Mar 21, 2017

भाजपा का एक छोटा सा साक्षात्कार

भाजपा की विकास यात्रा पर वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने लिया व्यंग्यात्मक साक्षात्कार 

प्रश्न : तुम्हारा नाम क्या है?
उत्तर : भाजपा कुमारी
प्रश्न : किस की बेटी हो?
उत्तर : आर एस एस पांडे की
प्रश्न : तुम्हारी उम्र?
उत्तर : यही कोई सैंतीस साल।
प्रश्न : उम्र के हिसाब से तो काफी फैल गयी हो।
उत्तर : मत पूछिए। एक बार ऐसी बीमार पड़ी थी कि मेरा वजन बस दो किलो रह गया था।
प्रश्न : उस के बाद सेहत कैसे बनी?
उत्तर : मैं नियमित रूप से वर्जिश करती हूँ। सुबह छह से सात। लाठी भाँजने में कई बार फर्स्ट आ चुकी हूँ। कुछ घरानों से टॉनिक भी आ जाता है।
प्रश्न : फिर भी इतनी जल्दी, इतना विकास?
उत्तर : अंकल, इस में मेरा दोष नहीं है। मेरी फ्रेंड्स सिकुड़ती गयीं और उन की जगह मुझे मिलती गयी। अब तो मैं ही मैं हूँ।
प्रश्न : तब तो तुम्हारी अभिलाषा पूरी हो चुकी होगी।
उत्तर : अभी कहाँ। इतनी उम्र हो गयी, पर शादी नहीं हुई। कुँवारी हूँ।
प्रश्न : क्या किसी खास लड़के का इंतजार कर रही हो?
उत्तर : हाँ, भारत कुमार।
प्रश्न : पर उस के पीछे तो और भी लड़कियाँ पड़ी हैं - रेशमा है, कावेरी है, उज्ज्वला है, ललिता है, गुलनार है, नालंदा है...
उत्तर : यही तो चुनौती है। पर पापा कहते हैं, लगी रहो, एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
प्रश्न : आजकल भारत कुमार बहुत बीमार है। कुपोषित है। उस का पूरा शरीर दर्द करता है। उसका स्वास्थ्य लौटाओगी, तभी तो उसे पाओगी।
उत्तर : जितना होता है, करती ही हूँ। पर मेरा लक्ष्य कुछ और है।
प्रश्न : तुम्हारा लक्ष्य क्या है?
उत्तर : पकड़ुआ विवाह करना। पर और लोग भी इसी फिराक में हैं। किसी के हिस्से में हाथ आते हैं, किसी के हिस्से में पैर। पूरा किसी के हाथ में नहीं आता।
प्रश्न : ऐसे हाथ नहीं आने वाला। उसे सर्वांग सुंदरी चाहिए।
उत्तर : इस समय मुझ से सुंदर कौन है?
प्रश्न : सो तो है। पर तुम्हारी हथेली में यह खून कैसे लगा? कहाँ से आ रही हो?
उत्तर : चुप कीजिए। आप जैसे देशद्रोहियों का जवाब मैं नहीं देती।

जब 'जुमला' ही राजनीतिक रणनीति बन जाए

मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान वाला जुमला सम्प्रेषण में कारगर रहा| अखिलेश ने इसकी काट के लिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को ‘चौबीस घंटे बिजली’ जैसे तर्क का सहारा लिया| हिंदुत्व के अखाड़े में साख गंवा चुके विकास का यह अदना—सा तर्क मोदी की निर्बाध भावनात्मक अपील के सामने नहीं ठहर सका.....

विकास नारायण राय

जुमलेबाजी में गलत क्या है? प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू के अनुसार एक प्रभावी जुमला (rhetoric) तीन तत्वों के मिश्रण से बनेगा- एथोस, पथोस और लोगोस, यानी संवादकर्ता की साख, जुमले की भावनात्मक अपील और उसमें निहित तर्क| नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलता ने सम्प्रेषण की इस कला को आज देश की सामयिक राजनीति में स्थापित कर दिया है| उत्तर प्रदेश के हालिया चुनाव में सभी ने देखा कि कैसे अखिलेश के ‘काम बोलता है’ पर मोदी का जवाबी जुमला ‘कारनामा बोलता है’ भारी पड़ा| 

इस लिहाज से मायावती मैदान में कहीं थी ही नहीं| 2015 में स्वयं मोदी का ‘कितने लाख करोड़ दूँ’ जैसा नाटकीय जुमला बिहार में औंधे मुंह धराशायी गिरा था| बिहार चुनाव के समय मोदी हर बैंक खाते में विदेशों से लाया पंद्रह लाख काला धन जमा करने में चूक गए व्यक्ति हुआ करते थे, जबकि उत्तर प्रदेश संस्करण में विमुद्रीकरण के घोड़े पर सवार उस दिशा में बढ़ते एक योद्धा|

अरस्तू ने इसे ‘तकनीक’ कहा| हालाँकि, राजनीतिक जुमला एक तरह से भाषा के कलेवर में छिपी राजनेता की अविश्वसनीयता का भी सूचक है| भविष्य के वादे के दम पर वर्तमान को अपने साथ ले जा पाने का उसका व्यावहारिक कौशल! साध्य को पाने का साधन! उत्तर प्रदेश की अभूतपूर्व सफलता के समानंतर पंजाब की करारी हार में मोदी ने यह भी पाया होगा कि उनका जुमला कौशल बादल परिवार की शून्य बराबर साख से गुणा होकर शून्य ही रह गया| जब साख नहीं तो जुमला काम नहीं आता, नाकाफी सिद्ध होते हैं अकेले दम भावनाओं की अपील और तर्कों के फलसफे| 

बेशक, लोगों को प्रभावित करने के लिए जरूरी नहीं कि साख सच्चाई या जवाबदेही के धरातल पर टिकी हो; जरूरी होता है लोगों का जुमले से तारतम्य| इंदिरा गाँधी के मशहूर, बेहद सफल राजनीतिक जुमले ‘गरीबी हटाओ’ की तरह| वैसे ही जैसे सदाबहार बन गया है परिवार नियोजन का सरकारी जुमला, ‘हम दो हमारे दो’|

मोदी ने ताजातरीन चुनावी दौर तक आते-आते महत्वपूर्ण ‘कोर्स करेक्शन’ किये हैं| बिहार चुनाव के समय उनकी छवि कृषि भूमि हड़पने पर उतारू, बुलेट ट्रेन और क्रोनी कॉर्पोरेट की संगत में दस लाख का नामधारी सूट पहन विदेशों में वक्त गुजारने वाले बड़बोले प्रधानमंत्री की बन रही थी| आज वे रसोई गैस, शौचालय, सकल आवास, बेटी बचाओ, कर्ज माफी, ईमानदार शासन और गुंडाराज से मुक्ति जैसे समावेशी मुद्दों की ब्रांडिंग को लालायित नेतृत्व के रूप में उभरते लग रहे हैं| 

मोदी के विकास केन्द्रित जुमलों को साख यहाँ से मिली ईमानदारी की भावनात्मक अपील और सुशासन की तर्क शक्ति तो उनमें पहले भी कम न थी| ध्यान रहे कि एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार बना पाने में असमर्थ भाजपा का मुख्य राजनीतिक जुमला, ‘सबका साथ सबका विकास’ साख और तर्क के मानदंड पर फिसड्डी रहा| मात्र एक भावना भर प्रेषित करने से यह पार्टी की कमजोर कड़ी सिद्ध हुआ| इसे मुस्लिमों, ईसाइयों और दलितों ने जैसे पहले नाकारा था वैसे ही अब भी| स्वीकारा तो दूसरों ने भी नहीं| हालाँकि भाजपा घाटे में नहीं रही क्योंकि पंजाब के बादलों की ही तरह उत्तर प्रदेश में यादवों की ब्रांड साख भी जीरो रही| लिहाजा, राहुल-अखिलेश के ‘यूपी को युवा साथ पसंद है’ वाली संयुक्त जुमलेबाजी का नतीजा कांग्रेस के लिए सिफर निकला|

सफल चुनावी जुमला और कुछ नहीं सही वोटर निशाने पर लगा शब्द बाण ही है| इस चुनावी दौर में हमने देखा कि इसका वाहक आशा, भय, घृणा, असुरक्षा, राष्ट्रवाद, विकास, कुछ भी हो सकते हैं| इसकी प्रभावी ताकत में संदेह नहीं| अपने हिंदुत्व वोट बैंक के चुनावी ध्रुवीकरण के लिए भाजपा पारंपरिक रूप से विरोधियों पर तुष्टीकरण का आरोप मढ़ती आयी है| 

अब की बार उत्तर प्रदेश में इसे सिरे चढ़ाने के लिए पार्टी को राम मंदिर या मुजफ्फरनगर का ढोल पीटने की जरूरत नहीं पड़ी| मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान और ईद-दीवाली वाला जुमला सम्प्रेषण में कारगर रहा| अखिलेश ने इसकी काट के लिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को ‘चौबीस घंटे बिजली’ जैसे तर्क का सहारा लिया|हिंदुत्व के अखाड़े में साख गंवा चुके विकास का यह अदना—सा तर्क मोदी की निर्बाध भावनात्मक अपील के सामने नहीं ठहर सका|

भारत निर्माण में सकारात्मक राजनीतिक जुमलों की ताकत बखूबी महसूस की गयी है| स्वतंत्रता संग्राम में ‘आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार’, ‘बन्दे मातरम’, ‘इन्कलाब जिंदाबाद’, ‘भारत छोडो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का सिलसिला स्वतंत्र भारत में ‘जय जवान जय किसान’ और ‘हर जोर जुल्म से टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’ तक बना रहा | इस बीच ‘आपातकाल अनुशासन पर्व’, ‘हम मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘तिलक, तराजू और तलवार......’ और ‘उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण’ बेहद विवादग्रस्त राजनीतिक जुमले बनकर देश के राजनीतिक क्षितिज पर उभरे| 

इस क्रम में देखें तो मोदी के जुमलों की चुनावी लय फिलहाल विकासवादी और विभाजक दोनों रही है| देर-सबेर वोटर को ही नहीं उन्हें भी इस घाल-मेल से निकलते दिखना होगा| अकेले गांधी जी ही यह जुमला बोल सकते थे- जो परिवर्तन दुनिया में देखना चाहते हो स्वयं में पैदा करो| यह था उनकी साख का राज! आज के दिन मोदी शायद देश में एकमात्र सक्रिय महत्वपूर्ण राजनेता हैं जो अपने श्रोताओं की आँख में आँख डाल कर कह सकते हैं, ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’| प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने कितनी ही बार करतल ध्वनि के बीच यह जुमला दोहराया होगा| 

हालाँकि, आपको बिना किसी अर्थशास्त्री के बताये भी पता है कि नोटबंदी ने काले धन पर कोई असर नहीं डाला | बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता जा रहा है| विजय माल्या, मोदी सरकार की आँखों में आँखें डालकर हजारों करोड़ की देनदारी के साथ देश से उड़न छू हो गया| क्रोनी कॉर्पोरेट तंत्र पहले जैसा ही फल-फूल रहा है| मणिपुर और गोवा में भाजपा सरकारें वोट से नहीं खोट से बनी हैं| तो क्या, महत्वपूर्ण है कि ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’ की मोदी साख बरकरार है|


मनमोहन सिंह इस जुमले का सिर्फ पहला आधा भाग कह सकते थे, ‘न खाऊँगा’, और मायावती सिर्फ शेष आधा, ‘न खाने दूंगी’| क्या मोदी के जुमलों की अंतर्वस्तु और उनकी सार्वजनिक वक्तृता शैली की तुलना हिटलर से की जा सकती है, जैसा कि उनके कई विरोधी दावा करते रहे है| इसके समर्थन में मुख्यतः मोदी की विशाल भीड़ से एकाकार होने के क्रम में नाटकीय भंगिमाओं और उनके गुजरात दौर के सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों का हवाला दिया जाता है| 

जैसे हिटलर जर्मन श्रमिक से एकजुटता दिखाने के लिए अपने साढ़े चार वर्ष के एक साधारण सैनिक के जीवन का भावुक हवाला दिया करता था, क्या मोदी का चाय वाला अवतार भी वही मकसद हासिल करता नहीं लगता? शब्दों के दोनों चितेरे राष्ट्रवादी फासिस्ट अपील से अपने श्रोताओं पर जादुई असर छोड़ते नजर आते हैं| लेकिन, भिन्न कालखण्डों के भिन्न राजनीतिक सन्दर्भों की कोई भी तुलना अकादमिक हो सकती है, जरूरी नहीं व्यावहारिक भी हो| अरस्तू वर्णित राजनीतिक जुमलों की अपील के तत्व बेशक दोनों में हों, वे उसी गहन रूप में आज भी हम पर असर करते हों, तो भी देश-काल सापेक्षता के निर्णायक महत्व को नकारा नहीं जा सकता है| हिटलर युद्ध उन्माद की उपज था| मोदी का जमाना ट्वीट का जमाना है|

भारत में ऐसे विचारकों की भी कमी नहीं जो भारतीय प्रधानमंत्री के राजनीतिक सम्प्रेषण को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के खांचे में रखना चाहेंगे| लेकिन सच्चाई यह है कि जुमलेबाजी की कला में ट्रम्प बहुत पीछे छूट जाते हैं| उनकी शैली दो टूक बात कहने वाली रही है, लगभग जुमला-विरोधी| दरअसल, इस क्षेत्र में मोदी की तुलना ट्रम्प के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति ओबामा से करनी अधिक दुरुस्त होगी, जो निर्विवाद रूप से शब्दों के कुशलतम चितेरे गिने जाते हैं| राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में ओबामा को उनकी नीतियों से कहीं ज्यादा उनके नपे-तुले शब्दों के लिए विरोधियों की घोर आलोचना सुननी पड़ी थी| 

उनके बारे में यहाँ तक कहा गया कि शब्द ही जिसके लिए सबकुछ हैं, उसका भरोसा कैसे किया जा सकता है| उत्तर प्रदेश में अखिलेश और राहुल ने भी लगातार मोदी के ‘मन की बात’ पर सवाल खड़ा किया कि वे ‘काम की बात’ कब शुरू करेंगे? यहाँ तक कि, याद कीजिये, 2014 में लोकसभा अभियान स्वयं मोदी ने भी ओबामा के मशहूर चुनावी जुमले ‘यस वी कैन’ से ही शुरू किया था| 

राजनीतिक जुमलों के अध्ययनकर्ता संपादक सैम लीथ का सटीक निष्कर्ष है कि जुमला शब्दों को शक्ति देने का काम करता है| इसका सटीक ज्ञान नागरिक को भी सत्ता के इस्तेमाल और उसके विरोध दोनों की समझ देगा |

Mar 17, 2017

देवबंद में है सिर्फ 35 फीसदी मुस्लिम वोट, 18 बार जीत चुके हैं हिंदू विधायक

पहली बार नहीं तीसरी बार जीती है भाजपा
अजय प्रकाश 


11 मार्च को जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणामों की घोषणा होने लगी तो एक खबर सिर चढ़कर मीडिया और सोशल मीडिया में छाने लगी। कहा गया कि देवबंद में भाजपा ने जीतकर इतिहास रच दिया है। हर तरफ प्रचारित होने लगा कि देश में भाजपा की जबर्दस्त लहर है और लहर के लपेटे में देवबंद जैसी 'कट्टरपंथी' और मुस्लिम वोटरों के बहुतायत वाली विधानसभा में भी पहली बार कोई हिंदू प्रत्याशी जीता है। गौरतलब है कि देवबंद धार्मिक मुस्लिम शिक्षा का बड़ा केंद्र है और हिंदूवादी जमातों में उसकी पहचान एक कट्टरपंथी शैक्षिक केंद्र के रूप में है।

 
भाजपा प्रत्याशी बृजेश को सहारनपुर जिले की देवबंद विधानसभा से 1 लाख 1 हजार 9 सौ 77 वोट मिलने और 29 हजार 3 सौ 23 वोट से जीतने की खबर कुछ इस रूप में फैली कि वहां 71 फीसदी मुस्लिम आबादी है, वहां आजादी के बाद से सिर्फ मुस्लिम ही जीतते हैं, बावजूद अबकी भाजपा जीत गयी। कुछ जगहों पर देवबंद विधानसभा की मुस्लिम आबादी को 80 प्रतिशत तक ​लिखा गया।

इन दावेदा​रियों का लब्बोलुआब ये रहा कि भाजपा की जीत बगैर मुस्लिम मतदाताओं के वोट के संभव नहीं है और इसको आधार बनाकर यह साबित करने की कोशिश की गयी कि भाजपा की 325विधानसभाओं में जो चमत्कारिक जीत है, वह बगैर मुस्लिम वोटों के संभव नहीं है। यानी अखलाक की हत्या, नोटबंदी से मुश्किलों में पड़ी मुस्लिमों की शिल्पकारी, भाजपा नेताओं की दंगाई मानसिकता और बार—बार मुस्लिमों को देशद्रोही साबित करने की हिंदूवादी प्रवृत्ति को अल्पसंख्यक मतदाता भूल गए और उन्हें मोदी जी के करिश्माई चरित्र ने अपनी ओर खींच लिया।

भाजपा की ऐतिहासिक जीत का खुमार ऐसा है कि तथ्य जांचना भी भाजपा के प्रति पूर्वग्रहित होना समझा जाने लगा है। सवाल करने वाले पत्रकारों और तथ्य के मांग करने वालों को 'वैचारिक लट्ठ' से हुरपेटा जा रहा है। बहुत ही शातिराना तरीके से ​हिंदू मानसिकता के पत्रकारों ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि 'तीन तलाक' को खत्म करने के सकारात्मक रुख के कारण मुस्लिम महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया है। दो कदम आगे बढ़कर बाकायदा चुटकुले और फब्तियां शेयर होने लगीं और ज्यादातर संघी मानसिकता के लोगों ने मान लिया कि मुस्लिम मतदाताओं ने भी भाजपा को वोट दिया।

पर जनज्वार की पड़ताल में यह एक बड़ा झूठ निकला। वोट प्रतिशत से लेकर वोटरों की गिनती सबकुछ ​दुष्प्रचार का हिस्सा लगा। पता चला कि यहां न सिर्फ हिंदू—मुस्लिम वोटरों का प्रतिशत 60 'हिंदू'और 40 'मुस्लिम' का है, बल्कि 1951 से लेकर2017 के बीच सिर्फ 2 बार मुस्लिम ​विधायक जीते हैं, जबकि 18 बार हिंदू विधायक जीत चुके हैं।

देवबंद से भाजपा पहली बार नहीं तीसरी बार जीती है, जबकि बसपा दो बार और सपा सिर्फ एक बार जीती है। देवबंद पारंपरिक तौर पर कांग्रेस की सीट है,पर एक बार निर्दलीय और लोकदल के विधायक भी जीत चुके हैं। 2017 से पहले बीजेपी की शशिबाला पुंडीर 1993 में और सुखबीर सिंह पुंडीर 1996 में क्रमश: 68698 और 61807 वोट पाकर विधायक रह चुके हैं।

देवबंद के पत्रकारों, नेताओं, किसानों और सामाजिक कामों में सक्रिय करीब दर्जन भर लोगों से जनज्वार ने बात की। सहारनपुर ईटीवी संवाददाता तसलीम कुरैशी कहते हैं, 'हां, मैंने भी देखा कि मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रचारित हो रहा है कि देवबंद में भाजपा से एक हिंदू ने विधायकी जीतकर इतिहास रच दिया है। पर आप यहां कहेंगे तो लोग हंसेंगे। मुझे अफसोस है कि ​दिल्ली में बैठे पत्रकार तथ्यों इस कदर अनभिज्ञ हैं और फेसबुक पर ​बैठ फिजूल की दावेदारियां किए जा रहे हैं। आखिर उन्होंने एक बार चुनाव की साइट की देख ली होती तब भी उनको पता चल जाता कि यहां पारंपरिक विजेता कौन है।'

मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौधरी के अनुसार, 'जीत की खुमारी में इलाकों के भूगोल बदलने की तेजी दरअसल उस सांप्रदायिक सोच को दिखाती है जो उन्मादी जमातों के दिल में दशकों से बैठा पड़ा है। जिस देवबंद में ​मुस्लिम वोटरों की आबादी ठीक से 35 प्रतिशत भी नहीं है, उसे 71 से80 बताने की मंशा का गहरा विश्लेषण होना चाहिए अन्यथा झूठ की नींव पर सच स्थापित करने की पत्रकारिता में नई परंपरा चल पड़ेगी।'
आंकड़ों में देवबंद का सच

विधानसभा — देवबंद — संख्या — 5

आबादी  — 8 लाख से अधिक

मतदान केंद्र — 178


वोटर — महिला — 1 लाख 49 हजार 547

      पुरुष —  1 लाख 77 हजार 306

कुल वोटर — 3 लाख 26 हजार 853


देवबंद विधानसभा में हिंदू व दलित वोट — 2 लाख17 हजार 354

देवबंद विधानसभा में मुस्लिम वोट — 1 लाख 9हजार 567

पूरा वोट — 3 लाख 26 हजार 921


प्रतिशत में हिंदू वोट — लगभग 65 प्रतिशत

प्रतिशत में मुस्लिम वोट — 35 प्रतिशत


चुनाव आयोग की संख्या और जाति और धर्म आधारित वोटरों की गिनती में 68 का फर्क है, वह इसलिए है कि उतने वोटरों का नाम वोटर लिस्ट में नहीं था।


इस बार देवबंद में वोट

भाजपा — 101977

बसपा — 72654

सपा — 55278

रालोद — 1129

सभी निर्दलीय प्रत्याशी — 1901

नोटा — 796

कुल वोट जो इस बार पोल हुआ — 2 लाख 33 हजार735

प्रतिशत — 67 प्रतिशत


इसमें से सपा और बसपा को मिले वोट को देखें तो वह 1 लाख 27 हजार 932 होता है, जबकि भाजपा को 1 लाख 1 हजार 77 वोट मिले हैं।

जाहिर वह दावेदारी इन तथ्यों के आगे सिर के बल खड़ी नजर आती है, जो मीडिया और सोशल मीडिया ने बड़े जोर—शोर से प्रचारित किया।

एक तो देवबंद में न तो हिंदुओं से मुसलमान ज्यादा हैं और न ही मुस्लिम या उनकी औरतों ने कोई वोट किया है। बल्कि भाजपा को हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा मिला है। अलबत्ता चुनाव परिणामों से साफ है कि हिंदुओं की करीब 40 हजार आबादी ने सपा—बसपा को भी वोट किया है।

Mar 10, 2017

सैफुल्ला के पिता ने की जांच की मांग

भाई ने उठाए पुलिसिया दावे पर सवाल

लखनऊ के ठाकुरगंज में आतंकी होने के आरोप में मारे गए सैफुल्ला के पिता सरताज ने बेटे के इनकाउंटर के जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बेटे के आतंकी होने की खबर मीडिया से मिली। सच्चाई क्या है, यह तो जांच से ही पता चल सकता है..... 

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत करते सैफुल्ला के भाई और पिता
उन्होंने यह भी कहा, 'अत्यधिक दबाव के चलते मैंने बेटे की लाश लेने से मना कर दिया, पर मैं मीडिया के सामने बार-बार पूरे मामले की जांच की मांग करता रहा। मीडिया ने उसे प्रसारित नहीं किया।'

रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए सैफुल्ला के पिता ने बार—बार कहा कि मैं अभी भी बहुत दबाव महसूस कर रहा हूं। हालांकि आतंक के मामले में फर्जी ढंग से फंसाए गए लोगों की कानूनी मदद करने वाले संगठन 'रिहाई मंच' ने सैफुल्ला के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें किसी के भी दबाव में न आने की बात कही। रिहाई मंच की ओर से मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मो0 शुऐब, महासचिव राजीव यादव, शबरोज मोहम्मदी, प्रियंका शुक्ला, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, सेराज बाबा, फिरदौस सिद्दीकी, एखलाक चिश्ती, रजीउद्दीन और परवेज सिद्दीकी कानपुर गए थे। 

कानपुर में सैफुल्ला के घर दौरे पर गए रिहाई मंच के कार्यकर्ताओं से बातचीत में सैफुल्ला के भाई खालिद ने बताया कि किसी ने उन्हें फोन करके अपने को पुलिस अधिकारी बताया और कहा,  तुम अपने भाई को समझाओ। हम तुम्हारी उससे बात करवाते हैं वो सरेंडर नहीं कर रहा है और शहादत देने की बात कर रहा है। इसके बाद खालिद ने बदहवासी में अपने भाई से जोर-जोर से सरेंडर कर देने की बात करता रहा, लेकिन उधर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, जिसके बाद फोन कट गया।'

रिहाई मंच के पूछने पर कि उसे आपको भाई की आवाज सुनाई दे रही थी तो सैफुल्ला के भाई खालिद का जवाब था, 'भाई की आवाज नहीं सुनाई दे रही थी। सिर्फ गोलियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी।' 

रिहाई मंच के अध्यक्ष और लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, 'सैफुल्ला के कानपुर​ स्थित घर जाने से पहले हमारी टीम ने लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित कथित मुठभेड़ स्थल का दौरा कर स्थानीय लोगों से बातचीत की।' 

मोहम्मद शोएब के अनुसार, 'पुलिस ने लाउडस्पीकर पर सैफुल्ला के आत्मसमर्पण करने की बात कहने का दावा किया है। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सवाल उठता है कि तब पुलिस यह दावा क्यों कर रही है? क्या ऐसा करके वो इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या को विधिपूवर्क पूरा किए गए अपने कथित काउंटर अटैक का तार्किक परिणाम बताना चाहती है?' 

Mar 9, 2017

दुनिया की सबसे भ्रष्ट पुलिस तीन दिन में भरोसेमंद कैसे हो गयी

तीन दिन पहले एक सर्वे में भारत के लोगों ने कहा कि देश की पुलिस दुनिया की सबसे भ्रष्ट पुलिस है। 7 मार्च का जारी हुई एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में 70 प्रतिशत भारतीयों ने बहुत खुलकर बताया कि बिन पैसे लिए पुलिस कैसे एक नहीं सुनती। पैसे लेकर मुकदमे दर्ज करती है, कार्यवाही करती है, फंसाती है या छोड़ती है......

अजय प्रकाश 

याद कीजिए यह सर्वे अखबारों में छपा भी। देश के लोगों कहा भी कि 10 में से 7 लोग घूस देते हैं तभी पुलिस काम करती है। लोगों ने यह भी बताया है कि पुलिस पैसा लेकर फर्जी मामलों में फंसाती है। पुलिस की खुबियों को कुछ टीवी वालों ने भी दिखाया।

फिर भ्रष्ट पुलिस में तीन दिन में ऐसा कौन सा रासा​यनिक परिवर्तन हुआ जिसके कारण वह आपको पवित्र लगने लगी। किस बिना पर मान लिया कि जो पुलिस बिन पैसे एक नहीं सुनती, वह सैफुल्ला को मारे जाने के बाद जो दावा कर रही वह सही ही है। खासकर उत्तर प्रदेश पुलिस, वह तो शिकायत दर्ज करने पर एक फोटोकॉपी तक नहीं देती।  

सवाल यह भी है कि क्या आपने तीन दिन पहले झूठ कहा था? आपने पुलिस को भारत का सबसे भ्रष्ट महकमा किसी से पैसे लेकर कहा? किसी टीवी चैनल और अखबार के बहकावे में कहा? किसी मीडिया ने आप पर मानसिक दबाव बनाया कि आप भारतीय पुलिस को देश ही नहीं दुनिया की सबसे भ्रष्ट सुरक्षादाता की उपाधि से नवाजें।  

अगर नहीं तो उसी पुलिस द्वारा आतंक के मामले में गढ़ी गयी इनकाउंटर की कहानी आपको शत प्रतिशत सच कैसे लगी। सिर्फ इसलिए कि मारा जाने वाला मुसलमान है, एक कमजोर और बेबस घराने की औलाद है। 

अन्यथा कैसे आपने मान लिया कि पुलिस और पिता की भावना एक है। कैसे आपने मान लिया कि न्याय और सत्ता की भावना एक है। किस बिना पर आप आंखों से खून रो रहे एक पिता को बहादुरी का तमगा देने पर आमादा हैं जबकि पांच वक्त के उस नमाजी बाप के हाथ में कब्र की मिट्टी तक नहीं लग पाई है। आपको क्या उसके भाई यह बात बेजा लगती है कि 'मरने वाला मर गया कौन झंझट मोल ले। नेता आएंगे, जिंदाबाद मुर्दाबाद होगा।'

बहरहाल, आपको नहीं लगता कि हिंदू— मुमलमान के चक्कर में सत्ता के सामने आप इतने कमजोर हो जाते हैं कि हर पांच साल बाद मदारी वोट लेने आ जाते हैं और आप उनके 'वादों' की मुंहदिखाई करते रह जाते हैं। आज सच्चाई का पुतला लग रही यही पुलिस जब गुंडों, नेताओं, पूंजीपतियों और माफियाओं की शागिर्द बनी घूमती है और चौतरफा बिसुरते फिरते हैं, फिर कोई हिंदू भावना या सांप्रदायिक चाहत आपका भला कर पाती है क्या?  

क्या आपकी इसी कमजोरी के चलते सत्ता की बेशर्मी और आपकी मानसिक गुलामी नहीं बढ़ती जा रही। क्या इसी कारण देश की पुलिस, नेता और अधिकारी दिन—ब​—दिन और भ्रष्ट, तानाशाह और जनविरोधी नहीं होते जा रहे। जबकि देश की जनता बतौर नागरिक रोज—ब—रोज कमजोर होती जा रही है। 

आपको याद है हमारे गृहमंत्री राजनाथ सिंह 67 लोगों की हत्या के आरोपी असीमानंद के बारे में कहा था, असीमानंद आतंकी नहीं हो सकता। विपक्ष में रहते हुए राजनाथ सिंह बकायदा आतंक के आरोपियों से बकायदा मिले थे, उनको छुड़वाने का आश्वासन दिया था और वादा किया था कि हमारी सत्ता आई तो उन्हें छोड़ देंगे। 

असीमानंद का बरी होना, माया कोडनानी का गुजरात दंगों में सौ लोगों की हत्या के आरोप में दोषी करार दिए जाने के बाद 28 साल की सजायाफ्ता होने के बावजूद घर पर महीनों से आराम करना और साध्वी प्रज्ञा का धमाकों के सभी मामलों से बरी होते जाना क्या उसी योजना का हिस्सा नहीं है। 

ऐसे में पुलिस की किसी कार्यवाही पर आंख मूंद लेना और मुसलमान होने के कारण पुलिस की दावेदारी को सच मान लेना न्याय के पक्ष में होने की बजाय पुलिसिया भ्रष्टाचार और सत्ता की तानाशाही के पक्ष में है। साथ ही किसी सरकार की सांप्रदाकिता किसी भी कीमत पर देश और जनता के हित में नहीं हो सकती, पार्टी हित में भले हो जाए।

Mar 8, 2017

तो इसलिए मान लेंगे सैफुल्ला को आतंकी !

दिल्ली में या दूसरे राज्यों में कश्मीरी होने के आरोप में जो लोग सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाते हैं, उनके अंतिम संस्कार भी पुलिस खुद ही करती है। परिवार डर, असुरक्षा के कारण लाश ले जाने नहीं आता या गरीबी इतनी होती है कि उनके लिए संभव नहीं हो पाता...
 
अजय प्रकाश

आतंकी होने के आरोप में मारे गए सैफुल्ला की लाश नहीं स्वीकारने को लेकर जो लोग उसके पिता को बधाई दे रहे हैं, उनलोगों को एक गरीब पिता की मुश्किल भी समझनी चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि उनकी मंशा और पिता की आत्मस्वीरोक्ति के बीच अल्पसंख्यक होने की मजबूरी और गरीबी की एक गहरी रेखा है, जो दिखने में हिंदू—मुसलमान के लिए एक जैसी लगती है पर फर्क इतना बड़ा है कि उस खाई को आजादी का 70 साल भी नहीं पाट पाया है।

बधाई देने वालों की निगाह में सैफुल्ला के पिता ने बेटे की लाश लेने से मना कर वह काम किया है जो मुसलमानों को लेकर इस देश का 'हिंदू विवेक' सोचता है। ​​बधाई देने वालों को लग रहा है कि मोदी युग में ऐसा पहली बार हुआ है। आतंक के आरोप में मारे गए किसी बेटे के खिलाफ एक बाप ने उस तरह से पहली सोचा है, जैसा इस देश का 'सामूहिक विवेक' सोचता है, जैसा मीडिया सोचती है। 
 
हालांकि पहले भी कई बार और कश्मीर में दर्जनों बार परिवारों ने लाश लेने से मना कर दिया है। दिल्ली में या दूसरे राज्यों में कश्मीरी होने के आरोप में जो लोग सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाते हैं, उनके अंतिम संस्कार भी पुलिस खुद ही करती है। परिवार डर, असुरक्षा के कारण लाश ले जाने नहीं आता या गरीबी इतनी होती है कि उनके लिए संभव नहीं हो पाता।

बहरहाल 'सामूहिक विवेक' यानी 'हिंदू विवेक' चाहता है कि आतंकवाद या देशद्रोह के जैसे मामलों में अगर कोई सैफुल्ला टाइप नाम उभरे तो उसे तत्काल ठोक दिया जाए, पत्थरों से कुचल दिया जाए या सरेआम चौराहों पर जला दिया जाए। यह उनके लिए न्याय का सबसे वाजिब तरीका है। उसके लिए अदालत, पुलिस, मानवाधिकार, तफ्शीस के सभी दरवाजे बंद कर दिए जाएं। यहां तक कि उसके अपने घर के भी।

और इस बार यही हुआ कि सैफुल्ला के पिता और भाई ने कहा कि एक आतंकी का शव हम नहीं लेंगे। एक गरीब पिता ने घर का दरवाजा भी बंद कर दिया है। आरोपी बेटे को आतंकी मान लिया, न्याय, बहस और संदेह के सभी दरवाजे पिता ने भी ठीक वैसे ही बंद कर दिए जैसे यह बहशी और सांप्रदायिक समाज चाहता है। लेकिन सवाल बड़ा है कि क्या सच में एक पिता ऐसा हो सकता है, क्या सच में कोई बाप अपनी इच्छा से पुलिस, मीडिया और सुरक्षाबलों की भाषा बोल सकता है?

दूसरी तरफ 'सामूहिक विवेक' समझौता ट्रेन बम धमाकों में 67 लोगों की हत्या के आरोपी असीमानंद को लेकर स्वीकार ही नहीं कर पाता कि वह भी आतंकी हो सकते हैं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह मानते हैं कि हिंदू कभी आतंकी हो ही नहीं सकता। संयोग से यह बयान राजनाथ सिंह ने असीमानंद की गिरफ्तारी के मौके पर ही दिया था। आज असीमानंद को अदालत ने कई मामलों में से एक मामले में बरी कर दिया है।

आपने कहीं कोई चर्चा देखी, कोई सवाल बनते देखा, जबकि असीमानंद ने एक मीडिया रिपोर्ट में बड़ी साफ स्वीकार किया था कि आरएसएस मुखिया मोहन भागवत के आदेश पर समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों को असीमानंद और उनके साथियों ने अंजाम दिया था।

और तो और भोपाल में बीजेपी के 11 सदस्य आइएसआइ के एजेंट होने के आरोप में गिरफ्तार किए गए, उन पर कोई 'सामूहिक विवेक' की ओर से बौखलाहट देख रहे हैं। भूचाल ला देने वाली कोई बात आपको नजर आ रही है। कोई कह रहा है कि दामाद क्यों पाल रहे हो, गोली क्यों नहीं मार देते। चौराहों पर लटकाने के लिए कोई प्रदर्शन हो रहे हैं, भक्तों की भीड़ इस मामले में पत्रकारों को ट्रोल कर रही है।

याद होगा कि मीडिया ने बाटला हाउस इनकाउंटर मामले में संजरपुर के एक सपा नेता के बेटे सैफ को गिरफ्तार किया था और वह बाद कई अन्य मामलों में गिरफ्तार हुआ। उसकी गिरफ्तारी के बाद समाजवादी पार्टी को आतंकी पार्टी कहा जाने लगा था, सपा को आतंकियों की नर्सरी तक कहा था संघ और मीडिया ने। पर यहां वह शब्दावली क्यों बदल जाती है? कौन सी ताकत है जो हिंदू आतंक के आरोपियों को लेकर बसंत और मुस्लिम आतंक के आरोपियों के लिए जेठ हो जाती है।

अब बात सैफुल्ला और उसके पिता की।

अगर उसके पिता की ही माने तो सैफुल्ला नल्ला था। मतलब बिना काम का। दो महीने पहले सैफुल्ला घर से मारपीट कर बाहर निकला। परिवार के सामने परिवार पालने की दस मुश्किलें हैं। ऐसे में नल्ले बेटे की लाश लेकर नया झंझट जीवन में कौन बाप मोल लेना चाहेगा। अगर पिता होने के नाते सोच भी ले तो दूसरे भाई चढ़ बैठेंगे, खबरदार जो नल्ले के नाम पर घर को तबाह किया तो। वहीं रिश्तेदारों ने आतंकवाद मामलों में पड़े परिवार वालों की दुर्दशा के पुराने अनुभवों को सुनाया होगा वैसे में किस बाप की हिम्मत होगी जो मरे हुए बेटे के चक्कर में जिंदा लोगों की कब्र खुदवाए।

Mar 6, 2017

भाजपा का मिशन 'विस्पर कैंपेन'

मैं मानता हूं कि यह सिर्फ पत्रकारिता की सामाजिक संरचना के कारण है कि 5 चरणों में मैदान से बाहर रही बीजेपी को सिर्फ एक फेज यानि छठे चरण में टक्कर में आने पर पत्रकार बीजेपी की सरकार बना देते हैं.....

वहीं 5 चरणों में टक्कर में रही बीएसपी की गिनती को लेकर 'अच्छा...ऐसा...कहीं दिख तो नहीं रहीं...लग ही नहीं रहा... मायावती लड़ भी रहीं...खत्म हो गयीं मैडम...बस चमारों की पार्टी रह गयी', जैसे जुमले उछालते हैं।

इसलिए जब तक पत्रकारिता की सामा​जिक संरचना संतुलित नहीं होती, तब तक हारी हुई पार्टियों के पक्ष में माहौल बनाकर अंतिम तौर पर जिताने की कोशिश होगी। उतनी ही कोशिश जितनी मोदी जी पिछले दो दिनों से कर रहे हैं। मोदी जी को भरोसा नहीं कि बनारस की सभी आठ सीटों पर भाजपा जीत पाएगी। आरएसएस और बूथ कार्यकर्ताओं ने आज 6 बजे की आखिरी रिपोर्ट में हां तो कहा है, पर भरोसे के साथ नहीं।

ऐसे में भक्त पत्रकारों की बड़ी संख्या आज और कल 'विस्पर कैंपेन' करेगी। 'विस्पर कैंपेन' भाजपा का सबसे आजमाया नुस्खा है जो वह पिछले कई दिनों से बनारस में बड़े स्तर पर कर रही है। इससे पहले भाजपा ने 2014 चुनाव में विस्पर कैंपेन में लगभग 1 लाख से अधिक लोगों का उतारा था और वह लोग भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में कामयाब रहे। इस बार भी विधानसभाओं में वह बूथ कार्यकर्ताओं के साथ लगाए गए हैं।

अब आप देखिए कि आप खुद कैसे और कब—कब विस्पर कैंपेन का हिस्सा बने हैं या बनाए गए हैं या ऐसे लोगों से टकराए हैं।

विस्पर कैंपेन में अलग—अलग राज्यों के युवा होते हैं, जिनमें कुछ पत्रकार, कुछ पत्रकारनुमा कार्यकर्ता, समर्थक और कुछ सर्वे कंपनियों के लोग होते हैं। अलग राज्यों के इसलिए रखे जाते हैं जिससे स्थानीय लोग उन पर भरोसा कर सकें और खुद को कनविंस महसूस कर सकें कि बाहर वाला भी ऐसा कह रहा है।

एक टीम 5 या 7 लोगों की हो सकती है। यह लोग चौक—चौराहों, चाय—पान की दुकानों, कॉलेजों—विश्वविद्यालयों और ट्रेनों—बसों में भेजे जाते हैं। ये लोग हो रही बहस में या अपनी तरफ से बहस छेड़कर, बताते हैं कि पूरे इलाके में भाजपा का माहौल है। ​हालांकि यह प्रयोग कुछ और पार्टियां भी कर रही हैं पर भाजपा को इसमें महारत है।

Mar 5, 2017

बनारस में हो रही राष्ट्रीय पत्रकारिता का एक मजमून

इन दिनों कई संपादक संवाददाता बन गए हैं। वह बनारस में जमे हुए हैं। उन्हीं में से किसी एक को मेरे एक जानकार से मेरा नंबर मिला। उनका फोन आया, अब बात सुनिये...

''अजय भाई, कोई मुद्दा बताइये जो बनारस का असल सवाल बने...''

मैं, ''दर्जन भर गंदे नालों को दिखाइए जो सीधे गंगा में गिरते हैं और बताइये नमामि गंगे कैसे बनारस में दम तोड़ रहा है।''

संपादक, ''ये बहुत ही रिपिटेड मुद्दा है।''

मैं, ''सडकों और आवाजाही की सुविधा को दिखाकर बताइये कि करोड़ों के फंड, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र होने और यूनेस्को से मिले विश्व धरोहर के दर्जे के बावजूद तीसरे दर्जे का शहर बना हुआ है।''

संपादक, ''चुनाव में कौन पढता है इन मुद्दों को। कोई चुनावी मुद्दा बताइये।''

मैं, ''मोदी महिलाओं के पक्षधर बनते हैं। बनारस में विधवा, परित्यक्त औरतें और भीख मांगने वाली महिलाओं की आबादी लाखों में है, इसपर कर दीजिए। और बताइये कि जहाँ सभी पार्टियों के धुरंधर हैं वहां आधे वोट की भागीदार औरत कहाँ है चुनाव में, प्रचार में।''

संपादक, ''यह तो मोदी को बेवजह टारगेट करना हो जायेगा। यह कोई आज की समस्या तो है नहीं।''

मैं' ''तो ठीक है आप बीएचयू पर करिये। बताइये कि अस्पताल से लेकर विश्विद्यालय तक कैसे दिन प्रतिदिन संसाधनों की कमी से घिरते जा रहे हैं। एक जगह शिक्षक नहीं तो दूसरे जगह सुविधा नहीं। महंगा इलाज और महँगी शिक्षा तो हैं ही। जबकि बिहार यूपी मिलाके 18 जिलों की उम्मीद है यहाँ के अस्पताल और विश्वविद्यालय से।''

संपादक, ''बहुत एकेडेमिक टाइप सवाल हैं। अच्छा...फिर बात करता हूँ आपसे। मोदी जी का जरा रोड शो कवर कर लूँ। थैंक्यू डियर।''