Jun 29, 2011

क्यों दी गयी जीतन मरांडी को फांसी ?


झारखंड की गिरीडिह अदालत ने हाल ही में चिलखारी हत्याकांड मामले में जिन चार लोगों को फांसी की सजा मुकर्रर की है,उनमें राज्य के लोक कलाकार जीतन मरांडी भी हैं। जीतन मरांडी क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ)के सदस्य हैं। आरडीएफ के सचिव राजकिशोर और साईंबाबा की ओर से जीतन मरांडी की गिरफ्तारी पर जारी प्रेस विज्ञप्ती...

लोक कलाकार जीतन मरांडी को गिरडीह की निचली अदालत ने चिलखारी केस में दोषी  करार देकर फांसी की सजा दे दी। 27 अक्तुबर 2007 को चिलखारी में झारखंड़ के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे की अनुप मरांड़ी सहित 19 लोगों की गोली लगने से मौत हुई थी। इस केस में जीतन मरांडी को जानबुझ कर फंसाया गया है क्योंकि एक जन कलाकार के रूप में जीतन मरांडी अपने संगठन झारखंड एभेन और क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा के जरिए राज्य की जनविरोधी नीतियों और दमनात्मक कार्यवाहियों की खिलाफत करता था।

वह विस्थापन, कारपोरेट लूट और राजकीय दमन के खिलाफत गीतों, नाटकों और लेखन के माध्यम से कर रहा था। सार्वजनिक मंचों पर इन गीतों के माध्यम से वह जन जागरूकता फैलाने के कारण सरकार की जनविरोधी की खिलाफत के कारण जीतन मरांडी कई बार जेल गया है। उसके ललकारते स्वर को रोकने के लिए इस बार उसे चिलखारी केस में फंसा दिया क्योंकि उसने प्रभात खबर में तीन कड़ियों में छपे लेख में झारखंड़ के नक्सलवादी आन्दोलन के कारणों को खंगालते हुएराज्य की जनविरोधी भूमिका और जनता के नक्सलवादियों से लगाव का खुलासा किया था। 5 अप्रैल 2008 को इस लेख की अन्तिम कड़ी छपते ही उसे रांची पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया जब वह रातू रोड़ में विस्थापन विरोधी जनविकास आन्दोलन की राज्य परिषद् की बैठक के बाद अपने घर लौट रहा था।

जीतन मरांडी पर सरकार ने पहले राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया जिसमें आरोप लगाया कि 1 अक्तुबर 2007को रांची में राज्यपाल भवन की समक्ष हुई राजनैतिक बंदी रिहाई रैली में उसने सरकार के खिलाफ उकसाउ भाषण दिया था। इसके बाद उसपर मानों केस लादने का सिलसिला सा शुरू कर दिया गया। चिलखारी केस के अलावा थाना गांव के दो केस,पीरटांड थाने में एक केस और तिसरी थाने में दो केस भी उस पर लाद दिए।

गौरतलब है कि पीरटांड और तिसरी थाने में दर्ज केस के दौरान तो जीतन मरांडी अलग-अलग केसों के सिलसिले में जेल में था। इससे सरकार की जीतन की आवाज को चुप कराने की मंशा को साफ हो जाती है। चिलखारी केस में भी पुलिस अधिकारियों ने पहले जीतन मरांडी के होने की सम्भावना से इन्कार किया था। चिलखारी घटना की रिपोर्ट करते हुए प्रभात खबर अखबार ने जीतन मरांडी को आरोपी ठहराते हुए उसकी तस्वीर प्रथम पृष्ठ पर छाप दी थी। बाद में प्रभात खबर के सम्पादक ने जीतन मरांडी से इस गलती की सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी।

उसी दौरान पुलिस उच्चाधिकारियों ने भी बयान दिया था कि चिलखारी केस का आरोपी जीतन मरांडी सांस्कृतिककर्मी जीतन मरांडी नहीं है बल्कि माओवादी कमांडर जीतन मरांडी है। परन्तु बाद में पुलिस ने सांस्कृतिक जीतन मरांडी और माओवादी कमांडर जीतन मरांडी दोनों को ही चिलखारी घटना में आरोपी बना दिया। सांस्कृतिक जीतन मरांडी को घटना में आरोपी बनाने के लिए तीन नए गवाहों को शामिल कर लिया। इस तरह जीतन मरांडी को फंसाने की साजिश रची गई।

चौबीस  मार्च 2009 को जीतन मरांडी को चिलखारी केस की सैशन कोर्ट की पेशी में लाया गया था। जब जीतन मरांडी सैशन हाजत में अन्य बन्दियों के साथ बैठा था तो एक आदमी,जो खुद को गिरिडीह टाउन थाना प्रभारी बता रहा था,उससे आकर मिला और बाद में चला गया। बाद में सिपाही ने जीतन को जबरन अकेले ही सैशन हाजत से बाहर निकाला और उसे सैशन कोर्ट में ले गया। सैशन हाजत से निकलते ही गिरिडीह टाउन थाना प्रभारी ने वहां खड़े लोगों को कहा कि यह जीतन मरांडी है,इसे पहचान लो। बाद में सभी लोग जीतन के पीछे-पीछे सैशन कोर्ट तक गए। सैशन कोर्ट में जीतन मरांडी को बगैर हाजिरी के दस्तखत करवाए ही वापिस लौटाने की कोशिश की जिसपर जीतन मरांडी ने ऐतराज भी जताया।

दरअसल पुलिस ने केस जिन गवाहों को जीतन मरांडी की पहचान करवा दी थी, उन्होनें ही बाद में जीतन मरांडी के घटना स्थल पर मौजूद होने की गवाही दी। जीतन मरांडी ने उपरोक्त घटना के बारे में न्यायालय को अवगत भी करवाया था।

गौरतलब है कि इन गवाहों में चिलखारी केस के मृतकों के परिवार का एक भी सदस्य नहीं हैं। सभी बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के कार्यकर्ता हैं। इन्ही गवाहों के बयान के आधार पर निचली अदालत ने जीतन मरांडी को फांसी की सजा दे दी। जीतन मरांडी की सजा भारत के अपराधिक न्याय प्रणाली के सरकार और पुलिस की कठपुतली होने का पर्दाफाश करती है जो सरकार के विचार से असहमत लोगों को,अन्याय के खिलाफ और जनहित में आवाज उठाने वाले लोगों को खासकर भारत के सर्वाधिक शोषित और उत्पीड़ित आदिवासीयों,दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को फांसी की सजा देती है।

चिलखारी केस में फांसी की सजा पाने वाले जीतन मरांडी,मनोज रजवार,छत्रापति मंड़ल और अनिल राम भी आदिवासी,दलित और पिछड़े जातियों के अत्यन्त गरीब परिवारों से हैं। न्यायिक प्रक्रिया और आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरूपयोग कर जीतन मरांडी को दिलवाई गई फांसी की सजा दिलवाने के केस भारत में कोई नई बात नहीं है। इससे पहले आंध्र प्रदेश के क्रान्तिकारी नेता किस्ता गौड़ और भूमैया को भी फांसी की सजा दी गई थी। बारा केस में पांच लोगों को फांसी की सजा दे दी।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भगवती ने माना है कि ‘कई बार पुलिस गवाहों को तैयार करती है ताकि पुलिस की विचार को सही प्रमाणित किया जा सके।’इसी केस में उच्चतम न्यायालय ने प्रावधान किया था कि फांसी की सजा ‘दुर्लभतम से दुर्लभ' केस में दी जाए। इस निर्णय के बावजूद भारत की न्यायायिक प्रणाली में मौत की सजा रेवडियों की तरह बांटी जा रही है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2006 से 2007 के दौरान कम से कम 140 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी। विश्व के 139 देश फांसी की सजा समाप्त कर चुके हैं। परन्तु विश्व के सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने का दावा करने वाली सरकार फांसी की सजा को खत्म करने को तैयार नहीं है क्योंकि वह फांसी की सजा का सर्वाधिक प्रयोग आन्दोलनकारियों और समाज परिवर्तन का सपना देखने वाले लोगों की आवाज चुप कराने के लिए करती है ताकि वह शोषण और लूट कायम करने के लिए बनाई जा रही नीतियों को बगैर विरोध के लागू कर सके।

क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा मांग करता है कि जीतन मरांडी सहित अन्य लोगों की फांसी की सजा तुरन्त रद्द की जाए तथा उन्हें बाइज्जत बरी किया जाए। जीतन मंराड़ी के खिलाफ साजिश करने वाले राजनैतिज्ञों,पुलिस अधिकारियों को सजा दी जाए। फांसी की सजा खत्म किया जाए। मोर्चा सभी प्रबुद्ध लोगों, जनतांत्रिक संगठनों से अपील करता है कि जीतन को न्याय दिलाने की लड़ाई को तेज करने के लिए एकजुट हो।


 

छोटे नाटक की लंबी कहानी

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के 150वें जन्मवर्ष पर तोता-कहानी का मंचन
सौ बरसों से भी पहले की लिखी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी में ये ज़रूर जोड़ा गया कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा व्यवस्था की इस विसंगति पर प्रहार करके ही नहीं छोड़ दिया बल्कि सही में शिक्षा कैसी होनी चाहिए, ये विश्वभारती और शांतिनिकेतन की स्थापना करके बताया...

विनीत तिवारी

इन्दौर। रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित ”तोता कहानी“ शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों को उजागर करती है। मुश्किल से दो पेज की ये कहानी मशहूर शिक्षाशास्त्री पाउलो फ्रेयरे की शिक्षा संबंधी अवधारणाओं का एक सरल कहानी में रूपांतरण है। फ्रेयरे के मुताबिक शिक्षा की प्रक्रिया में विद्यार्थी को गुल्लक या बैंक समझकर उसके भीतर ज्ञान ठूँसा या जमा किया जाता है, जबकि विद्यार्थी एक जीवंत इकाई है। वो हासिल ज्ञान को सँवार-सुधार या खारिज कर सकता है। कहानी में राजा एक तोते को पढ़ा-लिखाकर बड़ा विद्वान बनाने की सनक का शिकार हो जाता है और उसके लिए बेहतरीन सोने का पिंजरा बनाने से लेकर महापंडितों तक का प्रबंध किया जाता है।

उन्मुक्त, स्वच्छंद उड़ने वाला तोता सोने के पिंजरे के पीछे किताबों के ढेर में दब जाता है। राजा कुछ समय बाद निरीक्षण कर देखता है कि अब तोता टें-टें-टें नहीं करता, उड़ने के लिए फड़फड़ाता नहीं, तो वो सोचता है कि ज्ञान ने इसे सभ्य व सुसंस्कृत बना दिया है लेकिन हक़ीक़त ये होती है कि तोता कुछ सीखा नहीं होता। उल्टे वो सब भूल गया होता है जो उसे पहले आता था - प्रकृति से प्रेम, आकाश में उड़ान, अपनी जुबान, जो भी उसका अपना सहज था, वो सब।

सौ बरसों से भी पहले की लिखी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी में ये ज़रूर जोड़ा गया कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा व्यवस्था की इस विसंगति पर प्रहार करके ही नहीं छोड़ दिया बल्कि सही में शिक्षा कैसी होनी चाहिए, ये विश्वभारती और शांतिनिकेतन की स्थापना करके बताया। नाटक के हिस्से के तौर पर शांतिनिकेतन के बारे में जानकारी देने में नाटक की पकड़ ढीली पड़ने का रिस्क था लेकिन पोस्टरों और कविता के माध्यम का खूबसूरत इस्तेमाल करते हुए तथा दर्शकों में वैकल्पिक शिक्षा को जानने की उत्सुकता के पलों को समझते हुए ये हिस्सा भी काफी रोचक रहा।

पढ़ते हैं बच्चे जहाँ पेड़ों के नीचे
गिलहरी भी उनकी कक्षा में बैठ जाती है पीछे
आम की कैरी टपकती है उत्पल के सर पर
टीचर के पीछे उड़ती है तितली फरफर
ऐसी शिक्षा में लगता है बच्चों का मन
कहते हैं उस जगह को शांतिनिकेतन।

14 जून 2011 को हुए इस नाटक का निर्देशन सारिका श्रीवास्तव ने किया। पटकथा लेखन एवं निर्देशन में डॉ. जया मेहता एवं विनीत तिवारी ने सहयोग किया। संगीत दिया अभिनय करने वाले बच्चों में से ही एक राज ने। नाटक में सूत्रधार जैसी भूमिका में बोलती क़िताब बनकर आयी महिमा, नाटक के मुक्ष्य क़िरदार तोते की भूमिका में पीयूष ने और तोते को पढ़ाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रकाण्ड विद्वानों की भूमिका में अमन, खुशी और सुनीता को काफी सराहना मिली। गुलरेज़, सुलभा, रुचिता, शारदा मोरे, अरविंद बौरासी, अशोक दुबे, प्रमोद बागड़ी, आस्था तिवारी, विनीता हेमनानी ने मंच के पीछे की जिम्मेदारियाँ निभाईं।

शिविर के दौरान ही रोशन नायर ने एक तरफ़ बच्चों को डान्स करना और शरीर के अंगों की हिचक खोलना सिखाया तो दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा, फुकुशिमा, चेर्नोबिल और जैतापुर जैसे मसलों को आसान तरह से बच्चों की उत्सुकताओं में शरीक कर दिया। दिल्ली से आये प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने बच्चों को 21 मई 2011 को बगैर चित्रकारी सीखे बड़े ही आसान और सरल तरीके से पोस्टर बनाने सिखाये, जिसमें बच्चों ने बहुत सारे पोस्टर बनाये।


उसके पूर्व 20 अप्रैल को जैतापुर व चेर्नोबिल के संबंध में बच्चों को जानकारी दी गई जिसके आधार पर उन्होंने परमाणु विनाश के विषय पर अनेक पोस्टर बनाये।पंखुरी मिश्रा ने बच्चों एवं उनके अभिभावकों को शिक्षा अधिकार अधिनियम की जानकारी दी और बच्चों के भविष्य के लिए इस कानून का इस्तेमाल करने की अपील की। अशोक दुबे ने बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए याद्दाश्त बढ़ाने एवं आवाज़ में भाव-प्रवणता लाने के व्यायाम बताए और इस रंगशाला को ”मस्ती के मस्तानों की पाठशाला“ का नाम दिया। बच्चों के शिविर के दौरान बनाये गए पोस्टर भी इस मौक़े पर प्रदर्शित भी किये गए।

नवीन माध्यमिक शासकीय विद्यालय, मोतीलाल की चाल के हेडमास्टर श्री ओ.पी.मोहनिया और श्री चंद्रप्रकाश महावर, प्रभारी, जनशिक्षा केंद्र, नेहरू नगर ने इस कार्यशाला हेतु विद्यालय का हॉल उपलब्ध करवा कर सहयोग प्रदान किया।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि कॉमरेड पेरीन दाजी व इकाई अध्यक्ष श्री विजय दलाल ने शिविर के सफल संचालन के लिए बच्चों और सारिका को बधाई दी और सभी बच्चों को इप्टा के शिविर के प्रमाण-पत्र वितरित किये।

Jun 28, 2011

बंद चाय बागानों को चलाएगी सरकार


चाय बागानों में 50 हजार से ज्यादा आदिवासी श्रमिक परिवारों  के पास जीविका का कोई साधन उपलब्ध नहीं है. रोटी और भोजन की बात तो दूर इन बंद चाय बगानो में पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं है...

राजन कुमार 

पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित सरकार ने राज्य के आदिवासियों के प्रति अपनी विशेष चिंता प्रदर्शित करते हुए आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए सुलभ मूल्य पर चावल की आपूर्ति हेतु 156 करोड़ रूपयों की राशि आवंटित करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने  उत्तर बंगाल के 16 बंद चाय बागानों  को लेकर  खाद्य मंत्री ज्योति प्रिय मलिक को विशेष रूप से निर्देष दिया है कि वे आगामी 30जून के अंदर उत्तर बंगाल के बंद चाय बगानों का दौरा करके सरकार को रिपोर्ट पेश करें।

सरकार द्वारा आवंटित उपरोक्त राशि के तहत बीपीएल एवं अन्नपूर्णा और अन्त्योदय कार्डधारियों को दो रूपया प्रति किलो के दर से चावल उपलब्ध किया जायेगा एवं इस उद्देश्य से अगले तीन माह के लिए 1 लाख 22 हजार 256 मैट्रिक टन चावल खरीदा जायेगा। उधर केन्द्र सरकार द्वारा उसी अनुपात में फुड कार्पोरेशन ऑफ  इण्डिया द्वारा चावल की आपूर्ति करने की घोषणा की गयी है। 16बंद चाय बागानों  के बारे में उपलब्ध जानकारी पर वर्तमान सरकार को भरोसा नहीं  है क्योंकि  ये सूचना पूर्ववर्ती सरकार द्वारा संकलित की गयी थी।

इनमें  से 15चाय बगान जलपाईगुड़ी जिले में  और एक चाय बगान दार्जलिंग जिले में है। एक मोटे अनुमान के साथ इन चाय बगानो में 50 हजार से ज्यादा आदिवासी श्रमिक परिवार के पास जीविका का कोई साधन उपलब्ध नहीं है. रोटी और भोजन की बात तो दूर इन बंद चाय बगानो में पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं है,ना ही परिवारों को आवासीय सुविधा या बिजली उपलब्ध है। अत: मुख्यमंत्री ने बंद चाय बागानो की दुरावस्था पर आवश्यक कदम उठाने का निर्णाय लेकर सराहनीय कार्य किया है।

प्रश्न उठता है कि उपरोक्त 16चाय बागान क्यों  बंद हैं और इनकी विषय में राज्य सरकार के श्रम विभाग द्वारा आज तक क्या कार्रवाई की गयी है। क्या कारण है कि चाय बगान के मालिकों द्वारा जब कभी भी चाय बगान में ताला बंदी की घोषणा कर दी जाती है यह ताला बंदी का नोटिस चिपकाकर चाय बगान के मालिक या मैनेजर रात के अंधेरे मे चाय बगान छोड़ कर भाग जाते हैं और चाय बागान के मजदूरों के वेतन,राशन, पानी, बिजली, दवा, के लिए किसी तरह की व्यवस्था नही की जाती है।

बंद चाय बागानों के बारे में राज्य सरकार को ठोस एवं कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। ठोस कानूनी कार्रवाई द्वारा चाय बागान मालिकों को सतर्क कर देने की आवश्यकता है कि वे मनमाने ढंग से चाय बागान बंद करके न भाग सके। बंद चाय बागानों को अविलम्ब खुलवाने की दिशा में भी राज्य सरकार को आवश्यक कानूनी एवं शासकीय कार्रवाई करने की आवश्यकता है। नवनिर्वाचित सरकार के सामने बंद चाय बागान एक चुनौती हैं  जो उद्योगों के विषय में सरकार नीति और कार्यक्रम को उजागर करेंगी।

उसी तरह जंगल महल में पश्चिम मिदनापुर जिला के 13 ब्लाक और बाकुड़ा जिले के 5 ब्लाक एवं संपूर्ण पुरूलिया जिला में जनसंख्या पर गौर किया जाये तो यह भी आदिवासियों की जनसंख्या 35प्रतिशत से ज्यादा है और इनके साथ है कुर्मी महतो सम्प्रदाय के लोग जिनकी संख्या 30प्रतिशत है। कुर्मी महतो एवं आदिवासी की भाषा एवं संस्कृति में एक रूपता है। इनकी भाषा संथाल, मुण्डारी , कुर्माली , कुड़ुख इत्यादी है। उल्लेखनीय है कि 1935 तक कुर्मी महतो समुदाय भी अनुसूचित जनजाति में शामिल था। सरकारी अवहेलना के कारण जंगल महल का यह कुर्मी महतो एवं आदिवासी समुदाय आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा रह गया। नई सरकार ने जंगल महल के आदिवासियों के विकास के लिए विशेष पैकेज की घोषणा करके उनका ध्यान रखा।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों,जनजातियों पिछडे वर्गों ,अल्पसंख्यकों , महिलाओं आदि के उन अधिकारी की बहाल करने का जिक्र नहीं   है, जिनमें एक के बाद एक सरकार घेर तिरस्कार का रवैया अपनाए रही। यहां तक कि उपेक्षित वर्गों की सत्ता में आनुपातिक हिस्सेदारी देने वाले संवैधानिक प्रावधानों की भी ठीक से लागू नही किया गया। जिसका फलस्वरूप आज भी सरकारी नौकरियों मे 2006-07की कार्मिक विभाग की रिपोर्ट के अनुसार श्रेणी एक और दो में अनुसूचित जातियो का प्रतिशत 11.9 और 13.7 ( कुल 16 .00 ) की तुलना में अनुसूचित जातियों को 4.3 और 4.5 (7.5 की तुलना में ) रहा है।

इन उपेक्षित वर्गों की समस्याओं का आकलन केवल राशन कार्ड,बीपीएल कार्ड, एवं मनरेगा, योजनाओं के संन्दर्भ में होता है। इस का उद्देश्य इन उपेक्षित वर्गों को भीखमंगेपन के स्तर पर रोजाना 20 रूपयें) किसी तरह जिंदा रखना है। इन हालातों के बीच अगर नयी सरकार इन तबकों और क्षेत्र के लिए कुछ करती है तो बेहतर होगा.



उभरते हुए लेखक और ब्लॉग संचालक.







पेट्रोलियम की महंगाई रोकने के सुझाव


जब सरकार रसोई-गैस,डीजल,केरोसिन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के मामले में इन कम्पनियों की ओर से हस्तक्षेप कर सकती है तो इन कम्पनियों के खर्चों को नियन्त्रित करने के लिये हस्तक्षेप क्यों नहीं करती...

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

सरकार जब भी रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाती है, सरकार की ओर से हर बार रटे-रटाये दो तर्क प्रस्तुत करके देश के लोगों को चुप करवाने का प्रयास किया जाता है.पहला तो यह कि कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ गये हैं,जो सरकार के नियन्त्रण में नहीं है. दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को भारी घाटा हो रहा है,इसलिये रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाना सरकार की मजबूरी है.


उसके बाद राष्ट्रीय मीडिया की ओर से हर बार सरकार को बताया जाता है कि यदि सरकार अपने करों को कम कर दे तो रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढने के बजाय घट भी सकती हैं और आंकड़ों के जरिये यह सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को कुल मिलाकर घाटे के बजाय मुनाफा ही हो रहा है, फिर कीमतें बढाने की कहॉं पर जरूरत है.

मीडिया और जागरूक लोगों की ओर से उठाये जाने वाले इन तर्कसंगत सवालों पर सरकार तनिक भी ध्यान नहीं देती है और थोड़े-थोड़े से अन्तराल पर रसोई-गैस,डीजल,केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें लगातार और बेखौफ बढाती ही जा रही है,जिससे आम गरीब लोगों की कमर टूट चुकी है.राजनैतिक दल भी औपचारिक विरोध करके चुप हो जाते हैं.

दूसरी तरफ लोगों में सरकार के इस अत्याचार का संगठित होकर प्रतिकार करने की क्षमता नहीं है.मध्यम एवं उच्च वर्ग जो हर प्रकार से प्रतिकार करने में सक्षम है,वह एक-दो दिन चिल्लाचोट करके चुप हो जाता है.ऐसे में आम-अभावग्रस्त लोगों को इस दिशा में कुछ समाधानकारी मुद्दों को लेकर सड़क पर आने की जरूरत है.कारण कि रसोई गैस एवं केरोसिन की कुल खपत का करीब 40 प्रतिशत व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, जिसके लिये मूलत: इनकी कालाबाजारी जिम्मेदार है, जिसमें सरकार के अफसर भी शामिल हैं.

जाहिर इसकी सजा कालाबाजारी में शामिल माफियाओं-अफसरों को होनीचाहिए,जबकि डीजल, रसोई गैस एवं केरोसिन की कीमतें बढ़ाकर जनता पर सरकार अत्याचार कर रही है.रसोई-गैस,डीजल, केरोसिन   और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों के कर्मचारियों और अफसरों को जिस प्रकार की सुविधा और वेतन दिया जा रहा है,वह उनकी कार्यक्षमता से कई गुना अधिक है,जिसका भार अन्नत:देश की जनता पर ही पड़ता है, जब सरकार रसोई-गैस,डीजल, केरोसिन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के मामले में इन कम्पनियों की ओर से हस्तक्षेप कर सकती है तो इन कम्पनियों के खर्चों को नियन्त्रित करने के लिये हस्तक्षेप क्यों नहीं करती है?

जब भी इस बारे में सरकार के नियन्त्रण की बात की जाती है तो सरकार इसे कम्पनियों का आन्तरिक मामला कहकर पल्ला झाड़ लेती है,जबकि कम्पनियों द्वारा अर्जित धन की बर्बादी के कारण होने वाले घाटे की पूर्ति के लिये सरकार रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के लिये इन कम्पनियों की ओर से जनता पर भार बढाने में कभी भी संकोच नहीं करती है



प्रेसपालिका अख़बार के संपादक और भ्रष्टाचार व् अत्याचार अन्वेषण संस्थान के अध्यक्ष.
 
 
 

Jun 27, 2011

'हिंसा प्रेमी है हमारी सरकार' - पीवी राजगोपाल

भूमि सुधार की मांगों को लेकर 2007 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर से 25 हजार किसान पदयात्रा कर दिल्ली पहुंचे थे,जिसे ‘जनादेश’यात्रा कहा गया। एकता परिषद के बैनर तले हुई जनादेश यात्रा के बाद सरकार ने भूमि सुधारों को सामयिक बनाने के लिए ‘भूमि सुधार परिषद्’ का गठन किया था। हाल ही में एकता परिषद् के अध्यक्ष पीवी राजगोपाल दिल्ली दौरे पर थे। उनसे कई मसलों पर विस्तृत बातचीत हुई थी, पेश है प्रमुख अंश...  

पीवी राजगोपाल से अजय प्रकाश की बातचीत 


कालेधन के खिलाफ दिल्ली में अनशन कर रहे बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों पर  हमला कर सरकार ने आखिर क्या संदेश देना चाहा है?
तानाशाही और धोखे की यह सरकारी नीति बहुत दिन तक कारगर नहीं होगी। अगर देश की जनता लाइन लगाकर सरकारों को बना सकती है तो वह सरकार की चूलें भी हिला सकती है। हमारी सरकार अहमक है और उसे हिंसा पसंद है। पहले सरकार कश्मीरी युवकों को गोली मारती है फिर बात करती है, किसानों पर गोली दागती है फिर मांगें मानती है, उल्फा के युवाओं को तबाह करने के बाद शांतिवार्ता करती है। यहां तक कि अहिंसा में विश्वास  करने वाले संगठनों को सरकार पहले हिंसक घोषित  करती है,फिर वार्ता की तरफ बढ़ती है। हमारी हिंसाप्रेमी सरकार को अपनी जनता के प्रति इस व्यवहार को जितनी जल्दी हो सके बदल लेना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में एकता परिषद् पर माओवादियों से संबंध और उस पर प्रतिबंध की खबरों की क्या सच्चाई है?
यह सरकार के उसी अभियान का हिस्सा है ,जिसके तहत वह अहिंसक संगठनों को हिंसक करार देने पर तुली है। दरअसल, आदिवासी इलाकों के जल, जंगल और जमीन की लूट का निर्णय सरकार कर चुकी है। अब वह सिर्फ लूट के समर्थकों को ही राज्य हितैषी मानती है और बाकियों को दुश्मन। इस लूट के खिलाफ पहला मोर्चा आदिवासियों ने संभाला है इसलिए सरकार के वे सबसे बड़े दुश्मन हैं। सरकार आदिवासियों और उनके संघर्षों के साथ खड़े विभिन्न संगठनों-समूहों को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठी है। सबक सिखाने के लिए वह नक्सलवाद से निपटने के बहाने आदिवासियों के पक्ष में खड़े हो रहे लोगों को नक्सली करार देकर दमन के एक ही डंडे से सबका आसान शिकार कर रही है। आसान इसलिए है कि जिनका नक्सलवाद में विश्वास नहीं है,जो संगठन अहिंसा के रास्ते आदिवासियों की लूट का पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनको भी राज्य नक्सली बताकर आदिवासियों के संघर्षों से अलग कर देना चाहता है। उसी के नतीजे के तौर पर एकता परिषद पर भी प्रतिबंध की खबरें उड़ाई जा रही हैं।

छत्तीसगढ़ में एकता परिषद् पर प्रतिबंध की खबर के बाबत राज्य प्रशासन  से संगठन की कोई बात हो पायी है ?
छत्तीसगढ़ के एक दैनिक में पीयूसीएल के प्रतिबंध लगाने संबंधी समाचार छपा था। उसी में एकता परिषद की गतिविधियों को संदिग्ध और प्रतिबंध लगाये जाने की खबर थी। इस बाबत परिषद के कुछ साथी राज्य के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन  से मिले थे। महानिदेशक ने ऐसी किसी कार्यवाही से इनकार किया और अनभिज्ञता जाहिर की। दरअसल, इसमें मुझे राजनीतिक खेल ज्यादा लगता है।

कैसा राजनीतिक खेल?
छत्तीसगढ़ के ज्यादातर जिलों में एकता परिषद् का मजबूत जनाधार होने के कारण राज्य की भाजपा सरकार और आरएसएस समय-समय पर हमारे खिलाफ दुष्प्रचार  करते रहते हैं। पहले आरएसएस ने एकता परिषद् पर क्रिश्चियन  धर्म फैलाने का आरोप लगाया और अब माओवादियों से संदिग्ध संबंध होने की अफवाह फैला रहे हैं। एकता परिषद् पर यह आरोप दिग्विजयसिंह जब मुख्यमंत्री थे तब भी लगता था, और अब भी लग रहा है। जो मुद्दों से भटकाने की साजिश है। मैंने सभी मंत्रियों को पत्र लिखा कि पुलिस,फॉरेस्ट गॉर्ड कब से माओवाद और समाजवाद के ज्ञाता हो गये,जो सबको माओवादी बताते रहते हैं। मैंने मंत्रियों से पूछा कि क्या इन गार्डों को गांधी दर्शन और माओ दर्शन  का पाठ पढ़ाया गया है।
दरअसल, इन्हें चुनौती हमारे अहिंसात्मह आंदोलन से है, जिसको किसी आसान रास्ते ये किनारे लगा देने की फिराक में हैं। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में जनता को सही राजनीति की तरफ मोड़ना, अधिकारियों को जिम्मेदार बनने के लिए मजबूर करना राजनीतिक पार्टियों के लिए मुख्य खतरा है। वह ऐसे किसी संगठन को जनता के बीच पैठ  नहीं बनाने देना चाहते, जो सही मायने में जनता को लोकतंत्र में भागीदारी के लिए उत्तेजित करे।

कुछ महीनों पहले आपने सरकार और माओवादियों से बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की बात कही थी, क्या सरकार ने कोई दिलचस्पी दिखायी ?
हमने इच्छा इसलिए जाहिर की,क्योंकि चंबल क्षेत्र में डाकुओं को समर्पण कराने का एक अनुभव हमारे पास है। हम जानते हैं कि हिंसा में भरोसा करने वाले संगठनों से कैसे वार्ता की जाये, लेकिन यह वार्ताएं आदिवासी हितों को ताक पर रखकर संभव नहीं हैं। कौन नहीं जानता कि आदिवासी इलाकों में जारी अन्याय,अत्याचार और शोषण को रोककर माओवादियों को पसरने से रोका जा सकता है, मगर सरकार मदद नहीं लेना चाहती क्योंकि वह हिंसा को खत्म नहीं करना चाहती। अगर मैं पत्रकार पी.साईनाथ की किताब के शीर्षक ‘एव्रीबॉडी लव ड्रॉट्स’की तर्ज पर कहूं तो आदिवासी इलाकों में ‘एव्रीवन लव कंफ्लिक्ट’।

मतलब हिंसा को जान-बूझकर कायम रखा जा रहा है?
बिल्कुल। इसका सबसे बड़ा फायदा खनन कंपनियों को है। किसी ने 50एकड़ की लीज ली और खुदाई 100 एकड़ में हो रही है। कौन उसकी तहकीकात करने वाला है? अगर जनता लूट पर ऐतराज करती है तो उसे राज्य माओवादी समर्थक या उनका जासूस बताकर सारी जिम्मेदारी से ही बच जाता है। संघर्ष का इलाका है,सुरक्षा बल और नक्सली एक दूसरे को मार रहे हैं,आदि का बहाना बनाकर सरकारी कर्मचारी कभी सुचारू रूप से काम नहीं करते । जबकि संघर्ष के इन इलाकों में कर्मचारियों को सामान्य क्षेत्रों से अधिक भत्ता मिलता है। तीसरे हैं ठेकदार जो इस इलाके में बहुत खुश हैं। उन्होंने सड़क,पुल,स्कूल बनाये या नहीं, कोई पूछने वाला नहीं है। कहीं से कोई सवाल उठे तो इस क्षेत्र में एक ही जवाब है नक्सली समस्या।
ऐसा नहीं कि माओवादियों को इसमें कोई नुकसान है। राज्य के अत्याचारी रवैये से लगातार उनके कॉडरों की भर्ती हो रही है और उन्हें अवैध खनन से भरपूर टैक्स मिल रहा है। मैं नक्सलियों से पूछना चाहता हूं कि अगर वे हथियार से ही देश की तकदीर बदलने में भरोसा करते हैं तो उन्होंने कभी किसी मित्तल, टाटा या एस्सार जैसों को शिकार क्यों नहीं बनाया? माओवादी अगर खनन के विरोध में हैं तो कभी किसी खनन मालिक और माफिया को क्यों नहीं बंधक बनाते। मेरी राय में आदिवासियों की जीत एक अहिंसक मजबूत आधार वाले जनांदोलन के जरिये ही हो सकती है।

कई बार सरकार जनता के दबाव में कुछ कानून बनाने के लिए तैयार हो भी जाती है, लेकिन उसका अमल कैसे सुनिश्चित हो?
जिन अधिकारियों के कारण क्षेत्र में काम पूरा नहीं हुआ है,जब तक उन्हें सजा देने का कड़ा प्रावधान नहीं होगा, तब तक सही ढंग से कानून के लागू किये जाने की उम्मीद बेमानी है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ को लीजिए। वहां पिछले 63 वर्षों में दस से अधिक आइएएस और आईपीएस मुस्तैद हुए होंगे। उनकी मुस्तैदी के परिणाम के तौर पर सरकार अब स्वीकार करती है कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। फिर इन अधिकारियों की सजा क्यों नहीं है?अगर किसी नौकर के रहते घर में चोरी हो जाये तो माना जाता है कि वह अपने काम के काबिल नहीं है। उसी तर्ज पर इन अधिकारियों की पेंशन क्यों नहीं बंद होती, सस्पेंड क्यों नहीं किये जाते।

ऐसी हालत क्यों है?
आपातकाल के दौर में मेरे यहां केरल में एक नाटक होता था। उसमें राजा का आदेश था कि जब वह सोया हो तो किसी तरह का शोर नहीं होना चाहिए। एक दिन रात में चोर आया तो कुत्ते भोंकने लगे। चूंकि राजा का आदेश शोर नहीं करने का था, इसलिए सभी कारिंदे कुत्तों की ओर दौड़े। चोरों ने इत्मीनान से लूट का सामान बांधा और चलते बने। कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे देश की है। शांति और न्याय की बात करने वाले लोग देश के दुश्मन होते जा रहे हैं और कॉरपोरेट डकैत सरकार के हितैषी बने बैठे हैं।

लेकिन विरोध की ताकत भी तो बहुत बिखरी हुई है?
इसे हम भी शिद्दत से महसूस करते हैं,इसलिए एकता परिषद् की कोशिश है कि छोटे-मोटे अंतरविरोधों को छोड़, व्यापक एकता की ओर बढ़ा जाये।

गरीबों के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई माहौल क्यों नहीं बन पाता है?
गरीबों के बीच असल मुद्दा तो जल,जंगल और जमीन का ही है। मगर ऐसा नहीं है कि गरीबों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर देश में कई संघर्ष हुए हैं,बेशक उसकी व्यापकता अन्ना हजारे के मध्यवर्गीय आंदोलन की तरह नहीं रही है।

तो क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्यवर्ग और गरीब एक मंच पर आ सकते हैं?
पहले आजादी,फिर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के जरिये यहां के मध्यवर्ग ने अपने हिस्से में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाईयां तो लड़ीं,मगर जैसे ही मामला गरीबों के ऊपर किये जा रहे भ्रष्टाचार का आया तो ये बिदक गये। कारण कि गरीबों के लिए पहले भ्रष्टाचारी (ज्यादातर)यही लोग थे, जो अन्ना के साथ संघर्ष में भ्रष्टाचार के  खिलाफ दिख रहे थे।
मध्यवर्ग अपने लिए बेहतर लोकतंत्र चाहता है,लेकिन अपने से नीचे के तबके के लिए वह भी शोषक है। वह क्षणभर भी कोक और पेप्सी या दूसरी कंपनियों के उत्पादन से जुड़े भ्रष्टाचार को, कामगारों पर हो रहे भ्रष्टाचार को नहीं सुनना चाहता। वह नहीं चाहता कि किसान उसको कोल्ड ड्रिंक त्यागने के लिए कहे और बताये कि उसके खेत और पारिस्थिकी कैसे इन कंपनियों ने बर्बाद कर रखे हैं। इसलिए अन्ना के आंदोलन को पूरा समर्थन देते हुए भी एकता परिषद् की कोशिशरहेगी कि मध्यवर्ग और देश के गरीबों को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ खड़ा किया जाये। शुचिता और त्याग की भावना वाले जुझारू युवा ऐसा कर सकते हैं और उसी कीमत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुकम्मल लड़ाई संभव हो सकती है।

क्या यह एकता संभव होगी। खासकर तब जबकि दोनों वर्गों की जरूरतें अलग-अलग हैं?
इस देश के नब्बे फीसदी आंदोलन जल, जंगल, जमीन और जीवन जीने के संसाधनों की मांग को लेकर हैं। ऐसे में जरूरी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली से शुरू हुए आंदोलन को व्यापक पहुंच वाला बनाया जाये और समाज के सभी तबकों को साथ लाया जाये। इस मसले पर तमाम संगठनों की बैठक हुई है और शीघ्र ही अन्ना हजारे के हस्ताक्षर से देशभर के संगठनों को चिट्ठियांजायेंगी और एक राष्ट्रव्यापी बैठक की तैयारी है।

लोकपाल मसौदा समिति में शामिल अन्ना हजारे की टीम को चुनावी पार्टियों ने चुनाव लड़ने की चुनौती दी है, इस बारे में आप क्या कहते हैं?
इस बहस में दम नहीं है। देश का हर आदमी जानता है कि हमारे देश के ज्यादातर जनप्रतिनिधि गुंडई, पैसा और जातिगत आधार पर चुने जाते हैं। दूसरी बात कि अगर चुनावी दल नागरिक समाज के लोगों के लिए चुन के आने की पात्रता की शर्त रखते हैं तो पहला सवाल देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और योजना आयोग की उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहुलवालिया पर उठता है,जो बिना चुने ही इस देश की तकदीर का फैसला कर रहे हैं। ऐसे में मेरी राय है कि जो देश आजादी के 63 साल बाद जनता को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने में अक्षम रहा हो,उस देश के शासकों को जनता की ओर से उठ रहे सवालों पर चिढने और तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाने की बजाय संयत हो समाधान खोजना चाहिए।

छात्र नेता संदीप सिंह को एनएसयूआई के गुंडों ने लातों—जूतों से सरेआम पीटा

जनज्वार. झारखंड की राजधानी रांची में 23 जून को लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को कारगर बताने पहुंचे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को विरोध का सामना करना पड़ा था। विरोध कर रहे संगठन ‘आइसा’ से जुड़े छात्र मांग कर रहे थे कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री के भ्रश्टाचार की जांच को शामिल किया जाये। लेकिन मंत्री साहब के सामने किया गया आइसा का यह विरोध कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को पच नहीं सका और उससे जुड़े छात्रों ने विरोध कर रहे छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर बुरी तरह पीटा। मारपीट में आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संदीप सिंह समेत कई छात्रों को चोट आयी है।

 गौरतलब है कि लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को लेकर अन्ना हजारे की टीम और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच उभरे मतभेद के बाद कांग्रेस ने तय किया है कि उसके नेता और मंत्री जनता में अपने अच्छे और सच्चे लोकपाल के बारे में जनता को जानकारी देंगे। उसी अभियान के तहत रांची के अशोक होटल में मीडिया को संबोधित करने सिब्बल पहुंचे थे, जहां कांग्रेस के राजनीतिक भविश्य एनएसयूआइ ने नागरिक समाज द्वारा तैयार लोकपाल को लागू करने की मांग पर लातों-घूसों से अपना पक्ष रखा।

एनएसयूआइ की गुंडई का यह ‘अहिंसात्मक’ प्रदर्शन  संगठन के प्रदेश अध्यक्ष कुमार राजा और महासचिव शाहनवाज के नेतृत्व में रांची के अशोक होटल के सामने हुआ। एनएसयूआइ के लोग संदीप सिंह के इस बात से खफा थे कि उन्होंने पत्रकार के बतौर कपिल सिब्बल से सवाल पूछ दिया था और मंत्री जी असहज हो गये थे। संदीप सिंह के मुताबिक ‘वह आइसा के राश्ट्रीय अध्यक्ष के साथ समकालीन जनमत नाम की पत्रिका के नियमित लेखक है। इसी हैसियत से उन्होंने जानना चाहा कि ‘सरकार प्रतिदिन टैक्सों में कॉरपोरेट समूहों को 240 करोड़ की छूट क्यों देती है।’

उनके इस सवाल का कपिल सिब्बल जवाब देते उससे पहले ही एनएसयूआइ से जुड़े पांच-छह लोगों ने संदीप को धक्का देना और फिर पहचान पत्र मांगना शुरू कर दिया। पहचान पत्र नहीं दिखा पाने की स्थिति में उनलोगों ने संदीप को धक्का मारकर बाहर कर दिया। पहचान के बावत संदीप ने बताया कि ‘समकालीन जनमत पंजीकृत पत्रिका नहीं है, इसलिए पहचान पत्र जारी नहीं करती।’

कांफ्रेंस हाल से बाहर कर दिये जाने के बाद संदीप अपने साथियों के साथ मिलकर कपिल सिब्बल और कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, जिसका जवाब कांग्रेस के छात्र संगठन ने ‘अहिंसात्मक’ लातों-घूसों से दिया। हालांकि हमलावरों और प्रदर्शनकारियों की संख्या बराबर थी, लेकिन प्रदर्शनकारी टकहराहट में नहीं गये और उन्होंने बचाव करना ही लोकतंत्र के लिए जरूरी समझा।

पहले पत्रकार और फिर छात्र संगठन के नेता के रूप में संदीप ने दोहरी भूमिका क्यों निभायी के बारे में उनकी सफाई है, ‘अगर चिदंबरम्-सिब्बल-अभिषेक  मनु कांग्रेस के नेता और पूंजीपति समूहों के वकील हो सकते हैं तो मैं छात्र नेता और पत्रकार क्यों नहीं हो सकता।’

बहरहाल, आइसा के  अध्यक्ष संदीप सिंह ने कुमार राजा और अन्य के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी है, लेकिन अबतक किसी आरोपी की गिरफ्तारी रांची पुलिस नहीं कर सकी है। सीपीआइएमल की राज्य समिति ने भी बयान जारी कर घटना की भर्त्सना की है और दोषियों की गिरफ्तारी मांग की है। पत्रकार संगठन जेयूसीएस की ओर से जारी विज्ञप्ती में इसे पत्रकार बिरादरी पर हमला बताया गया।

अमेरिकी ‘रडार’ पर अब पाक परमाणु ठिकाने?

एबटाबाद की कार्रवाई में पाकिस्तान ने अपनी क्षमता व चौकसी का जो प्रदर्शन किया था वह भी अमेरिका देख चुका है। एबटाबाद में की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी विरोध के स्वर का स्तर भी अमेरिका भांप चुका है...

तनवीर जाफरी


पाकिस्तान की इस्लामाबाद स्थित सबसे बड़ी सैन्य अकादमी के बिल्कुल निकट एबटाबाद नामक संवेदनशील रिहायशी क्षेत्र में जहां कि कई पूर्व व वर्तमान सैन्य अधिकारियों के बंगले हैं,अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने गत् 1/2मई की रात अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लाडेन को ढूंढ निकाला तथा उसे वहीं मार गिराया।

इस घटना के बाद अमेरिका ने भी पाकिस्तान से यह कहा था कि ‘वह प्रमाणित करे कि ओसामा बिन लाडेन के एबटाबाद में गत् कई वर्षों से छिपे होने की जानकारी पाक सेना को नहीं थी’। ऐसे में अगला सवाल यह उठता है कि क्या ओसामा बिन लाडेन के खात्मे के बाद अब ‘अमेरिकी रडार’पर पाकिस्तान स्थित परमाणु शस्त्र आ चुके हैं?
पिछले दिनों पाकिस्तान में एक आला सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर अली को पाक सेना द्वारा आतंकवादियों व आतंकी संगठनों से संबंध होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया है। ब्रिगेडियर अली का परिवार गत् तीन पुश्तों से पाक सेना की ‘सेवा’करता आ रहा है। अली स्वयं गत् दो वर्षों से रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में तैनात थे।

पाकिस्तानी परमाणु सैन्य केंद्र : कैसे बचे आतंकियों से
ब्रिगेडियर अली की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर पिछले दिनों कराची के नेवल बेस पर हुए पाकिस्तान के अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को लेकर बने उस संदेह की पुष्टि हो जाती है,जिसमें यह कहा जा रहा था कि कराची के अति सुरक्षित नेवल बेस पर इस प्रकार का सुनियोजित आतंकी हमला तथा इसमें लड़ाकू विमानों को नष्ट किए जाने सहित भारी सैन्य सामग्री को नुकसान पहुंचाया जाना आदि बिना किसी भीतरी सहायता या जानकारी के कतई संभव नहीं था।

उधर पाकिस्तान-अफग़ानिस्तान सीमांत क्षेत्र के वज़ीरिस्तान इलाक़े में बढ़ते जा रहे चरमपंथी वर्चस्व को लेकर भी पाकिस्तान दोहरी भूमिका में दिखाई दे रहा है। उत्तरी वज़ीरिस्तान वही इलाक़ा है जहां बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाके तो मौजूद हैं ही इनके साथ ही अलकायदा के लड़ाके भी इस क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं। और इसी क्षेत्र में हक्क़ानी नेटवर्क से जुड़े आतंकी संगठनों का भी पूरा दबदबा है। इसी क्षेत्र में चरमपंथी संगठनों ने नाटो सेना के कई सैन्य काफिलों  पर हमले किए। कई रसद सामग्रियों से भरी कानवाई तबाह कर दी और कई बार इनके तेल डिपो व पार्किंग में खड़े तेल टैंकर व टैंक आदि तबाह कर डाले।
इस क्षेत्र को जहां अमेरिका दुनिया का सबसे अशांत क्षेत्र व आतंकवादियों का सबसे बड़ा केंद्र मान रहा है वहीं पाकिस्तान इसी इलाक़े को शांत व स्थिर क्षेत्र बता रहा है। अब यहां सवाल यही उठता है कि पाकिस्तान उत्तरी वज़ीरिस्तान में इन चरमपंथी संगठनों के विरूद्ध भरपूर ताक़ त इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा है। क्या इसलिए कि पाक सेना इन आतंकी संगठनों से खौफ़ खाती है या फिर इसलिए कि ‘अपनों’के विरूद्ध ऐसी कार्रवाई की पाकिस्तान कोई खास ज़रूरत महसूस नहीं कर रहा है।

 यदि उपरोक्त दोनों ही बातें गलत हैं फिर अमेरिका से चरमपंथी संगठनों के विरूद्ध कार्रवाई के नाम पर धन उगाही किए जाने का आखिर  क्या औचित्य है?हां उत्तरी वज़ीरिस्तान में बड़ी सैन्य कार्रवाई न करने को लेकर पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण बात यह ज़रूर कर रहा है कि ‘पाकिस्तान फ़िलहाल  उत्तरी वजीऱीस्तान में बड़ी सैन्य कार्रवाई करने की जल्दी नहीं महसूस कर रहा है’। पाकिस्तान का कहना है कि वह अपने ‘हितों’को ध्यान में रख कर ही कोई भी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

‘हित’ और ‘अहित’ के इसी परिपेक्ष में अब कयास इस बात के भी लगाए जाने लगे हैं कि अमेरिका अपने दूरगामी हितों के मद्देनज़र क्या पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियारों पर भी अपना नियंत्रण करने की योजना बना रहा है? क्या ओसामा बिन लाडेन जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी के खात्मे के बाद अब ‘अमेरिकी रडार’पर पाकिस्तान स्थित परमाणु शस्त्र आ चुके हैं?

पाकिस्तान में निरंतर बढ़ती जा रही आतंकी हिंसक घटनाएं,वहां सिलसिलेवार हो रहे आत्मघाती हमले,आए दिन किसी वकील,पत्रकार,नेता या अधिकारियों का मारा जाना,सैन्य ठिकानों तथा सुरक्षा संस्थानों को निशाना बनाकर किए जाने वाले चरमपंथी हमले तथा पीरों-फकीरों की दरगाहों पर व मस्जिदों में नमाज़ पढऩे वालों पर होने वाले चरमपंथी हमले अमेरिका को यह सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं कि चरमपंथी ताकतों के बढ़ते हुए यह हौसले कहीं किसी दिन उन्हें इस योग्य न बना दें कि वह पकिस्तान में रखे परमाणु हथियारों पर भी अपना नियंत्रण कर बैठें।

खासतौर पर ऐसी परिस्थितियों में जबकि चरमपंथी पाकिस्तान के सैन्य व सुरक्षा तंत्र के भीतर भी अपनी सेंध लगा चुके हों? इन हालात में यदि अमेरिका आप्रेशन जेरोनिमों की ही तर्ज  पर उससे भी कई गुणा बड़ा कमांडो आप्रेशन कर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने नियंत्रण में लेने तथा पाकिस्तान से अन्यत्र ले जाने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जहां तक पाकिस्तान के प्रतिरोध की क्षमता का प्रश्र है तो दोनों ही देश यानी अमेरिका व पाकिस्तान एक दूसरे की ताकत व एक दूसरे के पास मौजूद हथियारों से भी भली भांति वाकिफ  हैं। एबटाबाद की कार्रवाई में भी पाकिस्तान ने अपनी क्षमता व चौकसी का जो प्रदर्शन किया था वह भी अमेरिका देख चुका है। इतना ही नहीं बल्कि एबटाबाद में की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी विरोध के स्वर का स्तर भी अमेरिका भांप चुका है। इन हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि लाडेन की मौत के बाद अब अमेरिकी ‘रडार’ पर पाक स्थित परमाणु ठिकानों के आने की भी पूरी संभावना है।

लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.


 
 

Jun 26, 2011

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिसिया हमला


जनज्वार.छिंदवाड़ा जिले के अदानी पेंच पावर प्रोजेक्ट द्वारा की गयी मनमानी के खिलाफ आज 26 जून को आयोजित किसान महापंचायत पर पुलिस दमन का कहर बरपा हुआ है। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर बर्बर लाठी चार्ज किये और आंसू गैर के गोले छोड़े। पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बगैर हुए अवैध निर्माण कार्यो को ध्वस्त करने और जमीनें वापस लौटाने की मांग को लेकर किसान संघर्ष समिति की ओर से आज किसानों ने महापंचायत का आयोजन किया था।

किसान महापंचायत में भाग लेने जा रहे किसानों को पुलिस ने धमकाया तथा अलग अलग गांव से गिरफ्तार किया। विरोध में भाग लेने पहुंचे पूर्व विधायक और किसान नेता सुलीलम् को तड़के छिन्दवाडा पुलिस ने रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर शाम को नागपुर रेलवे स्टेशन पर रिहा किया। वहीं किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आराधना भार्गव को पुलिस ने भूलामोहगांव से जबरदस्ती घसीटकर गिरफ्तार किया। उनके साथ मौके पर पूर्व विधायक महेशदत्त मिश्रा भी मौजूद थे।

प्रशासन पर दबाव न बने इसके लिए पुलिस ने 12किसानों को अमरवाडा उपजेल भेज दिया है तो 44 किसान छिन्दवाड़ा जेल में बंद हैं। सुनीलम ने  राज्य सरकार की दमनकारी भूमिका पर आक्रोश  व्यक्त करते हुए कहा है कि 22मई के जानलेवा हमले के बाद किसान संघर्ष  समिति की और से शांतिपूर्ण तरीके से पदयात्रा की गई थी तथा 10हजार किसानों ने छिन्दवाडा पहुंचकर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए जिलाधीश महोदय को ज्ञापन सौंपा था। किसानों का कहना है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन अदानी कम्पनी के एजेन्ट के तौर पर कार्य कर रहा है। जिन लोगों ने किसानों की जमीनों पर अवैधानिक निर्माण कार्य किया है उनकी गिरफ्तारी करने की बजाय किसानों को गिरफ्तार किया जा रहा है।

डॉ0सुनीलम् ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि हर नागरीक को संविधान में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार दिया,लेकिन सरकार संविधान पर कुठाराघात करने पर आमदा है। डॉ0सुनीलम् ने कहा कि जानलेवा हमले,पुलिस की लाठी और गिरफ्तार ने किसानों को आक्रोषित करने का काम किया है। जिसके गंभीर परिणाम सरकार को भुगतने पड सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानिय पुलिस प्रशासन की होगी।

आंदोलनकारियों की अगली रणनीति के मुताबिक 27जून को जनसंगठनों का प्रतिनिधि मण्डल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मुलाकात करेगा और वे 30जून को भोपाल में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात कर किसानों के मानव अधिकार बहाल कराने की मांग करेंगे।