Nov 2, 2016

राजीव यादव पर हमले का वीडियो आया सामने, देखिए पुलिसिया गुंडई का नंगा नाच

आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारियों और मुठभेड़ों को लेकर करीब 5 वर्षों से सक्रिय रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव और शकील कुरैशी इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे और पुलिस लात—घूसे और लाठियां बरसाती रही। 

इस संगठन के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद सोएब ने पिछले वर्षों में दर्जनों ऐसे बेगुनाह युवाओं को जेलों से बाहर निकाला और बाइज्जत बरी कराया है, जिनको पुलिस ने फर्जी तरीके से आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किया था। 

शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर उत्तर प्रदेश पुलिस का बर्बर हमला

राजीव यादव पर पुलिस द्वारा किए जानलेवा हमले में दर्ज हुई एफआईआर

दोपहर 3 बजे लखनउ के हजरतगंज चौराहे पर स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना देने पहुंचे रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव और शकील कुरैशी पर पुलिस द्वारा जो जानलेवा हमला किया गया, उस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है। मुकदमा धारा 323 के तहत दर्ज हुआ है जबकि पुलिस की मार में राजीव यादव बुरी तरह जख्मी हैं, उनका सिर फट गया है और उन्हें ट्रामा सेंटर में भरती कराया गया है।





ये रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स है पार्टनर!

ऐसे तमाम लोग जो हमारे बीच हैं चाहे वह क़र्ज़ से पीड़ित किसान हो या बॉर्डर पर बैठा सैनिक या पुलिस का कोई जवान या आदिवासी या कि कोई मजदूर या कोई स्त्री या कोई भी जिसके साथ अन्याय हो रहा है अगर हम समय से अपनी आवाज़ बुलंद करते तो हम हर साल हज़ारों लोगों को बचा सकते हैं...

अभिषेक प्रकाश

राजा राम मोहन रॉय की एक कविता है जिसमें वह लिखते हैं कि-

'जरा विचार कीजिये
वह दिन कितना भयानक होगा जब आपकी मृत्यु होगी।
दूसरे बोलेंगे और आप चुप होने को अभिशप्त होंगे।'

सोचिए उन्नीसवीं शताब्दी में बैठा एक व्यक्ति अभिव्यक्ति के महत्व की बात कर रहा है और आज हम प्रश्न से ही डरने लगे हैं। जबकि लोकतंत्र सार्वजनिक बहसों और पारस्परिक तर्कों के सहारे ही वयस्क होता है। प्रश्न पूछना हमारे समाज में गुनाह होता जा रहा है। कॉपरनिकस याद हैं न, उस समय राजतंत्र था जब उसने यह बात उठायी थी कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है और इसके कारण उसे धर्मगुरुओं का भारी विरोध झेलना पड़ा थी। लेकिन तर्क करने की यह परम्परा क़ैद नहीं की जा सकी। मानव सभ्यता आज जहाँ तक पहुँची है उसके पीछे ऐसे तर्कशील लोगों द्वारा प्रश्न उठाने की इस निर्भीक परम्परा का महत्वपूर्ण योगदान है।

आज जो भी प्रश्न उठाए जाते है निश्चित ही कोई न कोई व्यक्ति, समुदाय या व्यवस्था उससे आहत होता है। पर क्या हमें चुप रहना चाहिए या प्रश्न का जवाब देना चाहिए। बात लोकतंत्र की हो तो हम यह पाते है कि नागरिक इन प्रश्नों के बहाने राजनीतिक बहसों में शामिल होते हैं और इन बहसों से वह अपनी एक राय बनाते हैं। इस क्रम में उन्हें नई नई सूचनाएं मिलती हैं। जो हमारी प्राथमिकताओं को तय करती हैं। हमारे निर्णय में काफी सहयोगी होती है। बात भारत की हो तो यह वाद-विवाद की परम्परा काफ़ी प्राचीन रही है।

नेल्सन मंडेला ने अपनी आत्मकथा  'लॉन्ग वॉक टू फ्रीडम' लिखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह शुरुआत मेरे घर से शुरू हुई। स्थानीय मीटिंग में मैं जाता था वहां चाहे कोई किसी भी तरह का काम करने वाला हो या किसी भी वर्ग का हो उसको अपनी बात रखने की स्वतंत्रता थी।स्वशासन की नींव में महत्वपूर्ण है कि सभी लोग अपने मतों को रख सके और नागरिक के रूप में उनकी वैल्यू समान हो। इसको हमने देखा कि जब वह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने श्वेत-अश्वेत दोनों को अपने साथ रखा। उनके प्रश्नों को उनकी चिंताओं को समझा और लोकतंत्र में उनकी सहभागिता को सुनिश्चित किया। वहीं हम आज देखते हैं कि बहुत सारे देशों ने अपने डेमोक्रेसी में सहभागिता को तवज़्ज़ो नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप उस देश को गृहयुद्ध से लेकर विभाजन तक का चक्र झेलना पड़ा।


आज हमारे देश में जो प्रश्न उठ रहें है उसको लेकर कुछ लोग शंका के शिकार हैं। वह प्रश्नों को सरकार के पक्ष-विपक्ष के रूप में देखने लगे हैं। जबकि मेरा मानना है कि हमें प्रश्नों के पीछे के वाज़िब तर्क को ढूढ़ना चाहिए, न कि प्रश्नों को वर्ग,जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता की राजनीतिक नाकाबंदी के रूप में। कुछ उदाहरण लीजिए जैसे पिछले दिनों हमारे प्रधानमंत्री ने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठायाए लेकिन शरीयत के नाम पर मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग उसका विरोध करते नज़र आया। तब इस मुद्दे पर उठे बहसों ने, याद कीजिए,किस तरह तमाम सूचनाओं ने हमारे ज्ञान को बढ़ाया और हमारी कई भ्रांतियों को दूर किया। हमें यह भी मालूम चला कि यह कई देशों में वैध नहीं है।

हिना सिद्धू ने ईरान में चल रहे शूटिंग प्रतियोगिता में हिज़ाब पहनने से मना किया और इस मुद्दे ने हमारा ध्यान खींचा। इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपगैंडा रचने के लिए किया जा रहा है। हमने देखा कि ईरान में भी ऐसे सुधारवादी लोगों की कमी नहीं है जो अपने समाज की अज्ञानता दूर करने का लगातार संघर्ष कर रहे हैं।


पिछले दिनों हजारीबाग में कुछ किसान मारे गए, छत्तीसगढ़ में भी कुछ लोग (कुछ के लिए आदिवासी तो कुछ लोगों के लिए नक्सली) मारे गए। दोनों जगहों पर पुलिस व राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाया गया। इस पर भी काफी ऐतराज किया गया। हालांकि एक अन्य उदाहरण में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में यह बयान दिया कि आदिवासियों के गांव को जलाने में पुलिस का हाथ था। नया बवाल सर्जिकल स्ट्राइक और मध्य प्रदेश में कैदियों के एनकाउंटर पर उठा।

इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में हम जब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों की पड़ताल करें तो हमें उस शंकालु वर्ग जो प्रश्नों को सरकार या व्यवस्था की आलोचना के रूप में देखते हैं या जो प्रश्नों को सपाट रूप में देखते हैं कि ओर से कुछ ऐसे प्रश्न सुनने को मिलते हैं-

-क्या सेना व पुलिस के लोगों का मानवाधिकार नहीं होता?

-क्या केवल आतंकवादियों व नक्सलियों के लिए ही मानवाधिकार हैं?

-आतंकवादियों को बैठा कर खिलाने की जरुरत क्या है, उन्हें मार देने में क्या बुराई है?

-अगर आपको राष्ट्र की चिंता है तो आपको इन लोगों के मरने पर इतना दुःख क्यों होता है?

ऐसे तमाम प्रश्न आज हमारे सामने तैर रहे हैं। आज प्रश्न न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को प्रमाणित करती है। हां, यह जरूर है कि ये प्रश्न भी एक प्रतिक्रिया की पैदाइश है जिसकी जड़ों में तुष्टिकरण,छद्म पंथनिरपेक्षता व तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों का खोखलापन है। लेकिन क्या यह देश, यहाँ के लोग वाम-दक्षिणपंथी विचारधारा के गुलाम हैं। आज इन राजनीतिक दंगल के बीच हम कुछ संकल्पनाओं को छोड़ते जा रहे हैं, जो इस इंडियन रिपब्लिक के लिए प्राणवायु की तरह है। जैसे कि—

-सर्वोच्च क्या है 'संविधान' कि सत्ता में पदासीन लोग?

-क्या हम क़ानून के प्रति प्रतिबद्ध हैं और क्या विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया हमारे कार्य व्यवहार और समाज को गतिमान करनी चाहिए या कि धर्म, जाति ही निर्णायक होना चाहिए?

-क्या इक्कीसवीं सदी का भारत वैज्ञानिकता की नींव पर नहीं टिका होना चाहिए?

-न्यायपालिका और सेना को क्या पवित्रता के चश्मे से ही देखना चाहिए?

-लोकतंत्र के लिए व्यक्तिवादी राजनीति क्या भयावह नहीं हैं?

इन प्रश्नों को हमें विश्लेषण करना होगा यदि हम चाहते हैं कि भारत एक महान राष्ट्र के रूप में उभरे तो हमें इन संदेह के बादलों को घनीभूत नहीं करना चाहिए। उसके समाधान की ओर बढ़ना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि इन प्रश्नों से उन घटनाओं पर क्या असर पड़ा। उदाहरण के लिए आप कैदियों के एनकाउंटर को ही लीजिए अगर इस पर प्रश्न नहीं उठाए जाते तो हमको अपनी कमियां दिखाई ही न देतीं। 

जेल का सीसीटीवी कैमरा ख़राब था और उतने कैदियों की निगरानी में केवल एक सिपाही था। और कि हमारे जेल से निकलने के लिए एक दातून और चादर की जरुरत पड़ती है!और भी बहुत कुछ जिसकी जानकारी आपको मिल चुकी होगी। आप इससे पहले भी देख चुके होंगे की लोग बीसियों साल बाद जेल से बेगुनाह साबित होकर निकलते हैं जब उनकी ज़िन्दगी पूरी तरह तबाह हो चुकी होती है। क्या इन प्रश्नों से हमें यह नहीं मालूम होता कि हमारी क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम उतनी प्रभावकारी नहीं है जितनी होनी चाहिए। क्या हमारी इन्वेस्टीगेशन सिस्टम इतना सक्षम है जो मामलों का समय से निस्तारण कर सके। व्यवस्था के हर पाये में आपको दक्षता, कार्यकुशलता, पारदर्शिता का अभाव मिलेगा, नौकरशाही में कई लूपहोल आपको दिखेगा।

अंत में एक बात और जिस सिपाही की जेल में हत्या हुई, क्या वह बच नहीं सकता था! शायद बच सकता था या बचाया जा सकता था अगर ऐसे प्रश्न पहले किए जाते! ऐसे तमाम लोग जो हमारे बीच हैं चाहे वह क़र्ज़ से पीड़ित किसान हो या बॉर्डर पर बैठा सैनिक या पुलिस का कोई जवान या आदिवासी या कि कोई मजदूर या कोई स्त्री या कोई भी जिसके साथ अन्याय हो रहा है अगर हम समय से अपनी आवाज़ बुलंद करते तो हम हर साल हज़ारों लोगों को बचा सकते हैं।

आज वह सिपाही भी बच सकता था अगर पुलिस रिफार्म होता, वो तमाम लोग जो फ़र्ज़ी मामलों में जेलों में क़ैद हैं अगर न्याय प्रणाली में सुधार हुआ होता तो निर्दोष लोग बाहर होते और दोषी को सजा हो सकती थी। पर ऐसा नहीं है। क्योंकि हम आवाज़ उठाना नहीं चाहते। और कुछ ताकतें है जो यह नहीं चाहती की आपके लब आज़ाद हों। हम अपनी प्राचीन भारतीय परम्परा जो वाद- विवाद से समृद्ध है, उसको भूलते जा रहे हैं। ऐसे में मुझे शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहते हैं कि, ''अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसके यादाश्त को मिटा देना होगा, उसके भूत को नष्ट कर देना होगा, उसकी कहानियों को समाप्त कर देना होगा।''

तो हमें इस परम्परा को बचाना ही होगा क्योंकि पार्टनर यही पॉलिटिक्स है! रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स।

भगवान की इस आरती से खुश हैं भक्त, 23 लाख मिले हिट्स और शेयर हुआ 71 हजार से अधिक

 आप भी इस आरती को सुनिये, सुनाइए और आनंद ​लीजिए

 

Oct 28, 2016

'कलम कसाई' को अब बर्दाश्त नहीं करेंगे दलित

राजस्थान हाईकोर्ट में लगी मनु की मूर्ति के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन का ऐलान

25 दिसम्बर को गांव—गांव जलाई जायेगी मनुस्मृति और 3 जनवरी को जयपुर में होगा मनु मूर्ति हटाने का आन्दोलन

दलित अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने प्रेस विज्ञप्ती में कहा है कि जिस मनु ने असमानता की क्रूर व्यवस्था को संहिताबद्ध किया, जिसने शूद्रों और महिलाओं को सारे मानवीय अधिकारों से वंचित करने का दुष्कर्म करते हुये एक स्मृति रची,जिसके प्रभाव से करोडों लोगों की जिन्दगी नरक में तब्दील हो गई, यह महाभियान उसके खिलाफ है।

मनुस्मृति के र​​चयिता मनु ने वर्ण और जाति नामक सर्वथा अवैज्ञानिक, अतार्किक और वाहियात व्यवस्था को अमलीजामा पहनाया. उन्होंने सामाजिक व्यवस्था एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था दी जिसने किसी को कलम पकड़ाई तो किसी को झाड़ू थामने को मजबूर कर दिया.

ऐसे कलम कसाई द्वारा लिखी गई मनुस्मृति को आग के हवाले करने में कैसी झिझक ? कैसा डर ? हां, मैं संविधान का समर्थक हूं , इसलिये मनुस्मृति का विरोधी हूं. इस काली किताब को मैं राख में बदल देना चाहता हूं.

मैं इस शैतानी किताब को सरेआम जलाना चाहता हूं ,ठीक उसी तरह, जैसे बाबा भीम ने उसे अग्नि के हवाले किया था.

मेरा तमाम मानवता पसंद नागरिकों से भी अनुरोध है कि वे मनु, मनुवृति और मनुस्मृति सबके खिलाफ अपनी पूरी ताकत से उठ खड़े हो.राजस्थान के जयपुर उच्च न्यायालय में मनु की मूर्ति शान से खड़ी है,जबकि संविधाननिर्माता को हाई कोर्ट के बाहर एक कोने में धकेल दिया गया है.

पूरे देश में ऐसा एकमात्र उदाहरण है ,जहां न्याय के मंदिर में ही अन्याय के देवता की प्रतिमा प्रस्थापित है. यह मूर्ति सिर्फ मूर्ति नहीं है ,यह अन्याय ,अत्याचार और भेदभाव के प्रतीक को स्वीकारने जैसा है. यह राष्ट्रीय शर्म की बात है.

26 अक्टूबर 2016 को गुजरात उना दलित अत्याचार लड़त समिति के संयोजक जिग्नेश मेवानी की मौजूदगी में जयपुर में जुटे मानवतावादी लोगों ने एक आर—पार की लड़ाई का ऐलान किया है कि या तो मनुवाद रहेगा या मानवतावाद.हम मनु की मूर्ति को हटाने का प्रचण्ड आन्दोलन करेंगे. यह आन्दोलन जयपुर में केन्द्रित होगा, लेकिन यह एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन का आगाज है.

आगामी 25 दिसम्बर 2016 मनुस्मृति दहन दिवस से राजस्थान के विभिन्न हिस्सों से मनुवाद विरोधी यात्राएं प्रारम्भ होकर  3 जनवरी 2017 सावित्री बाई फुले जयंती के मौके पर जयपुर पहुंचेगी, जहां पर मनु मूर्ति के विरोध में महासम्मेलन और आक्रोश रैली आयोजित होगी.

मैंने पापा को ऐसे रोते कभी नहीं देखा था, वो भयावह मंजर आज भी मैं भूल नहीं पाती

 एक गांव का दफन हो जाना

रिम्मी 
 
कल 17 साल बाद सेनारी हत्याकांड का फैसला आया. 38 आरोपियों में से 15 को अदालत ने दोषी पाया और 23 के रिहा होने का फैसला दिया. आप में से अधिकतम लोगों को पता भी नहीं होगा ये कौन सा हत्याकांड था, कब हुआ था, क्यों हुआ था और मरने वाले कौन थे. जैसा की अमूमन हर घटना के बाद होता है. जब तक वो सुर्खियों मेें रहती है हमें याद रहता है और खबर ठंडी होने के साथ ही हम भी उसे भूल जाते हैं. ये भयावह मंजर अगर किसी को नहीं भूलता तो सिर्फ उनलोगों को जो अपनों को खोते हैं. जिनका घर उजड़ जाता है, संसार तबाह हो जाता है.

ऐसे ही ये बिहार का चर्चित हत्याकांड मेरे जेहन में हमेशा ताजा रहती है क्योंकि मैं इसकी भुक्तभोगीं हूं. इस नरसंहार में मैने अपनों को खोया था वो भी एक- दो नहीं बल्कि छह लोग! जीवन की कभी ना भूलने वाली घटनाओं में से एक थी ये घटना. सबकुछ मेरे दिमाग में ऐसे छपा है जैसे कल की ही बात हो.

वो 18 मार्च 1999 की सुबह थी. मेरे 10वीं के बोर्ड एक्जाम चल रहे थे. तीन पेपर हो चुके थे 20 मार्च को मैथ्स का और 23 मार्च को सोशल साइंस का एक्जाम बचा हुआ था. घर में केबल टीवी नहीं था इसलिए रोजाना हम सुबह सात बजे का दूरदर्शन पर आने वाले समाचार को देख बीती रात में देश-दुनिया की बड़ी खबरों से रु-ब-रु होते थे. हर रोज की तरह उस रोज भी पापा ने टीवी चलाया. टीवी पर हेडलाइन चल रही थी. पहली ही हेडलाइन को एंकर ने पढ़ा- बिहार के जहानाबाद जिले स्थित सेनारी गांव में 35 लोगों की नृशंस हत्या!

हम टीवी देखते नहीं सुनते थे. वो सुबह भी हमारी आम दिनों की ही सुबह थी. मम्मी आंगन में चूल्हे पर नाश्ता बना रही थी. पापा बाहर क्यारियों में पानी दे रहे थे, मैं पढ़ रही थी. सभी अपने काम में मग्न टीवी सुन रहे थे. पर इस हेडलाइन को सिर्फ मैने सुना. मैं पापा के पास भागी, मम्मी आंगन से दौड़ी आई. हम सब अब टीवी के आगे चिपक गए. किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि ये मेरे ही घर आंगन को मीडिया कवर कर रही है. ये बात मेरे ही आंगन की हो रही है. समाचार खत्म हुआ. फोन की कोई सुविधा नहीं थी और दूरदर्शन के उस समाचार से हम ये मान ही नहीं पाए की नरसंहार का गवाह हमारा ही गांव बना है.

पड़ोस में रहमान अंकल के घर केबल लगा था. हम सभी भागे-भागे उनके घर इस न्यूज को कन्फर्म करने पहुंचे. कई बार एक ही खबर को देखने के बाद यकीन हो गया कि 'शायद' ये हमारा ही सेनारी गांव है! हर तरफ कोहराम मच गया. मोहल्ले की आंटियां हमारे घर आकर मम्मी के पास सांत्वना देने बैठ गयीं. पापा आनन-फानन में घर से तीन किलोमीटर दूर के एसटीडी बूथ पर फोन करने गए. किसी को कुछ समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है और आखिर ये सब हुआ कैसे.

जैसे तैसे दिन बीता. शाम को फिर पापा एसटीडी बूथ पर गए. उधर से जो खबर आई वो बस दिल को हिला देने के लिए काफी थी, हालांकि हम सभी इस सच्चाई को कहीं ना कहीं मान चुके थे कि खबरों का हिस्सा हम बन चुके हैं. पर फिर भी दिल के किसी कोने में ये आस लगाए बैठे थे कि हमारा सोचना गलत हो जाए. पापा घर आए और उनका रो-रोकर बुरा हाल. मैने पापा को उस तरह से रोते उसके पहले कभी नहीं देखा था. बच्चों की तरह चिंघाड़े मार, छातियां पीट-पीट रोना. जमीन में रोते रोते गिर पड़ना. कभी ना भूलने वाला ये मंजर मेरी आंखों के सामने चल रहा था. मम्मी एक कोने में रो रही थी, मैं और मेरा छोटा भाई कभी मम्मी से लिपटते तो कभी पापा से.

बदहवासी का वो पहला मंजर था मेरी याद में. अगले दिन सुबह पापा पटना निकल गए. वहां जाकर पता चला कि पापा के एक चचेरे भाई इस घटना को सहन ही नहीं कर पाए और गांव में अपनी आंखों के सामने इतनी लाशें उसमें से परिवार के चार लोगों को ढ़ेर देख हार्ट-अटैक के शिकार हो गए. मौके पर उनकी मौत हो गई और हमारे खानदान से एक और नाम मिट गया.

इन मौतों पर राजनीति भी खूब हुई और बाजार भी भरपूर लगा. पर हमने जो खोया वो सिर्फ और सिर्फ राजनीति की ही देन थी. सवर्ण बनाम दलित कार्ड खेलकर सरकारें बनीं, राबड़ी देवी ने कहा सेनारी से हमें वोट नहीं आता इसलिए हम उस गांव का दौरा नहीं करेंगे! सेनारी हत्याकांड का बदला लेने के नाम पर सवर्णों ने पास के ही मियांपुर गांव में कत्लेआम मचाया.

इस खूनी खेल में मुझे नहीं पता किसी को मिला क्या, पर इतना पता है कि खोया बहुतों ने. कई बच्चे अनाथ हो गए. गांव के गांव का भविष्य खत्म हो गया जो आज भी पिछड़ेपन में ही जी रहे हैं. आत्मा की शांति तो आज बहुतों को मिली होगी पर सबसे ज्यादा खुशी मुझे उस दिन होगी जब इस तरह के तमाम कत्लेआम और घटनाओं को करने वाले नहीं बल्कि करवाने वाले सूलियों पर चढ़ाए जाएंगे.

रिम्मी दिल्ली में पत्रकार हैं और सेनारी हत्याकांड में उनके परिवार के लोगों की हत्या हुई थी। वह
गुफ़्तगू नाम से ब्लॉग लिखती हैं। यह संस्मरण उसी ब्लॉग से।

Oct 27, 2016

जिन्हें खोजे नहीं मिल रहे तीन तलाक के मामले, यह रिपोर्ट सिर्फ उनके लिए

कोई जज है, कोई मैनेजर, कोई शिक्षक तो कोई बिजनेसमैन है, पर तीन तलाक बोलकर औरतों के अधिकारों की धज्जियां उड़ाने में कोई किसी से कम नहीं है। अजय प्रकाश की रिपोर्ट

तलाक बोला और घर से भगा दिया जज साहब ने
उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद की आफ्सा 45 वर्ष की हो गयीं थीं पर इस डर से शादी नहीं कर रही थीं कि शादी के बाद जब कभी पति की इच्छा होगी, वह तलाक बोल घर से बेदखल कर देगा। वह बीए की पढ़ाई करने के बाद पास के ही एक स्कूल में पढ़ा रही थीं। पर घर वालों के दबाव में 2014 में बड़ी दवाब में उन्होंने अलीगढ़ के 59 वर्षीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश मोहम्मद ज​हीरूद्दीन सिद्दीकी से शादी की। जज साहब की पहली पत्नी की मौत के बाद उनके दो बच्चों के पालन—पोषण की शर्त के साथ आफ्सा उनकी दूसरी पत्नी बनी। जिंदगी कुछ महीनों तक सामान्य चली फिर फरवरी में जज साहब ने पत्नी को घर बेदखल ​कर दिया। पत्नी गिड़गिड़ाती रहीं कि कहां जाउंगी तो उन्होंने कह दिया, अभी जाओ फिर बुला लुंगा। मायके वाले भी मान गए कि चलो नोंक—झोंक के बाद सब ठीक हो जाएगा। पर जब साहब ने पत्नी को वापस बुलाने से मना कर दिया और कह दिया कि मैं तलाक दे चुका हूं। आफ्सा कोर्ट नहीं जाना चाहतीं और उनके भाइयों को लगता है कि बीरादरी वाले निपटा देंगे।

पहले ठग लिया ​फिर तलाक बोल दिया
वरिष्ठ पत्रकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जावेद आनंद बताते हैं मुंबई में एक तलाक पीड़ित मुस्लिम लड़की ने मुझसे संपर्क किया। वह चाहती थी कि उसके पति और चेन्नई के मुख्य मुफ्ती ने उसके साथ जो धोखाधड़ी की है उसके खिलाफ कोई फतवा जारी हो जिससे मौलवी और ​पति को सबक मिले।' लड़की ने बताया, 'मैं एक मल्टीनेशनल बैंक में ​सीनियर एक्ज्यूक्टिव हूं और मेरा मुस्लिम शौहर चेन्नई में ही एक दूसरे मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है। हम दोनों ने एमबीए हैं। पति ने इंवेस्टमेंट के नाम पर मुझपर भावनात्मक दबाव बनाया और मेरी सैलरी हर महीने अपने खाते में डालता रहा। बाद में मैं अपनी सैलरी उसके खाते में डालने से मना कर दी तो वह बोला खुला 'लड़कियों का अधिकार जिसके ​जरिए वह तलाक दे सकती हैं' दे दो, जबकि मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। मैंने पैसा मांगा तो वह घर छोड़कर चला गया। मैं उसके घर गई तो कह दिया, मैंने तुम्हें तलाक दे दिया। मुख्य मु्फ्ती के यहां गयी, उसने मुझे डांटकर भगा दिया कि पहले 'खुला' देती हो और अब यहां नाटक करती हो।' जावेद बताते हैं कि फिर मैंने उस लड़की के लिए मुंबई के मुख्य मुफ्ती से मदद मांगी पर वह टाल गए, आख्रिर में पंजाब के मुख्य मुफ्ती फुजैलूर रहमान उस्मानी से गुहार लगाई तो वह फतवा जारी करने को तैयार हुए। उसके बाद कुछ खास हो पाया होगा मुझे नहीं लगता। हां, घरेलू हिंसा कानून के आने के बाद से जरूर मुस्लिम महिलाओं को राहत मिली है।

तीन तलाक के लिए सबसे आसान शब्द 'अवैध संबंध'
तीस हजारी कोर्ट में जज ने जब पूछा कितना पढ़े लिखे हो तो तलाक देने वाले शिक्षक शौहर का जवाब था — एमए, बीएड, एमएड और डायट की डिग्री। दिसंबर 2013 से अदालत में चल रहे इस मामले की शुरुआत उस समय हुई जब शिक्षक पति ने शिक्षिका पत्नी को तीन बार तलाक कह छोड़ गया। पति को संदेह था कि पत्नी का अवैध संबंध है। दो छोटे बच्चों के साथ, पति के मां—बांप को भी पाल रहीं फरहाना बताती हैं कि एक शाम कहीं से वह घूमकर आए। उनके पिता जी ने कोई बात कही। उस पर वह बिगड़े, मैंने हस्तक्षेप किया तो मुझपर आरोप लगाए, कहा तुम्हार अवैध संबंध है और तलाक बोल चलते बने। अब वह सिर्फ तारिखों पर अदालत में आते हैं और सुलह करने की बजाए मुझे बर्बाद करने की धमकी देते हैं।

तलाक वापस नहीं लेंगे चाहे करोड़ों फुंक जाए
कैश 30 लाख रुपए, चार पहिया गाड़ी और दस भर सोना दहेज में देने के बाद दिल्ली के जाफराबाद में हुई एक बिजनेसमैन घराने की शादी तीन महीने भी नहीं चली। शौहर ​साजिद ने लड़की से एक दिन मारपीट कर घर से निकाल दिया। लड़के—लड़की दोनों ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की है। मायके वाले उसे वापस ससुराल लेकर आए तो साजिद और उसके घर वालों ने कह दिया कि मैंने तलाक दे दिया है। इस मामले को देख रहीं सुप्रीम कोर्ट की वकील फरहा फैज कहती हैं, 'ऐसे मामलों में तलाक शब्द ही ब्रम्ह है, मनमानी ही रिवाज है।' साजिद अपनी 23 वर्षीय तलाकशुदा पत्नी को कोर्ट के आदेश के बावजूद 10 हजार महीना के हिसाब से भत्ता देने को तैयार नहीं। एक साल के बकाए का आधा उसने तब दिया है जब कोर्ट ने उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया।

Oct 23, 2016

पार्टी होगी दो फाड़, 3 नवंबर के बाद अखिलेश करेंगे नई पार्टी की घोषणा

अखिलेश ने तो बहुत पहले ही शिवपाल को हाशिए पर ला दिया होता पर पिता के कारण वह गले हड्डी ढो रहे हैं। शिवपाल ने मुख्यमंत्री के इजाजत के बगैर केंद्र सरकार से 2 लाख करोड़ की डील कर आग में घी का काम किया था। पार्टी के विश्वस्त सूत्रों के हवाले से पार्टी दो फाड़ होगी. 3 नवंबर के बाद अखिलेश नई पार्टी की घोषणा करेंगे...

समाजवादी पार्टी उत्तर भारत की इकलौती ऐसी पार्टी है जिसमें नेतृत्व, रणनीति और कार्यशैली को लेकर न सिर्फ रगड़ा और मतभेद है बल्कि पारिवारिक पार्टी होने की वजह से एक दूसरे के प्रति भावनाएं (दुर) भी खुलेआम दिखती हैं। पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई का संकट दिनोदिन गहरा रहा है. इसी कड़ी में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल यादव को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया है। शिवपाल यादव के साथ चार और मंत्रियों को भी मंत्रिमंडल से निकाला गया है. इससे पहले शिवपाल यादव ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद अखिलेश समर्थकों को न सिर्फ पार्टी से अलग- थलग करने की कोशिश की थी, बल्कि एक तरह भतीजे को चेताने का काम भी किया था।

शिवपाल बर्खास्तगी घटनाक्रम के बाद उन कयासों को और बल मिल गया है जिनके आधार पर पार्टी के दोफाड़ की आशंका जताई जा रही थी। कहा जा रहा है कि पार्टी में बंटवारा हो सकता है, नई पार्टी बन सकती है।  

शिवपाल को बर्खास्तगी तक पहुँचाने में विधायक उदयवीर सिंह की चिट्ठी ने भी अहम् भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि पार्टी में चल रहे घमासान के बारे में कुछ दिन पहले पत्र लिखने वाले विधायक उदयवीर को पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया गया था. उदयवीर अखिलेश के काफ़ी क़रीबी माने जाते हैं।

गौरतलब है कि 15 सितंबर को किए पांच मिनट के प्रेस कांफ्रेंस में एक-एक वाक्य में तीन-तीन बार नेताजी-नेताजी की दुहाई देने वाले उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल सिंह ने एक झटके में मन की कर डाली थी और दो टूक जता दिया कि अब लड़ाई चिलमन से बाहर निकल आमने-सामने की ही होगी। अब बड़े भाई की आड़ गयी अब भाड़ में। शिवपाल ने 19 सितंबर को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते ही अखिलेश समर्थक सात पदाधिकारियों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया। 

मुलायम सिंह यादव के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने में शिवपाल ने किसी किंतु-परंतु का सहारा नहीं लिया और निष्कासित सात पदाधिकारियों में अखिलेश के चहेते तीन विधान परिषद सदस्यों सुनील सिंह यादव, आनंद भदौरिया, संजय लाठर को सबसे पहले निकाला और मीडिया में तत्काल सूचना प्रसारित करवाई। वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार कहते हैं, ‘शिवपाल ने जिन लोगों को निकाला है वे वो लोग थे जिन्होंने पिछले शासन काल में आंदोलन करते हुए पुलिस दमन के शिकार हुए और सिर पर पुलिस की बूट की चोट झेली है।’ ऐसे में सवाल उठने शुरू हो गए थे की क्या प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इससे कमजोर प्रतिक्रिया देंगे। क्या वह फिर एक बार चुप रहकर अपने को कमजोर मुख्यमंत्री कहलवाएंगें या पिता के आदेशों को इंतजार करेंगे। खासकर तब जबकि निकाले गए लोगों में सपा सांसद और मुलायम के चचेरे भाई रामगोपाल का भांजे अरविंद यादव भी शामिल हो। सभी जानते हैं कि पारिवारिक खेमेबंदी में रामगोपाल अखिलेश के पक्ष में खड़े होते हैं। 

समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री ने एक अनौपचारिक बात में कहा भी था कि, ‘अबकी नहीं मानेेंगे अखिलेश और न ही नेताजी की सुनेेंगे। अखिलेश ने तो बहुत पहले ही शिवपाल को हाशिए पर ला दिया होता पर पिता के कारण वह गले हड्डी ढो रहे हैं। शिवपाल ने मुख्यमंत्री के इजाजत के बगैर केंद्र सरकार से 2 लाख करोड़ की डील कर आग में घी का काम किया था। गडकरी से मिलकर पार्टी विरोधी गतिविधियों का काम किया था जिसका परिणाम उन्हें भुगतना होगा।’  

 गौरतलब है भाजपा नेता और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से उत्तर प्रदेश के तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मंत्री शिवपाल सिंह की मुलाकात सितंबर के दूसरे सप्ताह में हुई थी। मुलाकात अमर सिंह ने राज्यसभा सांसद और एस्सेल ग्रुप के निदेशक सुभाष चंद्रा की मदद से कराई थी। मामला उत्तर प्रदेश में नेशनल हाइवे बनाने को लेकर 2 लाख करोड़ का था। सूत्रों के मुताबिक गडकरी चाहते थे कि 50 फीसदी सड़क का ठेका हमारे लोगों को मिल जाए और 50 फीसदी आपके लोगों को। जानकारी के मुताबिक गडकरी ने ठेका जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा के एस्सेल ग्रुप को दिया और अमर सिंह ने अपने लोगों। डील में सचिव दीपक सिंघल ने महत्वपूर्ण भूमिका। हैरत की बात यह कि जिस मुख्यमंत्री के आदेशों पर यह सब होना है उसको खबर तब पता चलती है जब हस्ताक्षर के लिए प्रोजेक्ट पेपर सामने रखा जाता है।

पेशे शिक्षक और समाजवादी पार्टी की राजनीति में खासे सक्रिय रफीक अहमद बताते हैं, ‘शिवपाल कभी अखिलेश को मुख्यमंत्री स्वीकार ही नहीं कर पाए और जबसे यह पता चला है कि अगले चुनावों में असली टक्कर भाजपा और सपा के बीच है तबसे उन्होंने अभी से खुद को अगला मुख्यमंत्री मान लिया।’ 

अक्सर शिवपाल की एक मजबूती की बात मीडिया करता रहता है कि उनकी संगठन में बहुत व्यापक और लोकप्रिय पकड़ है इसलिए मुलायम शिवपाल को अहमियत देते हैं। मगर उनके परिवार के एक बेहद करीबी और शिवपाल और मुलायम सिंह की कई मुलाकातों के साक्षी रहे सेवानिवृत्त अधिकारी की राय में 'संगठन में मजबूती’ वाली बात मीडिया द्वारा शिवपाल ले खुद स्थापित कराई है जिससे मुख्यमंत्री न बन पाने की निराशा को एडजस्ट कर सकें। कौन नहीं जानता कि जो सत्ता में उसी की पकड़ हर जगह होती है। क्या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पार्टी में किसी की अधिक पकड़ है। फिर सपा में ऐसा क्यों है? तो यह मुलायम सिंह यादव का अपराध बोध है। 

बात खत्म हो उससे पहले पंचतंत्र की वह कथा जरूर याद करनी चाहिए कि दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली कौन है? कौन इन दोनों के मुंह का निवाला छिनने की फिराक में है? पहला जवाब भाजपा है। पर क्या शिवपाल उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से लेकर हाल ही में बसपा छोड़े स्वामी प्रसाद मौर्य कि दुर्गति से परिचित नहीं हैं। हां, इसमें कोई शक नहीं कि अगर पार्टी टूटती है तो इसकी बड़ी लाभार्थी भाजपा बनेगी और शिवपाल बली का बकरा। बाकि अखिलेश का क्या होगा यह तो समय बताएगा। वैसे भी पारी के हिसाब से अबकी बारी में अखिलेश की पार्टी को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष में ही बैठना है। 

 इस मसले पर वरिष्ठ राजनीतिक चिन्तक सुधीर पंवार कहते हैं कि, 'हर पार्टी संक्रमण काल से गुजरती है। संक्रमण पार्टी को एक नया रूप और नई संभावनाएं देता है पर यह यों ही नहीं होता। इस बीच बहुत कुछ टूटता और खत्म भी होता है। मोरारजी देसाई के समय में कांग्रेस में और मोदी के समय भाजपा में भी ऐसा ही हुआ। दरअसल यह लड़ाई पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी की है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनावों से सालभर पहले पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह या यशवंत सिन्हा को हाशिए पर ढकेला तो कितना शोर मचा था पर अब देखिए। इसलिए यह हायतौबा की बात नहीं है कि पार्टी संक्रमण के दौर से गुजर रही है लेकिन इसकी चिंता जरूर की जानी चाहिए कि उसके बाद बचेगा क्या और बलिदान कितना करना होगा।'

राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि पार्टी के दोनों धड़ों का झगड़ा अब खुलकर सामने आ चुका है और अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव को किनारा करने की ठान ली है.