन में सिर्फ़ दो बार भोजन करना, सिर्फ़ उबले हुए पानी के साथ और वो भी सिर्फ़ सूर्यास्त से पहले।

एकाशना - दिन में सिर्फ़ एक बार भोजन करना, उबले हुए पानी के साथ, सूर्यास्त से पहले।

उपवास - बिलकुल भी खाना ना खाना, सिर्फ़ उबला हुआ पानी पीना वो भी सूर्यास्त से पहले तक।

चौविहार उपवास - पानी या खाने का बिलकुल भी सेवन ना करना।

अट्ठम - तीन दिन तक उपवास करना।

अट्ठाई - आठ दिनों तक उपवास करना।

15 दिनों तक उपवास करना।

मासखमन - 30 दिनों तक उपवास करना यानि कि भोजन का बिलकुल भी सेवन ना करना।

अपने परिवार के बड़ों को पूरे समर्पण से उपवास करते देख मुझे भी प्रेरणा मिली। पहले तो मैंने छोटे उपवास रखे। ज़्यादा से ज़्यादा एक ‘एकाशना’।

मुझे याद है जब मैंने पहली बार उपवास रखा तो मैं 8वीं कक्षा में था। मेरी माँ और चाची ने ‘अट्ठाई’ रखा था यानि कि आठ दिनों का उपवास। मैं ये कह सकता हूँ कि मेरा पहलाउपवास मैंने अपनी ‘मर्ज़ी’ से रखा था। ये कोई ज़्यादा मुश्किल नहीं था, बेशक रात में मुझे कई सपने आए जिनमें मिनट मेड के पल्पी ओरेंज जूस की बोतल भी शामिल थी!अगले साल मैंने आठ दिनों का उपवास रखा।

इस सब में सिर्फ़ ये समझना काफ़ी नहीं कि व्रत-उपवास रखना क्या होता है बल्कि ये भी समझना ज़रूरी है कि ये सब कैसे होता है (आख़िर क्या है जो बच्चों को ऐसे उपवासरखने को प्रेरित करता है)। यह तब मेरे ज़हन में साफ़ हो जाता है जब मैं विचार करता हूँ कि चौथी कक्षा से आठवीं कक्षा में आने के बीच मेरे साथ क्या-क्या हुआ। हमें (यानि हमारे समुदाय के बच्चों को) ‘पाठशाला’ में भेजा जाता था, हालाँकि ‘पाठशाला’ शब्द का मतलब तो विद्यालय भी होता है लेकिन यहाँ यह पाठशाला एक धार्मिक पाठशाला थी जैसे कि इस्लाम में मदरसा होता है।

मुझे (और मेरे चचेरे भाई-बहनों को) वहाँ मेरी माँ और चाची द्वारा ले जाया जाता था।पाठशाला में हमें धर्म के उपदेश दिए जाते थे। एकअच्छा जीवन जीने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह बताया जाता था। 40-50 साल की एक बुज़ुर्ग महिला हमें पढ़ाती थी। मुझे वो वाक़या याद है जब हमें एक किताबसे कुछ चित्र दिखाए गए थे जिनमें इंसानों के टुकड़े करने और उन्हें तेल में सेंकने जैसी तस्वीरें थीं जोकि मूलतः ‘नरक’ का चित्रण था। 

चातुर्मास के उत्सव में एक ख़ास तरीक़े की प्रतियोगिता होती थी। । हमें एक कार्ड दिया जाता था जिस पर कई खाने बने होते थे। पहले कॉलम में कई चीज़ें लिखी होती थीं, जैसे ‘पूजा की’, ‘मंदिर गया/गयी’, ‘रात को खाना नहीं खाया’, ‘कुछ दान किया’, आदि। हममें से हर एक को उन खानों को टिक करना होता था जो काम हमने उस दिन किए। इस हर एक काम के लिए हमें ‘पोईंट’ मिलते थे और इन सबका योग करने के बाद जोफ़ाइनल स्कोर होता था उसके आधार पर हमें गिफ़्ट मिला करते थे। यह परम्परा बिना शर्म के आज भी बदस्तूर जारी है।

मैं यहाँ इतनी छोटी-छोटी बातें भी इसलिए बयान कर रहा हूँ क्यूँकि उन लोगों की बातों को झुठलाने का यही एक तरीक़ा है जो कह रहे हैं कि आराधना समदरिया की मौत एक हादसा था और उसने उपवास अपनी ‘मर्ज़ी’ से रखा था।

नहीं, ऐसा क़तई नहीं है। उसी तरह जैसे मैं और मेरे इर्द-गिर्द के हर बच्चे ने अपनी ‘मर्ज़ी’ से ऐसा नहीं किया। यह उपवास तो हमारी धर्मिकता के आधार पर मिलने वाले इनामों और उस भय का परिणाम था जो धीरे-धीरे हमारे अंदर बैठाया गया था कि अगले जन्म में हमारा क्या हश्रहोगा। मुझे हमेशा ये बताया गया कि मैंने पिछले जन्मों में कुछ पुण्य किए थे जिनकी वजह से मेरा जन्म इस बार ‘दुनिया के सबसे बेहतरीन धर्म’ में हुआ है।

संस्कृति और संस्कार के नाम पर हमारा इंडॉक्ट्रिनेशन बहुत जल्दी ही शुरू हो जाता है और वो भी ऐसे तरीक़ों से जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में किए जाने वाले कामों के आधार पर कच्ची उम्र में ही हमारे अंदर आस्था के बीज बोती है।

बिना ज़्यादा तफ़सीलों में जाए मैं एक अन्य विवादास्पद लेकिन इससे जुड़े हुए मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ और वो है ‘सनथारा’ यानि कि धार्मिक वजहों से आमरण उपवास करना। मैं यहाँ हाल ही निखिल सोनी बनाम भारतीय संघ के मुक़दमे में राजस्थान राज्य द्वारा पेश की गयी दलीलकी तरफ़ आपका ध्यान लाना चाहूँगा। राजस्थान राज्य ने अपनी दलीलों में ‘दबाव के तहत किए गए धार्मिक कृत्य’ और ‘धार्मिक परम्परा या रिवाजों’ के बीच फ़र्क़ किया है। जो लोग जैन धर्म को समझने के बाद इसे ग्रहण करते हैं उन्हें छोड़ दिया जाए तो हर जैन परिवार के बच्चों परधार्मिक प्रथाओं का थोपा जाना ‘दबाव’ नहीं तो और क्या है!

आराधना समदरिया का 68 दिनों का उपवास शायद उसके माता-पिता की नज़रों में किसी दबाव का परिणाम नहीं था। लेकिन एक समुदाय द्वारा ऐसी प्रथा का पालन करना उस 13 साल की बच्ची को 68दिनों तक उपवास करने के लिए दबाव का परिणाम नहीं तो और क्या है।अंतर्जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह जैसी प्रवृत्तियाँ जैन समुदाय में बहुत कम ही देखने को मिलती हैं क्यूँकि एक आम जैन व्यक्ति को ‘बाज़ार’ के अलावा और किसी संस्कृति से रूबरू होने का कोई मौक़ा ही नहीं मिलता।

ऐसे वाक़ये आए दिन होते रहते हैं लेकिन इन्हें चुनौती देने वालाकोई नहीं होता। एक लड़की को ‘माहवारी हिंसा’ के ख़िलाफ़ बोलने नहीं दिया जाएगा, अगर उसकी मर्ज़ी ना हो तो भी उसे मंदिर जाने से मना करने की इजाज़त नहीं होगी, किसी लड़के को कोई माँस खाने वाला दोस्त रखने की कोई इजाज़त नहीं होगी (अपनी मर्ज़ी से माँस खाने काफ़ैसला करना तो ईश-निंदा करने के बराबर होगा), लेकिन एक 13 साल की बच्ची को 68 दिन का उपवास रखने दिया जाएगा इसलिए क्यूँकि किसी भिक्षु ने उस लड़की के पिता से कहा होगा कि बच्ची के उपवास रखने से उनका कारोबार फलेगा-फूलेगा।

आराधना की मौत जैन समुदाय को लेकर ‘पंथ-निरपेक्षता’ के सवालों पर पुनः सोचने पर मजबूर करती है। जैन धर्म में महिला-पुरुष एवं लड़के-लड़कियों के ‘दीक्षा’ लेकर (लगभग ‘सन्यास’ की तरह) भौतिक संसार की सभी ज़रूरतों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को छोड़ देने की प्रथा रही है। कई बार ऐसा भी होता है कि 15साल से भी छोटे लड़के-लड़कियों को ऐसे पथ पर स्वीकार कर लिया जाता है। 

आख़िर उनका ये क़दम कितना ‘स्वैच्छिक’ है? यह वाक़या राज्य-सत्ता और धर्म के बीच सम्बन्धों को लेकर भी पुनर्विचार करने पर मजबूर करता है। ख़ासकर जैन धर्म जैसे धर्म के बारे में जो ‘अल्पसंख्यक’ होने का फ़ायदा उठाते हुए अपनी परम्पराओं को बचाने और संरक्षित करने का काम कर रहा है। ये तो क़तई ऐसी परम्परा नहीं है जिसे हमें बचाना चाहिए। 

श्रेणिक मुथा ILS Law College, पुणे के छात्र हैं| उनसे shrenik.mutha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता हैं|  अनुवाद: अमित शर्मा