Mar 26, 2017

भाजपा सुशासन का एक सीन यह भी

तस्वीर में दिख रहे युवक 14 किलोमीटर दूर से कंधे पर एक मरीज को लादकर ईलाज कराने के लिए लाए हैं क्योंकि वहां सरकार एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं कर सकती।

जी हां, भाजपा शासित छत्तीसगढ़ में फिर एक बार स्वास्थ्य व्यवस्था को तार—तार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। जन सुविधाओं के बड़े—बड़े वायदे करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार की हालत यह है कि वह अपने राज्य की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी को स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मुहैया करा पा रही है।

आदिवासी बहुतायत वाले दंतेवाड़ा में आज 14 किलोमीटर पैदल चलकर एक मरीज के परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। तस्वीरों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे  14 किलोमीटर दूर से  कंधे पर मरीज को लेकर लोग पहुंचे होंगे।


सिर्फ 10 कॉरपोरेट 5 लाख करोड़ के कर्जदार और 9 करोड़ किसानों का कर्ज 12 लाख करोड़

बैंकों से लेकर नीति आयोग तक किसानों को कर्ज देने के मसले पर नाक—भौं सिकोड़ रहे हैं, पर सरकार और रिजर्व बैंक 70 हजार करोड़ से अधिक डकार जाने वाले डिफॉल्टरों का नाम बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहे...

राजेश रपरिया 

भारतीय स्टेट बैंक की प्रमुख अरूंधति भट्टाचार्य के किसानों की कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने के बयान से तूफान आ गया है। उन्होंने कहा कि चुनावों के वक्त किसानों का कर्ज माफ करना सही नहीं है। अगर ऐसा होता है तो हर चुनाव में कर्ज माफी की उम्मीद की जाएगी। इस बयान ने किसानों के गहरे जख्मों पर नमक तो छिड़का ही है, बल्कि बैंकिंग उद्योग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

बैंको की बढ़ती अनर्जक आस्तियों (नॉन परफार्मिंग एसेट्स —एनसीए) से अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की परेशानियां बढ़ गयी हैं, जबकि प्रमुख सरकारी बैंक की मुखिया अपने बयानों में ऐसे पेश आ रही हैं मानो देश की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों का मुख्य कारण किसान ही हों। मार्च 2016 तक बैंकों की कुल कर्जराशि 70 लाख करोड़ रुपए थी, जिसमें उद्योग की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी और कृषि कर्ज 13.49 फीसदी थी।



जाहिर है बड़े लोगों और कारोबारियों पर ही बैंकों का सबसे ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। पिछले 15 महीनों में बैंकों का एनपीए दोगुने से ज्यादा हो गया है। सितंबर 2015 में एनपीए 3 लाख 49 हजार 556 करोड़ रुपए के थे, जो सितंबर 2016 में बढ़कर 6 लाख 68 हजार 825 करोड़ रुपए के हो गए। विश्वविख्यात अंतरराष्ट्रीय वित्त कंपनी 'स्टैंडर्ड एंड पुअर्स' का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपए के पार कर जाएंगे। रिजर्व बैंक का तर्क है कि आर्थिक हालात खराब होने से कर्ई बार कर्जदार समय से कर्ज नहीं चुका पाता है। पर आर्थिक विकास दर में सुधार आने से एनपीए में कमी आएगी और रिकवरी बढ़ जाएगी। 

लेकिन विडंबना यह है कि रिजर्व बैंक और अन्य बैंक इस तरह के लाभ किसानों को देने को तैयार नहीं हैं। फिर विलफुल डिफॉल्टरों (जो कर्जदाता जानबूझ कर कर्ज वापस नहीं करते, जबकि कर्ज वापस करने की उनकी हैसियत होती है) का आंकड़ा और नाम क्यों छुपाया जाता है, इसका कोई वाजिब तर्क न रिजर्व बैंक के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास। यह कर्जदार गलत हथकंडों और सांठगांठ से भारी मात्रा में बैंकों से कर्ज पाते हैं, जो बैंकों, बड़े लोगों और राजनेताओं के कारनामों का जीता—जागता पुराण है। जनता के पैसों पर यह डिफॉल्टर बेनामी संपत्तियां बनाते हैं और विलासिता में करोड़ों—करोड़ रुपए उड़ा देते हैं। गौरतलब है कि 10 बड़े कॉरपोरेट समूहों पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह जानकारी राज्य सभा में वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने दी है। 

अपनी रिपोर्टों के लिए चर्चित न्यूज वेबसाइट न्यूज लॉन्ड्री ने इन डिफॉल्टरों के नाम उजागर किए। समाचार साइट फर्स्ट पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार 7129 बैंक खातों को डिफॉल्टर घोषित किया गया है, जिन पर 70 हजार 540 करोड़ का कर्ज है। इस साइट पर 18 बड़े कर्जदारों के नाम भी हैं। मोटा अनुमान है कि तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए ये डकार गए हैं। इनमें विजय माल्या का नाम जगजाहिर है। पर उषा इस्पात समूह के 17 हजार करोड़ रुपए के कर्ज डकारने की पूरी दास्तान जानकर न केवल किसी के होश उड़ जाएंगे, बल्कि गुस्सा भी आएगा कि एक छोटा—सा कर्ज देने के लिए बैंक कितने चक्कर लगवाता है, दस्तावेज मांगता है। पर इन डिफॉल्टरों को कर्ज पर कर्ज देने में इन्हें कोई परेशानी नहीं आती है। सच तो यह है कि इन बड़े आदमी के आगे बैंकों की बोलती बंद हो जाती है। ऐसा तब है जबकि रिजर्व बैंक बताता है कि कृषि कर्ज में किसान कर्ज ही नहीं कृषि कारोबार कर्ज भी शामिल रहता है । 

नवंबर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राज्यसभा में बताया कि सितंबर 2016 तक कुल कृषि कर्ज 12 लाख 60 करोड़ रुपए थे। इनमें से 7.75 लाख करोड़ के कृषि ऋ़ण थे और 4.84 लाख करोड़ रुपए के दीर्घकालिक कर्ज। उन्होंने यह भी साफ किया कि कृषि कल्याण कोष में किसानों की कर्ज अदायगी का कोई इरादा सरकार का नहीं है। कागज पर पिछले 15 सालों में कृषि कर्ज 8 गुना से ज्यादा बढ़े हैं, लेकिन उस अनुपात में किसानों खासकर छोटे, लघु और सीमांत किसानों के कर्ज नहीं बढ़े हैं। 

बजट भाषण में किसान 
किसानों के लिए 10 लाख करोड़ के कृषि कर्ज का लक्ष्य रखा गया है, जो लगभग बैंकों के संभावित कुल एनपीए के बराबर है। 

रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर मूलत: आधारित आर. राम कुमार और पल्लवी चौहान का शोधपत्र साफ बताता है कि बैंकिंग सेवा के भारी विस्तार और लक्ष्यों के बावजूद सीमांत किसानों की कर्ज निर्भरता सूदखोरों पर बढ़ी है। देश में 95 फीसदी सीमांत, लघु और छोटे किसान हैं जिनके पास एक, दो या पांच हेक्टेयर या उससे कम खेत हैं। देश की कुल कृषियोग्य भूमि का 68.7 फीसदी हिस्सा इन किसानों के पास है। इन किसानों के लिए अरसे से किसानी घाटे का सौदा बन गयी है। बाजार और मौसम की मार से उन्हें कोई कारगर सुरक्षा प्राप्त नहीं है। 


सरकार नहीं जानती किन पूंजीपतियों के कर्ज माफ हुए 
बैंकों ने बड़े कर्जदारों के 1.14 करोड़ रुपए के कर्ज तीन सालों 2013—2015 के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिए। राजनीतिक बयानबाजी में इसे कर्जमाफी कहा जाता है। वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने राज्य सभा में बताया है कि 2015—2016 में भी 59 हजार 547 करोड़ रुपए बैंकों ने बट्टे खाते में डाले हैं। पर आश्चचर्य यह है कि जिन बड़े कर्जदारों के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए हैं, इसकी जानकारी न रिजर्व बैंक के पास है न ही केंद्र सरकार के पास है। 

पिछले कुछ सालों में सवा 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 2015 में 8 हजार 7 किसानों ने आत्महत्या की। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे साफ जाहिर है कि देश में किसानों की आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। तमिलनाडु में सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है। वहां के किसान 60 फीसदी सूद पर कर्ज लेने को मजबूर हैं, जबकि केंद्र सरकार का निर्देश किसानों को 7 फीसदी पर कर्ज देने का है। वहीं केरल में 115 साल बाद का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है, जिसके लिए केंद्र सरकार से 1000 करोड़ रुपए की मदद चाहिए। बैंकों ने पिछले 10—15 सालों में सवा 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बट्टे खाते में डाल दिए हैं तो किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ किया जा सकता है। केंद्र सरकार को छोटे, सीमांत और लघु किसानों की कर्ज अदायगी के बारे में संजीदगी से सोचने का वक्त है। उत्तर प्रदेश में फसली ऋणों की घोषणा अपने भाषणों में कर सकते हैं, तो बाकि देश के किसानों ने क्या गुनाह किया है। 

एनपीए का नुकसान छोटे कर्जदारों और किसानों को 
बैंकों के एनपीए पिछले कुछ सालों से बेहिसाब बढ़े हैं। बढ़ते एनपीए से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होती है और कर्ज की ब्याज दरें अनावश्यक रूप से ज्यादा बनी रहती हैं। इसका असली खामियाजा छोटे बचतकर्ताओं और कर्जदारों को भुगतना पड़ता है। बैंक की भाषा में छोटे कर्जदारों को 'स्मॉल ब़रोअर' कहा जाता है। 1991 में शुरू हुए उदारीकृत अर्थव्यवस्था के दौर से छोटे कर्जदारों की हिस्सेदारी 63 फीसदी से घटकर 32 फीसदी रह गयी है। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के आर रामकुमार और पल्लवी चौहान के शोधपत्र में पुख्ता ढंग से यह बात सामने आयी है कि बैंकिंग उद्योग किसानों से दूर केवल बड़े लोगों और कारोबारियों का बन कर रह गया है। 

(राजेश रपरिया वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं। यह लेख दैनिक भास्कर से साभार।)

Mar 25, 2017

सदी के सबसे भयंकर सूखे के बीच खड़ा नरमुंड लिया किसान

हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया.....

आकांक्षा 

जंतर मंतर के सामने अपने आगे नरकंकालों की खोपड़ियां लिए धरने पर बैठे कुछ लोग सूनी आंखों से अपना दर्द बयान कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से खबरों में यही तस्वीर दिखाई जा रही हैं। ये लोग कोई और नहीं तमिलनाडु के किसान हैं। देश का अन्नदाता कहे जाने वाले किसान की ये दुर्दशा हो गई है कि खेतों की बजाय खोपड़ियां लिए प्रदर्शन करने को मजबूर हैं। वजह भयंकर सूखे के हालात, जो अकाल जैसी स्थिति में बदलते जा रहे हैं। 

भारत का दूसरा बड़ा चावल उत्पादक प्रदेश तमिलनाडु आज सदी के भीषण सूखे से जूझ रहा है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने आत्महत्या कर ली। दिन पर दिन स्थिति और बिगड़ती ही जा रही है। अक्टूबर 2016 से ये सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इन हालातों को देखते हुए एआईडीएमके के नेता पन्नीरसेलवम ने जनवरी 2017 में तमिलनाडु के 32 जिलों के सूखे की चपेट में होने की रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी है। तकरीबन 13,305 गांव बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। 

गौरतलब है कि पूरे तमिलनाडु में औसत से 35 से 85 प्रतिशत बारिश कम हुई है, जिसकी सीधी मार फसलों पर पड़ी है। सूखे के हालात और भी बदतर तब हुए जब कर्नाटक ने कावेरी नदी का पानी रोक लिया। इन सब  कारण पहले तो सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत खेती नहीं हुई, जो हुई वह भी बिना पानी बर्बाद हो गई। फसलों से लहलहाने वाले खेत आज बंजर भूमि में तब्दील होकर रह गए और किसान हताशा के बोझ तले दब गए। तमिलनाडु के साथ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के कुछ हिस्से भी सूखे से जूझ रहे हैं। 

हताशा का मंज़र

तमिलनाडु के औसत किसान के पास एक से तीन एकड़ जमीन है, जिस पर 15000 से 18000 रुपए प्रति एकड़ तक का खर्च आता है। लेकिन 2016 से हालात ऐसे बदले कि देखते ही देखते कृषि दर सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत घट गयी। जिन किसानों की फसलें लहलहाने का और कटाई के बाद खुशियां मनाने का वक्त था, वह सूखे की चपेट में ऐसी आई कि घरों में मातम पसर गया। हर तीसरा घर मातम मनाता नजर आता है। 

एक किसान अपनी 3 एकड़ की फसल की बर्बादी को देखकर इस कदर टूटा कि अपने बेटे को चाय लाने के बहाने भेजकर आत्महत्या कर ली। फसलों की बर्बादी और कर्ज की लटकती तलवारों से निजात पाने का सिर्फ एक यही तरीका किसानों के पास रह गया है। 

तमिलनाडु के हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया। पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने भी यही रूख अपनाया। लेकिन सरकारी कागजों में ये आंकड़ा सिर्फ 17 तक ही पहुंचा। तमिलनाडु किसान संगठन के नेता बी आर पंडियन ने सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार सही आंकड़े छुपा रही है जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं।

सरकार का रुख

बर्बाद होती फसलें लगातार बढ़ती आत्महत्याओं और धरने प्रदर्शन के बाद सरकार ने तमिलनाडु को 10 जनवरी, 2017 को सूखाग्रसित राज्य घोषित कर दिया। सरकार ने करीब 10 दिन पहले नागापटटीनम और थंजावूर जैसे भारी तबाही वाले जिलों में किसान परिवारों को 3 लाख रुपए मदद के रूप में दिए। किसानों की प्रति एकड़ बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा देने का वादा भी किया गया। केंद्र ने सूखाग्रसित तमिलनाडु के लिए करीब 2014 करोड़ रुपए की सहायता राशि अनुमोदित की है। राज्य सरकार को केंद्र से 39000 करोड़ रुपए की मदद की उम्मीद थी। 

इस बारे में किसान संगठन अध्यक्ष बी पंडियन का कहना है ये राशि घड़े में एक बूंद के समान है। सरकार ने प्रति एकड़ जमीन के हिसाब से भी क्षतिपूर्ति देने का वादा किया है। इसमें कावेरी नदी के आसपास वाले किसानों को 25000 प्रति एकड़ दिए जाएंगे, जबकि अन्य किसानों को 21000 से 26000 प्रति एकड़ के बीच आपदा राहत कोष से सहायता मिलेगी। सर्वे के मुताबिक कावेरी नदी के आसपास करीब 80000 एकड़ फसल बर्बाद हुई है। यूं तो सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 130,000 धान के खेतों का बीमा किया हुआ था, जिसके अंतर्गत करीब 95 प्रतिशत किसानों के खेत आते हैं। कुल मिलाकर 11 करोड़ की प्रीमियम राशि भी किसानों तक पहुंच जाए, तो आत्महत्या जैसे हताशा भरे कदम से तो निजात मिलेगी।

सरकार के वादों से उम्मीद की जा सकती है कि किसानों की बदतर स्थिति में थोड़ा सुधार आएगा। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब सरकार और किसानों के बीच के लंबे फासले को घटाया जा सके, ताकि मदद की गुहार लगाते किसानों को कुछ लाभ मिल सके।

मानसून की मार 

मौसम विभाग के अनुसार तमिलनाडु में इस बार 70 प्रतिशत मानसून कम रहा, जिसका सीधा असर भूमिगत जल स्तर पर पड़ा जो 85 प्रतिशत कम हो गया। जाहिर है बिना पानी के फसलें बुरी तरह बर्बाद हो गईं। मौसम विभाग के मुताबिक जून से सितंबर के बीच आने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून पिछले 140 सालों में सबसे खराब रहा। यही हाल उत्तर पूर्वी मानसून का भी रहा, जो तमिलनाडु से होता हुआ आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों दक्षिण कर्नाटक और केरल से होकर जाता है। 145 सालों में दूसरी बार ये खराब मानसून रहा। इसका सीधा असर जल स्त्रोतों पर पड़ा, जो 20 प्रतिशत तक सूख गए। 

इसी के साथ पेयजल का संकट भी गहराने लगा है। सरकार की ओर से नदी नहरों के मरम्मत के लिए भी करोड़ों का प्रावधान रखा गया है जिससे किसानों को मनरेगा के तहत काम मिल सके। मनरेगा योजना में भी 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन कर दिए गए हैं, ताकि काम करने वाले किसानों की रोजी रोटी चल सके। 


आकांक्षा युवा पत्रकार हैं।
editorjanjwar@gmail.com

Mar 24, 2017

वीसी के सामने कांफ्रेंस में पीटा महिला कर्मचारी को

जनज्वार। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की जूनियर स्टोर इंचार्ज डॉक्टर पुष्पा गौतम की पिटाई का वीडियो सामने आने के बाद कल बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच ने झांसी मेडिकल कॉलेज उनसे मुलाकात की। पुष्पा गौतम पर हुए जानलेवा हमले के बाद से ही वह मेडिकल कॉलेज में भर्ती हैं। 

पुष्पा गौतम से मुलाकात करते दलित अधिकार मंच के लोग 

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के कुलदीप बौद्ध ने बताया कि वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पांच - सात पुरुष कर्मचारी पुष्पा गौतम को लाल—घूसों और कुर्सी उठाकर मार रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोषी सात कर्मचारियों के साथ पुष्पा गौतम को क्यों निलंबित कर दिया है, समझ से परे है। 

गौरतलब है कि 18 मार्च को परिक्षाओं के मद्देनजर वीसी की उपस्थिति में झांसी के बुंदेलखंड विश्व​विद्यालय के सभी प्रशासनिक कर्मचारियों की बैठक चल रही थी। बैठक में जैसे ही पुष्पा गौतम ने बताना शुरू किया कि उनसे पिछले कुछ महीनों से तीन—चार कर्मचारी नेता दो लाख रुपया मांग रहे हैं तभी वह नेता पुष्पा पर पिल पड़े। 

अस्पताल में कुलदीप बौद्ध को मामले की जानकारी देते हुए पुष्पा गौतम ने बताया कि मारने वाले कर्मचारी ज्यादातर पिछड़ी जाति से हैं और मैं दलित। अशोक कुशवाहा, संतोष कुशवाहा, उमेश करोलिया, मुकेश शर्मा आदि लोग समय—समय पर मुझ पर दबाव बनाते थे और कहते थे तुम बहुत कमाती हो दो लाख हमें भी दो। हमारे विभाग का एक चपरासी भी इनके साथ है। वह एक ​दिन ड्यूटी पर नहीं आया तो मैंने अनु​पस्थिति दर्ज कर दी। इस पर उसने मुझे धमकी दी। बाद में उसने उन लोगों को भी धमकोने के लिए बुलाया जिनका नाम मैंने उपर बताया। फिर वो लोग दो लाख को लेकर कहने लगे। मैंने कह दिया, मैं नहीं दूंगी और अब मैं वीसी से शिकायत करूंगी। और उस दिन मैं शिकायत ही करने के लिए उठी थी और मामले की जानकारी ही दे रही थी कि इन लोगों ने मुझपर हमला कर दिया। 

फिलहाल मुकदमा दर्ज हो गया है। पर एक भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। आरोपी फोन पर धमकी देकर एसएसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले को वापस लेने की बात कर रहे हैं। पर पुष्पा गौतम का कहना है कि मैं पीछे नहीं हटुंगी, मैं दोषियों को सजा दिला के रहुंगी। 

पुष्पा गौतम पर हमले का वीडियो 

Mar 23, 2017

योगी के एंटी रोमियो दल की करतूत देखकर खून न खौला तो पानी है

उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो दल कैसे काम कर रहा है उसको जानना है तो आप तीन मिनट का यह ​वीडियो जरूर देख लें। लखनऊ  के राममनोहर लोहिया पार्क का यह वीडियो बताने के लिए काफी है कि आपने कैसी और किसकी सरकार चुनी है। जिस तरह वीडियो में लड़के—लड़कियों का बेइज्जत किया जा रहा है, मारा—पीटा जा रहा है, उसको देख कर आपका खून खौल जाएगा कि इसी दिन के लिए भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार दी थी। 

इतना याद रखिए अगर यह सिलसिला चलता रहा और आप तमाशा देखते रहे तो एक दिन आप, आपकी बहन, प्रेमिका, दोस्त शिकार किए जाएंगे और तब कहने वाला कोई न होगा ! 


Mar 22, 2017

दलित लड़की का गैंगरेप, विरोध करने पर भाई की उंंगलियां काटीं

योगी जी की पुलिस पहले गैंगरेप के सबूत मिटाती है फिर चार दिन बाद ​मुकदमा दर्ज करती है


जनज्वार। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही एक्शन में आए योगी आदित्यनाथ के प्रदेश की स्थिति यह है कि वहां चार ब्राह्मण जाति के लड़के जीतू, बॉबी, रितेश और प्रवीण पहले एक नाबालिग दलित लड़की का गैंगरेप करते हैं, भाई द्वारा विरोध करने पर उसकी उंगलियां काटते हैं, पेट में चाकू से 10 बार से ज्यादा वार करते हैं, मरा हुआ जानकर छोड़ जाते हैं और पिता शिब्बू जब इन घटनाओं को बताने के लिए पुलिस को फोन करते हैं तो इलाके का एसएचओ पीड़िता के बाप को एक रात हवालात की हवा खिलाकर कुटाई करता है कि तुम अपना केस वापस लो, मासूम लड़कों को बलात्कार जैसे संगीन आरोप में न फंसाओ, उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। 

और जब पिता ऐसा नहीं करता है तो आरोपियों के परिजन 17 वर्षीय नाबालिग पीड़िता के पिता के घर की छत में छेद करते हैं, उसे बाहर निकालते हैं, दम भर कु​टाई करते हैं और फिर घर लूटकर फूंक देते हैं। जिसमें दो मोटरसाइकिलों समेत सबकुछ जलकर खाक हो जाता है। साथ ही आरोपियों के परिजन धमकाते हैं अब राज बदल गया है. भाजपा विधायक अनिल शर्मा भी हमारा, पुलिस भी  हमारी. इस बीच वाल्मिकी परिवार खेतों—खलिहानों के रास्ते भागते हुए बुलंदशहर जाकर अपनी जान बचाता है। लूटपाट, आगजनी और जान से मारने की कोशिश के मामले में  मनोज, मनोज की घरवाली, पंकज, मुकेश, मनीष, नीतू, सोनू, राधा शर्मा,  शिवदत्त, सत्ता, वीरेंद्र और सोमू पर मुकदमा दर्ज है। पर एक भी गिरफ्तारी अबतक नहीं हुई है।

जी, हां। यही हुआ है यूपी के बुलंदशहर जिला के थाना जहांगिराबाद के ​कटियावली गांव में। गांव में तीन घर वाल्मिकी और पूरा गांव ब्राह्मणों का है। 14 मार्च की शाम 7.30 बजे अपने घेर (घर से अलग थोड़ी दूर पर जहां जानवरों को पालते हैं) पर पीड़िता जानवरों को बांधकर लौटने की ही वाली थी कि चार ब्राह्मण जाति के लड़कों ने उसको दबोच कर गैंगरेप किया। रेप करने वाले चारों आरोपियों की उम्र 20 से 30 साल के बीच है। 

पीड़ित पक्ष के वकील रणवीर सिंह लोधी बताते हैं, '14 मार्च की घटना का मुकदमा 18 मार्च को दर्ज हुआ। जहांगीराबाद थाना प्रभारी श्यामवीर ​सिंह ने मुकदमा दर्ज करने की बजाए पीड़िता के पिता को ही हवालात में डाल दिया और मुकदमा नहीं लिखाने पर दबाव बनाने लगे। दो दिन बाद में जब ये लोग मेरे पास आए तो एसएसपी सोनिया सिंह के हस्तक्षेप पर धारा 376, एसएसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि अब तक चारों में से किसी आरोपी की गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर सकी है। पुलिस ने यह जरूर किया है कि आरोपियों के साथ मिलकर ज्यादातर सबूत मिटा दिए हैं।'

मुकदमा दर्ज कराए जाने के बाद पीड़ित परिवार गांव लौटने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। मगर सरकार की ओर से अब तक पीड़ित परिवार के लिए न तो रहने की कोई व्यवस्था, न सुरक्षा और न ही कोई आर्थिक मदद मिली है। पीड़िता के भाई को बुलंदशहर जिला अस्पताल से दिल्ली रेफर कर दिया गया है। वहां के डॉक्टरों ने बताया कि पीड़िता के भाई राजा की हालत नाजुक है, उसे बेहतर ईलाज की जरूरत है। 

गौरतलब है कि 14 मार्च की शाम पीड़िता की चीख सुन उसका भाई राजा उसको बचाने के लिए दौड़ा आया। भाई को देख चारों ने लड़की को छोड़ उस पर हमला कर दिया। दरिंदों ने बचाव करते भाई के हाथ की चार उंगलियां काट दीं और 10 बार से ज्यादा बार चाकू से वार किया। इस जघन्य वारदात की सूचना के लिए पीड़िता के पिता ने रात में कई बार पुलिस के 100 नंबर पर फोन किया पर कोई नहीं आया। पीड़िता के पिता शिब्बू अन्य रिेश्तेदारों के साथ बेटे को नजदीकी अस्पताल में ले गए। 

Mar 21, 2017

भाजपा का एक छोटा सा साक्षात्कार

भाजपा की विकास यात्रा पर वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने लिया व्यंग्यात्मक साक्षात्कार 

प्रश्न : तुम्हारा नाम क्या है?
उत्तर : भाजपा कुमारी
प्रश्न : किस की बेटी हो?
उत्तर : आर एस एस पांडे की
प्रश्न : तुम्हारी उम्र?
उत्तर : यही कोई सैंतीस साल।
प्रश्न : उम्र के हिसाब से तो काफी फैल गयी हो।
उत्तर : मत पूछिए। एक बार ऐसी बीमार पड़ी थी कि मेरा वजन बस दो किलो रह गया था।
प्रश्न : उस के बाद सेहत कैसे बनी?
उत्तर : मैं नियमित रूप से वर्जिश करती हूँ। सुबह छह से सात। लाठी भाँजने में कई बार फर्स्ट आ चुकी हूँ। कुछ घरानों से टॉनिक भी आ जाता है।
प्रश्न : फिर भी इतनी जल्दी, इतना विकास?
उत्तर : अंकल, इस में मेरा दोष नहीं है। मेरी फ्रेंड्स सिकुड़ती गयीं और उन की जगह मुझे मिलती गयी। अब तो मैं ही मैं हूँ।
प्रश्न : तब तो तुम्हारी अभिलाषा पूरी हो चुकी होगी।
उत्तर : अभी कहाँ। इतनी उम्र हो गयी, पर शादी नहीं हुई। कुँवारी हूँ।
प्रश्न : क्या किसी खास लड़के का इंतजार कर रही हो?
उत्तर : हाँ, भारत कुमार।
प्रश्न : पर उस के पीछे तो और भी लड़कियाँ पड़ी हैं - रेशमा है, कावेरी है, उज्ज्वला है, ललिता है, गुलनार है, नालंदा है...
उत्तर : यही तो चुनौती है। पर पापा कहते हैं, लगी रहो, एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
प्रश्न : आजकल भारत कुमार बहुत बीमार है। कुपोषित है। उस का पूरा शरीर दर्द करता है। उसका स्वास्थ्य लौटाओगी, तभी तो उसे पाओगी।
उत्तर : जितना होता है, करती ही हूँ। पर मेरा लक्ष्य कुछ और है।
प्रश्न : तुम्हारा लक्ष्य क्या है?
उत्तर : पकड़ुआ विवाह करना। पर और लोग भी इसी फिराक में हैं। किसी के हिस्से में हाथ आते हैं, किसी के हिस्से में पैर। पूरा किसी के हाथ में नहीं आता।
प्रश्न : ऐसे हाथ नहीं आने वाला। उसे सर्वांग सुंदरी चाहिए।
उत्तर : इस समय मुझ से सुंदर कौन है?
प्रश्न : सो तो है। पर तुम्हारी हथेली में यह खून कैसे लगा? कहाँ से आ रही हो?
उत्तर : चुप कीजिए। आप जैसे देशद्रोहियों का जवाब मैं नहीं देती।

जब 'जुमला' ही राजनीतिक रणनीति बन जाए

मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान वाला जुमला सम्प्रेषण में कारगर रहा| अखिलेश ने इसकी काट के लिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को ‘चौबीस घंटे बिजली’ जैसे तर्क का सहारा लिया| हिंदुत्व के अखाड़े में साख गंवा चुके विकास का यह अदना—सा तर्क मोदी की निर्बाध भावनात्मक अपील के सामने नहीं ठहर सका.....

विकास नारायण राय

जुमलेबाजी में गलत क्या है? प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू के अनुसार एक प्रभावी जुमला (rhetoric) तीन तत्वों के मिश्रण से बनेगा- एथोस, पथोस और लोगोस, यानी संवादकर्ता की साख, जुमले की भावनात्मक अपील और उसमें निहित तर्क| नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलता ने सम्प्रेषण की इस कला को आज देश की सामयिक राजनीति में स्थापित कर दिया है| उत्तर प्रदेश के हालिया चुनाव में सभी ने देखा कि कैसे अखिलेश के ‘काम बोलता है’ पर मोदी का जवाबी जुमला ‘कारनामा बोलता है’ भारी पड़ा| 

इस लिहाज से मायावती मैदान में कहीं थी ही नहीं| 2015 में स्वयं मोदी का ‘कितने लाख करोड़ दूँ’ जैसा नाटकीय जुमला बिहार में औंधे मुंह धराशायी गिरा था| बिहार चुनाव के समय मोदी हर बैंक खाते में विदेशों से लाया पंद्रह लाख काला धन जमा करने में चूक गए व्यक्ति हुआ करते थे, जबकि उत्तर प्रदेश संस्करण में विमुद्रीकरण के घोड़े पर सवार उस दिशा में बढ़ते एक योद्धा|

अरस्तू ने इसे ‘तकनीक’ कहा| हालाँकि, राजनीतिक जुमला एक तरह से भाषा के कलेवर में छिपी राजनेता की अविश्वसनीयता का भी सूचक है| भविष्य के वादे के दम पर वर्तमान को अपने साथ ले जा पाने का उसका व्यावहारिक कौशल! साध्य को पाने का साधन! उत्तर प्रदेश की अभूतपूर्व सफलता के समानंतर पंजाब की करारी हार में मोदी ने यह भी पाया होगा कि उनका जुमला कौशल बादल परिवार की शून्य बराबर साख से गुणा होकर शून्य ही रह गया| जब साख नहीं तो जुमला काम नहीं आता, नाकाफी सिद्ध होते हैं अकेले दम भावनाओं की अपील और तर्कों के फलसफे| 

बेशक, लोगों को प्रभावित करने के लिए जरूरी नहीं कि साख सच्चाई या जवाबदेही के धरातल पर टिकी हो; जरूरी होता है लोगों का जुमले से तारतम्य| इंदिरा गाँधी के मशहूर, बेहद सफल राजनीतिक जुमले ‘गरीबी हटाओ’ की तरह| वैसे ही जैसे सदाबहार बन गया है परिवार नियोजन का सरकारी जुमला, ‘हम दो हमारे दो’|

मोदी ने ताजातरीन चुनावी दौर तक आते-आते महत्वपूर्ण ‘कोर्स करेक्शन’ किये हैं| बिहार चुनाव के समय उनकी छवि कृषि भूमि हड़पने पर उतारू, बुलेट ट्रेन और क्रोनी कॉर्पोरेट की संगत में दस लाख का नामधारी सूट पहन विदेशों में वक्त गुजारने वाले बड़बोले प्रधानमंत्री की बन रही थी| आज वे रसोई गैस, शौचालय, सकल आवास, बेटी बचाओ, कर्ज माफी, ईमानदार शासन और गुंडाराज से मुक्ति जैसे समावेशी मुद्दों की ब्रांडिंग को लालायित नेतृत्व के रूप में उभरते लग रहे हैं| 

मोदी के विकास केन्द्रित जुमलों को साख यहाँ से मिली ईमानदारी की भावनात्मक अपील और सुशासन की तर्क शक्ति तो उनमें पहले भी कम न थी| ध्यान रहे कि एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार बना पाने में असमर्थ भाजपा का मुख्य राजनीतिक जुमला, ‘सबका साथ सबका विकास’ साख और तर्क के मानदंड पर फिसड्डी रहा| मात्र एक भावना भर प्रेषित करने से यह पार्टी की कमजोर कड़ी सिद्ध हुआ| इसे मुस्लिमों, ईसाइयों और दलितों ने जैसे पहले नाकारा था वैसे ही अब भी| स्वीकारा तो दूसरों ने भी नहीं| हालाँकि भाजपा घाटे में नहीं रही क्योंकि पंजाब के बादलों की ही तरह उत्तर प्रदेश में यादवों की ब्रांड साख भी जीरो रही| लिहाजा, राहुल-अखिलेश के ‘यूपी को युवा साथ पसंद है’ वाली संयुक्त जुमलेबाजी का नतीजा कांग्रेस के लिए सिफर निकला|

सफल चुनावी जुमला और कुछ नहीं सही वोटर निशाने पर लगा शब्द बाण ही है| इस चुनावी दौर में हमने देखा कि इसका वाहक आशा, भय, घृणा, असुरक्षा, राष्ट्रवाद, विकास, कुछ भी हो सकते हैं| इसकी प्रभावी ताकत में संदेह नहीं| अपने हिंदुत्व वोट बैंक के चुनावी ध्रुवीकरण के लिए भाजपा पारंपरिक रूप से विरोधियों पर तुष्टीकरण का आरोप मढ़ती आयी है| 

अब की बार उत्तर प्रदेश में इसे सिरे चढ़ाने के लिए पार्टी को राम मंदिर या मुजफ्फरनगर का ढोल पीटने की जरूरत नहीं पड़ी| मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान और ईद-दीवाली वाला जुमला सम्प्रेषण में कारगर रहा| अखिलेश ने इसकी काट के लिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को ‘चौबीस घंटे बिजली’ जैसे तर्क का सहारा लिया|हिंदुत्व के अखाड़े में साख गंवा चुके विकास का यह अदना—सा तर्क मोदी की निर्बाध भावनात्मक अपील के सामने नहीं ठहर सका|

भारत निर्माण में सकारात्मक राजनीतिक जुमलों की ताकत बखूबी महसूस की गयी है| स्वतंत्रता संग्राम में ‘आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार’, ‘बन्दे मातरम’, ‘इन्कलाब जिंदाबाद’, ‘भारत छोडो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का सिलसिला स्वतंत्र भारत में ‘जय जवान जय किसान’ और ‘हर जोर जुल्म से टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’ तक बना रहा | इस बीच ‘आपातकाल अनुशासन पर्व’, ‘हम मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘तिलक, तराजू और तलवार......’ और ‘उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण’ बेहद विवादग्रस्त राजनीतिक जुमले बनकर देश के राजनीतिक क्षितिज पर उभरे| 

इस क्रम में देखें तो मोदी के जुमलों की चुनावी लय फिलहाल विकासवादी और विभाजक दोनों रही है| देर-सबेर वोटर को ही नहीं उन्हें भी इस घाल-मेल से निकलते दिखना होगा| अकेले गांधी जी ही यह जुमला बोल सकते थे- जो परिवर्तन दुनिया में देखना चाहते हो स्वयं में पैदा करो| यह था उनकी साख का राज! आज के दिन मोदी शायद देश में एकमात्र सक्रिय महत्वपूर्ण राजनेता हैं जो अपने श्रोताओं की आँख में आँख डाल कर कह सकते हैं, ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’| प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने कितनी ही बार करतल ध्वनि के बीच यह जुमला दोहराया होगा| 

हालाँकि, आपको बिना किसी अर्थशास्त्री के बताये भी पता है कि नोटबंदी ने काले धन पर कोई असर नहीं डाला | बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता जा रहा है| विजय माल्या, मोदी सरकार की आँखों में आँखें डालकर हजारों करोड़ की देनदारी के साथ देश से उड़न छू हो गया| क्रोनी कॉर्पोरेट तंत्र पहले जैसा ही फल-फूल रहा है| मणिपुर और गोवा में भाजपा सरकारें वोट से नहीं खोट से बनी हैं| तो क्या, महत्वपूर्ण है कि ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’ की मोदी साख बरकरार है|


मनमोहन सिंह इस जुमले का सिर्फ पहला आधा भाग कह सकते थे, ‘न खाऊँगा’, और मायावती सिर्फ शेष आधा, ‘न खाने दूंगी’| क्या मोदी के जुमलों की अंतर्वस्तु और उनकी सार्वजनिक वक्तृता शैली की तुलना हिटलर से की जा सकती है, जैसा कि उनके कई विरोधी दावा करते रहे है| इसके समर्थन में मुख्यतः मोदी की विशाल भीड़ से एकाकार होने के क्रम में नाटकीय भंगिमाओं और उनके गुजरात दौर के सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों का हवाला दिया जाता है| 

जैसे हिटलर जर्मन श्रमिक से एकजुटता दिखाने के लिए अपने साढ़े चार वर्ष के एक साधारण सैनिक के जीवन का भावुक हवाला दिया करता था, क्या मोदी का चाय वाला अवतार भी वही मकसद हासिल करता नहीं लगता? शब्दों के दोनों चितेरे राष्ट्रवादी फासिस्ट अपील से अपने श्रोताओं पर जादुई असर छोड़ते नजर आते हैं| लेकिन, भिन्न कालखण्डों के भिन्न राजनीतिक सन्दर्भों की कोई भी तुलना अकादमिक हो सकती है, जरूरी नहीं व्यावहारिक भी हो| अरस्तू वर्णित राजनीतिक जुमलों की अपील के तत्व बेशक दोनों में हों, वे उसी गहन रूप में आज भी हम पर असर करते हों, तो भी देश-काल सापेक्षता के निर्णायक महत्व को नकारा नहीं जा सकता है| हिटलर युद्ध उन्माद की उपज था| मोदी का जमाना ट्वीट का जमाना है|

भारत में ऐसे विचारकों की भी कमी नहीं जो भारतीय प्रधानमंत्री के राजनीतिक सम्प्रेषण को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के खांचे में रखना चाहेंगे| लेकिन सच्चाई यह है कि जुमलेबाजी की कला में ट्रम्प बहुत पीछे छूट जाते हैं| उनकी शैली दो टूक बात कहने वाली रही है, लगभग जुमला-विरोधी| दरअसल, इस क्षेत्र में मोदी की तुलना ट्रम्प के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति ओबामा से करनी अधिक दुरुस्त होगी, जो निर्विवाद रूप से शब्दों के कुशलतम चितेरे गिने जाते हैं| राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में ओबामा को उनकी नीतियों से कहीं ज्यादा उनके नपे-तुले शब्दों के लिए विरोधियों की घोर आलोचना सुननी पड़ी थी| 

उनके बारे में यहाँ तक कहा गया कि शब्द ही जिसके लिए सबकुछ हैं, उसका भरोसा कैसे किया जा सकता है| उत्तर प्रदेश में अखिलेश और राहुल ने भी लगातार मोदी के ‘मन की बात’ पर सवाल खड़ा किया कि वे ‘काम की बात’ कब शुरू करेंगे? यहाँ तक कि, याद कीजिये, 2014 में लोकसभा अभियान स्वयं मोदी ने भी ओबामा के मशहूर चुनावी जुमले ‘यस वी कैन’ से ही शुरू किया था| 

राजनीतिक जुमलों के अध्ययनकर्ता संपादक सैम लीथ का सटीक निष्कर्ष है कि जुमला शब्दों को शक्ति देने का काम करता है| इसका सटीक ज्ञान नागरिक को भी सत्ता के इस्तेमाल और उसके विरोध दोनों की समझ देगा |