Jun 26, 2011

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिसिया हमला


जनज्वार.छिंदवाड़ा जिले के अदानी पेंच पावर प्रोजेक्ट द्वारा की गयी मनमानी के खिलाफ आज 26 जून को आयोजित किसान महापंचायत पर पुलिस दमन का कहर बरपा हुआ है। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर बर्बर लाठी चार्ज किये और आंसू गैर के गोले छोड़े। पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बगैर हुए अवैध निर्माण कार्यो को ध्वस्त करने और जमीनें वापस लौटाने की मांग को लेकर किसान संघर्ष समिति की ओर से आज किसानों ने महापंचायत का आयोजन किया था।

किसान महापंचायत में भाग लेने जा रहे किसानों को पुलिस ने धमकाया तथा अलग अलग गांव से गिरफ्तार किया। विरोध में भाग लेने पहुंचे पूर्व विधायक और किसान नेता सुलीलम् को तड़के छिन्दवाडा पुलिस ने रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर शाम को नागपुर रेलवे स्टेशन पर रिहा किया। वहीं किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आराधना भार्गव को पुलिस ने भूलामोहगांव से जबरदस्ती घसीटकर गिरफ्तार किया। उनके साथ मौके पर पूर्व विधायक महेशदत्त मिश्रा भी मौजूद थे।

प्रशासन पर दबाव न बने इसके लिए पुलिस ने 12किसानों को अमरवाडा उपजेल भेज दिया है तो 44 किसान छिन्दवाड़ा जेल में बंद हैं। सुनीलम ने  राज्य सरकार की दमनकारी भूमिका पर आक्रोश  व्यक्त करते हुए कहा है कि 22मई के जानलेवा हमले के बाद किसान संघर्ष  समिति की और से शांतिपूर्ण तरीके से पदयात्रा की गई थी तथा 10हजार किसानों ने छिन्दवाडा पहुंचकर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए जिलाधीश महोदय को ज्ञापन सौंपा था। किसानों का कहना है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन अदानी कम्पनी के एजेन्ट के तौर पर कार्य कर रहा है। जिन लोगों ने किसानों की जमीनों पर अवैधानिक निर्माण कार्य किया है उनकी गिरफ्तारी करने की बजाय किसानों को गिरफ्तार किया जा रहा है।

डॉ0सुनीलम् ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि हर नागरीक को संविधान में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार दिया,लेकिन सरकार संविधान पर कुठाराघात करने पर आमदा है। डॉ0सुनीलम् ने कहा कि जानलेवा हमले,पुलिस की लाठी और गिरफ्तार ने किसानों को आक्रोषित करने का काम किया है। जिसके गंभीर परिणाम सरकार को भुगतने पड सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानिय पुलिस प्रशासन की होगी।

आंदोलनकारियों की अगली रणनीति के मुताबिक 27जून को जनसंगठनों का प्रतिनिधि मण्डल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मुलाकात करेगा और वे 30जून को भोपाल में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात कर किसानों के मानव अधिकार बहाल कराने की मांग करेंगे।



सरकारी नीतियों के विरोधी हू जिया रिहा


चीन में सरकार की नीतियों के एक प्रमुख विरोधी हू जिया को जेल से रिहा कर दिया गया है.उनकी पत्नी ज़ेंग जिंज्ञान ने इस ख़बर की पुष्टि की है और कहा है कि वे बीजिंग में अपने परिवार के साथ हैं...

ग़ौरतलब है कि पिछले बुधवार को चीन के जाने माने कलाकार और कार्यकर्ता आई वेईवेई को दो महीने की पुलिस हिरासत के बाद रिहा कर दिया गया था. हू जिया की रिहाई उस समय हुई है जब चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ यूरोप की यात्रा पर हैं और शनिवार रात को ब्रिटेन में बरमिंघम पहुँचे हैं.वे ब्रिटेन की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान ब्रिटेन में चीनी पूँजी निवेश को बढ़ाने के प्रयासों पर चर्चा करेंगे.

हू जिया पर चीन की सरकार ने विद्रोही गतिविधियों को उकसाने के आरोप लगाए थे. वर्ष 2008 में 37 वर्षीय हू जिया को दोषी पाया गया था और उन्हें साढ़े तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी.

मेरे पति घर लौट आए हैं और अपने माता-पिता और मेरे साथ हैं.मैं इस समय इंटरव्यू नहीं देने चाहती क्योंकि इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं हू जिया पर पांच लेख लिखने से संबंधित आरोप लगाए गए थे. साथ ही उन पर आरोप थे कि पत्रकारों को इंटरव्यू देते समय उन्होंने चीनी सरकार की आलोचना की थी.

उस समय चीन की सरकार समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हू ने 'अफ़वाहें फैलाईं और लोगों को उकसाया था.' हू जिया नागरिक अधिकारों के मुद्दों पर, पर्यावरण और एड्स से संबंधित मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं. वर्ष 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान उन्होंने चीन की सरकार के नाम एक 'ओपन लेटर' लिखी थी जिसका शीर्षक था - द रियल चाइना एंड द ओलंपिक्स यानी 'चीन का असली चेहरा और ओलंपिक खेल.'

इस पत्र में चीन में मानवाधिकारों के हनन के ख़त्म करने का आहवान किया गया था. वर्ष 2007 में हू जिया और उनकी पत्नी ने लगातार पुलिस की निगरानी में रहने के अपने अनुभवों का एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसके बाद उन्हें घर पर नज़रबंद कर दिया गया था.उन्हें यूरोपीय संघ ने अपने सर्वोच्च मानवाधिकार पुरस्कार साखारोव अवार्ड से सम्मानित किया था.

हू जिया की पत्नी ज़िंग जिंज्ञान ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया,"मेरे पति घर लौट आए हैं और अपने माता-पिता और मेरे साथ हैं. मैं इस समय इंटरव्यू नहीं देना चाहती क्योंकि इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं."मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लगातार चिंता ज़ाहिर की है कि हू जिया की रिहाई के बाद चीन की सरकार उन पर कड़े प्रतिबंध लगा सकती है. चीन की सरकार ने फ़िलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है.

बीबीसी से साभार

झारखण्ड में कलाकार को फांसी


जनज्वार.झारखण्ड के गिरिडीह जिले की अदालत ने चिलखारी हत्याकांड मामले में 23जून को चार माओवादियों को फांसी की सजा सुनाई है.झारखण्ड के इतिहास में यह पहली बार है कि माओवादियों को किसी मामले में फांसी की सजा हुई है. सजायाफ्ता लोगों में मनोज रजवार, छत्रपति मंडल, अनिल राम और जीतन मरांडी हैं, जिनमें जीतन मरांडी झारखंड के प्रसिद्ध प्रगतिशील लोक कलाकार हैं.

चिलखारी में 26अक्टूबर 2007 को हुई गोलीबारी में 19 लोगों की जान गई थी. मृतकों में झारखण्ड के  पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का बेटा अनूप भी था.माओवादियों ने यह हमला तब किया था जब वहां एक रंगारंग  कार्यक्रम चल रहा था.इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ़ द  रेयर मानते हुए  जिला और सत्र न्यायधीश इन्द्रदेव मिश्र ने सजा सुनाई है.  हालाँकि अदालत के इस फैसले का झारखंड में व्यापक विरोध हो रहा है.फांसी की सजा के विरोध में झारखण्ड के कई जेलों में बंद कैदी भी हैं और वे  आमरण अनशन कर रहे हैं.

बायीं  ओर जीतन और उनकी पत्नी : एक नए विनायक  
 जीतन मरांडी के खिलाफ हुए फैसले के बारे में झारखण्ड बचाओ आन्दोलन और पीयूसीएल का कहना है कि जीतन को फर्जी तरीके से फंसाया गया है.  संगठन के मुताबिक संदिग्धों में एक जीतन मरांडी था, जो फरार होने में सफल रहा. पुलिस उसे पकड़ने में अब तक नाकाम रही है और हमारे संगठन के मानवअधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी को इस मामले में अभियुक्त बना दिया,जबकि हत्याकांड के वक्त वह गांव में नहीं थे.संगठन का दावा है कि पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी के खिलाफ फर्जी गवाह पेश कर उन्हें मौत की सजा दिलाने में सफल रही है. 

संगठन की जारी विज्ञप्ति के मुताबिक  जीतन मरांडी नक्सलवादी नहीं है,वे एक सांस्कृतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. जीतन मरांडी एक प्रतिभाशाली कलाकार है, वे संगीत बनाते है, गीत लिखते है,और नुक्कड़ नाटक करते है.वे अपनी कला का इस्तेमाल गिरिडीह जिले के गावों में लोगो का मनोरंजन करने और उनकी जीवन की समस्यों के बारे में उन्हें जागरूक करने में करते है.ऐसे में जाहिर है कि वहां के प्रशासन और पुलिस के लिए वे एक खतरनाक व्यक्ति थे और वे उन्हें सबक सिखाने का मौका तलाश रहे थे.

झारखण्ड बचाओ आन्दोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि 'पुलिस ने हत्याकांड में शामिल असली जीतन मरांडी को पकड़ने का किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया.उनके लिए हमारे साथी को पकडना और उसे आरोपी बताना बहुत आसान था.पुलिस के लिए तथा कथित ‘गवाह को पेश करना कोई बड़ी बात नहीं थी जो अदालत में कबूल करते कि उन्होंने मरांडी को हत्याकांड की जगह देखा था और कोर्ट के लिए ये तथा कथित  गवाह सजा मुकर्रर  करने के लिए काफी थे.

वो सुबह कभी तो आएगी

जैसे ही कोर्ट ने सजा दी मरांडी ने कोर्ट परिसर में जोर जोर से ‘वो सुबह कभी तो आएगी’गीत गाना शरू कर दिया.जीतन की पत्नी अपर्णा ने भी 2साल के अपने बच्चे को गोद में उठाये हुए उनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिला दी.इस सजा के पीछे की कहानी एक राजनीतिक षड़यंत्र है जो पूर्व मुख्य मंत्री की पार्टी के नेताओं और पुलिस की मिलीभगत में रचा गया है ताकि जनता को डरा कर चुपचाप दमन सहते रहने को मजबूर किया जा सके.

 कोर्ट में जतीन ने घोषणा की कि वे इस सजा के खिलाफ अपील करेंगे. कोर्ट से बाहर  उनकी बीबी अपर्णा ने भी इस बात की पुष्टि की.अपर्णा के कहा कि वह न केवल उच्च न्यायालय  में बल्कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में भी सजा के खिलाफ अपील करेंगी.

Jun 25, 2011

राष्ट्रपति से माओवादियों के कुछ सवाल जवाब

छत्तीसगढ़ की विधानसभा को सम्बोधित करते हुए 24 जून को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा . राष्ट्रपति की इस अपील पर माओवादी क्या और क्यों  सोचते हैं, उस पूरे तर्कशास्त्र  को रखती  माओवादियों की ओर से  जारी प्रेस विज्ञप्ति ...


रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि 'माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्यधारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें।' राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें।

राष्ट्रपति ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।


देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है।

दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीजल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है, जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!

भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं, जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है, जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।

60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं, ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।

इसलिए देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।


सीपीआइ (माओवादी) के केन्द्रीय  कमेटी की यह विज्ञप्ति अभय के नाम से जारी हुई है, इसे यहाँ दखल की
दुनिया ब्लॉग से साभार प्रकाशित किया जा रहा है .

पर्यावरण और विकास के बीच पाखंड


सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं...
 
डॉ0 आशीष वशिष्ठ

हाल ही में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने विश्व की विशालतम स्टील कंपनी ‘पास्को’को उड़ीसा में प्लांट लगाने की सशर्त इजाजत दी है। जिस क्षेत्र में ये प्लांट स्थापित किया जाएगा वो क्षेत्र वनस्पतियों और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। सरकार को भलीभांति मालूम है कि उस क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने से जंगल और जमीन को भारी नुकसान होगा,बावजूद इसके प्लांट लगाने देने की अनुमति प्रदान करना उसकी की नीति और नीयत को ही दर्शाता है। 

सरकार का पक्ष है कि देश के विकास के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है। दुनिया के हर मुल्क में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हैं, लेकिन भारत में सरकारी मशीनरी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि एक बार उद्योग स्थापित होने के बाद लेनदेन का खेल शुरू हो जाता है। किसी भी उद्योग को देंखे, ऐसा हो ही नहीं सकता कि वहां पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन न होता हो। और सरकारकी आंख तब तक नहीं खुलती, जब तक कोई हादसा न हो जाए। 

पिछले दिनों ही लखनऊ के रिहायशी इलाके राजाजीपुरम में प्लाई बनाने की यूनिट और एक अन्य कारखाने में भीषण आग लगने के बाद प्रशासन की आंख खुली। आनन-फानन में इन औद्योगिक इकाईयों पर सख्त कार्रवाई का नाटक किया गया। लखनऊ की तरह  देश के हर छोटे-बड़े शहर के रिहायशी इलाकों में धडल्ले से सैकड़ों कारखाने चल रहे हैं। इनमें पर्यावरण कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे मानकों को ताक पर रखकर पर्यावरण और समूचे समाज की सेहत से खिलवाड़ आम बात है।

देश में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियत्रंण के लिए कानूनों का भारी बस्ता तो हमारे पास है, लेकिन उनका पालन करवाने की इच्छाशक्ति नहीं है। सरकारी तंत्र की उदासीनता और सरकार की लाहपरवाही के कारण ही अन्य देशों से खतरनाक कचरा हमारे तटबंधों पर आसानी से उतार जाता है। ऐसी कई घटनाएं पूर्व में घट चुकी हैं और अक्सर ऐसे वाकया सुनाई देते रहते हैं।

कुछ समय पहले दिल्ली में संपन्न हुए सतत विकास शिखर बैठक-2011में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि ‘सतत विकास को सुनिष्चित करने की रणनीति का केन्द्रीय सिद्धांत   यह है कि आर्थिक पहलुओं का फैसला करने वाले सभी लोगों या संगठनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वे पर्यावरण अनुकूल बातों को हमेशा ध्यान में रखें।’अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के मौजूदा मानकों को नाकाफी बताया। उनके मुताबिक अवशिष्ट प्रदूषण से निपटने के लिए ऐसा प्रवधान होना चाहिए कि प्रदूषण फैलाने वाले भुगतान करें। उनके विचार और सरकार के कारनामों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। वाकई पीएम पर्यावरण को लेकर इतने चिंतित है तो ‘पास्को’ को अनुमति क्यों दी गई।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी कितनी गंभीर है उसकी सच्चाई हाल ही में भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट से पता चलती है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के कामकाज पर पहली बार जारी पर्यावरण ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने जंगलों की सेहत सुधारने, जैव-विवधता और नदियों को बचाने समेत कईं मोर्चे पर योजनाओं के क्रियान्वयन में उदासीनता को लेकर फटकार लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजनाओं के लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र के अंबार को लेकर भी आश्चर्य जताया है। 

इसके अलावा पर्यावरण मंत्रालय में वित्त वर्ष 2008-09के आंकड़ों की पड़ताल में पाया कि परियोजनाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई, जिसके कारण वे अपना उद्देश्य ही पूरा नहीं कर पाई। रिपोर्ट के अनुसार पेड़ लगाने की 93 फीसदी परियोजनाएं अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई है। कैग सरकारी संस्था है और जब सरकारी संस्था स्वयं सरकार की गतिविधियों पर सवाल उठा रही है तो जमीनी हालातों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

सरकारी उदासीनता और ओछी राजनीति के कारण ही देश में नदी प्रदूषण की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप धारण करती जा रही है। चाहे नदियों को प्रदूषण मुक्त करने से लेकर नदियों पर बांध बनाने तक की हर छोटी-बड़ी योजना और पर्यावरण से जुड़े अहम् मसलों पर केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य विवाद आम बात है। केंद्र और राज्य सरकारों की राजनीति के फेर में पर्यावरण जैसा अहम् मुद्दा पिस जाता है।

गंगा और यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करोड़ों रूपये खर्च किए जा चुके हैं, बावजूद इसके अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाए हैं। जिन राज्यों से होकर गंगा नदी गुजरती है वहां की सरकारों का अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण गंगा को प्रदूषणमुक्त कर पाने में दिक्कतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वहीं केन्द्र सरकार के साथ ही साथ राज्य सरकारें भी गंगा को साफ-सुथरा बनाने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना पर काम नहीं कर रही हैं। 

उत्तराखंड में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की बाढ़ आई हुई है,वहीं उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेस हाईवे योजना अपने उफान पर है। वर्तमान में गंगा एक्षन प्लान को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के साथ विलय कर दिया गया है, बावजूद इसके स्थिति में मामूली सुधार भी नहीं आया है। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए विश्व बैंक ने भी मदद का हाथ आगे बढ़ाया है। उसने इस कार्य के लिए 26 लाख अरब डालर की राशि स्वीकृत की है, जो पीएम की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के माध्यम से खर्च किया जाएगा। अगर ईमानदारी से इस धनराशि से उपयोग किया गया तो स्थिति में सुधार हो सकता है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद कानपुर में चमड़ा शोधन इकाईयों को बड़ी मुश्किल से बंद करवाया जा सका है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा के तट पर बसा कानपुर देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। गंगा की भांति यमुना नदी में भी प्रदूषण का स्तर सारी हदें पार कर रहा है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश मे स्थित औद्योगिक इकाईयां और घरेलू कचरा नदी जल को जहर में तब्दील कर रहा है। पिछले साल चम्बल अभ्यारणय में जहां यमुना नदी का प्रदूषित जल आकर चम्बल नदी में मिलता है,वहां सैंकड़ों घड़ियालों की मौत सुर्खियों में रही है। हाल ही में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में मछलियों के भी मरने की खबरें आ रही हैं। इन सब घटनाओं के बाद भी सरकार महज कागजी कार्रवाई कर अपनी डयूटी पूरी कर रही है।


भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए विषिष्ट प्रावधान है। लेकिन यहां पर्यावरण की स्थिति गंभीर रूप धारण करती जा रही है। सरकार के एजेंडे में पर्यावरण का स्थान काफी नीचे है, तभी तो कड़ाई से पर्यावरण कानूनों और प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है। असलियत यह है कि हमारी विकास रणनीति में पर्यावरण और विकास के बीच सांमजस्य बैठाने का प्रयास कभी किया ही नहीं गया है। यही कारण है कि समूची विकास योजनाआं में पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न उपेक्षित ही रहता है। ज्यादातर मामलों में विकास का तर्क देकर जंगल के जंगल उजाड़ना, नदियों का रूख मोड़ने से लेकर उनके पानी को प्रदूषित करना, भूजल का अंधाधुंध दोहन, खेती के लिए रासायनिक उर्वरकों-कीटनाषको के बेलगाम इस्तेमाल आदि को खुद सरकारें प्रोत्साहित करती रही है।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए अनेक परियोजनाएं चलाई जा रही हैं,लेकिन सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, शहरीकरण, खेती के लिए कम होती धरती, बढ़ता औद्योगिककरण, अनियंत्रित  विकास और पर्यावरण के महत्ता को न समझने के कारण देश में आने वाले दिनों में पर्यावरण से जुड़ी समस्यायों  में बड़ा इजाफा होना तय है।


 
स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनितिक -सामाजिक मसलों के जानकार.


 

दलित महिलाओं पर शिक्षा मंत्री की दबंगई

इस बात पर किसी ने भी यह गौर करना उचित नहीं समझा कि आखिर पुष्पा देवी और उनके बेटे को हंगामा काटने पर क्यों मजबूर होना पड़ा। सबने बस वही सुना और लिखा जो पुलिस या मंत्री के समर्थकों ने कहा...

नरेन्द्र देव सिंह

पुष्पा देवी : उत्पीडन की शिकार
उत्तराखण्ड के नैनीताल जनपद के धारी ब्लाक के अन्तर्गत गांव सुई, रयूरीगाड़ निवासी पुष्पा सुयाल, उसके बेटे दीपक और सामाजिक कार्यकर्त्ता मुन्नी टम्टा को शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह बिष्ट के पीआरओ मदन पांडे की तहरीर पर धारा 151 के तहत जेल भेज दिया गया। गौरतलब है कि पुष्पा देवी और अनुसूचित जाति-जनजाति महिला उत्थान समिति की अध्यक्ष मुन्नी टम्टा दस जून को शिक्षा मंत्री के छडायल स्थित घर पर अपनी शिकायत दर्ज करने पहुंचे थे। जब पुष्पा देवी अपनी हिमायती महिला नेता के साथ गांव में दबंगों के हाथों उत्पीडित होने की शिकायत लेकर आयी थी, तब गोविन्द सिंह बिष्ट एक अधिकारी से बात कर रहे थे। 

शिक्षा मंत्री और  उनके समर्थकों के मुताबिक, पुष्पा देवी और  मुन्नी टम्टा कमरे में जबरन घुसने लगी. मना करने पर अनुसूचित जाति-जनजाति महिला उत्थान समिति की अध्यक्ष मुन्नी टम्टा  ने चप्पल उतार दी और शिक्षा मंत्री से अपशब्द कहे। इसी कारण मंत्री समर्थकों ने दोनों को बाहर खदेड़ा और उनकी पिटाई कर दी। इसके बाद कोतवाल प्रमोद शाह मुन्नी, पुष्पा और पुष्पा के बेटे को कोतवाली हल्द्वानी ले आये।

इस मामले में प्रमोद शाह शिक्षा मंत्री की आज्ञा का पालन करते दिखाई दिए, क्योंकि जब वह इन लोगों को गिरफ्तार करने आये तो उनके साथ कोई भी महिला पुलिसकर्मी नहीं थी। कोतवाली जाने के बाद पुष्पा देवी के बेटों का गुस्सा आक्रोश बनकर पुलिस की हीलाहवाली पर फूट पड़ा। करीब चार घंटे हंगामा होने के बाद उन्हें पुलिस की एकतरफा कार्रवाई का सामना करना पड़ा। 

इस पूरे मामले में इस बात पर किसी ने भी यह गौर करना उचित नहीं समझा कि आखिर पुष्पा देवी और उनके बेटे को हंगामा काटने पर क्यों मजबूर होना पड़ा। सबने बस वही सुना और लिखा जो पुलिस या मंत्री के समर्थकों ने कहा। असरदार लोगों की ऊंची आवाज से गरीब-दलित लोगों की चीखों को एक बार फिर से दबा दिया गया। 

पुष्पा देवी के बेटे सतीश ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि 16  मार्च को ग्राम सुई का ग्राम प्रधान सुभाष ब्रजवासी अपने 10-12 साथियों के साथ नशे में धुत  होकर लाठी-डंडों के साथ हमारे घर में घुस गया. उसने और उसके साथियों ने विधवा पुष्पा देवी और उसके तीनों बेटों की जमकर पिटाई की। साथ ही घर में तोडफोड़ भी की. 

जब सुभाष ब्रजवासी पुष्पा देवी और उसके परिवार को बेहोशी (अधमरी) की हालत में छोड़कर चला गया तो कुछ स्थानीय लोगों ने 108 एम्लेंबुस बुलाकर इन्हें पदमपुरी चिकित्सालय भिजवाया। जहां से इन्हें हल्द्वानी बेस अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। गौरतलब है कि यह मामला आपसी रंजिश के साथ-साथ सुभाष बृजवासी के गंदी नीयत का भी है। आरोप है कि सुभाष बृजवासी गांव की महिलाओं पर गंदी नीयत रखता है तथा अपनी दबंगई से गरीब और कमजोर लोगों को सताता है।

अस्पताल से कुछ ठीक होकर होने के बाद पुष्पा देवी ने मुक्तेश्वर थाने में सुभाष बृजवासी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी. उक्त नामजद लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने के कारण पीड़ित पक्ष इस सम्बन्ध में तहसीलदार, जिलाधिकारी नैनीताल, एस.एस.पी. नैनीताल से भी मिल चुका था, मगर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। इसीलिए मजबूर होकर पीड़ित परिवार अपनी फरियाद लेकर शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह बिष्ट के पास गया, परन्तु गोविन्द बिष्ट द्वारा मिलने से मना करने पर मामला बिगड़ गया। 


पुष्पा देवी ने शिक्षा मंत्री पर आरोप लगाया है कि सुभाष बृजवासी को गोविन्द सिंह बिष्ट का समर्थन प्राप्त है। इस कारण पुलिस भी सुभाष के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से बचती है। फिलहाल पुष्पा सुयाल और मुन्नी टम्टा जमानत पर रिहा हो चुकी हैं। दलितों के साथ इतना सबकुछ होने के बाद भी दलित हितों की बड़ी-बड़ी बात करने वाले कोई भी दलित नेता इन लोगों की सुध् लेने नहीं आया। जेल से रिहा होने के बाद मुन्नी टम्टा ने शिक्षा मंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘पुलिस शिक्षा मंत्री  के दबाव में काम कर रही है. जब हमें शिक्षा मंत्री के निवास स्थान से गिरफ्तार किया गया था तो कोई भी महिला पुलिस नहीं थी.'


इसके साथ ही शिक्षा मंत्री ने भी हम लोगों से अपशब्द कहे तथा अशोभनीय बर्ताव किया। मुन्नी टम्टा और पुष्पा देवी के साथ हुआ वाकया यह दर्शाता है कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री गोविन्द बिष्ट ने इन महिलाओं के प्रति बर्बरतापूर्वक कार्यवाही करवायी है, लेकिन सत्ता पाने के लिए तत्पर विपक्ष भी इन मुद्दों पर ध्यान देता हुआ नहीं दिख रहा है।


युवा पत्रकार  नरेन्द्र देव सिंह  उत्तराखंड के सामाजिक-राजनीतिक  मसलों पर लिखते हैं .



Jun 24, 2011

स्लट वॉक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का पहला प्रदर्शन जुलाई में


भारत में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर का तमगा हासिल कर चुकी दिल्ली में 25जून को आयोजित होने वाला स्लट वाक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का पहला प्रदर्शन अब जुलाई के पहले सप्ताह में होने की संभावना है...

विभा सचदेव

लड़कियों के छोटे कपड़े मर्दों को उत्तेजित करते हैं और वह लड़कियां ऐसे कपड़े पहनकर खुद ही बलात्कार और छेड़छाड़ को आमंत्रित करती हैं,जैसे तर्क आमतौर पर सार्वजनिक स्थलों पर सुनने को मिल जाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब बलात्कार के खिलाफ कार्यवाही करने वाली संस्थाएं भी इसी तरह का तर्क देती हैं। लेकिन अब इस एकतरफा मर्दाना समझ पर लगाम की तैयारी शुरू हो गयी। इस मर्दाना सोच को चुनौती देने के लिए अगले महीने दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की छात्रा उमंग सबरवाल के नेतृत्व में भारत में पहला बेशर्मी मोर्चा का प्रदर्शन दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में होने वाला है। गौरतलब है कि स्लट शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर मर्द उन औरतों के लिए करते हैं, जिन्हें वह बदचलन मानते हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा अर्पणा शर्मा कहती हैं,‘आखिरकार इस असुरक्षित शहर में हमारी आजादी के लिए कुछ तो होने जा रहा है। मैंने तो 25 जून को दिल्ली के कनॉट प्लेस में आयोजित होने वाले बेशर्मी मार्चा में शामिल होने के लिए आलमारी से सबसे छोटे कपड़े विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिये निकाले थे, मगर वह टल गया है।’ क्यों टला होगा, के सवाल पर अर्पणा कहती हैं, ‘जहां तक मुझे पता है नैतिकता के चौधरियों, जिसमें सरकार भी शामिल है, उसी का दवाब है।’

जनवरी2011में कनाडा के एक पुलिस अधिकारी द्वारा लड़कियों को यौन उत्पीड़न से बचने के लिए ‘कुलटा की तरह कपड़े’ न पहनने के सुझाव से इस विरोध की शुरुआत इस वर्ष टोरंटों शहर से हुई। पुलिस अधिकारी के सुझाव के विरोध में कनाड़ा की सड़के ‘हमें नहीं बलात्कारी को सजा दो’, ‘हम चाहे जो पहने, हमारी न का मतलब न है’ नारों से गूंज उठी। उसके बाद लंदन में ी लगग 5000 महिलाओं ने कम कपड़े पहनकर सड़क पर उतर कर ‘स्लट वॉक’का आगाज किया गया। केवल कनाडा और लंदन नहीं दुनिया के सी बड़े शहरों में ‘स्लट वॉक’ की आग देखने को मिली रही है और अब भारत की बारी है। इस मार्च में शामिल लड़कियां और महिलाएं वह कपड़े पहनती हैं, जिन्हें समाज नैतिकता के आधार पर पहनने की इजाजत नहीं देता और पहनने वालों को बदचलन कहने से गुरेज नहीं करता।

अगर एक आम व्यक्ति इस स्लट वॉक के बारे में सुनेगा तो उसकी धारणा कुछ अलग ही होगी। लेकिन वह यह अनुमान कभी  नहीं लगा पायेगा कि यह महिलाओं द्वारा छेड़ा गया एक सामाजिक आंदोलन है। भ्रष्टाचार   से लड़ने के लिए छेड़ा गया ‘फाइट अगेंस्ट करप्शन’, भूमि  अधिग्रहण को रोकने के लिए चला भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन’तो सुना है लेकिन बेशर्मो को सबक सिखाने के लिए खुद ही बेशर्म मोर्चा बना देना पहली बार देखा गया है।

देह का व्यापार करने वाली महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला यह अपमानजनक शब्द ‘स्लट’ का प्रयोग इन संघर्ष में शामिल महिलाओं द्वारा उन पुरुषों के मुंह पर तमाचा मारने के लिए किया गया जो   कभी किसी  लड़की को स्लट कहने में नहीं हिचकिचाते। भारत में इस विरोध प्रदर्शन का नाम बदलकर ‘बेशर्मी मोर्चो’ कर दिया गया है, क्योंकि यहां पर बहुत से पुरुष ऐसे मौजूद है जो इस शब्द का मतलब तक नहीं जानते, लेकिन उनके शब्दकोष में और ऐसे कई अपमानजनक शब्द मौजूद है जो किसी भी महिला को अपमानित करने के लिए काफी हैं।

महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक माने गये देशों की सूची में देश की राजधानी दिल्ली को चौथा स्थान प्राप्त है और भारत के असुरक्षित शहरों में पहला. यह वही शहर है जहां बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों को कहते सुना जाता है कि ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती,उस लड़की ने भी  कुछ न कुछ जरूर किया होगा’। प्रदेश की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का ऐसी घटनाएं कैसे रूकें पर राय है कि ‘लड़कियों को रात में बाहर नहीं निकलना चाहिए।’ सवाल है की क्या यह उपाय स्त्रियों को दोयम नागरिक बनाये रखने की ही साजिश नहीं है.

उसके बाद बारी आती है कार्ट की। कोर्ट में लड़की के चरित्र को लेकर बहस होती है और अगर किसी कारणों से एक पक्ष लड़की के चरित्र के साथ बदचलन शब्द लगाने में कामयाब हो जाता है तो पूरे केस का रुख ही बदल जाता है और पुरुष द्वारा किया गया अपराध, अपराध नहीं रह जाता। इसका मतलब यह है कि अगर लड़की का चरित्र साफ नहीं है तो कोई भी  उसके साथ कुछ ी कर सकता है। भारतीय मानसिकता के मुताबिक तो अगर लड़की छोटे कपड़े पहनकर घर से निकलती है तो उसका चरित्र ठीक होता।
दिल्ली की सड़कों का हाल तो कुछ इस तरह है कि अगर कोई लड़की छोटे कपड़े पहनकर निकलती है तो आस-पास चल रहे लोग उसको ऊपर से नीचे तक देखते हैं और झट से उनके मुंह से एक ही वाक्य निकलता है, ‘फिर कहेंगी हमारा रेप हो गया।’ ऐसे में शुक्र मनाना चाहिए कि आखिर किसी ने तो इसकी शुरूआत की और सड़ांध मार रही मानसिकता पर सवाल उठाया है। लेकिन इस विरोध आंदोलन की सफलता को लेकर एक सवाल अभी भी जेहन में है कि क्या भा रत में भी इस आंदोलन को उसी तरह समर्थन मिल पायेगा, जिस तरह विदेश में मिला है।

भारत की संस्कृति,मानसिकता और रहन-सहन सब कुछ बिलकुल अलग है। देश की सड़कों पर जब लड़कियां अर्धनग्न रूप में विरोध करते हुए उतरेगी तो यहां के लोगों का क्या रवैया होगा। क्योंकि यहां के मर्दो के इस ‘बेशर्मी मोर्चा’को लेकर अपमानजनक तर्क को अभी से आने शुरू हो गये हैं, और मर्द कहने लगे हैं कि ‘वी आर रेडी टू सी स्लटस ऑन दा रोड’।


पुणे स्थित इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ ब्रोडकास्टिंग एंड जर्नलिज्म से इसी वर्ष पत्रकारिता कर लेखन की शुरुआत.  सामाजिक विषयों और फ़िल्मी लेखन में रूची.


फोर्ड फाउंडेशन का सीआइए गठजोड़ और भारत के जनांदोलनों में घुसपैठ


'वर्ल्ड सोशल फोरम की राजनीति और अर्थशास्त्र, भूमंडलीकरण के खिलाफ संघर्ष के लिए सबक' नाम से www.globalresearch.ca पर उपलब्ध लम्बे पर्चे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अनुदित कर यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है. सामाजिक- राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़े लोगों के लिए यह एक जरुरी मसविदा है जो बताने के लिए काफी है कि स्वयंसेवी संगठनों ( NGOs) के जरिये किये जा रहे सामाजिक बदलावों के संघर्षों का असल राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या है, फोर्ड फाउन्डेशन जैसे दानदाताओं के पीछे असल साम्राज्यवादी मंशा क्या है. यह पर्चा  2003   मुंबई में आयोजित वर्ल्ड सोशल फोरम के समय प्रकाश में आया था...
अनुवाद - राजेश चन्द्र
 
 
फोर्ड फाउनडेशन-विदेशी फंडिंग के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन

"कभी न कभी कोई फोर्ड फाउनडेशन द्वारा भारत में किए जा रहे कार्यों का ब्योरा ज़रूर अमरीकी जनता के सामने रखेगा। देश में फोर्ड फाउनडेशन का कुछ लाख डॉलर में आने वाला कुल खर्च इस कहानी का दसवां हिस्सा भी शायद ही बयान कर सके"- चेस्टर बाउलन (भारत में पूर्व अमरीकी राजदूत)।

फोर्ड फाउनडेशन द्वारा विश्व सामाजिक मंच को दिए जा रहे अकूत धन के प्रवाह ने इस संस्थान की पृष्ठभूमि और इसकी वैश्विक गतिविधियों को जगजाहिर कर दिया है। यह न सिर्फ़ इसके बल्कि इस जैसी दूसरी संस्थाओं के अध्ययन की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। फोर्ड फाउनडेशन (एफएफ) की स्थापना 1936 में फोर्ड के विशाल साम्राज्य के हित में टैक्स बचाने की जुगत के तौर पर हुई थी, लेकिन इसकी गतिविधियाँ स्थानीय तौर पर मिशिगन के स्टेट को समर्पित थीं। 1950 में जब अमरीकी सरकार ने इसका ध्यान "कम्युनिस्ट धमकियों" से मुठभेड़ पर केंद्रित किया, फोर्ड  फाउनडेशन  एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फाउनडेशन में तब्दील हो गया।

फोर्ड फाउनडेशन और अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी  सीआईए का गठजोड़

सच तो यह है कि अमरीका की केन्द्रीय गुप्तचर संस्था (सीआइए) लम्बे समय से अनेकानेक लोकोपकारी फाउनडेशनों (खासकर फोर्ड फाउनडेशन) के माध्यम से कार्य करती आ रही थी। जेम्स पेत्रास के शब्दों में फोर्ड और सीआईए का अंतर्सम्बंध "अमरीका के साम्राज्यवादी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को मजबूती देने और वामपंथी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों की जड़ें खोदने के लिये एक सोची-समझी और सजग संयुक्त पहलकदमी थी। " फ्रांसिस स्टोनर इस दौर पर अपने एक अध्ययन में कहते हैं - इस समय फोर्ड फाउनडेशन ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक दुष्प्रचार के क्षेत्र में सरकार का ही एक विस्तार हो। फाउनडेशन के पास इसका पूरा ब्योरा है कि उसने यूरोप में मार्शल प्लान और सीआईए अधिकारियों के विशिष्ट अभियानों में कितनी प्रतिबद्धता और अंतरंगता के साथ कार्य किया है। "

रिचर्ड बिशेल ,जो 1952 -54 के दरम्यान फाउनडेशन के प्रमुख रहे, तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन ड्यूल्स के साथ खुले तौर पर मिलते-जुलते रहे थे। उन्होंने फोर्ड फाउनडेशन को सीआईए की विशेष मदद के लिये प्रेरित किया। ड्यूल्स के बाद जॉन मैकक्लॉय फोर्ड के प्रमुख बने। इससे पहले का उनका कैरिअर वार (War) के सहायक सचिव, विश्व बैंक के अध्यक्ष, अधिकृत जर्मनी के उच्चायुक्त, रौकफेलर के चेज मैनहट्टन बैंक के अध्यक्ष और सात बड़ी तेल कंपनियों के वाल स्ट्रीट अटोर्नी के तौर पर काफी विख्यात रहा था। मैकक्लॉय ने सीआईए और फोर्ड की साझेदारी को तीखा किया - फाउनडेशन के अंतर्गत एक प्रशासनिक इकाई गठित की जो खास तौर से सीआईए के साथ तालमेल बिठा सके और उन्होंने निजी तौर पर भी एक परामर्शदात्री समिति का नेतृत्व किया ताकि फोर्ड फाउनडेशन फंड के लिए एक आवरण और वाहक के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। 1966 में मैक जॉर्ज बंडी , जो उस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में विशेष सहायक थे, फोर्ड फाउनडेशन के प्रमुख बने।

यह फाउनडेशन और सीआईए के बीच एक व्यस्त और सघन साझेदारी थी। "सीआईए के बहुसंख्य "दस्तों" ने फोर्ड फाउनडेशन से भारी अनुदान प्राप्त किया। बड़ी संख्या में सीआईए प्रायोजित तथाकथित " स्वतन्त्र " सांस्कृतिक संगठनों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने सीआईए /फोर्ड फाउनडेशन से अनुदान प्राप्त किया। फोर्ड फाउनडेशन द्वारा दिए गए सबसे बड़े दानों में एक वह था जो सीआईए प्रायोजित सांस्कृतिक आज़ादी (स्वायत्तता ) कांग्रेस को 1960 में दिया गया था - सात मिलियन यानि सत्तर लाख डॉलर। सीआईए से जुड़कर काम करने वाले बहुतेरे लोगों को फोर्ड फाउनडेशन में पक्की नौकरी मिलती रही और यह घनिष्ठ साझेदारी परवान चढ़ती रही।"

बिशेल के अनुसार फोर्ड फाउनडेशन का मकसद "केवल इतना भर नहीं था कि वह वामपंथी बुद्धिजीवियों को वैचारिक समर में हरा दे, बल्कि यह भी था कि प्रलोभन देकर उन्हें उनकी जगह से उखाड़  दे ।"  1950 के सांस्कृतिक स्वायत्तता कांग्रेस (सीसीएफ) को सीआईए ने फोर्ड फाउनडेशन की कीप से फण्ड दिया। सीसीएफ की सबसे प्रसिद्ध गतिविधियों में से एक थी वैचारिक पत्रिका "एनकाउन्टर "। बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी जैसे बिकने को तैयार बैठे थे। सीआईए और फाउनडेशन ने विशिष्ट कलात्मक परम्पराओं, जो अमूर्त अभिव्यक्तियों पर आधारित थीं, को प्रोत्साहित करना शुरू किया - ताकि वह उस कला को जो सामाजिक सरोकारों को वाणी देती है, को कड़ी चुनौती दे सके।

अमरीकी फाउनडेशनों में सीआईए की अत्यन्त व्यापक घुसपैठ थी। अमरीकी सीनेट द्वारा 1976 में गठित एक कमिटी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि 1973-76 के दरम्यान दस हज़ार डॉलर से अधिक के 700 अनुदान जो 164 फाउनडेशनों के माध्यम से बांटे गए थे, उनमे से 108 आंशिक तौर पर अथवा शत प्रतिशत सीआईए  पोषित थे। पेत्रास के अनुसार, "फोर्ड फाउनडेशन के शीर्ष पदाधिकारियों और अमरीकी सरकार के बीच का सम्बन्ध सुस्पष्ट है और यह जारी है। हाल के दिनों के कुछ फंडेड प्रोजेक्ट का एक अध्ययन भी साफ बताता है कि फोर्ड फाउनडेशन ने किसी भी ऐसे बड़े प्रोजेक्ट को फण्ड नहीं किया है जो अमरीकी नीतियों की खिलाफत करता हो।"
फोर्ड फाउनडेशन कबूल करता है (अपने नयी दिल्ली ऑफिस की वेबसाइट पर) कि सन् 2000 की शुरुआत में इसने 7.5 विलियन डॉलर ग्रांट के रूप में दिया है और 1999 में इस क्षेत्र में कुल मिलाकर 13 विलियन डॉलर दान में दिया है। वह यह भी दावा करता है कि "सरकारों अथवा अन्य श्रोतों से फण्ड प्राप्त नहीं करता," पर वास्तव में, जैसा कि हमने देखा है, यह एक उल्टी बात है।

फोर्ड फाउनडेशन और  भारत

फोर्ड फाउनडेशन की नई दिल्ली ऑफिस के वेब पेज के अनुसार -"भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर फाउनडेशन ने 1952 में भारत में एक ऑफिस की स्थापना की।" वास्तव में चेस्टर बाउल्स जो 1951 में भारत में अमरीका के राजदूत थे, ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी। अमरीकी विदेश नीति की स्थापना में लगे बाउल्स को गहरा धक्का तब लगा जब 'चीन हाथ से निकल गया' (राष्ट्रीय स्तर पर वहां 1949 में कम्युनिस्ट सत्ता में आ गए थे)। इसी तरह वे इस बात से भी दुखी थे कि तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए हथियारबंद आन्दोलन को कुचलने में भरतीय सेना नाकाम रही थी (1946-51) " जब तक कि कम्युनिस्टों ने स्वयं ही हिंसा का रास्ता बदल नहीं लिया। " भारतीय किसानों की अपेक्षा थी कि अंग्रेजी राज की समाप्ति के बाद उनकी इस दीर्घकालीन मांग को पूरा किया जाएगा कि जमीन जोतने वाले को मिलनी चाहिए। और यह दबाव तेलंगाना आन्दोलन की समाप्ति के बाद भी आज भारत में हर कहीं महसूस किया जा सकता है।

पॉल हॉफमैन को जो फोर्ड फाउनडेशन के तत्कालीन अध्यक्ष थे, बाउल्स ने लिखा-"स्थितियां चीन में बदल रही हैं पर यहाँ भारतीय परिस्थितियां स्थिर हैं.....अगर आने वाले चार-पाँच वर्षों में वैषम्य बढ़ता है, या फ़िर अगर चीनी भारतीय सीमाओं को धमकाए बगैर अपना उदारवादी और तर्कसंगत रवैया बनाये रखते हैं .... भारत में कम्युनिस्म का बड़ा भारी विकास हो सकता है। नेहरू की मृत्यु अथवा उनके रिटायरमेंट के पश्चात् यदि एक अराजक स्थिति बनती है तो सम्भव है यहाँ एक ताक़तवर कम्युनिस्ट देश का जन्म हो।" हॉफमैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए एक मज़बूत भारतीय राज्य की जरूरत पर बल दिया -"एक मज़बूत केन्द्र सरकार का गठन होगा, उग्र कम्युनिस्टों को नियंत्रित किया जाएगा....प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जनता तथा दूसरे स्वतंत्र (बीमार) देशों से तालमेल, सहानुभूति और मदद की अत्यन्त आवश्यकता है। "

नई दिल्ली ऑफिस फौरन स्थापित किया गया, और फोर्ड फाउनडेशन ने कहा- "यह अमरीका से बाहर फाउनडेशन का पहला कार्यक्रम है और नई दिल्ली ऑफिस इसकी क्षेत्रीय कार्रवाइयों का काफ़ी बड़ा हिस्सा पूरा करेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र नेपाल और श्रीलंका तक व्याप्त है।

"फोर्ड फाउनडेशन की गतिविधियों का क्षेत्र तय कर दिया गया ( अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा) है "- जॉर्ज रोजेन लिखते हैं ,- " हमारा अनुभव है कि एक विदेशी (अमरीकी) सरकारी एजेंसी का ...................में काम करना अत्यन्त संवेदनशील मसला है .......दक्षिण एशिया बड़ी तेजी से फाउनडेशन की गतिविधियों के लिए एक संभावित क्षेत्र के रूप में सामने आया है.........भारत और पाकिस्तान दोनों ही चीन की ज़द में हैं और कम्युनिज्म द्वारा निशाने पर लिए हुए प्रतीत होते हैं। इसलिए वे अमरीकी नीतियों के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गए हैं..... ।"

फोर्ड फाउनडेशन ने भारतीय नीतियों पर आधिपत्य जमा लिया है। रोजेन कहते हैं कि "1950 से लेकर 1960 के बीच विदेशी विशेषज्ञों ने भारतीयों के मुकाबले  उच्च अधिकार हासिल कर लिए हैं ", और फोर्ड फाउनडेशन तथा (फोर्ड फाउनडेशन/सीआइए फंडेड) एमआईटी सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज "योजना आयोग के आधिकारिक सलाहकार" की तरह कार्य कर रहे हैं। बाउल्स लिखते हैं कि " डगलस एन्समिन्जर के नेतृत्व में, भारत में फोर्ड के कर्मचारी योजना आयोग के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं जो पंचवर्षीय योजनाओं का संचालन करता है। जहाँ भी दरार दिखती है, वे उसे भरते हैं, चाहे वह खेती का, स्वास्थ्य शिक्षा का अथवा प्रशासनिक मामला हो। वे ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ता प्रशिक्षण विद्यालयों में साथ जाते हैं, संचालन करते हैं और वित्तीय मदद देते हैं।"