Nov 3, 2016

धज्जियां रोज उड़ती हैं तो एनडीटीवी ही क्यों


सरकार ने कानून-उल्लंघन के लिये दंडित करने का फैसला भी किया तो हिन्दी के एक अपेक्षाकृत बेहतर और संतुलित चैनल को! ऐसी भी क्या 'इमर्जेेन्सी' थी....

उर्मिलेश, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार

'इमर्जेन्सी' की याद दिलाने के लिये 'इमर्जेेन्सी' जैसा कुछ न कुछ किया जाता रहेगा! NDTV-India के प्रसारण पर एक दिन की रोक लगाने का केंद्र सरकार का फैसला कुछ इसी प्रकार का है। 4 जनवरी,2016 को पठानकोट एयर बेस में सुरक्षा बलों के काउंटर-आपरेशन के कवरेज में राष्ट्रीय़ सुरक्षा से कथित समझौता करते प्रसारण के लिये सरकार ने NDTV-India को दंडित करने का फैसला किया है। 

मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक उस दिन सुरक्षा बल आतंकी हमले के खिलाफ आपरेशन चला रहे थे। सरकार को चैनल के 6 मिनट के एक खास प्रसारण पर गहरी आपत्ति है। सवाल है, उस दिन तो सारे चैनलों ने उस तरह का कवेरज किया। एक दर्शक के तौर पर मेरा आकलन है कि NDTV-India का कवेरज अन्य चैनलों जैसा ही था, उसमें कुछ भी अलग नहीं था। ऐसे में सिर्फ एक चैनल को क्यों दंडित किया जा रहा है? 

जहां तक केबल TV नेटवर्क एक्ट-1994 और अन्य सम्बद्ध सरकारी कानूनों के उल्लंघन का सवाल है, हिन्दी-अंगरेजी के कई चैनल उसके प्रावधानों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। कइयों पर अंध-विश्वास बढ़ाते कार्यक्रमों की झड़ी लगी हुई है। विज्ञापन-प्रसारण के मामले में भी रोजाना उल्लंघन होते हैं? क्या यह सब सरकारी कानून का उल्लंघन नहीं है? सरकार को ऐसे उल्लंघनों पर कोई आपत्ति नहीं! 

कैसी विडम्बना है, सरकार ने कानून-उल्लंघन के लिये दंडित करने का फैसला भी किया तो हिन्दी के एक अपेक्षाकृत बेहतर और संतुलित चैनल को! ऐसी भी क्या 'इमर्जेेन्सी' थी? ज्यादा नाराजगी थी तो एक नोटिस देकर चेतावनी दी जा सकती थी। पर यहां तो प्रसारण रोकने का फैसला आ गया। एक पत्रकार और नागरिक के रूप में मैं इसकी निन्दा करता हूं क्योंकि इस फैसले में किसी एक को चुनकर दंडित करने का पूर्वाग्रह दिखता है।

एनडीटीवी पर लगा प्रतिबंध, पहली बार किसी चैनल के खिलाफ हुई ऐसी कार्यवाही


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से गठित कई मंत्रालयों के प्रतिनिधियों ने आज सुझाव दिया है कि एनडीटीवी पर एक दिन के लिए प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। देश के इस मुख्य चैनल पर प्रति​बंध का फैसला मंत्रालय प्रतिनिधियों की ​समिति ने इसलिए लिया है कि चैनल ने पठानकोट हमला मामले में देश विरोधी रिपोर्टिंग की थी। समिति में शामिल मंत्रालय प्रतिनिधियों के मुताबिक चैनल द्वारा की गयी रिपोर्टिंग से देश सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में पड़ी। चैनल 9 नवम्बर को  दिन भर प्रसारित नहीं होगा। 

गौरतलब है कि पत्रकारिता के इतिहास में यह पहली घटना है जब किसी सरकार ने किसी चैनल को प्रतिबंधित किया है. एनडीटीवी अधिकारियों ने इस बारे में कोई टिप्पणी करने से मनाही की है. आउटलुक अंग्रेजी की वेबसाइट के अनुसार एनडीटीवी पर यह  कार्यवाही जनवरी में हुए पठानकोट हमले में मामले में की गयी है. 

रिहाई मंच पदाधिकारी पर हमले की असल वजह बने ये 10 सवाल

फर्जी मुठभेड़ों और गिरफ्तारियों के मामले में पुलिस और प्रशासन की नाक में दम किए रहने वाले रिहाई मंच ने सिमी कार्यकर्ताओं की हत्या को लेकर मध्य प्रदेश पुलिस पर दोटूक सवाल उठाए थे। 31 अक्टूबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मंच ने पांच सवाल उठाए, जिसके बाद से मुठभेड़ की कहानी पहले से अधिक बेपर्द हुई। 

मंच ने भोपाल सेन्ट्रल जेल में कैद अमजद, जाकिर हुसैन सादिक, मोहम्मद सालिक, मुजीब शेख, महबूब गुड्डू, मोहम्मद खालिद अहमद, अकील और माजिद के जेल से फरार होने और पुलिस द्वारा मुठभेड़ के दावे पर कुछ जो अहम सवाल उठाए, वह इस प्रकार से हैं और पुलिस द्वारा उन पर हमले की असल वजह भी यही सवाल हैं। 

1. भोपाल सेन्ट्रल जेल को अंतरराष्ट्रीय मानक आईएसओ-14001-2004 का दर्जा प्राप्त है, जिसमें सेक्यूरिटी भी एक अहम मानक है। ऐसे में वहां से फरार होने की पुलिसिया पटकथा अकल्पनीय है।

2. पुलिस जिन कैदियों को मुठभेड़ में मारने का दावा कर रही है उसमें से तीन कैदियों को वह खंडवा के जेल से फरार होने वाले कैदी बता रही है। इस साबित होता है कि मध्य प्रदेश सरकार आतंक के आरोपियों की झूठी फरारी और फिर गिरफ्तारी या फर्जी मुठभेड़ में मारने की आड़ में दहशत की राजनीति कर रही है।

3. यहां पर अहम सवाल है कि जिन आठ कैदियों के भागने की बात हो रही है वह जेल के ए ब्लाक और बी ब्लाक में बंद थे। मंच को प्राप्त सूचना अनुसार मारे गए जाकिर, अमजद, गुड्डू, अकील खिलजी जहां ए ब्लाक में थे तो वहीं खालिद, मुजीब शेख, माजिद बी ब्लाक में थे। इन ब्लाकों की काफी दूरी है। ऐसे में सवाल है कि अगर किसी एक ब्लाक में कैदियों ने एक बंदी रक्षक की हत्या की तो यह कैसे संभव हुआ कि दूसरे ब्लाक के कैदी भी फरार हो गए।

4. पुलिस चादर को रस्सी बनाकर सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने का दावा कर रही है। जबकि चादर को रस्सी बनाकर ऊपर ज्यादा ऊंचाई तक फेंका जाना संभव ही नहीं है यदि फेंका जाना संभव भी मान लिया जाए तो इसकी संभावना नहीं रहती कि वह फेंकी गई चादर कहीं फंसकर चढंने के लिए सीढ़ी का काम करे।

5. जेल के पहरेदार सिपाही को चम्मच से चाकू बनाकर गला रेतना बताया जा रहा है, जिसके कारण यह संभवना समाप्त हो जाती है कि उनके पास हथगोला और हथियार था जिसका प्रयोग मुठभेड़ में किया गया। दूसरे एक आदमी को मारकर कोई पुलिस चौकी की कस्टडी से नहीं भाग सकता किसी सेन्ट्रल जेल से भागना अकल्पनीय है।

6. एक संभावना और बनती है कि जेल से निकलने बाद उनको किसी ने विस्फोटक तथा हथियार मुहैया कराए हों लेकिन पुलिस की कहानी में ऐसा कोई तथ्य अभी तक सामने नहीं आया है।

7. जेल में लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज के बारे में अब तक कोई बात क्यों सामने नहीं आई।

8. पुलिस के दावे के अनुसार जिन आठों कैदियों की मुठभेड़ में मारने की बात कही जा रही है उसमें से कुछ के मीडिया में आए फोटोग्राफ्स, जिसमें उनके हाथों में घड़ी, पैरों में जूते आदि हैं, से यह भी संभावना है कि कहीं उन्हें किसी दूसरे जेल में शिफ्ट करने के नाम पर तैयार करवाया गया हो और फिर ले जाकर पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ को अंजाम दे दिया हो।

9. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने अपने बयान में यह कहा है कि इस मामले में जनता का सहयोग मिला, लोगों से सूचना मिली और लोकेशन का पता लगा लेकिन मुख्यमंत्री जी को यह बताना चाहिए कि इतनी जल्दी आम लोग को जेल से फरार अभियुक्तों को कैसे पहचान गए।

10. पुलिस के दावे अनुसार फरार आठों अभियुक्तों की मुठभेड़ के दौरान हत्या यह भी सवाल उठाती है कि इतनी पुलिस की ‘बहादुराना’ कार्रवाई पर किसी ने क्या सरेंडर करने का प्रयास नहीं किया होगा। या फिर उन्हें उठाकर वहां ले जाकर आठों को मारकर पुलिस इस मामले कोई सुबूत नहीं छोड़ना चाहती थी।

इस मसले पर रिहाई मंच महासचिव और लखनऊ पुलिस के हमले के शिकार हुए राजीव यादव ने भोपाल जेल इनकाउंटर में मारे गए जाकिर हुसैन के पिता बदरुल हुसैन से इस घटना के संबन्ध में बात की। राजीव के मुताबिक वे इस घटना से काफी स्तब्ध थे और उन्होंने बताया कि उनका एक और बेटा अब्दुल्ला उर्फ अल्ताफ हुसैन भी जेल में बंद है। उसकी सुरक्षा को लेकर वह बेहद चिंतित हैं। 

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि भोपाल में हुई घटना के बाद देश के विभिन्न जेलों में कैद आतंक के आरोपियों के परिजन काफी डरे हुए हैं कि कहीं इंसाफ मिलने से पहले ही उनके बच्चों का कत्ल न कर दिया जाए, जिस तरह से यर्वदा जेल में कतील सिद्दीकी और लखनऊ में खालिद मुजाहिद का पुलिस ने हिरासत में कत्ल कर दिया था। ऐसे में रिहाई मंच ने देश के विभिन्न जेलों में बंद आतंक के आरोपियों की सुरक्षा की गांरटी की मांग की है ताकि टेरर पाॅलिटिक्स का असली चेहरा सामने आ सके न कि बेगुनाहों की लाशें। मंच जल्द मध्य प्रदेश का दौरा करेगा।

एसटीएफ के पूर्व मुखिया ने कहा, थाली—चम्मच से बन सकते धारदार हथियार, लकड़ी की चाबी में भी कुछ नया नहीं

मध्यप्रदेश पुलिस के कई दावों को माना सच तो कुछ पर उठाए सवाल
 कहा, वाहवाही पाने के लिए हुई हत्या 



हरियाणा पुलिस के पूर्व एसटीएफ मुखिया और आईपीएस अधिकारी रहे विकास नारायण राय ने अपने लंबे अनुभव के आधार पर सोशल मीडिया में भोपाल जेल से भागे सिमी आरोपियों और उनकी हुई कथित हत्या को लेकर 8 महत्वपूर्ण प्वाइंट गिनाए हैं। ये प्वाइंट आपको पुलिसिया दावेदारी के सच और झूठ के बीच फर्क करने में मदद देंगे। साथ ही पूर्वग्रह के आधार पर बन रही आपकी समझदारी को भी दुरुस्त करेंगे कि पुलिस सबकुछ झूठ ही नहीं बोलती।  

विकास नारायण राय अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं, भोपाल जेल से फरार हुए आठ सिमी कैदियों की पुलिस मुठभेड़ पर अटकलबाजियां स्वाभाविक हैं| पर मैं अपने अनुभव के आधार पर कहना चाहूँगा कि - 

  • थाली, चम्मच से धारदार हथियार बनाना जेल जीवन में आम है, कोई अजूबा नहीं | लकड़ी की चाभी भी | कम्बलों व चादरों की मदद से दीवार फांदना भी |
  •  जाहिर है कि जेल की सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर लापरवाही रही होगी जिसका लाभ इन कैदियों ने उठाया | जेल रक्षक यादव की हत्या भी इन्होने की होगी अन्यथा वे चाभियाँ हथिया कर गुप-चुप निकल नहीं सकते थे | 
  • यह भी स्पष्ट है कि गाँव वालों ने उन्हें देख लिया होगा और एसटीएफ को इससे उन्हें घेरने में मदद मिली 
  • कैदियों के पास पिस्तौल वगैरह जैसे हथियार नहीं थे | तभी उन्होंने घिरने पर पत्थर का इस्तेमाल किया |
  • एसटीएफ का उन्हें गोलियों के आदान-प्रदान में मार गिराना एक गढ़ी हुयी कहानी है | सही छान-बीन और मेडिकल व फॉरेंसिक सबूतों से सच्चाई जानना मुश्किल नहीं | वे हर तरह से घिर गए थे अन्यथा सभी नहीं मारे जाते, कुछ बच भी निकलते | ऐसे में उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था |
  •  भारत में कानून से भागनेवालों को जान से मारने की व्यवस्था नहीं है | लिहाजा उनकी मौत, प्रतिशोध और वाह-वाही के लिए की गयी हत्या है |
  •  अब तक का सरकारी रवैया लीपा-पोती का है और इससे क़ानून-न्याय व्यवस्था पर प्रश्न-चिन्ह लगना स्वाभाविक है | 
  • इन कैदियों के आपराधिक इतिहास को देखते हुए इन्हें आतंकवादी ही कहा जायेगा, उसी तरह जैसे समझौता, माले गाँव इत्यादि मामलों में ट्रायल भुगत रहे असीमानंद, प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित आतंकवादी कहलाते हैं | इन आठ में से तीन पहले भी एक अन्य जेल से एक और जेल रक्षक की हत्या कर इसी तरीके से फरार हो चुके थे | 

Nov 2, 2016

राजीव यादव पर हमले का वीडियो आया सामने, देखिए पुलिसिया गुंडई का नंगा नाच

आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारियों और मुठभेड़ों को लेकर करीब 5 वर्षों से सक्रिय रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव और शकील कुरैशी इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे और पुलिस लात—घूसे और लाठियां बरसाती रही। 

इस संगठन के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद सोएब ने पिछले वर्षों में दर्जनों ऐसे बेगुनाह युवाओं को जेलों से बाहर निकाला और बाइज्जत बरी कराया है, जिनको पुलिस ने फर्जी तरीके से आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किया था। 

शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर उत्तर प्रदेश पुलिस का बर्बर हमला

राजीव यादव पर पुलिस द्वारा किए जानलेवा हमले में दर्ज हुई एफआईआर

दोपहर 3 बजे लखनउ के हजरतगंज चौराहे पर स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना देने पहुंचे रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव और शकील कुरैशी पर पुलिस द्वारा जो जानलेवा हमला किया गया, उस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है। मुकदमा धारा 323 के तहत दर्ज हुआ है जबकि पुलिस की मार में राजीव यादव बुरी तरह जख्मी हैं, उनका सिर फट गया है और उन्हें ट्रामा सेंटर में भरती कराया गया है।





ये रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स है पार्टनर!

ऐसे तमाम लोग जो हमारे बीच हैं चाहे वह क़र्ज़ से पीड़ित किसान हो या बॉर्डर पर बैठा सैनिक या पुलिस का कोई जवान या आदिवासी या कि कोई मजदूर या कोई स्त्री या कोई भी जिसके साथ अन्याय हो रहा है अगर हम समय से अपनी आवाज़ बुलंद करते तो हम हर साल हज़ारों लोगों को बचा सकते हैं...

अभिषेक प्रकाश

राजा राम मोहन रॉय की एक कविता है जिसमें वह लिखते हैं कि-

'जरा विचार कीजिये
वह दिन कितना भयानक होगा जब आपकी मृत्यु होगी।
दूसरे बोलेंगे और आप चुप होने को अभिशप्त होंगे।'

सोचिए उन्नीसवीं शताब्दी में बैठा एक व्यक्ति अभिव्यक्ति के महत्व की बात कर रहा है और आज हम प्रश्न से ही डरने लगे हैं। जबकि लोकतंत्र सार्वजनिक बहसों और पारस्परिक तर्कों के सहारे ही वयस्क होता है। प्रश्न पूछना हमारे समाज में गुनाह होता जा रहा है। कॉपरनिकस याद हैं न, उस समय राजतंत्र था जब उसने यह बात उठायी थी कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है और इसके कारण उसे धर्मगुरुओं का भारी विरोध झेलना पड़ा थी। लेकिन तर्क करने की यह परम्परा क़ैद नहीं की जा सकी। मानव सभ्यता आज जहाँ तक पहुँची है उसके पीछे ऐसे तर्कशील लोगों द्वारा प्रश्न उठाने की इस निर्भीक परम्परा का महत्वपूर्ण योगदान है।

आज जो भी प्रश्न उठाए जाते है निश्चित ही कोई न कोई व्यक्ति, समुदाय या व्यवस्था उससे आहत होता है। पर क्या हमें चुप रहना चाहिए या प्रश्न का जवाब देना चाहिए। बात लोकतंत्र की हो तो हम यह पाते है कि नागरिक इन प्रश्नों के बहाने राजनीतिक बहसों में शामिल होते हैं और इन बहसों से वह अपनी एक राय बनाते हैं। इस क्रम में उन्हें नई नई सूचनाएं मिलती हैं। जो हमारी प्राथमिकताओं को तय करती हैं। हमारे निर्णय में काफी सहयोगी होती है। बात भारत की हो तो यह वाद-विवाद की परम्परा काफ़ी प्राचीन रही है।

नेल्सन मंडेला ने अपनी आत्मकथा  'लॉन्ग वॉक टू फ्रीडम' लिखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह शुरुआत मेरे घर से शुरू हुई। स्थानीय मीटिंग में मैं जाता था वहां चाहे कोई किसी भी तरह का काम करने वाला हो या किसी भी वर्ग का हो उसको अपनी बात रखने की स्वतंत्रता थी।स्वशासन की नींव में महत्वपूर्ण है कि सभी लोग अपने मतों को रख सके और नागरिक के रूप में उनकी वैल्यू समान हो। इसको हमने देखा कि जब वह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने श्वेत-अश्वेत दोनों को अपने साथ रखा। उनके प्रश्नों को उनकी चिंताओं को समझा और लोकतंत्र में उनकी सहभागिता को सुनिश्चित किया। वहीं हम आज देखते हैं कि बहुत सारे देशों ने अपने डेमोक्रेसी में सहभागिता को तवज़्ज़ो नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप उस देश को गृहयुद्ध से लेकर विभाजन तक का चक्र झेलना पड़ा।


आज हमारे देश में जो प्रश्न उठ रहें है उसको लेकर कुछ लोग शंका के शिकार हैं। वह प्रश्नों को सरकार के पक्ष-विपक्ष के रूप में देखने लगे हैं। जबकि मेरा मानना है कि हमें प्रश्नों के पीछे के वाज़िब तर्क को ढूढ़ना चाहिए, न कि प्रश्नों को वर्ग,जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता की राजनीतिक नाकाबंदी के रूप में। कुछ उदाहरण लीजिए जैसे पिछले दिनों हमारे प्रधानमंत्री ने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठायाए लेकिन शरीयत के नाम पर मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग उसका विरोध करते नज़र आया। तब इस मुद्दे पर उठे बहसों ने, याद कीजिए,किस तरह तमाम सूचनाओं ने हमारे ज्ञान को बढ़ाया और हमारी कई भ्रांतियों को दूर किया। हमें यह भी मालूम चला कि यह कई देशों में वैध नहीं है।

हिना सिद्धू ने ईरान में चल रहे शूटिंग प्रतियोगिता में हिज़ाब पहनने से मना किया और इस मुद्दे ने हमारा ध्यान खींचा। इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपगैंडा रचने के लिए किया जा रहा है। हमने देखा कि ईरान में भी ऐसे सुधारवादी लोगों की कमी नहीं है जो अपने समाज की अज्ञानता दूर करने का लगातार संघर्ष कर रहे हैं।


पिछले दिनों हजारीबाग में कुछ किसान मारे गए, छत्तीसगढ़ में भी कुछ लोग (कुछ के लिए आदिवासी तो कुछ लोगों के लिए नक्सली) मारे गए। दोनों जगहों पर पुलिस व राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाया गया। इस पर भी काफी ऐतराज किया गया। हालांकि एक अन्य उदाहरण में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में यह बयान दिया कि आदिवासियों के गांव को जलाने में पुलिस का हाथ था। नया बवाल सर्जिकल स्ट्राइक और मध्य प्रदेश में कैदियों के एनकाउंटर पर उठा।

इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में हम जब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों की पड़ताल करें तो हमें उस शंकालु वर्ग जो प्रश्नों को सरकार या व्यवस्था की आलोचना के रूप में देखते हैं या जो प्रश्नों को सपाट रूप में देखते हैं कि ओर से कुछ ऐसे प्रश्न सुनने को मिलते हैं-

-क्या सेना व पुलिस के लोगों का मानवाधिकार नहीं होता?

-क्या केवल आतंकवादियों व नक्सलियों के लिए ही मानवाधिकार हैं?

-आतंकवादियों को बैठा कर खिलाने की जरुरत क्या है, उन्हें मार देने में क्या बुराई है?

-अगर आपको राष्ट्र की चिंता है तो आपको इन लोगों के मरने पर इतना दुःख क्यों होता है?

ऐसे तमाम प्रश्न आज हमारे सामने तैर रहे हैं। आज प्रश्न न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को प्रमाणित करती है। हां, यह जरूर है कि ये प्रश्न भी एक प्रतिक्रिया की पैदाइश है जिसकी जड़ों में तुष्टिकरण,छद्म पंथनिरपेक्षता व तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों का खोखलापन है। लेकिन क्या यह देश, यहाँ के लोग वाम-दक्षिणपंथी विचारधारा के गुलाम हैं। आज इन राजनीतिक दंगल के बीच हम कुछ संकल्पनाओं को छोड़ते जा रहे हैं, जो इस इंडियन रिपब्लिक के लिए प्राणवायु की तरह है। जैसे कि—

-सर्वोच्च क्या है 'संविधान' कि सत्ता में पदासीन लोग?

-क्या हम क़ानून के प्रति प्रतिबद्ध हैं और क्या विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया हमारे कार्य व्यवहार और समाज को गतिमान करनी चाहिए या कि धर्म, जाति ही निर्णायक होना चाहिए?

-क्या इक्कीसवीं सदी का भारत वैज्ञानिकता की नींव पर नहीं टिका होना चाहिए?

-न्यायपालिका और सेना को क्या पवित्रता के चश्मे से ही देखना चाहिए?

-लोकतंत्र के लिए व्यक्तिवादी राजनीति क्या भयावह नहीं हैं?

इन प्रश्नों को हमें विश्लेषण करना होगा यदि हम चाहते हैं कि भारत एक महान राष्ट्र के रूप में उभरे तो हमें इन संदेह के बादलों को घनीभूत नहीं करना चाहिए। उसके समाधान की ओर बढ़ना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि इन प्रश्नों से उन घटनाओं पर क्या असर पड़ा। उदाहरण के लिए आप कैदियों के एनकाउंटर को ही लीजिए अगर इस पर प्रश्न नहीं उठाए जाते तो हमको अपनी कमियां दिखाई ही न देतीं। 

जेल का सीसीटीवी कैमरा ख़राब था और उतने कैदियों की निगरानी में केवल एक सिपाही था। और कि हमारे जेल से निकलने के लिए एक दातून और चादर की जरुरत पड़ती है!और भी बहुत कुछ जिसकी जानकारी आपको मिल चुकी होगी। आप इससे पहले भी देख चुके होंगे की लोग बीसियों साल बाद जेल से बेगुनाह साबित होकर निकलते हैं जब उनकी ज़िन्दगी पूरी तरह तबाह हो चुकी होती है। क्या इन प्रश्नों से हमें यह नहीं मालूम होता कि हमारी क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम उतनी प्रभावकारी नहीं है जितनी होनी चाहिए। क्या हमारी इन्वेस्टीगेशन सिस्टम इतना सक्षम है जो मामलों का समय से निस्तारण कर सके। व्यवस्था के हर पाये में आपको दक्षता, कार्यकुशलता, पारदर्शिता का अभाव मिलेगा, नौकरशाही में कई लूपहोल आपको दिखेगा।

अंत में एक बात और जिस सिपाही की जेल में हत्या हुई, क्या वह बच नहीं सकता था! शायद बच सकता था या बचाया जा सकता था अगर ऐसे प्रश्न पहले किए जाते! ऐसे तमाम लोग जो हमारे बीच हैं चाहे वह क़र्ज़ से पीड़ित किसान हो या बॉर्डर पर बैठा सैनिक या पुलिस का कोई जवान या आदिवासी या कि कोई मजदूर या कोई स्त्री या कोई भी जिसके साथ अन्याय हो रहा है अगर हम समय से अपनी आवाज़ बुलंद करते तो हम हर साल हज़ारों लोगों को बचा सकते हैं।

आज वह सिपाही भी बच सकता था अगर पुलिस रिफार्म होता, वो तमाम लोग जो फ़र्ज़ी मामलों में जेलों में क़ैद हैं अगर न्याय प्रणाली में सुधार हुआ होता तो निर्दोष लोग बाहर होते और दोषी को सजा हो सकती थी। पर ऐसा नहीं है। क्योंकि हम आवाज़ उठाना नहीं चाहते। और कुछ ताकतें है जो यह नहीं चाहती की आपके लब आज़ाद हों। हम अपनी प्राचीन भारतीय परम्परा जो वाद- विवाद से समृद्ध है, उसको भूलते जा रहे हैं। ऐसे में मुझे शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहते हैं कि, ''अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसके यादाश्त को मिटा देना होगा, उसके भूत को नष्ट कर देना होगा, उसकी कहानियों को समाप्त कर देना होगा।''

तो हमें इस परम्परा को बचाना ही होगा क्योंकि पार्टनर यही पॉलिटिक्स है! रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स।

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 आप भी इस आरती को सुनिये, सुनाइए और आनंद ​लीजिए