Mar 30, 2017

चलो जंतर मंतर

यूनियन बनाने, ठेका मज़दूरों को स्थायी करने की मांग उठाने, मज़दूर हितों के लिए आवाज़ उठाने के अपराध में कई मारुति मजदूरों को हुई उम्रकैद के विरोध में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने जंतर मंतर चलो का आह्वान किया है। मासा की अगुवाई में कल 31 मार्च, को सुबह 11 बजे जंतर—मंतर को प्रतिवाद सभा आयो​जित की जाएगी।

मासा के मुताबिक मजदूरों के हो रहे उत्पीड़न और उनके हक में आवाज उठाने की एवज में 13 मारुति मज़दूरों को उम्रकैद की सजा दी गई है। इस अभियान के जरिए उनको रिहा किए जाने की मांग उठाई जाएगी, साथ ही इसी अपराध से बरी हुए 117 मारुति मजदूरों को काम पर वापिस लेने की मांग भी उठाई जाएगी।

तमाम मजदूर मुुद्दों को लेकर दिल्ली स्थि​त जंतर मंतर पर यह प्रतिवाद सभा आयोजित की जाएगी। सभा में पूंजीपतियों और सरकार के इशारे पर न्यायपालिका द्वारा मज़दूर विरोधी फैसला देने के खिलाफ भी आवाज उठाई जाएगी। मजदूर उत्पीड़न के खिलाफ विभिन्न विभिन्न जन संगठन कल इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। 

अखबार वाले कराते हैं सांप्रदायिक हिंसा — शहीद भगत सिंह

 भगत सिंह ने 90 साल पहले लिख दिया था मीडिया का सच

जनज्वार। मीडिया और सरकार के बारे में करीब 90 साल पहले भगत सिंह ने जो कहा था, उसे जब आज पढ़ेंगे तो लगेगा कि भगत सिंह हमारे—आपके समय का सच ही बयान कर रहे हैं। पढ़ते हुए लगेगा कि कोई हमारे बीच का ही आदमी बहुत ही सुचिंतित तरीके से अपनी बात कह रहा और दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए मीडिया को सांप्रदायीकरण से बाज आने की हिदायत दे रहा है।

भगत सिंह का यह लेख 'सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज' पहले के मुकाबले आज के दौर में बहुत प्रासंगिक हो चुका है। खासकर तब जबकि मीडिया के ज्यादातर माध्यम सत्ताधारी पार्टियों के मुखपत्र बन चुके हैं, पत्रकार उनके प्रवक्ता और संपादक—एंकर पार्टियों के अध्यक्ष की भूमिका निभाने लगे हैं। 

जून 1928 में ‘किरती’ नाम के अख़बार में छपे लेख में भगत सिंह लिखते हैं, 'दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है... वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, ज़मीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और सांप्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.'

इसी लेख में भगत सिंह मीडिया की भूमिका को और स्पष्ट करते हुए आगे लिखते हैं, 'अख़बार वाले सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था. आज बहुत ही गंदा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जिनका दिल व दिमाग़ ऐसे दिनों में भी शांत हो.' 

आखिर में शहीद भगत सिंह अखबार और मीडिया के कर्तव्यों को रेखांकित करते हैं, 'अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है. यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’

(आरोही पब्लिकेशन की ओर से प्रकाशित संकलन ‘इंकलाब जिंदाबाद’ से साभार और संपादित)

देश में बनेगा 100 करोड़ का पशु चिकित्सालय


पशुओं को बेहतर इलाज मुहैया कराने के लिए टाटा ट्रस्ट ने मुंबई में पीपुल फॉर एनिमल्स 'पेटा' के साथ मिलकर मुंबई के कलंबोली में अत्याधुनिक मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल बनाने की घोषणा की है। अनुमान है कि दो साल में बनाए जाने वाले इस अस्पताल के निर्माण में 100 करोड़ से ज्यादा की लागत आएगी।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन रतन टाटा की उपस्थिति में एक कार्यक्रम के दौरान इस अस्पताल को बनाने की घोषणा हुई। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने टाटा ग्रुप को धन्यवाद देते हुए कहा, 'मुझे यकीन है कि यह पहल महाराष्ट्र के लोगों को लाभप्रद साबित होगी। मैं आप सबको विश्वास दिलाता हूं कि महाराष्ट्र सरकार हर तरह से इस योजना को पूरा करने में सहयोग करेगी।' 

9,000 वर्ग मीटर बनने जा रहा यह अस्पताल भारत का सबसे अत्याधुनिक पशु अस्पताल होगा, जिसमें इमरजेंसी और आपीडी होगा। इसमें सभी छोटे—बड़े जानवरों का इलाज किया जाएगा। 

Mar 29, 2017

गुजरात में इंजीनियरिंग के 80 प्रतिशत छात्र बेरोजगार

71 हजार इंजीनियरिंग की सीटों में से 27 हजार पर नहीं ले रहा कोई छात्र एडमिशन

देश भर में विकास का डंका पीटने वाले प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य गुजरात में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं की बेकारी का आंकड़ा हतप्रभ कर देने वाला है। आॅल इंडिया कॉउंसिल फॉर टे​क्नीकल एजुकेशन 'एआइसीटीई' के अनुसार गुजरात में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले 80 प्रतिशत छात्र नौकरी पाने से वंचित रहे जाते हैं, सिर्फ 20 फीसदी छात्रों को ही नौकरी मिल पाती है। 



टाइम्स आॅफ इंडिया में छपी हरिता दवे की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में इंजीनियरिंग पढ़ रहे छात्रों में सबसे बुरा हाल सिविल इंजीनियरों के प्लेसमेंट का है। इनका सिर्फ 5 फीसदी ही प्लेसमेंट हो पाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह हालत इसलिए है कि पढ़ाई, कार्स और काम में बहुत फर्क है।

एआइसीटीई के 2015—2016 के आंकड़ों के अनुसार कम्प्यूटर साइंस में 11 हजार 190 छात्र पास हुए लेकिन 3 हजार 407 को केवल काम मिला। उसी तरह मैकेनिकल इंजीनियरिंग में 17 हजार 28 छात्र उत्तीर्ण हुए और 4 हजार 524 को नौकरी मिल पाई। 

डिग्री लेकर कैंपस से बाहर निकलने वाले ज्यादातर छात्रों को पता ही नहीं कि उनकी डिग्री का असल मतलब क्या है? गुजरात चैंबर आॅफ कॉमर्स एंड इं​डस्ट्री के अध्यक्ष विपिन पटेल छात्रों की बेकारी के लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं। उनका कहना है कि सरकार रिटायर्ड अधिकारियों को 15 लाख देकर नौकरियों पर रख रही है, लेकिन युवा डि​​ग्रीधारी युवा बेकारी फांक रहे हैं।'   

इस आंकड़े पर संदेह उठाने वालों का कहना है कि छात्रों को रोजगार केवल कैंपस में ही नहीं मिलता बल्कि वह बाहर भी रोजगार करते हैं और कुछ नौकरियां नहीं करते। लेकिन एआइसीटीई इन आंकड़ों को अपने स्रोत में शामिल नहीं करती है,  जिससे बेकारी की भयावहता बड़ी दिखती है।

पंडितों और ईश्वर की शरण में ​क्रांतिकारी गायक गदर




वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के 'लाल सितारा' का मंदिर—मंदिर घुटना टेकना बताता है कि आंदोलन में निराशा गहरे पैठ चुकी है...

जनज्वार। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सम​र्थक कहे जाने वाले सांस्कृतिक संगठन जन नाट्य मंडली के संस्थापक क्रांतिकारी गायक गदर आजकल मंदिर—मंदिर घूम रहे हैं। वे भगवान से अच्छी बारिश और लोगों के दुःख दूर करने की मनौती मांग रहे हैं। वे छात्रों को वेद पढ़ने और विवेकानंद के रास्ते पर चलने का उपदेश दे रहे हैं और जगह जगह अपने नए गुरु मंदिरों में पुजारी के आगे झोली फैलाकर ब्राह्मणवाद के एक सच्चे हिन्दू कार्यकर्ता बनने के लिए आशीर्वाद मांग रहे हैं।

पिछले 5 दशकों से हजारों वामपंथी और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के प्रेरणास्रोत रहे 67 वर्षीय क्रांतिकारी गायक गदर का वामपंथी आंदोलनों से मोहभंग की खबरें तो कुछ वर्ष पुरानी हैं लेकिन मंदिर—मंदिर मत्था टेकने की जानकारी नई है। हालांकि दिसंबर में भी ऐसी खबरें आई थी जिसमें कहा गया था कि वह जगह—जगह पंडितों के साथ बैठकर पूजा—पाठ कर रहे हैं।

खबरों के मुताबिक वह पिछले हफ्ते भोंगरी जिले के यदाद्रि मंदिर गए और भगवान लक्ष्मीनरसिम्हा की आरती उतारने के बाद उन्होंने मंदिर के पुजारी से आशीर्वाद लिया। इससे पहले जनवरी महीने में उन्होंने पालाकुरथी में प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर में भगवान शिव की भजनों के साथ पूजा की। इससे पहले वे सिद्दिपेट जिले में कोमुरावेल्ली मल्लाना मंदिर भी जा चुके हैं और लोगों को भगवान शिव के भजन सुना चुके हैं।

आंदोलनकारियों और वामपंथी कैडरों के बीच क्रांतिकारी गीतों और व्यवस्था विरोधी सांस्कृतिक आंदोलन के अगुआ माने जाने वाले गदर का यह व्यक्तित्व परिवर्तन बहस का विषय बना हुआ है।

कैडरो और वामपंथ समर्थकों  में सवाल यह भी है कि  जिस ब्राह्मणवाद, पुरोहितगिरी, सामंतवाद  और ईश्वरीय अवधारणा के खिलाफ सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में गदर ने अपना जीवन लगाया, उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर कौन सी निराशा उन्हें मंदिरों और पुरोहितों के चौखट तक ले गयी ?

Mar 28, 2017

सेना ने दर्ज कराया स्टिंग करने वाली पत्रकार पर मुकदमा

जनज्वार। देश सेवा की भावना से सेना में भर्ती होने वाले सैनिकों का इस्तेमाल सैन्य अधिकारी घरेलू नौकर के रूप में करते हैं, इस बात को स्टिंग के जरिए उजागर करने वाली पत्रकार पूनम अग्रवाल पर सेना ने नासिक में मुकदमा दर्ज कराया है।

 पत्रकार द्वारा सैनिकों के किए स्टिंग के बाद एक सैनिक लांस नायक रॉय मैथ्यू ने आत्महत्या कर ली थी। 

लांस नायक मैथ्यू केरल के कोलम जिले के एझुकोन के रहने वाले थे। उनकी तैनाती  महाराष्ट्र के नासिक जिले के देओलाली छावनी में थी। छावनी में ही सैनिक मैथ्यू का शव खाली बैरक की छत से 4 मार्च को लटकता मिला था। पुलिस बयानों के मुताबिक जवान की मौत करीब 3 दिन पहले हो चुकी थी। 

स्टिंग वीडियो वायरल होने के बाद 25 फरवरी से ही मैथ्यू देओलाली में आर्टिलरी सेंटर से लापता थे। 

मैथ्यू ने भी अन्य सैनिकों की तरह पत्रकार से कहा था कि 'सहायक' के रूप में सैन्य अधिकारी हमारा इस्तेमाल व्यक्तिगत नौकर की तरह करते हैं। पत्रकार के स्टिंग में भी सैनिक अधिकारियों के कुत्ते टहलाते और सब्जी लाते देखे जा सकते हैं।

गौरतलब है कि सेना ने स्टिंग ऑपरेशन करने वाली वेबसाइट 'द क्वींट' की भूमिका पर उसी समय सवाल उठाए थे। कहा था कि सेना के ​ठीकानों पर गुप्त कैमरों से स्टिंग करना और उसे सार्वजनकि करना प्रतिबंधित है। इस मामले में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने मैथ्यू की रहस्यमय मौत संसद में बयान देना पड़ा था। वहीं तत्कालीन गृहमंत्री मनमोहन पर्रिकर ने सैनिक की आत्महत्या को 'छिटफुट घटना' बताकर सरकार की किरकिरी करा दी थी। 

नासिक में सेना ने पत्रकार पूनम अग्रवाल के खिलाफ विभागीय गुप्त मामलों का खुलासा करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में मुकदमा दर्ज कराया है। यह सेना के उस पत्र के बाद हुआ था जिसमें पुलिस को कहा गया था कि पत्रकार पर उचित धाराओं के तहत मुकदमा कर कार्यवाही करे। 

पत्रकार पूनम अग्रवाल ने इंडियन एक्सप्रेस मुकदमा दर्ज होने के बाद हुई बातचीत में बताया, 'इस मामले में मेरी सैन्य अधिकारियों से मुलाकात हुई। स्टिंग का जरिया और बातचीत दिखा दिया था। पर उस दौरान अधिकारियों ने यह नहीं ​कहा कि यह सब प्रतिबंधित है।' 

Mar 27, 2017

मम्मी पापा का सर्जिकल स्ट्राईक, रोमियो और योगी

ललित सती

एक अंग्रेज़ी गाना है - आई एम किसिंग यू। बढ़िया गाना है। ऊपी का रोमियो भी किस करना चाहता है, जूलियट भी चाहती है। लेकिन कहाँ करे। अपने घर में? जूलियट के घर में? वहाँ तो कोई स्कोप नहीं है। स्कूल में? वहाँ भी कोई स्कोप नहीं। सड़कों पर, किसी झील के किनारे? समाज की आँखें सजग हैं। कहीं कोई स्कोप नहीं। 

होटल में कमरा लेने के पैसे नहीं। वे पार्क पहुँचते हैं। किसी झाड़ की आड़ में बैठते हैं। वहाँ पुलिस आ टपकती है। छुप के इसलिए करते हैं लगता है जैसे कोई अपराध करने जा रहे हों। अपराध ही ठैरा। दोनों ने अपने-अपने माँ-बाप को कभी एक दूसरे को बाँहों में लेते नहीं देखा, चूमते हुए देखना तो बहुत दूर की बात है। स्त्री पुरुष संबंध क्या होते हैं वे क्या जानें।

बचपन में पता चला था कि भगवान जी की वजह से बच्चा हो जाता है, बाद में लगा नहीं, कुछ ऐसा नहीं। बस, इतना समझ आया कि रात के अँधेरे में कोई सर्जिकल स्ट्राइक होती है और बच्चे हो जाते हैं, और बस इत्ता ही होता है स्त्री-पुरुष संबंध। लड़का मसें भींजने के साथ अँधेरे में छाती पर हाथ मारना, दबोच लेना टाइप शिक्षा तो अपने सीनियरों से पा लेता है, इससे अधिक परिवार से उसे कुछ ज्ञान नहीं मिल पाता, न स्कूल में कि किसी स्त्री से कैसे व्यवहार किया जाए। 

ऐसे पिछड़े परिवेश से आने वाले लड़कों से समझदार लोग कहते हैं - ऐ नालायक, प्रेम महज देह नहीं और यदि प्रेम करते हो तो बग़ावत कर डालो। लड़का, न लड़की, समझ नहीं पाते किससे बग़ावत करें। समझदार कहता है- ग़र बग़ावत नहीं कर सकते तो डूब मरो चुल्लू भर पानी में। चुल्लू भर पानी में डूबना संभव नहीं तो एक दिन रोमियो जूलियट फाँसी खा लेते हैं या किसी नदी में डूब मरते हैं हिंदुस्तान में। इति वार्ता हो जाता है, समाज की संस्कृति बची रह जाती है। समझदार की बात भी सही साबित हो जाती है कि ये जनता ही मूरख व कायर है।

जो स्पेस हम अपने नौजवानों का छीन रहे हैं, फ्री सेक्स, देह की भूख टाइप फ़ालतू बातें करके, हम नहीं जानते हम कितने असामान्य इंसान तैयार कर रहे हैं। स्त्रियों की तो मुझे नहीं पता, लेकिन पुरुषों में जिन पुरुषों को स्त्रियों का सानिध्य मिला यानी स्त्री का एक इंसान के रूप में सहज स्वाभाविक सानिध्य मिला। जिन्होंने प्रेम किया। जिनके जीवन में कम पाबंदियाँ रहीं। 

ब्रह्मचर्य के नाम पर पैंतीस-चालीस बरस तक ब्याह होने तक जिन्हें लोहे का लंगोट नहीं पहनना पड़ा, वे कहीं बेहतर पुरुष होते हैं। बूढ़े ठरकियों से अधिक बेहतर ढंग से युवा लोग प्रेम के मायने समझते हैं। युवापन में देह के रहस्य जान लेने की उत्सुकता तो होती है, देह पा लेने की ज़िद नहीं। युवापन में आदमी होता है कहीं अधिक संवेदनशील, कहीं बेहतर इंसान।

ठरकी बुड्ढे क्या ज्ञान पेलते हैं, इसे छोड़िए। अपने नौजवानों को स्पेस दीजिए। पार्कों में नहीं है तो घरों में ही दीजिए। यकीन मानिए ये कोई पाप नहीं।

न तो मजनू के पिंजड़े लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़ को रोक सके, न कोई एंटी-रोमियो स्क्वाड रोक पाएगा। बस एक भ्रम अवश्य कुछ समय, कुछ बरसों के लिए क्रिएट हो जाएगा, जैसा विमुद्रीकरण के मामले में हुआ।

एकदम नारकीय जीवन में पशुवत जीवन जीते आदमी को प्रेम तो इंसान बना सकता है, मगर कोई डंडा नहीं। न कोई लोहे की लंगोट।

पाखंड के लिए आप भले किसी योगी, साधु, संत, मौलवी, "समझदार" के भक्त बने रहें, अपने बच्चों को तो जीवन दें। सुख मिलेगा।
(ललित सती सामाजिक मसलों पर रोचक टिप्पणियां लिखते हैं. यह टिप्पणी उनके वॉल से )

कमाई ​कला के दलालों के हिस्से और बेगारी आर्टिस्टों के

विश्व थियेटर दिवस पर विशेष 

कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाये तो सार्थक और मूल्यवान रंगमंच कभी भी अनुदान पर निर्भर होकर नहीं हुआ है। इन अपवादों की भी छानबीन करें तो हमें पता चलता है कि जिन रंगकर्मियों ने अनुदान लेकर बेहतर नाटक किये वे अनुदान के बिना भी बेहतर थियेटर करने की क़ाबिलियत रखते रहे हैं...

राजेश चंद्र

हबीब तनवीर अनुदान लेते थे, पर उनका थियेटर अनुदान की वजह से नहीं था। पोंगा पंडित जैसे नाटक अनुदान के बग़ैर भी उसी प्रभावशीलता के साथ हो सकते हैं, जिस तरह अनुदान लेकर। पर ज़्यादातर अनुदानकर्मी रंगकर्मी करते क्या हैं? 5-5 लाख लेकर दो कौड़ी के नाटक नहीं करते। 


कुछ ठेके पर नाटक का मंचन करवा लेते हैं। कुछ पुराने नाटक को दुहरा कर काम चला लेते हैं। कुछ नाटक ही नहीं करते, पूरा हजम कर जाते हैं। कुछ बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं। यानी कुछ नाटक में भी लगा दो और कुछ अपने लिये भी रख लो। यह अनुपात रंगकर्मी में बचे ज़मीर का समानुपाती हुआ करता है, जो वैसे भी सैकड़ों में से किसी एक में मिलता है।

यह हाल तो प्रस्तुति अनुदान का है, पर अगर सैलरी ग्रांट या वेतन अनुदान की बात करें, जिसके अंतर्गत देश में सैकड़ों निर्देशकों को प्रतिवर्ष 10 से 25 लाख रुपये सरकार देती है, उसकी लूट का पैमाना व्यापम जैसे किसी भी महाघोटाले से छोटा नहीं होगा। यह अनुदान अभिनेताओं के वेतन के लिये है, पर उसका 60-70 फीसदी, और कहीं-कहीं तो 90 फीसदी हिस्सा रंगमंडल संचालक या निर्देशक हजम कर जाते हैं।

अभिनेताओं की हैसियत ज़्यादातर रंगमंडलों में दास या बेग़ार खटने वाले मज़दूर से अधिक नहीं होती। देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले इन  रंगमंडलों का, जिनमें से ज्यादातर केवल काग़ज पर हैं, आपसी नेटवर्क इतना मज़बूत है कि इस गोरखधंधे का विरोध करने वाले अभिनेता को फिर कभी किसी रंगमंडल में काम नहीं मिलता। सी.ए. से फर्जी प्रमाणपत्र बनवा कर, तस्वीरें भेज कर और मंत्रालय के बाबुओं को खुश कर अनुदान हड़प लिये जाते हैं। 

मंत्रालयों में पैठ रखने वाले ताक़तवर रंगकर्मियों ने अलग-अलग लोगों के नाम से कई-कई रंगमंडल बना रखे हैं और वे नये रंगमंडलों के लिये ग्रांट पास करवाने के बदले भरपूर कमीशन भी खा रहे हैं। ऐसे सफेदपोश रंगकर्मी आज सभी राज्यों में कमीशन एजेन्ट का काम कर रहे हैं।

थियेटर में ग्रांट के वितरण और प्रबंध के लिये सरकार ने एनएसडी को नोडल एजेन्सी बना रखा है। थियेटर में बहने वाली भ्रष्टाचार और लूट की महागंगा की गंगोत्री यही ब्राह्मणवादी संस्था है।एनएसडी आज नाटक करने की, कथ्य समझने की तमीज़ नहीं सिखाती, वह उन्हें कुछ ट्रिक्स और फारमूले सिखा देती है, पांच लाख-दस लाख के अनुदान को खपाना सिखाती है, गलत-सही बिल बनाना और प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बनाना सिखाती है, ताकि अनुदान के लिये फ़ाइट करने लायक नाटक उसके प्रशिक्षित लोग किसी प्रकार कर लें। एनएसडी प्रशिक्षण के नाम पर आज देश को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं करती। इस पर कभी और बात होगी।

आज थियेटर में अनुदान बंद हो जाये तो 80 फीसदी रंगकर्मी रंगकर्म छोड़ देंगे। अनुदान अपने साथ एक संस्कृति भी लेकर आता है, भ्रष्टाचार, समझौतापरस्ती, अवसरवाद और लोलुपता की! रंगकर्मी एक बार समझौतापरस्त और बेईमान हो गया तो फिर वह रंगकर्मी कहां रह गया! जब आप अनुदान की पात्रता के हिसाब से अपने रंगकर्म का स्वरूप निर्धारित करते हैं, कथ्य और शैली चुनते हैं, तो फिर कथ्य और नीयत और क्वालिटी तो पहले ही संदिग्ध हो जाती है। अगली बार के अनुदान की फिक़्र तो और जानलेवा होती है।

विकास परियोजनाओं के नाम पर देश भर के आदिवासी और दलित विस्थापित हो रहे हैं, उजाड़े जा रहे हैं, उनके जल, जंगल, ज़मीन और संस्कृति की जैसी भयावह तबाही रची जा रही है, वह रंगमंच से क्यों गायब है? बस्तर और दन्तेवाड़ा जैसी जगहों पर, मणिपुर में, असम में, कश्मीर में मानव अधिकारों को बर्बर तरीके से कुचला जा रहा है, वह हमारे नाटकों का विषय क्यों नहीं है? कभी अखलाक, कभी पानसरे, कभी कलबुर्गी और कभी किरवले। रोज़ समाज के सोचने समझने वाले, हाशिये पर जीने वाले लोग मारे जा रहे हैं, दलितों की बस्तियां जलायी जा रहीं हैं, उनको आत्महत्या के लिये मजबूर किया जा रहा है, नंगा कर घुमाया जा रहा है, ये हमारे नाटकों में क्यों नहीं आता? किसानों की इतने बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्याएं रंगमंच में क्यों जगह नहीं पातीं?

इन सवालों का अकेला जवाब यही है कि अनुदान लेकर आप इन मुद्दों पर सवाल नहीं उठा सकते। आपको अनुदान और पुरस्कार मिलता ही इसीलिये है कि आप यह सब नाटक और रंगमंच में नहीं आने दें। जनता के सामने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते आप अनुदान लेकर। अनुदान सरकार इसी मकसद से देती है। लोग यह मकसद आगे बढ़ कर पूरा कर रहे हैं।

अनुदान-विमर्श आज रंगमंच का सबसे अपरिहार्य और प्राथमिक सरोकार बन गया है! सारी मेधा और प्रतिबद्धता इसी जोड़-तोड़ और बचाव में चुक रही है! इससे पता चलता है कि हम जिसे रंगकर्म मान रहे हैं उस मान्यता और समझ में ही बहुत भारी लोचा उत्पन्न हो गया है! अगर रंगमंच को, उसकी सामाजिक-राजनीतिक भूमिका को, उसके गौरवशाली इतिहास को बचाना है तो रंगकर्म को सरकारी बैसाखी से मुक्त करना अपरिहार्य हो गया है। इस दिशा में संगठित होना आज एक बड़ा कार्यभार है।

एनएसडी आज तमाम संसाधनों पर वर्चस्व और एकाधिकार की वजह से केन्द्र में नहीं है! वह श्रेष्ठ और विशिष्ट थी,  तभी रंगमंच के सारे संसाधन और शक्तियां उसके पास हैं! एनएसडी के स्नातक श्रेष्ठ और विशिष्ट होते हैं, इसीलिये उनका सारे संसाधनों और अवसरों पर पहला और नैसर्गिक अधिकार है! यह सोच क्या वैसी नहीं है कि ब्राह्मण जन्म से ही श्रेष्ठ होते हैं, इसलिये उन्हें शेष समाज पर वर्चस्व और नियंत्रण का नैसर्गिक और दैवीय अधिकार है! जैसे अंग्रेज हमसे श्रेष्ठ और महान थे, इसलिये हम पर अपना शासन और अन्याय-उत्पीड़न थोपना उनका विशेष और नैसर्गिक अधिकार था! 

जिस प्रकार हिटलर के जन्मजात महान और श्रेष्ठ लोग दुनिया पर शासन करने निकल पड़े, उसी प्रकार जन्म से ही श्रेष्ठ और विशिष्ट संस्थान एनएसडी के श्रेष्ठ और विशिष्ट स्नातक भारतीय रंगमंच को विजित करने निकल पड़े! सारे संसाधनों पर, सारे ग्रांट पर, सारी कमिटियों पर, सारे पुरस्कारों पर, सारे महोत्सवों पर, सभी संस्थानों पर एकाधिकार करने और थियेटर को अपने अनुसार हांकने का उन्हें महान, विशिष्ट, जन्मजात और दैवीय अधिकार प्राप्त है! 

राजेश चंद्र वरिष्ठ रंग समीक्षक। कई नाटक लिख और निर्देशित कर चुके हैं।