Jun 20, 2011

पड़ोस के लुटेरे

बासो और बासो जैसी कितनी हजारो की दास्तान सुनकर सवाल उठता है आखिर हमने कैसा सामाज बनाया है। अपने ही माँ, पड़ोस, भाई-बहन को लूट रहे हैं। बाहरी लूटेरों से तो लड़ सकते हैं-लेकिन अपने बनाये समाज से कैसे लड़गें...

दयामनी  बारला 

जिस माँ से आशीर्वाद  की उम्मीद में हम उनका चरण स्पर्श  करते हैं, धन की लोलूपता उसी माँ को लूटने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती है। ये हैं बासो देवी, विधवा माँ । घर है झारखण्ड के गुमला जिला के बसिया प्रखंड के पोकट गांव में। रहने के लिए छत  नहीं है। पड़ासियों ने अपने घर में पनाह  दिया है। देश के बाकि हिस्सों की तरह यहाँ भी बेघरों को इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत आवास दिया जाता  है। बासो देवी को भी सरकार की ओर से इंदिरा आवास स्वीकृत हुआ है और माकन बनाने के लिए उन्हें  45,000 रूपये भी सरकार की और से मिले हैं. 

बासो देवी : लूट में अपनों का हाथ
इन रुपयों में से  20,000  बसों देवी ने निकाला कि माकन बनाने का काम शुरू हो सके । 6 जून 2011 को पोकटा पंचायत में मनरेगा योजना में काम किये मजदूरों को मजदूरी का भूगतान नहीं किया गया , इस संबंध में मजदूरों की बैठक में बासो देवी ने हमें अपना दुखड़ा सुनाया कि कैसे माकन का सपना अधुरा रह गया और वह बेघर हालत मेंवह दूसरे के यहाँ शरण ली हुई हैं। उम्र इतना हो गया है कि अब बासो  बिना डंडा के खड़ी भी नहीं हो पाती हैं । एक तरफ उनमें माँ की ममता  छलकती है, तो दूसरी ओर सामाज द्वारा छल -कपट की शिकार पीड़ित वृद्ध  औरत का दर्द भी छलक रहा है।

कहती है-इंदिरा आवास बना थों-नवीण कहलक पत्थल-इंटा गिराय देबु पैसा दे (इंदिरा आवास के लिए नवीन ने कहा कि पैसा दो तो माकन के लिए ईंट-पत्थर गिरा दूंगा) । ९००० (नौ हजार) लेईगेलक आज तक न तो इंटा गिरायेल ना तो पत्थर । कई धर गेलों कहेकले-कि गिराय दे-कहते रहाई गेलक हां गिराय देबु-आईज तक कोनो नंखे (नौ हजार ले गया, लेकिन ईंट गिराया न पत्थर. कई बार कही भी तो आजकल करता रहा)। बासो आगे कहती हैं -अब हम मिटटी का ही दिवाल उठा रहे है। घर तो किसी तरह तैयार करना ही है -इसलिए कि दूसरों के घर में हुं।

बासो और बासो जैसी  कितनी हजारो की दास्तान सुनकर सवाल उठता है आखिर हमने कैसा सामाज बनाया है। अपने ही माँ, पड़ोस, भाई-बहन को लूट रहे हैं। बाहरी लूटेरों से तो लड़ सकते हैं-लेकिन अपने बनाये समाज से कैसे  लड़गें, शुरुआत कहां से हो-यह अपने समाज के भीतर और बाहर सबसे बड़ा सवाल  है। इस लड़ाई को आसानी से जीता जा सकता है-यदि सरकारी मशीनरी, प्रशासन इस लूट तंत्र को रोकने के प्रति कटिबद्व हो। साथ ही समाज को भी सोचना होगा की..क्या हम इसी  तरह के माहौल  में रहना चाहते हैं...




झारखण्ड की प्रमुख और सशक्त सामाजिक कार्यकर्त्ता. देश के विभिन्न जनांदोलनों से गहरा जुड़ाव. संघर्षों के बीच वह अपनी बात पहुँचाने के लिए लगातार लिखती रहती हैं. लोकतंत्र की सच्ची दास्तानगोई  दयामनी बारला के जरिये अब आपके बीच होगी.
  






Jun 19, 2011

मानवाधिकार उल्लंघन में सर्वोपरि होता पाकिस्तान

आतंकवादियों, कट्टरपंथी ताकतों, बाहुबलियों,पंचायतों द्वारा पाकिस्तान में सरेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन किया ही जा रहा है,अब सुरक्षाकर्मियों,सैनिकों,आईएसआई व रेंजर्स द्वारा भी उसी मानवता विरोधी नक्शेकदम पर चलने का प्रयास, आखिरकार पाकिस्तान को किस मोड़ पर ले जाएगा...

तनवीर जाफरी

स्वतंत्र इस्लामी राज्य के गठन की अवधारणा को लेकर 14 अगस्त 1947 को संयुक्त भारत से विभाजित होकर अस्तित्व में आया पाकिस्तान आज मूल इस्लामी सिद्धांतों व शिक्षाओं की भी धज्जियां उड़ाता दिखाई दे रहा है। कुरान शरीफ द्वारा निर्देशित इस्लामी शिक्षा साफतौर पर मुसलमानों को यह हिदायत देती है कि ‘किसी बेगुनाह के साथ कोई ज़्यादती हरगिज़ मत करो। और यदि तुमने किसी एक बेगुनाह का कत्ल किया तो गोया तुमने पूरी इंसानियत का कत्ल कर डाला’। परंतु मानवाधिकारों की रक्षा की बात ही क्या करनी पाकिस्तान तो आज उस इस्लाम के सिद्धांतों से भी दूर होता जा रहा है जिसके नाम पर इस भू-भाग को भारतवर्ष से अलग कराया गया था।

पाकिस्तान में इन दिनों रोज़मर्रा के हालात तो यही बता रहे हैं कि वहां तकरीबन रोज़ाना एक-दो नहीं बल्कि कई-कई बेगुनाह मारे जा रहे हैं। कभी कट्टरपंथी तालिबानी आतंकवादियों के हाथों, कभी किसी आत्मघाती हमले के द्वारा, कभी सेना के जवानों की गोलियों से तो कभी पुलिस या पाक रेंजर्स के हाथों। और कई रहस्यमयी हत्याओं की खबरें तो ऐसी भी सामने आ रही हैं जिनमें सीधेतौर पर आईएसआई तथा सेना की भी साजि़श होने का इल्ज़ाम है।

अभी पाकिस्तान के एक 40 वर्षीय पत्रकार को अपनी पत्रकारिता के दायित्वों का पालन करते हुए अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। इसी वर्ष  31 मई को सैय्यद सलीम शहज़ाद नामक यह पत्रकार सिर्फ इसलिए कत्ल कर दिया गया था क्योंकि उसने पाकिस्तान की नवसेना तथा अलकायदा के मध्य सांठगांठ होने के नापाक नेटवर्क का पर्दाफाश किया था। गौरतलब है कि सलीम शहज़ाद की हत्या के पीछे आईएसआई की साजि़श बताई जा रही है।



अभी इस घटना को बीते मात्र एक सप्ताह ही बीता था कि  9 जून को पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन की एक और सनसनीखेज़ घटना सामने आई। सरफराज़ नामक एक 19वर्षीय युवक जो कि कराची के बोट बेसिन क्षेत्र में स्थित बेनज़ीर भुट्टो पार्क में सैर कर रहा था उसे पाक रेंजर्स ने दबोच लिया। उसके पश्चात उसे पार्क से बाहर लाकर चारों ओर से 6-7 सशस्त्र रेंजर्स ने घेर लिया और सभी रेंजर्स ने उस निहत्थे युवक सरफराज़ पर बंदूक व पिस्टल तान ली। दहशत का मारा वह युवक अपनी जान की भीख मांगता हुआ उन रेंजर्स के समक्ष हाथ जोडक़र गिड़गिड़ाता रहा। परंतु उसके जवाब में ज़ालिम रेंजर्स ‘गोली मार दो’ व ‘इसे मार डालो’ जैसी दहशतनाक आवाज़ें बुलंद करते रहे। इतना ही नहीं एक रेंजर ने तो युवक के बाल पकडक़र कैमरे के समक्ष उसका मुंह भी साफतौर पर दिखाने की कोशिश की। और उसके बाद  पाक रेंजर्स ने भरी दोपहर में सार्वजनिक स्थल पर ही बिल्कुल करीब से गोली मार कर निहत्थे सरफराज़ को कत्ल कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो भी एक पत्रकार द्वारा बनाई गई। घटना के तुरंत बाद यह दहशतनाक वीडियो पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया के कई टीवी चैनल्स द्वारा प्रसारित कर दी गई। पूरी दुनिया ने मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाने वाली पाकिस्तान रेंजर्स की इस वहशियाना कार्रवाई को बड़ी हैरत से देखा। पाक रेंजर्स को इस मामले पर अपनी फज़ीहत होते देख अच्छा नहीं लगा। इनके गुर्गों द्वारा अब उस पत्रकार को भी धमकी दी गई है जिसने दिन-दहाड़े रेंजर्स द्वारा सरफराज़ के कत्ल की वीडियोग्राफी की थी। यानी  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने का फिर  घिनौना प्रयास।

हालाँकि पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी ने इस घटना पर स्वयं संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान रेंजर्स के निदेशक मेजर जनरल एजाज़ चौधरी तथा पुलिस महानिरीक्षक फय्याज़ लघारी को न सिर्फ बर्खास्त कर दिया है बल्कि महालेखाकार कार्यालय को यह निर्देश भी दिया कि इन अधिकारियों को उस समय तक कोई वेतन न दिया जाए जब तक अदालत अपना अगला आदेश जारी न करे। दोषी  रेंजर्स को घटना के अगले ही दिन गिरफ्तार कर पुलिस के हवाले कर दिया गया था। इस कत्ल को लेकर पाक रेंजर्स द्वारा अपने बचाव में यह कहा जा रहा है कि सरफराज़ डकैती जैसे जुर्म में शामिल था। जबकि उसके परिजनों का कहना है कि उनका लडक़ा बेगुनाह था तथा पार्क में सैर करने की गरज़ से गया हुआ था। उच्चतम न्यायालय ने इस बात की जांच के आदेश दिए हैं कि युवक सरफराज़ का कोई आपराधिक रिकॉर्ड था भी या नहीं।

इस घटना पर पाकिस्तान के कई जि़म्मेदार नेताओं द्वारा गहरी चिंता व दु:ख व्यक्त किया गया है। पाकिस्तान में तमाम जि़म्मेदार लोग यह महसूस कर रहे हैं कि चूंकि पाक रेंजर्स पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा केंद्र का एक अंग है तथा सीधे तौर पर यह गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं,इसलिए इतनी जि़म्मेदार सुरक्षा एजेंसी द्वारा दिन-दहाड़े एक निहत्थे युवक के साथ कातिलों के रूप में पेश आना पाकिस्तान की शासन व्यवस्था तथा सुरक्षातंत्र की कार्यप्रणाली पर सीधे तौर पर प्रश्रचिन्ह लगाते हैं। हालांकि पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने इस घटना के फौरन बाद ही घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए थे। परंतु प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी को पाकिस्तान व दुनिया के अन्य हिस्सों में  इस घटना को लेकर पाक रेंजर्स की हो रही निंदा व आलोचना अच्छी नहीं लगी। गिलानी ने साफतौर पर सदन में पाक रेंजर्स का यह कहकर बचाव किया कि ‘किसी एक घटना से समूचे संस्थान को बदनाम नहीं किया जा सकता’।

मानवाधिकार उल्लंघन की इस प्रकार की कोई सिर्फ एक या दो घटनाएं ही नहीं बल्कि  इसी वर्ष मई माह में पांच चेचेन नागरिकों को  सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान के क्वेटा के खरोताबाद क्षेत्र में दिन-दहाड़े मार डाला गया। इनमें तीन पुरुष व दो महिलाएं शामिल थीं। मारी गई एक महिला सात माह की गर्भवती भी थी जिसके शरीर में सुरक्षाबलों ने 12 गोलियां उतार दीं। इन निहत्थे चेचेन नागरिकों की हत्या के बाद जब सुरक्षा बलों के विरुद्ध हंगामा हुआ उस समय अपने पक्ष में सुरक्षा बलों द्वारा फिर यही तर्क दिया गया कि इनमें से तीन युवक संदिग्ध आत्मघाती हमलावर थे। 18 से लेकर 25 वर्ष आयु वर्ग के यह सभी नवयुवक संदिग्ध आतंकी होने के कथित संदेह पर सरेआम मार दिए गए।

हालांकि उनके कब्ज़े से किसी प्रकार के कोई हथियार भी बरामद नहीं हुए। जबकि सुरक्षा कर्मियों पर आरोप यह लगाया गया कि पाक सुरक्षा कर्मी एक चेचेन महिला के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती कर उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाह रहे थे।  ऐसे में सवाल यह उठता है की   आत्मघाती हमलावरों,आतंकवादियों, कट्टरपंथी ताकतों, बाहुबलियों,पंचायतों द्वारा पाकिस्तान में सरेआम मानवाधिकारों का  उल्लंघन किया ही जा रहा है,अब सुरक्षाकर्मियों,सैनिकों,आईएसआई व रेंजर्स द्वारा भी उसी मानवता विरोधी नक्शेकदम पर चलने का प्रयास, आखिरकार पाकिस्तान को किस मोड़ पर ले जाएगा ।



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.




गरीबों का आवास व्यापारियों - पत्रकारों के नाम



जनज्वार टीम. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में कांशीराम शहरी गरीब आवासीय योजना के तहत निम्नीपार और हरदौली घाट मोहल्ला स्थित कुल 1500 आवास निरीह , असहाय और निराश्रित बी0पी0एल0 कार्ड धारको के लिये बनाये गये थे। कार्यदायी संस्था लोक निर्माण विभाग, जिला विकास अभिकरण ने बिल्डिंग निर्माण का काम झांसी की फर्म मेसर्स ओम शांति बिल्डर्स को दिया था तथा जिला विकास अभिकरण के सहायक अभियंता हरगोविन्द और अवर अभियंता अखिलेश कुमार ने पूरे निर्माण कार्य का मेजरमेंट विगत 14 मई 2009 को किया था।
बान्दा में बन रहा गरीबों का आवास : कब्ज़ा अमीरों का

गौरतलब है कि 23 फरवरी 2011 को मुख्यमंत्री उ0प्र0 मायावती जी द्वारा कांशीराम आवास योजना का लावलश्कर के साथ शिलान्यास यह कहते हुये किया गया कि बुंदेलखंड में अब कोई गरीब सड़को पर नही सोयेगा। बीते 26 मई को मुख्य सचिव अनूप मिश्रा ने भी कांशीराम आवास योजना का मौके पर जाकर मुआयना किया और नजर आयी खामियों को संम्बंधितअधिकारियों से दूर करने को कहा गया।

डूडा विभाग के एपीओ पवन शर्मा और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शारदा यादव ने अपने परिवारिक रिश्तेदारो के साथ साथ जनपद के दबंग, सरकारी कर्मचारी , व्यापारी और कुछ तथाकथित पत्रकारों के साथ लाईसेस बंदूकधारी व्यक्तियों केा भी बी0पी0एल लोगो के आवास आवंटित कर दिये। साथ ही जिन लोगो को बी.पी.एल कार्ड मे आवास दिये गये उनसे 30000 से 40000 तक की अवैध धन उगाही की गयी। इसके साथ ही इन आवासों  में चालीस प्रतिशत एक जाति विशेष को भी आवास आंवटित किये गये।

सामाजिक कार्यकर्ता एवं सूचनाधिकार एक्टिविस्ट आशीष सागर ने कई मर्तबा सम्बंधित अधिकारियों  से इस बात की लिखित और मौखिक शिकायते की लेकिन वह सब नक्कारखाने में तूती ही बनकर रह गयी। इधर बीते 16.06.2011 को हरदौली घाट के आवासों में एक मंजिला इमारत के बिना आंधी पानी  गिर जाने से कालीचरण 35 निवासी कोहारा बिसंडा और कंधी निवासी अमलाहट , अजयगढ़ अपने बच्चों समेत गंभीर रूप से घायल हो गये है साथ ही बीते दो दिनो से जनपद मे आवंटनो मे की गयी धांधली को लेकर कुछ  गरीबो  द्वारा आमरण अनशन शुरू कर दिया गया है।

अनशन में बैठे लच्छू रैदास, सावित्री, सुनीता रैकवार , रामप्यारी, रामरती, सरोज तिवारी, सुमन वर्मा , लखन रैकवार और तुलसी ने इस भ्रष्टाचार के खुलासे की मांग की है। वहीं भारतीय यग मैन के संपादक बाल कृष्ण पांडेय , चित्रकूट टाइम्स के संपादक राजेश पांडेय सहित दैनिक जागरण के पूर्व ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार बिनोद मिश्रा तक के नाम 2 से 3 कालौनियां आवंटित की गयी है।

  • बीपीएल आवास  200 से 300 बीघा के कास्तकारों को बांटे गये गरीबों के आशियाने
  • बीस करोड़ की लागत वाले 1500 आवासों में 940 की खुलने लगी पोल
  • जिला शहरी विकास अधिकरण (डूडा) ने नही दी आरटीआई की सूचना

डूडा विभाग के शारदा यादव की पत्नी के नाम भी तीन कालौनियां आंवटित है यह तो भ्रष्टाचार में की गयी धांधली की एक नजीर बस है। जब कि एपीओ डूडा ने तीस दिवस बीत जाने के बाद भी जन सूचना अधिकार मे मांगी गयी जानकारी उपलब्ध नही करायी है जिसकी प्रथम अपील जिलाधिकारी बांदा को आशीष सागर ने की है। वैसे तो इस मुदद्े को लेकर तमाम राजनीतिक दलो में हलचल शुरू हो गयी है और हो भी क्यों नही आखिर प्रकरण बी0पी0एल0 वोट बैंक का है और बुन्देलखण्ड में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी का मिशन भी विधान सभा चुनाव 2012 को फतह करना है। भ्रष्टाचार के पाटे में तो पूरा देश ही जल रहा है लेकिन बुन्देलखण्ड की कमोवेश स्थिति और भी ज्यादा भी गम्भीर हो रही है। मसलन गरीब लोगो के आवास भी अब अमीरजादो की ऐशगाह बन गये है।



शिक्षा के व्यावसायीकरण पर गोष्ठी

लखनऊ . ‘शिक्षा के व्यावसायीकरण  के प्रभाव’ विषय पर बीते 14 जुलाई को लखनऊ के बली प्रेक्षागृह में रीगल मावन सृजन संस्थान की ओर से सेमिनार का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता शिक्षाविद अरुणेश मिश्र ने की तथा संचालन किया संस्थान की महासचिव मंजू शुक्ला ने।

इस मौके पर बोलते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि शिक्षा का जिस तरह से बाजारीकरण हुआ है, उससे न सिर्फ शिक्षा की गुणवता प्रभावित हुई है बल्कि शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है। शिक्षा की सर्वग्राहिता ही समाप्त होती जा रही है। मौजूदा समय में शिक्षा एक खास वर्ग की जागीर बनती जा रही है। निजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है, जहाँ न तो फीस का मानक तय है और न ही शिक्षण कार्य का। अच्छे स्कूल का मानक लम्बी फीस है। इसकी वजह से समाज का बड़ा हिस्सा शिक्षा से दूर होता जा रहा है। शिक्षा माफिया पैदा हो गये हैं जिनका मकसद मात्र धन उपार्जन है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन ने कहा कि आजादी के बाद से शिक्षा पर किसी ने घ्यान नहीं दिया। देश का निर्माण तभी संभव है जब सर्वग्राही स्कूलिंग की व्यवस्था की जाती और कारगर योजना बनाई जाती। 1952 में डॉ0 राममनोहर लोहिया ने इस ओर इशारा किया था और कहा था कि जो आजादी हमें मिली है, वह विखण्डित है। अब तो हर चीज के लिए हम अमरीका के मुखापेक्षी हो चुके हैं। मैकडोनल्ड की संस्कृति चारो तरफ फैल रही है, शिक्षा के क्षेत्र में भी इसने हाथ-पैर फैला दिये हैं।

कवि और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में नागरिको को शिक्षा और चिकित्सा प्रदान करना राज्य की जिम्मेदारी है। आजादी के बाद हमारे यहाँ कल्याणकारी राज्य की घोषणा हुई और इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाये गये जो जरूरत को देखते हुए अपर्याप्त थे। पर आज तो वैश्वीकरण के इस दौर में उससे भी सरकार ने अपना हाथ खींच लिया है।

शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मानव संस्कृति के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को अमीरों व धन्नासेठों के हवाले कर दिया गया है। तथ्य तो यह है कि हमारी सरकार का रक्षा बजट दिन.दिन बढ़ता जा रहा है, वहीं शिक्षा व स्वास्थ्य पर बजट घटता जा रहा है। इन क्षेत्रों का सेवा, ज्ञान व संस्कृति के संवर्द्धन की जगह व्यवसाय में बदल जाना सरकार की उन अमीर परस्त. साम्राज्यपरस्त नीतियों की देन है। इसीलिए शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरोध का मतलब इन नीतियों के विरुद्ध संघर्ष है। इस संदर्भ में रीगल मानव सृजन संस्थान का संघर्ष महत्वपूर्ण है। ऐसे संघर्ष को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

सेमिनार को एसके पाण्डेय, विश्वकांत मिश्रा, एससी यादव आदि शिक्षाविदों ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर रीगल मानव सृजन संस्थान के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया। यह संस्थान का चौथा वार्षिकोत्सव भी था। बच्चों ने ‘हम होंगे कामयाब’ पेश कर यह संदेश दिया कि संघर्ष और आशाएँ कभी खत्म नहीं होती हैं। मानव के अन्दर सृजन की अकूत संभावनाएँ हैं जिन्हें समझने और आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस संदर्भ में संस्थान का चार साल का यह सफर मील के पत्थर की तरह है। विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजयी बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन सुधा राजपूत ने किया और अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन संस्थान की महासचिव मंजू शुक्ला ने दिया।

 

Jun 18, 2011

मंगर-शनिचर की ‘दछ’ से भेंट वार्ता


मंगर-शनिचर की दूसरी वार्ता आपके सामने है। यह वार्ता हर मंगर-शनिचर को आपके बीच होगी...किस्त - 2

आप कहते हैं कि भू, नि और बा के रहते भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा और फिर भी सबको भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं। का कहीं से कन्फ्यूज  हैं...

गजराज  

हाल में बीते चंद्रग्रहण की पूर्व संध्या पर मंगर-शनिचर बनारस पहुंचे। मुफ्त की ट्रेन मिल गयी तो वे एक दिन पहले ही चल दिये और अस्सी घाट पर पड़ गये। गंगा को संयोग से साफ और भरपूर पानी से भरा देख दुन्नों में खुशी की लहरी समा गयी और वे छपाक से छलांग लगा डाले। घंटे भर गंगा में आनंद लेने के बाद बाहर निकले तो मंगर ने कहा, ‘अबे शनिचर, भोजन का इंतजाम दिमाग में तो हो गया।’

शनिचर- ज्यादा भाववादी न बनो बच्चा, बात सीधी कहो?

मंगर- उ तुलसी घाट के बगल में पीली और गुलाबी कोठी तुम्हें दिखायी पड़ रही है, वह संकट मोचन के महंथ की है, जो अपने ही जिले का है। चलो ट्राई मारते हैं, मामला बन जायेगा।

दुन्नों सटासट कपड़ा धारण किये और यह सोचकर बढ़ने लगे कि समय से पेट भर जाये,फिर घाट की सीढ़ियों पर नींद अच्छी आये। मंगर ने कहा भी, ‘कदम तेज धरो शनिचर, जल्दी से पेट में अन्न भरकर तत्काल प्रभाव से यहां पलट आना है और कल पूरा दिन बनारस भ्रमण का आनंद लेना है।’

तभी अचानक मंगर बोला -‘अबे ई देखो का हो रहा है!’ मंगर ने शनिचर से उचक कर कहा और दोनों उस ओर चल पड़े। सीढ़ियों पर चढ़ते और पढ़ते जा रहे थे -भ्रष्टाचार  के खिलाफ एकजुट हों, लोकपाल बिल लागू हो,कालाधन के खिलाफ...। बैनर पर छपी इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद दोनों उस तरफ बढ़े,जहां एक दढ़ियल-छड़ियल (चेहरे पर दाढ़ी और बदन छड़ की तरह) नौजवान कुछ लोगों को समझाने की कोशिश में लगा था।

मंगर-शनिचर को दढ़ियल-छड़ियल (दछ)की ओर आते देख उन लोगों ने दछ को  इशारा कर कहा, ‘अब 'इन्हें भी समझाओ भैया।’

दछ -हां साथी,हम उन्हें भी समझायेंगे। आप उसकी चिंता न करें,पहले आप तो समझ लें कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आगे ले जाते हुए व्यवस्था परिवर्तन में कैसे बदलना है। आपलोग अपना मोबाइल और पता लिख दें। हम लोगों के साथी आपसे मिलकर बताएँगे  कि कैसे अन्ना हजारे और रामदेव की  नकली लड़ाई से बाहर निकल क्रांतिकारी विकल्प तलाशना है।

समझने वाले ‘दछ’ के कहे अनुसार कुछ करते, उससे पहले ही मंगर-शनिचर ‘दछ’ से सटकर खड़े हो गये और उनके हाथ में पड़े परचों को काबिल निगाहों से निहारने लगे। इस सीन को ‘दछ’ ताड़ गये और वे संयत ढंग से उन दोनों की तरफ मुखातिब हुए।

‘दछ’ को अपनी ओर मुखातिब होते देख मंगर ने कहा, ‘अरे देखिये, वो लोग भगे जा रहे हैं।’

दछ- हमलोग किसी को पकड़ते नहीं हैं। पकड़ती और जकड़ती तो यह व्यवस्था है, जो सबको गुलाम बनाकर अधिकारों के प्रति जागरूक होने से रोकती है। हमलोग सिर्फ लोगों को अपने साथ खड़ा होने के लिए कहते हैं।

‘दछ’ के इतना बोलने पर मंगर उन्हें रोक के बोला, ‘हम लोग तो अभी आपके साथ ही खड़े हैं, लेकिन वो लोग तो चले गये जिन्हें आप पहले से यहां खड़ा किये थे। देश  भर में लोग आपके साथ क्या इसी तरह खड़े हो रहे हैं?’

दछ- देखिये हमने आपसे पहले ही कहा कि यह एक व्यापक संघर्ष  है, जिसमें लोग आते-जाते रहते हैं। हो सकता है आप सुनकर चलते बनें, तो फिर हम अगले से अपनी बात कहेंगे।

शनिचर- यानी आप हमारे गांव के पंडितों की तरह कथा बांचते रहते हैं, चाहे गाय सुने या गोबर ?

दछ-  इसे आप जैसे लोग कथा कहते हैं और हम जैसे क्रांतिकारी फैसलाकून लड़ाई की तैयारी। भूमंडलीकरण, निजीकरण और बाजारीकरण के रहते हुए भ्रष्टाचार  कभी नहीं खत्म हो सकता।

मंगर-फिर तो आप ठग निकले। आप कहते हैं कि भू, नि और बा के रहते भ्रष्टाचार  खत्म नहीं होगा और फिर भी सबको भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा भी कर रहे हैं। का कहीं से कन्फ्यूज हो रहे हैं..। आखिर पहले भू, नि और बा को ही खत्म क्यों नहीं कर लेते।

दछ- मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के जनवादी छात्र संगठन से आया हूं और मैं वहां पीएचडी कर रहा हूं। वहां पर हम लोगों का कई विश्वविद्यालयों में व्यापक संघर्श चल रहा है और हजारों की संख्या में छात्र हमसे इस आंदोलन में जुड़ रहे हैं।

शनिचर- यह काम आप कब से कर रहे हैं, आपको कितनी आमदनी हो जाती है ?

दछ- आप दोनों कैसे सवाल कर रहे हैं। कुछ संगठन आदि की समझ है या नहीं। कभी गांव-देहात देखा है कि वहां गरीबों की क्या स्थिति है। अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के बारे में कुछ जानते हैं। कमेटी कहती है कि देश की अस्सी फीसदी जनता बीस रुपये में रोज गुजारा करती है। शिक्षा के बाजारीकरण के कारण इंजीनियरिंग,मेडिकल कॉलेजों की शिक्षा बड़े बाप के बेटों की बपौती बन गयी है। गरीबों को पढ़ने की सुविधा नहीं है,ईलाज नहीं है। इसलिए भगत सिंह के सपनों का भारत बनाने के लिए वैसे युवाओं की आवष्यकता है, जिनके रगों में पानी नहीं खून हो।

शनिचर-देश में ज्यादातर लोगों के पास खाने का पैसा ही नहीं है तो खून वाले युवा मिलेंगे कैसे? उसके लिए तो आपलोगों को सेठियों के लौंडों को पोटना पड़ेगा।

मंगर को लगा कि षनिचर कुछ हॉर्ड टॉक में उलझ रहा तो उसने सौम्य एहसास के साथ कहा- लेकिन बीस रुपये वाले इंजीनियरिंग-मेडिकल में कैसे पढ़ेंगे?

दछ-अब आपने सही सवाल पूछा है। हमारी लड़ाई है कि शिक्षा का समाजवाद हो। निजीकरण के कारण फीस भरना गरीब के बस का नहीं रह गया है।

शनिचर-लेकिन फीस की बात तो बाद में है। पहला सवाल तो है कि जो बीस रुपया कमायेगा वह बेटे-बेटियों को अपने मंडल जैसे गोरखपुर आदि में कैसे भेजेगा। काहे कि उससे पहले कोई मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है जिले में। और आप कह रहे हैं कि देश की अस्सी प्रतिशत आबादी बीस रुपया रोजाना कमाती है। यानी साफ है कि देश की अस्सी फीसदी आबादी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा संस्थानों में नहीं भेज सकती,चाहे वह प्राइवेट हों या सरकारी। अगर मैं आपकी बात ठीक से समझ पा रहा हूं तो आप समाज के बीस फीसदी लोगों के लिए लड़ रहे हैं और व्यापक एकता बना रहे हैं।

दछ- उफ...दरअसल आप जैसों लोगों को समझाना मुश्किल होता है,जो सिर्फ बात के लिए बात करते हैं और लुंपेन सर्वहारा होते हैं। हम लोग क्रांतिकारी समाज के निर्माण के लिए लड़ रहे हैं और बीस फीसदी को उखाड़ कर अस्सी फीसदी की सत्ता बनाने के लिए।

इतना कहने के साथ ‘दछ’ गुस्से में जान पड़े और वे दूसरे झुंड को समझाने चल पड़े। इधर मंगर-शनिचर ‘व्यापक’, ‘संघर्श’, 'खड़ा', 'लड़ाई', ‘खिलाफ’ ' भू-नि-बा' और सबसे दिलचस्प ‘लुंपेन सर्वहारा’ का विश्लेशण करते हुए तेज सीढ़ियां चढ़ने लगे ...।


(लेखक ‘फोटलचरी’विधा के पहले भारतीय संकलनकर्ता हैं। नीचे कमेंट बॉक्स के जरिये उनसे संपर्क, सुझाव और शिकायत का रिश्ता बनाया जा सकता है।)




मीडिया के सुशासन पर सवारी गांठते नीतीश कुमार


नीतीश सरकार ने बिहार के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों की आर्थिक नब्ज दबा रखी है। राज्य सरकार से मिले कागज़ के टुकडे यह बताते हैं कि सरकार काम पर कम, विज्ञापन पर ज्यादा ध्यान देती है...

अफरोज आलम 'साहिल'

अख़बारों को देख यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार खूब तरक़्क़ी कर रहा है। हर दिन विकास की नयी-नयी योजनाओं की घोषणाएं हो रही हैं। विकास कार्यों के विज्ञापन अखबारों में खूब छप रहे हैं। हर दिन किसी न किसी काम का शिलान्यास हो रहा है। इसके लिए बधाई के पात्र हैं हमारे ‘सुशासन बाबू’ यानी नीतीश कुमार जी। लेकिन विकास की जो तस्वीर मीडिया ने बिहार और देश की जनता के सामने पेश की है, वो  ‘सच’ नहीं है। बल्कि नीतीश कुमार का सच तो कुछ और है,जिसे पूरे देश की जनता ने 3 जून को बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज गोलीकांड में देख लिया  है।

फारबिसगंज पुलिस गोलीकांड की घटना को दो सप्ताह से अधिक का समय बीत  चुका है, लेकिन दोषियों पर कोई करवाई नहीं हुई है। प्रदर्शनकारियों का कसूर  इतना भर था कि ये भजनपुर गांव के पास स्टार्च और ग्लूकोज फैक्ट्री स्थापित करने के लिए प्राईवेट कंपनी मैसर्स औरो सुन्दरम इंटरनेशनल के लिए सरकार द्वारा 36.65 एकड़ आवंटित जमीन के रास्ते से होकर आने-जाने का अधिकार मांग रहे थे। जमीन आवंटित किये जाने के पहले लोग यहीं से होकर जाते थे, जो उन्हें  ईदगाह, करबला और बाज़ार तक पहुंचाता था। लेकिन अब इस रास्ते को रोक दिया गया है. सरकार रोक इसलिए लगा रही है क्योंकि  यह कंपनी भाजपा एम.एल.सी.अशोक अग्रवाल के बेटे सौरभ अग्रवाल की है और सौरभ की शादी प्रदेश के  उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की बेटी से होने वाली है.

उस दिन 3 जून को हुए पुलिसिया जुल्म की दास्तान यह रही कि फारबिसगंज   में जमीन पर बेसुध पड़े एक प्रदर्शनकारी युवक को एक  पुलिसवाला जूतों से कुचलता  रहा और मौके पर मौजूद एसपी गरिमा मलिक तमाशाबीन बनी रहीं । बाद में उस युवक की मौत हो गयी। सिर्फ यह युवक ही नहीं,बल्कि मृतकों में एक गर्भवती महिला और छह महीने की एक बच्ची भी शामिल है। पुलिस ने न केवल प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई,बल्कि उनका उनके घरों तक पीछा करके उन्हें पॉइंट ब्लैंक रेंज में गोली मारी। इस घटना में नौ लोग घायल भी हुए हैं। गौरतलब है की सभी मृतक मुस्लिम समुदाय से हैं।

फारबिसगंज की घटना नीतीश के लिए बहुत बड़ा सवाल है,जिसका जवाब उनको देना ही पड़ेगा। और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार गुजरात की तर्ज पर बिहार का विकास चाहते हैं? अगर हां!  तो नीतीश कुमार कान खोलकर सुन लें बिहार की जनता इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। बिहार की जनता को ऐसा विकास कतई नहीं चाहिए जो मानवअधिकारों के उल्लंघन पर आधारित हो।

ऐसा नहीं है कि फारबिसगंज की घटना बिहार के लिए नई है। पिछले एक साल में ही राज्य में किसान कई बार पुलिस का शिकार बने हैं। पटना जिले के बिहटा,औरंगाबाद के नबीनगर और मुजफ्फरपुर के मड़वन इलाके में फोर-लेन सड़क, थर्मल पावर प्लांट और एस्बेस्टस फैक्ट्री का विरोध करने पर किसानों पर पुलिस का कहर बरपना इसके कुछ उदाहरण भर हैं। औरंगाबाद में तो किसान मारे भी गये थे।

इसके अलावा पिछले छह सालों के दौरान अन्य कई मौकों पर भी पुलिस बर्बर कारवाइयों को अंजाम दे चुकी है। कहलगांव में वर्ष 2008 के जनवरी महीने में नियमित बिजली की मांग कर रहे लोगों में से तीन शहरी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे। वर्ष 2007में भागलपुर में चोरी के आरोपी औरंगजेब का 'स्पीडी ट्रायल' करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने उसे अपने मोटरसाइकिल के पीछे बांधकर घसीटा था। कोसी इलाके में उचित मुआवजा और पुनर्वास की मांग करने वाले बाढ़-प्रभावित भी पुलिस की गोली का निशाना बने।

यह सब कुछ हुआ है नीतीश के 'सुशासन' में बिहार के विकास के नाम पर। जब बात सुशासन और विकास की चल रही है,तो क्यों न उनके विकास की कुछ सच्चाइयों के आंकड़ों को भी प्रस्तुत कर दिया जाए। जिस विकास की गंगा से राज्य को सींचने का दावा नीतीश कुमार कर रहे हैं, उसमें केन्द्र का पानी कितना है और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का कितना? यह जानना दिलचस्प होगा।

यह सरकारी सच है कि नीतीश कुमार को राज्य में विकास और योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए केन्द्र से पिछली सरकारों से ज़्यादा पैसा मिला है। सरकारी कागज़ों में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल में वर्ष 2003-04 में राज्य सरकार को 1617.62 करोड़ रुपये मिले थे। इसके बाद सरकार बदली और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए-1 और यूपीए-2 सत्ता में आई। यूपीए सरकार ने वर्ष 2005-06 में बिहार को 3332.72 करोड़ रूपये दिए। यह राशि एनडीए के समय के अनुदान से दोगुनी थी। वित्तीय वर्ष 2006-07 में 5247.10 करोड़, वर्ष 2007-08 में 5831.66 करोड़ और फिर वित्तीय वर्ष 2008-09 के लिए केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को 7962 करोड़ रुपये का अनुदान दिया। यहां स्पष्ट कर दें कि यह सहायता राशि है,इसमें राज्य सरकार को केन्द्र से मिलने वाला कर्ज या अग्रिम अनुदान शामिल नहीं है।

इतना ही नहीं, बिहार सरकार को विश्वबैंक से मिल रहे अनुदान में भी कई गुना की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2006-07 में विश्वबैंक से उसे 92 लाख मिले। इसमें से 60 लाख लाख खर्च भी हुए। वर्ष 2007-08 में यह राशि बढ़कर 464 करोड़ हो गई। जिसमे से खर्च सिर्फ छह करोड़ हो पाए। वर्ष 2008-09 में 18 करोड़, वर्ष 2009-10 में 552 करोड़ रुपये और पिछले वित्तीय वर्ष में 15 अगस्त, 2010 तक नीतीश सरकार को विश्वबैंक 74 करोड़ रुपये दे चुका है।

नीतीश सरकार ने बिहार के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों की आर्थिक नब्ज दबा रखी है। इसके लिए जरिया बनाया गया है सरकारी विज्ञापनों को। क्योंकि राज्य सरकार से मिले कागज़ के टुकडे यह बताते हैं कि वर्तमान राज्य सरकार का काम पर कम और विज्ञापन पर ज़्यादा ध्यान रहा है। बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा वर्ष 2005-10 के दौरान 28फरवरी 2010 तक यानी नीतीश के कार्यकाल के चार सालों में लगभग 38हज़ार अलग-अलग कार्यों के विज्ञापन जारी किए गए और इस कार्य के लिए विभाग ने 64.48 करोड़ रुपये खर्च किये। जबकि लालू-राबड़ी सरकार ने अपने कार्यकाल के 6 सालों में सिर्फ 23.90 करोड़ ही खर्च किए थे। सिर्फ वर्ष 2009-10 में नीतीश सरकार ने योजना मद में विज्ञापनों पर 1.69करोड़ रूपये खर्च किए, वहीं गैर-योजना मद में यह राशि 32.90 करोड़ है। पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2010-11 के शुरुआती तीन महीनों में ही यानी चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकार समेकित रूप से 7.19 करोड़ विज्ञापनों पर खर्च कर चुकी थी।

ज़ाहिर है कि नीतीश के कार्यकाल में सबसे ज़्यादा फायदा यहां के मीडिया उद्योग को हुआ है, इसलिए वो ‘विकास’ के पीछे के सच को जनता के सामने लाना मुनासिब नहीं समझते। मीडिया को इस बात का डर है कि अगर इन सच्चाइयों पर से पर्दा उठा दिया तो सरकारी विज्ञापनों से हाथ धोना पड़ सकता है (क्योंकि राज्य विज्ञापन नीति, स्टेट एडवर्टिजमेंट पॉलिसी- 2008 के तहत अगर किसी मीडिया संस्थान का काम राज्य हित में नहीं है तो उसे दिये जा रहे विज्ञापन रोके जा सकते हैं। उसे स्वीकृत सूची से किसी भी वक़्त बाहर किया जा सकता है।)। ऐसे में न्यूज़ की बात तो छोड़ ही दें,अगर किसी ने एक लेख भी बिहार सरकार के खिलाफ लिखा तो अगले ही दिन उस लेखक को मुख्यमंत्री कार्यालय बुला लिया जाता है।

नीतीश कुमार के झांसे में अल्पसंख्यक भी आये। जिन पैसों को अल्पसंख्यक छात्रों के बीच स्कॉलरशिप के रूप में बांटकर उन्होंने अपनी पीठ थपथपाई,दरअसल वह पैसा केन्द्र की यूपीए सरकार ने अपनी स्कीम के तहत उपलब्ध कराया था। बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक बिहार में वर्ष 2007-08के दौरान कुल 3,72,81,738 रुपये मेधा-सह-आय आधारित योजना के अन्तर्गत अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं के बीच केन्द्र सरकार ने बांटे, न कि बिहार सरकार ने। 15 अगस्त 2008 को नीतीश कुमार ने मुस्लिम गरीब बच्चों के लिए ‘तालीमी मरकज़’ खोलने का ऐलान किया, लेकिन जब बिहार सरकार से सूचना अधिकार कानून के तहत यह पूछा गया कि अब तक कितने ‘तालीमी मरकज़’पूरे बिहार में खोले गए हैं, तो उसने इस संबंध में कोई जानकारी देना मुनासिब नहीं समझा।

जो नीतीश कुमार मुसलमानों के दम पर दुबारा बहुमत के साथ सत्ता में आए, वही भागलपुर दंगे की जांच को लेकर टालमटोलपूर्ण रवैया अपना रहे हैं। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक नीतीश सरकार ने जस्टिस एनएन सिंह की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया, जिसे छह माह के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी थी, लेकिन यह आयोग छह माह तो क्या, सरकार के पूरे कार्यकाल में भी वह काम नहीं कर सका,जिसके लिए ढोल पीटकर इसका गठन जनवरी 2006 में हुआ था। जबकि इस जांच आयोग के सदस्यों की सैलरी पर ही अक्तूबर 2009 तक 1,44,83,000 रूपये खर्च किए जा चुके हैं।

सूचना के अधिकार से मिले आंकड़े बताते हैं कि नीतीश सरकार को अल्पसंख्यक मद में खूब पैसे मिले,लेकिन अपने को अल्पसंख्यकों का मसीहा कहने वाली इस सरकार ने यह पैसा अल्पसंख्यकों पर खर्च करना मुनासिब नहीं समझा।  



सूचना अधिकार कार्यकर्त्ता से पत्रकारिता तक की यात्रा करने वाले अफरोज अंग्रेजी वेबसाइट www.beyondheadlines.in के संपादक हैं .






Jun 17, 2011

प्रचंड पर रॉ से सम्बन्ध का संदेह


जनमुक्ति सेना के कमांडरों के बैठक में अधिकांश ने प्रचंड के फैसले को आत्मसमर्पण कहा और पार्टी के उपाध्यक्ष किरण ने १८ सूत्रीय विरोध पत्र प्रस्तुत किया,जिसमें भारतीय गुप्तचर संस्थान (RAW) से प्रचंड के सम्बन्ध बनाने का भी उल्लेख है...

विष्णु शर्मा  

नेपाल की माओवादी पार्टी के अंदर विवाद लगातार तेज होता जा रहा है. अब  वहां  की माओवादी पार्टी एक संयुक्त इकाई कम और तीन गुटों का नीतिगत (टेक्टिकल) गठबंधन अधिक दिखाई पड़ती है. प्रचंड के लाइन के खिलाफ कभी बाबुराम और कभी किरण ‘नोट ऑफ डीसेंट’ लिखते हैं. इसीलिए  पार्टी ने निर्णय लिया है कि तीनों धड़े अपने अपने समर्थकों की मीटिंग कर सकते है, उन्हें अपने विचार से अवगत करा सकते है. अब स्थति यह है कि गुटों की बैठक पार्टी की बैठक से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. कई बार तो इन बैठकों के कारण पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक भी रद्द हो जा रही हैं.

लाइन के इस संघर्ष में बाबुराम और किरण के गुट लगातार मजबूत हो रहे है और प्रचंड का प्रभाव कमजोर होता जा रहा है. अपनी साख को बचाने के लिए प्रचंड को पार्टी के अंदर ऐसे बहुत से समझौते करने पड़ रहे हैं,  जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. कभी बाबुराम को भारत समर्थक कहने वाले घोर प्रचंड समर्थक भी आज बाबुराम को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखने से नहीं झिझक  रहे है.

एनेकपा के अध्यक्ष प्रचंड और उपाध्यक्ष किरण : सिर्फ असहमति
अभी हाल में प्रचंड के करीबी माने जाने वाले बर्ष मान पुन ने कहा है कि प्रचंड प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते और माओवादी की ओर से बाबुराम भट्टराई को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. इस टिपण्णी  का सीधा मतलब पार्टी के भीतर लगातार मजबूत हो रहे उपाध्यक्ष किरण के खिलाफ (प्रचंड और बाबुराम ) का ‘संयुक्त’ मोर्चा बनाना है. नेपाल की राजनीती में प्रचंड एक क्रांतिकारी  नेता से कंफ्लिक्ट मैनेजर  के स्तर में आ गए है. प्रचंड के लिए प्रधान मंत्री बनने से अधिक जरूरी माओवादी पार्टी का अध्यक्ष बने रहना है और इसलिए बाबुराम को अपने पक्ष में रखना आवश्यक है.

फिर भी पार्टी को बचा पाना मुश्किल होता जा रहा  है. किरण ने जिस तरह से खुद की लाइन को प्रस्तुत किया है उसमें  समझौते की गुंजाईश नहीं दिखती. हाँ किरण की एक कमजोरी जरुर है कि प्रचंड को समझौतावादी मानने के बावजूद पार्टी के भीतर बने रहने की उनकी कार्यशैली है, जिसपर  अभी से  प्रश्न उठने लगे है.आगामी दिनों में किरण पर पार्टी से अलग होने का जबरदस्त दवाब बनेगा. यदि तब भी वह पार्टी में बने रहते है तो संभव है की दूसरी पीढ़ी के नेता अपने लिए नया रास्ता तलाशें. एक दौर में उनके साथ रहे मातृका यादव ने अभी हाल में अपने एक साक्षात्कार में उन्हें ‘गोलचक्करवादी’ बताया था. यदि किरण  कोई ठोस निर्णय नहीं लेते तो मातृका की बात की पुष्टि करते नज़र आयेंगे.

प्रचंड पर लगे आरोप  '18 विचलन ' के   दस्तावेज जनज्वार के पास हैं , प्रस्तुत है उनमें से कुछेक 
  • राजनीतिक स्तर पर प्रचंड  दक्षिणपंथी सुधारवाद और राष्ट्रीय आत्मसमर्पणवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं  
  • प्रचंड भारतीय गुप्तचर संस्थान (RAW) के सीधे संपर्क में हैं
  • प्रचंड धन, ताकत और अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नैतिक और अनैतिक क्रियाकलाप कर सकने की प्रवत्ति रखते हैं
  • अन्य संसदीय पार्टियों के साथ समझौता कर ऐसा संविधान बनाने की मंजूरी दे दी है जो रूप और सार में घोर प्रतिक्रियावादी है
  • प्रचंड ने जानबूझ कर पार्टी में आर्थिक हिसाब को कभी होने नहीं दिया और अपने निजी हितों के लिए संसाधनों का इस्तेमाल किया हैं
  • प्रचंड के भीतर फासिस्ट प्रवृत्ति  का विकास हुआ है

हालाँकि किरण के समर्थक पूर्व माओवादी नेता मातृका की बात से सहमत नहीं है. उनका मानना है कि जल्दबाजी में पार्टी से अलग होना गलत होगा.पार्टी में रहकर प्रचंड की लाइन को सरेआम  करना सही नीति है. और जहाँ तक पार्टीका सवाल है वह किसी एक की बपौती नहीं है. समर्थकों के  तर्कों से स्पष्ट है कि किरण के पास भी अभी क्रांति की कोई ठोस योजना नहीं है और इसलिए पार्टी में रहकर प्रचंड-बाबुराम की लाइन का विरोध करना उन्हें ठीक लगता है. लेकिन उनके करीबी कुछ नेता मानते है कि जितना लंबा समय वे पार्टी में रहेंगे उतना ही प्रचंड मजबूत होंगे.

जबकि मौजूदा समय में प्रचंड की  अपनी कोई लाइन नहीं है, बल्कि वे कभी बाबुराम और कभी किरण के समर्थन में खुद को खड़ा करते है.पार्टी का बहुसंख्यक हिस्सा उन्हें अपने नेता के रूप में नहीं देखता. हाल में जनमुक्ति सेना के कमांडरों की बैठक में अधिकांश ने प्रचंड के फैसले को आत्मसमर्पण  कह कर आलोचना की थी. साथ ही  किरण ने अपने समर्थकों के बीच ‘प्रचंड के 18 विचलन’ नाम से एक दस्तावेज़ बांटा  है. इस दस्तावेज़ के दुसरे बिन्दु में लिखा है कि ‘राजनीतिक स्तर पर दहाल दक्षिणपंथी सुधारवाद और राष्ट्रीय आत्मसमर्पणवाद का प्रतिनिधित्व करते है’. इसी दस्तावेज़ में  कहा गया है कि प्रचंड भारतीय गुप्तचर संस्थान  (RAW) के  सीधे संपर्क में है,  जिसका साफ़ मतलब है कि  प्रचंड और RAW के बीच  संबंध  हैं.

पार्टी संगठन के स्तर पर इस दस्तावेज़ के 18वे बिंदु में कहा गया है कि ‘प्रचंड धन, ताकत और अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नैतिक और अनैतिक क्रियाकलाप कर सकने की प्रवत्ति रखते है. और इसी के चलते उन्होंने अन्य संसदीय पार्टियों  के साथ समझौता  कर ऐसा संविधान बनाने  की मंजूरी दे दी है जो रूप और सार में घोर प्रतिक्रियावादी है.’ आगे दस्तावेज़ कहता है कि प्रचंड  ने जानबूझ कर पार्टी मेंआर्थिक हिसाब को कभी होने नहीं दिया और अपने निजी हितों के लिए संसाधनों का इस्तेमाल किया है. दस्तावेज़ में एक जगह कहा गया है कि प्रचंड के भीतर फासिस्ट प्रवत्ति का विकास हुआ है.

इस विवाद के बीच 15 जून 2011को होने वाली स्थाई समिति की बैठक ‘तैयारी की कमी’ का कारण बता कर रद्द कर दी गई.कयास लगाया जा रहा है कि प्रचंड ने ऐसा आलोचना के डर से किया. उन्हें इस बात का आभास हो गया है कि पार्टी के साथ अब जनसेना में भी उनकी लाइन के विरोध में स्वर तेज होते जा रहे हैं. आगे वे अपने बचाव में क्या तर्क देंगे यह देखना जरूरी होगा.आज तक उन्होंने खुद को क्रांति के अगुवा के बतौर और बाबुराम को संशोधनवादी और किरणको अतिवामपंथी के रूप में लोगों  के सामने प्रस्तुत किया है.

क्रांति की लाइन को न छोड़ने के चलते ही अब तक लोग उन्हें एक समझदार नेता मानते आये है. एक ऐसा नेता जो कभी दक्षिणपंथी और कभी वामपंथी लाइन लेते हुए भी क्रांति को हमेशा केंद्र में रखता है. यदि अबकी बार उनके तर्क बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं  को क्रांति की भावना के खिलाफ  नज़रआते है तो उनकी प्रासंगिकता  पर भी सवाल उठ सकता है.




जुलाई में आपके बीच होगी 'हैलो बस्तर'



जनज्वार.युवा और जनपक्षधर पत्रकार राहुल पंडिता की 'हेल्लो बस्तर: दी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ माओईस्ट  मूवमेंट' माओवादी आन्दोलन के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालने वाली महत्वपूर्ण किताब है. इस आन्दोलन के नेतृव से सीधे संपर्क कर राहुल जानने का प्रयास करते हैं  कि कैसे क्रांति में विश्वास रखने वाले चंद लोग 1980 में मध्य भारत के बस्तर क्षेत्र में प्रवेश करते हैं  और  एक शक्तिशाली आन्दोलन खड़ा करते हैं, जिसे आज भारत सरकार आतंरिक सुरक्षा का  सबसे बड़ा खतरा मानती  है.

यह किताब उन कारणों को तलाशती है जिसकी वजह से आज यह आन्दोलन भारत के 10 राज्यों में गरीब और हाशिए पर खड़े लोगों  की ओर से भारतीय सुरक्षा तंत्र पर  प्राणघाती हमले कर रहा है. यह लाल क्षेत्र में रहने वाले माओवादी छापामारों और आदिवासी जनता के जीवन पर अभूतपूर्व ढंग से प्रकाश भी डालती है.

जमीनी स्तर पर रिपोर्ट और माओवादी पार्टी के महासचिव गणपति और पोलित ब्यूरो सदस्य  कोबाद गाँधी सहित अनेक माओवादी नेताओं से लंबी बातचीत पर आधारित यह पुस्तक, प्रत्यक्ष अनुभव और साहस  का उल्लेखनीय उदाहरण है.

इस पुस्तक का दो शब्द (afterword) दिल्ली के तिहार जेल में बंद माओवादी नेता कोबाद गाँधी ने लिखा है. यह किताब आप पाठकों के लिए जुलाई के प्रथम सप्ताह से  दुकानों पर  उपलब्ध होगी.