Jun 18, 2017

पत्रकारिता के किस काम की आईआईएमसी

आईआईएमसी एक बड़ा सर्प है जो आसपास के सभी जीवों को निगल जाता है। दिल्ली के तमाम संस्थानों में इनके लोग घुसे हुए हैं जो पत्रकारिता में सैटिंग कर अन्य संस्थानों और शहरों से आए लोगों को पत्रकारिता क्षेत्र में प्रवेश करने नहीं देते...
विष्णु शर्मा
भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC आईआईएमसी), दिल्ली के एक कार्यक्रम में बस्तर के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एसआरपी कल्लूरी के आने पर खूब हल्ला मचा। कई लोगों ने संस्थान के बदलते चरित्र पर चिंता व्यक्त की तो कई भले लोगों ने कल्लूरी के विरोध को गैरवाजिब बताया।

कल्लूरी के आने का संस्थान के उन पूर्व छात्रों और अध्यापको का विरोध करना कितना सही था जिनके पत्रकार बन जाने में कल्लूरी जैसे बड़े नामों का बड़ा योगदान है इस पर बात करने की बहुत जरूरत नहीं है।
आईआईएमसी एक सरकारी संस्थान है जो हर साल बड़ी तादाद में सरकारी कर्मचारी पैदा करता है। कुछ लोग पत्रकार भी बन जाते हैं लेकिन तभी जब अच्छा पैकेज मिलता है। एक सरकारी संस्थान से पत्रकारिता के मानकों की अपेक्षा करना खुद विरोध करने वाले इन भोले पत्रकारों की सोच पर सवाल खड़ा करता है।
कुल मिलाकर बात यह है कि आईआईएमसी के चरित्र में कोई बड़ा बदलाव केन्द्र में एनडीए सरकार के आने से नहीं आया है। यह संस्थान पिछले 50 सालों से सरकारी पत्रकार पैदा करती रही हैं और आगे भी करती रहेगी। कल वाम सरकार बन जाए तो देख लीजिएगा इसका पूरा रूप लाल हो जाएगा।
हर साल इस संस्थान से हजारों नहीं तो सैकड़ों ‘पत्रकार’ निकलते हैं, जिनमें से 95 से 98 प्रतिशत देर—सबेर सरकारी कर्मचारी से ज्यादा कुछ नहीं बन पाते। देर—सबेर इसलिए कि शुरू में इनमें से बहुतेरे पत्रकारिता में नौकरी शुरू करते हैं, मगर वह लगातार इसी प्रयास में होते हैं कि कैसे शासन—सत्ता में सेटिंग कर सरकारी—गैरसरकारी नौकरी हथियाई जाए।
असल में आईआईएमसी एक प्लेसमैंट ऐजेंसी से ज्यादा कुछ है ही नहीं। इस संस्थान के संचालकों का पूरा जोर इस बात पर रहता है कि संस्थान के अधिक से अधिक विधार्थियों की सैटिंग कहीं हो जाए। अब इस सैटिंग के लिए क्या जरूरी है ये कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं है। ऐसे में राईट-लैफ्ट-सेन्टर के कल्लूरी साहब आते रहेंगे और ये इसके चलते रहने की जरूरी शर्त भी है।
अगर पत्रकार और पत्रकारिता के गिरते चरित्र को रोकना है तो ‘कल्लूरी’ के विरोध से अधिक जरूरी है आईआईएमसी को बंद कर देना। एक प्रयोग के तौर पर कम से कम इसे अगले 5 साल तक बंद कर देना चाहिए। इससे अन्य शहरों से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले लोगों को भी दिल्ली और अन्य बड़े शहरों के ‘राष्ट्रीय’ मीडिया में प्रवेश करने का मौका मिलेगा और इन लगभग मरणासन्न संस्थानों को नया रक्त और नई उर्जा मिलेगी।
आईआईएमसी एक बड़ा सर्प है जो आसपास के सभी जीवों को निगल जाता है। दिल्ली के तमाम संस्थानों में इनके लोग घुसे हुए हैं जो अन्य संस्थान और शहर के लोगों को पत्रकारिता क्षेत्र में प्रवेश करने नहीं देते। इस क्षेत्र की तमाम छोटी बड़ी नौकरियां इनके कब्जे में हैं। ये लोग लोगों का करियर बनाते और बिगाड़ते हैं।
इसी संस्थान के पास आउट बड़े बड़े चैनलों के मालिक बन गए है। ये ही लोग सरकारी नौकरियों में हैं। ये ही जनसम्पर्क अधिकारी हैं और ये ही प्रकाशन संस्थानों में भरे है। ये लोग बीबीसी हिन्दी, डॉयचे वेले, चाइना रेडियो इन्टरनेशनल और तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में घुस गए हैं। यहां तक कि ये लोग पत्रकारिता की सारी स्कॉलरशिप और फैलोशिप खा जाते हैं। अनुवाद और प्रूफ रीडिंग का काम लोगों से छीन लेते है।
आज अगर आईआईएमसी कोई एक चीज पैदा नहीं कर पा रहा है तो वह है पत्रकार। पिछले दिनों पत्रकारिता को जिन लोगों ने सबसे अधिक बदनाम किया वे इसी संस्थान के पूर्व छात्र हैं। सारी फर्जी कहानियां आईआईएमसी के पूर्व छात्रों से आई हैं। जेएनयू में त्राही—त्राही मचाने वाले यही लोग हैं। दीपक चौरसिया हो, सुधीर चौधरी, या निधी राजदान आज की ‘पत्रकारिता’ के सभी मालिक के और आवाज आईआईएमसीएन ही हैं। पक्ष भी और विपक्ष भी।
इसके अलावा सामाजिक संजाल में भी इन्हीं का कब्जा है। ये ही लोगों को पत्रकारिता का सर्टिफिकेट बांटते हैं। फेसबुक और ट्वीटर में 20 हजार फोलोवर बताने वाले बडे़—बडे़ पत्रकार भी पत्रकारिता के नाम पर हर तरह से बदनाम राजनीति के प्रवक्ता बने हुए हैं। कोई द्वीज सरकार का प्रवक्ता है तो कोई गैर द्वीज सरकार का और कोई वाम सरकार का, लेकिन सारे के सारे आईआईएमसीएन हैं तो सरकारी प्रवक्ता ही।
ऐसे में बेचारे गैर आईआईएमसी पत्रकार कहां जाएं? छोटे शहरों के ये मासूम पत्रकार आज भी पढ़ रहे हैं कि पत्रकार को सरकार का नहीं बल्कि जनता का प्रवक्ता हो चाहिए। इनकी हालत तो भारतीय सेना के उन जवानों की तरह है जो 10 मिनिट में 2.4 किलोमीटर दौड़ कर भर्ती होते हैं लेकिन इनका अफसर हमेशा इण्डियन मिल्ट्री अकादमी का पास आउट की होता है।
तो ऐसे में कल्लूरी के आने पर इतना बवाल मचाने की क्या जरूरत है। कल्लूरी किसी दीपक चौरसिया या सुधीर चौधरी से बड़े तो नहीं हैं। उनके पास जन चेतना को प्रभावित करने की वैसी शक्ति नहीं है जो आईआईएमसी के पास आउट संचार माफियाओं के पास होती है।

महिला के पक्ष में रिपोर्ट शेयर की तो ग्रुप की महिलाएं हुईं आग बबूला

पारिवारिक ग्रुपों में अश्लील चुटकुलों और अश्लील फब्तियों पर तो खूब मजे लिए जाते हैं लेकिन महिला मसलों के गंभीर सवालों पर संस्कारी लोग मुंह बिचकाने लगते हैं.....

पूरी कहानी बता रहे हैं, मनु मनस्वी 

पिछले दिनों जनज्वार में औरत के गुप्तांग की शक्ल वाली ऐशट्रे के विज्ञापन का हो रहा विरोध खबर पढ़कर मन बेहद दुखी हुआ। लगा कि जनता के पैसों पर पलकर करोड़ों—अरबों कमाने वाली कंपनियों के लिए मनुष्य केवल सामान बेचने का जरिया मात्र रह गया है। इस खबर पर सबसे पहले लेखिका अनामिका अनु अपने फेसबुक पेज के जरिए प्रकाश में लेकर आयीं, जिसके बाद पता चला कि कई वेबसाइट्स पर यह घटिया विज्ञापन प्रसारित हो रहा है।

 
जब इस खबर के लिंक को मैंने व्हाट्सएप ग्रुप पर शेयर किया तो कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली। हैरत की बात यह कि प्रतिक्रिया खबर के विरोध में होने की बजाय इस बात पर थी कि मैंने ऐसी खबर शेयर करने का दुस्साहस कैसे कर दिया? मेरे रिश्तेदारों द्वारा बनाए गए ‘फैमिली ग्रुप’ में खबर को देखते ही ये धारणा बना ली गई कि खबर अश्लील है। 

फैमिली ग्रुप के एकाध मेंबर ने तो ललकारते हुए ग्रुप छोड़ने की धमकी तक दे डाली। खैर! मेरे लिए फैमिली का अर्थ बहुत व्यापक है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा को मानने वाला मैं कैसे मात्र कुछ एक रिश्तेदारों को फैमिली मान सकता हूं, जबकि पूरे समाज के प्रति मेरा दायित्व बनता है। 

कहने को तो लोग अपने बच्चों को ईमानदारी, सच्चाई, परोपकार की घुट्टी पैदा होते ही पिलाने लग जाते हैं, पर दुखद है कि अक्सर वे ही इस पर दोगली मानसिकता रखते हैं।  

खैर! मेरे द्वारा खबर का लिंक शेयर करने पर मिली तीखी प्रतिक्रिया से मैं हैरान था। ये हैरानी क्षोभ में तब बदली, जब एक महिला सदस्य ने कहा कि इस तरह की खबर के ग्रुप में शेयर होने से अब यह ग्रुप ‘फैमिली ग्रुप’ नहीं रहा, लिहाजा अब वह इस ग्रुप को छोड़ रही हैं। (गोया कि महिलाओं पर आधारित यह खबर डालने से फैमिली ग्रुप अछूत हो गया हो, जिससे आहत होकर वह महिला सदस्य अपने पापों का प्रायश्चित कर रही हो।)

मुझे उक्त महिला सदस्य की इस मानसिकता पर बेहद दुख हुआ। मैं समझ गया कि यह खबर पढ़ी ही नहीं गई है और मात्र हेडिंग देखकर ही अश्लील होने का ठप्पा इस पर लगा दिया गया है। मैंने तत्काल इसका जवाब देना मुनासिब समझा और ग्रुप में एक मैसेज भेज दिया जो कुछ इस प्रकार था -

‘एक बात का जवाब दें। फैमिली ग्रुप शब्द के मायने क्या होते हैं? क्या केवल हा..हा..ही..ही.. करना या समाज में हो रहे सही—गलत कार्यों पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करना भी होता है? कोई वाहियात चुटकुला बनाकर इस ग्रुप में शेयर करूं तो सही, लेकिन सच को सच तरह पेश करूं तो गलत। वह सही होगा? सच को सच कहने का साहस मैं रखता हूं इसीलिये मैं हर एक को नहीं सुहाता

जवाब में मैंने आगे लिखा, 'यह खबर एक महिला अनामिका अनु द्वारा ही लिखी गई है। खबर में न तो चटखारे लेकर औरतों का मजाक उड़ाया गया है और न ही इसे चुटकुले के रूप में पेश किया गया है। ये महिलाओं के प्रति बिजनेस कंपनियों की घटिया सोच को दर्शाती खबर है, जिसे सच्चाई के साथ पेश किया गया है।'  

मैंने कहा, 'इस खबर का लिंक शेयर करने पर कायम हूं। आप समाज में हो रही गलत चीजों पर आंखें फेर लेने से या ‘छिः छिः गंदा’ कहकर आप उसे अच्छा नहीं बना सकते। फैमिली ग्रुप में पति पत्नी के जोक्स और शादियों की फोटो ही शेेयर करनी हैं तो वही सही। पर सच से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। खासकर तब, जबकि ग्रुप में अधिकतर सदस्य शिक्षा और पुलिस जैसे जिम्मेदार महकमों से जुड़े हों।’

मैसेज भेजकर मुझे कुछ सुकून मिला। बहरहाल एकाध के ग्रुप छोड़कर जाने का मैसेज मिल चुका है। शेष भी चलें जाए तो मेरी बला से। लंगड़े घोड़े होने से बेहतर है पैदल सड़कें नापना।

सरकारी स्कूल जब इतने ही अच्छे तो केजरीवाल और सिसोदिया के बच्चे उनमें क्यों नहीं पढ़ते!

जब दिल्ली के सरकारी स्कूल स्वर्ग बन ही गये हैं और वहां बहुत अच्छी पढ़ाई हो रही है तो आपकी पार्टी के कितने विधायकों के बच्चे जो स्कूलों में जाते हैं। उनमें से कितनों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं....
दिल्ली से स्वतंत्र कुमार की रिपोर्ट
सेलिब्रिटी, एक्टिविस्ट और अब सबसे ज्यादा मीडिया कैसे प्रोपगेंडा का शिकार हो जाते हैं, उसकी एक बानगी ये देखिए।
कुछ दिन पहले दिल्ली में सीबीएसई का बारहवीं क्लास का रिजल्ट घोषित हुआ। रिजल्ट के आते ही इस तरह परिचर्चा छिड़ गई मानो दिल्ली में सरकारी शिक्षा क्षेेत्र में कुछ जादू हो गया है। हर कोई सोशल मीडिया पर दिल्ली के सरकारी स्कूलों के रिजल्ट की चर्चा करने लगा कि जैसे किसी जादूगर ने कोई चमत्कार कर दिया है और इस जादूगर का नाम मनीष सिसोदिया है।
बॉलीवुड से लेकर भाजपा के केंद्रीय मंत्री और सुबह से शाम तक टीवी पर चमकते रिपोर्टर 12वीं के सरकारी स्कूल के रिजल्ट को लेकर दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को बधाई देने लगे। मनीष इस बधाई के हकदार भी थे, क्योंकि प्राइवेट स्कूलों का रिजल्ट सरकारी स्कूलों से बहुत कम आया था। प्राइवेट स्कूलों का रिजल्ट कम क्यों आया था या पिछले कुछ सालों से कम ही आ रहा था और इस बार औऱ प्राइवेट स्कूलों का रिजल्ट का प्रतिशत गिर गया।
खैर अब असली मुद्दे पर बात करते हैं और यह भी कि इस खबर को हम इतना देरी से क्यों कर रहे हैं। मनीष के अनुसार (उनके 12वीं के रिजल्ट को लेकर किये गए ट्वीट ओर रिट्वीट को देखें) 12वी का सरकारी स्कूल का रिजल्ट बहुत शानदार था। अरविंद केजरीवाल जो कि दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं, वो भी 12वी के नतीज़ों को लेकर लेकर खूब उत्साहित होकर ट्वीट कर रहे थे। मनीष को बधाई दे रहे थे।
मीडिया मित्रों की तो क्या ही कहें। वो तो 12वीं के रिजल्ट आने के बाद ऐसे गुणगान कर रहे थे जैसे इस रिजल्ट के लिए उन्होंने पढ़ने वालों बच्चों से ज्यादा मेहनत की है। लेकिन इन मीडिया वालों ने आज तक दिल्ली की शिक्षा में क्रांति लाने वाले दिल्ली के शिक्षा मंत्री से ये सवाल नहीं किया कि जब दिल्ली की शिक्षा में इतनी क्रांति आ ही गई है तो आपका बेटा अब भी प्राइवेट स्कूल में क्यों पढ़ रहा है।
और तो और दिल्ली के मुखिया को भी क्या आपके दावे पर भरोसा नहीं है कि वो भी अपने बेटे पुलकित को नोएडा के एक प्रसिद्ध प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे हैं। आज तक किसी मीडिया वाले ने मनीष से ये सवाल क्यों नहीं किया कि जब दिल्ली के सरकारी स्कूल स्वर्ग बन ही गये हैं और वहां बहुत अच्छी पढ़ाई हो रही है तो आपकी पार्टी के कितने विधायकों के बच्चे जो स्कूलों में जाते हैं। उनमें से कितनों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं।
हम इंतज़ार करते रहे, कोई तो मनीष जी और अरविंद जी से ये सवाल पूछेगा। लेकिन गोदी मीडिया ने ये सवाल पूछना जरूरी नहीं समझा। हम इसलिए ये खबर इतना लेट दे रहे हैं, क्योंकि हमें लगता था कि कोई तो कभी तो ये सवाल करेगा, लेकिन जब इस पर सवाल नहीं हुआ तो हमें ये कड़वे सवालों वाली खबर चलानी पड़ी।
एक बात और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दिनों के अगर आप आज के शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री के वीडियो देखेंगे तो हंसने लगेंगे। क्योंकि कोई और नहीं, यही नेता उस समय के एक्टिविस्ट बोलते थे कि मंत्री अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं और गरीब का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ता है। ये दोहरापन ओर अन्याय और नही होने देंगे। आज इतिहास खुद को दोहरा रहा है। उस समय के एक्टिविस्ट मनीष सिसोदिया ओर अरविंद केजरीवाल जैसों के बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं और गरीब का बच्चा आज भी सरकारी स्कूल में ही जा रहा है।

Jun 17, 2017

भाजपा को वध से प्रेम है, फिर वह अस्वच्छता ही क्यों न हो

वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है......... 

कुमार

पिछले साल अक्तूबर में गांधी मार्ग चौराहा, जयपुर पर एक बड़े से बोर्ड पर लिखा था 'आइए अस्वच्छता का वध करें।' इस स्लोगन को पढ़ते हुए तब कई विचार आये थे। 


जैसे -
—क्या यह वधिकों की सरकार है।
—वध से बहे खून से क्या खुशबू फैलेगी।
—तीर-धनुष से अस्वच्छता का वध कैसे होता है।
—अस्वच्छता का मतलब गंदगी में जीने को मजबूर गरीबों से तो नहीं।
—क्या यह हिमालयी मूर्खताओं का समय है।

यूं भी वध शब्द का प्रयोग अस्वच्छता के साथ गलत है। यह खुद एक अस्वच्छ भाषा है। वध की क्रिया को उत्सव की तरह हत्यारे ही देख सकते हैं। अस्वच्छता दूर करना उत्सवता की भावना पैदा करता है, पर वध उसके उलट भावना है।

अब आज की तारीख में 'अस्‍वच्‍छता का वध' के निहितार्थ सामने आने लगे हैं और वो भी राजस्‍थान में ही। पिछले शुक्रवार 9 जून को प्रतापगढ़ की कच्ची बस्ती में महिलाएं शौच करने जा रही थीं। तब नगर परिषद के लोगों ने उनकी तस्‍वीर लेने की कोशिश की। श्रमिक संगठन के एक नेता ने इस तरह तस्‍वीर लेने का विरोध किया। इससे नाराज लोगों ने उन महोदय की जमकर पिटाई की जिससे उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। अब कच्ची बस्तियों के लोग अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए धरने पर हैं।

इसी तरह हरियाणा के एक अधिकारी अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में स्वच्छता अभियान की आड़ में अरे-तरे पर उतारू हैं। लोगों ने जब उनकी पोस्‍ट पर आपत्ति जतायी तो उनका जवाब है - आपत्ति करने वालों ने मेरी भाषा अभी सुनी ही कहां है। मेरी भाषा में दस शब्दों वाले वाक्य में आठ शब्द गाली ही होते हैं। वही मेरी ऑरिजनल भाषा है और मुझे अपनी भाषा से बहुत प्यार है। आप लोगों को जाकर UPSC में शिकायत अवश्य करनी चाहिए, जिन्होंने एक बार नहीं, दो बार नहीं; बल्कि तीन बार मुझे IAS सिलेक्ट किया और वह भी बिना किसी रिज़र्वेशन के।"

आखिर क्‍या कारण हैं कि जि‍स स्‍वच्‍छता अभियान की गांधी ने एक मिसाल खड़ी कर दी थी उसी के नाम पर चला मोदी जी का अभियान मानसिक गंदगी का पर्याय हो जा रहा।

Jun 16, 2017

2 महीने बाद मीडिया तक पहुंची 15 दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें की सूचना

राजपूतों के दबाव में की जा रही हरियाणा के दलितों की बेजा गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे छात्र—नौजवान, 24 अप्रैल की दोपहर में सीएम खट्टर से अंबाला में मिले थे युवक और शाम को देशद्रोह समेत कई अन्य धाराओं में उनपर कर दिया गया था मुकदमा दर्ज।  

कैथल से राजेश कापरो की रिपोर्ट 

जी हां। यह सही समाचार है। ​हरियाणा के करनाल जिले के सिविल लाईन पुलिस थाना में 24 अप्रैल को यह मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मुकदमा के अनुसार इन 15 नामजद दलित छात्रों—नौजवानों ने देशद्रोह का अपराध किया है । इन 15 आरोपियों में मोनिका नाम की एक दलित छात्रा का नाम भी है जो कुरूक्षेत्र युनीवर्सिटी में पढ़ती है।

 मैंने इस मुकदमे की एफआईआर की कॉपी के साथ पूरी जानकारी 5 जून को अपने फेसबुक शेयर कर दी थी। प्रदर्शनकारियों पर क्या मुकदमा दर्ज हुआ है यह पता करने में ही दसियों दिन लग गए। फिर थाने से कॉपी लेने में समय मुझे समय लगा और मैंने 5 जून को एक पोस्ट जरिए खुलासा किया कि 15 दलित छात्रों—नौजवानों पर हरियाणा पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया है। छात्रों—नौजवानों समेत सैकड़ों की संख्या में दलित अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ राज्य के कई जिलों में प्रदर्शन कर रहे थे। 

कुछ लोगों ने खबर को शेयर भी किया पर देश ने आज तब संज्ञान में लिया, जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे प्रयासों के बाद छाप दिया। हिंदी अखबारों, संपादकों और बुद्धिजीवियों ने तो कोई संज्ञान ही नहीं लिया। शायद हिंदी वालों को हिंदी में लिखने वालों की दी सूचनाओं पर भरोसा नहीं होता या फिर वह अंग्रेजी को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। 

खैर, जो भी हो। दिलचस्प यह है कि 24 अप्रैल को दर्ज हुए इस मुकदमें में पुलिस ने ​अबतक एक भी गिरफ्तारी नहीं की है। पुलिस से जब पीड़ितों के परिजनों ने जानकारी चाही तो उनका कहना था कि अभी गिरफ्तार नहीं करेंगे लेकिन जब यह दूसरी बार प्रदर्शन या किसी आंदोलन में शामिल होंगे तब इन्हें भीतर करेंगे। 

पुलिस के बयान से सवाल यह उठता है कि हरियाणा की पुलिस ने छात्रों—नौजवानों पर देशद्रोह जैसा मुकदमा सिर्फ धमकाने और तफरी लेने के लिए दर्ज कर लिया है या ऐसे गंभीर और रेयर मुकदमें दर्ज कर पुलिस कुछ और संदेश देना चाहती है। एक वकील होने के नाते मैं जानता हूं कि देशद्रोह का मुकदमें में गिरफ्तारी और जमानत ज्यादा बेहतर होती है, बजाय कि आप आरोपियों को यूं ही छोड़ दें। इसका एक ही मकसद हो सकता है कि पुलिस ऐसे आरोपियों को 'न जीने देगी और न मरने देगी' वाली हालत में बनाकर रखना चा​हती है। 

और यही वजह है कि देशद्रोह के मुकदमें से खौफ में हैं सभी दलित छात्र—नौजवान, बयान तक देने से डर रहे हैं कि पुलिस कहीं उन्हें गिरफ्तार न कर ले। 

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत 
अंबाला जिला के गांव पतरेहड़ी के दलितों ने विभिन्न दलित संगठनों के नेतृत्व में अप्रैल 19 से 26 तक कर्ण पार्क करनाल में धरना किया था। प्रदर्शनकारी दलितों की मांग थी कि अंबाला पुलिस दलित नौजवानों को हत्या के एक फर्जी मुकदमे में फंसा रही है उस पर रोक लगाई जाए। सीएम मनोहर लाल खट्टर को अपना दर्द बताने दलित अंबाला से यहां आए थे। मुख्यमंत्री से मिल के जाने के बाद ही पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया। जाहिर है पुलिस अमले का यह रवैया बगैर मुख्यमंत्री के इशारे के संभव नहीं रहा होगा। 

हरियाणा के इतिहास में शायद यह पहला मामला है जहां पर इतनी बडी संख्या में दलित समाज के लोगों को नामजद किया गया है। हालांकि इससे पहले भी दलित समाज के अधिकारों की आवाज बुलंद करने वालों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किये गए थे। 

देशद्रोह का यह मुकदमा दलित नेता अशोक कुमार, कृष्ण कुटेल, मलखान नंबरदार, राकेश, रवि कुमार इंद्री, अमर मुनक, अमर सगा, मोनिका, मुलखराज, राजकुमार पतरेहड़ी, धर्मसिहं व रविंद्र कुरूक्षेत्र अनिल, संजू ,नरेश पतरेहड़ी पर दर्ज किया गया है।

जिनपर दर्ज हुए मुकदमें 
बावेला यहाँ से खड़ा हुआ  
अंबाला पुलिस के लापरवाही भरे रवैए के कारण मार्च में दलित समुदाय और राजपूतों के बीच तनाव चल रहा था । राजपूत जाति के कुछ बदमाश बार बार दलित समाज के लोगों पर हमला कर रहे थे । पुलिस ने शिकायत के बावजूद दबंग जाति के बदमाशों पर कारवाई नहीं की । दलितों को दबंगों का मूहतोड़ जवाब देने के लिए मजबूर किया गया और दलित अपनी जानमाल की सुरक्षा करने के लिए एकजुट हुए । इस प्रकार से झगड़े की इस घटना में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए । पुलिस ने उसी समय दलितों पर 323 आईपीसी तथा दबंग जाति के बदमाशों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट सहित 323 आईपीसी आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।

मुश्किल बनी यह घटना
घटना के चार पांच दिन बाद दबंग जाति के एक घायल की मौत घाव में संक्रमण के कारण हो गई । पुलिस ने दलित समाज के नौजवानों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया । छात्र जवानों को जेलों में ठूंस दिया । झगड़े की जड़ गांव के सरपंच जिस पर एससी एसटी में मुकदमा दर्ज है अभी तक नहीं पकड़ा गया है । पुलिस दलित छात्र नौजवानों को केवल इसी आधार पर उठा रही थी कि वह अंबेडकर संगठन के सदस्य है और दलित उत्पीड़न की घटनाओं का विरोध करता है । करनाल के कर्ण पार्क में पतरेहड़ी के दलित मुख्यमंत्री का ध्यान अंबाला पुलिस की इसी मनमर्जी की तरफ दिलाने आए थे।

इन धाराओं के तहत हुआ है मुकदमा 
इस संबंध में एफआईआर संख्या 298 दिनांक 26/04/2017 धारा 124ए/147/149/186/283/332/341/353 आईपीसी पुलिस थाना सिविल लाईन में दर्ज की गई है।  

कौन हैं जिन पर देशद्राह का मुकदमा हुआ है दर्ज 
15 दलित छात्र नौजवानों पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है वे सभी उस प्रतिनिधी मंडल का हिस्सा थे जो 24 अप्रैल  के रोष प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री से मिले थे । यह प्रतिनिधी मंडल मुख्यमंत्री के आश्वासन से सहमत नहीं हुआ और कर्ण पार्क में अपना रोश प्रदर्शन जारी रखने की बात बोलकर वार्ता से उठकर आ गया । 26 अप्रैल को पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों को कर्ण पार्क से जबरन खदेड़ दिया । सारा दिन सैंकड़ो दलितों को पुलिस बसों में भरकर घूमाती रही और बाद में अलग अलग स्थानों पर फेंक दिया । पार्क में पानी भर दिया गया । 26 तारीख को गिरफ्तार किए गए इन लोगों में ये सभी 15 लोग भी थे उनको भी बाकि पब्लिक के साथ छोड़ दिया । हालांकि इन सब के खिलाफ 26 अप्रैल को ही देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा चुका था । यदि उसी समय पुलिस इनको गिरफ्तार कर लेती तो आंदोलन और ज्यादा भड़क उठता, इसलिए पुलिस ने गिरफ्तारी नहीं की । 

दलितों पर बढ़ रहे हैं हमले 
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अत्याचारों के रूप में 2016 में दलितों पर हमलों के 47000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए । इन आंकड़ो के अनुसार रोजाना 2 दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है । एक अन्य अनुमान के अनुसार प्रत्येक 18वें मिनट में दलित के खिलाफ एक अपराध होता है हर सप्ताह 13 दलितों को मौत की नींद सूला दिया जाता है हर सप्ताह 6 दलितों का आपराधिक अपहरण किया जाता है हररोज दलित उत्पीड़न की 27 घटनाएं दर्ज होती है । उतर प्रदेश के सहारनपुर की घटनाओं में भाजपा की योगी सरकार ने जो रवैया अपनाया हुआ है हरियाणा की खट्टर सरकार भी उसी राह पर है । ऐसे में दलित समाज के सामने संघर्ष की राह पर अग्रसर होने के अलावा कोई चारा नहीं है ।

पहले भी हुए दलितों पर देशद्रोह के मुकदमें दर्ज 
भगाना के दलितों पर कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने देशद्रोह बनाया था। उससे पहले 2007 में हरियाणा सरकार ने प्राईवेट युनीवर्सिटी बिल का विरोध करने वाले जागरूक छात्र मोर्चा के छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। इनमें भी ज्यादातर छात्र दलित या पिछड़ी जातियों संबंधित थे। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के ईस्मालईबाद इलाके में भी पुलिस ने आवासीय प्लाटों की मांग करने वाले दलितों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया था। 

Jun 15, 2017

जिम कार्बेट के होटल मजदूर आंदोलन की राह पर

उत्तराखंड। रामनगर जिले के ढिकुली के मनुमहारानी होटल में काम करने वाले श्रमिकों ने होटल प्रबंधक पर अपना दो माह का बकाया वेतन न दिये जाने का आरोप लगाते हुये प्रशासन से वेतन दिलाये जाने की गुहार लगाई है। 


इस मामले में पीड़ितों ने स्थानीय एसडीएम का दरवाजा खटखटाते हुये उन्हें एक ज्ञापन सौंपते हुये कोतवाली व श्रम प्रवर्तन अधिकारी को शिकायत की है। रिजोर्ट में काम कर रहे श्रमिक भाजपा नेता गणेश रावत की अगुवाई में प्रशासनिक भवन पहुंचे जहां श्रमिकों ने जोरदार नारेबाजी करते हुए प्रदर्शन किया। 

इस दौरान उन्होंने एसडीएम परितोष वर्मा को सौंपे गये ज्ञापन में रिसोर्ट प्रबंधक मनोज कुमार शर्मा पर आरोप लगाते हुये कहा कि उनके द्वारा उन्हें दो माह का वेतन नहीं दिया जा रहा है। जब भी वह प्रबंधक अपने वेतन की बात करते हैं, तो रिसोर्ट प्रबंधक उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी देता रहता है। वेतन न मिलने के कारण उनके परिवार का जीवन-यापन मुश्किल भरा हो गया है। 

श्रमिकों का कहना है कि रिसोर्ट स्वामी द्वारा रिसोर्ट जुकासो कम्पनी को लीज पर दिया गया है, जिसकी लीज की अवधि पूरी होने वाली है। ऐसे में उनके सामने वेतन का संकट खड़ा हो गया है। इस मामले में एसडीएम वर्मा ने श्रमिकों को आश्वासन देते हुये कहा कि उनका पूरा वेतन होटल प्रबंधक से दिलाया जायेगा। इसके बाद श्रमिकों ने कोतवाली पुलिस व श्रम प्रवर्तन कार्यालय में भी विधिवत अपनी शिकायत दर्ज कराई। 

इस मामले में भाजपा नेता गणेश रावत का कहना है कि कार्बेट नेशनल पार्क के आस-पास डेढ़ सौ से अधिक रिसोर्ट कार्यरत हैं, लेकिन इन रिसोर्ट में कार्यरत श्रमिकों की कोई भी संगठित यूनियन न होने के चलते इनका लगातार उत्पीड़न किया जा रहा है, जबकि रिसोर्ट स्वामियों ने अपने हितों की रक्षा के लिये अपना स्वयं का संगठन बना रखा है। 

रावत ने श्रम अधिकारी से मांग की है कि क्षेत्र में कार्यरत सभी श्रमिकों की यूनियन बनाकर उनके हितों का संरक्षण किया जाये, अन्यथा श्रम विभाग के खिलाफ भी व्यापक तौर पर आंदोलन छेड़ा जायेगा। 

इस दौरान ज्ञापन देने वालों में वीरेन्द्र रावत, संजय बिष्ट, गणेश रावत, सूरज, छोटेलाल, महेश, मनोज, गुलाब हुसैन, सूरज, किशोर सहित अनेकों लोग मौजूद थे।

अब आप के भरोसे राज्यसभा नहीं जा पाएंगे कुमार विश्वास

कुमार की ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर....

जनज्वार दिल्ली। आम आदमी पार्टी में एक बात कही जाती है कि यहां कोई भी बयान यूं ही नहीं दे देता, जब तक ऊपर से अनुमति या सहमति न हो। कल दिल्ली के पूर्व संयोजक रहे दिलीप पांडेय का कुमार विश्वास पर ट्वीट करके किया गया हमला स्पष्ट करता है कि अब कुमार पर पार्टी को कितना अविश्वास है।


पर दिलीप पांडेय के ट्वीट ने कुमार को बैकफुट पर ला दिया है। कल से कुमार भाजपा के खिलाफ ट्वीट ओर रिट्वीट कर रहे हैं। कुमार के ट्वीटर हैंडल को देखकर समझ आ जायेगा कि दिलीप का तीर निशाने पर लगा है। यह लड़ाई पंजाब के विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के समय से चली आ रही है जो कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट रूप से बाहर आ जाती है। 

अब एक बात तो तय है कि कुमार आम आदमी पार्टी में अकेले पड़ते नज़र आ रहे हैं। इसका जिक्र वो खुद 2 दिन पहले एनडीटीवी 24/7 को दिए अपने इंटरव्यू में भी कर चुके हैं। इस इंटरव्यू में कुमार खुद को अभिमन्यु की उपाधि दे रहे थे, जो महाभारत में घेरकर मार दिया जाता है। इंटरव्यू लेने वाली पत्रकार भी खुद ये बोल रही थी कि आपके खिलाफ पार्टी के ऊपरी स्तर पर साजिश रची जा रही है। कुमार ने खुद कहा कि उन्हें भी इस बात का इल्म है। आखिर क्या वजह है कि पार्टी के बड़े नेता कुमार को किनारे लगाने में लगे हुए हैं।

दरअसल दिल्ली से राज्यसभा के लिए 3 सांसद जाने हैं। पार्टी के एमएलए के हिसाब से तीनों आप के सांसद राज्यसभा जाएंगे। इसमें से एक सीट के लिए खुले तौर पर कुमार अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। और पार्टी तक ये बात पहुंचाते रहे हैं कि उनको राजयसभा के लिए दूसरी पार्टी से भी आॅफर है। कुमार की इसी ठसक को पार्टी और उसके नेता बर्दाश्त नहीं करते। कुमार की इस कमजोरी का भी पार्टी को पता है कि वो भाजपा को लेकर इतने कटु कभी नहीं रहते, जितने कांग्रेस को लेकर। 

पार्टी के नेताओं को भी पता है उन्हें राज्यसभा के लिए कहां से आॅफर है। इसी को ध्यान में रखते हुए कल सोच—समझ कर दिलीप पांडेय ने अपने ट्वीट में कुमार पर हमला करते हुए कहा कि क्या बात है भैया आप कांग्रेस को तो खूब गाली देते हो पर कहते हो वसुंधरा के खिलाफ नही बोलेंगे। ऐसा क्यों?

कुमार ने अपने इंटरव्यू में साफ—साफ बोल दिया था कि मुझे पता है पार्टी में कौन—कौन उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं कुछ तो वो हैं, जो इस घर में रहे हैं (इस घर से मतलब कुमार के घर में) और यहीं रोटी खाई है। कुमार को भी अब ये समझ आ रहा है कि इस लड़ाई में उनकी हार निश्चित है इसलिए वो खुद को अभिमन्यु घोषित कर रहे हैं। 

इस लड़ाई में किसी को कुछ हासिल हो या न हो पर राजनीति के चलते दो दोस्तों की दोस्ती में जरूर दरार आ गई है। कुमार और मनीष सिसोदिया दोनों गाज़ियाबाद ज़िले के पिलखुआ कस्बे रहने वाले बचपन के दोस्त थे। पर अब दोस्ती  में पहले जैसी बात नहीं रह गई है। इसका सबूत रविवार को राजस्थान की पार्टी की वहां के वालंटियर्स की मीटिंग की कुमार और मनीष की फ़ोटो देखकर पता चल जाता है। दोनों एक मंच पर बैठे हैं, पर ऐसा लगता है जैसे दोनों बस एक खानापूर्ति कर रहे हैं। कवि कुमार विश्वास का चेहरा देख साफ पता चल रहा है कि अब उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र मनीष से भी कोई उम्मीद नहीं कि वे पार्टी में उनका सपोर्ट करेंगे। कुमार के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा है।

इस लड़ाई में एक और अहम किरदार है संजय राघव। ये जनाब मनीष सिसोदिया जी के साले साहब हैं। मनीष भले ही खुद कुमार पर कोई कटाक्ष करने से बचते रहे हों, लेकिन उनका साला संजय राघव जो खुद कुमार के घर के पास रहता है वो कोई भी दिन नहीं छोड़ता जब अपने ट्वीट से कुमार पर आक्रमण न करता हो। इसे मनीष की मौन सहमति कहा जाए या कुछ और। लेकिन इतना तो तय है कि मनीष और कुमार की दोस्ती एक किनारे पर आ गई है, जो कभी भी टूट सकती है।

पार्टी नेताओं को ये आपसी लड़ाई आने वाले दिनों में सोशल मीडिया से निकलकर सड़क पर भी आयेगी। बस इंतज़ार कीजिये कुछ दिनों का।

फर्जी मुठभेड़ करने वाले जवानों को डीजीपी ने पार्टी करने के लिए दिए 1 लाख रुपए

देश की सुरक्षा—व्यवस्था के इतिहास में यह पहली बार है कि किसी राज्य के डीजीपी ने एक अादिवासी की हत्या करने पर जवानों को मुर्गा—भात खाने और जश्न मनाने के लिए 1 लाख रुपए का ईनाम दिया हो, वह भी फर्जी मुठभेड़ के बदले। 

गिरिडीह से रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट 

मोतीलाल बास्के : जब वह राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू की विधि व्यवस्था में लगे थे 
झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना अंतर्गत जैन तीर्थावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल पारसनाथ पर्वत की तलहटी में स्थित आदिवासी गांव ढोलकट्टा के समीप 9 जून को माओवादियों व सीआरपीएफ कोबरा के बीच मुठभेड़ होती है। मुठभेड़ की ही शाम में पुलिस दावा करती है कि मुठभेड़ में एक दुर्दांत माओवादी को मार गिराया गया। 

मारे गए आदिवासी के पास से पुलिस एक एसएलआर व गोली समेत कई चीजें दिखाती है। 10 जून को झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय हवाई मार्ग से मधुबन पहुंचते हैं और ‘भारत माता की जय’ ‘सीआरपीएफ की जय’ के नारे के उद्घोष के बीच गिरिडीह एसपी बी वारियार को एक लाख रूपये मुठभेड़ में शामिल जवानों को बड़ी पार्टी देने के लिए देते हैं और अलग से 15 लाख रूपये इनाम देने की घोषणा भी करते हैं। इस खबर को झारखंड के तमाम अखबारों के तमाम एडिसन में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।

मुठभेड़ में मारे गए क्या सच में दुर्दांत माओवादी थे?
इस सवाल का जवाब 11 जून को मिल गया, जब मारे गये आदिवासी की पहचान उजागर हुई तो पता चला कि जिसे मारकर प्रशासन अपना पीठ खुद ही थपथपा रहा है और जिसकी हत्या का जश्न भी अब तक प्रशासन मना चुका है, दरअसल वह एक डोली मजदूर था, जो कि तीर्थयात्रियों को डोली पर बिठाकर अपने कंधे पर उठाकर तीर्थस्थल का भ्रमण कराता था और साथ ही पारसनाथ पर्वत पर स्थित चंद्र मंदिर के नीचे एक छोटा सा होटल भी चलाता था, जिसमें डोली मजदूर चावल-दाल व सत्तू खाया करते थे। 

उस डोली मजदूर का नाम मोतीलाल बास्के था। वह धनबाद जिला के तोपचांची प्रखंड अंतर्गत चिरूवाबेड़ा का रहने वाला था, लेकिन कुछ दिन से अपने ससुराल गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत ढोलकट्टा में ही रहकर प्रखंड से पास किया गया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने आवास को बनवा रहा था। 

कौन है मोतीलाल बास्के 
9 जून को वह ढोलकट्टा से पारसनाथ पर्वत स्थित अपनी दुकान ही जा रहा था, लेकिन हमारे देश के ‘बहादुर’ अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ कोबरा ने उसकी हत्या करके उसे दुर्दांत माओवादी घोषित कर दिया और उसकी हत्या का जश्न भी सरकारी खजाने से मनाया। अब जबकि यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि मृतक मोतीलाल बास्के एक डोली मजदूर था और डोली मजदूरों के एकमात्र संगठन मजदूर संगठन समिति का सदस्य भी था, उसकी सदस्यता संख्या 2065 है। 
मारे जाने के बाद छपी यह खबर 


एक आदिवासी होने के नाते वह आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी का भी सदस्य था और 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित मारांड. बुरु बाहा पोरोब में विधि व्यवस्था का दायित्व भी संभाला था, जिसमें झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के बतौर शामिल हुई थीं। मृतक मोतीलाल बास्के को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनाने के पैसे भी मिले हैं, जिससे वे मकान बना रहे थे।

माओवादी बताकर मोतीलाल बास्के की हत्या पुलिस द्वारा कर दिए जाने का सच पारसनाथ पर्वत के अगल-बगल के गांवों में पहुंचते ही आम लोगों में गुस्सा बढ़ने लगा और 11 जून को मधुबन के हटिया मैदान में मजदूर संगठन समिति ने एक बैठक कर मोतीलाल बास्के का सच सबके सामने उजागर किया। इस बैठक में आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए और 14 जून को वहीं पर महापंचायत करने का निर्णय लिया गया। 

धीरे-धीरे फर्जी मुठभेड़ का सच बाहर आने लगा। 12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन की एक टीम ने अपने गिरिडीह जिला सचिव के नेतृत्व में मृतक के परिजनों से मुलाकात करते हुए इस फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच व दोषी पुलिसकर्मियों को सजा देने की मांग के साथ 15 जून को पूरे जिला में प्रतिवाद दिवस मनाने की घोषणा की, साथ ही मृतक की पत्नी को 5 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की। 

13 जून को झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतागण ढोलकट्टा जाकर मृतक के परिजनों से मुलाकात की व मृतक की पत्नी की बात झारखंड के विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से करायी, जिसमें उन्होंने उनको न्याय दिलाने का वादा किया। 14 जून को मधुबन में आयोजित मजदूर संगठन समिति के महापंचायत में सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों के साथ-साथ झामुमो, झाविमो, भाकपा (माले) लिबरेशन, आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी व स्थानीय तमाम जनप्रतिनिधि- जिला परिषद सदस्य, प्रखंड प्रमुख व कई पंचायत के मुखिया शामिल हुए। 

महापंचायत ने इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ 17 जून को मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में उपायुक्त के समक्ष धरना, 2 जुलाई को पूरे गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस व 3 जुलाई को गिरिडीह बंद की घोषणा की। 15 जून के अखबारों में भाकपा (माओवादी) का बयान भी आया कि मोतीलाल बास्के उनके पार्टी या पीएलजीए का सदस्य नहीं है।

सवाल यही कि आदिवासियों के ही राज्य में आदिवासी हत्या पर जश्न  

फर्जी मुठभेड़ के बाद प्रदर्शन करते पार्टियों के लोग और स्थानीय जनता 
उलगुलान के सृजनकार महान छापामार योद्धा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस 9 जून को ही फर्जी मुठभेड़ में एक आदिवासी मजदूर की हत्या को माओवादी हत्या के रुप में पूरे झारखंड के तमाम अखबारों ने अपने तमाम एडीसन में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी, लेकिन अब जबकि यह साबित हो चुका है कि मृतक मोतीलाल बास्के माओवादी नहीं था, तो सभी अखबारों ने इन तमाम समाचारों को गिरिडीह के पन्नों में ही कैद कर रखा है। 

तमाम अखबारों ने डीजीपी द्वारा एसपी को एक लाख रुपये हत्यारों को पार्टी देने की खबरों को प्रमुखता से छापा था, लेकिन आज कोई अखबार यह सवाल नहीं कर रहा है कि आखिर एक ग्रामीण आदिवासी की हत्या का जश्न क्यों और कब तक?

फर्जी मुठभेड़ की घटना को अब एक सप्ताह होने को हैं, लेकिन देश के मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों व न्यायपसन्द नागरिकों के कानों पर अब तक जूं भी क्यों नहीं रेंग रही? उनके लिए एक आदिवासी की हत्या और हत्यारे पुलिस अधिकारियों के द्वारा हत्या का जश्न मनाना कोई बेचैनी का सवाल क्यों नहीं बनता?