Aug 1, 2011

पंजाब में किसानों का भयंकर दमन

पुलिस ने महिला कार्यकर्ताओं से कहा है की वे स्वयं आज शाम तक खुद थाने में आकर अपनी गिरफ्तारी दे दे वरना कल सुबह उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जायेगा...

हिमांशु कुमार


पंजाब से  लोक मोर्चा महासचिव श्री अमोलक सिंह जी ने जानकारी दी है कि पंजाब के गोविन्दपुरा गाँव में थर्मल पावर प्लांट लगाने के नाम पर किसानो की 880  एकड़   सिंचित भूमि को पंजाब सरकार अवैध तरीकों से बलपूर्वक लेने की कोशिश कर रही है !

पोना नामक कंपनी के लिए किसानो की इन ज़मीनों को लेने से पहले प्रशासन ने किसानो को कोई नोटिस नहीं दिया ! किसानो का आरोप है कि सत्ता दल के  नेताओं ने  पेओना नामक कंपनी के साथ  मिलीभगत कर के उनकी ज़मीन को कंपनी के नाम कर दिया है !

 इस वर्ष की 21 जून को कंपनी के लोग पंजाब के 6  जिलों से जमा किये गए बड़े पुलिस बल के साथ जब इस ज़मीन पर कांटेदार तार लगाने पहुंचे तो  उन्हें महिलाओं और किसानो के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा ! 24  जुलाई को पुलिस ने इस गाँव पर हमला किया और घरों में सोये हुए 450  किसानो को ले जाकर  जेल में डाल दिया ! ये किसान आज भी जेल में ही बन्द हैं !

 पंजाब के 17  मजदूर किसान संगठनो ने इस अवैध भूमि अधिग्रहण और सरकारी दमन के विरोध में 2  अगस्त अर्थात कल ' गोविन्दपुरा चलो ' रैली की घोषणा की है परन्तु आज सुबह 4  बजे से ही पुलिस ने छापेमारी कर के इस आन्दोलनपंजाब में आज अपने घरों में सोये हुए १०० से ज्यादा किसानो को पुलिस ने  गिरफ्तार कर लिया है !

अवैध तरीके से किसानो की ज़मीनों को बड़े पैसे वालों को देने के खिलाफपंजाब के किसान कल पंजाब के मानसा जिले में गोविंदपुर में रैली करने वाले हैं ! किसानो की इस शांतीपूर्ण रैली को रोकने के लिए पंजाब सरकार ने आज सुबह किसान नेताओं को सुबह ४ बजे घरों में सोते समय ही पकड़ लिया है !

साथ ही पुलिस ने महिला कार्यकर्ताओं से कहा है की वे स्वयं आज शाम तक खुद थाने में आकर अपनी गिरफ्तारी दे दे वरना कल सुबह उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जायेगा ! पंजाब के किसान नेताओं ने आज बातचीत के दौरान बताया कि पंजाब में ऐसा दमन १९३१ के बाद अब हो रहा है ! उस समय भगत सिंह  द्वारा स्थापित कीर्ति पार्टी के जलसों से पहले भी कार्यकर्ताओं की इसी प्रकार अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तारी की जाती थी और महिलाओं को खुद थाने आ जाने के लिए कह दिया जाता था !

आज दिन भर पुलिस ने मानसा, भटिंडा, बरनाला , मोगा , मुक्तसर , अमृतसर, और गुरदासपुर जिलों में छापेमारी की और भारतीय किसान यूनियन और अन्य सहयोगी संगठनो  के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की है  !


दारुल उलूम की विरासत और वस्तानवी

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था...

तनवीर जाफरी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद कस्बे में स्थित दारुल-उलूम देवबंद पूरी दुनिया में इस्लामी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। दारुल-उलूम देवबंद में केवल भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों के मुसलमानों के वे बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं जिन्हें उच्चस्तरीय एवं गहन इस्लामी शिक्षा प्राप्त करने की ज़रूरत महसूस होती है।

 यहां एक बात पुन:स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हालांकि देवबंद एक कस्बे का नाम ज़रूर है। परंतु दारुल उलूम के देवबंद में स्थित होने की वजह से इस मदरसे से शिक्षा प्राप्त कर चुके इस्लामी स्कॉलर्स अथवा इनकी विचारधारा से जुड़े लोगों को भी देवबंदी कहकर संबोधित किया जाने लगा है। अर्थात इस्लाम तथा मुसलमानों के बताए गए कुल 73 फिरक़ों में देवबंदी मुसलमान भी एक वर्ग विशेष से संबंध रखने वाले मुसलमान कहे जाते हैं।

 इसमें कोई शक नहीं कि दारुल-उलूम देवबंद ने भारत सहित पूरी दुनिया के लाखों मुसलमानों को धार्मिक शिक्षा से नवाज़ा है। पूरे विश्व में लाखों इमाम,  पेश इमाम, क़ारी, हाफिज़, धर्मगुरु, धर्म प्रचारक तथा इस्लामी शिक्षक,दारुल-उलूम से शिक्षा पाकर अन्यत्र धार्मिक सेवाएं करते तथा अपने व अपने परिवार का पालन-पोषण करते देखे जा सकते हैं।

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था।वहीं दूसरी ओर इसी दारूल-उलूम पर कट्टरपंथी व रूढ़ीवादी इस्लामी शिक्षा देने तथा कट्टर इस्लामी स्कॉलर तैयार करने का भी इल्ज़ाम है। कहा तो यहां तक जाता है कि दुनिया में इस्लाम तथा जेहाद के नाम पर फैला आतंकवाद तथा इसमें शामिल गुमराह मुस्लिम युवक भी देवबंदी विचारधारा की धार्मिक शिक्षा से ही प्रभावित हैं।

दारूल-उलूम ने धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ तमाम ऐसे स्कॉलर भी तैयार किए जो देश की प्रशासनिक सेवाओं से लेकर अन्य उच्चस्तरीय सरकारी व गैर सरकारी सेवाओं में अपना योगदान देकर देश की सेवा में भी अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं।

कभी-कभी अपने कई विवादित फतवों को लेकर भी दारुल-उलूम सुर्ख़ियों  में छाया रहता है। साथ ही साथ इसी दारुल-उलूम से इस्लाम के नाम पर फैले आतंकवाद के विरुद्ध भी विस्तृत फतवा जारी किया जा चुका है। भले ही पूरे देश व दुनिया के सभी मुसलमान अथवा सभी फिरकों के मुसलमान दारुल-उलूम की विचारधारा तथा उनके द्वारा दी जाने वाली इस्लामी शिक्षा से सहमति न रखते हों।

परंतु दुनिया के विशेषकर भारत के देवबंदी विचारधारा के मुसलमानों की बड़ी संख्या दारूल-उलूम के फतवों, दिशा निर्देशों तथा वहां चलने वाली धर्म संबंधी गतिविधियों से प्रभावित होती है। पिछले दिनों दारुल-उलूम देवबंद एक बार फिर उस समय पूरे देश के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहा जबकि इस विश्वविद्यालय की संचालन समिति जिसे शूरा के नाम से जाना जाता है,ने अपने ही वाईस चांसलर मौलाना गुलाम वस्तानवी को उनके पद से हटा दिया।शूरा के कुल 14 सदस्यों में से 9 सदस्यों ने वस्तानवी को हटाए जाने के पक्ष में अपना मत दिया। जबकि 5 सदस्य ऐसे भी थे जिन्होंने गुलाम वस्तानवी को कुलपति के पद पर बने रहने के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया।

 गुजरात मूल के मौलाना गुलाम वस्तानवी को अभी कुछ ही माह पूर्व दारूल-उलूम देवबंद का वाईस चांसलर नियुक्त किया गया था। अपनी नियुक्ति के फौरन बाद ही मौलाना वस्तानवी ने गुजरात के अति विवादित मुख्यमंत्री तथा गुजरात दंगों में हुए भीषण नरसंहार के लिए जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी की तारीफ में क़सीदे पढऩे शुरु कर दिए। इतना ही नहीं बल्कि वस्तानवी ने कुछ इस प्रकार का इज़हार-ए-ख्याल भी किया कि मुसलमानों को अब गुजरात दंगों से आगे भी देखना चाहिए।

उनकी बातों से ऐसा अंदाज़ा लगाया जाने लगा था कि मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी को वे क्लीन चिट देना चाह रहे हैं तथा मुसलमानों से भी यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे भी गुजरात दंगों को भूलकर गुजरात,देश तथा अपने समुदाय के विकास में शरीक हों। वस्तानवी के इस प्रकार के विवादित वक्तव्य के बाद दारूल-उलूम की मजलिस-ए-शूरा में,देवबंद से जुड़े लोगों में तथा विशेषकर मीडिया में ज़बरदस्त हंगामा खड़ा हो गया और वस्तानवी को फौरन बर्खास्त किए जाने की मांग उठने लगी।

वस्तानवी का मामला शूरा को सौंप दिया गया जिसने गत् दिनों आखिरकार  उन्हें अपदस्थ किए जाने के पक्ष में बहुमत से अपना फैसला सुनाया। मौलाना वस्तानवी के पद छोड़े जाने के बाद अब इस मुद्दे को लेकर देश में कई प्रकार के राजनैतिक समीकरण बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं मौलाना वस्तानवी इस मुद्दे को गुजराती व गैर गुजराती मुसलमानों के बीच के विवाद के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि दारूल-उलूम पर उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों का दबदबा है और एक गुजराती व्यक्ति को पहली बार दारुल-उलूम का वाईस चांसलर होते हुए नहीं देख सके। 

 शूरा के सभी सदस्य वस्तानवी के इन आरोपों का खंडन कर रहे है. वस्तानवी के यह आरोप वैसे भी निराधर इसलिए प्रतीत होते हैं क्योंकि शूरा के जिन 5सदस्यों ने वस्तानवी के पक्ष में मतदान किया उनमें भी अधिकांश सदस्य उत्तर प्रदेश व बिहार के ही थे। राजनैतिक क्षेत्रों में इस बात की चर्चा है कि वस्तानवी अपने साथ हुए घटनाक्रम को गुजराती मुसलमानों का अपमान उसी तर्ज पर साबित करना चाह रहे हैं जैसे कि नरेंद्र मोदी स्वयं अपने ऊपर लगने वाले किसी आरोप को फौरन गुजराती समाज या गुजरातियों का अपमान बताने लगते हैं।

वस्तानवी वास्तव में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के भी ज़बरदस्त पैरोकार हैं। वस्तानवी अपने निजी प्रयासों से गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक तमाम स्कूल,कॉलेज,महिला शिक्षा संस्थान,बी एड कॉलेज,आयुर्वैदिक संस्थान,आईटीआई,कई पुस्तकालय तथा जामिया अक्कलकुआ के नाम से एक विश्वविधालय स्तरीय संस्थान संचालित कर रहे हैं। जहां कुरान शरीफ की तालीम देने के लिए मौलाना ने सैकड़ों मदरसे स्थापित किए हैं उन्होंने कई मदरसों की सहायता भी की है। वे स्वयं भी विश्व का सबसे बड़ा कुरानी शिक्षा केंद्र चला रहे हैं।

गुलाम वस्तानवी जैसे शिक्षा उद्योग से जुड़े एक धनपति व्यक्ति के लिए दारूल-उलूम का कुलपति बनना या न बनना अथवा उस पद पर बने रहना या हट जाना कोई खास मायने नहीं रखता। परंतु इस पूरे प्रकरण में जिस प्रकार गुजरात दंगों,नरेंद्र मोदी, गुजरात राज्य के मुसलमानों,उत्तरप्रदेश-बिहार के दारुल-उलूम पर वर्चस्व तथा विशेषकर एक परिवार विशेष के दारूल-उलूम का वर्चस्व होने तथा मुसलमानों से गुजरात से आगे बढऩे की बात करने जैसी जो बातें जोड़ी जा रही हैं उनसे साफ ज़ाहिर हो रहा है कि राजनीति के महारथी लोग वस्तानवी प्रकरण को राजनीति का हथियार बनाना चाह रहे हैं।

जहां तक गुजरात से आगे की सोचने का प्रश्र है तो बेशक वस्तानवी का यह कहना सही है,परंतु इस विषय पर निर्णय करने का अधिकार भी कम से कम उन्हीं लोगों को पहले दिया जाना चाहिए जो स्वयं भुक्तभोगी हैं तथा आज तक गुजरात दंगों का दंश वे व उनके परिजन झेल रहे हैं। वस्तानवी अथवा किसी अन्य मुसलिम रहनुमा अथवा धर्मगुरु के आह्वान मात्र से ऐसा नहीं होने वाला। 


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के टिप्पणीकार.





                                                                                    

प्रमोशन की रेस में जिंदगी से हारे सिपाही


सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है। एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है...

आशीष वशिष्ठ

प्रमोशन पाकर सबइंस्पेक्टर बनने के लिए होने वाली शारीरिक क्षमता परीक्षा (फिजिकल फिटनेस टेस्ट) उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मियों पर लगातार भारी पड़ रही है। राज्य के कई मंडलों में 20 जुलाई से चल रही इस परीक्षा में करीब 41 पुलिसकर्मी बेहोष हुए हैं और आजमगढ़ में हुई रेस के दौरान 37 वर्षीय पुलिसकर्मी अली सुजमा समेत चार पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है और कई की यादाश्त जा चुकी है।

 लंबे समय के बाद यूपी में सिपाही से दरोगा पद की पदोन्नती की प्रक्रिया चल रही है। यूपी में सब-इंस्पेक्टर के करीब 5380 पद खाली हैं। इस पद पर प्रमोशन के लिए पिछले मार्च में कराए गए लिखित परीक्षा में 3892 कैंडिडेट पास घोषित किए गए थे। इन्हीं कैंडिडेटों का फिजिकली फिटनेस टेस्ट के तहत 10 किलोमीटर दौड़ की परीक्षा मेरठ, आजमगढ़, कानपुर और सीतापुर पुलिस सेंटरों में 20 जुलाई से चल रही है, जिसमें अब तक 1470 कैंडिडेटों ने दौड़ परीक्षा पास कर चुके हैं।

पुलिसकर्मियों के लगातार बेहोष होने और मौत की घटनाओं की परवाह किये बिना मौत की दौड़ बदस्तूर जारी है। राज्य के स्पेशल डीजीपी बृजलाल ने यूपी के पुलिसकर्मियों से स्पष्ट किया है कि यदि वे अपने को फिजिकली फिट नहीं महसूस कर रहे हैं, तो वे प्रमोशन रेस में हिस्सा नहीं लें। बृजलाल ने माना कि कई जवान मोटापा-ब्लडप्रेशर एवं मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं, तभी इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। स्पेशल डीजीपी का कहना है कि जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है, पहले फिट हों, तभी प्रमोशन की रेस के बारे में सोचें। उनके अनुसार फिजिकल फिटनेस दौड़ यूपी में रोकी नहीं जाएगी। फिट सिपाही ही सब-इंस्पेक्टर बनने का पात्र होगा।

गौरतलब है कि देषभर में राज्य पुलिस के जवान अल्प साधनों और संसाधनों और अस्त-व्यस्त दिनचर्या के साथ जीवन यापन करते हैं। किसी भी राज्य में पुलिसकर्मियों के काम के घंटे निर्धारित नहीं हैं। वहीं पुलिसकर्मियों की कमी भी बड़ा मुद्दा है। आंकड़ों पर गौर करें तो देष में 1 लाख की आबादी के अनुपात में 142 पुलिसकर्मी तैनात है जोकि विष्व के तमाम छोटे-बड़े मुल्कों के मुकाबले काफी कम है।

संविधान के अनुच्छेद सात के अंर्तगत ‘पुलिस’ और ‘लॉ एण्ड ऑर्डर’ राज्य सूची का विषय है। नागरिकों की सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है। बेसिक ट्रेनिंग के बाद एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है। ऊंचे पदों पर आसीन पुलिस अफसरों के लिए तो राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग और स्पेषल कोर्सेज की व्यवस्था का प्रावधान है लेकिन महकमे के मेरूदण्ड सिपाही से लेकर इंसपेक्टर तक के लिए ट्रेनिंग का खास इंतजाम नहीं है।

अधिकतर पुलिसवाले चौबीस घंटे डयूटी पर ही रहते है। उनके खाने, पीने और आराम का कोई निष्चित समय नहीं है। और ये बात समझ से परे है कि कोई व्यक्ति बिना खाये-पिये और आराम किये चौबीस घंटे पूरी ईमानदारी, निष्ठा और सर्तकता से डयूटी कर सकता है ? वहीं अनियमित दिनचर्या से फिजिकल फिटनेस और ष्षारीरीक क्षमता का क्षय होना स्वाभाविक है। सेना और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवान सारा साल फिजिकल फिटनिस और ड्रिल से जुड़े रहते हैं। लेकिन राज्य पुलिस के जवानों और अफसरों को वीआईपी डयूटी, थाना, कोर्ट कचहरी और वसूली से ही फुर्सत नहीं मिलती तो वो भला फिजीकल फिटनेस पर क्या ध्यान देंगे।

पुलिस महकमे के सुधार और पुलिस कर्मियों को बेहतर सुविधाएं दिलाने की गरज से कई आयोग और दर्जनों सिफारिशें  सरकारी फाइलों में दबी पड़ी है। ये कड़वी सच्चाई है कि थानो में बिजली, पानी, टायलेट, स्टेषनरी और तमाम दूसरी सुविधाओं का सर्वथा अभाव ही रहता है। महकमे से जितना बजट किसी थाने को मिलता है उससे तीन बंडल पेपर खरीद पाना भी बडी बात है। जिन पुलिसकर्मियों के भरोसे लाखों लोगों की जान और माल की सुरक्षा की अहम् जिम्मेदारी है जब वो ही अनफिट और बीमार होंगे तो आम आदमी किसके सहारे खुद को सुरक्षित महसूस करेगा।

Jul 31, 2011

बाजा बजाते दिग्गी राजा

मध्य प्रदेश के एक छोटे से इलाके राघोगढ़ के ठिकानेदार और चार -पांच सौ   घरों के मुखिया के रूप में जाने जानेवाले इस राजपूत नेता को आगे लाने में दिवंगत अर्जुन सिंह ने अहम भूमिका निभायी थी...

एस.के. सिन्हा  

उनकी निगाह में बाबा रामदेव एक ठग से ज्यादा कुछ नहीं हैं,भारतीय जनता पार्टी नचनियों का दल है,राष्ट्रमंडल खेलों के भ्रष्टाचार  में फंसे सुरेश कलमाडी बेकसूर हैं,कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ओसामा जी हैं,और राहुल गांधी अब इतने परिपक्व हो गये हैं कि अब उन्हें प्रधानमंत्री का पद संभाल लेना चाहिए। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का ताजा कारनामा यह बयान है कि पुलिस द्वारा पकड़ा गया हर हिंदू आतंकवादी राष्ट्र स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने मुंबई में हुए बंमकांड के तार भी  संघ से जुड़े होने की संभावना व्यक्त की जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी और उनके बीच घटिया आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ भाजपाई छात्रों ने जब दिग्विजय सिंह का घेराव कर लिया था उन्होंने एक छात्र को पकड़ कर तमाचे भी  जड़ दिये।

राहुल गांधी के खास सलाहकार के रूप में उभरे दिग्विजय सिंह यानी दिग्गी राजा को विवादास्पद बयानों के कारण एक अलग पहचान मिल रही है। उनके बयानों का निशाना भले ही विपक्ष रहता हो,लेकिन अक्सर जब-तब वे अपनी ही पार्टी और सरकार के लिए मुश्किले पैदा करने से नहीं चूकते। उनके बयान कभी-कभी इतना बखेड़ा खड़ा कर देते हैं कि बचाव में खुद प्रधानमंत्री मनमोहन को बयान देना पड़ता है। यह और बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या राहुल की ओर से उन्हें बयानबाजी करने के अभी तक नहीं रोका गया है।

आज दिग्विजय सिंह राहुल गांधी के मार्गदर्शक की तरह हैं। वे उन्हें राजनीति का ज्ञान दे रहे हैं। राहुल गांधी ने उन्हें उत्तर  प्रदेश की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी है। नोएडा में राहुल की यात्रा आयोजित करवाने में उनकी खास भूमिका रही। दिग्गी राजा का राजनीतिक एजेंडा भी काफी विशाल है। वे न केवल राहुल गांधी के माध्यम से पार्टी में अपनी जगह बनाने में जुटे हैं,बल्कि देश की राजपूत राजनीति में पैदा हुई नेतृत्व की शून्यता को भी  भरना चाहते हैं।

मध्य प्रदेश के एक छोटे से इलाके राघोगढ़ के ठिकानेदार और 400-500घरों के मुखिया के रूप में जाने जानेवाले इस राजपूत नेता को आगे लाने में दिवंगत अर्जुन सिंह ने अहम भूमिका निभायी थी। अर्जुन सिंह के खेमे के मुताबिक दिग्विजय सिंह उनके यहां आने वालों को पानी पिलवाने तक का काम करते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया कि उन्होंने अपने गुरू से ही पानी भरवा कर उन्हें राज्य की राजनीति में बेसहारा छोड़ दिया। जो स्थिति कभी अर्जुन सिंह ने राजीव गांधी के दरबार में हासिल की थी, वही आज राहुल गांधी के यहां दिग्विजय की है।

मध्य प्रदेश में लगातार दो बार सरकार बनाने के बाद जब इस इंजीनियर के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया तो उसकी सारी सोशल इंजीनियरिंग फेल हो गयी। कंप्यूटर नेटवर्क ही गांव तक को जोड़ देने वाले दिग्विजय शहरों तक को पानी,बिजली,सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने में असफल रहे और उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सभा का छींका फूट गया। कांग्रेस 2003के विधानसभा चुनाव में 230 में से महज तीन दर्जन सीटे ही जीत पायी।

इस हार के बाद दिग्विजय सिंह ने दस साल तक कोई पद न लेने का ऐलान कर दिया और दिल्ली में डेरा डाल दिया। अंबिका सोनी और अशोक गहलोत की परिक्रमा करके केंद्र में महासचिव बने। अहमद पटेल ने पुराने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए उनकी विशेष मदद की और असम का प्रभारी बना दिया। दिल्ली में आने के बाद दिग्विजय सिंह को यह भांपने  में देर नहीं लगी कि कांग्रेस का भविष्य तो राहुल गांधी के हाथों में है। वे हर रोज नोट बना कर भेजने लगे कि किस मसले पर पार्टी का क्या रुख होना चाहिए। राहुल गांधी ने उन्हें उत्तर  प्रदेश का प्रभारी बनवा दिया और संयोग से कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में अच्छी खासी सीटें मिल गयी। इसका श्रेय दिग्विजय को मिला। फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

एक समय था जबकि देश में अनेक राजपूत नेता हुआ करते थे। इनमें चंद्रशेखर,  भैरोसिंह शेखावत,अर्जुन सिंह खासे अग्रणी थे। भैरोसिंह शेखावत की राजपूतों में लोकप्रियता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा तो तमाम दलों के राजपूत सांसदों ने उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर अपने वोट दिये और वे भाजपा और उनके सहयोगी दलों के अलावा 32 अतिरिक्त वोट हासिल करने में कामयाब हो गये। ये तीनों राजपूत नेता अब इस दुनिया में नहीं है।

भाजपा में राजनाथ सिंह राजपूत होने के बावजूद उत्तर प्रदेश तक में पार्टी का जनाधार बना पाने में नाकाम रहे। उन्होंने तो जानेमाने डॉन राजा भैया के  बारे में सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि राजा भैया कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन देशद्रोही नहीं हो सकते। समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद अमर सिंह ने भी  खुद को राजपूतों का नेता साबित करने की कोशिश की, लेकिन वे दलालों के नेता होने की छवि से आज तक मुक्त नही हो पाये हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने हर दल में अपने दुश्मन पैदा कर लिये हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह के लिए राजनीति का मैदान खाली पड़ा है।

कांग्रेस के बुजुर्ग नेता याद दिलाते हैं कि एक समय था जब पहले संजय गांधी और बाद में राजीव गांधी को राजपूत नेता अपने मोहपाश में जकड़ने में कामयाब हो गये थे। संजय गांधी के समय में संजय सिंह, वीरभद्र सिंह, वीर बहादुर सिंह, अर्जुन सिंह, वीपी सिंह सरीखे नेताओं का अभ्युदय हुआ। वीपी सिंह की राजीव गांधी से निकटता कितना ज्यादा थी,यह तथ्य भी किसी से छिपा नही है। यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने ही राजीव गांधी की सरकार के पतन में अहम भूमिका अदा की। वीपी सिंह के बारे में राजीव गांधी ने वोट क्लब की रैली में कहा था कि उन्हें इस बात का खेद है कि पार्टी में ‘जयचंद’घुस गये हैं। अर्जुन सिंह को तो उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए पूरी पार्टी की ही जिम्मेदारी सौंप दी थी।

दिग्विजय सिंह को लगता है कि नेतृत्व-शून्यता वही भर सकते हैं। इसके साथ ही उनकी नजर मुस्लिम वोट बैंक पर भी  है। कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि दिग्विजय सिंह जो कुछ कर रहे हैं,उसके पीछे सोनिया और राहुल गांधी को पूरी सहमति है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज से नाखुश यह परिवार यूपीए सरकार के लगाता घोटालों में घिरते जाने के कारण बेहद परेशान है। उनका मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाये गये तो कांग्रेस को बहुत ज्यादा नुकसान होगा। इसलिए वे उनकी निर्भरता  दिग्विजय सिंह पर बढ़ती जा रही है।

दिग्विजय सिंह के करीबियों के मुताबिक उन्होंने हाईकमान को यह सलाह दी है कि सरकार के भ्रष्टाचार और घोटालों से ध्यान हटाने के लिए जरूरी है कि विपक्ष का ध्यान और ऊर्जा कही और केंद्रित की जाये। असली मुद्दों से विपक्ष को भटकाने के लिए ही वे ऐसे बयान दे रहे हैं,जिनसे कि विपक्ष खंडन-मंडन में ही फंस कर रह जाये। उनका दावा है कि इस काम में दिग्गी राजा को महारत हासिल है। जिस नेता ने माधव राव सिंधिया, अर्जुन सिंह, विद्या चरण शुक्ल सरीखे धुरंधरों को मध्य प्रदेश की राजनीति में धूल चटाने में कामयाबी हासिल की हो,उसके लिए विपक्ष को उलझाना कोई मुश्किल काम नहीं है। वे बताते हैं कि इसके साथ ही उनका लक्ष्य अहमद पटेल हैं। उनका मानना है कि राजनीति के शीर्ष पर पहुंचने में बड़ी उनके लिए अंतिम बाधा साबित हो सकते हैं।

द पब्लिक एजेंडा से साभार   

भगत सिंह मामले में खुशवंत सिंह की सफाई

आज दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में खुशवंत सिंह ने अपने पिता पर लग रहे आरोपों का जवाब देने की कोशिश की है. पिछले दिनों जनज्वार ने यह मुद्दा तीसरा स्वतंत्रता आन्दोलन के नेता गोपाल राय के लेख 'भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले को सम्मान'  के जरिये प्रमुखता से उठाया था...

खुशवंत सिंह

कुछ वक्त पहले मैंने नई दिल्ली बनाने वालों पर लिखा था। उनमें पांच लोग खास थे। मेरी शिकायत थी कि उनमें से किसी के नाम पर दिल्ली में सड़क नहीं है। तब तक मुझे नहीं पता था कि मनमोहन सिंह ने शीला दीक्षित को इस सिलसिले में एक चिट्ठी लिखी है। उनकी गुजारिश थी कि विंडसर प्लेस को मेरे पिता शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए।

उसके बाद एक किस्म का तूफान ही आ गया। कई लोगों ने विरोध जताया कि मेरे पिता तो ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू थे। मैंने उस पर कुछ भी नहीं कहा। जब कुछ अखबारों ने उनका नाम भगत सिंह की सजा से जोडा, तो मुझे तकलीफ हुई। सचमुच, उस खबर में कोई सच नहीं था।
दरअसल, शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने इंस्पेक्टर सांडर्स और हेड कांस्टेबल चन्नन सिंह की हत्या की थी। वे इन दोनों से लाला लाजपत राय का बदला लेना चाहते थे। लाहौर में लालाजी की हत्या में उनका हाथ था।

उसके बाद भगत सिंह और उनके साथी हिन्दुस्तान की आजादी के आंदोलन को दुनिया की नजरों में लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तय किया कि संसद में हंगामा करेंगे। और फिर अपनी गिरफ्तारी दे देंगे। ठीक यही उन्होंने किया भी।

ये लोग दर्शक दीर्घा में जा बैठे। वहीं मेरे पिता भी बैठे थे। संसद में बहस चल रही थी। और वह खासा उबाऊ थी। सो मेरे पिता ने अखबार निकाला और उसे पढ़ने लगे। अचानक पिस्टल चलने और बम के धमाके की आवाज सुनी। वहां बैठे बाकी लोग भाग लिए। रह गए मेरे पिता और दो क्रांतिकारी।

जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई, तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। मेरे पिता का जुर्म यह था कि उन्होंने कोर्ट में दोनों की पहचान की थी। दरअसल, मेरे पिता ने सिर्फ सच कहा था। सच के सिवा कुछ नहीं। क्या सच कहना कोई जुर्म है? फिर भी मीडिया ने शहीदों की फांसी से उन्हें जोड़ दिया। सचमुच उनका क्रांतिकारियों की फांसी से कोई लेना-देना नहीं था। यह एक ऐसे आदमी पर कीचड़ उछालना है, जो अपना बचाव करने के लिए दुनिया में नहीं है।



 

प्रेमचंद को याद करने के मायने


आज कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की 131वीं जयंती है। आइए इस मौके पर कुछ ज़रूरी बातें कर लें... प्रेमचंद को याद करने का मतलब है अपने समय की सच्चाई से रूबरू होना, उनसे मुठभेड़ करना। आज के यथार्थ को उकेरना। लेकिन आज का लेखक इसी सच्चाई से मुंह चुरा रहा है। सत्ता से और ज़्यादा करीब होने की होड़ में अपना कलम गिरवी रख रहा है..

मुकुल सरल

मुंशी प्रेमचंद को याद करने का क्या मतलब है? क्या मायने हैं? क्या महज़ एक रस्म अदायगी...कुछ रोना-गाना कि हाय मुंशी जी को भुला दिया गया, कि हाय उनका स्मारक अधूरा रह गया...कि लमही में यूं न हुआ, कि गोरखपुर, प्रतापगढ़ या इलाहाबाद में यूं न हुआ। या इससे अलग कुछ और...क्या मतलब है प्रेमचंद के होने या न होने का, उन्हें याद करने का।
प्रेमचंद को याद करने का मतलब है उस ग्रामीण भारत को याद करना जो उनकी कहानियों और उपन्यासों के केंद्र में रहा। उस ग्रामीण भारत को जिसकी दशा आज भी नहीं बदली।

भूमंडलीयकरण और आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस गांव को बर्बाद करने की पूरी तैयारी है। उस ग्रामीण भारत को जानना, उसकी आवाज़ बनना...यही है प्रेमचंद को याद करना।

प्रेमचंद को याद करने का मतलब है अपने समय की सच्चाई से रूबरू होना, उनसे मुठभेड़ करना। आज के यथार्थ को उकेरना। लेकिन आज का लेखक इसी सच्चाई से मुंह चुरा रहा है। सत्ता से और ज़्यादा करीब होने की होड़ में अपना कलम गिरवी रख रहा है।

आज प्रेमचंद का होरी आत्महत्या कर रहा है। आज की ही ख़बर है कि बुंदेलखंड के हमीरपुर में कर्ज़ से परेशान एक किसान ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। विदर्भ का उदाहरण हम सबके सामने है ही। कमोबेश पूरे देश में यही स्थिति है। कृषि प्रधान व्यवस्था बर्बाद की जा रही है।

किसान कर्ज़ के जाल में फंस गया है। कहीं सूखे ने उसे मार डाला है, कहीं बाढ़ ने। कहीं विकास के नाम पर उसकी ज़मीन सस्ते में छीनी जा रही है और बड़े-बड़े बिल्डरों और कंपनियों को कॉलोनी और मॉल बनाने के लिए दी जा रही है। जिससे वे भारी मुनाफा कमा सकें। भट्ठा-पारसौल से लेकर टप्पल तक यही हुआ। और ये सब कौन कर रहा है हमारी सरकारें। जो गांव और किसान के नाम पर सत्ता में आती हैं।

गोबर गांव से पलायन कर रहा है। धनिया की सुध लेने वाला कोई नहीं। ऐसे दौर में प्रेमचंद को याद करना इस स्थिति के खिलाफ कलम उठाना है, कदम बढ़ाना है।

प्रेमचंद को याद करना उस सांप्रदायिक एकता को भी याद करना है जिसकी उन्होंने पुरज़ोर वकालत की। उस उर्दू-हिन्दी के एका को याद करना है जिसने उनकी कलम को बेमिसाल बना दिया। लेकिन जिसके खिलाफ आज सांप्रदायिक ताकतें बंटवारे की राजनीति कर रही हैं।

दरअस्ल प्रेमचंद को याद करना साहित्य की उस प्रगतिशील धारा की मशाल को जलाए रखना है जिसकी रौशनी में ही नये भारत का निर्माण संभव है।




मीडिया मंडी का नया माल बन गया ‘बेशर्मी मोर्चा’

मन में सवाल उठ रहा था कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए स्लट वॉक कहीं मंडी में आया ताजा माल तो नहीं, जिसको बेचने के लिए एक-एक न्यूज चैनल से तीन-तीन पंसारी पहुंचे हुए हैं...

भूपेंद्र सिंह


महिलाओं के हक और समान अधिकार के लिए दुनिया के कई देशों में निकाली जा चुकी स्लट वॉक आज दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित हुआ। पिछले कई महीनों से जिस स्लट वॉक या उसके भारतीय रूपांतरण ‘बेशर्मी मोर्चा’ को लेकर मुख्यधारा की मीडिया में खबरें आ रही थीं, आज उस बेशर्मी मोर्चा में शामिल युवक-युवतियों ने जंतर-मंतर पर एकत्रित होकर पार्लियामेंट स्ट्रीट का चक्कर लगाया।

बमुश्किल 300 लोगों के झुंड को कवर करने के लिए 30 से ज्यादा न्यूज चैनलों की ओवी वैन आयोजकों से पहले जंतर-मंतर पहुंच चुकी थीं। भीड़ देखकर ऐसा लगा कि पत्रकारों और फोटोग्राफरों की संख्या भी 300 के आसपास ही रही होगी। मन में बस यही सवाल उठ रहा था कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए क्या यह इतना बड़ा आयोजन है कि एक-एक न्यूज चैनल से स्टल वॉक कवर करने के लिए तीन-तीन पत्रकार भेजे गये हैं। कम कपड़े में आयी लड़कियों के शरीर फोकस होते कैमरों को देख लगा कि यह मुद्दा है या मीडिया मंडी में आया ताजा माल, जिसमें मुनाफा बाइडिफाल्ट है।

आयोजक उमंग सबरवाल और एक प्रदर्शनकारी : अधिकार की लड़ाई  

यह बात परेशान करने वाली थी कि जब मीडिया के कैमरे लोगों के झुंड में उन लड़कियों को ढूंढ़ रहे हैं जिन्होंने कम कपड़े पहने हैं, तो हम ऐसे आयोजन करके समाज के लोगों की सोच में कैसे बदलाव की बात कैसे कर सकते हैं कि छोटे कपड़े पहनकर कोई लड़की सड़क पर गुजरेगी तो उसकी ओर कोई मुड़कर नहीं देखेगा या कमेंट नहीं करेगा। ऐसे में समाज में परिवर्तन की बात करना क्या बेमानी नहीं है? एक और बात जो मुझे यहां हैरान कर रही थी वह यह कि इस मोर्चे में भाग लेने के लिए लड़कियों से ज्यादा संख्या लड़कों की थी।

यह स्लट वॉक कई चैनलों के लिए अपनी ब्रांडिंग का जरिया भी था, जो जाहिर कर रहा था इनके लिए मामला तभी मुद्दा है जब वह मंडी के मुनाफे में चार चांद लगाता हो। और यह कूवततो बेशर्मी मोर्चा में है- तेज एंकरों, रिपोर्टरों और संपादकों ने ताड़ लिया है। एक न्यूज चैनल की वरिष्ठ एंकर तो बाकायदा जंतर-मंतर पर टॉक शो आयोजित करने के लिए घंटों से तैयारी में जुटी हुयी थीं और चैनल के नाम का होर्डिंग का एक घेरा बनाकर वॉक के आयोजकों का टाक शो में शामिल होने का इंतजार कर रही थी।

वहीं युवाओं के बीच यूथ चैनल के नाम से लोकप्रिय एक चैनल ने तो इस वाक में शामिल होने वाले युवक-युवतियों को टी-शर्ट पहनायी हुयी थी, जिसके पीछे बेशर्मी मोर्चा और चैनल का नाम लिखा था। एक एफएम चैनल के आरजे भी यहां पहुंचे हुए थे। कहने की जरूरत नहीं कि उनका यहां आने का मकसद अपने-अपने चैनल या एफएम की ब्रांडिंग का अवसर हाथ से न जाने देने वाला अवसर था। अंग्रेजी बोलने वाले और आईफोन इस्तेमाल करने वाले इन युवक-युवतियों ने जब अपनी वाक शुरू की तो न्यूज चैनलों के कैमरे इनकी ओर ऐसे लपके जैसे कोई शिकारी शिकार के लिए झपटता है।

मीडिया ने बेशर्म मोर्चा की रैली को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया कि दिल्ली पुलिस के साथ-साथ सीआरपीएफ के जवान भी मौके पर तैनात करने पड़े। जिस तरह जंतर-मंतर पर मौजूद न्यूज चैनलों के रिपोर्टर कैमरे के सामने खबरें प्रस्तुत कर रहे थे उन्हें देखकर मैं यह सोचकर हैरान हो रहा था कि घर में बैठा एक आम दर्शक सोच रहा होगा कि पता नहीं कितना हुजूम उमड़ा होगा। लेकिन हकीकत में मुझे यह कुछ बड़े घरों के लड़के-लड़कियों द्वारा पश्चिमी देशों में निकाली गयी स्लट वाक से प्रभावित होकर कुछ अलग करने से ज्यादा नहीं लगा।

अब बात जरा इस मोर्चे की आयोजक की भी कर ली जाये। आयोजक उमंग सब्बरवाल सफेद टी-शर्ट और जींस में दिखीं, जबकि वाक में शामिल कुछ लड़कियां स्कर्ट और शार्ट्स पहनकर पहुंची थीं। कई दंपत्ति भी इस वाक का हिस्सा बनने पहुंचे थे। पूछने पर पता चला कि संडे का दिन था, सोचा कुछ अलग इवेंट हो रहा है तो इसमें शामिल हुआ जाये तो चले आये। दो महीने की जद्दोजहद के बाद मात्र कुछ सौ लोगों को देखकर मैं यह सोचने लगा कि यदि मीडिया ने इसे इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया होता तो शायद इतने लोग भी नहीं जुटते।

'खाप' का आईना देख बौखलाए चौधरी


अजय सिन्हा ने साहस करके खाप पंचायतों के क्रूर चेहरे और ऑनर किलिंग के ज्वलंत मुद्दे पर फिल्म बनाकर साहस का काम किय है। सिनेमा के व्याप्क प्रचार, प्रसार और असर से घबराई खाप पंचायते ये कभी नहीं चाहेंगी कि उनकी असलियत दुनिया के सामने आये...

आशीष वशिष्ठ

अजय सिन्हा निर्देशित फिल्म ‘खाप-ए स्टोरी ऑफ ऑनर किलिंग’ ने पिछले हफ्ते देश भर के सिनेमाघरों में दस्तक दी है। लेकिन हरियाणा में इस फिल्म को लेकर खासा विरोध चल रहा है। हरियाणा से भड़की विरोध की चिंगारी पष्चिमी उत्तर प्रदेश  के कई जिलों तक फैल चुकी है। अजय सिन्हा ने सिने दर्शकों के लिए एक मनोरंजन फिल्म बनायी है जिसमें, डांस है, ड्रामा है, रोमांस है, एक्शन है। इसमें  हर हिंदी फिल्म की तरह एक लवस्टोरी को दिखाया गया है जिसे समाज की स्वीकृति नहीं मिलती है और उस स्टोरी का दर्दनाक अंत हो जाता है।

ये तो हर प्रेम कहानी  में होता है। पिछले कई दशकों से ये ही होता आ रहा है लेकिन अजय सिन्हा की फिल्म में ऐसा क्या है जिससे हरियाणा और पष्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप पंचायत एक दम से उखड़ गयी है। और वो इस फिल्म का विरोध और  फिल्म के षो रूकवाने पर उतारू है। लेकिन इस लो बजट की फिल्म के विरोध ने देश भर के सिनेमाघरों की सीटों को जरूर पहले शो के लिए हाउसफुल कर दिया है। फिल्म की पृष्ठभूमि दिल्ली व आसपास के इलाके पर आधारित है।

ऑनर किलिंग के विषय पर आधारित फिल्म खाप रुढ़िवादी पीढ़ियों द्वारा बनाई गयी एक प्रथा का विरोध करती है। फिल्म में दो प्रेमी दिखाये गये हैं। कहानी रिया (युविका चौधरी) ओर कुश(सरताज) के इर्द-गिर्द धूमती है जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं। रिया के पिता मधुर (मुनीश बहल) ने 16 साल पहले अपने दोस्त के ऑनर किलिंग के नाम पर की गई हत्या के बाद गांव छोड़ दिया था। वही दूसरी तरफ खाप पंचायत का मुखिया (ओम पुरी) रिया के दादा हैं और ओम पुरी इस बात से अनजान है।

कहानी में ट्वीस्ट तब आता है जब गांव में फिर ऑनर किलिंग के नाम पर एक प्रेमी जोड़े की हत्या हो जाती है और प्रशासन इसकी जांच के लिए रिया के पिता मधुर को ही गांव भेजता है। रिया की शादी कुश से हो जाती है लेकिन दोनों ही इस बात से अनजान होते हैं कि वे एक ही खाप से संबंध रखते हैं। यहां से उनके और परिवार वालों के लिए मुश्किलें शुरू हो जाती हैं। ढ़ी भला खाप पंचायत की बातों को क्यों माने? लेकिन इस बीच ऑनर किलिंग की भयावह घटनाएं दोनों को सहमा देती हैं। खैर, फिल्म का अंत सकारात्मक है। आखिर में जीत कुश और रिया की ही होती है।

फिल्म खाप में ऑनर किलिंग जैसे मुद्दे को केंद्र में जरूर रखा गया है, परंतु इसकी अहमियत एक मसाला फिल्म जितनी ही है। फिल्म में बहुत कुछ कहने की कोशिश की गई है, लेकिन फिल्म के कथ्य के सरलीकृत स्वरूप ने दिक्कत पैदा कर दी है। हां खाप पंचायत के बारे में बहुत सारी जानकारी इससे मिल सकती है। हरियाणा, यूपी व अन्य राज्यों के गांवों में परंपरा और इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की कहानी है फिल्म खाप। फिल्म ने गांवों में सदियों पुरानी परंपरा के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग को दिखाया गया है।


जिस तरह हरियाणा और पष्चिमी उत्तर प्रदेष में फिल्क का व्याप्क तौर पर विरोध हो रहा है उससे  ये संकेत मिलते हैं कि खाप को भी इस बात का अंदेशा है कि उसके फैसले कहीं ना कहीं गलत होते हैं। उसके तुगलकी फरमान से लोग को काफी तकलीफ होती है। हरियाणा की खाप पंचायत ने फिल्म की रिलीज को रूकवाने के लिए एड़ी चोटी का दम लगाया था, लेकिन लाख कोषिषों के फिल्म रिलीज हो गई।

असल में खाप पंचायतों को कहीं ना कहीं ये डर सता रहा था क कि खाप फिल्म से उसका वो घिनौना सच लोगों के सामने ना आ जाये जिसे खाप पंचायत सही मानती है। और कहीं ऐसा न हो कि फिल्म देखने के बाद लोग खाप पंचायतों के विद्रोह पर उतर आयें। गौरतलब है कि पिछले साल के रिकार्ड के मुताबिक हरियाणा में सबसे ज्यादा ऑनर किलिंग के मामले सामने आये है। जिसके लिए काफी हद तक खाप पंचायत के तुगलकी फरमान जिम्मेदार है। लेकिन खाप पर इन बातों का कोई असर नहीं होता है।

अजय  सिन्हा ने साहस करके खाप पंचायतों के क्रूर चेहरे और ऑनर किलिंग के ज्वलंत मुद्दे पर फिल्म बनाकर साहस का काम किय है। सिनेमा के व्याप्क प्रचार, प्रसार और असर से घबराई खाप पंचायते ये कभी नहीं चाहेंगी कि उनकी असलियत दुनिया के सामने आए, ऐसे में आने वाले दिनों में ‘खाप’ का विरोध तेज होगा, आखिरकर सच का सामना करने की हिम्मत हर एक में नहीं होती है। खाप पंचायते अपनी सच्चाई सिल्वर स्क्रीन के बड़े पर्दे पर देखकर हैरान, परेशान और घबराई हुई है ।