Jun 22, 2011

सच के साहस का संपादकीय


अरिंदम के  एक या दो लेखों  में ऐसा होता तो इसे इत्तेफाक कहकर छुटकारा मिल जाता, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. वे लगातार ऐसे मुद्दों पर लिख रहे है,जिन्हें लिखने पर भारत में आप सहज ही सरकार-संविधान-राष्ट्र विरोधी घोषित किये जा सकते हैं...

विष्णु शर्मा 

ताज्जुब है कि इतनी तीखी और सच्ची बात लिखने पर भी सरकार अरिंदम चौधुरी को अब तक बर्दाश्त  कैसे कर रही है? प्रोफेसर चौधुरी, जो प्लानमैन ग्रुप ऑफ कम्प्नीज  के संस्थापक  और दी सन्डे इंडियन के प्रधान संपादक हैं,को क्यों सरकार माओवादी कहकर किसी कुख्यात दफा में  आजीवन कारावास नहीं दे देती! वे उन चंद उद्योगपतियों (शायद वे अकेले ही है) में  से हैं, जिन पर लक्ष्मी का वाहन उल्लू की पुरानी भारतीय कहावत असर नहीं करती. उनके लेखों,खासकर दी सन्डे इंडियन के सम्पादकीय में, भारतीय जनमानस की भावना को लगातार स्थान मिलता है.

वे उन विचारों को व्यक्त करने में भी नहीं झिझकते, जिनके बारे में लिखने की कल्पना बहुत से जनपक्षधर लेखक कर तो सकते है, लेकिन लिखने का साहस नहीं जुटा पाते. उन्हें पढ़ते  हुए आश्चर्य होता है कि एक उद्योगपति जिसका दिल्ली के सीआर पार्क जैसे पाश इलाके में आलीशान मकान  हो, जिसके सामने ढेरों गार्ड पहरेदारी करते हों , वह आम जनता के सरोकार को इतनी संवेदनशीलता से कैसे रख सकता है.

यदि अरिंदम के  एक या दो लेखों  में  ऐसा होता तो इसे इत्तेफाक कह कर छुटकारा मिल जाता, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. वे लगातार ऐसे मुद्दों पर लिख रहे है जिन्हें लिखने पर भारत में आप सहज ही सरकार-संविधान-राष्ट्र विरोधी घोषित किये जा सकते हैं! और यदि आप इस तरह के लेखों का व्यापक प्रसार किसी भारतीय भाषा में  करते हैं  तो जेल जाना आपकी नियति है. अरिंदम चौधुरी तो एक कदम आगे बढ़ कर भारत की चौदह भाषाओं में  एक साथ इस तरह के लेखों को प्रकाशित करते है, बढ़ावा देते है! 

मार्च 2011 में  अरिंदम चौधुरी ने राजद्रोह कानून पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए लिखा ‘यह बड़े शर्म की बात है कि आज भी हम औपनिवेशिक अतीत और उस दौर के पक्षपाती कानूनों के चंगुल से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए हैं,जिनका मकसद लोगों को सरकार चलाने वाले चुनिंदा लोगों के तलवे चाटने पर मजबूर करना है.’  पेशे से अर्थशास्त्री कहलाना  पसंद करने वाले प्रोफेसर चौधुरी सार्वजनिक जीवन में  सरकार की हिस्सेदारी को जरुरी मानते है.वे अंधाधुन्ध निजीकरण के खिलाफ हैं,   जिसका मकसद मुठ्ठी भर लोगों को असीमित संसाधनों का मालिक बना देना है.

11 मार्च 2011 के अपने लेख मे वे लिखते है ‘हम अजीबो-गरीब अर्थव्यवस्था हैं, जहां अरबपतियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है,जबकि हमारे पास अरब डॉलर वाला शायद ही कोई वैश्विक उत्पाद है. ऐसी अजीब,गूढ़ और अद्भुत बात- जहां बगैर किसी वैश्विक उत्पाद के ही अरबों बनाए जा रहे हों- यह केवल भारत में ही संभव है.’

भूमि अधिग्रहण के सवाल पर उनका मानना है कि ‘भारत में जमीन खरीदने वाला कानून 110 साल से भी अधिक पुराना है (भूमि अधिग्रहण कानून-1894). हालांकि इस कानून में कई बार संशोधन हुए, लेकिन संशोधनों ने सरकार की जमीन हथियाने की ताकत में और इजाफा ही किया.’और ‘राजनेताओं से लेकर नौकरशाह और उद्यमी तक, सभी की निगाहें विभिन्न विकास योजनाओं पर लगी रहती हैं,ताकि मौके की जमीन का एक टुकड़ा हथियाया जा सके.’

अरिंदम माओवादी आन्दोलन को बिना समझे आतंकवाद कहकर नकार  देने के खिलाफ है. 16 मई 2010 की सम्पादकीय  ‘हमारी सरकारों ने मानवता के खिलाफ माओवादियों से अधिक आतंकवाद मचा रखा है’ मे उन्होंने लिखा ‘जब भारत और भारतीय मीडिया फोर्ब्स सूची में अरबपतियों की बढ़ती संख्या का जश्न मनाती है, तब ये गरीबी और भूख की वजह से अनजाने और अनसुने ही दम तोड़ रहे होते हैं. इस धारणा के उलट सरकार जिन माओवादियों को आतंकवादी बनाना चाहती है,वे गरीब परिवारों से आते हैं,जिन्हें हाशिए पर धकेल कर भूखे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. दुनियाभर में जब नेता इस तरह से बड़ी संख्या में लोगों को हाशिए पर डाल देते हैं तो वहां क्रांतियां जन्म लेती हैं.’

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद जब सभी मीडिया घराने वाम पार्टियों की हार को वाम दर्शन की हार के रूप मे प्रस्तुत कर रहे थे, तब अपने सम्पादकीय में उन्होंने बड़े सीधे तर्कों के साथ सीपीएम की हार के कारणों पर लिखा -‘यह बंगाल में मार्क्सवाद के सात दुष्कर्म का अंत है’. उन्होंने आगे लिखा‘मार्क्सवाद के नाम पर जो कुछ भी किया गया,वह सब गैर मार्क्सवादी था, और मार्क्सवाद विचारधारा के केंद्र में रहने वाले गरीबों को ही सबसे अधिक आतंकित किया गया.उन्हीं का सबसे अधिक शोषण हुआ.’

अरिंदम : सच का साहस
अरिंदम मानते है कि सीपीएम ने अपने कुख्यात शासन के शुरुआती दस सालों में पूरी ईमानदारी के साथ काम किया, लेकिन वह बाद में ‘स्तालिनवादी’सोच का शिकार होकर जनविरोधी बन गई. अभी हाल में बाबा रामदेव के  भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन  पर हुए सरकारी जुल्म पर जिस प्रकार से उन्होंने लिखा है वह उनकी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता  को व्यक्त करता है.

‘चापलूसों की तानाशाही’शीर्षक अपनी सम्पादकीय मे उन्होंने लिखा है,‘रामलीला मैदान पर हुआ आधुनिक जालियांवाला बाग कांड, केंद्र सरकार के दानवी रवैये, विपक्ष की कमजोर रीढ़ और भारत के प्रति मीडिया के पाखंड का दर्शन कराता है!मेरा सवाल यह है कि हम किसी लोकतंत्र में रह रहे हैं या फिर गलती न मानने वाले तानाशाही शासन में? क्या सरकार नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. या फिर वे मानते हैं कि देश के लोग मूर्ख हैं और वे चुपचाप इस तरह की तानाशाही स्वीकार कर लेंगे तथा 2014में एक बार फिर उन्हें वोट देकर सत्ता में वापस ले आएंगे?’

भारत के बड़े मीडिया संस्थानों में शायद दी सन्डे इंडियन ही एक मात्र पत्रिका है,जिसने इतने कड़े शब्दों मे रामलीला में  सरकारी आतंक की निंदा की हो. बीजेपी के पूर्व अध्धक्ष लाल कृष्ण आडवाणी  1975-1977की भारतीय आपातकाल का हवाला देते हुए अक्सर कहते हैं  कि ‘उस वक्त पत्रकारों को झुकने का आदेश मिला तो वो रेंगने लगेंगे.’

लेकिन आज जबकि औपचारिक तौर पर आपातकाल नहीं है,ऐसे में  सरकार की तानाशाही को बिना सवाल किये स्वीकार करना लोकतंत्र में अक्षम्य है. ऐसे में अरिंदम चौधुरी की गिनती उन संपादकों में हैं जो अपने वर्ग की सीमा को तोड़ने का प्रयास करते है और लोकतंत्र पर विश्वास रखते हुए ‘लीक’ से हटकर सोच सकते है.



राह चलते किसान को तहसीलदार ने उठवाया


आजमगढ़. मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की उत्तर प्रदेश इकाई के आजमगढ़ जिला प्रभारी तारिक शफीक और विनोद यादव ने जहांनागंज के बबुरा गांव निवासी यशवंत यादव का अतिरिक्त मजिस्टेªट नुरुल हसन के समक्ष 20 जून 2011 को बयान दर्ज करवाया। पीयूसीएल ने कर्ज के बोझ से दबे किसानों को गैरकानूनी व अपराधिक तरीके से उठाकर तहसीलों और जेलों के हवालातों में दी जा रही यातनाओं को मानवाधिकार हनन का गंभीर मसला बताते हुए किसानों के ऐसे सवालों को उठाया है।

यह बयान पीयूसीएल के प्रदेश संगठन सचिव राजीव यादव और प्रदेश संयुक्त सचिव मसीहुद्दीन संजरी द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग को 15 अप्रैल 2011 को भेजे शिकायती पत्र के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा आजमगढ़ के मण्लायुक्त को भेजे गई नोटिस के बाद कि ‘‘वह प्रकरण की निष्पक्ष जांचकर आख्या आयोग को एक माह में प्रेषित करें’’ के बाद दर्ज किया गया है।

यशवंत 29 मार्च को जब दो पहिया वाहन से जा रहे थे तो सेमा और रोशनपुर गांव के बीच में राह चलते तहसीलदार ने यशवंत को उठवा लिया। इस बात की जानकारी दूसरे दिन समाचार पत्रों में छपी खबरों से मालूम हो पायी। यशवंत की पत्नी नरमी ने बताया कि यशवंत ने उससे बताया था कि जब उसे तहसील के हवालात में बंद कर दिया गया तो उसकी तबीयत काफी बिगड़ गई। जिसके बाद उसे जिला अस्पताल आजमगढ़ लाया गया जहां से उसे जेल भेज दिया गया। यशवंत यादव ने अपने बयान में दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाई की मांग करते हुए भारत सरकार से मांग की कि उसका कृषि ऋण माफ किया जाय।

पीयूसीएल नेता तारिक शफीक और विनोद यादव ने कहा कि जिस तरह से आपराधिक तरीके से यशवंत को तहसील के लोगों ने उठाया और परिवार को कोई सूचना नहीं दी इस पर सख्त कार्यवाई की जाय। जिस तरह से किसान देश में आत्महत्या कर रहें हैं वैसी स्थिति में इस तरह से किसानों को जलील करने पर अगर कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए राज्य जिम्मेदार होगा।

 

Jun 21, 2011

कोसी जन संवाद यात्रा जुलाई में

जनज्वार. बिहार में कोसी की भयानक त्रासदी के तीन वर्ष भी पूरे नहीं हुए कि फिर एक बार कोसी के पूर्वी तटबंध पर पानी के बढ़ते दबाव से लोग भयाक्रांत हैं। सरकार ने कुसहा बांधते समय दावा किया था कि अब 25 वर्षों तक कोई खतरा नहीं होगा। वही सरकार अब हल्ला मचा रही है कि कोसी को ऐसे खतरों से बचाने के लिए ‘मुख्यधारा’ में पायलट चैनल बनाना जरूरी है।

पायलट चैलन नहीं बना पाने का दोष बिहार सरकार नेपाल पर मढ़ रही है। सरकार द्वारा तय मानकों के मुताबिक  30 अप्रैल तक कोशी में बाढ़ निरोधक सभी काम पूरा करना होता है, क्योंकि मई से पानी बढ़ने लगता है। लेकिन राज्य सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 31 मई को केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर नेपाल सरकार से कोसी मामले में बात करने का अनुरोध करते हैं।

कोसी त्रासदी के बाद 9 सितंबर, 08 को राज्य सरकार ने ‘कोसी बांध कटान न्यायिक जांच आयोग’ का गठन किया था। इसे एक साल के अंदर रिपोर्ट देनी थी। अब तीन वर्ष पूरा होने को हैं। 70 लाख से ज्यादा रूपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन अब तक आयोग ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर एक भी जनसुनवाई नहीं की है। आयोग की शर्त्तें एवं जांच के बिन्दुओं को इस तरह निर्धारित किया गया है कि उसमें वर्तमान सरकार को बचाने का पहले से ही पक्का इंतजाम हो।
कुसहा बांध पीड़ित : पुनर्वास का इंतजार  

वीरपुर से बिहारीगंज तक 10 से 14 जुलाई के बीच जनसंवाद यात्रा के मुद्दे
  • बाढ़ की दीर्घकालिन समाधन के लिए जन भागीदारी निर्णायक हो
  • न्यायिक जांच आयोग अविलंब जन सुनवाई शुरू करे
  • बांध टूटने के दोषियों की सजा के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन
  • पुनर्वास प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध किया जाये
  • कोसी पुनर्निर्माण योजनाओं के चयन व निर्माण में पंचायती राज संस्थाओं एवं नागरिक संगठनों की निर्णायक भागीदारी

सच्चाई यह है कि कुसहा बांध टूटने के बाद आज तक एक भी पदाधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। तब के सिंचाई मंत्री आज भी बेशर्मी के साथ नीतीश सरकार के चहेते बने हुए हैं। पुनर्वास की तमाम योजनाओं में जटिल प्रक्रियाओं, सरकारी उदासीनता एवं सुस्ती से भ्रष्टाचार का रास्ता खुल गया है।  सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुल दो लाख छत्तीस हजार छः सौ बत्तीस (236632) घर ध्वस्त हुए थे, लेकिन अब तक मात्र 258 मकान बने हैं और 2164 मकान अधूरे  बने हैं।  यह तो केवल एक उदाहरण है। क्षतिग्रस्त घरों का मुआवजा हो या फसल क्षति का, खेतों से बालू हटाने का मुद्दा हो या उनके सीमांकन का, इन सभी मामलों में आम आदमी और किसानों की कठिनाईयां बढ़ी हैं। मौजुदा समय में भी अनेक गांवों को जोड़ने वाले पुल, सड़कें और पुलिया क्षतिग्रस्त हैं और हल्की वारिश से ही लोगों का जीवन दूभर हो जाता है।

इतना ही नहीं राहत के तौर पर आयी योजनाओं जैसे परिजनों की मृत्यु तथा मृत पशुओं के मुआवजे की क्रूर व अव्यवहारिक प्रक्रियाओं ने लोगों के जख्मों को बार-बार कुरेदा है। स्कूल और अस्पतालों की बदतर स्थिति अभी भी सबके सामने है। लाखों लोग जो अपनी आजीविका से हाथ धो बैठे उनके लिए नई रोज़गार की योजनाएं शुरु करना तो दूर पहले से चल रही मनरेगा एवं स्वावलम्बन की योजनाएं भी भ्रष्टाचार के चलते उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

जाहिर है ऐसे में सामाजिक संगठनों, कार्यकर्त्ताओं, प्रबुद्व नागरिकों, विभिन्न दलों के ईमानदार नेताओं व कार्यकर्त्ताओं का दायित्व बनता है कि पुनर्वास योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करें। सरकार के असंवेदनशील रवैये का पर्दाफाश करें तथा बाढ़ समस्या के दीर्घकालीन समाधान एवं जनपक्षीय पुनर्वास नीति के लिए पहल करें। इसी पहल को संगठित करने की दृष्टि से 10 से 14 जुलाई के बीच वीरपुर से बिहारीगंज तक एक जनसंवाद यात्रा का आयोजन ‘कोसी विकास संघर्ष समिति एवं कोशी नवनिर्माण मंच’ की ओर से किया जा रहा है, जिसमें आपकी भागीदारी पीड़ितों को न्याय दिलाने में मदद करेगी।



बसपा सरकार में बेख़ौफ़ गुंडई

अपराधियों को पुलिस-प्रशासन का कोई खौफ नहीं है। तभी तो दिनदहाड़े महिलाओं और बच्चियों का बलात्कार हो रहा है। कहीं खेत से किसी की लाश  मिलती है, तो कहीं बलात्कार की कोशिश में नाकाम रहने पर अपराधी लड़की की आंखें ही फोड़ देते हैं...

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

जैसे-जैसे 2012विधानसभा चुनावों का समय नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे विपक्षी दलों के साथ ही साथ अपराधी भी उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार की परीक्षाएं ले रहे हैं। प्रदेशभर में एक के बाद एक हो रहे बलात्कार कांड ने यूपी की कानून-व्यवस्था की पोल-पट्टी खोल कर रख दी है। मायावती कानून व्यवस्था के चुस्त-दुरूस्त होने के चाहे लाख दावे करें,लेकिन बेखौफ अपराधी सरकारी आंकड़ों और दावों को सरेआम मुंह चिढ़ा रहे हैं।

तेरह मई को सरकार के चार साल पूरे होने के अवसर पर जारी पुस्तिका में माया सरकार ने प्रदेश भर में अपराधियों पर नकेल कसने और अपराध नियत्रंण के जो लंबे-चौड़े दावे किए, वो आंकड़ों की धोखेबाजी के अलावा कुछ और दिखाई नहीं देते हैं। मायावती एक ओर अपनी पार्टी के विधायकों और मंत्रियों के कुकृत्यों से परेशान हैं, दूसरी तरफ बेखौफ अपराधी सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं।

हाल ही में माया सरकार के दो विधायकों शेखर तिवारी और आनंद सेन को हत्या के मामले में सजा सुनाई गई है। प्रदेश के गन्ना विकास संस्थान के चेयरमैन राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त इंतिजार आब्दी उर्फ बाबी की राजधानी के चर्चित सैफी हत्याकांड में हुई गिरफ्तारी ने सरकार को एकबार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। डैमेज कंट्रोल के लिए सरकार चाहे जितनी सख्त कार्रवाई करे, लेकिन कानून-व्यवस्था के बिगड़ते हालात ये बताते हैं कि सरकारी मशीनरी  का ध्यान कानून-व्यवस्था के बजाए लूटपाट, भ्रष्टाचार और सत्ता की सेवा में लीन है।

प्रदेश में गरीब, किसान, महिलाओं और शोषितों  की आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। सरकार दुर्घटना घट जाने पर लाठी पीटने और मुआवजा देकर अपनी छवि सुधारने का काम तो करती है, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि अपराधियों को पुलिस-प्रशासन का कोई खौफ नहीं है। तभी तो दिनदहाड़े महिलाओं और बच्चियों का बलात्कार हो रहा है। कहीं खेत से किसी की लाश मिलती है, तो कहीं बलात्कार की कोशिश में नाकाम रहने पर अपराधी लड़की की आंखें ही फोड़ देते हैं।

सूबे में कानून व्यवस्था बुरी तरह चरमरा चुकी है। कन्नौज में नाबालिग लड़की से रेप की कोशिश में नाकामी पर आंख फोड़ने की घटना के 48 घंटे के भीतर प्रदेश में में छह और महिलाएं दरिंदों की हवस की शिकार बनीं। इन घटनाओं से लगता है कि यहां हर तरफ जंगलराज कायम हो गया है। पर हद तो तब हो जाती है जब पुलिस कानून व्यवस्था को सही बताते हुए मीडिया पर ही गलत खबर देकर छवि खराब करने का आरोप लगाती है। एडीजे बृजलाल ने मीडिया से कहा कि वो पुलिस की छवि लोगों के बीच खराब न करे। वहीं मुख्य सचिव अनूप मिश्र ने दिल्ली में प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था और 48 घंटों की अंदर 6 बलात्कार और एक बलात्कार की कोशिश के बारे में पूछे गए सवाल को हल्के में लेते हुए ‘ऐसी छोटी-मोटी घटनाएं होती रहती हैं’और ‘प्रदेश में कानून व्यवस्था सामान्य है’ कहकर सरकार का पक्ष रखा।   

कन्नौज के गुरपुरवा गांव में एक 14 साल की लड़की से बलात्कार की कोशिश की गई और नाकाम रहने के बाद उसकी आंखों पर घातक वार किए गए। आरोपी कुलदीप और निरंजन यादव उसे रास्ते में रोककर पहले खेतों में ले गए, जहां उसे घसीटा और फिर बलात्कार की कोशिश की। लड़की द्वारा विरोध करने पर उसकी दोनों आंखों पर चाकू से वार किया। बाद में आरोपी बेहोश लड़की को खेत में ही छोड़कर फरार हो गए। गांववालों को जानकारी मिलने के बाद पीड़ित लड़की को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों के मुताबिक लड़की की एक आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई है और शायद ही सामान्य स्थिति में आ पाएगी। उसे इलाज के लिए कानपुर भेज दिया गया।

कन्नौज की घटना के बाद एटा जिले के निधौली कलां थाना क्षेत्र के सभापुर गांव में एक दलित महिला से पांच लोगों ने गैंगरेप किया। गैंगरेप करने के बाद महिला को जला दिया गया। गंभीर रूप से झुलसी महिला की इलाज के दौरान अस्पताल में मौत हो गई। इस कांड में लिप्त सभी आरोपी फरार हैं। 20 जून की सुबह तैंतीस वर्षीय अनारकली के घर में घुसकर उसके साथ बलात्कार किया गया।

इसी तरह गौंडा के करनैलगंज में एक नाबालिग दलित किशोरी से गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई। हत्या के बाद बलात्कारी उसके शव को गन्ने के खेत में फेंककर भाग गए। जिले के करनैलगंज के मसौलिया गांव के निवासी राजेश की चौदह वर्षीय बेटी 16जून से ही लापता थी। खेत पर जाने के बाद वह वापस नहीं लौटी। रविवार को गन्ने की खेत से उसका शव बरामद हुआ। उसके साथ भी गैंगरेप होने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस ने कहा है कि पोस्टमार्टम के बाद सच सामने आएगा। राजेश ने तीन लोगों के खिलाफ थाने में तहरीर दी है।

फिरोजाबाद के सिरसागंज में भी एक 15 साल की नाबालिग लड़की के साथ कथित रूप से बलात्कार किया गया। मीना बाजार इलाके में लड़की के कथित प्रेमी शानू नाम के लड़के ने अपने दोस्त गट्टू के साथ मिलकर उसका बलात्कार किया। पुलिस ने शानू को गिरफ्तार कर लिया तथा दूसरे आरोपी की तलाश जारी है। बस्ती जिले में 18साल की दलित लड़की के साथ एक युवक ने रेप किया। बताया जा रहा है कि उक्त युवक ने बंदूक की नोक पर लड़की का रेप किया। अपने परिवार के साथ स्टेशन से घर जा रही कानपुर के कर्नलगंज की एक युवती को चार गुंड़ों ने रावतपुर चौराहे से अगवा कर लिया। उसे एक होटल में रखा गया। रविवार की सुबह लड़की सफाई करने वाले लड़के की मदद से किसी तरह भाग निकली।

लड़की के परिजनों की शिकायत पर हरबंश मोहाल पुलिस ने होटल मैनेजर को हिरासत में ले लिया। पुलिस का कहना है कि इस मामले में गैंगरेप की पुष्टि नहीं हुई है। युवती ने बताया कि वो भीड़ की वजह से परिवार से बिछड़ गई थी,जिसके बाद उसको अगवा किया गया। युवती के परिजनों ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी रिपोर्ट लिखवाने जाने पर कहा कि कहीं चली गई होगी। बस्ती के रानीपुर बेलादी गांव में एक युवक ने बंदूक की नोंक पर बलात्कार किया। पुलिस ने आरोपी सत्ती सिंह के खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया है और आरोपी की तलाश की जा रही है। राज्य में पिछले दिनों अपराध की बढ़ती घटनाओं पर राजनीति भी शुरू हो गई है। कांग्रेस ने यूपी की सत्तारुढ़ बसपा सरकार पर अपराधियों की मदद करने का आरोप लगाया है।
इन घटनाओं से तो यही लगता है लगभग पूरा सरकारी अमला लूटपाट और भ्रष्टाचार में लिप्त है। पुलिस प्रशासन अपने विवेक को एक किनारे रखकर सत्ताधारी दल के एजेंट की भांति काम कर रहा है। कहीं डीआईजी स्तर का अधिकारी किसी प्रदर्षनकारी को जूते से मसलने में शान समझता है,तो कहीं सीओ और एसपी स्तर के अधिकारी अपनी नेम प्लेट छुपाकर अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर बर्बरतापूर्वक डंडे बरसाना ही अपनी डयूटी समझते हैं।

मायावती ने चुनावों के मद्देनजर प्रशासनिक अधिकारियों के व्यापक स्तर पर फेरबदल किया है, ताकि चुनावों के समय उनके चहेते पालतू अधिकारी सरकारी एजेंट की भांति सत्ताधारी दल की चाकरी कर सके। निजी स्वार्थों और प्रमोशन के भूखे अधिकारी अपनी जान पर खेलकर बहनजी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। सत्ता की चाकरी और चापलूसी के चलते प्रदेश की कानून व्यवस्था चरमरा कर रह गई है। अपराधियों को ये भलीभांति ज्ञान है कि जब प्रदेश में सत्ताधारी दल के विधायक और मंत्री अपराध में संलिप्त है तो उनको पूछने वाला कौन है अर्थात चोर चोर मौसेरे भाई। मायावती सख्त कानून और प्रषासन के चाहे जितने भी दावे करे लेकिन जमीनी सच्चाई किसी से छिपी नहीं है।

भारी जनदबाव और विपक्षी दलों के चिल्लाने पर सरकार की आंख खुलती है और फिर समूचा सरकारी अमला झाडपोंछ और डैमेज कंट्रोल में लग जाता है। सरकार घटना के कारणों को जानने की बजाए लीपापोती में अधिक विश्वास करती है। चाहे किसी भी घटना का इतिहास उठाकर देख लीजिए प्राथमिक स्तर पर सरकारी अमले की नाकामी ही दिखायी देती है। भट्ठा-पारसौल की घटना हो या फिर शीलू  बलात्कार कांड, सरकार पहले पहल घटना को छुपाने की ही कोशिश में लग रहती है। मीडिया, जनता और विपक्षी दलों कें हस्तक्षेप के बाद सरकार जाग पाती है।

मुख्मंत्री के मातहत बहनजी को उनके मातहत चाहे जो भी विकास और अपराध नियंत्रण की तस्वीर दिखा रहे हों लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश में गरीब, किसान और महिलाएं अत्यधिक दुःखी और प्रताडित हैं लेकिन सरकारी अमला कागजी कार्रवाई और फर्जी आंकड़ेबाजी में मशगूल है।


 स्वतंत्र पत्रकार  और उत्तर प्रदेश के राजनितिक -सामाजिक मसलों   के जानकार .







Jun 20, 2011

पड़ोस के लुटेरे

बासो और बासो जैसी कितनी हजारो की दास्तान सुनकर सवाल उठता है आखिर हमने कैसा सामाज बनाया है। अपने ही माँ, पड़ोस, भाई-बहन को लूट रहे हैं। बाहरी लूटेरों से तो लड़ सकते हैं-लेकिन अपने बनाये समाज से कैसे लड़गें...

दयामनी  बारला 

जिस माँ से आशीर्वाद  की उम्मीद में हम उनका चरण स्पर्श  करते हैं, धन की लोलूपता उसी माँ को लूटने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती है। ये हैं बासो देवी, विधवा माँ । घर है झारखण्ड के गुमला जिला के बसिया प्रखंड के पोकट गांव में। रहने के लिए छत  नहीं है। पड़ासियों ने अपने घर में पनाह  दिया है। देश के बाकि हिस्सों की तरह यहाँ भी बेघरों को इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत आवास दिया जाता  है। बासो देवी को भी सरकार की ओर से इंदिरा आवास स्वीकृत हुआ है और माकन बनाने के लिए उन्हें  45,000 रूपये भी सरकार की और से मिले हैं. 

बासो देवी : लूट में अपनों का हाथ
इन रुपयों में से  20,000  बसों देवी ने निकाला कि माकन बनाने का काम शुरू हो सके । 6 जून 2011 को पोकटा पंचायत में मनरेगा योजना में काम किये मजदूरों को मजदूरी का भूगतान नहीं किया गया , इस संबंध में मजदूरों की बैठक में बासो देवी ने हमें अपना दुखड़ा सुनाया कि कैसे माकन का सपना अधुरा रह गया और वह बेघर हालत मेंवह दूसरे के यहाँ शरण ली हुई हैं। उम्र इतना हो गया है कि अब बासो  बिना डंडा के खड़ी भी नहीं हो पाती हैं । एक तरफ उनमें माँ की ममता  छलकती है, तो दूसरी ओर सामाज द्वारा छल -कपट की शिकार पीड़ित वृद्ध  औरत का दर्द भी छलक रहा है।

कहती है-इंदिरा आवास बना थों-नवीण कहलक पत्थल-इंटा गिराय देबु पैसा दे (इंदिरा आवास के लिए नवीन ने कहा कि पैसा दो तो माकन के लिए ईंट-पत्थर गिरा दूंगा) । ९००० (नौ हजार) लेईगेलक आज तक न तो इंटा गिरायेल ना तो पत्थर । कई धर गेलों कहेकले-कि गिराय दे-कहते रहाई गेलक हां गिराय देबु-आईज तक कोनो नंखे (नौ हजार ले गया, लेकिन ईंट गिराया न पत्थर. कई बार कही भी तो आजकल करता रहा)। बासो आगे कहती हैं -अब हम मिटटी का ही दिवाल उठा रहे है। घर तो किसी तरह तैयार करना ही है -इसलिए कि दूसरों के घर में हुं।

बासो और बासो जैसी  कितनी हजारो की दास्तान सुनकर सवाल उठता है आखिर हमने कैसा सामाज बनाया है। अपने ही माँ, पड़ोस, भाई-बहन को लूट रहे हैं। बाहरी लूटेरों से तो लड़ सकते हैं-लेकिन अपने बनाये समाज से कैसे  लड़गें, शुरुआत कहां से हो-यह अपने समाज के भीतर और बाहर सबसे बड़ा सवाल  है। इस लड़ाई को आसानी से जीता जा सकता है-यदि सरकारी मशीनरी, प्रशासन इस लूट तंत्र को रोकने के प्रति कटिबद्व हो। साथ ही समाज को भी सोचना होगा की..क्या हम इसी  तरह के माहौल  में रहना चाहते हैं...




झारखण्ड की प्रमुख और सशक्त सामाजिक कार्यकर्त्ता. देश के विभिन्न जनांदोलनों से गहरा जुड़ाव. संघर्षों के बीच वह अपनी बात पहुँचाने के लिए लगातार लिखती रहती हैं. लोकतंत्र की सच्ची दास्तानगोई  दयामनी बारला के जरिये अब आपके बीच होगी.
  






Jun 19, 2011

मानवाधिकार उल्लंघन में सर्वोपरि होता पाकिस्तान

आतंकवादियों, कट्टरपंथी ताकतों, बाहुबलियों,पंचायतों द्वारा पाकिस्तान में सरेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन किया ही जा रहा है,अब सुरक्षाकर्मियों,सैनिकों,आईएसआई व रेंजर्स द्वारा भी उसी मानवता विरोधी नक्शेकदम पर चलने का प्रयास, आखिरकार पाकिस्तान को किस मोड़ पर ले जाएगा...

तनवीर जाफरी

स्वतंत्र इस्लामी राज्य के गठन की अवधारणा को लेकर 14 अगस्त 1947 को संयुक्त भारत से विभाजित होकर अस्तित्व में आया पाकिस्तान आज मूल इस्लामी सिद्धांतों व शिक्षाओं की भी धज्जियां उड़ाता दिखाई दे रहा है। कुरान शरीफ द्वारा निर्देशित इस्लामी शिक्षा साफतौर पर मुसलमानों को यह हिदायत देती है कि ‘किसी बेगुनाह के साथ कोई ज़्यादती हरगिज़ मत करो। और यदि तुमने किसी एक बेगुनाह का कत्ल किया तो गोया तुमने पूरी इंसानियत का कत्ल कर डाला’। परंतु मानवाधिकारों की रक्षा की बात ही क्या करनी पाकिस्तान तो आज उस इस्लाम के सिद्धांतों से भी दूर होता जा रहा है जिसके नाम पर इस भू-भाग को भारतवर्ष से अलग कराया गया था।

पाकिस्तान में इन दिनों रोज़मर्रा के हालात तो यही बता रहे हैं कि वहां तकरीबन रोज़ाना एक-दो नहीं बल्कि कई-कई बेगुनाह मारे जा रहे हैं। कभी कट्टरपंथी तालिबानी आतंकवादियों के हाथों, कभी किसी आत्मघाती हमले के द्वारा, कभी सेना के जवानों की गोलियों से तो कभी पुलिस या पाक रेंजर्स के हाथों। और कई रहस्यमयी हत्याओं की खबरें तो ऐसी भी सामने आ रही हैं जिनमें सीधेतौर पर आईएसआई तथा सेना की भी साजि़श होने का इल्ज़ाम है।

अभी पाकिस्तान के एक 40 वर्षीय पत्रकार को अपनी पत्रकारिता के दायित्वों का पालन करते हुए अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। इसी वर्ष  31 मई को सैय्यद सलीम शहज़ाद नामक यह पत्रकार सिर्फ इसलिए कत्ल कर दिया गया था क्योंकि उसने पाकिस्तान की नवसेना तथा अलकायदा के मध्य सांठगांठ होने के नापाक नेटवर्क का पर्दाफाश किया था। गौरतलब है कि सलीम शहज़ाद की हत्या के पीछे आईएसआई की साजि़श बताई जा रही है।



अभी इस घटना को बीते मात्र एक सप्ताह ही बीता था कि  9 जून को पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन की एक और सनसनीखेज़ घटना सामने आई। सरफराज़ नामक एक 19वर्षीय युवक जो कि कराची के बोट बेसिन क्षेत्र में स्थित बेनज़ीर भुट्टो पार्क में सैर कर रहा था उसे पाक रेंजर्स ने दबोच लिया। उसके पश्चात उसे पार्क से बाहर लाकर चारों ओर से 6-7 सशस्त्र रेंजर्स ने घेर लिया और सभी रेंजर्स ने उस निहत्थे युवक सरफराज़ पर बंदूक व पिस्टल तान ली। दहशत का मारा वह युवक अपनी जान की भीख मांगता हुआ उन रेंजर्स के समक्ष हाथ जोडक़र गिड़गिड़ाता रहा। परंतु उसके जवाब में ज़ालिम रेंजर्स ‘गोली मार दो’ व ‘इसे मार डालो’ जैसी दहशतनाक आवाज़ें बुलंद करते रहे। इतना ही नहीं एक रेंजर ने तो युवक के बाल पकडक़र कैमरे के समक्ष उसका मुंह भी साफतौर पर दिखाने की कोशिश की। और उसके बाद  पाक रेंजर्स ने भरी दोपहर में सार्वजनिक स्थल पर ही बिल्कुल करीब से गोली मार कर निहत्थे सरफराज़ को कत्ल कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो भी एक पत्रकार द्वारा बनाई गई। घटना के तुरंत बाद यह दहशतनाक वीडियो पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया के कई टीवी चैनल्स द्वारा प्रसारित कर दी गई। पूरी दुनिया ने मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाने वाली पाकिस्तान रेंजर्स की इस वहशियाना कार्रवाई को बड़ी हैरत से देखा। पाक रेंजर्स को इस मामले पर अपनी फज़ीहत होते देख अच्छा नहीं लगा। इनके गुर्गों द्वारा अब उस पत्रकार को भी धमकी दी गई है जिसने दिन-दहाड़े रेंजर्स द्वारा सरफराज़ के कत्ल की वीडियोग्राफी की थी। यानी  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने का फिर  घिनौना प्रयास।

हालाँकि पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी ने इस घटना पर स्वयं संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान रेंजर्स के निदेशक मेजर जनरल एजाज़ चौधरी तथा पुलिस महानिरीक्षक फय्याज़ लघारी को न सिर्फ बर्खास्त कर दिया है बल्कि महालेखाकार कार्यालय को यह निर्देश भी दिया कि इन अधिकारियों को उस समय तक कोई वेतन न दिया जाए जब तक अदालत अपना अगला आदेश जारी न करे। दोषी  रेंजर्स को घटना के अगले ही दिन गिरफ्तार कर पुलिस के हवाले कर दिया गया था। इस कत्ल को लेकर पाक रेंजर्स द्वारा अपने बचाव में यह कहा जा रहा है कि सरफराज़ डकैती जैसे जुर्म में शामिल था। जबकि उसके परिजनों का कहना है कि उनका लडक़ा बेगुनाह था तथा पार्क में सैर करने की गरज़ से गया हुआ था। उच्चतम न्यायालय ने इस बात की जांच के आदेश दिए हैं कि युवक सरफराज़ का कोई आपराधिक रिकॉर्ड था भी या नहीं।

इस घटना पर पाकिस्तान के कई जि़म्मेदार नेताओं द्वारा गहरी चिंता व दु:ख व्यक्त किया गया है। पाकिस्तान में तमाम जि़म्मेदार लोग यह महसूस कर रहे हैं कि चूंकि पाक रेंजर्स पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा केंद्र का एक अंग है तथा सीधे तौर पर यह गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं,इसलिए इतनी जि़म्मेदार सुरक्षा एजेंसी द्वारा दिन-दहाड़े एक निहत्थे युवक के साथ कातिलों के रूप में पेश आना पाकिस्तान की शासन व्यवस्था तथा सुरक्षातंत्र की कार्यप्रणाली पर सीधे तौर पर प्रश्रचिन्ह लगाते हैं। हालांकि पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने इस घटना के फौरन बाद ही घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए थे। परंतु प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी को पाकिस्तान व दुनिया के अन्य हिस्सों में  इस घटना को लेकर पाक रेंजर्स की हो रही निंदा व आलोचना अच्छी नहीं लगी। गिलानी ने साफतौर पर सदन में पाक रेंजर्स का यह कहकर बचाव किया कि ‘किसी एक घटना से समूचे संस्थान को बदनाम नहीं किया जा सकता’।

मानवाधिकार उल्लंघन की इस प्रकार की कोई सिर्फ एक या दो घटनाएं ही नहीं बल्कि  इसी वर्ष मई माह में पांच चेचेन नागरिकों को  सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान के क्वेटा के खरोताबाद क्षेत्र में दिन-दहाड़े मार डाला गया। इनमें तीन पुरुष व दो महिलाएं शामिल थीं। मारी गई एक महिला सात माह की गर्भवती भी थी जिसके शरीर में सुरक्षाबलों ने 12 गोलियां उतार दीं। इन निहत्थे चेचेन नागरिकों की हत्या के बाद जब सुरक्षा बलों के विरुद्ध हंगामा हुआ उस समय अपने पक्ष में सुरक्षा बलों द्वारा फिर यही तर्क दिया गया कि इनमें से तीन युवक संदिग्ध आत्मघाती हमलावर थे। 18 से लेकर 25 वर्ष आयु वर्ग के यह सभी नवयुवक संदिग्ध आतंकी होने के कथित संदेह पर सरेआम मार दिए गए।

हालांकि उनके कब्ज़े से किसी प्रकार के कोई हथियार भी बरामद नहीं हुए। जबकि सुरक्षा कर्मियों पर आरोप यह लगाया गया कि पाक सुरक्षा कर्मी एक चेचेन महिला के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती कर उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाह रहे थे।  ऐसे में सवाल यह उठता है की   आत्मघाती हमलावरों,आतंकवादियों, कट्टरपंथी ताकतों, बाहुबलियों,पंचायतों द्वारा पाकिस्तान में सरेआम मानवाधिकारों का  उल्लंघन किया ही जा रहा है,अब सुरक्षाकर्मियों,सैनिकों,आईएसआई व रेंजर्स द्वारा भी उसी मानवता विरोधी नक्शेकदम पर चलने का प्रयास, आखिरकार पाकिस्तान को किस मोड़ पर ले जाएगा ।



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.




गरीबों का आवास व्यापारियों - पत्रकारों के नाम



जनज्वार टीम. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में कांशीराम शहरी गरीब आवासीय योजना के तहत निम्नीपार और हरदौली घाट मोहल्ला स्थित कुल 1500 आवास निरीह , असहाय और निराश्रित बी0पी0एल0 कार्ड धारको के लिये बनाये गये थे। कार्यदायी संस्था लोक निर्माण विभाग, जिला विकास अभिकरण ने बिल्डिंग निर्माण का काम झांसी की फर्म मेसर्स ओम शांति बिल्डर्स को दिया था तथा जिला विकास अभिकरण के सहायक अभियंता हरगोविन्द और अवर अभियंता अखिलेश कुमार ने पूरे निर्माण कार्य का मेजरमेंट विगत 14 मई 2009 को किया था।
बान्दा में बन रहा गरीबों का आवास : कब्ज़ा अमीरों का

गौरतलब है कि 23 फरवरी 2011 को मुख्यमंत्री उ0प्र0 मायावती जी द्वारा कांशीराम आवास योजना का लावलश्कर के साथ शिलान्यास यह कहते हुये किया गया कि बुंदेलखंड में अब कोई गरीब सड़को पर नही सोयेगा। बीते 26 मई को मुख्य सचिव अनूप मिश्रा ने भी कांशीराम आवास योजना का मौके पर जाकर मुआयना किया और नजर आयी खामियों को संम्बंधितअधिकारियों से दूर करने को कहा गया।

डूडा विभाग के एपीओ पवन शर्मा और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शारदा यादव ने अपने परिवारिक रिश्तेदारो के साथ साथ जनपद के दबंग, सरकारी कर्मचारी , व्यापारी और कुछ तथाकथित पत्रकारों के साथ लाईसेस बंदूकधारी व्यक्तियों केा भी बी0पी0एल लोगो के आवास आवंटित कर दिये। साथ ही जिन लोगो को बी.पी.एल कार्ड मे आवास दिये गये उनसे 30000 से 40000 तक की अवैध धन उगाही की गयी। इसके साथ ही इन आवासों  में चालीस प्रतिशत एक जाति विशेष को भी आवास आंवटित किये गये।

सामाजिक कार्यकर्ता एवं सूचनाधिकार एक्टिविस्ट आशीष सागर ने कई मर्तबा सम्बंधित अधिकारियों  से इस बात की लिखित और मौखिक शिकायते की लेकिन वह सब नक्कारखाने में तूती ही बनकर रह गयी। इधर बीते 16.06.2011 को हरदौली घाट के आवासों में एक मंजिला इमारत के बिना आंधी पानी  गिर जाने से कालीचरण 35 निवासी कोहारा बिसंडा और कंधी निवासी अमलाहट , अजयगढ़ अपने बच्चों समेत गंभीर रूप से घायल हो गये है साथ ही बीते दो दिनो से जनपद मे आवंटनो मे की गयी धांधली को लेकर कुछ  गरीबो  द्वारा आमरण अनशन शुरू कर दिया गया है।

अनशन में बैठे लच्छू रैदास, सावित्री, सुनीता रैकवार , रामप्यारी, रामरती, सरोज तिवारी, सुमन वर्मा , लखन रैकवार और तुलसी ने इस भ्रष्टाचार के खुलासे की मांग की है। वहीं भारतीय यग मैन के संपादक बाल कृष्ण पांडेय , चित्रकूट टाइम्स के संपादक राजेश पांडेय सहित दैनिक जागरण के पूर्व ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार बिनोद मिश्रा तक के नाम 2 से 3 कालौनियां आवंटित की गयी है।

  • बीपीएल आवास  200 से 300 बीघा के कास्तकारों को बांटे गये गरीबों के आशियाने
  • बीस करोड़ की लागत वाले 1500 आवासों में 940 की खुलने लगी पोल
  • जिला शहरी विकास अधिकरण (डूडा) ने नही दी आरटीआई की सूचना

डूडा विभाग के शारदा यादव की पत्नी के नाम भी तीन कालौनियां आंवटित है यह तो भ्रष्टाचार में की गयी धांधली की एक नजीर बस है। जब कि एपीओ डूडा ने तीस दिवस बीत जाने के बाद भी जन सूचना अधिकार मे मांगी गयी जानकारी उपलब्ध नही करायी है जिसकी प्रथम अपील जिलाधिकारी बांदा को आशीष सागर ने की है। वैसे तो इस मुदद्े को लेकर तमाम राजनीतिक दलो में हलचल शुरू हो गयी है और हो भी क्यों नही आखिर प्रकरण बी0पी0एल0 वोट बैंक का है और बुन्देलखण्ड में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी का मिशन भी विधान सभा चुनाव 2012 को फतह करना है। भ्रष्टाचार के पाटे में तो पूरा देश ही जल रहा है लेकिन बुन्देलखण्ड की कमोवेश स्थिति और भी ज्यादा भी गम्भीर हो रही है। मसलन गरीब लोगो के आवास भी अब अमीरजादो की ऐशगाह बन गये है।



शिक्षा के व्यावसायीकरण पर गोष्ठी

लखनऊ . ‘शिक्षा के व्यावसायीकरण  के प्रभाव’ विषय पर बीते 14 जुलाई को लखनऊ के बली प्रेक्षागृह में रीगल मावन सृजन संस्थान की ओर से सेमिनार का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता शिक्षाविद अरुणेश मिश्र ने की तथा संचालन किया संस्थान की महासचिव मंजू शुक्ला ने।

इस मौके पर बोलते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि शिक्षा का जिस तरह से बाजारीकरण हुआ है, उससे न सिर्फ शिक्षा की गुणवता प्रभावित हुई है बल्कि शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है। शिक्षा की सर्वग्राहिता ही समाप्त होती जा रही है। मौजूदा समय में शिक्षा एक खास वर्ग की जागीर बनती जा रही है। निजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है, जहाँ न तो फीस का मानक तय है और न ही शिक्षण कार्य का। अच्छे स्कूल का मानक लम्बी फीस है। इसकी वजह से समाज का बड़ा हिस्सा शिक्षा से दूर होता जा रहा है। शिक्षा माफिया पैदा हो गये हैं जिनका मकसद मात्र धन उपार्जन है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन ने कहा कि आजादी के बाद से शिक्षा पर किसी ने घ्यान नहीं दिया। देश का निर्माण तभी संभव है जब सर्वग्राही स्कूलिंग की व्यवस्था की जाती और कारगर योजना बनाई जाती। 1952 में डॉ0 राममनोहर लोहिया ने इस ओर इशारा किया था और कहा था कि जो आजादी हमें मिली है, वह विखण्डित है। अब तो हर चीज के लिए हम अमरीका के मुखापेक्षी हो चुके हैं। मैकडोनल्ड की संस्कृति चारो तरफ फैल रही है, शिक्षा के क्षेत्र में भी इसने हाथ-पैर फैला दिये हैं।

कवि और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में नागरिको को शिक्षा और चिकित्सा प्रदान करना राज्य की जिम्मेदारी है। आजादी के बाद हमारे यहाँ कल्याणकारी राज्य की घोषणा हुई और इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाये गये जो जरूरत को देखते हुए अपर्याप्त थे। पर आज तो वैश्वीकरण के इस दौर में उससे भी सरकार ने अपना हाथ खींच लिया है।

शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मानव संस्कृति के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को अमीरों व धन्नासेठों के हवाले कर दिया गया है। तथ्य तो यह है कि हमारी सरकार का रक्षा बजट दिन.दिन बढ़ता जा रहा है, वहीं शिक्षा व स्वास्थ्य पर बजट घटता जा रहा है। इन क्षेत्रों का सेवा, ज्ञान व संस्कृति के संवर्द्धन की जगह व्यवसाय में बदल जाना सरकार की उन अमीर परस्त. साम्राज्यपरस्त नीतियों की देन है। इसीलिए शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरोध का मतलब इन नीतियों के विरुद्ध संघर्ष है। इस संदर्भ में रीगल मानव सृजन संस्थान का संघर्ष महत्वपूर्ण है। ऐसे संघर्ष को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

सेमिनार को एसके पाण्डेय, विश्वकांत मिश्रा, एससी यादव आदि शिक्षाविदों ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर रीगल मानव सृजन संस्थान के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया। यह संस्थान का चौथा वार्षिकोत्सव भी था। बच्चों ने ‘हम होंगे कामयाब’ पेश कर यह संदेश दिया कि संघर्ष और आशाएँ कभी खत्म नहीं होती हैं। मानव के अन्दर सृजन की अकूत संभावनाएँ हैं जिन्हें समझने और आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस संदर्भ में संस्थान का चार साल का यह सफर मील के पत्थर की तरह है। विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजयी बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन सुधा राजपूत ने किया और अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन संस्थान की महासचिव मंजू शुक्ला ने दिया।