Nov 9, 2016

पहले कालेधन को समझिए फिर फैसले पर उछलिए

विस्तार से जानिए क्यों मोदी ने क्यों उठाए होंगे कदम। पढ़िए युवा पत्रकार महेंद्र मिश्र का बिंदुवार विश्लेषण

बाजार से 500 और 1000 के नोटों को वापस लेने का फैसला स्वागत योग्य है। पहली नजर में इसमें फायदा होता जरूर दिख रहा है। लेकिन एक तरह का अतिरेक भी है कि काला धन सिर्फ 500 और 1000 के नोटों के रूप में है। यह मानना कालेधन को नहीं समझने जैसा है।

देश में काले धन का बड़ा हिस्सा अब रीयल स्टेट, जमीन, सोना और बेनामी संपत्तियों के तौर पर है। कारपोरेट, नौकरशाह और राजनेताओं के बड़े हिस्से का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। अगर कुछ देश में है तो वो कैश की जगह दूसरी संपत्तियों के रूप में है। एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंकों का धन को विदेशी खातों में जमा करने में सहयोग का पहले ही खुलासा हो चुका है।

अगर नोटों के बदलने से काला धन समाप्त होता तो यह प्रयोग एक नहीं दो बार हो चुका है। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने 500, 1000, पांच हजार और 10 हजार के नोटों को बंद करने का काम किया था। लेकिन उसका क्या नतीजा निकला? क्या उससे भ्रष्टाचार रुक गया या फिर कालाधन खत्म हो गया?

यूपीए के शासन के दौरान भी 500 के नोटों में बदलाव किया गया था। हां उसके लिए इतना हो-हल्ला नहीं मचाया गया। इस मामले में भी बताया जा रहा है कि 500 और 1000 के नोटों को बदलने की तैयारी रिजर्व बैंक ने चार साल पहले ही शुरू कर दी थी। और अब जब उसका काम पूरा हो गया और उसे लागू करने का समय आया तो मोदी जी ने उसे इंवेट में बदल दिया, जिसके वो माहिर खिलाड़ी हैं। यूपीए के शासन में इस तरह के फैसलों की घोषणा रिजर्व बैंक के गर्वनर करते थे। यहां गर्वनर की बात तो दूर वित्तमंत्री तक कहीं नहीं दिखे। सारा श्रेय मोदी लेने सामने आ गए।

फैसले का बड़ा असर परंपरागत व्यवसायियों पर पड़ेगा जिन्होंने अपने घरों या ठिकानों में नोटों की गड्डियां जमा कर रखी थीं। लेकिन उससे ज्यादा मार उस हिस्से पर पड़ेगा जो अभी भी बैंक की पहुंच से दूर है। या उसका किसी बैंक में कोई खाता नहीं है। रकम के तौर पर उसके पास बड़ी नोटे हैं। उसके लिए जिंदगी उजड़ने जैसी बात है। बाकी आम जनता के लिए अगले आने वाले कई महीने दुश्वारियों से भरे होंगे। जिनको अपने रोजमर्रा के जीवन में इसके चलते तमाम संकटों का सामना करना पड़ेगा।

लिक्विड मनी या फिर कैश के तौर पर पैसे की कमी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों इसके बड़े हिस्से का निवेश रियल स्टेट और नये चैनलों में हुआ था। लेकिन ये दोनों सेक्टर भी अब संकट के दौर से गुजर रहे हैं। उनमें मंदी है। यानी बाजार में लिक्विड मनी है ही नहीं। अगर बिल्डरों के पास पैसा होता तो वो निर्माण की प्रक्रिया जारी रखते और ब्लैक मनी रखने वाले भी फ्लैटों की बेनामी खरीदारी कर रहे होते।

समझने की बात यह है कि इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा नुकसान उस हिस्से की होने की आशंका है जो अभी तक बीजेपी का परंपरागत आधार रहा है। यानी देश का वैश्य समुदाय। लेकिन पूरे कारपोरेट क्लास की मोदी के पक्ष में गोलबंदी ने इस घाटे की भरपाई कर दी है। और मोदी जी को पता है कि देश की हवा के रुख को मोड़ने में कारपोरेट सक्षम है। ऐसे में भविष्य के एक बड़े लाभ के लिए छोटी कुर्बानी कोई मायने नहीं रखती है।

अगर तात्कालिक लाभ के तौर पर देखा जाए। तो उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनावों में बीजेपी को इसका फायदा हो सकता है। दरअसल तमाम दूसरी पार्टियां जो कारपोरेट फंडिंग से ज्यादा स्थानीय कैश और छोटे व्यापारियों की सहायता पर निर्भर होती हैं। उनके लिए बड़ा संकट खड़ा होने जा रहा है। जबकि बीजेपी ने या तो इसकी पहले से तैयार कर रखी है। या फिर किसी लिक्विड कैश की जरूरत से ज्यादा उसे कारपोरेट का सहयोग हासिल है। अडानी और अंबानी के हेलीकाप्टर और जहाज उनकी सेवा में होंगे। और पैसे के लिहाज से भी उनकी एक नेटवर्किंग है। जो धन को गंतव्य स्थानों तक पहुंचाने का काम करेंगे।

नरेंद्र मोदी अगर सचमुच में गंभीर होते तो उनके पास विदेशी बैंकों के खाताधारकों की सूची है और उनके खिलाफ सीधे कार्रवाई कर उस रकम को वापस लाया जा सकता है। लेकिन वो हिस्सा कारपोरेट का है या फिर उनके अपने सबसे ज्यादा करीबियों का। इसलिए सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है।

ऊपर से 2000 के नोट जारी करने की बात कुछ समझ में नहीं आयी। इससे अगर ब्लैक मनी के बनने के स्रोत बने रहे तो फिर जितना पैसा किसी शख्स ने 20 सालों में बनाया होगा उतना अगले चार सालों में बना लेगा। यानी कालाधनधारियों के लिए एक नई संभावना भी खोल दी गई है। ऐसे में पूरी कवायद का नतीजा ढाक के तीन पात सरीखा होगा। तात्कालिक तौर पर भले ही इसमें वाहवाही मिल जाए लेकिन आखिरी तौर पर यही आशंका है कि यह एक और एक और जुमला न साबित हो।

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तुगलकी फैसला पर स्वागतयोग्य

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं।


तरुण शर्मा  


मंगलवार की शाम प्रधानमंत्री मोदी जब सेना के तीनों प्रमुखों के साथ बैठे तो एकबारगी लगा कि ये बेमौसम बरसात क्यों? मुल्क पर ऐसी क्या इमरजेंसी आ गयी कि देश के मुखिया को सेना प्रमुखों के साथ बैठना पड़े। ​फिर लगा कि संभव है मोदी सरकार की तमाम मोर्चों पर जारी असफलताओं के मद्देनजर वह पाकिस्तान पर हमले का कोई नया जुमला छोड़ें। 

भक्तों को छोड़ व्यापक जनता में यह पूर्वग्रह इसलिए भी है कि सरकार और भाजपा हर वादे के बाद उसे जुमला, कहानी या ऐवें ही बोल दिया था, कह देती है।

लेकिन इन तमाम अटकलों और आकलनों को परे ढकेलते हुए जब मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करने की अचानक घोषणा कर दी तो देश हतप्रभ रह गया। यह एक फैसला ऐसा था जिसकी खबर मोदी कैबिनेट तक को नहीं थी, यहां तक कि बैंकों को भी नहीं। यही वजह है कि बीजेपी के छोटे—बड़े नेता अभी भी हैंगओवर में हैं कि ये क्या हुआ कि जिसकी उनको भनक ही नहीं थी। 

बाकि पार्टियों की तरह भ्रष्ट भक्तों और कालाबाजारी के समर्थन वाली बीजेपी के नेता भी अंदरखाने में मोदी को वही कह रहे हैं जो कॉमरेड और कांग्रेसी लोग कह रहे हैं। सब कम समय की दुहाई दे रहे हैं और मोदी को तुगलक बता रहे हैं। 

आप इस फैसले को तुगलकी कह सकते हैं। पर बेहद गोपनीयता और सही समय पर लिए गए इस फैसले के बाद उत्साह और बेहतरी की उम्मीद से जिस तरह देश भर गया वह जरूर 'ऐतिहासिक' था।  ऐसे में किसी के पास कुछ ठोस कहने को नहीं है पर आम आदमी खुश है कि चलो एक फैसला मोदी सरकार ने ऐसा किया है जिसके साथ हमारी भी बराबर की भागीदारी बनती है।

अब बात संशय पर। हो सकता है कि सरकार जैसा अभी कालेधन योजना पर नकेल कसने के जो कसीदे पढ़ रही है, वैसा कल को न हो। यह भी दिखावा मात्र बनकर रह जाए। दूसरी योजनाओं और सुधारों की तरह फेल हो जाए और कागजी साबित हो। पर हमारा सवाल यह है कि अभी से इस नकारात्मक चाह में खुद को पतले क्यों करते जाना है? अभी तो गलत नहीं लग रहा है। हां, गरीबों-मजदूरों की व्यापक आबादी को जरूर कुछ ​दिन मुश्किल के गुजारने होंगे, क्योंकि उनका जीवन कैश पर ही चलता है। 

पर आप यह भी तो देखिए कि कौन-सा ऐसा सुधार होता है जिसमें लोगों को मुश्किल नहीं झेलनी पड़ती है। याद है न आपको दिल्ली मेट्रो। कितनी मुश्किल झेलनी पड़ी दिल्ली वालों को। बहुत लोग अपने घरों से उजड़े, उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट होना पड़ा। पर आज सुविधा कौन उठा रहा है, घंटों की उमस और जाम से भरी दूरियों को मिनटों में कौन पूरा कर रहा है।  

इस फैसले पर तमाम तरह की बहस और चर्चाएं मीडिया और समाज में चल रही है आम आदमी व मध्यमवर्ग इस मुद्दे पर पुरजोर समर्थन के साथ मोदी की पीठ ठोकता नजर आ रहा है वहीं हैरत की बात यह है कि व्यवसाय के तमाम कालेधन के गढ़ शिक्षा व सवास्थ्य माफिया, प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट कारोबारी, राजनीति से जुड़े हुए दलाल  इस पर खामोश हैं। वहीं कुछ वामपंथी  जिसके पास कालाधन तो क्या अपना खर्चा उठाने लायक पैसे नहीं है बिना तथ्य व जानकारी के फेसबुक पर मोदी विरोध व आलोचना की अपनी दैनिक दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं. 

सरकार के इस फैसले से उम्मीद है प्रॉपर्टी व रियल एस्टेट जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कालेधन से गतिमान और संचालित होती है पर नकेल लगेगी और जनता को अपेक्षाकृत सस्ता आवास उपलब्ध होगा। घरेलू व्यापार जिसका एक बड़ा हिस्सा कालेधन से चलता है व्यापार  में नकदी की कमी दूर करने के लिए कीमतें कम करने के लिए मजबूर होगा और कालाबाजारी पर रोक लगेगी। 

इस फैसले के अलग-अलग पहलू हैं जिनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए. इसमें एक बड़ा सवाल है कि कुछ दिनों के लिए आम आदमी को इससे असुविधा होगी. नकदी संकट के चलते उसे दैनिक लेनदेन व रोजमर्रा की जरुरी चीजों की खरीद में परेशानी आएगी। आम आदमी की नकदी समस्या  पर .ध्यान देने के बजाए धैर्य से काम ले।  मीडिया के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता में फ़ालतू की हड़बड़ी और खलबली पैदा करने कि बजाए  कालाधन सफ़ेद करने के तरीके खोज रहे कालाधन सरगनाओं की तिड़कमों का पर्दाफ़ाश करे और ये सुनिश्चित करे कि भ्रष्ट राजनीतिक नेतृत्व और कालेधन के व्यापारी बैंकिंग व्यवस्था में सांठ गाँठ से न दिखने वाला कोई सेफ पैसेज खोज लें।   

Nov 8, 2016

यह भाजपा की परिवर्तन रैली का वीडियो है, किसी मुजरे का नहीं

वीडियो देख  सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि मोदी जी क्या ठुमकों के सहारे उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाएंगे।  लोग यह भी जानना चाह रहे हैं कि पाकिस्तानी मुजरे वाले डांस स्टाइल से आरएसएस के लोगों को इतना लगाव क्यों है



समाजवादी पार्टी की ओर से 3 नवंबर को जो रथयात्रा शुरू हुई है उसको चुनौती देने के लिए कल से भाजपा अध्यक्ष ​अमित शाह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश भाजपा ने परिवर्तन यात्रा शुरु की। कल परिवर्तन यात्रा का पहला दिन था। पर यात्रा के पहले ही दिन स्थानीय नेताओं को मनोबल इस कदर गिरा हुआ था कि नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए बार डांसरों के ठुमकों का सहारा लेना पड़ा। 

घर में दाना नहीं और आप थाली की पूछते हो

बांदा से आशीष सागर ​दीक्षित की रिपोर्ट  

शोभा देवी : भाजपा जीतने के बाद इन्हें कार देगी !                                              फोटो : आशीष सागर  

शोभा देवी कहती हैं, 'जब घर में अन्न ही नहीं तो थाली—परात का क्या कहूं। हमने सीमेंट के बोरे को ही बर्तन मान लिया है। 10 साल पहले पति की आत्महत्या के बाद बेटियों की शादी के बीच कभी इतना हुआ ही नहीं कि एक परात खरीद सकूं। यह चावल स्कूल वाले दे देते हैं, वह न दें तो हम खाए बिना ही मर जाएं।' 

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के पड़ोई गांव की शोभा देवी के पति किशोरी ने 6 जुलाई 2006 को अवसाद के कारण आत्महत्या कर ली थी। किशोरी साहू की आत्महत्या का कारण तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट नंदन चक्रवती द्वारा किशोरी की बेटी पर बदचलनी का आरोप लगाना था। सिटी मजिस्ट्रेट के इस वाहियात बयान के बाद लोग किशोरी के परिवार पर छींटाकशी करने लगे थे, जिससे वह अवसाद पीड़ित हो गया और निराशा में आत्महत्या कर ली थी।

गांव वाले कहते हैं कि कर्ज और फांकाकशी में मरे किसान किशोरी की हाय ऐसी लगी कि सिटी मजिस्ट्रेट खुद एड्स की बीमारी से मरा। यह अधिकारी किसानों के राहत चेक भी खा जाता था।

शोभा देवी के मुताबिक, 'गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे कई बार कम आते हैं या खाना नहीं खाते हैं। फिर मिड डे मिल में बना खाना बच जाता है तो वे लोग हमें बुला लेते हैं। चावल मेरा परिवार तभी खा पाता है जब मिड डे मिल वाले देते हैं।' 

शोभा के पति किशोरी को मरे दस वर्ष हो चुके हैं पर उनकी पत्नी शोभा की माली हालत में तनिक भी सुधार नहीं आया है. उनकी 6 बेटियां थीं। उनमें से पांच की शादी उन्होंने कर दी है। एक उन्हीं के साथ गांव में ही रहती है।   

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड में किसान आत्महत्या नई बात नहीं है. ये अंतहीन कहानी अपने स्याह पन्नों से हर रोज एक नया अध्याय लिख रही है. पिछले एक दशक में 5 हजार किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं और ये हालात तब हैं जब सरकारें मुआवजे और पैकेज से बुन्देली किसान को खुशहाल करने का दंभ भरती है. 

12 नवम्बर को लगने वाली लोक अदालत में बैंकों ने लामबंद होकर 13  हजार किसानों को चुनौती देने की रणनीति तैयार कर ली है। अगर इस धमकी आयोजन के बाद कुछ किसान डरके,या  निराश हो के आत्महत्या कर लें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इन किसानों पर 22 करोड़ रुपया कर्जा बकाया है। 

Nov 7, 2016

भाजपा की परिवर्तन यात्रा बार डांसरों के भरोसे

स्थानीय नेताओं का मानना था कि अगर भीड़ रोकनी है तो मंत्री—सांसद के भाषण से जरूरी बार डांसरों की अदाएं और ठुमके हैं। 



समाजवादी पार्टी की ओर से 3 नवंबर को जो रथयात्रा शुरू हुई है उसको चुनौती देने के लिए कल से भाजपा अध्यक्ष ​अमित शाह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश भाजपा ने परिवर्तन यात्रा शुरु की। कल परिवर्तन यात्रा का पहला दिन था। पर यात्रा के पहले ही दिन स्थानीय नेताओं को मनोबल इस कदर गिरा हुआ था कि नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए बार डांसरों के ठुमकों का सहारा लेना पड़ा। 

स्थानीय नेताओं का मानना था कि अगर भीड़ रोकनी है तो मंत्री—सांसद के भाषण से जरूरी बार डांसरों के फूहड़ गीत और ठुमके हैं। गौरतलब है कि अभी भाजपा अध्यक्ष अ​मित शाह द्वारा सोमवार को  बुंदेलखंड में किए चुनावी वादे, कि भाजपा जीतेगी तो हर बुंदेली को कार देंगे, को लेकर सोशल मीडिया पर मजाक बनना बंद भी नहीं हुआ था कि परिवर्तन यात्रा को लेकर यह खबर आ गयी। 

सुचिता की राजनीति का दंभ भरने वाली भाजपा को भी उत्तर प्रदेश के बागपत में भीड़ जुटाने के लिए अपने नेताओं से अधिक बार डांसरों पर भरोसा करना पड़ा। एबीवी की वेबसाइट पर छपे खबर के मुताबिक स्थानीय नेताओं को मंत्री और सांसद के आने से पहले भीड़ को रोकने के लिए डांस कराना पड़ा। 

वेबसाइट के मुताबिक बागपत में बीजेपी की परिवर्तन यात्रा के मंच पर नेताओं के आने में जरा सी देर हुई तो मंच संभाल लिया एक डांसर ने. दरअसल यूपी में बीजेपी की परिवर्तन यात्रा के कैराना से बागपत के तुगाना पहुंचने पर ये कार्यक्रम किया गया था, केंद्रीय राज्य मंत्री संजीव बालियान और बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह के इंतजार में लोग बैठे थे…भीड़ कहीं भाग ना जाए इसलिए आयोजकों ने मंच पर बार बाला को उतार दिया.

गांधी के आगे—आगे चलने वाला यह बालक आज नहीं रहा


नमक सत्याग्रह 'दांडी मार्च' के पहले दिन समुद्र किनारे गांधी के साथ डंडा पकड़कर चलते कनू गांधी 

महात्माा गांधी के पोते कनू गांधी का निधन 

महात्मा गांधी की इस ऐतिहासिक महत्व की तस्वीर को आपने कई दफा देखी होगी। पर आज इस तस्वीर के लिए खास महत्व का दिन है। इस तस्वीर में डंडा थामे आगे—आगे चल रहा बालक  रामदास कनू गांधी हैं, जिनकी सोमवार को सूरत के एक निजी अस्पताल में मृत्यु हो गयी। 

रामदास कनू गांधी की यह तस्वीर उस समय की है जब महात्मा गांधी ने गुजरात में नमक सत्याग्रह 'दांडी मार्च' की शुरुआत की थी। कनू के साथ की यह तस्वीर गुजरात के दांडी में समुद्र के किनारे की है। गांधी ने मार्च—अप्रैल 1930 में नमक सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था।  

87 वर्षीय कनू गांधी प्रसिद्ध संस्था नासा के ​वैज्ञानिक रह चुके थे। कनु ने अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थान एमआईटी से पढ़ाई की थी और नासा में भी काम किया था। उनकी पत्नी शिवलक्ष्मी गांधी पेशे से प्रोफेसर थीं और इन दिनों उनकी सेहत भी ठीक नहीं चल रही। 

कनू गांधी पिछले दिनों तब चर्चा में आए थे जब वह अपनी पत्नी संग दिल्ली के वृद्धाश्रम में रहने लगे थे। हालांकि उन्होंने इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं बताया था। पर कहा भी था कि वह किसी के आगे हाथ नहीं फैला सकते। मीडिया ने कनू गांधी की हालत को प्रमुखता से उठाया था। बाद में प्रधानमंत्री मोदी ने उनका हाल—चाल लिया था। 

NDTV इंडिया के समर्थन में पढ़िये तैश पोठवारी की कविता


बागों में बहार है, बैकफुट पर सरकार है



ब्रॉडकास्टिंग कानून-उल्लंघन के लिये दंडित किए गए NDTV इंडिया पर से केंद्र की भाजपा सरकार ने फिलहाल  9 नवंबर को एक दिन के लिए ऑफ एयर करने का प्रतिबंध स्थगित कर दिया है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह फैसला किया है।

गौरतलब है कि मीडिया को बैन किए जाने के इस तानाशाहीपूर्ण फैसले के खिलाफ एडिटर्स गिल्ड, पत्रकार संगठनों, राजनीतिक पार्टियों और मीडिया माध्यमों ने बड़े स्तर पर अपना विरोध दर्ज कराया था। लगातार मांग की जा रही थी कि सरकार अपने इस तानाशाही पूर्ण फैसले को तत्काल वापस ले और ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री को सख्त हिदायत दे कि वह पूर्वग्रह​ ग्रसित और राजनीति परस्त कार्रवाही से भ​विष्य में बाज आए। सरकार के इस फैसले को लगातार गैरकानूनी और असंवैधानिक करार ठहराया जा रहा था।

चैनल पर इस बैन की वजह इस साल जनवरी में पंजाब के पठानकोट स्थित एयरबेस पर हुए आतंकी हमले के दौरान प्रसारण नियमों का उल्लंघन बताई गई थी। सरकार के इस फैसले के खिलाफ NDTV इंडिया कोर्ट में पहुंच गया था।