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Oct 21, 2016

जो अपनी महिलाओं के नहीं हो सके, उनका देश क्या खाक होगा

यह और कुछ नहीं, गुंडई है। खुलेआम गुंडई! पहले आप घर में करते थे, अब चौराहों पर चौड़े होकर कर रहे हैं। धर्म, परिवार, समाज और सियासत का वास्ता देकर अपनी औरतों को आपने सदियों तक चुप कराया । पर वो चुप नहीं हुईं ? वह खड़ा होने का साहस कर गयीं। तो अब आप सड़क और सरकार के सामने सरेआम नंगा हो उतर आए हैं।

आप किसी के अधिकार को खत्म करने को लेकर धरना—प्रदर्शन कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों को मजबूर कर रहे हैं कि लोकतंत्र में आपकी औरतों की अधिकार बहाली की वे मुखालफत करें। आप कौम के नौजवानों तक को मुर्ख बना रहे हैं कि यह धर्म पर हमला है, औरत को अधिकार देने की पहल नहीं। 

हद तो यह कि इन मूर्खताओं के बावजूद आप धर्मं और खुद को प्रगतिशील कहते हैं? महान ईस्लाम और मुसल्लम ईमान वाले मुसलमान होने की बात कहते हैं? हद तो यह है कि जब आपके धर्म में औरतों की हालत पर बहस हो रही है तो आप कभी कूद कर हिन्दू धर्म की तो कभी किसी और धर्म की गंदगी उभार कर अपनी गलाजत को सही ठहराने की तरकीब तलाशते हैं. आपकी चिंता यह नहीं होती कि अपनी गन्दगी दूर कर दूसरे की मोरियों को उभार कर पूरे समाज से औरतों के दोयम स्थिति को ठीक  किया जाये बल्कि आप अपनी टट्टी ढंकने के लिए दूसरे की टट्टी उभार देते हैं और सोचते हैं बच गया धर्म,  हो गए हम मुसलमान। 

आखिर आप भारत को कैसा लोकतंत्र बनाना चाहते हैं जो औरतों के जुल्म को धर्म के चिलमन में जायज ठहरा दे।

पर दिक्कत क्या है कि ऐसा सिर्फ आप औरतों के लिए चाहते हैं। अपने लिए पैमाना आपका बिल्कुल अलग है। क्या यह ठीक वैसी ही गुंडई है नहीं है जैसी आपके साथ हिंदूवादी और सरकार करती है। तब तो आप चाहते हैं कि मुल्क आपके साथ खड़ा हो जाए, तब आपको मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और बराबरी के सवाल चतुर्दिक नजर आते हैं। तब आपको लगता है देश में संविधान की सरकार नहीं चल रही, संघियों की शाखा जारी है।

मगर आप अपनी महिलाओं के मामले में सरे राह डंडा लिए खड़े हैं और आधुनिक होते समय में आप दम ठोंककर कहते हैं — वह हमारी औरते हैं, उनका फैसला हम करेंगे...लोकतंत्र नहीं, सरकार नहीं। फिर यही भाषा आपके लिए हिंदू धार्मिक कट्टरपंथी, उन्मादी और दंगाई बोलें तो देश क्यों बोले? क्यों आपके साथ धर्मनिरपेक्षता का ढोल बजे और क्यों कोई कहे कि देश सबका है, क्यों न कहे कि यह देश हिंदुओं का है।

ऐसे में यह याद रखिए कि जो कौम और जिनके नुमाईंदे अपनी महिलाओं के साथ नहीं खड़े हो सकते, जो अपनी आधी आबादी के हक में नहीं हो सकते, उन्हें यह सोचने और चाहने का कोई हक नहीं कि पूरा देश उनके हक—हकूक के साथ खड़ा हो जाए, धार्मिक उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करे। 
अगर यह देश और इसका लोकतंत्र मुसलमान मर्दों के दबाव में झुक जाता है और तीन तलाक जैसे अमानवीय धार्मिक प्रथा को बरकरार रखने के लिए मजबूर होता है तो यह सिर्फ मुस्लिम औरतों की हार नहीं होगी। यह हार आप मर्दों की बड़ी होगी क्योंकि इससे आप हिंदूवादियों को वह लॉजिक देंगे जिससे वह सांस्थानिक स्तर पर  दशकों तक साबित करते रहेंगे कि आप कितने लोकतंत्र विरोधी, धार्मिक दकियानूस और स्त्री विरोधी हैं।

Oct 20, 2016

भाजपा आपको भटका रही है और आप भटकने के एक्सपर्ट बनते जा रहे हैं

पिछले दो दशकों से जनसंघर्षों की अगुवाई कर रहे हिमांशु कमार का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए...

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत सरकार ने गरीबों को राशन मिलने के तरीके में कुछ बदलाव किये हैं। अब गरीबों के लिए दो नए नियम बनाये गए हैं।

पहला तो यह की राशन उसी को मिलेगा जिसके पास आधार कार्ड होगा। अब आधार कार्ड तो उसी का बन सकता है जिसके पास पहले से कोई पहचान पत्र हो। लेकिन जो लोग फुटपाथ पर रहते हैं, ट्रांसजेंडर, बेघर और प्रवासी मजदूर हैं इनके पास कोई पहचान पत्र नहीं हैं, इसलिए इनका आधार भी नहीं बनेगा .

और इनका आधारकार्ड नहीं बनेगा तो इन्हें राशन भी नहीं मिलेगा, जबकि सस्ते राशन की ज़रूरत तो सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को है। यानि जिन लोगों को राशन की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उन्हें ही सरकार नें धक्के मार कर बाहर खदेड़ दिया है। इसके अलावा सरकार नें राशन दुकानों में अंगूठे और उँगलियों के निशान के मार्फत ही राशन देने का नियम बना दिया है।

अब जो मजदूर पत्थर ढोने का काम करते हैं या अमीरों के घरों में बर्तन साफ़ करने वाली महिलायें हैं, उनकी उँगलियों के निशान घिस जाते हैं या सर्दियों में उंगलियों की खाल फट जाती हैं। इन हालातों में दूकान पर दी गयी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती, बुढापे में झुर्रियां पड़ने से भी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती।

इसकी वजह से मजदूर, महिलायें और बुजुर्ग लोग कई किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं और मशीन के द्वारा उँगलियों के निशान ना पहचाने जाने पर खाली हाथ वापिस चले जाना पड़ता है। कई महीनों तक राशन ना देने के बाद दुकानदार लिख देता है की यह व्यक्ति राशन लेने नहीं आता है। क्योंकि सरकार द्वारा दूकान वालों को यही आदेश दिया गया है, इसके बाद ऐसे लोगों के राशन कार्ड रद्द कर दिए जाते हैं।

जाहिर है लाखों गरीबों का राशन लेने का हक सरकार साजिश करके मार रही है। एक तरफ अंबानी जैसे धनिकों को पैसे के बल पर सारे देश की आबादी की दाल से मुनाफा कमाने और तीन गुना कीमत कर देने की सहूलियत दी जा रही है। वहीं जान—बूझ कर गरीब को राशन की दूकान से भगा कर बाज़ार से सामान खरीदने की साजिश पर काम चालू है ताकि गरीब मजदूर की जेब से भी मुनाफ़ा निकाल कर तिजोरी में डाला जा सके।

हम सरकार को चुनौती देते हैं कि सरकार में दम है तो गरीब जनता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति कर के दिखाए। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे काल्पनिक मुद्दों पर सारे देश का ध्यान भटकाने की साजिश बंद करी जाय। चुनाव भी देश की गरीब जनता के मुद्दे पर लड़ कर दिखाइये।

देश की गरीब जनता की बात कोई नहीं सुन रहा है। भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए, अगर आप भाजपा के मुद्दों पर बहस में फंसेंगे तो वो आपको अपने मैदान में पीट कर भगा देंगे। इन संघियों को अपने मैदान में घसीट कर लाइए,
ये यहाँ मार खायेंगे कि ये हिन्दुओं की नहीं अमीरों के गुलामों की सरकार है।