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Jul 19, 2011

जीतन मरांडी रिहाई मोर्चा में शामिल हों !



रांची.वो जो कल तक आम लोगों के बीच मेहनतकश समुदाय के दुःख-दर्द और उनकी जिन्दगी के जद्दो-जहद को अपना सांस्कृतिक स्वर देता था............ खेत-खलिहान, कारखाने-खदान से लेकर गांव, देहात, कस्बों, शहरों में अपनी सांस्कृतिक मण्डली के साथ घूम-घूमकर, पतनशील व मानव विरोधी संस्कृति के बरखिलाफ जन संस्कृति के गीत गाता है.............जल-जंगल-जमीन तथा जीवन पर अधिकार के लिए हूल-उलगुलान के सपनों को शोषित-वंचित आदिवासी एवं मेहनतकश जन समुदाय के बीच जगाता रहा तथा लूट-झूठ की सत्ता से हताश, निराश और परेशान दिलों में अपनी धन-धरती पर अधिकार और मर्यादापूर्ण जीवन के लिए परिवर्तन का जोश भरता रहा ...........और रात के विरुद्ध प्रात के लिए, भूख के विरुद्ध भात के लिए नये राज-समाज गढ़ने के अभियान में चेतना का संगीत सजाता रहा .........उस जन कलाकार जीतन मरांडी को झूठे केस में फंसाकर कलाकर से कातिल ठहराया गया और फांसी का हुक्म सुनाया गया।

जीतन मरांडी ने अपसंस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृति के लिए सदैव मांदर, ढोल, नगाड़ा, बांसुरी और कलम-कूची को अपना हथियार बनाया,लेकिन उसे झूठे गवाहों के बल पर उग्रवादी साबित किया गया। एक जन कलाकार के रूप में उसने संस्कृतिकर्म की वही राह अपनायी जिसे कबीर, भारतेन्दू हरिश्चन्द्र से लेकर मुंशी प्रेमचन्द और नागार्जुन की रचना-सांस्कृतिक परम्परा ने दिखलायी। वही संकल्प रखा जिसे सिद्धू-कानू, बिरसा मुण्डा और भगत सिंह के आदर्शों ने सिखलाया। जो यही काली ताकतों को नहीं भाया। प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने वर्षों पूर्व लिखा था -

“भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की”

आज जीतन मरांडी के साथ यही चरितार्थ हो रहा है। उसने देश की सम्प्रभुता-स्वतंत्रता और लोकतंत्र का अपहरण करनेवाली शासन-व्यवस्था और सत्ता-संस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृतिकर्म की मशाल जलायी। आईये,जन कलाकार जीतन मरांडी को सही न्याय दिलाने तथा उसे फांसी की सजा से मुक्त कराने के जन अभियान में हर स्तर पर सक्रिय भूमिका में हम सब आगे आयें!

विभिन्न जनान्दोलनों में सक्रिय रहने वाले जनकलाकार जीतन मरांडी पर यों तो कई झूठे मुकदमे सरकार-प्रशासन द्वारा पहले ही लादे जाते रहे हैं। 2008 में गिरिडीह जिले के चिलखारी जनसंहार कांड के प्रमुख अभियुक्तों में स्थानीय प्रशासन व भ्रष्ट राजनेता-बिचौलियों ने साजिश कर जीतन मरांडी को फंसा दिया। 2009 में रांची से जीतन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। गिरीडीह की निचली अदालत में एकतरफा एवं झूठी गवाही दिलवाकर 23जून 2011 को फांसी की सजा सुनायी गयी। चूंकि जीतन मरांडी झारखण्ड में कोरपोरेट लूट और झूठ की सरकारों की जन विरोधी नीतियों संघर्ष की सांस्कृतिक आवाज बुलंद करते थे और ग्रामीण-आदिवासी जनता में लोकप्रिय थे। इसलिए वे लूट-झूठ की शक्तियों की आंखों की किरकिरी बन गये थे।



निवेदक
जन कलाकार जीतन रिहाई मंच
अनिल अंशुमन, संयोजक
प्रचारित-प्रसारित: झारखण्ड जन संस्कृति मंच, संपर्क: 09939081850, anshuman.anil@gmail.com

Jun 29, 2011

क्यों दी गयी जीतन मरांडी को फांसी ?


झारखंड की गिरीडिह अदालत ने हाल ही में चिलखारी हत्याकांड मामले में जिन चार लोगों को फांसी की सजा मुकर्रर की है,उनमें राज्य के लोक कलाकार जीतन मरांडी भी हैं। जीतन मरांडी क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ)के सदस्य हैं। आरडीएफ के सचिव राजकिशोर और साईंबाबा की ओर से जीतन मरांडी की गिरफ्तारी पर जारी प्रेस विज्ञप्ती...

लोक कलाकार जीतन मरांडी को गिरडीह की निचली अदालत ने चिलखारी केस में दोषी  करार देकर फांसी की सजा दे दी। 27 अक्तुबर 2007 को चिलखारी में झारखंड़ के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे की अनुप मरांड़ी सहित 19 लोगों की गोली लगने से मौत हुई थी। इस केस में जीतन मरांडी को जानबुझ कर फंसाया गया है क्योंकि एक जन कलाकार के रूप में जीतन मरांडी अपने संगठन झारखंड एभेन और क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा के जरिए राज्य की जनविरोधी नीतियों और दमनात्मक कार्यवाहियों की खिलाफत करता था।

वह विस्थापन, कारपोरेट लूट और राजकीय दमन के खिलाफत गीतों, नाटकों और लेखन के माध्यम से कर रहा था। सार्वजनिक मंचों पर इन गीतों के माध्यम से वह जन जागरूकता फैलाने के कारण सरकार की जनविरोधी की खिलाफत के कारण जीतन मरांडी कई बार जेल गया है। उसके ललकारते स्वर को रोकने के लिए इस बार उसे चिलखारी केस में फंसा दिया क्योंकि उसने प्रभात खबर में तीन कड़ियों में छपे लेख में झारखंड़ के नक्सलवादी आन्दोलन के कारणों को खंगालते हुएराज्य की जनविरोधी भूमिका और जनता के नक्सलवादियों से लगाव का खुलासा किया था। 5 अप्रैल 2008 को इस लेख की अन्तिम कड़ी छपते ही उसे रांची पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया जब वह रातू रोड़ में विस्थापन विरोधी जनविकास आन्दोलन की राज्य परिषद् की बैठक के बाद अपने घर लौट रहा था।

जीतन मरांडी पर सरकार ने पहले राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया जिसमें आरोप लगाया कि 1 अक्तुबर 2007को रांची में राज्यपाल भवन की समक्ष हुई राजनैतिक बंदी रिहाई रैली में उसने सरकार के खिलाफ उकसाउ भाषण दिया था। इसके बाद उसपर मानों केस लादने का सिलसिला सा शुरू कर दिया गया। चिलखारी केस के अलावा थाना गांव के दो केस,पीरटांड थाने में एक केस और तिसरी थाने में दो केस भी उस पर लाद दिए।

गौरतलब है कि पीरटांड और तिसरी थाने में दर्ज केस के दौरान तो जीतन मरांडी अलग-अलग केसों के सिलसिले में जेल में था। इससे सरकार की जीतन की आवाज को चुप कराने की मंशा को साफ हो जाती है। चिलखारी केस में भी पुलिस अधिकारियों ने पहले जीतन मरांडी के होने की सम्भावना से इन्कार किया था। चिलखारी घटना की रिपोर्ट करते हुए प्रभात खबर अखबार ने जीतन मरांडी को आरोपी ठहराते हुए उसकी तस्वीर प्रथम पृष्ठ पर छाप दी थी। बाद में प्रभात खबर के सम्पादक ने जीतन मरांडी से इस गलती की सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी।

उसी दौरान पुलिस उच्चाधिकारियों ने भी बयान दिया था कि चिलखारी केस का आरोपी जीतन मरांडी सांस्कृतिककर्मी जीतन मरांडी नहीं है बल्कि माओवादी कमांडर जीतन मरांडी है। परन्तु बाद में पुलिस ने सांस्कृतिक जीतन मरांडी और माओवादी कमांडर जीतन मरांडी दोनों को ही चिलखारी घटना में आरोपी बना दिया। सांस्कृतिक जीतन मरांडी को घटना में आरोपी बनाने के लिए तीन नए गवाहों को शामिल कर लिया। इस तरह जीतन मरांडी को फंसाने की साजिश रची गई।

चौबीस  मार्च 2009 को जीतन मरांडी को चिलखारी केस की सैशन कोर्ट की पेशी में लाया गया था। जब जीतन मरांडी सैशन हाजत में अन्य बन्दियों के साथ बैठा था तो एक आदमी,जो खुद को गिरिडीह टाउन थाना प्रभारी बता रहा था,उससे आकर मिला और बाद में चला गया। बाद में सिपाही ने जीतन को जबरन अकेले ही सैशन हाजत से बाहर निकाला और उसे सैशन कोर्ट में ले गया। सैशन हाजत से निकलते ही गिरिडीह टाउन थाना प्रभारी ने वहां खड़े लोगों को कहा कि यह जीतन मरांडी है,इसे पहचान लो। बाद में सभी लोग जीतन के पीछे-पीछे सैशन कोर्ट तक गए। सैशन कोर्ट में जीतन मरांडी को बगैर हाजिरी के दस्तखत करवाए ही वापिस लौटाने की कोशिश की जिसपर जीतन मरांडी ने ऐतराज भी जताया।

दरअसल पुलिस ने केस जिन गवाहों को जीतन मरांडी की पहचान करवा दी थी, उन्होनें ही बाद में जीतन मरांडी के घटना स्थल पर मौजूद होने की गवाही दी। जीतन मरांडी ने उपरोक्त घटना के बारे में न्यायालय को अवगत भी करवाया था।

गौरतलब है कि इन गवाहों में चिलखारी केस के मृतकों के परिवार का एक भी सदस्य नहीं हैं। सभी बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के कार्यकर्ता हैं। इन्ही गवाहों के बयान के आधार पर निचली अदालत ने जीतन मरांडी को फांसी की सजा दे दी। जीतन मरांडी की सजा भारत के अपराधिक न्याय प्रणाली के सरकार और पुलिस की कठपुतली होने का पर्दाफाश करती है जो सरकार के विचार से असहमत लोगों को,अन्याय के खिलाफ और जनहित में आवाज उठाने वाले लोगों को खासकर भारत के सर्वाधिक शोषित और उत्पीड़ित आदिवासीयों,दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को फांसी की सजा देती है।

चिलखारी केस में फांसी की सजा पाने वाले जीतन मरांडी,मनोज रजवार,छत्रापति मंड़ल और अनिल राम भी आदिवासी,दलित और पिछड़े जातियों के अत्यन्त गरीब परिवारों से हैं। न्यायिक प्रक्रिया और आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरूपयोग कर जीतन मरांडी को दिलवाई गई फांसी की सजा दिलवाने के केस भारत में कोई नई बात नहीं है। इससे पहले आंध्र प्रदेश के क्रान्तिकारी नेता किस्ता गौड़ और भूमैया को भी फांसी की सजा दी गई थी। बारा केस में पांच लोगों को फांसी की सजा दे दी।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भगवती ने माना है कि ‘कई बार पुलिस गवाहों को तैयार करती है ताकि पुलिस की विचार को सही प्रमाणित किया जा सके।’इसी केस में उच्चतम न्यायालय ने प्रावधान किया था कि फांसी की सजा ‘दुर्लभतम से दुर्लभ' केस में दी जाए। इस निर्णय के बावजूद भारत की न्यायायिक प्रणाली में मौत की सजा रेवडियों की तरह बांटी जा रही है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2006 से 2007 के दौरान कम से कम 140 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी। विश्व के 139 देश फांसी की सजा समाप्त कर चुके हैं। परन्तु विश्व के सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने का दावा करने वाली सरकार फांसी की सजा को खत्म करने को तैयार नहीं है क्योंकि वह फांसी की सजा का सर्वाधिक प्रयोग आन्दोलनकारियों और समाज परिवर्तन का सपना देखने वाले लोगों की आवाज चुप कराने के लिए करती है ताकि वह शोषण और लूट कायम करने के लिए बनाई जा रही नीतियों को बगैर विरोध के लागू कर सके।

क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा मांग करता है कि जीतन मरांडी सहित अन्य लोगों की फांसी की सजा तुरन्त रद्द की जाए तथा उन्हें बाइज्जत बरी किया जाए। जीतन मंराड़ी के खिलाफ साजिश करने वाले राजनैतिज्ञों,पुलिस अधिकारियों को सजा दी जाए। फांसी की सजा खत्म किया जाए। मोर्चा सभी प्रबुद्ध लोगों, जनतांत्रिक संगठनों से अपील करता है कि जीतन को न्याय दिलाने की लड़ाई को तेज करने के लिए एकजुट हो।


 

Jun 26, 2011

झारखण्ड में कलाकार को फांसी


जनज्वार.झारखण्ड के गिरिडीह जिले की अदालत ने चिलखारी हत्याकांड मामले में 23जून को चार माओवादियों को फांसी की सजा सुनाई है.झारखण्ड के इतिहास में यह पहली बार है कि माओवादियों को किसी मामले में फांसी की सजा हुई है. सजायाफ्ता लोगों में मनोज रजवार, छत्रपति मंडल, अनिल राम और जीतन मरांडी हैं, जिनमें जीतन मरांडी झारखंड के प्रसिद्ध प्रगतिशील लोक कलाकार हैं.

चिलखारी में 26अक्टूबर 2007 को हुई गोलीबारी में 19 लोगों की जान गई थी. मृतकों में झारखण्ड के  पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का बेटा अनूप भी था.माओवादियों ने यह हमला तब किया था जब वहां एक रंगारंग  कार्यक्रम चल रहा था.इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ़ द  रेयर मानते हुए  जिला और सत्र न्यायधीश इन्द्रदेव मिश्र ने सजा सुनाई है.  हालाँकि अदालत के इस फैसले का झारखंड में व्यापक विरोध हो रहा है.फांसी की सजा के विरोध में झारखण्ड के कई जेलों में बंद कैदी भी हैं और वे  आमरण अनशन कर रहे हैं.

बायीं  ओर जीतन और उनकी पत्नी : एक नए विनायक  
 जीतन मरांडी के खिलाफ हुए फैसले के बारे में झारखण्ड बचाओ आन्दोलन और पीयूसीएल का कहना है कि जीतन को फर्जी तरीके से फंसाया गया है.  संगठन के मुताबिक संदिग्धों में एक जीतन मरांडी था, जो फरार होने में सफल रहा. पुलिस उसे पकड़ने में अब तक नाकाम रही है और हमारे संगठन के मानवअधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी को इस मामले में अभियुक्त बना दिया,जबकि हत्याकांड के वक्त वह गांव में नहीं थे.संगठन का दावा है कि पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी के खिलाफ फर्जी गवाह पेश कर उन्हें मौत की सजा दिलाने में सफल रही है. 

संगठन की जारी विज्ञप्ति के मुताबिक  जीतन मरांडी नक्सलवादी नहीं है,वे एक सांस्कृतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. जीतन मरांडी एक प्रतिभाशाली कलाकार है, वे संगीत बनाते है, गीत लिखते है,और नुक्कड़ नाटक करते है.वे अपनी कला का इस्तेमाल गिरिडीह जिले के गावों में लोगो का मनोरंजन करने और उनकी जीवन की समस्यों के बारे में उन्हें जागरूक करने में करते है.ऐसे में जाहिर है कि वहां के प्रशासन और पुलिस के लिए वे एक खतरनाक व्यक्ति थे और वे उन्हें सबक सिखाने का मौका तलाश रहे थे.

झारखण्ड बचाओ आन्दोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि 'पुलिस ने हत्याकांड में शामिल असली जीतन मरांडी को पकड़ने का किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया.उनके लिए हमारे साथी को पकडना और उसे आरोपी बताना बहुत आसान था.पुलिस के लिए तथा कथित ‘गवाह को पेश करना कोई बड़ी बात नहीं थी जो अदालत में कबूल करते कि उन्होंने मरांडी को हत्याकांड की जगह देखा था और कोर्ट के लिए ये तथा कथित  गवाह सजा मुकर्रर  करने के लिए काफी थे.

वो सुबह कभी तो आएगी

जैसे ही कोर्ट ने सजा दी मरांडी ने कोर्ट परिसर में जोर जोर से ‘वो सुबह कभी तो आएगी’गीत गाना शरू कर दिया.जीतन की पत्नी अपर्णा ने भी 2साल के अपने बच्चे को गोद में उठाये हुए उनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिला दी.इस सजा के पीछे की कहानी एक राजनीतिक षड़यंत्र है जो पूर्व मुख्य मंत्री की पार्टी के नेताओं और पुलिस की मिलीभगत में रचा गया है ताकि जनता को डरा कर चुपचाप दमन सहते रहने को मजबूर किया जा सके.

 कोर्ट में जतीन ने घोषणा की कि वे इस सजा के खिलाफ अपील करेंगे. कोर्ट से बाहर  उनकी बीबी अपर्णा ने भी इस बात की पुष्टि की.अपर्णा के कहा कि वह न केवल उच्च न्यायालय  में बल्कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में भी सजा के खिलाफ अपील करेंगी.