Jun 10, 2017

दिल्ली में डिस्टेंस एजूकेशन के केवल 1 प्रतिशत विद्यार्थी हुए पास

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 99 फीसदी बच्चे फेल हो गए ...

दिल्ली में इस बार पत्राचार से दसवीं की परीक्षा देने वाले 62000 विद्यार्थियों में से 60750 विद्यार्थी फेल हो गए हैं। आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने इस परीक्षा परिणाम को केजरीवाल सरकार की गलत शिक्षा नीति का नतीजा बताया है। इसके खिलाफ रविवार, 11 जून, 2017 को जंतर मंतर पर विद्यार्थी अपने माता—पिता और रिश्तेदारों के साथ धरना प्रदर्शन करेंगे। 

आॅल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन का कहना है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पहले 62000 बच्चों को स्कूल सिस्टम से निकाला और फिर पत्राचार से दसवीं  की परीक्षा दिलाई, जिसके कारण 60750 बच्चे असफल हुए। गलत शिक्षा नीति के चलते इतने सारे विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। इन नीतियों के खिलाफ ही विद्यार्थियों ने धरना प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
  
आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन ने केजरीवाल सरकार से मांग की है कि सभी फेल विद्यार्थियों को री-टेस्ट का मौका दिया जाए। री-टेस्ट में पास होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में ग्यारहवीं में एडमिशन दिया जाए साथ ही री-टेस्ट में फेल होने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में दसवीं कक्षा में एडमिशन दिया जाए।

आल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने सभी असफल विद्यार्थियों और उनके माता—पिता से अपील की है वे ज्यादा से ज्यादा तादाद में आकर इस धरने को सफल बनाएं जिससे केजरीवाल सरकार की आंखें खुलें और वो अपनी गलत शिक्षा नीति की तरफ ध्यान दे।

देखें वीडियो :


Jun 5, 2017

एनडीटीवी इतनी आसानी से नहीं बना है जो आप मिटा देंगे : रवीश कुमार

र​वीश कुमार की मोदी को ललकार, कभी आमने—सामने तो आइए 

सरकार विरोधी माने जाने वाले एनडीटीवी समूह के संपादक प्रणब रॉय के यहां 2010 के एक बैंक फ्रॉड के मामले में हुई छापेमारी के बाद पूरे देश से तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। भाजपा को छोड़ ज्यादातर पार्टियों ने सरकार की इस कार्यवाही की निंदा की है। देश के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सरकार की हां में हां नहीं मिलाने वाली मीडिया के मूंह पर जाबी लगाने की कायराना हरकत बताया है।

गौरतलब है कि तीन दिन पहले भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा एनडीटीवी अंग्रजी के डिबेट में शामिल होने एनडीटीवी के दफ्तर पहुंचे थे। शो में बहस के दौरान संबित ने एंकर निधि राजदान के एक सवाल पर एनडीटीवी को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आपलोगों का एक एजेंडा है, जिसपर आपलोग काम करते हैं। 

संबित के कहे पर एंकर ने ऐतराज किया पर संबित ने अपनी बात जारी रखी और एजेंडा वाली बात पर अड़े रहे। ऐसे में एंकर निधि राजदान ने उन्हें शो से जाने को कहा और संबित को शो से जाना पड़ा। 

माना जा रहा है कि भाजपा सरकार ने अपने प्रवक्ता की इस बेइज्जती का बदला लिया है और एनडीटीवी को सबक सिखाने के लिए छापेमारी करवाई है। भाजपा की इस प्रतिक्रियावादी कार्यवाही पर ज्यादातर पार्टियों ने भाजपा और मोदी सरकार की आलोचना की है और कहा है कि मीडिया की आवाज को इस तरह से दबाया जाना कहीं से भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। 

सरकार की कार्यवाही से आहत एनडीटीवी के सबसे प्रखर एंकर रवीश कुमार ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है कि मोदी सरकार देश में सिर्फ गोदी मीडिया को देखना चाहती है।

औरत के गुप्तांग की शक्ल वाली ऐशट्रे के विज्ञापन का हो रहा विरोध

अमेज़ॉन डॉट कॉम के इस वाहियात विज्ञापन का हो रहा जमकर विरोध, कंपनियां सामान बेचने के नाम पर हमारे नौजवानों बना रही हैं असंवेदनशील, कंपनी की निगाह में औरतों की नहीं कोई इज़्ज़त। सोशल मीडिया पर हो रही मांग, अमेजॉन तत्काल हटाए ये विज्ञापन।

इस मसले को सबसे पहले सोशल मीडिया में लेकर आयीं अनामिका चक्रवर्ती अनु लिखती हैं, 

स्त्री के गुप्तांग में सिगरेट बुझाना यानि पुरूष की सोच कहाँ तक जा चुकी है। अब तक बलात्कारी — डंडा, राॅड, बाँस और न जाने क्या क्या डाल चुके हैं पीड़िताआं के गुप्तांगों में। अब एक दुनिया की सबसे बड़ी आॅनलाइन अमेजॉन लेकर लेकर आयी है ऐश ट्रे स्त्री के गुप्तांग के रूप में।

अनामिका लिखती हैं, 'किसी न किसी बहाने औरत को नंगा कर उसे बेइज्जत करना एक शौक बन गया है। रचनात्मकता का आधुनिकरण इस चरम पर पहुँच गया है कि
अब एक सिगरेट बुझाने वाले ऐश ट्रे के डिजाइन को स्त्री के गुप्तांग के रूप में बनाना पड़ गया।'

और ये महान घिनौना काम किया है सबसे बड़ी Online Company #amazon ने।

लेखिका सवाल करती हैं कि इन्हें पूरी दुनियाँ में, पूरी पृथ्वी में कोई और डिजाइन नहीं मिला एक अदने से ऐश ट्रे को डिजाइन करने के लिये।'

आखिर ये कम्पनी आज किसी बलात्कारी से कम नजर नहीं आ रही है। इस कम्पनी ने इससे पहले भी ऐसी ही शर्मनाक काम किया था जूतों पर तिरंगे का डिजाइन करके ।

अनामिका अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए सवाल करती हैं, 'क्या स्त्री केवल भोग संभोग की वस्तु है?
क्या स्त्री केवल एक सेक्स का प्रतिरूप है ?
कहाँ हैं वे लोग जो स्त्री के मान सम्मान उसकी सुरक्षा पर बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेख, कहानी, उपन्यास और क्रांतिकारी कविताएं लिखते हैं।

वह अपील करते हुए कहती हैं, 'कम्पनी की इस वाहियात हरकत पर आवाज उठाएं और तुरन्त बंद करवाएं इस प्रोडक्ट को। और इतना ही नहीं इस पर एक केस दर्ज होना चाहिये जिससे भविष्य में फिर कभी ये ऐसी बेशर्मी वाली हरकतें न करें ।
ये सिर्फ ऐश ट्रे नहीं अपनी माँ बहन को बाजारू वस्तु बना रहे हैं ऐश ट्रे के रूप में।

इस कम्पनी का पूरी दुनियाँ में बहिष्कार किया जाना चाहिये।

जनरल पहले आप कानून का सम्मान करें

पैंतीस वर्ष के पुलिस जीवन में मेरा सैकड़ों पत्थर फेंकने वाली हिंसक भीड़ से, अनेकों बार हजारों की संख्या में भी वास्ता पड़ा होगा जिसमें शामिल लोग ‘उपद्रवी’, ‘शरारती’, ‘पथभ्रष्ट’, ‘भाड़े के टटटू’ कुछ भी कहे जाने चाहिये थे, पर देश के दुश्मन हरगिज नहीं.....

विकास नारायण राय 

भारत के सेनाध्यक्ष जनरल रावत ने कश्मीर में उपचुनाव के बहिष्कार के समर्थन में पत्थर फेंकने वालों को ‘डर्टी वार’ का हिस्सा और देश का ‘दुश्मन’ करार दिया है. उनसे निपटने में सेना की ‘मानव कवच’ रणनीति के समर्थन में उतरे जनरल ने कहा कि लोग डरेंगे नहीं तो सेना के आदेशों का सम्मान नहीं करेंगे.


पैंतीस वर्ष के पुलिस जीवन में मेरा सैकड़ों पत्थर फेंकने वाली हिंसक भीड़ से, अनेकों बार हजारों की संख्या में भी वास्ता पड़ा होगा जिसमें शामिल लोग ‘उपद्रवी’, ‘शरारती’, ‘पथभ्रष्ट’, ‘भाड़े के टटटू’ कुछ भी कहे जाने चाहिये थे, पर देश के दुश्मन हरगिज नहीं. यह भी मेरा अनुभव रहा है कि उत्तेजित लोग तभी आपकी बात मानेंगे जब आप भी कानून का सम्मान करें. 

9 अप्रैल, श्रीनगर उपचुनाव के दिन, पांच घंटे सेना की जीप के बोनेट पर रस्सी से बंधे-बंधे एक कश्मीरी मुस्लिम युवक को अट्ठाईस किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ा था. जीप उसे इसी रूप में कुल सत्रह गांवों में लेकर गयी और अंत में एक सीआरपीएफ़ कैंप में उसे उसके भाई और सरपंच के हवाले किया गया.

सारा दिन वह इस बात की गारंटी रहा कि उसे कवच बनाकर निकली सैन्य टुकड़ी पर पत्थर न फेंके जायें. 13 अप्रैल को जाकर स्थानीय पुलिस ने मुक़दमा दर्ज किया. 22 मई को सेना ने मेजर को पुरस्कृत किया. अगले दिन मेजर ने प्रेस कांफ्रेंस में ऐसी गढ़ी कहानी सुनायी जिस पर एक भी सवाल लेने की उनकी हिम्मत नहीं हो सकी.

गोगोई के अनुसार उन्हें उपचुनाव के दिन सूचना मिली कि एक मतदान केन्द्र में तैनात लोगों को पत्थरबाजी करती भीड़ ने घेर रखा है. मौके पर पहुंचे उनके जवानों ने भीड़ में से एक प्रमुख पत्थरबाज फारूकडार को काबू कर जीप के बोनेट से बाँध दिया जिससे उनकी दिशा में आने वाला पथराव रुक गया और वे घिरे लोगों को निकालकर ले जा सके. ऐसा उन्होंने स्थानीय लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया, अन्यथा उन्हें गोली चलानी पड़ती. तब से छिड़ी देशव्यापी बहस में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी गोगोई के कदम को साहसी और त्वरित बुद्धि वाला करार दिया है. उनके मुताबिक, हिंसक प्रतिरोध की आशंका में मानव कवच का प्रयोग कोई नयी रणनीति नहीं है.

यह देश उकसाऊ कश्मीरी पत्थरबाजों की आशंका से घिरे मेजर गोगोई के जोशीले रणनीतिक अतिरेक को तो शायद पचा सकता है, लेकिन बचाव में उतरे जनरल रावत के‘दुश्मन’ और ‘डर्टी वार’ से निपटने के शेखचिल्ली दावों को नहीं. इन दावों से रावत ने, जिन्हें दो वरिष्ठों की अनदेखी कर सेनाध्यक्ष बनाया गया है, अपने संघी पैरोकारों को बेशक खुश किया हो, कश्मीर में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तो निराशा ही बढ़ी है. 

रावत ने कहा-
1. भारतीय सेना कश्मीर में डर्टी वार लड़ रही है.
2. वहां दुश्मन के विरुद्ध कल्पनाशील दांव-पेंच की जरूरत है.
3. मेजर गोगोई ने स्थानीय युवक फारूकडार को मानव कवच बनाकर मौके के मुताबिक ठीक किया. अन्यथा उन्हें मतदान केंद्र में फंसे जवानों को बचाने में पत्थरबाजी कर रहे स्थानीय लोगों पर गोली चलानी पड़ती.
4. सेनाध्यक्ष होने के नाते अपने अफसर के पक्ष में खड़ा होना उनका कर्तव्य बनता है.
5. मामले में कोर्ट मार्शल की कार्यवाही का नतीजा आये बिना सेना का गोगोई को पुरस्कृत करना उचित कदम है.
6. नागरिकों को सेना से डरना चाहिए अन्यथा वे सेना के आदेशों का सम्मान नहीं करेंगे.

मेजर के प्रेस कांफ्रेंस के वीडियो में बयान किया गया घटनाक्रम पहली नजर में ही बनावटी बातों का पुलिंदा नजर आता है. पत्थर बरसाती पांच सौ नौजवानों की उग्र भीड़ के बीच से, बिना गोली चलाये, एक व्यक्ति को पकड़कर जीप के बोनेट पर बांधना संभव ही नहीं है. डार ने उस दिन उपचुनाव में वोट भी डाला था, लिहाजा उसके पत्थर मारने वालों में शामिल होने की बात में वैसे भी दम नहीं लगता. न उसे घंटों बोनेट पर बाँध कर गाँव-गाँव घुमाने की जरूरत थी.

उसे गोगोई की टुकड़ी द्वारा रास्ते से उठाकर मानव कवच के रूप में इस्तेमाल करने का विवरण, तब से कई राष्ट्रीय अख़बारों में आ चुका है. यह भी तय है कि अगर जीप से बंधे डार की तस्वीर वाइरल न हुयी होती तो न गोगोई पर सवाल उठते और न रावत का बयान आता.

जायज सवाल है कि क्या कश्मीर अपवाद नहीं है? क्या वहां पाकिस्तान के समर्थन से छाया युद्ध ही नहीं चलाया जा रहा? तो आइये, कानून-व्यवस्था में सेनाको झोंकने की गति को एक अलग प्रसंग से समझते हैं. फरवरी, 2016 में हरियाणा के हिंसक जाट आरक्षण आन्दोलन के बीच सेना की झज्जर शहर के मुख्य बाजार में तैनात टुकड़ी ने गोली चलाकर आठ व्यक्तियों को मार दिया था, जबकि वहां आगजनी और लूट-पाट का दौर तब भी निर्बाध चलता रहा.

दरअसल, प्रदेश में नागरिक समुदाय का कोई भी तबका उस दौरान सेना की भूमिका से संतुष्ट नहीं था. होता भी कैसे, सेना से जो काम लिया जा रहा था, उसके लिए सेना बनी ही नहीं है. उसे झज्जर के बाजार की व्यवस्था का नहीं देश की सीमा की रक्षा का ज्ञान दिया जाता है, उसे नागरिकों के असंतोष से नहीं दुश्मनों के दांव-पेंच से निपटने की सिखलाई दी जाती है.

अन्यथा जनरल रावत से बेहतर कौन जानेगा कि पाकिस्तान का छाया युद्ध वहां की सेना और आइएसआई, भाड़े के आतंकियों और खरीदे हुए अलगाववादियों की मार्फ़त लड़ रहे हैं. कि पाकिस्तान का जिहादी इस्लाम वहां की सत्ता राजनीति को इस छाया युद्ध के लिए उकसाता रहता है. सीमा पर भारतीय सैनिकों का सर काटना ‘डर्टी वार’ का हिस्सा है. अलगाववादियों को आर्थिक और कूटनीतिक मदद देना ‘डर्टी वार’ का हिस्सा है. भाड़े के आत्मघाती तैयार कर भारतीय सैन्य कैम्पों पर हमला कराना ‘डर्टी वार’ है. कारगिल‘डर्टी वार’ था. कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन ‘डर्टी वार’ था. इन सब को रोकने के लिए बेशक कल्पनाशील दांव-पेंच चाहिए.

हमारा राजनीतिक, कूटनीतिक और सामरिक नेतृत्व इन मोर्चों पर वांछित परिणाम नहीं दिखा सका है. उपचुनाव में मतदान का बायकाट और फर्जी मुठभेड़ या सेना और पुलिस की अन्य ज्यादतियों पर बाजार बंद और उस क्रम में पथराव जैसा असंतोष प्रदर्शन देश में कहाँ नहीं होता. कश्मीर में इन सबको ‘डर्टी वार’ का हिस्सा मानने का मतलब है हम पाकिस्तान के हाथ खेल रहे हैं. क्या इस तरह हम हर कश्मीरी मुस्लिम को पाकिस्तान के पाले में खड़ा नहीं कर रहे?

स्पष्ट कर दूँ, मैं भी उन लोगों में से ही हूँ जो मानते हैं कि कश्मीर में लम्बे अरसे से उग्र नागरिक स्थितियों से दो-चार हो रही अपनी सेना से हम भारतीयों को पूरी सहानुभूति रखनी चाहिए. वे इस तरह के काम के लिए बने ही नहीं हैं, यानी अफस्पा या बिना अफस्पा, उनके हिस्से अलोकप्रियता ही आनी है.

मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड में कानून-व्यवस्थाकी कवायद से लम्बे सैन्य साहचर्य का कटु अनुभव हमारे सामने है. इसी कारण इन प्रदेशों में भारतीय सेना को लेकर लोगों में गर्मजोशी का प्रकट अभाव मिलेगा। साथ ही पंजाब का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ सेना का आतंकवाद से निपटने में सीमित एवं केन्द्रित इस्तेमाल सभी के लिए फलदायी रहा। सबक यह कि सेना सरहद के लिए होनी चाहिए, वक्ती जरूरत पड़ने पर अपवादस्वरूप नागरिक प्रशासन की मदद में आये. लेकिन नागरिकों के बीच उसकी अंतहीन उपस्थिति प्रतिकूल ही सिद्ध होगी.

हालाँकि किसी को ऐसा मुगालता भी नहीं होना चाहिए कि कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर स्थानीय पुलिस की भूमिका,प्रायः लोकप्रिय रहती है. दरअसल, नागरिकों के असंतोष से निपटने के क्रम में पुलिस पर पक्षपात, मनमानी, निकम्मापन और सत्ता केन्द्रित होने के आरोप आम लगते रहते हैं, एक हद तक सही भी.

कितनी ही स्वतंत्र एवं सरकारी जांच रपटों में पुलिस की कमियों और मिलीभगत का लेखा-जोखा पाया जा सकता है. लेकिन, निर्णायक तत्व यह है कि एक गयी गुज़री पुलिस भी न कभी नागरिकों को ‘दुश्मन’ करार देने की गलती करेगी, और न डींग मारेगी कि नागरिकों को पुलिस से डरना चाहिए.

कश्मीर में असंभव नागरिक दायित्व निभा रही सैन्य टुकड़ियों से किसी को ईर्ष्या नहीं हो सकती. दिल्ली से संचालित सत्ता केंद्र जब तक अपनी नीतियां नहीं बदलते, सेना को बेहद विषम परिस्थितियों में मनोबल कायम रखना ही है. हालाँकि, मेजर गोगोई के मानव कवच वाले कृत्य पर खेद जारी कर सेना न सिर्फ अपनी गौरवशाली परम्पराओं के साथ खड़ी नजर आती, शायद कश्मीर में विश्वसनीय आंतरिक सुरक्षा माहौल देने का श्रेय भी पा रही होती.

हमारे जनरलों को दोटूक बताना चाहिए कि सेना को दुश्मन से युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है, न कि नागरिकों के बीच कानून-व्यवस्था संभालने की. नागरिक प्रशासन की मदद में ड्यूटी करने वाली सैन्य टुकड़ियों में उग्र भीड़ से निपटने के समय प्रायः अनुभव और सिखलाई की कमी दिखना स्वाभाविक है.

तो भी मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि सेना को अपनी गलती पकड़े जाने पर खेद जताना नहीं सिखाया जाता. सामान्य शिष्टाचार का यह सबक सैन्य अनुशासन का अभिन्न हिस्सा होता है, बेशक सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत इसे अपवाद सिद्ध करने पर उतारू नजर आते हों.

editorjanjwar@gmail.com

Jun 1, 2017

देश की 71 प्रतिशत आबादी मांसाहारी : भारत सरकार

भारत सरकार ने बताए तथ्यगत आंकड़े जानिये आप भी, क्या है सच 

अगर आप सोचते हैं कि भारत में हिंदुओं का बहुतायत शाकाहारी है तो आप गफलत में हैं। और आपका यह सोचना तो बिलकुल ही निराधार है कि हिन्दू धार्मिक कारणों से मांस-मच्छी नहीं खाते और खाने वालों से नफरत करते हैं। 

जी हाँ,  भारत सरकार के रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया के नवीनतम उपलब्ध 'यूनियन गवर्नमेंट सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे 2014 ' के मुताबिक भारत की 71 % जनता मांसाहारी है।

भारत सरकार द्वारा जारी किये गए आंकड़ों से साफ है कि मांसाहार का निषेध देश की जनता की मांग नहीं है बल्कि कुछ पार्टियों का देश को इस आधार पर बांटने का एजेंडा है. वही बस इसको लेकर फर्जी दावेदारियां करती रहती हैं और देश की जनता को बिना मतलब के मसलों पर उलझाए रखती हैं. 

भारत सरकार के उपलब्ध आंकड़ों  के अनुसार  तेलंगाना मांसाहार खाने वालों में 98.8 % के साथ  सबसे ऊपर है। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल 98.5 % के साथ दूसरे आंध्रा प्रदेश 98.25 के साथ तीसरे ओडिशा 97.35 चौथे, केरल 97%  पांचवे स्थान  और बिहार 92 प्रतिशत  के साथ छठवें स्थान पर है। 

राजस्थान ,हरियाणा और गुजरात सिर्फ ती  ऐसे राज्य हैं जहां की आबादी का आधा से अधिक हिस्सा  शाकाहारी है।

तो सवाल है कि क्या हिन्दू संस्कृति और धर्म के शाकाहारी होने को लेकर बनाई गई धारणाएं और मत खोखले और निराधार हैं ? क्या इस मनगढंत आंकड़ों और प्रचार के पीछे सांप्रदायिक संगठनों का कोई निहित स्वार्थ है ?

नीचे दिए गए मानचित्र में राज्यवार आंकड़े  देखें और स्वयं फैसला  करें :

May 31, 2017

पत्नी दलित है इसलिए आत्महत्या कर रहा हूं....

क्या वाकई हमारे समाज में जातीय अहं इतने भीतर तक समाया हुआ है कि इस तरह से सवर्ण होने के सामाजिक दंभ और अहसास में आई गिरावट से कोई ख़ुदकुशी भी कर सकता है.....

तैश पोठवारी

"मैं मनप्रीत सिंह बरार हूं। बिचौलिए गुरतेज सिंह बाबा के माध्यम से मेरी शादी तय हुई थी। मैं एक जट लड़का हूं और मेरे ससुर भी जट हैं, लेकिन उनकी पत्नी रामदासिया हैं... पहले मुझे और मेरे परिवार को बताया गया था कि वे (उनकी पत्नी और सास) भी जट हैं।"

मनप्रीत सिंह  बरार  की फाइल फोटो 
यह सुसाइड नोट है एक जट सिख लड़के का, जो सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर लेता है, क्योंंकि उसकी पत्नी जट नहीं बल्कि दलित है। एक तरफ हमारी युवा पीढ़ी जहां जाति—पाति से उपर उठने की बात करती है, वहीं जाति की जड़ें उसमें कितनी गहरे तक पैठी हुई हैं उसका एक उदाहरण है पंजाब का यह जट सिख नौजवान। 22 वर्षीय मनप्रीत सिंह जिसकी हाल ही में शादी हुई थी, ने मात्र इसलिए जहरीला पदार्थ खा लिया, क्योंकि उसकी पत्नी जिसे उसने जट सिख समझा था वह दलित जाति से ताल्लुक रखती है।

यह घटना पंजाब के लहरिगागा स्थित खाई गांव की है। यह शादी एक बिचौलिये गुरतेज सिंह निवासी भुटाल कलां के माध्यम से ​हुई थी, जिसने 45000 हजार रुपए लेकर यह शादी करवाई थी। 22 वर्षीय मनप्रीत सिंह बरार की शादी 21 मई को संगरूर निवासी रेणु कौर से हुई थी। 

जैसे ही शादी के बाद मनप्रीत ने यह जाना कि उसकी सास रासदासिया है, और चूंकि उसने उस लड़की से शादी की है जो उसकी कोख से पैदा हुई है तो उसने आत्महत्या कर ली। क्योंकि पत्नी का एक रामदासिया के पेट से पैदा होने से उसके जातीय अहं को चोट पहुंची थी। हालांकि यहां भी सवाल उठता है कि जहां हमारा भारतीय समाज पितृसत्तात्मक है, और पिता के वंश से ही बच्चों की पहचान होती है तो रेणु दलित कैसे हो गयी। आखिर उसकी मां का पति जट सिख है। चाहे फिर उसका अतीत जो रहा हो। क्या वाकई हमारे समाज में जातीय अहं इतने भीतर तक समा चुका है कि इस तरह से सवर्ण होने के सामाजिक दंभ और अहसास में आई गिरावट से कोई ख़ुदकुशी भी कर सकता है। 

मृतक के पिता बघेल सिंह बेटे की मौत के बाद कहते हैं कि सारी गलती बिचौलिए की है, जिसने हमारे साथ धोखा किया। बिचौलिए ने यह कहकर और पैसे लेकर शादी करवाई थी कि रेणु कौर जटों की लड़की है, पर गरीब है। शादी के बाद जब मनप्रीत अपनी मां के साथ रेणु के घर फेरा पाने गया तब उसे पता चला कि वास्तव में रेणु की मां रामदासिया है। रेणु की मां अपने पति की मौत के बाद एक जट सिख के साथ अपने घर में रहती है। 

इसी से परेशान और दुखी मनप्रीत ने लहिरागागा वापिस आकर खेतों में जा सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले लिखे पत्र में उसने व्यथित होकर लिखा भी है कि 45000 रुपए लेकर उसकी शादी यह कहकर करवाई थी कि वो जट सिख परिवार से है, जबकि हकीकत में वो रविदासी जाती की है, जिस वजह से वो आत्महत्या कर रहा है। 

घटना के बाद लहिरागागा पुलिस के एसएचओ जंगबीर सिंह ने कहा कि उन्होंने आईपीसी की धारा 306 के तहत बिचौलिए गुरतेज सिंह पर केस दर्ज कर लिया है।  

रिश्तों को गालियों से नहीं नजदीकियों से आंकिए !

अगर भक्तों को यह सुनना अच्छा लगता है कि भाजपा देश की नई कांग्रेस है तो उन्हें यह सुनकर भी आह्लादित होना चाहिए कि मोदी देश के नए नेहरु हैं। फिर कांग्रेस तो नेहरु की संस्कृति​ ही बनाएगी जिसमें प्रियंका चोपड़ा का भी एक रोल होगा...


जनज्वार। प्रधानमंत्री मोदी विदेश यात्रा के दौरान बर्लिन में प्रियंका चोपड़ा से भी मिले। मोदी के समक्ष प्रियंका के बैठने के अंदाज से प्रधानमंत्री के भारतीय समर्थक आहत हैं। वह हताशा में प्रियंका को गालियां बक रहे हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति की याद दिला रहे हैं। 

मोदी भक्त और समर्थक संस्कार, संस्कृति, लाज, लिहाज और बाप—बेटी के रिश्ते जैसी बातें कर अपने पंरपरावादी नेता का बचाव कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि इससे मोदी की छवि को छति पहुंचेगी। बर्लिन में प्रियंका और मोदी के मिलने—मिलाने के प्रकरण में वह लगातार प्रियंका को दोषी मान रहे हैं। 

उनकी बातों और ट्वीटर—फेसबुक पर आ रही टिप्पणियों से लग रहा है मानो प्रियंका ने मोदी जैसे वृहत्तम व्यक्तित्व को अपनी दो टांगों के करीब ला पटका है। भक्तों की यह चिंता इसलिए भी दिख रही है कि प्रियंका से उनका मुख्य ऐतराज प्रियंका की दिखती टांगों और बैठने के आत्मविश्वासी अंदाज पर है। 

पर भक्तों और परंपरावादी कट्टरपंथियों को समझना चाहिए कि मोदी जी खुली टांगों को नैतिकता को मानक मानने की राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के बुद्धिकौशल से उपर उठ चुके हैं, जबकि संघी अभी भी नाभी, जांघ, नितंब, उरोज के उभार, उसके दिखने और न दिखने को नैतिकता की चरम स्थिति मानते हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत कई नेता इस संदर्भ में बयान भी दे चुके हैं।   

इसीलिए वह प्रियंका के लिबास पर अकबक बोलकर जी को शांत कर रहे हैं। पर भक्त इस मामूली बात को नहीं मान रहे कि प्रियंका का यही अंदाज मोदी को आकर्षित करता है जिसकी वजह से वह विदेश यात्रा में भी उनके लिए अलग से समय निकालते हैं। रही बात कपड़े की तो भारतीय महिला फिल्म कलाकारों का यह सामान्य ड्रेस है जो किसी से मिलते-जुलते वक्त पहनती हैं। फिर प्रियंका किसी खाप की गिरफ्त में हैं तो हैं नहीं जो ड्रेस कोड माने।

प्रियंका के प्रति प्रधानमंत्री की आत्मीयता, लगाव और स्नेह एक कलाकार से बढ़कर होगा तभी तो वह मिलें हैं। जैसे प्रियंका प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के इस बार के महत्वपूर्ण और व्यस्ततम कार्यक्रमों का हिस्सा हों, उनके बिना विदेश यात्रा अधूरी रह जाती हो। 

और एक बात आखिर में ! 

मोदी के सामने प्रियंका के बैठने का अंदाज बहुत कुछ कहता है। और इतना स्पष्ट रूप से कहता है कि मोदी प्रियंका को यह अधिकार देते हैं और जिससे वह एक शक्तिशाली महिला के रूप में उनके सामने पेश हो पा रही हैं। नहीं तो उनके कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री भी मोदी के समक्ष हाथ पीछे किए ऐसे खड़े रहते हैं जैसे अर्दली खड़ा होता है। 

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रियंका ने मोदी से मुलाकात की तस्वीर ट्वीटर पर प्रधानमंत्री की इजाजत के बगैर शेयर की होगी?

या अंदाज भारतीय पूंजीपति मुकेश अंबानी वाला रहा होगा कि अंबानी ने अपने नेटवर्क 'जियो' के प्रचार का ब्रांडआइकॉन बनाकर मीडिया में मोदी को पेश कर दिया था जिसपर ऐतराज होने पर पीएमओ ने एक फर्जी सफाई दे दी थी और अंबानी पर एक हवाई जुर्माना लगा दिया था। 

May 29, 2017

तुम इतने कट्टर क्यों हो भक्तो!

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं...

अमेरिका से जनज्वार के लिए विकास नारायण राय 

अमेरिका और भारत दुनिया में लोकतंत्र के मानक कहे जाते हैं। प्रधानमत्रंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के पूर्ववर्तियों, मनमोहन सिंह और बराक ओबामा को सारी दुनिया सार्वजनिक जीवन में शिष्टता का प्रतीक मानती रही है। इस सन्दर्भ में मोदी का पिछले वर्ष का अमेरिकी दौरा याद कीजिये। सैन फ्रांसिस्को में फेसबुक मुख्यालय पर भारतीयों से मुलाकात के दौरान स्वयं होस्ट मार्क जुकरबर्ग को मोदी ने कैमरे की जद से धक्का मारकर किनारे कर दिया था। 

ऐसी ही सड़कछाप उजड्डता ट्रम्प ने भी हालिया पहले विदेशी दौरे में सहयोगी नाटो राष्ट्राध्यक्षों के जमावड़े में दिखायी, जब वे मोंटेनीग्रो के प्रधानमंत्री को धकियाते हुए कैमरे के केंद्र में पहुँच गए। क्या दोनों भक्त समूहों के लिए यह विचलन की घड़ी हो सकती थी? नहीं, जरा भी नहीं। उनके लिए तो यह उनके नायकों की सहज चेष्टा ही रही।

उत्तर पश्चिमी अमेरिका के बारिश भरे प्रान्त ऑरेगोन की सबवे ट्रेन में नस्ली गुरूर में डूबे एक व्हाइट अमेरिकी ने हिजाब पहनी हुयी दो अमेरिकी मुस्लिम औरतों को अनाप-शनाप दुत्कारना शुरू कर दिया। टोकने पर उसने एक के बाद एक तीन व्हाइट सहयात्रियों को चाकू मार दिया, जिनमें दो की मृत्यु हो गयी। 

उत्तर पश्चिमी भारत के पशु बहुल राजस्थान प्रान्त में मुस्लिम गाय व्यापारियों के एक समूह पर स्वयंभू गौ-रक्षक को सरेआम लाठियों से ताबड़तोड़ हमला कर हत्या करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ। अमेरिका का राष्ट्रपति संभावित आतंकवाद रोकने के नाम पर अपने ही देश के मुस्लिम नागरिकों को देश में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देता है। भारत का सेनाध्यक्ष पत्थर फेंकते कश्मीरी मुस्लिम युवकों को देश के ‘दुश्मन’ की संज्ञा से संबोधित करता है। ट्रम्प और मोदी समर्थकों के लिए यह सब राष्ट्रीय शर्म का नहीं, अपने नायकों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर सरीखा है।

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं। इसे विसंगति मत समझिये कि अमेरिकी गृहयुद्ध के नायक और दास प्रथा को समाप्त करने वाले अब्राहम लिंकन नहीं, कॉर्पोरेट एनपीए में अमेरिका को डुबाने वाले रोनाल्ड रीगन हैं ट्रम्प के आदर्श।।

नस्ली गोरों का एजेंडा रहा है काले और लातीनी समुदाय को अमेरिका से खदेड़ना, जो उनके हिसाब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं। उन्हें भावी अप्रवासियों को भी अमेरिका में आने से रोकना है जो उनके ख्याल से उनका रोजगार खा रहे हैं। आखिर ट्रम्प की राजनीति भी इसी तरह अमेरिका को महान बनाने की ही तो है।

भक्तों के लिए उस मोदी में भी कोई विसंगति नहीं है जो गाँधी को तो राष्ट्रपिता कहता है पर गाँधी के घोषित उत्तराधिकारी और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू को कोसने और गाँधी के वैचारिक हत्यारे सावरकर को महिमामंडित करने में पूरी ऊर्जा लगा देता है। सोचिये, स्वतंत्र भारत में सवर्ण सपने क्या रहे हैं? मुसलमानों और ईसाइयों का दमन, पाकिस्तान की पिटाई, दलित शोषण, आरक्षण की समाप्ति, कम्युनिस्ट दमन, मर्द अधीन स्त्री, मनुवाद और परलोकवाद की स्थापना! उसके हिसाब से भारत की सनातनी श्रेष्ठता के लिए आवश्यक तत्व यही हैं। क्या मोदी शासन उसके सपनों को ही हवा नहीं देता! 

समीकरण सीधा है, लोकतंत्र में हर विचारधारा को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चाहिए। नस्ली और सवर्ण श्रेष्ठता के पैरोकारों को भी। अन्यथा,अमेरिका में नस्ली-धार्मिक और भारत में सांप्रदायिक-जातीय घृणा के जब-तब फूटने वाले हालिया उभार में नया कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि आज इन दोनों लोकतांत्रिक देशों के शासन पर जो काबिज हैं, ट्रम्प और मोदी, उन्होंने अपनी विजय यात्रा इसी घृणा की लहर पर सवार होकर तय की है।

यानी स्वाभाविक है, जनसंख्या के एक प्रबल हिस्से का घोषित एजेंडा और शासन में बने रहने का ट्रम्प-मोदी का अघोषित एजेंडा परस्पर गड्मड् होकर दोनों देशों की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय धरोहर को बेशक आशंकित करते रहें, भक्तों को तो आश्वस्त ही रखेंगे। स्पष्टतः न मोदी भक्ति 2014 और न ट्रम्प भक्ति 2016 अचानक या जल्दबाजी में संपन्न हुयी परिघटना हैं|

मोदी और ट्रम्प भक्तों में अद्भुत समानता है। मोदी और ट्रम्प कितना भी फिसलें, उनके भक्तों की कट्टर निष्ठा अडिग रहेगी। बेशक ट्रम्प से चिपके तमाम लैंगिक और नस्ली कलंक उदाहरणों में अब राष्ट्रपति चुनाव अभियान में रूस से मिलीभगत के गंभीर आरोप भी शामिल हो गए हों। बेशक,मोदी के सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट-यारी वाले चेहरे को इतिहास के सबसे बड़े फेकू होने का दर्जा मिल रहा हो। 

ये सब बातें भक्तों के लिए बेमानी हैं। मजबूत तर्क और अकाट्य तथ्य उनकी भक्ति को हिला नहीं सकते। दरअसल, मोदी और ट्रम्प अपने इन कट्टर समर्थकों के क्रमशः सोलह आना खरे राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध हुए हैं। इस हद तक और इतने इंतजार के बाद कि उनके लिए वे एकमात्र विकल्प जैसे हैं।

दोनों के भक्तों के अडिग आचरण को समझने के लिए यहाँ एक और पर्दाफाश जरूरी है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी अभियान में माना जाता था कि ट्रम्प ने बड़े आक्रामक अंदाज में रिपब्लिकन पार्टी का नामांकन हथियाया है। लेकिन अब पार्टी का केंद्र और उसका समर्थक मीडिया,ओबामा केयर समाप्त करने और अमीरों को टैक्स छूट देने में ही नहीं, चिर-दुश्मन रूससे मिलीभगत की छानबीन में भी जिस अंदाज में ट्रम्प के साथ खड़े नजर आते हैं, उनके एक दूसरे का पूरक होने में कोई शक नहीं।  

मोदी ने संघ के आशीर्वाद से भाजपा का नेतृत्व हथियाया था। तब भी,उनके कैंप की ओर से,खरीदी मीडिया के माध्यम से, लगातार‘विकास’ के एजेंडे पर इस तरह जोर दिखाया जाता रहा है मानो संघ की हिंदुत्व ध्रुवीकरण की विभाजक पैंतरेबाजियों से मोदी का लेना-देना न हो। जाहिर है,संघ के दलित और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर ही नहीं, किसान और मजदूर की कीमत पर व्यापारियों और पूंजीशाहों के बेशर्म पोषण पर भी, संघ और मोदी की प्रशासनिक एकता इस छद्म प्रचार को अब और अधिक चलने नहीं दे पा रही।

इस आलोक में ट्रम्प और मोदी की चुनावी सफलतायें उतनी आकस्मिक नहीं रह जाती हैं, जितना उनके विरोधी विश्वास करना चाहेंगे। न ही उनके अंधसमर्थकों को ऐसे बरगलाये लोगों का समूह मानना सही होगा, जिन्हें राष्ट्रीय विरासत, लोकतांत्रिक परम्पराओं और संवैधानिक दबावों के रास्ते पर लाने की बात जब-तब बौद्धिक आकलनों में उठाई जाती है। 

दरअसल,समर्थकों की तिरस्कृत पड़ी आकांक्षाओं को मोदी और ट्रम्प ने राष्ट्रीय राजनीति में जैसे प्रतिष्ठित किया है, वे चिर ऋणी क्यों न रहें? समझे, भला भक्त इतने कट्टर क्यों?