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Jun 22, 2011

सच के साहस का संपादकीय


अरिंदम के  एक या दो लेखों  में ऐसा होता तो इसे इत्तेफाक कहकर छुटकारा मिल जाता, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. वे लगातार ऐसे मुद्दों पर लिख रहे है,जिन्हें लिखने पर भारत में आप सहज ही सरकार-संविधान-राष्ट्र विरोधी घोषित किये जा सकते हैं...

विष्णु शर्मा 

ताज्जुब है कि इतनी तीखी और सच्ची बात लिखने पर भी सरकार अरिंदम चौधुरी को अब तक बर्दाश्त  कैसे कर रही है? प्रोफेसर चौधुरी, जो प्लानमैन ग्रुप ऑफ कम्प्नीज  के संस्थापक  और दी सन्डे इंडियन के प्रधान संपादक हैं,को क्यों सरकार माओवादी कहकर किसी कुख्यात दफा में  आजीवन कारावास नहीं दे देती! वे उन चंद उद्योगपतियों (शायद वे अकेले ही है) में  से हैं, जिन पर लक्ष्मी का वाहन उल्लू की पुरानी भारतीय कहावत असर नहीं करती. उनके लेखों,खासकर दी सन्डे इंडियन के सम्पादकीय में, भारतीय जनमानस की भावना को लगातार स्थान मिलता है.

वे उन विचारों को व्यक्त करने में भी नहीं झिझकते, जिनके बारे में लिखने की कल्पना बहुत से जनपक्षधर लेखक कर तो सकते है, लेकिन लिखने का साहस नहीं जुटा पाते. उन्हें पढ़ते  हुए आश्चर्य होता है कि एक उद्योगपति जिसका दिल्ली के सीआर पार्क जैसे पाश इलाके में आलीशान मकान  हो, जिसके सामने ढेरों गार्ड पहरेदारी करते हों , वह आम जनता के सरोकार को इतनी संवेदनशीलता से कैसे रख सकता है.

यदि अरिंदम के  एक या दो लेखों  में  ऐसा होता तो इसे इत्तेफाक कह कर छुटकारा मिल जाता, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. वे लगातार ऐसे मुद्दों पर लिख रहे है जिन्हें लिखने पर भारत में आप सहज ही सरकार-संविधान-राष्ट्र विरोधी घोषित किये जा सकते हैं! और यदि आप इस तरह के लेखों का व्यापक प्रसार किसी भारतीय भाषा में  करते हैं  तो जेल जाना आपकी नियति है. अरिंदम चौधुरी तो एक कदम आगे बढ़ कर भारत की चौदह भाषाओं में  एक साथ इस तरह के लेखों को प्रकाशित करते है, बढ़ावा देते है! 

मार्च 2011 में  अरिंदम चौधुरी ने राजद्रोह कानून पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए लिखा ‘यह बड़े शर्म की बात है कि आज भी हम औपनिवेशिक अतीत और उस दौर के पक्षपाती कानूनों के चंगुल से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए हैं,जिनका मकसद लोगों को सरकार चलाने वाले चुनिंदा लोगों के तलवे चाटने पर मजबूर करना है.’  पेशे से अर्थशास्त्री कहलाना  पसंद करने वाले प्रोफेसर चौधुरी सार्वजनिक जीवन में  सरकार की हिस्सेदारी को जरुरी मानते है.वे अंधाधुन्ध निजीकरण के खिलाफ हैं,   जिसका मकसद मुठ्ठी भर लोगों को असीमित संसाधनों का मालिक बना देना है.

11 मार्च 2011 के अपने लेख मे वे लिखते है ‘हम अजीबो-गरीब अर्थव्यवस्था हैं, जहां अरबपतियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है,जबकि हमारे पास अरब डॉलर वाला शायद ही कोई वैश्विक उत्पाद है. ऐसी अजीब,गूढ़ और अद्भुत बात- जहां बगैर किसी वैश्विक उत्पाद के ही अरबों बनाए जा रहे हों- यह केवल भारत में ही संभव है.’

भूमि अधिग्रहण के सवाल पर उनका मानना है कि ‘भारत में जमीन खरीदने वाला कानून 110 साल से भी अधिक पुराना है (भूमि अधिग्रहण कानून-1894). हालांकि इस कानून में कई बार संशोधन हुए, लेकिन संशोधनों ने सरकार की जमीन हथियाने की ताकत में और इजाफा ही किया.’और ‘राजनेताओं से लेकर नौकरशाह और उद्यमी तक, सभी की निगाहें विभिन्न विकास योजनाओं पर लगी रहती हैं,ताकि मौके की जमीन का एक टुकड़ा हथियाया जा सके.’

अरिंदम माओवादी आन्दोलन को बिना समझे आतंकवाद कहकर नकार  देने के खिलाफ है. 16 मई 2010 की सम्पादकीय  ‘हमारी सरकारों ने मानवता के खिलाफ माओवादियों से अधिक आतंकवाद मचा रखा है’ मे उन्होंने लिखा ‘जब भारत और भारतीय मीडिया फोर्ब्स सूची में अरबपतियों की बढ़ती संख्या का जश्न मनाती है, तब ये गरीबी और भूख की वजह से अनजाने और अनसुने ही दम तोड़ रहे होते हैं. इस धारणा के उलट सरकार जिन माओवादियों को आतंकवादी बनाना चाहती है,वे गरीब परिवारों से आते हैं,जिन्हें हाशिए पर धकेल कर भूखे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. दुनियाभर में जब नेता इस तरह से बड़ी संख्या में लोगों को हाशिए पर डाल देते हैं तो वहां क्रांतियां जन्म लेती हैं.’

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद जब सभी मीडिया घराने वाम पार्टियों की हार को वाम दर्शन की हार के रूप मे प्रस्तुत कर रहे थे, तब अपने सम्पादकीय में उन्होंने बड़े सीधे तर्कों के साथ सीपीएम की हार के कारणों पर लिखा -‘यह बंगाल में मार्क्सवाद के सात दुष्कर्म का अंत है’. उन्होंने आगे लिखा‘मार्क्सवाद के नाम पर जो कुछ भी किया गया,वह सब गैर मार्क्सवादी था, और मार्क्सवाद विचारधारा के केंद्र में रहने वाले गरीबों को ही सबसे अधिक आतंकित किया गया.उन्हीं का सबसे अधिक शोषण हुआ.’

अरिंदम : सच का साहस
अरिंदम मानते है कि सीपीएम ने अपने कुख्यात शासन के शुरुआती दस सालों में पूरी ईमानदारी के साथ काम किया, लेकिन वह बाद में ‘स्तालिनवादी’सोच का शिकार होकर जनविरोधी बन गई. अभी हाल में बाबा रामदेव के  भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन  पर हुए सरकारी जुल्म पर जिस प्रकार से उन्होंने लिखा है वह उनकी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता  को व्यक्त करता है.

‘चापलूसों की तानाशाही’शीर्षक अपनी सम्पादकीय मे उन्होंने लिखा है,‘रामलीला मैदान पर हुआ आधुनिक जालियांवाला बाग कांड, केंद्र सरकार के दानवी रवैये, विपक्ष की कमजोर रीढ़ और भारत के प्रति मीडिया के पाखंड का दर्शन कराता है!मेरा सवाल यह है कि हम किसी लोकतंत्र में रह रहे हैं या फिर गलती न मानने वाले तानाशाही शासन में? क्या सरकार नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. या फिर वे मानते हैं कि देश के लोग मूर्ख हैं और वे चुपचाप इस तरह की तानाशाही स्वीकार कर लेंगे तथा 2014में एक बार फिर उन्हें वोट देकर सत्ता में वापस ले आएंगे?’

भारत के बड़े मीडिया संस्थानों में शायद दी सन्डे इंडियन ही एक मात्र पत्रिका है,जिसने इतने कड़े शब्दों मे रामलीला में  सरकारी आतंक की निंदा की हो. बीजेपी के पूर्व अध्धक्ष लाल कृष्ण आडवाणी  1975-1977की भारतीय आपातकाल का हवाला देते हुए अक्सर कहते हैं  कि ‘उस वक्त पत्रकारों को झुकने का आदेश मिला तो वो रेंगने लगेंगे.’

लेकिन आज जबकि औपचारिक तौर पर आपातकाल नहीं है,ऐसे में  सरकार की तानाशाही को बिना सवाल किये स्वीकार करना लोकतंत्र में अक्षम्य है. ऐसे में अरिंदम चौधुरी की गिनती उन संपादकों में हैं जो अपने वर्ग की सीमा को तोड़ने का प्रयास करते है और लोकतंत्र पर विश्वास रखते हुए ‘लीक’ से हटकर सोच सकते है.



Mar 13, 2011

जनता की फिक्र करे मीडिया

 
मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है.ऐसी स्थिति में जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए...


शनिवार की ढलती गुनगुनी दोपहर के बाद दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम का माहौल तल्ख था. देश के दिग्गज पत्रकारों ने मीडिया की वर्तमान भूमिका को जायज भी ठहराया तो उसकी खामियों को इंगित करते हुए आत्ममंथन की जरूरत भी बतायी.मौका था प्लानमैन मीडिया समूह की समाचार पत्रिका द संडे इंडियन और टाइम्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित “जनवाणी से जनता की वाणी” विषयक सेमिनार का.

दरअसल ठीक 25साल पहले सरकार नियंत्रित भारतीय दूरदर्शन पर शुरु हुआ था एक कार्यक्रम जनवाणी,जिसके माध्यम से पहली बार भारत में दर्शकों के राजनीतिज्ञों से सीधे सवाल पूछने का मौका मिला. उसके बाद सरकार की ओपन स्काई पॉलिसी आयी और शुरु हुआ निजी समाचार चैनलों का आगमन. और आज 25 साल बाद भारतीय आकाश में 600 से ज्यादा चैनल हैं, जो हर रोज सवाल पूछ रहें हैं. तो क्या 25 सालों में जनवाणी से शुरु हुए इस सफर में आज के चैनल जनता की वाणी बन गये हैं. या कहीं वे उच्छृंखल तो नहीं हो गये. ऐसे ही मौजूं सवालों पर आयोजित था यह विशेष राष्ट्रीय सेमिनार. जिसका उद्घाटन वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने किया.


बाएं से द संडे इंडियन के संपादक अरिंदम  चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला और
दीप प्रज्वलित करते  आज समाज के समूह संपादक राहुल देव

खचाखच भरे कमानी सभागार में आयोजित इस ऐतिहासिक सेमिनार का विषय प्रवर्तन  करते हुए द संडे इंडियन के प्रधान संपादक व मैनेजमेंट गुरु प्रो. अरिंदम चौधरी ने सवाल उठाया कि क्या वास्तव में आज की मीडिया जनता की आवाज है?उन्होंने कहा कि 25साल पहले देश में निजी समाचार चैनल नहीं थे, उस समय पहली बार दूरदर्शन पर “जनवाणी” कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें केंद्रीय मंत्री जनता के सवालों से रूबरू होते थे.

आज सैकड़ों की तादाद में समाचार चैनल और अखबार हैं,क्या वास्तव में हम जनता की आवाज उठाते हैं. श्री चौधरी ने कहा कि यह आत्ममंथन की घड़ी है, और जब हम अपने भीतर झांकते हैं तो पाते हैं कि वास्तव में हम अपनी दिशा भूल गये हैं. “जनवाणी” भले ही सरकार द्वारा आयोजित अपने प्रचार का माध्यम रहा, लेकिन उसने भारतीय मीडिया को एक नयी अवधारणा दी. उन्होंने कहा कि अब हमें अपनी दिशा तय करनी होगी और देश के आम लोगों की फिक्र करनी होगी,मीडिया में जनसरोकार वाले मुददों को प्रमुखता देनी होगी वरना हम यूं ही हाय-तौबा मचाते रहेंगे और अपने दायित्वों से मुंह छुपाते रहेंगे.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय निदेशक प्रभु चावला ने कहा कि आज हम जनता की आवाज नहीं उठाते, ये सही है. हम अपनी दिशा भूल गये हैं, यह भी सही है लेकिन मीडिया ही है, जिसने देश को,देश के लोकतंत्र को बचा कर रखा है.हमें अपनी खामियों को दुरुस्त करना होगा.बाजार के ताकतवर होने से हमारी नैतिकता कमजोर हुई है.

हमें अपनी साख को बरकरार रखते हुए जनोन्मुख होना होगा. “जनवाणी” की नियत अच्छी नहीं थी, लेकिन प्रयास बेहतर था. लेकिन हमें अच्छी नीयत के साथ अच्छे प्रयास करने होंगे.उन्होंने कहा कि यह सेमिनार इस मामले में सभी सेमिनारों से इतर है कि यहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया के सभी दिग्गज मौजूद हैं,ऐसी उपस्थिति तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आयोजित संपादकों की बैठक में भी नहीं थी.

सेमिनार की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने की.सेमिनार में दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई,आज समाज के समूह संपादक राहुल देव,अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय,आईबीएन 7के प्रबंध संपादक आशुतोष,दूरदर्शन के पूर्व डीडीजी एमपी लेले,टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन चंद्र पांडे,जी न्यूज के प्रसिद्ध एंकर व वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी,साधना न्यूज चैनल के प्रमुख व ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसियेशन के महासचिव एन के सिंह,इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली,एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल,न्यूज एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार,वरिष्ठ लेखक व चैनल पी 7के प्रोग्रामिंग हेड शरद दत्त,दूरदर्शन के पूर्व चीफ प्रोड्यूसर कुबेर दत्त और लेखिका व मीडिया समीक्षक वर्तिका नंदा भी मौजूद थीं.


पत्रकार और कवि लीलाधर मंडलोई : जनवाणी के पचीस वर्ष पुरे 

अतिथियों का स्वागत करते हुए प्लानमैन मीडिया के प्रबंध संपादक सुतनु गुरु ने कहा कि मीडिया जनता के लिए होती है और वह जनता प्रति जवाबदेह है और वह अपनी जवाबदेही से नहीं मुकर  सकती. वरिष्ठ   पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत में मीडिया अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है. अब इसके साख को बचाने का समय है. किसी लोकतंत्र में मीडिया इतनी मजबूर नहीं होनी चाहिए कि वह बाजार के सामने घुटने टेक दे.इस प्रवृति से बाहर आने की दिशा में कदम उठाने का समय है.

आईबीएन 7 के प्रबंध संपादक आशुतोष ने कहा कि हिंदुस्तान बदल रहा है, इस बदलाव के दौर में मीडिया भी बदल रही है लेकिन यह बदलाव सकारात्मक है.इस पर आंसू बहाने की जरुरत नहीं है. ये बात सच है कि 2004-05 और 2009 में मीडिया के कृत्यों से इसके साख पर बट्टा जरूर लगा. लेकिन इसने फिर खुद को संभाल लिया.दुनिया के जिस कोने में मीडिया स्वतंत्र है वहां मिस्र जैसे हालात पैदा नहीं हो सकते.  मीडिया ही है जिसने भारतीय समाज के मनोबल को ऊंचा रखा है.

आज समाज के समूह संपादक राहुल देव ने कहा कि मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है.ऐसी स्थिति में इससे ज्यादा उम्मीद की कल्पना कैसे की जा सकती है. सबसे पहली जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए, हालांकि यह दुरुह कार्य है. लेकिन उम्मीदें बाकी हैं.

अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय ने कहा कि भारतीय मीडिया अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करती, संतुलित है, लेकिन यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या नहीं, इस पर नये सिरे से मंथन करना होगा. मीडिया की जनपक्षधरता पर हमेशा से सवाल उठाये जाते रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है लेकिन यह भी सही है कि इन सारी चुनौतियों के बीच मीडिया जनता की आवाज को एक मंच जरुर देती है.

वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि आज मीडिया नफा-नुकसान के गणित को ध्यान में रख कर अपनी दिशा तय कर रही है.इसके लिए मीडिया को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता,पूरी व्यवस्था ही जिम्मेदार है. नैतिकता कहने की चीज हो गई है अपनाने की नहीं. वास्तव में वैकल्पिक बहस ही बंद हो गई है.

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज के चैनल हेड एन के सिंह ने कहा कि जहां ज्यादा पैसा है वहीं टैम मीटर लगे हैं और वही समाचार चैनलों की दिशा तय करते हैं. जब तक टीआरपी के झमेले से चैनल मुक्त नहीं होंगे.जनपक्षधरता हाशिये पर रहेगी. उन्होंने कहा कि जहां तक कंटेंट का सवाल है, तो दो वर्षों में भारतीय मीडिया के कंटेंट का स्तर काफी बेहतर होगा, इसका विश्वास दिलाता हूं.

इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली ने कहा कि देश मीडिया पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है. देश की जनता जागरूक है.एनडीए की फील गुड और शाइनिंग इंडिया को नकार कर अयोध्या मामले के फैसले के दिन देश में अमन रख कर जनता ने अपने जागरुक होने का सबूत दे दिया है.इस उपलब्धि में मीडिया का कोई रोल नहीं था.अब समय आ गया है कि मीडिया अपने साख और दायित्व तय करे.

एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल ने कहा कि अब खबरिया चैनलों को अपने कंटेंट पर ध्यान देना होगा,नहीं तो देश की जनता उन्हें नकार देगी और इसके साथ ही वे अपनी साख बरकरार नहीं रख पाएंगे.बाजार के दबाव और अपनी नैतिकता के बीच का कोई रास्ता निकालना होगा.

वरिष्ठ पत्रकार जफर आगा ने कहा कि वर्तमान दौर में टीआरपी ने समाचार चैनलों की दिशा तय कर दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता अब बेमतलब की चीज हो गई है.

मंच संचालन द संडे इंडियन हिंदी व भोजपुरी संस्करण के कार्यकारी संपादक तथा ब्रॉडकास्टर्स क्लब ऑफ इंडिया के कार्यकारी अध्यक्ष ओंकारेश्वर पांडेय ने किया.सेमिनार के समापन से पहले प्रो. अरिंदम चौधरी ने पूरी चर्चा का सार संक्षेप रखा और इस ऐतिहासिक आयोजन में सहभागी बनने के लिए टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन पांडेय तथा सेमिनार में आये मीडिया के दिग्गजों का आभार व्यक्त किया. आखिर में प्रो. अरिंदम चौधरी और श्री पूरन पांडेय ने सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर उन्हें सम्मानित किया.