Aug 2, 2011

पंजाब में आन्दोलनकारी किसान की मौत

 हिमांशु कुमार

पंजाब सरकार के बर्बर हमले से कल यानी 2 अगस्त को एक किसान सुरजीत सिंह शहीद हो गए. पुलिस ने उन्हें लाठियों से पीटकर मार डाला. पंजाब के मानसा जिले के ग्राम गोविन्दपुरा गाँव में राज्य सरकार द्वारा एक कंपनी के लिए किये जाने वाले अवैध भूमि अधिग्रहण का विरोध करने के लिए 2 अगस्त को किसानो ने रैली करने का प्रयास किया था.

सरकार ने किसानो के इस अहिंसक आन्दोलन को कुचलने के लिए भयंकर लाठीचार्ज किया, जिसमें लगभग पचास किसान बुरी तरह घायल हुए और एक किसान कार्यकर्ता सुरजीत सिंह की मौत हो गयी.  

गौरतलब है कि पंजाब के गोविन्दपुरा गाँव में थर्मल पावर प्लांट लगाने के नाम पर किसानो की 880 एकड़ सिंचित भूमि को पंजाब सरकार अवैध तरीकों से बलपूर्वक लेने की कोशिश कर रही है. पोना नामक कंपनी के लिए किसानो की इन ज़मीनों को लेने से पहले प्रशासन ने किसानो को कोई नोटिस नहीं दिया. किसानो का आरोप है कि सत्ता दल के नेताओं ने पोना नामक कंपनी के साथ मिलीभगत कर के उनकी ज़मीन को कंपनी के नाम कर दिया है.

इस वर्ष 21 जून को कंपनी के लोग पंजाब के 6 जिलों से जमा किये गए बड़े पुलिस बल के साथ जब इस ज़मीन पर कांटेदार तार लगाने पहुंचे तो उन्हें महिलाओं और किसानो के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था. 24 जुलाई को पुलिस ने इस गाँव पर हमला किया और घरों में सोये हुए 450 किसानो को ले जाकर जेल में डाल दिया. ये किसान अभी भी जेल में ही बन्द हैं.

पंजाब के 17 मजदूर किसान संगठनो ने इस अवैध भूमि अधिग्रहण और सरकारी दमन के विरोध में 2 अगस्त को ' गोविन्दपुरा चलो ' रैली की घोषणा की थी. किसानो की इस शांतिपूर्ण रैली को रोकने के लिए पंजाब सरकार ने सुबह से ही किसान नेताओं को घरों में सोते समय ही पकड़ लिया था.

प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

रोजी-रोटी अधिकार अभियान आगाह करता है कि देश में संगठित रिटेल के प्रवेश का रास्ता तैयार करने के लिए जानबूझकर पीडीएस व्यवस्था खत्म की जा रही है...

प्रिय डॉ सिंह,

रोजी रोटी अधिकार अभियान. जैसा कि आप जानते हैं हाल ही में मंत्रियों के सशक्त समूह-ईजीओएम ने खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा तैयार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-एनएफएसबी के मसौदे को मंजूरी दी है। सरकार का दावा है इसे अब कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। विधेयक का यह ड्राफ्ट सभी को खाद्य सुरक्षा देने के विचार का पूरा मखौल उड़ाता है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से मिली वर्तमान हकदारियों को भी छीनता है।

गरीबी रेखा की असफलता के तमाम प्रमाणों के बावजूद इस ड्राफ्ट में भी गरीबी रेखा से ऊपर और नीचे रखने वालों के बीच स्पष्ट विभाजन जारी है। यह गरीबी रेखा इतनी कम है कि देश में भूख के विस्तार को प्रदर्शित नहीं करती है। इस मामले में लोगों की पहचान और उनके वंचित रह जाने से जुड़ी समस्याएं जगजाहिर हैं।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान पीडीएस को खत्म करने और इसके स्थान पर कैश ट्रांसफर का कड़ा विरोध करता है...
बन्दा  जिले का एक गाँव : अन्न मांगता   भारत

किसानों और खाद्य सुरक्षा पर कैश ट्रांसफर का असर-हमारा मानना है कि राशन के स्थान पर पैसा बांटने से न केवल परिवारों की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी बल्कि खाद्यान्न के उत्पादन,खरीद और संग्रह की व्यवस्था पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा। चूंकि राशन की दुकानें नहीं चलानी पड़ेगी इसलिए सरकार अनाज की बड़े पैमाने पर खरीद नहीं करेगी। इससे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाएगा जो फिलहाल अनाज पैदा करने के पीछे सबसे बड़ा प्रोत्साहन है। अपने अनाज की बिक्री के लिए किसान बाजार के हवाले कर दिए जाएंगे जहां उन्हें बहुत कम भाव पर भी उपज बेचनी पड़ सकती है। ऐसे में एफसीआई को भी अब जितने गोदामों की जरूरत नहीं होगी और धीरे-धीरे यह भी एक महत्वहीन व्यवस्था बनकर रह जाएगी। यह राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा के अंत की ओर जाने वाला रास्ता है।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान आगाह करता है कि देश में संगठित रिटेल के प्रवेश का रास्ता तैयार करने के लिए जानबूझकर पीडीएस व्यवस्था खत्म की जा रही है। खाद्यन्न की उपलब्धता सुनिष्चित किए बगैर जनता को बाजार के हवाले कर देना खाद्य असुरक्षा को बढाने वाला कदम साबित होगा। खाद्यान्न के बदले कैश देने को हम रिटेल कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश-एफडीआई की सीमा बढ़ाने के आपकी सरकार के फैसले से जोडकर देखते हैं। कोई षक नहीं है कि पूरी तरह बाजार पर आधारित वितरण प्रणाली ज्यादा खतरनाक साबित होगी।

बच्चों,महिलाओं और वंचित समूहों से संबंधित अन्य सभी प्रावधानों के मामले में भी प्रस्तावित विधेयक अत्यंत निराशाजनक है। छह महीने तक 1,000रुपये महीना मातृत्व अनुग्रह के तौर पर देना, एनएसी का एक जरूरी सुझाव था, जिसे छोड़ दिया गया है। कुपोषित बच्चों, स्कूल से वंचित बच्चों, प्रवासी मजदूरों, भुखमरी से होने वाली मौतों, बेसहारा लोगों का पेट भरने और सामुदायिक रसोई से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधानों को हटा दिया गया है या फिर कमजोर कर दिया गया है। ऐसा लगाता है कि यह ड्राफ्ट पके हुए भोजन की जगह पहले से बने खाने की शुरुआत का अवसर दे रहा है तभी तो पके हुए भोजन को पके हुए पोषक और तुरंत खाने योग्य भोजन के तौर पर परिभाषित किया गया है। इस प्रकार ठेकेदारों और कंपनियों के लिए रास्ता तैयार हो रहा है।

वास्तव में,यह पूरा विधेयक व्यय सीमित करने, जिम्मेदारी को नकारने और मौजूदा वितरण प्रणाली को तबाह करने के असली सरकारी उद्ेश्यों का खुलासा करता है। धन की कमी एक बहाना बनाकर सरकार एक व्यापक कानून लाने में आनाकानी नहीं कर सकती खासकर जबकि सरकार हर साल 5 लाख करोड रूपये का टैक्स विभिन्न प्रकार कर कर छूट के जरिए उद्योग जगत और व्यक्तिगत करदाताओं पर छोड रही है। हैरानी की बात है कि इस राषि का पंचावा हिस्सा भी सरकार देष की खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने के लिए खर्च करने को तैयार नहीं है।
सरकार की ओर से कृषि की उपेक्षा ने कृषि संकट को जन्म दिया है और लाखों लाचार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आज 650 लाख टन से ज्यादा अनाज देष भर के एफसीआई गोदामों में रखा है या फिर गोदामों की कमी के चलते खुले में सड रहा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार सभी को सस्ता राषन नहीं देने के लिए अनाज की कमी का तर्क नहीं दे सकती है।

पीडीएस वितरण को छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों के सफल प्रयोग के आधार पर पूरे देष में मजबूत किया जाना चाहिए।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान सरकार के ड्राफ्ट खाद्य सुरक्षा विधेयक को अस्वीकार करने के लिए देषव्यापी आंदोलन का आवाहन करता है एवं मांग करता है कि एक व्यापक खाद्य सुरक्षा कानून बने जिसमे उत्पादन से लेकर वितरण तक जनहित के पहलुओं को ध्यान में रखा जाए।

नई दिल्ली, 2 अगस्त




कायर सत्याग्रही और दमनकारी सरकार

अन्ना हजारे द्वारा  भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है...

प्रेम सिंह

पक्ष चाहे सरकार का हो या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का, भ्रष्टाचार-विरोध को लेकर दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से जो दृश्य जारी है उसमें संगति कम और बेतुकापन ज्यादा दिखाई देता है। उससे भ्रष्टाचार मिटने वाला नहीं है। बात-बात पर और पहले ही दिन से आमरण अनशन पर बैठ जाने और सरकार या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने से भ्रष्टाचार पर लगाम भी नहीं कसी जा सकेगी। इस हकीकत के कई उदाहरण भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान ही देखने को मिलते हैं।

उनमें एक उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार का है। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पूरी तरह से भ्रष्टाचार का खेल बन जाने पर भी देश के प्रधानमन्त्री  से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक चुप्पी मारे रहे। जब घड़ा खेल होने से पहले ही पफूट गया तो प्रधनमंत्री ने डेमेज कंट्रोल के लिए आनन-फानन में जांच के लिए शुंगलु समिति नियुक्त की। शुंगलु समिति की रपट में दिल्ली की मुख्यमंत्री और राज्यपाल की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए गए हैं। वैसे भी इतना बड़ा और खुला घोटाला मुख्यमंत्री और राज्यपाल की आंख बचा कर हो ही नहीं सकता था।

लेकिन दिल्ली मुख्यमंत्री ने शुंगलु समिति की रपट की ही जांच करा डाली है। होना तो यह चाहिए था कि शुंगलु समिति का गठन करने वाले प्रधनमंत्री को रपट आने के तुरंत बाद मुख्यमंत्राी और राज्यपाल की भूमिका पर जांच बिठानी चाहिए थी। आप गौर कर लें, भ्रष्टाचार का यह खेल  इंडिया अंगेस्ट करप्शन की नाक नीचे हुआ है, लेकिन इंडिया अंगेस्ट करप्शन के बांकुरे विरोध् के किसी भी मंच अथवा स्थल पर नहीं पहुंचे। न ही अपने मंच से कोई विरोध् किया। क्या वे बता सकते हैं उनका लोकपाल इस मामले में क्या करेगा?

स्पैक्ट्रम 2घोटाले में फंसे डी राजा ने अदालत में बयान दिया है कि जो हुआ पीएम,एफएम, केबिनेट और टेलकॉम मंत्रालय के आला अधिकारीयों  की जानकारी और सहमति से हुआ। टीम हजारे का लोकपाल किस-किस को फांसी पर चढ़ाएगा?कांग्रेस राजा के बयान को आरोपी का बयान कह कर खारिज कर सकती है,लेकिन कौन नहीं जानता मामला अगर एफडीआई का हो तो सहमति होगी, भले ही उसमें संवैधानिक प्रावधनों का कितना भी उल्लंघन और कितना भी भ्रष्टाचार होता हो। जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर भारत की सुरक्षा व्यवस्था निरर्थक हो जाती है,उसी तरह एफडीआई के आने पर भारतीय संविधन निरर्थक हो जाता है। एफडीआई और भ्रष्टाचार नाभि-नाल जुड़े हैं।

सगुण विरोध् की जगह केवल निर्गुण विरोध् निरी हवाबाजी है,और हवाबाजी से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। लाख बचाने की कोशिशों के बावजूद किसी डी राजा या किसी कलमाडी के फंस जाने पर जिन भले लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलती नजर आने लगती है, उन्हें गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा कि अगर भ्रष्टाचार मिटाना है तो उसके लिए वास्तव में क्या करना होगा। वह कर्तव्य नवउदारवादी लूट पर कायम शाइनिंग इंडिया के ‘आदर्श’ पर तय नहीं किया जा सकता। उसके बाहर छूटे भारत के यथार्थ से वह तय होगा। मुक्तिबोध् ने पूछा था, ‘कामरेड आपकी पॉलिटिक्स क्या है?’ तय तो होना चाहिए आप किस जमीन पर खड़े होकर बहस कर रहे हैं।

गाँधी ने हिंसा,विग्रह और शोषण से ग्रस्त अधिनिक  औद्योगिक व्यवस्था में दमन और अत्याचार का प्रतिकार करने और अंततः उसे बदलने के उद्देश्य से दक्षिण अप्रफीका में सत्याग्रह के तरीके का संधन किया था। देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी के तरीके का उपयोग कियाऋ गोकि आजादी के संघर्ष में सशस्त्रा और भूमिगत क्रांतिकारी तरीके भी उपयोग में लाए गए थे और बलिदान की कसौटी पर उनकी सार्थकता कम नहीं थी। खुद गाँधी ने 1942में ‘करो या मरो’ का नारा दिया था जिसमें देश के हर नागरिक से उपनिवेशवादी सत्ता के जुझारू प्रतिरोध् का आह्नान था। आजाद भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने गांध्ी की अन्याय के प्रतिकार की सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी की कार्यप्रणाली को दुनिया की अभी तक की सबसे बड़ी क्रांति बताया।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। जिस तरह से अस्सी और नब्बे के दशकों में र्ध्मनिरपेक्षता के पद ने चौतरपफा ठोकरें खाईं और अपना अर्थ गंवा दिया, वही हालत इध्र सत्याग्रह पद की बन गई है।

अगर आजादी के संघर्ष के नेताओं की अपनी और उनके बारे में उपनिवेशवादी सत्ता की लिखतें हमारे सामने नहीं होतीं तो नई पीढ़ियों को यही लगता कि भारत में शुरू से ही बकवादियों का बोलबाला रहा है। लोग यही मानते कि गांध्ी और उनका सत्याग्रह भी वैसा ही तमाशा थे जैसा जंतर-मंतर,रामलीला मैदान और राजघाट पर देखने को मिलता है। जिसमें कोई हिंसक ललकार दे रहा है,कोई जनाना कपड़ों में रात के अंध्ेरे में छिप कर भाग रहा है,कोई सत्ता की सूंघ से मतवाला होकर नाच रहा है।

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों-अवधरणाओं और तरीकों का मौजूदा संदर्भों में नवोन्मेषकारी अर्थ व प्रयोग नहीं हो सकताऋ बल्कि वह होना चाहिए। लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमजोरियों पर परदा डालने के लिए उनका रूप बिगाड़ देना उनके आविष्कर्ताओं को लांछित करने के साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है। नवउदारवाद के हमाम में जो हालत र्ध्मनिरपेक्षता की हो चुकी है,वही गांध्ी और सत्याग्रह की होने जा रही है।

दिल्ली से खदेड़े जाने के अगले दिन जब रामदेव का टीवी पर हरिद्वार से प्रसारण आया तो मेरे 14 साल के बेटे ने कहा कि बाबा तो बुरी तरह डर गया है। दुनिया को स्वास्थ्य और शक्ति के नुस्खे बांटने वाले रामदेव चार दिन के अनशन में बेहाल हो गए। नुस्खे वे आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के भी बांटते हैं। लेकिन भोगियों के इस योगी में न आध्यात्मिक शक्ति का लेश निकला न शारीरिक शक्ति का। वह दरअसल उनमें कभी थी ही नहीं। आपको याद होगा,कुछ साल पहले उनके कारखाने में बनने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और काम करने वाले मजदूरों के शोषण पर सवाल उठे थे। बाबा हल्की पेंदी के तवे की तरह गरम हो गया था और अनर्गल प्रलाप करने लगा था। नवउदारवाद की प्रयोगशाला में ऐसे ही योगी ढलते हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और राजनितिक -सामाजिक मसलों के लेखक.
 
 
 
 
 
 
नोट : प्रकाशित लेख 'नवउदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्टाचार' का एक हिस्सा है. पुरे लेख को पढने के लिए दाहिनी तरफ ऊपर देखें.

Aug 1, 2011

पंजाब में किसानों का भयंकर दमन

पुलिस ने महिला कार्यकर्ताओं से कहा है की वे स्वयं आज शाम तक खुद थाने में आकर अपनी गिरफ्तारी दे दे वरना कल सुबह उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जायेगा...

हिमांशु कुमार


पंजाब से  लोक मोर्चा महासचिव श्री अमोलक सिंह जी ने जानकारी दी है कि पंजाब के गोविन्दपुरा गाँव में थर्मल पावर प्लांट लगाने के नाम पर किसानो की 880  एकड़   सिंचित भूमि को पंजाब सरकार अवैध तरीकों से बलपूर्वक लेने की कोशिश कर रही है !

पोना नामक कंपनी के लिए किसानो की इन ज़मीनों को लेने से पहले प्रशासन ने किसानो को कोई नोटिस नहीं दिया ! किसानो का आरोप है कि सत्ता दल के  नेताओं ने  पेओना नामक कंपनी के साथ  मिलीभगत कर के उनकी ज़मीन को कंपनी के नाम कर दिया है !

 इस वर्ष की 21 जून को कंपनी के लोग पंजाब के 6  जिलों से जमा किये गए बड़े पुलिस बल के साथ जब इस ज़मीन पर कांटेदार तार लगाने पहुंचे तो  उन्हें महिलाओं और किसानो के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा ! 24  जुलाई को पुलिस ने इस गाँव पर हमला किया और घरों में सोये हुए 450  किसानो को ले जाकर  जेल में डाल दिया ! ये किसान आज भी जेल में ही बन्द हैं !

 पंजाब के 17  मजदूर किसान संगठनो ने इस अवैध भूमि अधिग्रहण और सरकारी दमन के विरोध में 2  अगस्त अर्थात कल ' गोविन्दपुरा चलो ' रैली की घोषणा की है परन्तु आज सुबह 4  बजे से ही पुलिस ने छापेमारी कर के इस आन्दोलनपंजाब में आज अपने घरों में सोये हुए १०० से ज्यादा किसानो को पुलिस ने  गिरफ्तार कर लिया है !

अवैध तरीके से किसानो की ज़मीनों को बड़े पैसे वालों को देने के खिलाफपंजाब के किसान कल पंजाब के मानसा जिले में गोविंदपुर में रैली करने वाले हैं ! किसानो की इस शांतीपूर्ण रैली को रोकने के लिए पंजाब सरकार ने आज सुबह किसान नेताओं को सुबह ४ बजे घरों में सोते समय ही पकड़ लिया है !

साथ ही पुलिस ने महिला कार्यकर्ताओं से कहा है की वे स्वयं आज शाम तक खुद थाने में आकर अपनी गिरफ्तारी दे दे वरना कल सुबह उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जायेगा ! पंजाब के किसान नेताओं ने आज बातचीत के दौरान बताया कि पंजाब में ऐसा दमन १९३१ के बाद अब हो रहा है ! उस समय भगत सिंह  द्वारा स्थापित कीर्ति पार्टी के जलसों से पहले भी कार्यकर्ताओं की इसी प्रकार अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तारी की जाती थी और महिलाओं को खुद थाने आ जाने के लिए कह दिया जाता था !

आज दिन भर पुलिस ने मानसा, भटिंडा, बरनाला , मोगा , मुक्तसर , अमृतसर, और गुरदासपुर जिलों में छापेमारी की और भारतीय किसान यूनियन और अन्य सहयोगी संगठनो  के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की है  !


दारुल उलूम की विरासत और वस्तानवी

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था...

तनवीर जाफरी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद कस्बे में स्थित दारुल-उलूम देवबंद पूरी दुनिया में इस्लामी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। दारुल-उलूम देवबंद में केवल भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों के मुसलमानों के वे बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं जिन्हें उच्चस्तरीय एवं गहन इस्लामी शिक्षा प्राप्त करने की ज़रूरत महसूस होती है।

 यहां एक बात पुन:स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हालांकि देवबंद एक कस्बे का नाम ज़रूर है। परंतु दारुल उलूम के देवबंद में स्थित होने की वजह से इस मदरसे से शिक्षा प्राप्त कर चुके इस्लामी स्कॉलर्स अथवा इनकी विचारधारा से जुड़े लोगों को भी देवबंदी कहकर संबोधित किया जाने लगा है। अर्थात इस्लाम तथा मुसलमानों के बताए गए कुल 73 फिरक़ों में देवबंदी मुसलमान भी एक वर्ग विशेष से संबंध रखने वाले मुसलमान कहे जाते हैं।

 इसमें कोई शक नहीं कि दारुल-उलूम देवबंद ने भारत सहित पूरी दुनिया के लाखों मुसलमानों को धार्मिक शिक्षा से नवाज़ा है। पूरे विश्व में लाखों इमाम,  पेश इमाम, क़ारी, हाफिज़, धर्मगुरु, धर्म प्रचारक तथा इस्लामी शिक्षक,दारुल-उलूम से शिक्षा पाकर अन्यत्र धार्मिक सेवाएं करते तथा अपने व अपने परिवार का पालन-पोषण करते देखे जा सकते हैं।

दारूल-उलूम की गिनती नि:संदेह देश के उस सर्वप्रमुख इस्लामी संस्थान में की जाती है जिसने कि 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन का विरोध करते हुए अखंड भारत के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया था।वहीं दूसरी ओर इसी दारूल-उलूम पर कट्टरपंथी व रूढ़ीवादी इस्लामी शिक्षा देने तथा कट्टर इस्लामी स्कॉलर तैयार करने का भी इल्ज़ाम है। कहा तो यहां तक जाता है कि दुनिया में इस्लाम तथा जेहाद के नाम पर फैला आतंकवाद तथा इसमें शामिल गुमराह मुस्लिम युवक भी देवबंदी विचारधारा की धार्मिक शिक्षा से ही प्रभावित हैं।

दारूल-उलूम ने धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ तमाम ऐसे स्कॉलर भी तैयार किए जो देश की प्रशासनिक सेवाओं से लेकर अन्य उच्चस्तरीय सरकारी व गैर सरकारी सेवाओं में अपना योगदान देकर देश की सेवा में भी अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं।

कभी-कभी अपने कई विवादित फतवों को लेकर भी दारुल-उलूम सुर्ख़ियों  में छाया रहता है। साथ ही साथ इसी दारुल-उलूम से इस्लाम के नाम पर फैले आतंकवाद के विरुद्ध भी विस्तृत फतवा जारी किया जा चुका है। भले ही पूरे देश व दुनिया के सभी मुसलमान अथवा सभी फिरकों के मुसलमान दारुल-उलूम की विचारधारा तथा उनके द्वारा दी जाने वाली इस्लामी शिक्षा से सहमति न रखते हों।

परंतु दुनिया के विशेषकर भारत के देवबंदी विचारधारा के मुसलमानों की बड़ी संख्या दारूल-उलूम के फतवों, दिशा निर्देशों तथा वहां चलने वाली धर्म संबंधी गतिविधियों से प्रभावित होती है। पिछले दिनों दारुल-उलूम देवबंद एक बार फिर उस समय पूरे देश के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहा जबकि इस विश्वविद्यालय की संचालन समिति जिसे शूरा के नाम से जाना जाता है,ने अपने ही वाईस चांसलर मौलाना गुलाम वस्तानवी को उनके पद से हटा दिया।शूरा के कुल 14 सदस्यों में से 9 सदस्यों ने वस्तानवी को हटाए जाने के पक्ष में अपना मत दिया। जबकि 5 सदस्य ऐसे भी थे जिन्होंने गुलाम वस्तानवी को कुलपति के पद पर बने रहने के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया।

 गुजरात मूल के मौलाना गुलाम वस्तानवी को अभी कुछ ही माह पूर्व दारूल-उलूम देवबंद का वाईस चांसलर नियुक्त किया गया था। अपनी नियुक्ति के फौरन बाद ही मौलाना वस्तानवी ने गुजरात के अति विवादित मुख्यमंत्री तथा गुजरात दंगों में हुए भीषण नरसंहार के लिए जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी की तारीफ में क़सीदे पढऩे शुरु कर दिए। इतना ही नहीं बल्कि वस्तानवी ने कुछ इस प्रकार का इज़हार-ए-ख्याल भी किया कि मुसलमानों को अब गुजरात दंगों से आगे भी देखना चाहिए।

उनकी बातों से ऐसा अंदाज़ा लगाया जाने लगा था कि मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के जि़म्मेदार समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी को वे क्लीन चिट देना चाह रहे हैं तथा मुसलमानों से भी यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे भी गुजरात दंगों को भूलकर गुजरात,देश तथा अपने समुदाय के विकास में शरीक हों। वस्तानवी के इस प्रकार के विवादित वक्तव्य के बाद दारूल-उलूम की मजलिस-ए-शूरा में,देवबंद से जुड़े लोगों में तथा विशेषकर मीडिया में ज़बरदस्त हंगामा खड़ा हो गया और वस्तानवी को फौरन बर्खास्त किए जाने की मांग उठने लगी।

वस्तानवी का मामला शूरा को सौंप दिया गया जिसने गत् दिनों आखिरकार  उन्हें अपदस्थ किए जाने के पक्ष में बहुमत से अपना फैसला सुनाया। मौलाना वस्तानवी के पद छोड़े जाने के बाद अब इस मुद्दे को लेकर देश में कई प्रकार के राजनैतिक समीकरण बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं मौलाना वस्तानवी इस मुद्दे को गुजराती व गैर गुजराती मुसलमानों के बीच के विवाद के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि दारूल-उलूम पर उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों का दबदबा है और एक गुजराती व्यक्ति को पहली बार दारुल-उलूम का वाईस चांसलर होते हुए नहीं देख सके। 

 शूरा के सभी सदस्य वस्तानवी के इन आरोपों का खंडन कर रहे है. वस्तानवी के यह आरोप वैसे भी निराधर इसलिए प्रतीत होते हैं क्योंकि शूरा के जिन 5सदस्यों ने वस्तानवी के पक्ष में मतदान किया उनमें भी अधिकांश सदस्य उत्तर प्रदेश व बिहार के ही थे। राजनैतिक क्षेत्रों में इस बात की चर्चा है कि वस्तानवी अपने साथ हुए घटनाक्रम को गुजराती मुसलमानों का अपमान उसी तर्ज पर साबित करना चाह रहे हैं जैसे कि नरेंद्र मोदी स्वयं अपने ऊपर लगने वाले किसी आरोप को फौरन गुजराती समाज या गुजरातियों का अपमान बताने लगते हैं।

वस्तानवी वास्तव में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के भी ज़बरदस्त पैरोकार हैं। वस्तानवी अपने निजी प्रयासों से गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक तमाम स्कूल,कॉलेज,महिला शिक्षा संस्थान,बी एड कॉलेज,आयुर्वैदिक संस्थान,आईटीआई,कई पुस्तकालय तथा जामिया अक्कलकुआ के नाम से एक विश्वविधालय स्तरीय संस्थान संचालित कर रहे हैं। जहां कुरान शरीफ की तालीम देने के लिए मौलाना ने सैकड़ों मदरसे स्थापित किए हैं उन्होंने कई मदरसों की सहायता भी की है। वे स्वयं भी विश्व का सबसे बड़ा कुरानी शिक्षा केंद्र चला रहे हैं।

गुलाम वस्तानवी जैसे शिक्षा उद्योग से जुड़े एक धनपति व्यक्ति के लिए दारूल-उलूम का कुलपति बनना या न बनना अथवा उस पद पर बने रहना या हट जाना कोई खास मायने नहीं रखता। परंतु इस पूरे प्रकरण में जिस प्रकार गुजरात दंगों,नरेंद्र मोदी, गुजरात राज्य के मुसलमानों,उत्तरप्रदेश-बिहार के दारुल-उलूम पर वर्चस्व तथा विशेषकर एक परिवार विशेष के दारूल-उलूम का वर्चस्व होने तथा मुसलमानों से गुजरात से आगे बढऩे की बात करने जैसी जो बातें जोड़ी जा रही हैं उनसे साफ ज़ाहिर हो रहा है कि राजनीति के महारथी लोग वस्तानवी प्रकरण को राजनीति का हथियार बनाना चाह रहे हैं।

जहां तक गुजरात से आगे की सोचने का प्रश्र है तो बेशक वस्तानवी का यह कहना सही है,परंतु इस विषय पर निर्णय करने का अधिकार भी कम से कम उन्हीं लोगों को पहले दिया जाना चाहिए जो स्वयं भुक्तभोगी हैं तथा आज तक गुजरात दंगों का दंश वे व उनके परिजन झेल रहे हैं। वस्तानवी अथवा किसी अन्य मुसलिम रहनुमा अथवा धर्मगुरु के आह्वान मात्र से ऐसा नहीं होने वाला। 


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के टिप्पणीकार.





                                                                                    

प्रमोशन की रेस में जिंदगी से हारे सिपाही


सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है। एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है...

आशीष वशिष्ठ

प्रमोशन पाकर सबइंस्पेक्टर बनने के लिए होने वाली शारीरिक क्षमता परीक्षा (फिजिकल फिटनेस टेस्ट) उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मियों पर लगातार भारी पड़ रही है। राज्य के कई मंडलों में 20 जुलाई से चल रही इस परीक्षा में करीब 41 पुलिसकर्मी बेहोष हुए हैं और आजमगढ़ में हुई रेस के दौरान 37 वर्षीय पुलिसकर्मी अली सुजमा समेत चार पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है और कई की यादाश्त जा चुकी है।

 लंबे समय के बाद यूपी में सिपाही से दरोगा पद की पदोन्नती की प्रक्रिया चल रही है। यूपी में सब-इंस्पेक्टर के करीब 5380 पद खाली हैं। इस पद पर प्रमोशन के लिए पिछले मार्च में कराए गए लिखित परीक्षा में 3892 कैंडिडेट पास घोषित किए गए थे। इन्हीं कैंडिडेटों का फिजिकली फिटनेस टेस्ट के तहत 10 किलोमीटर दौड़ की परीक्षा मेरठ, आजमगढ़, कानपुर और सीतापुर पुलिस सेंटरों में 20 जुलाई से चल रही है, जिसमें अब तक 1470 कैंडिडेटों ने दौड़ परीक्षा पास कर चुके हैं।

पुलिसकर्मियों के लगातार बेहोष होने और मौत की घटनाओं की परवाह किये बिना मौत की दौड़ बदस्तूर जारी है। राज्य के स्पेशल डीजीपी बृजलाल ने यूपी के पुलिसकर्मियों से स्पष्ट किया है कि यदि वे अपने को फिजिकली फिट नहीं महसूस कर रहे हैं, तो वे प्रमोशन रेस में हिस्सा नहीं लें। बृजलाल ने माना कि कई जवान मोटापा-ब्लडप्रेशर एवं मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं, तभी इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। स्पेशल डीजीपी का कहना है कि जिंदगी ज्यादा महत्वपूर्ण है, पहले फिट हों, तभी प्रमोशन की रेस के बारे में सोचें। उनके अनुसार फिजिकल फिटनेस दौड़ यूपी में रोकी नहीं जाएगी। फिट सिपाही ही सब-इंस्पेक्टर बनने का पात्र होगा।

गौरतलब है कि देषभर में राज्य पुलिस के जवान अल्प साधनों और संसाधनों और अस्त-व्यस्त दिनचर्या के साथ जीवन यापन करते हैं। किसी भी राज्य में पुलिसकर्मियों के काम के घंटे निर्धारित नहीं हैं। वहीं पुलिसकर्मियों की कमी भी बड़ा मुद्दा है। आंकड़ों पर गौर करें तो देष में 1 लाख की आबादी के अनुपात में 142 पुलिसकर्मी तैनात है जोकि विष्व के तमाम छोटे-बड़े मुल्कों के मुकाबले काफी कम है।

संविधान के अनुच्छेद सात के अंर्तगत ‘पुलिस’ और ‘लॉ एण्ड ऑर्डर’ राज्य सूची का विषय है। नागरिकों की सुरक्षा और सहायता के लिए बना पुलिस महकमा खुद कितना बीमार, ढीला, सुस्त और लाचार है ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है। बेसिक ट्रेनिंग के बाद एकाध के अलावा किसी पुलिसकर्मी का फिजीकल फिटनेस से कोई नाता नहीं रहता है। ऊंचे पदों पर आसीन पुलिस अफसरों के लिए तो राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग और स्पेषल कोर्सेज की व्यवस्था का प्रावधान है लेकिन महकमे के मेरूदण्ड सिपाही से लेकर इंसपेक्टर तक के लिए ट्रेनिंग का खास इंतजाम नहीं है।

अधिकतर पुलिसवाले चौबीस घंटे डयूटी पर ही रहते है। उनके खाने, पीने और आराम का कोई निष्चित समय नहीं है। और ये बात समझ से परे है कि कोई व्यक्ति बिना खाये-पिये और आराम किये चौबीस घंटे पूरी ईमानदारी, निष्ठा और सर्तकता से डयूटी कर सकता है ? वहीं अनियमित दिनचर्या से फिजिकल फिटनेस और ष्षारीरीक क्षमता का क्षय होना स्वाभाविक है। सेना और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवान सारा साल फिजिकल फिटनिस और ड्रिल से जुड़े रहते हैं। लेकिन राज्य पुलिस के जवानों और अफसरों को वीआईपी डयूटी, थाना, कोर्ट कचहरी और वसूली से ही फुर्सत नहीं मिलती तो वो भला फिजीकल फिटनेस पर क्या ध्यान देंगे।

पुलिस महकमे के सुधार और पुलिस कर्मियों को बेहतर सुविधाएं दिलाने की गरज से कई आयोग और दर्जनों सिफारिशें  सरकारी फाइलों में दबी पड़ी है। ये कड़वी सच्चाई है कि थानो में बिजली, पानी, टायलेट, स्टेषनरी और तमाम दूसरी सुविधाओं का सर्वथा अभाव ही रहता है। महकमे से जितना बजट किसी थाने को मिलता है उससे तीन बंडल पेपर खरीद पाना भी बडी बात है। जिन पुलिसकर्मियों के भरोसे लाखों लोगों की जान और माल की सुरक्षा की अहम् जिम्मेदारी है जब वो ही अनफिट और बीमार होंगे तो आम आदमी किसके सहारे खुद को सुरक्षित महसूस करेगा।

Jul 31, 2011

बाजा बजाते दिग्गी राजा

मध्य प्रदेश के एक छोटे से इलाके राघोगढ़ के ठिकानेदार और चार -पांच सौ   घरों के मुखिया के रूप में जाने जानेवाले इस राजपूत नेता को आगे लाने में दिवंगत अर्जुन सिंह ने अहम भूमिका निभायी थी...

एस.के. सिन्हा  

उनकी निगाह में बाबा रामदेव एक ठग से ज्यादा कुछ नहीं हैं,भारतीय जनता पार्टी नचनियों का दल है,राष्ट्रमंडल खेलों के भ्रष्टाचार  में फंसे सुरेश कलमाडी बेकसूर हैं,कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ओसामा जी हैं,और राहुल गांधी अब इतने परिपक्व हो गये हैं कि अब उन्हें प्रधानमंत्री का पद संभाल लेना चाहिए। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का ताजा कारनामा यह बयान है कि पुलिस द्वारा पकड़ा गया हर हिंदू आतंकवादी राष्ट्र स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने मुंबई में हुए बंमकांड के तार भी  संघ से जुड़े होने की संभावना व्यक्त की जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी और उनके बीच घटिया आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ भाजपाई छात्रों ने जब दिग्विजय सिंह का घेराव कर लिया था उन्होंने एक छात्र को पकड़ कर तमाचे भी  जड़ दिये।

राहुल गांधी के खास सलाहकार के रूप में उभरे दिग्विजय सिंह यानी दिग्गी राजा को विवादास्पद बयानों के कारण एक अलग पहचान मिल रही है। उनके बयानों का निशाना भले ही विपक्ष रहता हो,लेकिन अक्सर जब-तब वे अपनी ही पार्टी और सरकार के लिए मुश्किले पैदा करने से नहीं चूकते। उनके बयान कभी-कभी इतना बखेड़ा खड़ा कर देते हैं कि बचाव में खुद प्रधानमंत्री मनमोहन को बयान देना पड़ता है। यह और बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या राहुल की ओर से उन्हें बयानबाजी करने के अभी तक नहीं रोका गया है।

आज दिग्विजय सिंह राहुल गांधी के मार्गदर्शक की तरह हैं। वे उन्हें राजनीति का ज्ञान दे रहे हैं। राहुल गांधी ने उन्हें उत्तर  प्रदेश की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी है। नोएडा में राहुल की यात्रा आयोजित करवाने में उनकी खास भूमिका रही। दिग्गी राजा का राजनीतिक एजेंडा भी काफी विशाल है। वे न केवल राहुल गांधी के माध्यम से पार्टी में अपनी जगह बनाने में जुटे हैं,बल्कि देश की राजपूत राजनीति में पैदा हुई नेतृत्व की शून्यता को भी  भरना चाहते हैं।

मध्य प्रदेश के एक छोटे से इलाके राघोगढ़ के ठिकानेदार और 400-500घरों के मुखिया के रूप में जाने जानेवाले इस राजपूत नेता को आगे लाने में दिवंगत अर्जुन सिंह ने अहम भूमिका निभायी थी। अर्जुन सिंह के खेमे के मुताबिक दिग्विजय सिंह उनके यहां आने वालों को पानी पिलवाने तक का काम करते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया कि उन्होंने अपने गुरू से ही पानी भरवा कर उन्हें राज्य की राजनीति में बेसहारा छोड़ दिया। जो स्थिति कभी अर्जुन सिंह ने राजीव गांधी के दरबार में हासिल की थी, वही आज राहुल गांधी के यहां दिग्विजय की है।

मध्य प्रदेश में लगातार दो बार सरकार बनाने के बाद जब इस इंजीनियर के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया तो उसकी सारी सोशल इंजीनियरिंग फेल हो गयी। कंप्यूटर नेटवर्क ही गांव तक को जोड़ देने वाले दिग्विजय शहरों तक को पानी,बिजली,सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने में असफल रहे और उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सभा का छींका फूट गया। कांग्रेस 2003के विधानसभा चुनाव में 230 में से महज तीन दर्जन सीटे ही जीत पायी।

इस हार के बाद दिग्विजय सिंह ने दस साल तक कोई पद न लेने का ऐलान कर दिया और दिल्ली में डेरा डाल दिया। अंबिका सोनी और अशोक गहलोत की परिक्रमा करके केंद्र में महासचिव बने। अहमद पटेल ने पुराने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए उनकी विशेष मदद की और असम का प्रभारी बना दिया। दिल्ली में आने के बाद दिग्विजय सिंह को यह भांपने  में देर नहीं लगी कि कांग्रेस का भविष्य तो राहुल गांधी के हाथों में है। वे हर रोज नोट बना कर भेजने लगे कि किस मसले पर पार्टी का क्या रुख होना चाहिए। राहुल गांधी ने उन्हें उत्तर  प्रदेश का प्रभारी बनवा दिया और संयोग से कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में अच्छी खासी सीटें मिल गयी। इसका श्रेय दिग्विजय को मिला। फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

एक समय था जबकि देश में अनेक राजपूत नेता हुआ करते थे। इनमें चंद्रशेखर,  भैरोसिंह शेखावत,अर्जुन सिंह खासे अग्रणी थे। भैरोसिंह शेखावत की राजपूतों में लोकप्रियता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा तो तमाम दलों के राजपूत सांसदों ने उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर अपने वोट दिये और वे भाजपा और उनके सहयोगी दलों के अलावा 32 अतिरिक्त वोट हासिल करने में कामयाब हो गये। ये तीनों राजपूत नेता अब इस दुनिया में नहीं है।

भाजपा में राजनाथ सिंह राजपूत होने के बावजूद उत्तर प्रदेश तक में पार्टी का जनाधार बना पाने में नाकाम रहे। उन्होंने तो जानेमाने डॉन राजा भैया के  बारे में सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि राजा भैया कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन देशद्रोही नहीं हो सकते। समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद अमर सिंह ने भी  खुद को राजपूतों का नेता साबित करने की कोशिश की, लेकिन वे दलालों के नेता होने की छवि से आज तक मुक्त नही हो पाये हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने हर दल में अपने दुश्मन पैदा कर लिये हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह के लिए राजनीति का मैदान खाली पड़ा है।

कांग्रेस के बुजुर्ग नेता याद दिलाते हैं कि एक समय था जब पहले संजय गांधी और बाद में राजीव गांधी को राजपूत नेता अपने मोहपाश में जकड़ने में कामयाब हो गये थे। संजय गांधी के समय में संजय सिंह, वीरभद्र सिंह, वीर बहादुर सिंह, अर्जुन सिंह, वीपी सिंह सरीखे नेताओं का अभ्युदय हुआ। वीपी सिंह की राजीव गांधी से निकटता कितना ज्यादा थी,यह तथ्य भी किसी से छिपा नही है। यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने ही राजीव गांधी की सरकार के पतन में अहम भूमिका अदा की। वीपी सिंह के बारे में राजीव गांधी ने वोट क्लब की रैली में कहा था कि उन्हें इस बात का खेद है कि पार्टी में ‘जयचंद’घुस गये हैं। अर्जुन सिंह को तो उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए पूरी पार्टी की ही जिम्मेदारी सौंप दी थी।

दिग्विजय सिंह को लगता है कि नेतृत्व-शून्यता वही भर सकते हैं। इसके साथ ही उनकी नजर मुस्लिम वोट बैंक पर भी  है। कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि दिग्विजय सिंह जो कुछ कर रहे हैं,उसके पीछे सोनिया और राहुल गांधी को पूरी सहमति है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज से नाखुश यह परिवार यूपीए सरकार के लगाता घोटालों में घिरते जाने के कारण बेहद परेशान है। उनका मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाये गये तो कांग्रेस को बहुत ज्यादा नुकसान होगा। इसलिए वे उनकी निर्भरता  दिग्विजय सिंह पर बढ़ती जा रही है।

दिग्विजय सिंह के करीबियों के मुताबिक उन्होंने हाईकमान को यह सलाह दी है कि सरकार के भ्रष्टाचार और घोटालों से ध्यान हटाने के लिए जरूरी है कि विपक्ष का ध्यान और ऊर्जा कही और केंद्रित की जाये। असली मुद्दों से विपक्ष को भटकाने के लिए ही वे ऐसे बयान दे रहे हैं,जिनसे कि विपक्ष खंडन-मंडन में ही फंस कर रह जाये। उनका दावा है कि इस काम में दिग्गी राजा को महारत हासिल है। जिस नेता ने माधव राव सिंधिया, अर्जुन सिंह, विद्या चरण शुक्ल सरीखे धुरंधरों को मध्य प्रदेश की राजनीति में धूल चटाने में कामयाबी हासिल की हो,उसके लिए विपक्ष को उलझाना कोई मुश्किल काम नहीं है। वे बताते हैं कि इसके साथ ही उनका लक्ष्य अहमद पटेल हैं। उनका मानना है कि राजनीति के शीर्ष पर पहुंचने में बड़ी उनके लिए अंतिम बाधा साबित हो सकते हैं।

द पब्लिक एजेंडा से साभार   

भगत सिंह मामले में खुशवंत सिंह की सफाई

आज दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में खुशवंत सिंह ने अपने पिता पर लग रहे आरोपों का जवाब देने की कोशिश की है. पिछले दिनों जनज्वार ने यह मुद्दा तीसरा स्वतंत्रता आन्दोलन के नेता गोपाल राय के लेख 'भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले को सम्मान'  के जरिये प्रमुखता से उठाया था...

खुशवंत सिंह

कुछ वक्त पहले मैंने नई दिल्ली बनाने वालों पर लिखा था। उनमें पांच लोग खास थे। मेरी शिकायत थी कि उनमें से किसी के नाम पर दिल्ली में सड़क नहीं है। तब तक मुझे नहीं पता था कि मनमोहन सिंह ने शीला दीक्षित को इस सिलसिले में एक चिट्ठी लिखी है। उनकी गुजारिश थी कि विंडसर प्लेस को मेरे पिता शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए।

उसके बाद एक किस्म का तूफान ही आ गया। कई लोगों ने विरोध जताया कि मेरे पिता तो ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू थे। मैंने उस पर कुछ भी नहीं कहा। जब कुछ अखबारों ने उनका नाम भगत सिंह की सजा से जोडा, तो मुझे तकलीफ हुई। सचमुच, उस खबर में कोई सच नहीं था।
दरअसल, शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने इंस्पेक्टर सांडर्स और हेड कांस्टेबल चन्नन सिंह की हत्या की थी। वे इन दोनों से लाला लाजपत राय का बदला लेना चाहते थे। लाहौर में लालाजी की हत्या में उनका हाथ था।

उसके बाद भगत सिंह और उनके साथी हिन्दुस्तान की आजादी के आंदोलन को दुनिया की नजरों में लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तय किया कि संसद में हंगामा करेंगे। और फिर अपनी गिरफ्तारी दे देंगे। ठीक यही उन्होंने किया भी।

ये लोग दर्शक दीर्घा में जा बैठे। वहीं मेरे पिता भी बैठे थे। संसद में बहस चल रही थी। और वह खासा उबाऊ थी। सो मेरे पिता ने अखबार निकाला और उसे पढ़ने लगे। अचानक पिस्टल चलने और बम के धमाके की आवाज सुनी। वहां बैठे बाकी लोग भाग लिए। रह गए मेरे पिता और दो क्रांतिकारी।

जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई, तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। मेरे पिता का जुर्म यह था कि उन्होंने कोर्ट में दोनों की पहचान की थी। दरअसल, मेरे पिता ने सिर्फ सच कहा था। सच के सिवा कुछ नहीं। क्या सच कहना कोई जुर्म है? फिर भी मीडिया ने शहीदों की फांसी से उन्हें जोड़ दिया। सचमुच उनका क्रांतिकारियों की फांसी से कोई लेना-देना नहीं था। यह एक ऐसे आदमी पर कीचड़ उछालना है, जो अपना बचाव करने के लिए दुनिया में नहीं है।