Apr 13, 2017

मूर्ति आंबेडकर की और नारे जय श्रीराम के

 कहीं दूध पी रहे आंबेडकर तो कहीं हो रहा आंबेडकर यज्ञ, महिलाएं सिर पर कलश लेकर पूज रहीं आंबेडकर को

भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते हैं। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुई है....
भंवर मेघवंशी 

जयपुर में आज 13 अप्रैल को अम्बेडकर के नाम पर "भक्ति संध्या" होगी। दो केंद्रीय मंत्री इस अम्बेडकर विरोधी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे। अम्बेडकर जैसा तर्कवादी और भक्तिभाव जैसी मूर्खता! इससे ज्यादा बेहूदा क्या बात होगी?

भीलवाड़ा में बाबा साहब की जीवनभर विरोधी रही कांग्रेस पार्टी का एस.सी. डिपार्टमेंट दूसरी मूर्खता करेगा। 126 किलो दूध से बाबा साहब की प्रतिमा का अभिषेक किया जायेगा। अभिषेक होगा तो पंडित भी आएंगे, मंत्रोच्चार होगा, गाय के गोबर, दूध, दही, मूत्र आदि का पंचामृत भी अभिषेक में काम में लिया ही जायेगा। अछूत अम्बेडकर कल भीलवाड़ा में पवित्र हो जायेंगे!

तीसरी वाहियात हरकत रायपुर में होगी 5100 कलश की यात्रा निकाली जाएगी। जिस औरत को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब ने मंत्री पद खोया, उस औरत के सर पर कलश, घर घर से एक एक नारियल लाया जाएगा। कलश का पानी और नारियल आंबेडकर की प्रतिमा पर चढ़ाये जायेंगे। हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जायेंगे। जिस अम्बेडकर के समाज को आज भी नरेगा, आंगनवाड़ी और मिड डे मील का मटका छूने की आज़ादी नहीं है, उनके नाम पर कलश यात्रा! बेहद दुखद! निंदनीय!

एक और जगह से बाबा साहब की जयंती की पूर्व संध्या पर भजन सत्संग किये जाने की खबर आयी है। एक शहर में लड्डुओं का भोग भगवान आंबेडकर को लगाया जायेगा।

बाबा साहब के अनुयायी जातियों के महाकुम्भ कर रहे हैं, सामूहिक भोज कर रहे हैं, जिनके कार्डों पर गणेशाय नमः और जय भीम साथ साथ शोभायमान है। भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते हैं। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुई है।

बड़े बड़े अम्बेडकरवादी हाथों में तरह तरह की अंगूठियां फसाये हुए हैं,गले में पितर भैरू देवत भोमियाजी लटके पड़े हैं और हाथ कलवों के जलवों से गुलज़ार है, फिर भी ये सब अम्बेडकरवादी हैं।

राजस्थान में बाबा साहब की मूर्तियां दलित विरोधी बाबा रामदेव से चंदा लेकर डोनेट की जा रही हैं। इन मूर्तियों को देख़ कर ही उबकाई आती है। कहीं डॉ आंबेडकर को किसी मारवाड़ी लाला की शक्ल दे दी गयी है, कहीं हाथ नीचे लटका हुआ है तो कहीं अंगुली "सबका मालिक एक है " की भाव भंगिमा लिए हुए है।

ये बाबा साहब है या साई बाबा? मत लगाओ मूर्ति अगर पैसा नहीं है या समझ नहीं है तो।

कहीं कहीं तो जमीन हड़पने के लिए सबसे गंदी जगह पर बाबा साहब की घटिया सी मूर्ति रातों रात लगा दी जा रही है।

बाबा साहब की मूर्तियां बन रही हैं, लग रही हैं, जल्दी ही मंदिर बन जायेंगे, पूजा होगी, घंटे घड़ियाल बजेंगे, भक्तिभाव से अम्बेडकर के भजन गाये जायेंगे। भीम चालीसा रच दी गयी है, जपते रहियेगा।

गुलामी का नया दौर शुरू हो चुका है। जिन जिन चीजों के बाबा साहब सख्त खिलाफ थे, वो सारे पाखण्ड किये जा रहे। बाबा साहब को अवतार कहा जा रहा है। भगवान बताया जा रहा है। यहाँ तक कि उन्हें ब्रह्मा—विष्णु—महेश कहा जा रहा है। 

हम सब जानते है कि डॉ अम्बेडकर गौरी, गणपति, राम कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भय, भाग्य, भगवान् तथा आत्मा व परमात्मा जैसी चीजों के सख्त खिलाफ थे।

वे व्यक्ति पूजा और भक्ति भाव के विरोधी थे। उन्होने इन कथित महात्माओं का भी विरोध किया, उन्होंने कहा इन महात्माओं ने अछूतों की धूल ही उड़ाई है।

पर आज हम क्या कर रहे है बाबा साहब के नाम पर? जो कर रहे हैं वह बेहद शर्मनाक है, इससे डॉ अम्बेडकर और हमारे महापुरुषों एवं महान स्त्रियों का कारवां हजार साल पीछे चला जायेगा। इसे रोकिये। 

बाबा साहब का केवल गुणगान और मूर्तिपूजा मत कीजिये। उनके विचारों को दरकिनार करके उन्हें भगवान मत बनाइये। बाबा साहब की हत्या मत कीजिये। आप गुलाम रहना चाहते हैं, बेशक रहिये,भारत का संविधान आपको यह आज़ादी देता है, पर डॉ अम्बेडकर को प्रदूषित मत कीजिये।

आपका रास्ता लोकतंत्र और संविधान को खा जायेगा। फिर भेदभाव हो, जूते पड़े, आपकी महिलाएं बेइज्जत की जायें और आरक्षण खत्म हो जाये तो किसी को दोष मत दीजिये।

इन बेहूदा मूर्तियों और अपने वाहियात अम्बेडकरवाद के समक्ष सर फोड़ते रहिये। रोते रहिये और हज़ारों साल की गुलामी के रास्ते पर जाने के लिए अपनी नस्लों को धकेल दीजिये। गुलामों से इसके अलावा कोई और अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है।

जो बाबा साहब के सच्चे मिशनरी साथी है और इस साजिश और संभावित खतरे को समझते हैं, वो बाबा साहब के दैवीकरण और ब्राह्मणीकरण का पुरजोर विरोध करें। मनुवाद के इस स्वरुप का खुल कर विरोध करें अम्बेडकरवाद में भक्तिभाव  के लिए कोई जगह नहीं है ।

(भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

Apr 12, 2017

दलित लड़कियों का किया घर में घुसकर बलात्कार, 30 घंटे बाद दर्ज हुआ मुकदमा

ख़ामोशी तोड़ो दलितो, यह चुप्पी भयानक है...

आखिर राजस्थान में दो दलित छात्राओं से बलात्कार व आत्महत्या की नृशंस घटना पर इस देश में कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली.... 

भंवर मेघवंशी


राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना क्षेत्र के भगेगा गाँव के एक दलित बलाई परिवार की बीए प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली दो सगी बहनों के साथ तीन सवर्ण युवाओं बजरंग सिंह, पिंकू सिंह और एक अन्य ने घर में घुसकर  बलात्कार किया। बजरंग सिंह और पिंकू सिंह जहां जाति के राजपूत हैं, वहीं तीसरा बलात्कारी ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता है।

पुलिस कर रही मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार

पीड़िताओं के छोटे भाई के आ जाने के बाद बलात्कारी घटनास्थल से भाग गए। 17 व 18 साल की इन दोनों दलित छात्राओं ने घटना के एक घंटे के बाद पास के रेलवे लाइन पर रेवाड़ी से फुलैया जाने वाली ट्रेन के सामने दिन में 11:30 बजे कूदकर जान दे दी। इस मामले में पुलिस अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। नीमथाना के डीवाईएसपी कुशाल सिंह का कहना है कि पुलिस आरोपियों को तब तक गिरफ्तार नहीं करेगी, जब तक पीड़िताओं की मेडिकल रिपोर्ट जयपुर से आ नहीं जाती।

ये दर्दनाक और शर्मनाक घटना 5 अप्रैल, 2017 को दिन में 11 बजे घटी। घर में उस वक्त इन दो बहनों के अलावा कोई नहीं था। बड़ी बहन एमए की परीक्षा देने शहर गई थी, जबकि मां खेती के काम से बाहर गई थी और पिता लालचंद वर्मा भट्टे पर मजदूरी करने। छोटा भाई भी घर पर नहीं था।

सामाजिक कार्यकर्ता और एनएपीएम से जुड़े कैलाश मीणा के मुताबिक बड़ी जोर—जबर्दस्ती और प्रयासों के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ वारदात के लगभग 30 घंटे बाद 6 अप्रैल की शाम 5 बजे मुकदमा दर्ज किया।

मामला बलात्कार, दलित अत्याचार,नाबालिग के लैंगिक शोषण का होने के बावजूद भी जान-बूझकर सिर्फ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण की धारा 306 में दर्ज किया गया। इस मामले में डीवाईएसपी कुशाल सिंह खुद जाति से राजपूत हैं और परिजनों का मानना है कि उनके रहते जांच सही दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती। इतना ही नहीं इलाके के सरपंच और विधायक भी आरोपियों की जाति के हैं।

इस मामले में महिला दलित तथा मानव अधिकार संगठनों का संयुक्त दल भगेगा पहुंचा तथा पीड़ित परिवार, जाँच अधिकारी तथा ग्रामीणों से मुलाकात कर मामले की जानकारी ली। यह दल 15 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट जारी करेगा।

पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों पर से देशद्रोह का मुकदमा वापस, 58 छात्रों को भेजा 14 दिन की न्यायिक हिरासत में


पुलिस ने पहले दर्ज किया था 124ए के तहत देशद्रोह का मुकदमा पर दबाव बढ़ने पर सभी छात्रों पर से लिया वापस। लेकिन अब भी दंगा करने और सरकारी संपत्ति नुकसान करने के आरोप में 3 छात्राओं समेत 67 छात्रों पर है मुकदमा दर्ज। 67 में से 58 को कर चुकी है पुलिस गिरफ्तार। छात्राओं की जमानत पर अदालत करेगी 15 अप्रैल को सुनवाई

जनज्वार। चण्डीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में कल हुई फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिसिया हिंसा के बाद सैकड़ों छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तारी के बाद 66 छात्रों पर पुलिस ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, दंगा करने के साथ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया। पर छात्रों पर से देशद्रोह का मुकदमा 11 बजे रात  में वापस ले लिया गया।

आंदोलनकारी 3 छात्राओं की जमानत लेने पहुंचे वकील अंकित ने जनज्वार को बताया कि फीस वापसी की वाजिब मांग कर रहे छात्रों पर इतने संगीन मुक़दमें दर्ज करना बताता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार छात्रों को अपराधी बनाने पर तुली है। 

कितनी बढ़ी है फीस
फार्मा कोर्स की फीस 5080 रुपये से बढ़ाकर 50 हजार कर दी गई है । जर्नलिज्म कोर्स की फीस 5290 रुपये से बढ़ाकर 30 हजार रुपये कर दी गई है। डेंटल कोर्स  की फीस Rs 86,400 to Rs 1.5 लाख कर दी गई है ।

हिंसक कैसे हुआ आंदोलन 

चं​डीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय ने इस सत्र के ज्यादातर पाठ्यक्रमों की फी 11 गुना बढ़ा दी थी। इस फीसवृद्धि के खिलाफ तमाम संगठनों के छात्र पिछले 10 दिनों से एकजुट विरोध कर रहे थे। पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी मांग पर कोई सुनवाई नहीं।

ऐसे में छात्र संगठनों ने 11 मार्च को विश्वविद्यालय बंद का आह्वान किया था। छात्र विश्वविद्यालय में पहुंचते उससे पहले ही वहां पुलिस पहुंची हुई थी। सैकड़ों की संख्या में छात्र वीसी से मिलने पर अड़े हुए थे लेकिल पुलिस ने उनकी एक न सुनी।

छात्र जब रोष में आने लगे तो पुलिस ने पानी का बौछार किया। बौछार से एमफील प्रथम वर्ष की छात्रा जगजीत कौर घायल हो गयी और उसकी आंख पर गंभीर चोट आई। ऐसे में मामले को पुलिस संभालती उसने आंसू गैस के गोले छोड़ दिए। गोले में एक छात्र के चेहरे पर बुरी तरह झुलसा दिया।

उसके बाद फिर फिर क्या हुआ उसे पूरे देश ने ​देखा कि कैसे वाजिब मांग कर रहे छात्रों को पुलिस ने दौड़ा—दौड़ के मारा और गिरफ्तार किया। 

66 आंदोलनकारी छात्रों पर दर्ज किया देशद्रोह का मुकदमा, नहीं ली अबतक फीस वापस


तस्वीर में खून से लथपथ दिख रहा छात्र पंजाब यूनिव​र्सिटी का छात्र है जो फीस बढ़ोतरी के खिलाफ कल विश्वविद्यालय में कुलपति से मिलने का प्रयास कर रहे छात्रों में शामिल था। छात्र विश्वविद्यालय की बढ़ाई गयी 11 गुना फीस का विरोध कर रहे थे। 

पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में कल 11 अप्रैल को छात्र 11 गुनी बढ़ाई गयी फीस के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। विरोध कर रहे छात्र अपनी बात का संज्ञान दिलाने के लिए कुलपित अरुण कुमार ग्रोवर से मिलने का प्रयास कर रहे थे। 

लेकिन कुलपति ने छात्रों से मिलने से इनकार कर दिया। फिर भी छात्र कुलपति से मिलने और फीस वापसी कराने की मांग पर अड़े रहे तो तनाव बढ़ा। 

कानून—व्यवस्था बहाल करने के नाम पर आई पुलिस ने छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज किया। आँसू गैस के गोले छोड़े। कई छात्र-छात्राएँ बुरी तरह घायल हुए हैं।

पुलिस ने सरकार के इशारे पर आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है। इसके साथ ही दंगा फैलाने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का भी मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि पुलिस का कहना है कि छात्र एहतियात के तौर पर हिरासत में ले लिए गए हैं। 

आंदोलन में स्टूडेंट फार सोसायटी (एसएफएस), नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई), पंजाब यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (पुसु) के सदस्योंं समेत दूसरे संगठनों के भी छात्र शामिल हैं। 

दिल्ली में सेना अधिकारियों के यहां काम करते हैं 143 बंधुआ मजदूर

न छुट्टी मिलती है न सैलरी, गर्भपात होने पर भी नहीं देते आराम का मौका, काम नहीं करने पर सेना अधिकारी और परिजन करते हैं पिटाई 

संबंधित अधिकारियों समेत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजी गयी शिकायत, पर नहीं हो रही है सुनवाई, संगठन ने की अब हाईकार्ट जाने की तैयारी.....

सेनाधिकारियों के यहां काम करे बंधुआ मजदूर, 143 ने जमा किया एफिडेविट
जनज्वार। आर्मी फोर्स ऑफिसर्स के घरों में बेगारी करते-करते मजदूर परिवारों की तीन पीढ़ियां गुजर गईं। एडवांस के रूप में मिलता है मजदूरों को केवल एक कमरा। मजदूर काम नहीं कर पाते तो उनके बच्चों से लिया जाता था जबरन काम। पहले अंग्रेजों के घरों में की गुलामी फिर हिंदुस्तानी ऑफिसरों के बने गुलाम।    

नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर ने दिल्ली के इंडिया गेट के समीप बसे प्रिंसेस पार्क में लगभग 3 एकड़ की जमीन पर बने 205 टूटे—फूटे घरों जिन्हें सर्वेंट रूम कहा जाता है, के मजदूरों  से बात की तब पता चला की दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों से आर्मी अफसरों के घरों में कई दशकों से गुलामी (बंधुआ मजदूरी) करवाई जा रही है। गुलाम मजदूरों की संख्या 143 है। 

काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि आर्मी अफसरों के ऑफिस और घरों में इन मजदूरों से गुलामों की तरह काम कराया जाता है। मजदूर यहां घरेलू कामगार, सफाई मजदूर, माली और धोबी के रूप में काम करते हैं। 

हर परिवार का एक मेंबर अफसरों की गुलामी करता जिसे बेगारी कहते हैं, जबकि संविधान के आर्टिकल 23 में बेगारी एक गैरक़ानूनी अपराध है। काम के बदले मजदूरो को कोई भी दाम (वेतन, मजदूरी, तनख्वाह) नहीं मिलता है। मजदूरों के पास दिल्ली में रहने को घर न होने व गरीबी की वजह से मजदूर, मालिक और मेस कमेटी के चंगुल में फंसे हैं। इन मजदूरों की गुलामी का इतिहास आजादी के 2 साल पहले शुरू ही शुरू हो गया था। 

आजादी से पहले 1945 में कुछ दलित लोगों से प्रिंसेस पार्क में ही चौकीदारी का काम करवाया जाता था। गुलामी के शिकार हुए इन मजदूरों ने बताया की किसी समय में प्रिंसेस पार्क अंग्रेजों के घोड़े का अस्तबल हुआ करता था. धीरे-धीरे मजदूर काम की तलाश में आते गए और प्रिंसेस पार्क की मेस कमेटी के जाल में फंसते गए और बंधुआ मजदूरी प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 1976  के पारित होने पर भी उन्हें आजादी नहीं मिली। 

लाजू (बदला हुआ नाम) नामक एक महिला ने बताया की उसका जन्म ही गुलामी की चार दीवारों में हुआ। पहले उसने अपने नाना को फिर माता-पिता और अपने पड़ोस के कई लोगों को गुलामी करते हुए देखा है। अपनी बंधुआ बनने की कहानी कहते हुए लाजू कहती है, 'माँ की एवज में आये दिन मालिकों के घर बंधुआ मजदूरी करते करते—करते बचपन में ही घरेलु कामगार बन गई। 

लाजू गुलामी में ही ब्याही गई। पहली गुलामी मालिक और दूसरी गुलामी पति की करनी पड़ी। बंधुआ मजदूरी की शिकार लाजू तब फूट-फूट के रोने लगती है वह बताती है, 'गर्भपात के समय में भी मालिक और उनकी पत्नी ने मुझ पर रहम नहीं किया। पहले घर का पूरा काम कराया फिर उसे बड़ी मुश्किल से दवा लेने जाने दिया। कई बार मालिकों से परेशान होकर आत्महत्या का भी प्रयास किया।'

तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं इस हालत में, इस एक छत के भरोसे
रेखा देवी (बदला हुआ नाम) के अनुसार वो एक एक सफाई कामगार है। रेखा की सास ने जिंदगीभर गुलामी करके अपनी बहू को विरासत में ये गुलामी की नौकरी दे दी। जब बेगारी का ठीकरा रेखा के सर फोड़ा गया तो उसने एक बार काम का मेहनताना मांगने की हिम्मत की, किन्तु उसको मेस कमेटी की ओर से मिली धमकी ने फिर से उसे उस उदास मौसम की तरफ धकेल दिया जहाँ दास बनकर ही जीना था। 

रेखा के मुताबिक, मालिकों द्वारा बताए काम को पूरा न करने और रेस्ट कर सो जाने की स्थिति में मालिकों द्वारा उसे इतना पीटा गया कि उसका हाथ ही  टूट गया। मेस कमेटी ने रेखा की कोई सहायता नहीं की, उल्टा रेखा को ही पुलिस कार्रवाही से यह कहके रोक लिया की तुम्हारे घर पर ताला लगाने जा रहे है। 

रेखा कहती हैं, एक छत की मज़बूरी गुलामी में जीने को मजबूर करती रही। आज भी रेखा एक गुलाम की भांति मेस कमेटी के आदेश पर सफाई के काम को कर रही है।

कपड़े धुलाई का काम करने वाली अनुमति देवी बताती हैं, हम मजदूर बाद में हैं, पहले मजबूर है और यही हमारी गुलामी का प्रमुख कारण है। हमारी पीढ़ियां गुजर गईं सेना मालिकों की गुलामी करते-करते। 

अनुमति उम्मीद जताते हुए कहती हैं, 'प्रधानमंत्री ने जब सबको आवास देने की बात की तो एकाएक हमें लगा की हमें जब घर मिल जायेगा तो शायद उस दिन हमारी मुक्ति होगी, लेकिन वो दिन आज तक नहीं आया। पता नहीं कौन सी योजना है जिससे बेघर और गरीबों को घर मिलता है।' 

अनु​मति देवी सेना अधिकारियों के कपड़े धोते और प्रेस करते करते बूढी हो चुकी हैं। अनुमति कहती हैं, 'पहले पति कमा के मेरा पेट भरता था अब बेटा भरता है। मैं आज भी बेगारिन हूँ और इन अमीरों की सेवा करती हूं। यदि पेट भरने के लिए मालिकों के भरोसे रह जाते तो अब तक भूख से मर जाते। हमें हमारे काम का आज तक कोई दाम नहीं मिला। एक टूटी छत देकर हमसे हमारी मज़बूरी का फायदा उठाकर काम लिया गया। अगर हमारे काम का हमें भी दाम मिलता तो आज हमारा भी महल जैसा घर बन गया होत।'

गौरतलब है कि हाल ही में रक्षा मंत्रालय की ओर से एक फरमान जारी कर बंधुआ मजदूरों को उनके घर खाली करवाकर उनको भगाया जा रहा है।

मोनिका नामक कामगार ने बताया कि प्रिंसेस पार्क में म्यूजियम बनने जा रहा है। मोनिका पूछती हैं, 'जिन्दा इंसानों को उजाड़कर सरकार शहीदों की याद में म्यूजियम बना रही है। यही है हम मजबूर कामगारों के जिंदगी की कीमत और यही है हमारे लिए सामाजिक न्याय।'

नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर के संयोजक ने बताया कि उन्होंने ईमेल करके उपायुक्त और चाणक्यपुरी उपखंड अधिकारी को शिकायत पत्र भेजा है और बंधुआ मजदूरों के मुक्ति एवं पुनर्वास की मांग की है। किन्तु प्रशासन की कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। गोराना ने शिकायत की एक प्र​ति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजी है।

देखें वीडियो :



Apr 11, 2017

जानिए कुलभूषण जाधव के बारे में पाकिस्तानी मीडिया की राय

हम यहां पाठकों की सुविधा के लिए एक बातचीत का यूट्यूब वीडियो पेश कर रहे हैं जो पाकिस्तान में फांसी की सजा पाए भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव के बारे में है। बातचीत में पाकिस्तान के प्रसिद्ध पत्रकार नज़म सेठी ने भागीदारी की है।

कुलभूषण को  पिछले साल मार्च में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था। 

पाकिस्तान स्थित डेली न्यूज चैनल के इस वीडियो में विस्तार से पाकिस्तान सरकार का पक्ष रखा गया है। वीडियो में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान ने अबतक कितने भारतीय नागरिकों को जासूस होने के आधार पर गिरफ्तार किया है और कब—कब उन्हें फांसी दी गयी है। 

वीडियो के दावे के मुताबिक अबतक पाकिस्तान ने कुल 13 भारतीय नागरिकों को जासूसी के मामले में गिरफ्तार किया जिसमें से ज्यादातर को फांसी की सजा नहीं हुई। 

पर पाकिस्तानी मीडिया की निगाह में कुलभूषण जाधव का मामला अलग है। वहां की मीडिया और जानकारों के अनुसार जाधव पर पाकिस्तान में बम धमाके कराने का आरोप है। वहां की मीडिया का यह भी कहना है कि कुलभूषण को सजा मिलिट्री कोर्ट ने नहीं ​बल्कि एक सामान्य न्यायिक अदालत ने दिया है।

हालांकि भारत सरकार ने कहा है कि कुलभूषण ईरान से क़ानूनी तरीके से अपना कारोबार चला रहे थे और पाकिस्तानी एजेंसियों द्वारा उनके अपहरण की आशंका है।

पाकिस्तानी न्यूज चैनल 'डेली न्यूज' के साथ नज़म सेठी की बातचीत  

महिला नेता के खिलाफ दुष्प्रचार को क्यों नहीं रोक रहे गूगल और फेसबुक

असल सवाल यह है कि क्या भाजपा की किसी महिला या पुरुष नेता के खिलाफ ऐसे ही दुष्प्रचार किया जाता और फेसबुक व गूगल तमाशा देखते रहते...

जनज्वार। गूगल और फेसबुक कई बार सत्ता और सरकार की असलियत उजागर करने वाली वेबसाइट्स की खबरों को तत्काल रोक देते हैं। उनका तकनीकी विंग इतनी सक्रियता दिखाता है कि उसे रोकने में वह कई बार उन्हें कुछ ​मिनट भी नहीं लगते। और तो और वे विज्ञापन अधिकार छीन लेते है, रैंकिंग घटा देते हैं। 

फिर यहां देरी का क्या मतलब है, जबकि खुद पीड़िता कविता कृष्णन ने फेसबुक पर इस न्यूज को रोकने की अपील कर रखी है। बताया है कि मैंने कभी मोदी को न तो नपुंसक कहा और न ही इस भाषा में मैं कोई बात करती हूं।  बावजूद इसके इस फर्जी खबर को शेयर करने वालों संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

 गौरतलब है कि वामपंथी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन के खिलाफ पिछले एक सप्ताह से लगातार अपमानजक टिप्पणियां और उनका फर्जी बयान दर्जनों वेबसाइट और ग्रुप में शेयर हो रहा है लेकिन उनको अबतक गूगल और फेसबुक ने रोका नहीं है।  

जनज्वार तथ्य के तौर पर चार वेबसाइट का प्रिंट शॉट दे रहा है जिससे कविता कृष्णन के समर्थक सक्रिय हों और ऐसी गलत खबरों के प्रसारण को रूकवाने की तत्काल कोशिश करें।  

कविता कृष्णन की फेसबुक अपील

'मेरे बारे में एक फेक न्यूज कई वेबसाइट्स पर चलाई जा रही हैं। यह फेक न्यूज़ हिंदी में है और कहता है कि मैंने मोदी को नपुंसक कहा और 'फ्री सेक्स' की वकालत की। इस फेक न्यूज़ को चलाने वाले कुछ साइट तो अन्य अश्लील वीडियो भी चलाते हैं। ऐसा फेक न्यूज़ मेरे खिलाफ यौन उत्पीड़न है, मेरे सम्मान पर हमला है, और इससे मेरे लिये और यौन उत्पीडन का खतरा भी पैदा किया जा रहा है। ये सब सोचे समझे साजिश के तहत हो रहा है। मेरा अपील है कि कृपया ऐसे न्यूज़ को न खोजें और इन लिंक्स पर क्लिक न करें। यहां में सिर्फ इसलिए सबको सचेत कर रही हूं कि कोई मित्र बिना पढ़े गलती से ऐसे न्यूज़ शेयर न कर बैठे ये समझ कर कि मेरा बयान होगा तो ठीक ही होगा। मेरा इन वेबसाइट्स के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने का पूरा इरादा है।'

नीतीश गांधी पर देते रहे भाषण और मजदूर नेता आग के हवाले हो गए


पिछले 15 वर्षों से बकाये के लिए मजदूर—किसान 4 दिनों से दे रहे थे धरना, दो ने किया आत्मदाह का प्रयास और एक को लगी गोली, दर्जनों हुए घायल और सरकार गांधी के सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने पर पड़ोस में मना रही थी महोत्सव...

बिहार की राजधानी पटना से करीब 155 किमी दूर पूर्वी चंपारण से 1917 में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की शुरुआत की थी। यह उनका पहला अहिंसात्मक आंदोलन था। कल गांधी की उसी धरती पर किसान और मजदूर पुलिस की लाठियां, गोलियां खाते रहे, औरतें और बच्चे दौड़ा—दौड़ाकर मारे जाते रहे, लेकिन गांधी के सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने पर उत्सव मना रही सरकार और उसके मुखिया के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

मोतिहारी शुगर मिल लेबर यूनियन पिछले चार दिनों से 15 वर्षों से मिल पर बकाया भुगतान के लिए धरना—प्रदर्शन कर रहे थे। इस मुद्दे पर सरकार की बेपरवाही से तंग दो मजदूर नेताओं नरेश श्रीवास्तव और सूरज बैठा ने खुद पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा ली। ये दोनों मजदूर नेता 60—70 फीसदी तक जल चुके हैं और फिलहाल पटना मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए कल से भर्ती हैं। 

गौरतलब है कि कल 10 अप्रैल, 2017 को गांधीजी के पोते गोपाल गांधी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों ही चंपारण शताब्दी समारोह के दौरान ज्ञानभवन में उस वक्त मौजूद थे, जब मजदूर और किसान पुलिसिया ज्यादती के शिकार हो रहे थे। इस दौरान एक को लगी गोली और 24 लोग घायल हो गए।

गौरतलब है कि जिस मामले को लेकर पिछले कई दिन से मजदूर—किसान धरना—प्रदर्शन कर रहे थे वह मामला 15 साल पुराना है। 2002 में मोतिहारी शुगर मिल बंद हो गई थी। तभी से मजदूरों का पैसा फैक्टरी में बकाया है, वहीं किसानों के 18 करोड़ रुपए कंपनी ​मालिकों से सरकार नहीं दिलवा पायी है। 

संयोग से भारत के कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह भी इसी क्षेत्र से सांसद हैं और यहां के किसानों का ही इतना बुरा हाल है। ऐसे में नेता चाहे गांधी को याद कर लें या सुभाष चंद्र बोस को पर उनके मूल्यों पर कितना चल पाते हैं यह घटना साबित करने के लिए काफी है।