Aug 3, 2011

अधूरी उम्र का पूरा जीवन

फिल्मी दुनिया को चमक देने वाले कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जिनको पुरस्कार तो बहुत सारे मिले, लेकिन वह पुरस्कार इनकी 'उम्र' न बढ़ा सके...

विभा सचदेवा

संता -बंता का अदाकारों को मिलने वाले पुरस्कार को लेकर एक चुटकला काफी सुना गया था। उस चुटकुले में संता-बंता से कहता है कि आखिर यह फिल्मी सितारे अवॉर्ड लेकर इतना खुश क्यों होते हैं, तो उस पर बंता कहता है कि इन अवॉर्ड से इन सितारों की 'उम' बढ़ जाती है।
लेकिन अगर हम ग्लैमरस वर्ल्ड के कुछ सितारों के जीवन पर नजर डाले तो यह चुटकुला कतई सच नहीं लगता। फिल्मी दुनिया को चमक देने वाले कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जिनको पुरस्कार तो बहुत सारे मिले, लेकिन वह पुरस्कार इनकी 'उम्र' न बढ़ा सके।

इसी का एक उदाहरण है हाल ही में ब्रिटिश गायिका एैमी वाइनहाउस की मौत। उनका सिर्फ 27 वर्ष का आयु में दुनिया छोड़ देना हतप्रभ कर देने वाली खबर थी, जिस पर सहसा यकीन नहीं होता।


ऐमी वाइनहाउस ब्रिटिश की जानी-मानी गायिका थी। वे फिल्मी दुनिया के प्रतिष्ठित कई ग्रैमी अवॉर्ड भी जीत चुकी थी। उनकी मौत ऐसे समय में हुई है, जब वह सफलता की ऊंचाइयों को छू रही थी। इसी तरह बालीवुड में भी कई सितारे हैं जो छोटी आयु में ही चल बसे, लेकिन आज भी वह अपने किरदार और प्रतिभा के लिए याद किये जाते हैं।
दिव्या भारती : ऐसी ही एक कलाकार हैं दिव्या भारती। वे 25 फरवरी, 1974 को मुंबई में पैदा हुईं थीं। इस कलाकार की मौत उस समय हुई जब वह शौहरत की बुलंदियों को छू रही थी और इनके चाहने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी। दिव्या भारती ने बॉलीवुड में अपने कैरियर की शुरुआत 'विश्वात्मा' फिल्म से की। इस फिल्म में अपने किरदार के लिए उन्हें बहुत सराहना मिली।

उसके बाद शोला और शबनम, रंग, दीवानगी, दिल का क्या कसूर,दिल ही तो है आदि फिल्मों ने इस अदाकारा को बालीवुड में एक अलग पहचान दिलवायी और यह लाखों-करोड़ों दर्शकों के दिलों की धड़कन बन गयी। लेकिन 5 अप्रैल 1993 को अपने अपार्टमैंट से गिरने के कारण हुई इनकी मौत ने इन करोड़ों प्रशंसकों को सकते में डाल दिया। और उनकी आने वाली फिल्म का इंतजार कर रहे इन प्रशंसकों का इंतजार यहीं खत्म हो गया।

गुरु दत्त : आज भी जब ‘वक्त ने किया क्या हसी सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम’ सुनते हैं तो एक संजीदा अदाकार गुरुदत्त का चेहरा सामने आता है। गुरुदत्त ने फिल्म 'प्यासा' और 'कागज के फूल' में जिस तरह का किरदार निभाया था उससे उनकी जिंदगी की परेशानी साफ दिखती थी। इन फिल्मों को इनकी जिंदगी पर आधारित फिल्मों के रूप में भी देखा जाता था।

गुरुदत्त की रहस्यमय मौत से यह बात साबित भी हो गयी थी। 39 साल की छोटी उम्र में शराब में नींद की गोलिया मिलाकर खाने के कारण हुई इनकी मौत के पीछे का कारण आज तक किसी को पता नहीं चल पाया है। लेकिन इनकी मौत का एक कारण इनकी नाखुश शादीशुदा जिन्दगी और शादी के बाद भी वहीदा रहमान के साथ प्यार को माना जाता है। इस कलाकार की बतौर निर्देशक और अभिनेता बनायी गयी फिल्में बालीवुड के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ फिल्मों के रूप में आज भी दर्ज है। इनकी कुछ यादगार फिल्मों में 'कागज के फूल', 'चौदहवीं का चांद', 'साहिब बीवी और गुलाम' आदि शामिल हैं।

स्मिता पाटिल : दो नैशनल अवॉर्ड, फिल्मफेयर अवॉर्ड और पदमश्री भी इस कलाकार की उम्र नहीं बढ़ा पाए। 17 अक्तूबर 1955 को पैदा हुई इस कलाकार का जीवन केवल 31 साल में ही खत्म हो गया। बॉलीवुड में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी समिता पाटिल पैरलर सिनेमा का जाना-माना नाम थी। जहां एक तरफ अपने अभिनय की वजह से इन्हें काफी सराहना मिली, वहीं दूसरी तरफ राज बब्बर के साथ अपने रिशते के लिए इन्हें काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा।
इसी रिश्ते की वजह से राज बब्बर ने अपनी पहली बीवी को छोड़कर इनसे शादी की। इनकी अच्छी फिल्मों में भूमिका, चक्कर, बाजार, मंडी, अर्थ और आज की आवाज शामिल हैँ। सराहनाओं और आलोचनाओं के उस दौर में 13 दिसंबर, 1986 को समिता पाटिल की प्रतीक बब्बर को जन्म देने के दो हफ्ते बाद ही मौत हो गयी। लेकिन आज भी जब पैरलर सिनेमा की बात होती है, समिता पाटील का नाम जरूर लिया जाता है।

मीना कुमारी : 1 अगस्त, 1932 को मुंबई में मध्यवर्ग परिवार में पैदा हुई एक लड़की ने कभीी सोचा भीी न होगा कि एक दिन वह बॉलीवुड की 'ट्रैजडी क्वीन' के नाम से जानी जायेगी। बालीवुड की 'ट्रैजडी क्वीन' मीना कुमारी एक अच्छी अदाकारा के साथ-साथ बेहतरीन कवियत्री भी थी। वह हर गम और खुशी को वह अपनी कविता के माध्यम से बयाँ करती थी।
अपने तलाक के समय भी उन्होंने अपने गम को बयाँ करने के लिए एक कविता लिखी थी - ‘तलाक तो दे रहे हो नजर-ए-कहर के साथ, जवानी भी मेरी लौटा दो मेहर के साथ।’ एक अच्छी कवियत्री के साथ-साथ अभिनय के मामले में भी उस समय की प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों में से मीना कुमारी एक थी। चाहे 'छोटी बहू' फिल्म में उनके निभाए गए किरदार की बात करें या फिर 'परीणिता'की, हर किरदार को इन्होंने बखूबी निभाया था।

मीना कुमारी की यादगार फिल्मों में साहिब बीवी और गुलाम, शारदा, दिल अपना प्रीत परायी, शरारत और कोहिनूर समेत कई फ़िल्में शामिल हैं। इस अभिनेत्री ने अपने प्रशंसकों का साथ तब छोड़ा, जब वह पांच महीने बाद आने वाले इनके जन्मदिन की तैयरियों में लगे थे। इनकी मौत उस समय हुई, जब उनकी फिल्म 'पाकीजा' सिनेमा हॉल में दर्शकों की अपार सराहना बटोर रही थी।

मधुबाला : हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिभावान अभिनेत्री मधुबाला के जीवन का अंत केवल 36 साल की उम्र में ही हो गया था। 9 साल की उम्र में बाल कालाकार के रूप में इनकी पहली फिल्म 'बसंत' बहुत बड़ी बॉक्स आफिस हिट रही । उसके बाद 14 साल की उम्र में इस अभिनेत्री को 'नील कमल' फिल्म के लिए राजकपूर के अपोजिट कास्ट किया गया।

नीलकमल के बाद तो इस अभिनेत्री की फिल्मों की कतार लग गयी। इनकी फिल्मों में ज्वाला, शराबी, हॉफ टिकट, ब्वायफ्रेंड , महल, जाली नोट, बरसात की रात आदि शामिल हैं। इनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए याद की जाने वाली फिल्म 'मुगल-ए-आजम' ने इस अभिनेत्री को बॉलीवुड में अनारकली के रूप में एक अलग पहचान दिलवायी।

'मुगल-ए-आजम' से जहां एक तरफ बॉलीवुड को अनारकली मिली, वहीं दूसरी तरफ इस फिल्म के समय ही यह बात सामने आई कि मधुबाला अब और काम करने की स्थिति में नहीं हैं। उसके बाद काफी जगह पर इनका इलाज हुआ और लगातार 9 साल तक जिंदगी से संघर्ष करने बाद 1969 में मधुबाला ने आखिरी सांस भरी।

फिल्मी दुनिया के यह कलाकार तो सालों पहले चले गए, लेकिन आज भी इनको बेहतरीन अभिनय के लिए याद किया जाता है। इसलिए ही कहा जाता है कि इंसान मर जाते है, लेकिन उनकी प्रतिभा की नहीं मरती।


Aug 2, 2011

पंजाब में आन्दोलनकारी किसान की मौत

 हिमांशु कुमार

पंजाब सरकार के बर्बर हमले से कल यानी 2 अगस्त को एक किसान सुरजीत सिंह शहीद हो गए. पुलिस ने उन्हें लाठियों से पीटकर मार डाला. पंजाब के मानसा जिले के ग्राम गोविन्दपुरा गाँव में राज्य सरकार द्वारा एक कंपनी के लिए किये जाने वाले अवैध भूमि अधिग्रहण का विरोध करने के लिए 2 अगस्त को किसानो ने रैली करने का प्रयास किया था.

सरकार ने किसानो के इस अहिंसक आन्दोलन को कुचलने के लिए भयंकर लाठीचार्ज किया, जिसमें लगभग पचास किसान बुरी तरह घायल हुए और एक किसान कार्यकर्ता सुरजीत सिंह की मौत हो गयी.  

गौरतलब है कि पंजाब के गोविन्दपुरा गाँव में थर्मल पावर प्लांट लगाने के नाम पर किसानो की 880 एकड़ सिंचित भूमि को पंजाब सरकार अवैध तरीकों से बलपूर्वक लेने की कोशिश कर रही है. पोना नामक कंपनी के लिए किसानो की इन ज़मीनों को लेने से पहले प्रशासन ने किसानो को कोई नोटिस नहीं दिया. किसानो का आरोप है कि सत्ता दल के नेताओं ने पोना नामक कंपनी के साथ मिलीभगत कर के उनकी ज़मीन को कंपनी के नाम कर दिया है.

इस वर्ष 21 जून को कंपनी के लोग पंजाब के 6 जिलों से जमा किये गए बड़े पुलिस बल के साथ जब इस ज़मीन पर कांटेदार तार लगाने पहुंचे तो उन्हें महिलाओं और किसानो के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था. 24 जुलाई को पुलिस ने इस गाँव पर हमला किया और घरों में सोये हुए 450 किसानो को ले जाकर जेल में डाल दिया. ये किसान अभी भी जेल में ही बन्द हैं.

पंजाब के 17 मजदूर किसान संगठनो ने इस अवैध भूमि अधिग्रहण और सरकारी दमन के विरोध में 2 अगस्त को ' गोविन्दपुरा चलो ' रैली की घोषणा की थी. किसानो की इस शांतिपूर्ण रैली को रोकने के लिए पंजाब सरकार ने सुबह से ही किसान नेताओं को घरों में सोते समय ही पकड़ लिया था.

प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

रोजी-रोटी अधिकार अभियान आगाह करता है कि देश में संगठित रिटेल के प्रवेश का रास्ता तैयार करने के लिए जानबूझकर पीडीएस व्यवस्था खत्म की जा रही है...

प्रिय डॉ सिंह,

रोजी रोटी अधिकार अभियान. जैसा कि आप जानते हैं हाल ही में मंत्रियों के सशक्त समूह-ईजीओएम ने खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा तैयार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-एनएफएसबी के मसौदे को मंजूरी दी है। सरकार का दावा है इसे अब कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। विधेयक का यह ड्राफ्ट सभी को खाद्य सुरक्षा देने के विचार का पूरा मखौल उड़ाता है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से मिली वर्तमान हकदारियों को भी छीनता है।

गरीबी रेखा की असफलता के तमाम प्रमाणों के बावजूद इस ड्राफ्ट में भी गरीबी रेखा से ऊपर और नीचे रखने वालों के बीच स्पष्ट विभाजन जारी है। यह गरीबी रेखा इतनी कम है कि देश में भूख के विस्तार को प्रदर्शित नहीं करती है। इस मामले में लोगों की पहचान और उनके वंचित रह जाने से जुड़ी समस्याएं जगजाहिर हैं।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान पीडीएस को खत्म करने और इसके स्थान पर कैश ट्रांसफर का कड़ा विरोध करता है...
बन्दा  जिले का एक गाँव : अन्न मांगता   भारत

किसानों और खाद्य सुरक्षा पर कैश ट्रांसफर का असर-हमारा मानना है कि राशन के स्थान पर पैसा बांटने से न केवल परिवारों की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी बल्कि खाद्यान्न के उत्पादन,खरीद और संग्रह की व्यवस्था पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा। चूंकि राशन की दुकानें नहीं चलानी पड़ेगी इसलिए सरकार अनाज की बड़े पैमाने पर खरीद नहीं करेगी। इससे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाएगा जो फिलहाल अनाज पैदा करने के पीछे सबसे बड़ा प्रोत्साहन है। अपने अनाज की बिक्री के लिए किसान बाजार के हवाले कर दिए जाएंगे जहां उन्हें बहुत कम भाव पर भी उपज बेचनी पड़ सकती है। ऐसे में एफसीआई को भी अब जितने गोदामों की जरूरत नहीं होगी और धीरे-धीरे यह भी एक महत्वहीन व्यवस्था बनकर रह जाएगी। यह राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा के अंत की ओर जाने वाला रास्ता है।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान आगाह करता है कि देश में संगठित रिटेल के प्रवेश का रास्ता तैयार करने के लिए जानबूझकर पीडीएस व्यवस्था खत्म की जा रही है। खाद्यन्न की उपलब्धता सुनिष्चित किए बगैर जनता को बाजार के हवाले कर देना खाद्य असुरक्षा को बढाने वाला कदम साबित होगा। खाद्यान्न के बदले कैश देने को हम रिटेल कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश-एफडीआई की सीमा बढ़ाने के आपकी सरकार के फैसले से जोडकर देखते हैं। कोई षक नहीं है कि पूरी तरह बाजार पर आधारित वितरण प्रणाली ज्यादा खतरनाक साबित होगी।

बच्चों,महिलाओं और वंचित समूहों से संबंधित अन्य सभी प्रावधानों के मामले में भी प्रस्तावित विधेयक अत्यंत निराशाजनक है। छह महीने तक 1,000रुपये महीना मातृत्व अनुग्रह के तौर पर देना, एनएसी का एक जरूरी सुझाव था, जिसे छोड़ दिया गया है। कुपोषित बच्चों, स्कूल से वंचित बच्चों, प्रवासी मजदूरों, भुखमरी से होने वाली मौतों, बेसहारा लोगों का पेट भरने और सामुदायिक रसोई से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधानों को हटा दिया गया है या फिर कमजोर कर दिया गया है। ऐसा लगाता है कि यह ड्राफ्ट पके हुए भोजन की जगह पहले से बने खाने की शुरुआत का अवसर दे रहा है तभी तो पके हुए भोजन को पके हुए पोषक और तुरंत खाने योग्य भोजन के तौर पर परिभाषित किया गया है। इस प्रकार ठेकेदारों और कंपनियों के लिए रास्ता तैयार हो रहा है।

वास्तव में,यह पूरा विधेयक व्यय सीमित करने, जिम्मेदारी को नकारने और मौजूदा वितरण प्रणाली को तबाह करने के असली सरकारी उद्ेश्यों का खुलासा करता है। धन की कमी एक बहाना बनाकर सरकार एक व्यापक कानून लाने में आनाकानी नहीं कर सकती खासकर जबकि सरकार हर साल 5 लाख करोड रूपये का टैक्स विभिन्न प्रकार कर कर छूट के जरिए उद्योग जगत और व्यक्तिगत करदाताओं पर छोड रही है। हैरानी की बात है कि इस राषि का पंचावा हिस्सा भी सरकार देष की खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने के लिए खर्च करने को तैयार नहीं है।
सरकार की ओर से कृषि की उपेक्षा ने कृषि संकट को जन्म दिया है और लाखों लाचार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आज 650 लाख टन से ज्यादा अनाज देष भर के एफसीआई गोदामों में रखा है या फिर गोदामों की कमी के चलते खुले में सड रहा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार सभी को सस्ता राषन नहीं देने के लिए अनाज की कमी का तर्क नहीं दे सकती है।

पीडीएस वितरण को छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों के सफल प्रयोग के आधार पर पूरे देष में मजबूत किया जाना चाहिए।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान सरकार के ड्राफ्ट खाद्य सुरक्षा विधेयक को अस्वीकार करने के लिए देषव्यापी आंदोलन का आवाहन करता है एवं मांग करता है कि एक व्यापक खाद्य सुरक्षा कानून बने जिसमे उत्पादन से लेकर वितरण तक जनहित के पहलुओं को ध्यान में रखा जाए।

नई दिल्ली, 2 अगस्त




कायर सत्याग्रही और दमनकारी सरकार

अन्ना हजारे द्वारा  भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है...

प्रेम सिंह

पक्ष चाहे सरकार का हो या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का, भ्रष्टाचार-विरोध को लेकर दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से जो दृश्य जारी है उसमें संगति कम और बेतुकापन ज्यादा दिखाई देता है। उससे भ्रष्टाचार मिटने वाला नहीं है। बात-बात पर और पहले ही दिन से आमरण अनशन पर बैठ जाने और सरकार या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने से भ्रष्टाचार पर लगाम भी नहीं कसी जा सकेगी। इस हकीकत के कई उदाहरण भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान ही देखने को मिलते हैं।

उनमें एक उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार का है। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पूरी तरह से भ्रष्टाचार का खेल बन जाने पर भी देश के प्रधानमन्त्री  से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक चुप्पी मारे रहे। जब घड़ा खेल होने से पहले ही पफूट गया तो प्रधनमंत्री ने डेमेज कंट्रोल के लिए आनन-फानन में जांच के लिए शुंगलु समिति नियुक्त की। शुंगलु समिति की रपट में दिल्ली की मुख्यमंत्री और राज्यपाल की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए गए हैं। वैसे भी इतना बड़ा और खुला घोटाला मुख्यमंत्री और राज्यपाल की आंख बचा कर हो ही नहीं सकता था।

लेकिन दिल्ली मुख्यमंत्री ने शुंगलु समिति की रपट की ही जांच करा डाली है। होना तो यह चाहिए था कि शुंगलु समिति का गठन करने वाले प्रधनमंत्री को रपट आने के तुरंत बाद मुख्यमंत्राी और राज्यपाल की भूमिका पर जांच बिठानी चाहिए थी। आप गौर कर लें, भ्रष्टाचार का यह खेल  इंडिया अंगेस्ट करप्शन की नाक नीचे हुआ है, लेकिन इंडिया अंगेस्ट करप्शन के बांकुरे विरोध् के किसी भी मंच अथवा स्थल पर नहीं पहुंचे। न ही अपने मंच से कोई विरोध् किया। क्या वे बता सकते हैं उनका लोकपाल इस मामले में क्या करेगा?

स्पैक्ट्रम 2घोटाले में फंसे डी राजा ने अदालत में बयान दिया है कि जो हुआ पीएम,एफएम, केबिनेट और टेलकॉम मंत्रालय के आला अधिकारीयों  की जानकारी और सहमति से हुआ। टीम हजारे का लोकपाल किस-किस को फांसी पर चढ़ाएगा?कांग्रेस राजा के बयान को आरोपी का बयान कह कर खारिज कर सकती है,लेकिन कौन नहीं जानता मामला अगर एफडीआई का हो तो सहमति होगी, भले ही उसमें संवैधानिक प्रावधनों का कितना भी उल्लंघन और कितना भी भ्रष्टाचार होता हो। जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर भारत की सुरक्षा व्यवस्था निरर्थक हो जाती है,उसी तरह एफडीआई के आने पर भारतीय संविधन निरर्थक हो जाता है। एफडीआई और भ्रष्टाचार नाभि-नाल जुड़े हैं।

सगुण विरोध् की जगह केवल निर्गुण विरोध् निरी हवाबाजी है,और हवाबाजी से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। लाख बचाने की कोशिशों के बावजूद किसी डी राजा या किसी कलमाडी के फंस जाने पर जिन भले लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलती नजर आने लगती है, उन्हें गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा कि अगर भ्रष्टाचार मिटाना है तो उसके लिए वास्तव में क्या करना होगा। वह कर्तव्य नवउदारवादी लूट पर कायम शाइनिंग इंडिया के ‘आदर्श’ पर तय नहीं किया जा सकता। उसके बाहर छूटे भारत के यथार्थ से वह तय होगा। मुक्तिबोध् ने पूछा था, ‘कामरेड आपकी पॉलिटिक्स क्या है?’ तय तो होना चाहिए आप किस जमीन पर खड़े होकर बहस कर रहे हैं।

गाँधी ने हिंसा,विग्रह और शोषण से ग्रस्त अधिनिक  औद्योगिक व्यवस्था में दमन और अत्याचार का प्रतिकार करने और अंततः उसे बदलने के उद्देश्य से दक्षिण अप्रफीका में सत्याग्रह के तरीके का संधन किया था। देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी के तरीके का उपयोग कियाऋ गोकि आजादी के संघर्ष में सशस्त्रा और भूमिगत क्रांतिकारी तरीके भी उपयोग में लाए गए थे और बलिदान की कसौटी पर उनकी सार्थकता कम नहीं थी। खुद गाँधी ने 1942में ‘करो या मरो’ का नारा दिया था जिसमें देश के हर नागरिक से उपनिवेशवादी सत्ता के जुझारू प्रतिरोध् का आह्नान था। आजाद भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने गांध्ी की अन्याय के प्रतिकार की सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी की कार्यप्रणाली को दुनिया की अभी तक की सबसे बड़ी क्रांति बताया।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। जिस तरह से अस्सी और नब्बे के दशकों में र्ध्मनिरपेक्षता के पद ने चौतरपफा ठोकरें खाईं और अपना अर्थ गंवा दिया, वही हालत इध्र सत्याग्रह पद की बन गई है।

अगर आजादी के संघर्ष के नेताओं की अपनी और उनके बारे में उपनिवेशवादी सत्ता की लिखतें हमारे सामने नहीं होतीं तो नई पीढ़ियों को यही लगता कि भारत में शुरू से ही बकवादियों का बोलबाला रहा है। लोग यही मानते कि गांध्ी और उनका सत्याग्रह भी वैसा ही तमाशा थे जैसा जंतर-मंतर,रामलीला मैदान और राजघाट पर देखने को मिलता है। जिसमें कोई हिंसक ललकार दे रहा है,कोई जनाना कपड़ों में रात के अंध्ेरे में छिप कर भाग रहा है,कोई सत्ता की सूंघ से मतवाला होकर नाच रहा है।

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों-अवधरणाओं और तरीकों का मौजूदा संदर्भों में नवोन्मेषकारी अर्थ व प्रयोग नहीं हो सकताऋ बल्कि वह होना चाहिए। लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमजोरियों पर परदा डालने के लिए उनका रूप बिगाड़ देना उनके आविष्कर्ताओं को लांछित करने के साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है। नवउदारवाद के हमाम में जो हालत र्ध्मनिरपेक्षता की हो चुकी है,वही गांध्ी और सत्याग्रह की होने जा रही है।

दिल्ली से खदेड़े जाने के अगले दिन जब रामदेव का टीवी पर हरिद्वार से प्रसारण आया तो मेरे 14 साल के बेटे ने कहा कि बाबा तो बुरी तरह डर गया है। दुनिया को स्वास्थ्य और शक्ति के नुस्खे बांटने वाले रामदेव चार दिन के अनशन में बेहाल हो गए। नुस्खे वे आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के भी बांटते हैं। लेकिन भोगियों के इस योगी में न आध्यात्मिक शक्ति का लेश निकला न शारीरिक शक्ति का। वह दरअसल उनमें कभी थी ही नहीं। आपको याद होगा,कुछ साल पहले उनके कारखाने में बनने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और काम करने वाले मजदूरों के शोषण पर सवाल उठे थे। बाबा हल्की पेंदी के तवे की तरह गरम हो गया था और अनर्गल प्रलाप करने लगा था। नवउदारवाद की प्रयोगशाला में ऐसे ही योगी ढलते हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और राजनितिक -सामाजिक मसलों के लेखक.
 
 
 
 
 
 
नोट : प्रकाशित लेख 'नवउदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्टाचार' का एक हिस्सा है. पुरे लेख को पढने के लिए दाहिनी तरफ ऊपर देखें.

Aug 1, 2011

पंजाब में किसानों का भयंकर दमन

पुलिस ने महिला कार्यकर्ताओं से कहा है की वे स्वयं आज शाम तक खुद थाने में आकर अपनी गिरफ्तारी दे दे वरना कल सुबह उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जायेगा...

हिमांशु कुमार


पंजाब से  लोक मोर्चा महासचिव श्री अमोलक सिंह जी ने जानकारी दी है कि पंजाब के गोविन्दपुरा गाँव में थर्मल पावर प्लांट लगाने के नाम पर किसानो की 880  एकड़   सिंचित भूमि को पंजाब सरकार अवैध तरीकों से बलपूर्वक लेने की कोशिश कर रही है !

पोना नामक कंपनी के लिए किसानो की इन ज़मीनों को लेने से पहले प्रशासन ने किसानो को कोई नोटिस नहीं दिया ! किसानो का आरोप है कि सत्ता दल के  नेताओं ने  पेओना नामक कंपनी के साथ  मिलीभगत कर के उनकी ज़मीन को कंपनी के नाम कर दिया है !

 इस वर्ष की 21 जून को कंपनी के लोग पंजाब के 6  जिलों से जमा किये गए बड़े पुलिस बल के साथ जब इस ज़मीन पर कांटेदार तार लगाने पहुंचे तो  उन्हें महिलाओं और किसानो के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा ! 24  जुलाई को पुलिस ने इस गाँव पर हमला किया और घरों में सोये हुए 450  किसानो को ले जाकर  जेल में डाल दिया ! ये किसान आज भी जेल में ही बन्द हैं !

 पंजाब के 17  मजदूर किसान संगठनो ने इस अवैध भूमि अधिग्रहण और सरकारी दमन के विरोध में 2  अगस्त अर्थात कल ' गोविन्दपुरा चलो ' रैली की घोषणा की है परन्तु आज सुबह 4  बजे से ही पुलिस ने छापेमारी कर के इस आन्दोलनपंजाब में आज अपने घरों में सोये हुए १०० से ज्यादा किसानो को पुलिस ने  गिरफ्तार कर लिया है !

अवैध तरीके से किसानो की ज़मीनों को बड़े पैसे वालों को देने के खिलाफपंजाब के किसान कल पंजाब के मानसा जिले में गोविंदपुर में रैली करने वाले हैं ! किसानो की इस शांतीपूर्ण रैली को रोकने के लिए पंजाब सरकार ने आज सुबह किसान नेताओं को सुबह ४ बजे घरों में सोते समय ही पकड़ लिया है !

साथ ही पुलिस ने महिला कार्यकर्ताओं से कहा है की वे स्वयं आज शाम तक खुद थाने में आकर अपनी गिरफ्तारी दे दे वरना कल सुबह उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जायेगा ! पंजाब के किसान नेताओं ने आज बातचीत के दौरान बताया कि पंजाब में ऐसा दमन १९३१ के बाद अब हो रहा है ! उस समय भगत सिंह  द्वारा स्थापित कीर्ति पार्टी के जलसों से पहले भी कार्यकर्ताओं की इसी प्रकार अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तारी की जाती थी और महिलाओं को खुद थाने आ जाने के लिए कह दिया जाता था !

आज दिन भर पुलिस ने मानसा, भटिंडा, बरनाला , मोगा , मुक्तसर , अमृतसर, और गुरदासपुर जिलों में छापेमारी की और भारतीय किसान यूनियन और अन्य सहयोगी संगठनो  के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की है  !


दारुल उलूम की विरासत और वस्तानवी

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था...

तनवीर जाफरी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद कस्बे में स्थित दारुल-उलूम देवबंद पूरी दुनिया में इस्लामी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। दारुल-उलूम देवबंद में केवल भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों के मुसलमानों के वे बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं जिन्हें उच्चस्तरीय एवं गहन इस्लामी शिक्षा प्राप्त करने की ज़रूरत महसूस होती है।

 यहां एक बात पुन:स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हालांकि देवबंद एक कस्बे का नाम ज़रूर है। परंतु दारुल उलूम के देवबंद में स्थित होने की वजह से इस मदरसे से शिक्षा प्राप्त कर चुके इस्लामी स्कॉलर्स अथवा इनकी विचारधारा से जुड़े लोगों को भी देवबंदी कहकर संबोधित किया जाने लगा है। अर्थात इस्लाम तथा मुसलमानों के बताए गए कुल 73 फिरक़ों में देवबंदी मुसलमान भी एक वर्ग विशेष से संबंध रखने वाले मुसलमान कहे जाते हैं।

 इसमें कोई शक नहीं कि दारुल-उलूम देवबंद ने भारत सहित पूरी दुनिया के लाखों मुसलमानों को धार्मिक शिक्षा से नवाज़ा है। पूरे विश्व में लाखों इमाम,  पेश इमाम, क़ारी, हाफिज़, धर्मगुरु, धर्म प्रचारक तथा इस्लामी शिक्षक,दारुल-उलूम से शिक्षा पाकर अन्यत्र धार्मिक सेवाएं करते तथा अपने व अपने परिवार का पालन-पोषण करते देखे जा सकते हैं।

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था।वहीं दूसरी ओर इसी दारूल-उलूम पर कट्टरपंथी व रूढ़ीवादी इस्लामी शिक्षा देने तथा कट्टर इस्लामी स्कॉलर तैयार करने का भी इल्ज़ाम है। कहा तो यहां तक जाता है कि दुनिया में इस्लाम तथा जेहाद के नाम पर फैला आतंकवाद तथा इसमें शामिल गुमराह मुस्लिम युवक भी देवबंदी विचारधारा की धार्मिक शिक्षा से ही प्रभावित हैं।

दारूल-उलूम ने धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ तमाम ऐसे स्कॉलर भी तैयार किए जो देश की प्रशासनिक सेवाओं से लेकर अन्य उच्चस्तरीय सरकारी व गैर सरकारी सेवाओं में अपना योगदान देकर देश की सेवा में भी अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं।

कभी-कभी अपने कई विवादित फतवों को लेकर भी दारुल-उलूम सुर्ख़ियों  में छाया रहता है। साथ ही साथ इसी दारुल-उलूम से इस्लाम के नाम पर फैले आतंकवाद के विरुद्ध भी विस्तृत फतवा जारी किया जा चुका है। भले ही पूरे देश व दुनिया के सभी मुसलमान अथवा सभी फिरकों के मुसलमान दारुल-उलूम की विचारधारा तथा उनके द्वारा दी जाने वाली इस्लामी शिक्षा से सहमति न रखते हों।

परंतु दुनिया के विशेषकर भारत के देवबंदी विचारधारा के मुसलमानों की बड़ी संख्या दारूल-उलूम के फतवों, दिशा निर्देशों तथा वहां चलने वाली धर्म संबंधी गतिविधियों से प्रभावित होती है। पिछले दिनों दारुल-उलूम देवबंद एक बार फिर उस समय पूरे देश के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहा जबकि इस विश्वविद्यालय की संचालन समिति जिसे शूरा के नाम से जाना जाता है,ने अपने ही वाईस चांसलर मौलाना गुलाम वस्तानवी को उनके पद से हटा दिया।शूरा के कुल 14 सदस्यों में से 9 सदस्यों ने वस्तानवी को हटाए जाने के पक्ष में अपना मत दिया। जबकि 5 सदस्य ऐसे भी थे जिन्होंने गुलाम वस्तानवी को कुलपति के पद पर बने रहने के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया।

 गुजरात मूल के मौलाना गुलाम वस्तानवी को अभी कुछ ही माह पूर्व दारूल-उलूम देवबंद का वाईस चांसलर नियुक्त किया गया था। अपनी नियुक्ति के फौरन बाद ही मौलाना वस्तानवी ने गुजरात के अति विवादित मुख्यमंत्री तथा गुजरात दंगों में हुए भीषण नरसंहार के लिए जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी की तारीफ में क़सीदे पढऩे शुरु कर दिए। इतना ही नहीं बल्कि वस्तानवी ने कुछ इस प्रकार का इज़हार-ए-ख्याल भी किया कि मुसलमानों को अब गुजरात दंगों से आगे भी देखना चाहिए।

उनकी बातों से ऐसा अंदाज़ा लगाया जाने लगा था कि मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी को वे क्लीन चिट देना चाह रहे हैं तथा मुसलमानों से भी यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे भी गुजरात दंगों को भूलकर गुजरात,देश तथा अपने समुदाय के विकास में शरीक हों। वस्तानवी के इस प्रकार के विवादित वक्तव्य के बाद दारूल-उलूम की मजलिस-ए-शूरा में,देवबंद से जुड़े लोगों में तथा विशेषकर मीडिया में ज़बरदस्त हंगामा खड़ा हो गया और वस्तानवी को फौरन बर्खास्त किए जाने की मांग उठने लगी।

वस्तानवी का मामला शूरा को सौंप दिया गया जिसने गत् दिनों आखिरकार  उन्हें अपदस्थ किए जाने के पक्ष में बहुमत से अपना फैसला सुनाया। मौलाना वस्तानवी के पद छोड़े जाने के बाद अब इस मुद्दे को लेकर देश में कई प्रकार के राजनैतिक समीकरण बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं मौलाना वस्तानवी इस मुद्दे को गुजराती व गैर गुजराती मुसलमानों के बीच के विवाद के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि दारूल-उलूम पर उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों का दबदबा है और एक गुजराती व्यक्ति को पहली बार दारुल-उलूम का वाईस चांसलर होते हुए नहीं देख सके। 

 शूरा के सभी सदस्य वस्तानवी के इन आरोपों का खंडन कर रहे है. वस्तानवी के यह आरोप वैसे भी निराधर इसलिए प्रतीत होते हैं क्योंकि शूरा के जिन 5सदस्यों ने वस्तानवी के पक्ष में मतदान किया उनमें भी अधिकांश सदस्य उत्तर प्रदेश व बिहार के ही थे। राजनैतिक क्षेत्रों में इस बात की चर्चा है कि वस्तानवी अपने साथ हुए घटनाक्रम को गुजराती मुसलमानों का अपमान उसी तर्ज पर साबित करना चाह रहे हैं जैसे कि नरेंद्र मोदी स्वयं अपने ऊपर लगने वाले किसी आरोप को फौरन गुजराती समाज या गुजरातियों का अपमान बताने लगते हैं।

वस्तानवी वास्तव में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के भी ज़बरदस्त पैरोकार हैं। वस्तानवी अपने निजी प्रयासों से गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक तमाम स्कूल,कॉलेज,महिला शिक्षा संस्थान,बी एड कॉलेज,आयुर्वैदिक संस्थान,आईटीआई,कई पुस्तकालय तथा जामिया अक्कलकुआ के नाम से एक विश्वविधालय स्तरीय संस्थान संचालित कर रहे हैं। जहां कुरान शरीफ की तालीम देने के लिए मौलाना ने सैकड़ों मदरसे स्थापित किए हैं उन्होंने कई मदरसों की सहायता भी की है। वे स्वयं भी विश्व का सबसे बड़ा कुरानी शिक्षा केंद्र चला रहे हैं।

गुलाम वस्तानवी जैसे शिक्षा उद्योग से जुड़े एक धनपति व्यक्ति के लिए दारूल-उलूम का कुलपति बनना या न बनना अथवा उस पद पर बने रहना या हट जाना कोई खास मायने नहीं रखता। परंतु इस पूरे प्रकरण में जिस प्रकार गुजरात दंगों,नरेंद्र मोदी, गुजरात राज्य के मुसलमानों,उत्तरप्रदेश-बिहार के दारुल-उलूम पर वर्चस्व तथा विशेषकर एक परिवार विशेष के दारूल-उलूम का वर्चस्व होने तथा मुसलमानों से गुजरात से आगे बढऩे की बात करने जैसी जो बातें जोड़ी जा रही हैं उनसे साफ ज़ाहिर हो रहा है कि राजनीति के महारथी लोग वस्तानवी प्रकरण को राजनीति का हथियार बनाना चाह रहे हैं।

जहां तक गुजरात से आगे की सोचने का प्रश्र है तो बेशक वस्तानवी का यह कहना सही है,परंतु इस विषय पर निर्णय करने का अधिकार भी कम से कम उन्हीं लोगों को पहले दिया जाना चाहिए जो स्वयं भुक्तभोगी हैं तथा आज तक गुजरात दंगों का दंश वे व उनके परिजन झेल रहे हैं। वस्तानवी अथवा किसी अन्य मुसलिम रहनुमा अथवा धर्मगुरु के आह्वान मात्र से ऐसा नहीं होने वाला। 


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के टिप्पणीकार.





                                                                                    

प्रमोशन की रेस में जिंदगी से हारे सिपाही


सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है। एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है...

आशीष वशिष्ठ

प्रमोशन पाकर सबइंस्पेक्टर बनने के लिए होने वाली शारीरिक क्षमता परीक्षा (फिजिकल फिटनेस टेस्ट) उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मियों पर लगातार भारी पड़ रही है। राज्य के कई मंडलों में 20 जुलाई से चल रही इस परीक्षा में करीब 41 पुलिसकर्मी बेहोष हुए हैं और आजमगढ़ में हुई रेस के दौरान 37 वर्षीय पुलिसकर्मी अली सुजमा समेत चार पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है और कई की यादाश्त जा चुकी है।

 लंबे समय के बाद यूपी में सिपाही से दरोगा पद की पदोन्नती की प्रक्रिया चल रही है। यूपी में सब-इंस्पेक्टर के करीब 5380 पद खाली हैं। इस पद पर प्रमोशन के लिए पिछले मार्च में कराए गए लिखित परीक्षा में 3892 कैंडिडेट पास घोषित किए गए थे। इन्हीं कैंडिडेटों का फिजिकली फिटनेस टेस्ट के तहत 10 किलोमीटर दौड़ की परीक्षा मेरठ, आजमगढ़, कानपुर और सीतापुर पुलिस सेंटरों में 20 जुलाई से चल रही है, जिसमें अब तक 1470 कैंडिडेटों ने दौड़ परीक्षा पास कर चुके हैं।

पुलिसकर्मियों के लगातार बेहोष होने और मौत की घटनाओं की परवाह किये बिना मौत की दौड़ बदस्तूर जारी है। राज्य के स्पेशल डीजीपी बृजलाल ने यूपी के पुलिसकर्मियों से स्पष्ट किया है कि यदि वे अपने को फिजिकली फिट नहीं महसूस कर रहे हैं, तो वे प्रमोशन रेस में हिस्सा नहीं लें। बृजलाल ने माना कि कई जवान मोटापा-ब्लडप्रेशर एवं मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं, तभी इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। स्पेशल डीजीपी का कहना है कि जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है, पहले फिट हों, तभी प्रमोशन की रेस के बारे में सोचें। उनके अनुसार फिजिकल फिटनेस दौड़ यूपी में रोकी नहीं जाएगी। फिट सिपाही ही सब-इंस्पेक्टर बनने का पात्र होगा।

गौरतलब है कि देषभर में राज्य पुलिस के जवान अल्प साधनों और संसाधनों और अस्त-व्यस्त दिनचर्या के साथ जीवन यापन करते हैं। किसी भी राज्य में पुलिसकर्मियों के काम के घंटे निर्धारित नहीं हैं। वहीं पुलिसकर्मियों की कमी भी बड़ा मुद्दा है। आंकड़ों पर गौर करें तो देष में 1 लाख की आबादी के अनुपात में 142 पुलिसकर्मी तैनात है जोकि विष्व के तमाम छोटे-बड़े मुल्कों के मुकाबले काफी कम है।

संविधान के अनुच्छेद सात के अंर्तगत ‘पुलिस’ और ‘लॉ एण्ड ऑर्डर’ राज्य सूची का विषय है। नागरिकों की सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है। बेसिक ट्रेनिंग के बाद एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है। ऊंचे पदों पर आसीन पुलिस अफसरों के लिए तो राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग और स्पेषल कोर्सेज की व्यवस्था का प्रावधान है लेकिन महकमे के मेरूदण्ड सिपाही से लेकर इंसपेक्टर तक के लिए ट्रेनिंग का खास इंतजाम नहीं है।

अधिकतर पुलिसवाले चौबीस घंटे डयूटी पर ही रहते है। उनके खाने, पीने और आराम का कोई निष्चित समय नहीं है। और ये बात समझ से परे है कि कोई व्यक्ति बिना खाये-पिये और आराम किये चौबीस घंटे पूरी ईमानदारी, निष्ठा और सर्तकता से डयूटी कर सकता है ? वहीं अनियमित दिनचर्या से फिजिकल फिटनेस और ष्षारीरीक क्षमता का क्षय होना स्वाभाविक है। सेना और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवान सारा साल फिजिकल फिटनिस और ड्रिल से जुड़े रहते हैं। लेकिन राज्य पुलिस के जवानों और अफसरों को वीआईपी डयूटी, थाना, कोर्ट कचहरी और वसूली से ही फुर्सत नहीं मिलती तो वो भला फिजीकल फिटनेस पर क्या ध्यान देंगे।

पुलिस महकमे के सुधार और पुलिस कर्मियों को बेहतर सुविधाएं दिलाने की गरज से कई आयोग और दर्जनों सिफारिशें  सरकारी फाइलों में दबी पड़ी है। ये कड़वी सच्चाई है कि थानो में बिजली, पानी, टायलेट, स्टेषनरी और तमाम दूसरी सुविधाओं का सर्वथा अभाव ही रहता है। महकमे से जितना बजट किसी थाने को मिलता है उससे तीन बंडल पेपर खरीद पाना भी बडी बात है। जिन पुलिसकर्मियों के भरोसे लाखों लोगों की जान और माल की सुरक्षा की अहम् जिम्मेदारी है जब वो ही अनफिट और बीमार होंगे तो आम आदमी किसके सहारे खुद को सुरक्षित महसूस करेगा।