आप इस शख्स को ध्यान से देखिए। कैसे यह विकसित होते भारत को बदनाम कर रहा
है। मरी हुई बीवी को कंधे पर लाद के ले जा रहा है। वह भी 10 किलोमीटर। इसे
गौर से पहचान लीजिए। यह उसी कालाहांडी का है जहां भूख से मरने वालों ने देश
की समृद्धि पर दाग लगाई थी, हमारी सभ्यता को दागदार किया था। हो सके तो
इसे देश निकाला देने के लिए अभियान चलाइए। और यकीन कीजिए यह मोदी या नवीन
पटनायक की तरह चार घंटे नहीं सोता होगा। न ही अंबानी, अडानी या टाटा की तरह
हाड़तोड़ मेहनत करता होगा। मेहनत करने वाले कहीं ऐसे मरते हैं। यह दुर्गति
तो मुफ्त में रोटियां तोड़ने वालों की ही होती है। अन्यथा इसकी पत्नी
सरकारी अस्पताल में भगवान भरोसे क्यों मरती। अगर मर भी जाति तो सरकार की
हजारों एंबुलेंस क्या इसे घर तक छोड़ के नहीं आतीं। जरूर इसने मदद नहीं
मांगी होगी। किसी नेता से फोन भी नहीं कराया होगा। पक्का बदमिजाज होगा। मरे
हमें क्या!
Aug 25, 2016
वोट बैंक नहीं होता सवर्ण
दलित वोट बैंक, पिछड़ा वोट बैंक, मुस्लिम वोट बैंक।
लेकिन आपने कभी सवर्ण वोट बैंक का नाम सुना है।
नहीं न!
लेकिन आपने कभी सवर्ण वोट बैंक का नाम सुना है।
नहीं न!
सवर्ण समझदार वोटर होते हैं। ये वोट बैंक नहीं है। हो भी नहीं सकते। यह
पढ़े—लिखे और खानदानी होते हैं। यह जाति, पैसे, क्षेत्र और विचारधारा के
आधार पर वोट नहीं देते। सिर्फ विकास, शांति, सुरक्षा, सुविधा, रोजगार देने
वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं। सही और अच्छे प्रत्याशी चुनते
हैं।
लेकिन दलित, पिछड़े और मुसलमान वोट देने में पैसा, जाति, क्षेत्र, गोत्र, संप्रदाय, विचाारधारा देखते हैं। वह पिछड़ेपन, दंगा, हिंसा, असुरक्षा, असुविधा, महंगाई, बीमारी और बलात्कार फैलाने वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं।
अब आप पूछेंगे, ये कौन कहता है?
भारतीय मीडिया कहता है जी। उन दफ्तरों में बैठे पत्रकार कहते हैं जी। जिसको भरोसा न हो वह हिंदी पत्रकारों की एक खुली डिबेट रखे पता चल जाएगा कि हमारी पत्रकारिता और पत्रकार किस खेत की मूली है।
लेकिन दलित, पिछड़े और मुसलमान वोट देने में पैसा, जाति, क्षेत्र, गोत्र, संप्रदाय, विचाारधारा देखते हैं। वह पिछड़ेपन, दंगा, हिंसा, असुरक्षा, असुविधा, महंगाई, बीमारी और बलात्कार फैलाने वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं।
अब आप पूछेंगे, ये कौन कहता है?
भारतीय मीडिया कहता है जी। उन दफ्तरों में बैठे पत्रकार कहते हैं जी। जिसको भरोसा न हो वह हिंदी पत्रकारों की एक खुली डिबेट रखे पता चल जाएगा कि हमारी पत्रकारिता और पत्रकार किस खेत की मूली है।
Jul 14, 2016
क्या आप इस खबर को देश की खबर बनाएंगे
देश की सबसे बड़ी
इलेक्ट्रानिक कंपनियों में शुमार 'एलजी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' की नोएडा
यूनिट में 11 तारीख से करीब 620 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कर्मचारियों ने
हड़ताल प्रबंधन की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ की है।
लेकिन एक
लाइन भी किसी मीडिया में कोई खबर नहीं है। हड़ताल में शामिल दर्जनों माएं,
बहनें कई दिनों से अपने घर नहीं लौटी हैं, इनमें कई छोटे बच्चों की मांए भी
हैं। एलजी कर्मचारी मनोज कुमार से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने
स्थानीय मीडिया को बुलाया भी पर किसी ने कोई एक पंक्ति की खबर नहीं लिखी।
कर्मचारी और प्रबंधन के बीच टहराहट बहुत मामूली मांगों को लेकर है।
कर्मचारियों की मांग है कि उनकी शिफ्ट 8 घंटे की जाए जो कि अभी 12 से 13
घंटे की है। साथ ही कर्मचारी चाहते हैं कि डीए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया
जाए।
कर्मचारियों का कहना है कि इस मांग को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने एक यूनियन बनाने की कोशिश की। मगर एलजी प्रबंधन ने रजिस्ट्रार को पैसा खिलाकर उनकी यूनियन का रजिट्रेशन रद्द कर दिया।
प्रबंधन यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कराने के बाद जो 11 लोग यूनियन के अगुआ थे उनका ट्रांसफर नोएडा से हैदराबाद, जम्मू, मध्यप्रदेश आदि जगहों पर कर दिया। ऐसे में अब कर्मचारियों की पहली मांग है कि पहले उनके नेताओं का ट्रांसफर रद्द हो और फिर उनकी सभी मांगों पर प्रबंधन वार्ता करे और निकाले।
पर प्रबंधन इस पर कान देने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वह विज्ञापन देकर मीडिया को खरीद चुका है। मगर क्या हम आप तो नहीं बिके हैं, इसे आप अपनी खबर बनाईए और कर्मचारियों की आवाज बनिए, उनके आंदोलन का समर्थन कीजिए।
कर्मचारियों का कहना है कि इस मांग को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने एक यूनियन बनाने की कोशिश की। मगर एलजी प्रबंधन ने रजिस्ट्रार को पैसा खिलाकर उनकी यूनियन का रजिट्रेशन रद्द कर दिया।
प्रबंधन यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कराने के बाद जो 11 लोग यूनियन के अगुआ थे उनका ट्रांसफर नोएडा से हैदराबाद, जम्मू, मध्यप्रदेश आदि जगहों पर कर दिया। ऐसे में अब कर्मचारियों की पहली मांग है कि पहले उनके नेताओं का ट्रांसफर रद्द हो और फिर उनकी सभी मांगों पर प्रबंधन वार्ता करे और निकाले।
पर प्रबंधन इस पर कान देने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वह विज्ञापन देकर मीडिया को खरीद चुका है। मगर क्या हम आप तो नहीं बिके हैं, इसे आप अपनी खबर बनाईए और कर्मचारियों की आवाज बनिए, उनके आंदोलन का समर्थन कीजिए।
Jul 12, 2016
गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं
गोला देने में बीजेपी वालों की कोई सानी नहीं है। तीन दिन हो गए लेकिन जाकिर के खिलाफ एक एफआइआर तक दर्ज नहीं हो पाई। जाहिर है अबतक एफआइआर लायक भी अपराध साबित नहीं हो पाया। पर माहौल ऐसा बना दिया कि जाकिर मिल जाए या उसकी शक्लो—सूरत वाला कोई और भी मिल जाए तो लोग उसे मौके पर मार डालेंगे। सरेराह, सरेबाजार चौराहे पर फैसला सुना देंगे।
सोचिए, राजनीति की यह कैसी खतरनाक रवायत शुरू हो रही है। अबतक यह प्रैक्टिस आतंकवाद मामले में पकड़े गए लोगों को लेकर थी। धमाके हुए नहीं कि बिना सोचे—समझे जो मिले उसे उठा लो, आतंकी बना दो और जब झूठ बेपर्द हो जाए तो 10—20 साल बाद उस शख्स की जिंदगी जहन्नुम बनाकर बाइज्जत रिहा कर दो। बाद में अदालतें या खुद जांच एजेंसियां थोड़ी सख्त हुईं तो इस पर हल्की से रोक लग पाई है पर बीजेपी ने इसका दायरा बढ़ा दिया है।
कांग्रेस के काल में धमाकों में या विद्रोहियों को बिना सबूत अपराधी करार दिया जाता था पर अब बोलने वालों के खिलाफ भी वही बर्ताव होने लगा है। बीजेपी ने दो साल में इसे सरकार चलाने की परंपरा के तौर पर स्थापित किया है। लव जेहाद, घर वापसी से शुरू हुआ सफर अब नाइक तक पहुंचा है।
आप याद कीजिए तीन—चार महीने पहले जेएनयू में क्या हुआ? उससे पहले दादरी कांड में क्या हुआ। मतलब टेप आया नहीं, भाषण क्या हुआ पता नहीं, मांस की जांच हुई नहीं पर घर—घर में छात्रों के देशद्रोही होने के सर्टिफिकेट पहुंचा दिए गए और जन—जन जान गया कि अखलाक के घर में गाय का मांस ही था।
जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में इस कदर दुष्प्रचार कर नफरत फैलाई गयी कि वह आसानी से आज भी खुला नहीं घूमते, उनपर कोई सांप्रदायिक सनकी कभी भी हमला कर सकता है। बावजूद कि सभी रिपोर्ट्स में उनका कोई कसूर किसी भी तरह से साबित नहीं हो पाया है।
सवाल है कि पुलिस, जांच, अदालत या सरकार से पहले ये कौन सी नई ताकत है जो आपकी जुबान को अपने दिमाग का गुलाम बनाकर सांप्रदायिकों की एक ऐसी भीड़ खड़ी कर रही है जहां बहस—मुबाहिसा का कोई चांस ही नहीं है। आरोप लगता है और अपराधी करार दिया जाता है। तानाशाही विरोधी शब्दों लेकिन, किंतु, परंतु का स्पेस ही खत्म हुआ जा रहा है।
भाजपा के इस खास तरीके को समझना होगा। उसे लगता है कि वैचारिक स्तर पर हो या सांस्थानिक रूप से देश पर कब्जा करने का यही तरीका है— भले ही देश, देश ही न रह जाए, दंगाईयों और रक्त पिपासुओं की सनकी भीड़ ही क्यों न बन जाए। भाजपा और मोदी सरकार की इन जनविरोधी आदतों को ताकतपूर्वक रोकना होगा, अन्यथा देश की तबाही में ये हमें गवाह बनाके छोड़ेंगे।
सोचिए, राजनीति की यह कैसी खतरनाक रवायत शुरू हो रही है। अबतक यह प्रैक्टिस आतंकवाद मामले में पकड़े गए लोगों को लेकर थी। धमाके हुए नहीं कि बिना सोचे—समझे जो मिले उसे उठा लो, आतंकी बना दो और जब झूठ बेपर्द हो जाए तो 10—20 साल बाद उस शख्स की जिंदगी जहन्नुम बनाकर बाइज्जत रिहा कर दो। बाद में अदालतें या खुद जांच एजेंसियां थोड़ी सख्त हुईं तो इस पर हल्की से रोक लग पाई है पर बीजेपी ने इसका दायरा बढ़ा दिया है।
कांग्रेस के काल में धमाकों में या विद्रोहियों को बिना सबूत अपराधी करार दिया जाता था पर अब बोलने वालों के खिलाफ भी वही बर्ताव होने लगा है। बीजेपी ने दो साल में इसे सरकार चलाने की परंपरा के तौर पर स्थापित किया है। लव जेहाद, घर वापसी से शुरू हुआ सफर अब नाइक तक पहुंचा है।
आप याद कीजिए तीन—चार महीने पहले जेएनयू में क्या हुआ? उससे पहले दादरी कांड में क्या हुआ। मतलब टेप आया नहीं, भाषण क्या हुआ पता नहीं, मांस की जांच हुई नहीं पर घर—घर में छात्रों के देशद्रोही होने के सर्टिफिकेट पहुंचा दिए गए और जन—जन जान गया कि अखलाक के घर में गाय का मांस ही था।
जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में इस कदर दुष्प्रचार कर नफरत फैलाई गयी कि वह आसानी से आज भी खुला नहीं घूमते, उनपर कोई सांप्रदायिक सनकी कभी भी हमला कर सकता है। बावजूद कि सभी रिपोर्ट्स में उनका कोई कसूर किसी भी तरह से साबित नहीं हो पाया है।
सवाल है कि पुलिस, जांच, अदालत या सरकार से पहले ये कौन सी नई ताकत है जो आपकी जुबान को अपने दिमाग का गुलाम बनाकर सांप्रदायिकों की एक ऐसी भीड़ खड़ी कर रही है जहां बहस—मुबाहिसा का कोई चांस ही नहीं है। आरोप लगता है और अपराधी करार दिया जाता है। तानाशाही विरोधी शब्दों लेकिन, किंतु, परंतु का स्पेस ही खत्म हुआ जा रहा है।
भाजपा के इस खास तरीके को समझना होगा। उसे लगता है कि वैचारिक स्तर पर हो या सांस्थानिक रूप से देश पर कब्जा करने का यही तरीका है— भले ही देश, देश ही न रह जाए, दंगाईयों और रक्त पिपासुओं की सनकी भीड़ ही क्यों न बन जाए। भाजपा और मोदी सरकार की इन जनविरोधी आदतों को ताकतपूर्वक रोकना होगा, अन्यथा देश की तबाही में ये हमें गवाह बनाके छोड़ेंगे।
Jul 11, 2016
तुम मेरी वाली लिखो
दो—तीन दिन पहले मेरे बेटे ने पूछा, 'क्या कर रहे हो पापा?
मैंने कहा, कुछ लिख रहा हूं।
'क्या लिख रहे हो'
एक स्टोरी।
'कौन सी'
है एक, उसे ही।
'तो तुम मेरी वाली लिखो। मेरी वाली तुम लिखते ही नहीं।'
अपनी कहानी खुद लिखनी होती है मेरे बच्चे।
'पर मैं अभी छोटा हूं और केजी में हूं। कैसे लिखुंगा। तुम्हें मालुम तो है?'
तो तुम जाओ पेंटिंग करो।
'मुझे नहीं करनी। मेरी कहानी लिखो। मम्मा भी नहीं लिखती।'
तुमने मम्मा को बताया?
'हां, पर वह सुनती ही नहीं। बस हंस देती है।'
अच्छा मुझे सुनाओ अपनी कहानी।
'शेर—चूहे वाली है'
ओह! वही वाली जिसमें चूहा जाल काट कर शेर को बचाता है। उसे क्या लिखना, सब जानते हैं। तुम्हारी किताब में भी है।
'अरे नहीं। दूसरी है। इसमें चूहा शेर को मार देता है।'
चूहा, शेर को मार देता है। गज्जब! वह कैसे?
'शेर, चूहे को खाता है इसलिए मर जाता है'
शेर, चूहा खाता है। हा...हा। ऐसा क्यों, मेरे बच्चे!!!
'क्योंकि शेर को चूहे पर बहुत तेज गुुस्सा आता है।'
ओह! पर शेर को चूहे पर गुस्सा क्यों आता है? वो भी इतना कि वह चूहे को खा ही जाए।
'शेर को चूहे पर गुस्सा इसलिए आता है कि जब भी शेर शिकार करने जाता है, उससे पहले ही चूहा वहां पहुंचकर सब जानवरों को बता देता है कि शेर तुम्हें खाने के लिए आ रहा है और जानवर भाग जाते हैं।'
हा...हा। अबे, ऐसी कहानी तुमने कब बनायी। मैंने तो सुनी नहीं ये वाली।
'यही तो है मेरी वाली।'
अच्छा ये बताओ, शेर मर क्यों जाता है चूहा खाकर?
'इसलिए मर जाता है क्योंकि चूहा तो कुछ भी काट सकता है न। शेर जैसे ही चूहे को खाता है, चूहा शेर का गला काटकर बाहर निकल आता है और शेर मर जाता है। सुन ली न कहानी...चलो अब लिखो।'
मैंने कहा, कुछ लिख रहा हूं।
'क्या लिख रहे हो'
एक स्टोरी।
'कौन सी'
है एक, उसे ही।
'तो तुम मेरी वाली लिखो। मेरी वाली तुम लिखते ही नहीं।'
अपनी कहानी खुद लिखनी होती है मेरे बच्चे।
'पर मैं अभी छोटा हूं और केजी में हूं। कैसे लिखुंगा। तुम्हें मालुम तो है?'
तो तुम जाओ पेंटिंग करो।
'मुझे नहीं करनी। मेरी कहानी लिखो। मम्मा भी नहीं लिखती।'
तुमने मम्मा को बताया?
'हां, पर वह सुनती ही नहीं। बस हंस देती है।'
अच्छा मुझे सुनाओ अपनी कहानी।
'शेर—चूहे वाली है'
ओह! वही वाली जिसमें चूहा जाल काट कर शेर को बचाता है। उसे क्या लिखना, सब जानते हैं। तुम्हारी किताब में भी है।
'अरे नहीं। दूसरी है। इसमें चूहा शेर को मार देता है।'
चूहा, शेर को मार देता है। गज्जब! वह कैसे?
'शेर, चूहे को खाता है इसलिए मर जाता है'
शेर, चूहा खाता है। हा...हा। ऐसा क्यों, मेरे बच्चे!!!
'क्योंकि शेर को चूहे पर बहुत तेज गुुस्सा आता है।'
ओह! पर शेर को चूहे पर गुस्सा क्यों आता है? वो भी इतना कि वह चूहे को खा ही जाए।
'शेर को चूहे पर गुस्सा इसलिए आता है कि जब भी शेर शिकार करने जाता है, उससे पहले ही चूहा वहां पहुंचकर सब जानवरों को बता देता है कि शेर तुम्हें खाने के लिए आ रहा है और जानवर भाग जाते हैं।'
हा...हा। अबे, ऐसी कहानी तुमने कब बनायी। मैंने तो सुनी नहीं ये वाली।
'यही तो है मेरी वाली।'
अच्छा ये बताओ, शेर मर क्यों जाता है चूहा खाकर?
'इसलिए मर जाता है क्योंकि चूहा तो कुछ भी काट सकता है न। शेर जैसे ही चूहे को खाता है, चूहा शेर का गला काटकर बाहर निकल आता है और शेर मर जाता है। सुन ली न कहानी...चलो अब लिखो।'
Jun 1, 2016
एक पहेली सुनिए और सुलझाइए...
करीब पंद्रह दिन पहले की बात है। एक
स्कूल होता है। उसमें लड़का—लड़की दोनों पढ़ते हैं। जैसा कि पढ़ाई के दौरान
कई बार होता है, वो यहां भी होता है। 16—17 साल के एक ही गांव के एक जोड़े
में मोहब्बत हो जाती है। पर मोहब्बत भी इतनी आसान चीज कहां। निगोड़ी हर
बार जाति—धर्म के साथ आती है, सो इस बार भी आई है।
लौंडिया हिंदू है और
लौंडा मुसलमान। प्रेम परवान चढ़ता है। दुनिया खूबसूरत लगने लगती है। जोड़े
एक बार इस दुनिया को जिंदगी में घुली खूबसूरती के साथ निहारते हैं।
वह खूबसूरती की खुशी को सबमें बांटना चाहते हैं। वे अपनों से चहक—चहक के
'जिंदगी में पहली बार हुआ है' कहना चाहते हैं। पर कहां ये खाम ख्याली। उनकी
आंखें सूख जाती हैंं। हृदय कहता है यहां अब और नहीं, कहीं और चलो। वे
प्लान बनाते हैं।
लौंडे के पास थोड़ा पैसा है, कुछ घर से दाएं—बाएं करता
है। एक बाइक जुगाड़ता है और निकल पड़ते हैं दोनों कि जहां तक आसमां चले। पर
बाइक और पेट से दिल का क्या। यह तो रोकड़े से चलता है और रोकड़े की नियती
खत्म होने की है। सो खत्म हो जाता है और जोड़ा अपने घर लौट आता है।
अब कहानी रोकड़ा खत्म होने के बाद की
जोड़ा शादी कर चुका है। लड़की ससुराल जाती है। मायके वालों को पता चल जाता है। बेटी को वह घसीट लाते हैं। थोड़े दिन सब चुप रहते हैं। फिर बेटी की शादी अपनी जाति में कहीं और कर दी जाती है। लड़की थोड़े दिन नए पति के साथ रहती है। फिर एक दिन वह लौटकर मायके आती है। देर रात में वह अकेले मायके से निकल पड़ती है। अपने प्रेमी के घर जाती है। लड़का मिलता है। वह अपने कमरे में होता है। शायद लड़की के इंतजार में। लड़की उसके कमरे में जाती है और थोड़ी देर बाद कमरे से धुआं उठता है। मोहल्ले को पता चलता है। लोग जुटते हैं। दरवाजा टूटता है। दो लाशें गिरती हैं।
आखिरी बयान
विक्षिप्त सा हो रहा लड़के का पिता कहता है, 'उस पानी में ही क्यों उतरना जिसको पार करना न आता हो।'
पहेली में जो सुलझाना है
आपको गुनहगार बताना है। ध्यान रहे जब आप गुनहगार चिन्हित कर लें तो यह पहेली आप औरों को सुनाएं और उनसे कहें वह किसी और को सुनाएं। बहुत जरूरी पहेली है सर। हल्के में मत लेना। हल्के में लेंगे तो फिर एक बार पुलिस इसे आत्महत्या का सीधा मामला और समाज 'जैसी करनी वैसी भरनी' की परिपाटी बताकर आपको चलता कर देगा।
जोड़ा शादी कर चुका है। लड़की ससुराल जाती है। मायके वालों को पता चल जाता है। बेटी को वह घसीट लाते हैं। थोड़े दिन सब चुप रहते हैं। फिर बेटी की शादी अपनी जाति में कहीं और कर दी जाती है। लड़की थोड़े दिन नए पति के साथ रहती है। फिर एक दिन वह लौटकर मायके आती है। देर रात में वह अकेले मायके से निकल पड़ती है। अपने प्रेमी के घर जाती है। लड़का मिलता है। वह अपने कमरे में होता है। शायद लड़की के इंतजार में। लड़की उसके कमरे में जाती है और थोड़ी देर बाद कमरे से धुआं उठता है। मोहल्ले को पता चलता है। लोग जुटते हैं। दरवाजा टूटता है। दो लाशें गिरती हैं।
आखिरी बयान
विक्षिप्त सा हो रहा लड़के का पिता कहता है, 'उस पानी में ही क्यों उतरना जिसको पार करना न आता हो।'
पहेली में जो सुलझाना है
आपको गुनहगार बताना है। ध्यान रहे जब आप गुनहगार चिन्हित कर लें तो यह पहेली आप औरों को सुनाएं और उनसे कहें वह किसी और को सुनाएं। बहुत जरूरी पहेली है सर। हल्के में मत लेना। हल्के में लेंगे तो फिर एक बार पुलिस इसे आत्महत्या का सीधा मामला और समाज 'जैसी करनी वैसी भरनी' की परिपाटी बताकर आपको चलता कर देगा।
May 31, 2016
इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है...
कई सारे पत्रकार सोशल मीडिया पर बता रहे हैं कि आज पत्रकारिता दिवस है।
लोग एक दूसरे को बधाइयां दे रहे हैं। मैं भी इस मौके पर कुछ कहना चाहता
हूँ। मगर कहने से पहले एक सफाई । मैं वर्तमान के बारे अपने अनुभव शेयर
करूँगा क्योंकि इतिहास का गर्व मैं कभी महसूस नहीं कर पाया...
●
पत्रकारिता एक मात्र धंधा है जहाँ आप पत्रकारिता करने के आलावा जो भी करें
उसके लिए प्रोत्साहित किये जाते हैं, आपको तवज्जो मिलती है..लाइजनिंग,
सेटिंग, बारगेनिंग, क्रिमिनल एक्टिविटी ...दूसरे किसी धंधे में ऐसा नहीं होता।
गौर करें यह सभी अंग्रेजी के शब्द हैं पर हिंदी पत्रकारिता इसे सर्वाधिक
अपने व्यवहार में उतारती है, वरिष्ठ इसे परंपरा की तरह नए में रोपते हैं।
●सभी धंधों की मांग होती है उच्च गुणवत्ता। पर इस धंधे में उच्च गुणवत्ता
लाने वालों की नौकरी हमेशा बोरिया-बिस्तर समेटने की मुद्रा में होती है।
कहा जाता है- नोटिस तुम्हें खुद झेलनी होगी, मानहानी के मामले में नौकरी
जायेगी, तेज न बनो, पॉलिसी समझो, नौकरी जायेगी, नहीं चलेगी एक्टिविस्ट टाइप
पत्रकारिता।
● उदाहरण के लिए आप स्टील के धंधे को लें। इसकी गुणवत्ता इंजिनियरिंग विभाग तय करता होगा क्योंकि वही इसके काबिल है। पर पत्रकारिता की गुणवत्ता का मापदंड संपादकीय विभाग को छोड़कर दूसरे सभी विभाग तय करते हैं। मोटा सच ये है कि संपादकीय सिर्फ अंगूठा लगाता है।
● यह एक मात्र धंधा है जहाँ प्रोडक्ट प्रोड्यूस यानि अख़बार निकालने वालों की सैलरी सभी अन्य विभागों मार्केटिंग, सेल्स, प्रोडक्शन, प्रिंटिंग, सर्कुलेशन से कम होती है।
● अगर कोई सर्वे हो और उन्हें दूसरे काम का विकल्प दिया जाय तो मीडिया हाउसों में काम करने वाले 80 फिसदी कर्मचारी-पत्रकार नौकरी छोड़ना पसंद करेंगे।
● जिस धंधे का बहुतायत किसी आनंद, संतुष्टि, महत्वाकांक्षा या फितरत के कारण काम नहीं कर रहा, बल्कि पेट, परिवार और ईएमआई की मज़बूरी में ख़ट रहा है उसकी गुणवत्ता की बात करना टाइम पास है।
● अख़बारों और टीवी चैनलों की सबसे बड़ी वर्कफोर्स स्ट्रिंगर हैं, किसी मीडिया हॉउस को राष्ट्रीय बनाने की वह धुरी हैं पर उनकी औसत सैलरी 500 रुपये प्रतिमाह भी नहीं है।
● अभिव्यक्ति के इस धंधे में जो सबसे कम अभिव्यक्ति करता है, सबकुछ सह लेता है, वह आसमान में उड़ता है और जो बोलता है वह इस पेज से उस पेज पर गरई पकड़ता है।
● जिनको लिखने नहीं आता वह संपादक बनते हैं और जो लिखना जानते हैं उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता संपादकीय के 3 सौ शब्द लिखने में साबित होती है।
● इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है। संघी-वामपंथी-समाजवादी होना अतिरिक्त योग्यता है। साक्षात्कार संस्थान के मानक को बनाये रखने का जरिया भर है जिससे कंपनी के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वैल्यू में कमी न आये। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप हर साल अपरेजल फार्म भरते हैं पर उससे पहले ही तय हो चुका होता है कि सबकी सालाना सैलरी कितनी बढ़नी है।
अब आप कह सकते हैं कि जब इतना कुछ नकारात्मक है तो आप क्यों हैं पत्रकारिता में, छोड़ क्यों नहीं देते। हो सकता है कुछ मित्र फोन करें कि नौकरी चली जायेगी भाई।
इसपर मेरा बस कहना है दोस्तों मैं पत्रकारिता को जीता हूँ, इसलिये लिख रहा हूँ। आप भी लिखिए। डंके की चोट पर 'हम कह कर लेंगे' तो सूरत बदलेगी।
बाजार सक्षम और विवेकवान लोगों को भी कम स्पेस नहीं देता। जरुरत है तो पत्रकारिता की काई को साफ़ करने की, क्योंकि हमने काई देखते - देखते पानी के अस्तित्व को ही भुला दिया है। #hamtobolenge
● उदाहरण के लिए आप स्टील के धंधे को लें। इसकी गुणवत्ता इंजिनियरिंग विभाग तय करता होगा क्योंकि वही इसके काबिल है। पर पत्रकारिता की गुणवत्ता का मापदंड संपादकीय विभाग को छोड़कर दूसरे सभी विभाग तय करते हैं। मोटा सच ये है कि संपादकीय सिर्फ अंगूठा लगाता है।
● यह एक मात्र धंधा है जहाँ प्रोडक्ट प्रोड्यूस यानि अख़बार निकालने वालों की सैलरी सभी अन्य विभागों मार्केटिंग, सेल्स, प्रोडक्शन, प्रिंटिंग, सर्कुलेशन से कम होती है।
● अगर कोई सर्वे हो और उन्हें दूसरे काम का विकल्प दिया जाय तो मीडिया हाउसों में काम करने वाले 80 फिसदी कर्मचारी-पत्रकार नौकरी छोड़ना पसंद करेंगे।
● जिस धंधे का बहुतायत किसी आनंद, संतुष्टि, महत्वाकांक्षा या फितरत के कारण काम नहीं कर रहा, बल्कि पेट, परिवार और ईएमआई की मज़बूरी में ख़ट रहा है उसकी गुणवत्ता की बात करना टाइम पास है।
● अख़बारों और टीवी चैनलों की सबसे बड़ी वर्कफोर्स स्ट्रिंगर हैं, किसी मीडिया हॉउस को राष्ट्रीय बनाने की वह धुरी हैं पर उनकी औसत सैलरी 500 रुपये प्रतिमाह भी नहीं है।
● अभिव्यक्ति के इस धंधे में जो सबसे कम अभिव्यक्ति करता है, सबकुछ सह लेता है, वह आसमान में उड़ता है और जो बोलता है वह इस पेज से उस पेज पर गरई पकड़ता है।
● जिनको लिखने नहीं आता वह संपादक बनते हैं और जो लिखना जानते हैं उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता संपादकीय के 3 सौ शब्द लिखने में साबित होती है।
● इस धंधे में नौकरी मिलने का एक मात्र पैमाना संपर्क, जाति और जुगाड़ है। संघी-वामपंथी-समाजवादी होना अतिरिक्त योग्यता है। साक्षात्कार संस्थान के मानक को बनाये रखने का जरिया भर है जिससे कंपनी के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वैल्यू में कमी न आये। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप हर साल अपरेजल फार्म भरते हैं पर उससे पहले ही तय हो चुका होता है कि सबकी सालाना सैलरी कितनी बढ़नी है।
अब आप कह सकते हैं कि जब इतना कुछ नकारात्मक है तो आप क्यों हैं पत्रकारिता में, छोड़ क्यों नहीं देते। हो सकता है कुछ मित्र फोन करें कि नौकरी चली जायेगी भाई।
इसपर मेरा बस कहना है दोस्तों मैं पत्रकारिता को जीता हूँ, इसलिये लिख रहा हूँ। आप भी लिखिए। डंके की चोट पर 'हम कह कर लेंगे' तो सूरत बदलेगी।
बाजार सक्षम और विवेकवान लोगों को भी कम स्पेस नहीं देता। जरुरत है तो पत्रकारिता की काई को साफ़ करने की, क्योंकि हमने काई देखते - देखते पानी के अस्तित्व को ही भुला दिया है। #hamtobolenge
May 27, 2016
आपने किसानों को बचाने वाली पोस्ट शेयर होते देखी है...
मैं अक्सर देखता हूं किसी सैनिक के मारे जाने पर पोस्ट घूमने लगती है। पोस्ट शेयर करने वाले लोग अपील करते हैं इसे ज्यादा से ज्यादा लाइक करें, यह देश का सपूत है, इसने देश की रक्षा में अपनी जान गंवाई है। इस पोस्ट को देखते हुए मुझे किसानों की अक्सर याद आती है।
सोचता हूं आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या अब तीन लाख से उपर हो चुकी है पर इनकी सुरक्षा, समृद्धि और सबलता को बनाए रखने की कोई अपील करती पोस्ट क्यों नहीं दिखती ? जो किसान सैनिकों के पेट पालते हैं, सीमा पर उन्हें खड़े होने लायक बनाते हैं, वह क्या इतने भी महान और कद्र के काबिल नहीं कि उनके जीवन बचाने की गारंटी की भी राष्ट्रीय अपील हो, स्वत:स्फूर्त ढंग से लोग हजारों की संख्या में शेयर करें और सरकार से गारंटी लें कि अगर अगला किसान मरा तो अच्छा नहीं होगा। सरकार को चेताएं कि आत्महत्या रूकी नहीं तो हम सोशल मीडिया से सड़कों पर उतर आएंगे।
आप खुद देखिए कि सीमा पर तैनात सैनिक के मरने पर 30 लाख से 1 करोड़ तक मिलते हैं पर जो किसान देश को खड़ा होने लायक बनाता है, जिसका अन्न खाकर देश डकार लेता है, उसकी आत्महत्या के बाद कैसी छिछालेदर मचती है। उसने कर्ज और खेती में नुकसान के कारण आत्महत्या की है, यही साबित करने के लिए उसे अधिकारियों को घूस देना पड़ता है। किसान के मरने के बाद उसके बचे परिवार को मुआवजे के लिए बीडीओ, लेखपाल, एसडीएम, क्लर्क, चपरासी समेत नेताओं की इस कदर जी हजूूरी करनी पड़ती है कि भिखमंगे भी शर्मिंदा हो जाएं।
क्या हम अपने देश के लोगों के त्याग को बांटकर देखेंगे। एक ही घर, गांव और परिवार से निकले सैनिकों और किसानों की संयुक्त भूमिका देश की सीमा से लेकर देश के शरीर को सबल बनाने में एक सी नहीं है। अगर है तो नजरिया बदलिए, एकजुट होइए और किसानों को बचाने के लिए आगे आइए। क्योंकि आप भी जानते हेैं और ह भी, सीमा तभी बचेगी जब सैनिक बचेगा, और सैनिक तभी बचेगा जब किसान बचेगा। किसान नहीं बचा तो न सीमा बचेगी, न सैनिक बचेंगे और न ही देश।
Subscribe to:
Posts (Atom)
