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Mar 31, 2017

अब ओशो का लिखा छापने पर पत्रकार को हुई जेल

पत्रकार दीपक असीम को 12 दिन तक सिर्फ इसलिए जेल की सींखचों के पीछे रहना पड़ा क्योंकि उन्होंने बतौर विज्ञापन अपने अखबार में ओशो की ​चर्चित पुस्तक 'बिन बाती बिन तेल' का एक हिस्सा प्रकाशित कर दिया था.....

प्रेमा नेगी

अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों के बीच प्रसिद्ध भारतीय विचारक—दार्शनिक ओशो का लिखा भी अब पुनर्प्रकाशित करने पर जेल हो जा रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर से निकलने वाले अखबार खजराना लाइव के संपादक दीपक असीम को 12 दिन तक हिंदूवादियों की शिकायत पर सिर्फ इसलिए जेल की सींखचों के पीछे रहना पड़ा क्योंकि उन्होंने बतौर विज्ञापन के रूप में ओशो की ​चर्चित पुस्तक 'बिन बाती बिन तेल' का एक हिस्सा प्रकाशित कर दिया था।

ओशो के लेख का वह हिस्सा जिसके लिए दीपक असीम को जाना पड़ा जेल 
15 मार्च को दीपक असीम की जमानत हुई। उसके बाद उन्होंने सीनियर एडवोकेट आनंदमोहन माथुर के माध्यम से हाईकोर्ट में एक रिट दायर कर पूछा कि किसी पत्रकार के लिखने से शांति भंग कैसे हो सकती है। गौरतलब है कि एसडीएम ने धारा 107—16 में शांति भंग करने का हवाला देते हुए दीपक असीम को नोटिस थमाया था कि क्यों न आपसे 10 हजार रुपए का मुचलका और इतनी ही राशि की जमानत ली जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि आप अगले 6 महीने तक शांति भंग करने वाला कोई काम नहीं करेंगे।  

इंदौर के स्थानीय अखबार खजराना लाइव के 27 फरवरी के अंक में ओशो द्वारा लिखित एक लेख प्रकाशित हुआ। जिसके लिए दीपक असीम के खिलाफ धारा 295—ए के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया। प्रकाशित लेख में शिवपुराण के हवाले से ओशो ने शिव—पार्वती के बीच संभोग का वर्णन किया है। वर्णन में खास बात यह है कि शिव और पार्वती संभोग में इस कदर लिप्त होते हैं कि उनसे मिलने आए ब्रह्मा और विष्णु का वह गौर ही नहीं कर पाते। ओशो ने इस कथा में संभोग और समाधि के बीच एक तारतम्य बैठाने की कोशिश की है।

दीपक असीम कहते हैं, ''अखबार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हम विज्ञापन के रूप में ओशो के प्रवचन छापते हैं। प्रवचन जिस स्पेस में छपता है उसका भुगतान जयदेव भट्ट अपने दादा स्वर्गीय भालचंद जी भट्ट की याद में करते हैं। इस बात का डिस्कलेमर भी हम अखबार के हर अंक में छापते हैं। 

दीपक असीम ने कहा, ''ओशो की किताब 'बिना बाती बिन तेल' का अंश अपने अखबार में प्रकाशित करने के बाद जब हिंदुवादियों ने विरोध किया तो मैंने माफी मांग ली। न सिर्फ माफी मांगी बल्कि लिखित तौर पर पूरी सफाई अखबार में भी प्रकाशित की। बावजूद मुझे 3 से 16 मार्च तक जेल में रहना पड़ा। इसका कारण मैं अपनी शादी एक ​मुस्लिम लड़की से होना मानता हूं। हिंदू संगठनों के लोग मानकर चलते हैं कि मैंने मुस्लिम धर्म ज्वाइन कर लिया है, जबकि यह सच नहीं है। जिस तरह यह सच नहीं है कि मैंने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए कोई लेख प्रकाशित किया है। मुझे बताया गया है कि ओशो ने अपनी पुस्तक 'बिना बाती बिन तेल' में उस किस्से का जिक्र प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक ग्रंथ 'शिवपुराण' से साभार किया है। ऐसे में मेरा मुस्लिम लड़की से शादी करना न होता तो ऐसा क्यों होता कि पहले से प्रकाशित, फिर पुनर्प्रकाशित को छापने के जुर्म में मुझे जेल क्यों जाना पड़ता।''

लेख पर माफ़ी मांगने के बावजूद नहीं मिली राहत 
मीडिया की भूमिका

दीपक असीम की गिरफ्तारी को लेकर ज्यादातर हिंंदी के बड़े अखबारों ने अभियोजन पक्ष, पुलिस और हिंदूवादियों का बयान छापा।  प्रभात किरण नाम के अखबार को छोड़ बाकी किसी भी अखबार ने दीपक असीम की गलत गिरफ्तारी का विरोध नहीं किया। न ही यह सवाल उठाया किएक पौराणिक कहानी जो कि शताब्दियों पहले से शिवपुराण में प्रकाशित है, उसके सैकड़ों भाष्य हैं और उनका पुनर्भाष्य है फिर भी असीम दीपक को क्यों गिरफ्तार किया गया।

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने दीपक असीम का पक्ष रखा, वहीं दैनिक भास्कर के प्रसिद्ध और चर्चित स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे ने भी दीपक असीम का अपने कॉलम में जिक्र करते हुए बचाव किया।

मीडिया की भूमिका पर दीपक असीम कहते हैं, ''अधिकांश पत्रकार इस मामले में खामोश रहे, लेकिन कुछ लोग थे जो साथ खड़े रहे। आनंदमोहन माथुर और सारिका जैसे लोगों के सहयोग के बिना जमानत तक मुश्किल थी। इनके साथ ही अभय नेमा, संजय वर्मा, अवधेश प्रताप सिंह, विनीत तिवारी और कुछ अन्य लोग भी 12 दिनों तक मेरी रिहाई की अनवरत कोशिश में लगे रहे। कुछ प्रगतिशील संगठन भी साथ रहे।'' 

Jun 29, 2011

छोटे नाटक की लंबी कहानी

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के 150वें जन्मवर्ष पर तोता-कहानी का मंचन
सौ बरसों से भी पहले की लिखी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी में ये ज़रूर जोड़ा गया कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा व्यवस्था की इस विसंगति पर प्रहार करके ही नहीं छोड़ दिया बल्कि सही में शिक्षा कैसी होनी चाहिए, ये विश्वभारती और शांतिनिकेतन की स्थापना करके बताया...

विनीत तिवारी

इन्दौर। रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित ”तोता कहानी“ शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों को उजागर करती है। मुश्किल से दो पेज की ये कहानी मशहूर शिक्षाशास्त्री पाउलो फ्रेयरे की शिक्षा संबंधी अवधारणाओं का एक सरल कहानी में रूपांतरण है। फ्रेयरे के मुताबिक शिक्षा की प्रक्रिया में विद्यार्थी को गुल्लक या बैंक समझकर उसके भीतर ज्ञान ठूँसा या जमा किया जाता है, जबकि विद्यार्थी एक जीवंत इकाई है। वो हासिल ज्ञान को सँवार-सुधार या खारिज कर सकता है। कहानी में राजा एक तोते को पढ़ा-लिखाकर बड़ा विद्वान बनाने की सनक का शिकार हो जाता है और उसके लिए बेहतरीन सोने का पिंजरा बनाने से लेकर महापंडितों तक का प्रबंध किया जाता है।

उन्मुक्त, स्वच्छंद उड़ने वाला तोता सोने के पिंजरे के पीछे किताबों के ढेर में दब जाता है। राजा कुछ समय बाद निरीक्षण कर देखता है कि अब तोता टें-टें-टें नहीं करता, उड़ने के लिए फड़फड़ाता नहीं, तो वो सोचता है कि ज्ञान ने इसे सभ्य व सुसंस्कृत बना दिया है लेकिन हक़ीक़त ये होती है कि तोता कुछ सीखा नहीं होता। उल्टे वो सब भूल गया होता है जो उसे पहले आता था - प्रकृति से प्रेम, आकाश में उड़ान, अपनी जुबान, जो भी उसका अपना सहज था, वो सब।

सौ बरसों से भी पहले की लिखी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी में ये ज़रूर जोड़ा गया कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा व्यवस्था की इस विसंगति पर प्रहार करके ही नहीं छोड़ दिया बल्कि सही में शिक्षा कैसी होनी चाहिए, ये विश्वभारती और शांतिनिकेतन की स्थापना करके बताया। नाटक के हिस्से के तौर पर शांतिनिकेतन के बारे में जानकारी देने में नाटक की पकड़ ढीली पड़ने का रिस्क था लेकिन पोस्टरों और कविता के माध्यम का खूबसूरत इस्तेमाल करते हुए तथा दर्शकों में वैकल्पिक शिक्षा को जानने की उत्सुकता के पलों को समझते हुए ये हिस्सा भी काफी रोचक रहा।

पढ़ते हैं बच्चे जहाँ पेड़ों के नीचे
गिलहरी भी उनकी कक्षा में बैठ जाती है पीछे
आम की कैरी टपकती है उत्पल के सर पर
टीचर के पीछे उड़ती है तितली फरफर
ऐसी शिक्षा में लगता है बच्चों का मन
कहते हैं उस जगह को शांतिनिकेतन।

14 जून 2011 को हुए इस नाटक का निर्देशन सारिका श्रीवास्तव ने किया। पटकथा लेखन एवं निर्देशन में डॉ. जया मेहता एवं विनीत तिवारी ने सहयोग किया। संगीत दिया अभिनय करने वाले बच्चों में से ही एक राज ने। नाटक में सूत्रधार जैसी भूमिका में बोलती क़िताब बनकर आयी महिमा, नाटक के मुक्ष्य क़िरदार तोते की भूमिका में पीयूष ने और तोते को पढ़ाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रकाण्ड विद्वानों की भूमिका में अमन, खुशी और सुनीता को काफी सराहना मिली। गुलरेज़, सुलभा, रुचिता, शारदा मोरे, अरविंद बौरासी, अशोक दुबे, प्रमोद बागड़ी, आस्था तिवारी, विनीता हेमनानी ने मंच के पीछे की जिम्मेदारियाँ निभाईं।

शिविर के दौरान ही रोशन नायर ने एक तरफ़ बच्चों को डान्स करना और शरीर के अंगों की हिचक खोलना सिखाया तो दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा, फुकुशिमा, चेर्नोबिल और जैतापुर जैसे मसलों को आसान तरह से बच्चों की उत्सुकताओं में शरीक कर दिया। दिल्ली से आये प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने बच्चों को 21 मई 2011 को बगैर चित्रकारी सीखे बड़े ही आसान और सरल तरीके से पोस्टर बनाने सिखाये, जिसमें बच्चों ने बहुत सारे पोस्टर बनाये।


उसके पूर्व 20 अप्रैल को जैतापुर व चेर्नोबिल के संबंध में बच्चों को जानकारी दी गई जिसके आधार पर उन्होंने परमाणु विनाश के विषय पर अनेक पोस्टर बनाये।पंखुरी मिश्रा ने बच्चों एवं उनके अभिभावकों को शिक्षा अधिकार अधिनियम की जानकारी दी और बच्चों के भविष्य के लिए इस कानून का इस्तेमाल करने की अपील की। अशोक दुबे ने बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए याद्दाश्त बढ़ाने एवं आवाज़ में भाव-प्रवणता लाने के व्यायाम बताए और इस रंगशाला को ”मस्ती के मस्तानों की पाठशाला“ का नाम दिया। बच्चों के शिविर के दौरान बनाये गए पोस्टर भी इस मौक़े पर प्रदर्शित भी किये गए।

नवीन माध्यमिक शासकीय विद्यालय, मोतीलाल की चाल के हेडमास्टर श्री ओ.पी.मोहनिया और श्री चंद्रप्रकाश महावर, प्रभारी, जनशिक्षा केंद्र, नेहरू नगर ने इस कार्यशाला हेतु विद्यालय का हॉल उपलब्ध करवा कर सहयोग प्रदान किया।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि कॉमरेड पेरीन दाजी व इकाई अध्यक्ष श्री विजय दलाल ने शिविर के सफल संचालन के लिए बच्चों और सारिका को बधाई दी और सभी बच्चों को इप्टा के शिविर के प्रमाण-पत्र वितरित किये।