Oct 23, 2016

पार्टी होगी दो फाड़, 3 नवंबर के बाद अखिलेश करेंगे नई पार्टी की घोषणा

अखिलेश ने तो बहुत पहले ही शिवपाल को हाशिए पर ला दिया होता पर पिता के कारण वह गले हड्डी ढो रहे हैं। शिवपाल ने मुख्यमंत्री के इजाजत के बगैर केंद्र सरकार से 2 लाख करोड़ की डील कर आग में घी का काम किया था। पार्टी के विश्वस्त सूत्रों के हवाले से पार्टी दो फाड़ होगी. 3 नवंबर के बाद अखिलेश नई पार्टी की घोषणा करेंगे...

समाजवादी पार्टी उत्तर भारत की इकलौती ऐसी पार्टी है जिसमें नेतृत्व, रणनीति और कार्यशैली को लेकर न सिर्फ रगड़ा और मतभेद है बल्कि पारिवारिक पार्टी होने की वजह से एक दूसरे के प्रति भावनाएं (दुर) भी खुलेआम दिखती हैं। पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई का संकट दिनोदिन गहरा रहा है. इसी कड़ी में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल यादव को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया है। शिवपाल यादव के साथ चार और मंत्रियों को भी मंत्रिमंडल से निकाला गया है. इससे पहले शिवपाल यादव ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद अखिलेश समर्थकों को न सिर्फ पार्टी से अलग- थलग करने की कोशिश की थी, बल्कि एक तरह भतीजे को चेताने का काम भी किया था।

शिवपाल बर्खास्तगी घटनाक्रम के बाद उन कयासों को और बल मिल गया है जिनके आधार पर पार्टी के दोफाड़ की आशंका जताई जा रही थी। कहा जा रहा है कि पार्टी में बंटवारा हो सकता है, नई पार्टी बन सकती है।  

शिवपाल को बर्खास्तगी तक पहुँचाने में विधायक उदयवीर सिंह की चिट्ठी ने भी अहम् भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि पार्टी में चल रहे घमासान के बारे में कुछ दिन पहले पत्र लिखने वाले विधायक उदयवीर को पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया गया था. उदयवीर अखिलेश के काफ़ी क़रीबी माने जाते हैं।

गौरतलब है कि 15 सितंबर को किए पांच मिनट के प्रेस कांफ्रेंस में एक-एक वाक्य में तीन-तीन बार नेताजी-नेताजी की दुहाई देने वाले उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल सिंह ने एक झटके में मन की कर डाली थी और दो टूक जता दिया कि अब लड़ाई चिलमन से बाहर निकल आमने-सामने की ही होगी। अब बड़े भाई की आड़ गयी अब भाड़ में। शिवपाल ने 19 सितंबर को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते ही अखिलेश समर्थक सात पदाधिकारियों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया। 

मुलायम सिंह यादव के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने में शिवपाल ने किसी किंतु-परंतु का सहारा नहीं लिया और निष्कासित सात पदाधिकारियों में अखिलेश के चहेते तीन विधान परिषद सदस्यों सुनील सिंह यादव, आनंद भदौरिया, संजय लाठर को सबसे पहले निकाला और मीडिया में तत्काल सूचना प्रसारित करवाई। वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार कहते हैं, ‘शिवपाल ने जिन लोगों को निकाला है वे वो लोग थे जिन्होंने पिछले शासन काल में आंदोलन करते हुए पुलिस दमन के शिकार हुए और सिर पर पुलिस की बूट की चोट झेली है।’ ऐसे में सवाल उठने शुरू हो गए थे की क्या प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इससे कमजोर प्रतिक्रिया देंगे। क्या वह फिर एक बार चुप रहकर अपने को कमजोर मुख्यमंत्री कहलवाएंगें या पिता के आदेशों को इंतजार करेंगे। खासकर तब जबकि निकाले गए लोगों में सपा सांसद और मुलायम के चचेरे भाई रामगोपाल का भांजे अरविंद यादव भी शामिल हो। सभी जानते हैं कि पारिवारिक खेमेबंदी में रामगोपाल अखिलेश के पक्ष में खड़े होते हैं। 

समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री ने एक अनौपचारिक बात में कहा भी था कि, ‘अबकी नहीं मानेेंगे अखिलेश और न ही नेताजी की सुनेेंगे। अखिलेश ने तो बहुत पहले ही शिवपाल को हाशिए पर ला दिया होता पर पिता के कारण वह गले हड्डी ढो रहे हैं। शिवपाल ने मुख्यमंत्री के इजाजत के बगैर केंद्र सरकार से 2 लाख करोड़ की डील कर आग में घी का काम किया था। गडकरी से मिलकर पार्टी विरोधी गतिविधियों का काम किया था जिसका परिणाम उन्हें भुगतना होगा।’  

 गौरतलब है भाजपा नेता और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से उत्तर प्रदेश के तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मंत्री शिवपाल सिंह की मुलाकात सितंबर के दूसरे सप्ताह में हुई थी। मुलाकात अमर सिंह ने राज्यसभा सांसद और एस्सेल ग्रुप के निदेशक सुभाष चंद्रा की मदद से कराई थी। मामला उत्तर प्रदेश में नेशनल हाइवे बनाने को लेकर 2 लाख करोड़ का था। सूत्रों के मुताबिक गडकरी चाहते थे कि 50 फीसदी सड़क का ठेका हमारे लोगों को मिल जाए और 50 फीसदी आपके लोगों को। जानकारी के मुताबिक गडकरी ने ठेका जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा के एस्सेल ग्रुप को दिया और अमर सिंह ने अपने लोगों। डील में सचिव दीपक सिंघल ने महत्वपूर्ण भूमिका। हैरत की बात यह कि जिस मुख्यमंत्री के आदेशों पर यह सब होना है उसको खबर तब पता चलती है जब हस्ताक्षर के लिए प्रोजेक्ट पेपर सामने रखा जाता है।

पेशे शिक्षक और समाजवादी पार्टी की राजनीति में खासे सक्रिय रफीक अहमद बताते हैं, ‘शिवपाल कभी अखिलेश को मुख्यमंत्री स्वीकार ही नहीं कर पाए और जबसे यह पता चला है कि अगले चुनावों में असली टक्कर भाजपा और सपा के बीच है तबसे उन्होंने अभी से खुद को अगला मुख्यमंत्री मान लिया।’ 

अक्सर शिवपाल की एक मजबूती की बात मीडिया करता रहता है कि उनकी संगठन में बहुत व्यापक और लोकप्रिय पकड़ है इसलिए मुलायम शिवपाल को अहमियत देते हैं। मगर उनके परिवार के एक बेहद करीबी और शिवपाल और मुलायम सिंह की कई मुलाकातों के साक्षी रहे सेवानिवृत्त अधिकारी की राय में 'संगठन में मजबूती’ वाली बात मीडिया द्वारा शिवपाल ले खुद स्थापित कराई है जिससे मुख्यमंत्री न बन पाने की निराशा को एडजस्ट कर सकें। कौन नहीं जानता कि जो सत्ता में उसी की पकड़ हर जगह होती है। क्या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पार्टी में किसी की अधिक पकड़ है। फिर सपा में ऐसा क्यों है? तो यह मुलायम सिंह यादव का अपराध बोध है। 

बात खत्म हो उससे पहले पंचतंत्र की वह कथा जरूर याद करनी चाहिए कि दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली कौन है? कौन इन दोनों के मुंह का निवाला छिनने की फिराक में है? पहला जवाब भाजपा है। पर क्या शिवपाल उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से लेकर हाल ही में बसपा छोड़े स्वामी प्रसाद मौर्य कि दुर्गति से परिचित नहीं हैं। हां, इसमें कोई शक नहीं कि अगर पार्टी टूटती है तो इसकी बड़ी लाभार्थी भाजपा बनेगी और शिवपाल बली का बकरा। बाकि अखिलेश का क्या होगा यह तो समय बताएगा। वैसे भी पारी के हिसाब से अबकी बारी में अखिलेश की पार्टी को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष में ही बैठना है। 

 इस मसले पर वरिष्ठ राजनीतिक चिन्तक सुधीर पंवार कहते हैं कि, 'हर पार्टी संक्रमण काल से गुजरती है। संक्रमण पार्टी को एक नया रूप और नई संभावनाएं देता है पर यह यों ही नहीं होता। इस बीच बहुत कुछ टूटता और खत्म भी होता है। मोरारजी देसाई के समय में कांग्रेस में और मोदी के समय भाजपा में भी ऐसा ही हुआ। दरअसल यह लड़ाई पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी की है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनावों से सालभर पहले पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह या यशवंत सिन्हा को हाशिए पर ढकेला तो कितना शोर मचा था पर अब देखिए। इसलिए यह हायतौबा की बात नहीं है कि पार्टी संक्रमण के दौर से गुजर रही है लेकिन इसकी चिंता जरूर की जानी चाहिए कि उसके बाद बचेगा क्या और बलिदान कितना करना होगा।'

राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि पार्टी के दोनों धड़ों का झगड़ा अब खुलकर सामने आ चुका है और अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव को किनारा करने की ठान ली है.

Oct 22, 2016

5 करोड़ में बिका 'देशप्रेम', अब दलाली देकर रख सकेंगे पाकिस्तानी कलाकार

महेंद्र मिश्र

लीजिए भाई । अब राष्ट्रवाद भी बिकाऊ हो गया है । पहली बोली मुम्बई में लगी है । कीमत लगी है 5 करोड़ रुपये । यह एक फ़िल्म को रिलीज करने देने के एवज में लगी है ।

यह सौदा मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फड़नवीस की मध्यस्थता में उनके घर पर हुआ है । इस बैठक में सूबे की मशीनरी को बंधक बनाने वाले राज ठाकरे भी शामिल थे । साथ ही फ़िल्म के निर्माता निर्देशक के साथ बिरादरी के दूसरे वरिष्ठ लोग मौजूद थे । इसमें तय हुआ कि फ़िल्म के निर्माता सेना के कल्याण कोष में 5 करोड़ रुपये जमा करेंगे ।

साथ ही ठाकरे ने इसकी भी घोषणा कर दी कि आइन्दा कोई 5 करोड़ रुपये देकर पाक कलाकारों को फ़िल्म में रख सकता है । यानी 5 करोड़ में दुश्मन दोस्त में बदल जाएगा । और राष्ट्रवाद की गरिमा भी अक्षुण हो जायेगी । पहली बात तो हमारी सेना और उसका कल्याण इस तरह के किसी सौदे और फिरौती के पैसे के मोहताज नहीं है । और यह खुद उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ है । साथ ही एक ऐसे अंदरूनी राजनीतिक मामले में उसको ले आना देश के भविष्य और उसकी राजनीति के लिए बहुत घातक है ।

इस मामले में केंद्र सरकार और खासकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह की भूमिका भी संदिग्ध रही । फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक ने राजनाथ से मुलाकात की थी । उसके बाद देवेन्द्र फडनवीश भी उनसे मिले थे । यानी सब कुछ उनके संज्ञान में हुआ । ऐसे में अगर केंद्र ने इस समस्या का यही समाधान निकाला तो यह बहुत अफसोसनाक है ।

यह बिल्कुल कानून और व्यवस्था का मामला था । और फ़िल्म को शांतिपूर्ण तरीके से पर्दे पर दिखाये जाने की जिम्मेदारी सरकार की थी । लेकिन अपना यह कर्तव्य निभाने में वह पूरी तरह से नाकाम रही है। उसने एमएनएस के गुंडों के सामने समर्पण किया है । कल एक दूसरा गुंडा अपराधी इसी तरह से किसी मामले में सामने आए तो उसके लिए यह एक नजीर होगा । और हालात जिस तरफ जा रहे हैं कल को यह राष्ट्रवाद अगर चुरमुरे के भाव बिके तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए ।

बहरहाल कांधार कांड में आतंकियों के सामने घुटने टेकने वालों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती है । बस अंतर यही है कि तब इन लोगों ने समर्पण बाहरी अपराधियों और गुंडों के सामने किया था । इस बार देश के भीतर के गुंडों के सामने किया है ।

हिरासत में हत्या की चैंपियन है यूपी पुलिस

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने मानवाधिकार हनन के मामले में उत्तर प्रदेश को अव्वल पाया है। अक्टूबर 2015 से सितंबर 2015 में दर्ज हुए मानवाधिकार हनन के मामलों में 44 प्रतिशत उत्तर प्रदेश से दर्ज हुए हैं।

21 अक्टूबर को एनएचआरसी फाउंडेशन दिवस पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एचएल दत्तु की ओर जारी किए आंकड़ों के अनुसार पिछले एक वर्ष में पूरे देश भर में मानवाधिकार हनन के 1.05 लाख मामले दर्ज हुए। उनमें से 46 हजार 5 सौ 75 मामले उत्तर प्रदेश से  हुए, जबकि मानवाधिकार हनन में दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रहे ओडिशा में क्रमश: 10,227, हरियाणा 7,342 और बिहार 4,254 मामले दर्ज हुए ।

पुलिस और न्यायिक हिरासत में मरने वालों की सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में ही उजागर हुई है। आयोग द्वारा जारी सूची के मुताबिक न्यायिक हिरासत में देश भर में कुल 1757 मौतें हुईं। उनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 401 लोगों की न्यायिक हिरासत में मौत हुई। वहीं पुलिस हिरासत में 192 मौतें हुईं जिनमें से सबसे ज्यादा 27 उत्तर प्रदेश के नाम रही।

Oct 21, 2016

एक दलित शिक्षिका का सुलगता सवाल

क्या हम अपनी बेटियों के साथ बलात्कार होने का इन्तजार करें ?

भंवर मेघवंशी

यह जलता हुआ सवाल राजस्थान के पाली जिले की एक दलित शिक्षिका का है ,जो कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय सोजत सिटी की संस्था प्रधान है .शोभा चौहान नामकी यह सरकारी अध्यापिका  एक बहादुर सैनिक की बेटी है और बाबासाहब से प्रेरणा लेकर न्याय के लिए अनवरत लड़ने वाली भीमपुत्री है .उनके विद्याालय में पढने वाली चार दलित नाबालिग लड़कियों ने उन्हें 15 मार्च की शाम 8 बजे बताया कि उनके साथ परीक्षा के दौरान 12 और 14 मार्च 2016 को परीक्षक छैलसिंह चारण ने परीक्षा देते वक़्त अश्लील हरकतें की .

छात्राओं के मुताबिक – शिक्षक छैलसिंह ने उनमें से प्रत्येक के साथ पेपर देने के बहाने या हस्ताक्षर करने के नाम पर अश्लील और यौन उत्पीड़न करने वाली घटनाएँ की .आरोपी अध्यापक ने उनके हाथ पकड़े ,उन्हें मरोड़ा ,लड़कियों की जंघाओं पर चिकुटी काटी और अपना प्राइवेट पार्ट को बार बार लड़कियों के शरीर से स्पर्श कर रगड़ा .इतना ही नहीं बल्कि चार में से एक लड़की को अपना मोबाईल नम्बर दे कर कहा कि छुट्टियों में इस नम्बर पर बात कर लेना .में तुम्हें पास कर दूंंगा .ऐसा कह कर उसने उक्त लड़की को वहीँ रोक लिया ,लड़की बुरी तरह से सहम गई .बाद में दूसरी छात्राओं के आ जाने से उसका बचाव हो सका .

निरंतर दो दिनों तक हुयी यौन उत्पीडन की वारदात से डरी हुई चारों लड़कियां जब कस्तूरबा विद्यालय पहुंची तो उन्होंने हिम्मत बटोर कर अपने साथ हुई घटना की जानकारी संस्था प्रधान श्रीमती शोभा चौहान को रात के 8 बजे दे दी.गरीब पृष्ठभूमि से आकर पढाई कर रही इन दलित नाबालिग छात्राओं के साथ विद्या के मंदिर कहे जाने वाले स्थल पर गुरु के द्वारा ही की गई इस घृणित हरकत की बात सुनकर शोभा चौहान स्तब्ध रह गई .उन्होंने तुरंत उच्च अधिकारीयों से संपर्क किया और फ़ोन पर मामले की जानकारी दी .

15 मार्च को केजीबी संस्था प्रधान शोभा पीड़ित छात्राओं के साथ परीक्षा केंद्र पंहुची ,जहाँ पर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी नाहर सिंह राठोड की मौजूदगी में केन्द्राध्यक्ष से बात की ,आरोपी शिक्षक को भी तलब किया गया .शुरूआती ना नुकर के बाद आरोपी शिक्षक छैलसिंह ने अपनी गलती होना स्वीकार कर लिया
.
लेकिन आरोप स्वीकार कर लेने से पीड़ित छात्राओं को तो न्याय नहीं मिल सकता था और ना ही ऐसे घृणित करतब करने वाले दुष्ट शिक्षक को कोई सजा ,इसलिये संस्था प्रधान शोभा चौहान ने इस मामले में कानूनी लडाई लड़ने का संकल्प ले लिया ,शोभा ने आर पार की लडाई का मानस बना लिया था और इसमें उनकी सहयोगी थी एक शिक्षिका मंजू तथा चारों पीड़ित दलित छात्राएं .बाकी कोई साथ देता नजर नहीं आ रहा था ,पर शोभा चौहान को कानून और व्यवस्था पर पूरा भरोसा था,उन्होंने संघर्ष का बीड़ा उठाया और न्याय के पथ पर चल पड़ी .अगले दिन वह क्षेत्र के उपखंड अधिकारी के पास लड़कियों को लेकर पंहुच गई .उपखंड अधिकारी ने ब्लाक शिक्षा अधिकारी को जाँच अधिकारी नियुक्त किया.प्रारम्भिक जाँच में शिक्षा विभाग ने भी शिक्षक छैलसिंह को दोषी पाया

.दूसरी तरफ संस्था प्रधान शोभा चौहान ने शाला प्रबंध कमिटी की आपातकालीन मीटिंग बुलाई ,जहाँ पर आरोपी शिक्षक के खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज कराने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से लिया गया ,विभाग ने भी आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने हेतु निर्देशित कर दिया .ऐसे में संस्था प्रधान होने के नाते श्रीमती शोभा छैलसिंह के खिलाफ पुलिस थाना सोजत में मुकदमा क्रमांक 83 /2016 अजा जजा अधिनियम की धारा  3 (1 ) (3 ) (11 ) तथा पोस्को एक्ट की धारा 7 व 8 के तहत दर्ज करवा दिया .

मुकदमा दर्ज होते ही मुसीबतों का अंतहीन दौर शुरू हो गया ,पीड़ित छात्राओं के परिजनों और रिश्तेदारों को डराया धमकाया जाने लगा .उनको संस्था प्रधान के विरुद्ध उकसाया जाने लगा .राजनितिक दलों के लोगों द्वारा छेड़छाड़ करनेवाले शिक्षक के समर्थन में माहौल बनाया गया .जाँच को प्रभावित करने की भी कोशिस की गई ,मगर शुरूआती जाँच अधिकारी भंवर लाल सिसोदिया ने पूरी ईमानदारी से जाँच की .पीड़ितों के बयान कलमबद्ध किये तथा उनकी विडिओ रिकोर्डिंग की .मगर आरोपी पक्ष ने अपने जातीय रसूख का इस्तेमाल किया गया और कोर्ट में होने वाले धारा 164 के बयान लेने में जान बुझ कर देरी करवाई गई ,दो तीन बार चक्कर कटवाए और अंततः न्यायलय तक में बयान देते वक़्त पीड़ित दलित छात्राओं को धमकाया गया .

 चार में से तीन लड़कियों को कोर्ट में अपने बयान बदलने के लिए मजबूर कर दिया गया मगर एक लड़की ने बहादूरी दिखाई और किसी भी प्रलोभन और धमकी के सामने झुके बगैर वह अपने आरोप पर अडिग रही ,फलत जाँच अधिकारी सिसोदिया ने मामले में चालान करने की कोशिस की .जैसे ही आरोपी शिक्षक को इसकी भनक मिली कि जाँच उसके खिलाफ जा रही है तो उसने राजनीतिक अप्रोच के ज़रिये 8 मई को जाँच सिरोही जिले के पुलिस उपाधीक्षक तेजसिंह को दिलवा दी ,जो की आरोपी के स्वजाति बन्धु थे .इस तरह न्यायालय में 164 के बयान लेने वाला न्यायाधीश अपनी जाति का और अब जाँच अधिकारी भी अपनी ही जाति का मिल जाने पर जाँच को मनचाहा मोड़ देते हुए मामले में फाईनल रिपोर्ट देने की अनुशंषा कर दी गई .

परिवादी शिक्षिका शोभा चौहान को जब इसकी खबर मिली तो उन्होंने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और मामले की जाँच पुलिस महानिदेक कार्यालय जोधपुर के एएसपी केवल राय को सौंप दी गई .जहाँआज भी जाँच होना बताया जा रहा है .इतनी गंभीर घटना की 7 माह से जाँच हो रही है ,आज तक ना चालान पेश हुआ है और ना ही आरोपी की गिरफ्तारी .

न्याय की प्रत्याशा को हताशा में बदलते हुए यह जरुर किया गया कि शोभा चौहान का स्थानांतरण सोजत से जोधपुर कर दिया गया ताकि वह मामले में पैरवी ही ना कर सके ,हालाँकि शोभा चौहान हार मानने वाली महिला नहीं है,उन्होंने कोर्ट से स्टे ले लिया और आज भी उसी आवासीय विद्यालय में बतौर संस्था प्रधान कार्यरत है .उन्हें भयभीत करने के लिए दो बार भीड़ से श्रीमती शोभा चौहान पर हमले करवाए जा चुके है ,उनके चरित्र पर भी कीचड़ उछालने का असफल प्रयास हो चूका है ,मगर शोभा है कि हार मानना जानती ही नहीं है ,वो आज भी न्याय के लिए हर संभव दरवाजा खटखटा रही है .न्याय का संघर्ष जारी है .

उनको दलित शोषण मुक्ति मंच तथा अन्य दलित व मानव अधिकार संगठनों का सहयोग भी मिला है ,कामरेड किशन मेघवाल ,जोगराज सिंह ,तोलाराम चौहान तथा स्टेट रेस्पोंस ग्रुप के गोपाल वर्मा सहित कुछ साथियों ने इस मुद्दे में अपनी भूमिका निभाई है ,लेकिन जितना सहयोग समुदाय के जागरूक लोगों से मिलना चाहिए ,उतना नहीं मिला है .हाल ही में राज्य के कई हिस्सों में इसको लेकर ज्ञापन दिये गए है .

नाबालिग दलित छात्राओं के साथ यौन उत्पीडन करने वाले शिक्षक छैलसिंह को सजा दिलाने के लिए कृत संकल्प बाड़मेर के उत्साही अम्बेडकरवादी कार्यकर्ता जोगराज सिंह कहते है कि हमें हर हाल में इन दलित छात्राओं और दलित शिक्षिका शोभा चौहान को न्याय दिलाना है.

वर्तमान हालात यह है कि सभी पीड़ित चारों दलित छात्राएं इस घटना के बाद से पढाई छोड़ चुकी है .संस्था प्रधान शोभा चौहान अकेली होने के बावजूद सारे खतरे झेलते हुए भी लडाई को जारी रखे हुये है और आरोपी शिक्षक का निलंबन रद्द करके उसकी वापस नियुक्ति कर दी गई है .

बाकी लड़कियों ने भले ही दबाव में बयान बदल दिये है मगर कस्तूरबा विद्यालय की एक शिक्षिका मंजू देवी और एक छात्रा जिसके माँ बाप बेहद गरीब है ,वह इस लडाई में संस्था प्रधान शोभा चौहान के साथ खड़ी हुई है ,यही संतोष की बात है .

अटल इरादों की धनी ,निडर और संघर्षशील भीमपुत्री श्रीमती शोभा चौहान की हिम्मत आज भी चट्टान की भांति कायम है ,वह बिना किसी डर या झिझक के कहती है कि दोषी शिक्षक के बचाव में लोग तर्क देते है कि छेड़छाड़ ही तो की ,बलात्कार तो नहीं किया ना ? फिर इतना बवाल क्यों ?

इस तरह के कुतर्कों से खफा शोभा चौहान का सबसे यह सवाल है कि – “  क्या हम इन्तजार करें कि हमारी बेटियों के साथ बलात्कार हो ,तभी हम जागेंगे, तभी हम बोलेंगे ,तभी हम कार्यवाही करेंगे ?

क्या वाकई हमें इंतजार करना चाहिए ताकि  शिक्षण संस्थानों में हो रहे भेदभावों और यौन उत्पीड़नों के चलते कईं और रोहित वेमुला व डेल्टा मेघवाल अपनी जान गंवा दें और शोभा चौहान जैसी भीमपुत्री इंसाफ की अपनी लडाई हार जाये ? अगर नहीं तो चुप्पी तोडिये और सोजत शहर के कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय की नाबालिग दलित छात्राओं को न्याय दिलाने में सहभागी बनिये .

-       भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है ,उनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है )

आदिवासियों के गांवों को माओवादियों ने नहीं सीआरपीएफ ने फूंका — सीबीआई

सीबीआई ने कहा पुलिस अधिक्षक कल्लूरी के आदेश में पर हुई थी हत्या और बलात्कार। आदिवासियों के सैकड़ों घरों को भी फूंक दिया था सुरक्षाबलों ने। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा, करो माओवादियों से शांतिवार्ता

सुप्रीम कोर्ट के सामने आज सीबीआई ने कहा कि 2011 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में जो तीन गांव फूंक कर तबाह कर दिए गए थे उन्हें 'कांबिंग आॅपरेशन' के नाम पर सुरक्षा बलों दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधिक्षक एसआरपी कल्लूरी के आदेश पर जला दिया गया था। पुलिस अधिक्षक के आदेश में पर तबाह किए गए इन गांवों में सुरक्षा बलों ने तीन आदिवासियों की हत्या और तीन महिलाओं का बलात्कार भी किया था।

सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, 'मैनें पुलिस और सीआरपीएफ पर इल्ज़ाम लगाया था कि पुलिस ने आदिवासियों के तीन गांवों को आग लगा दी थी, तब सरकार ने कहा था आग नक्सलवादियों ने लगाई है , आज सीबीआई की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट मे पेश हुई है। सीबीआई ने कहा है कि आग पुलिस सीआरपीएफ और विशेष पुलिस अधिकारियो ने लगाई और आग लगाने का आदेश पुलिस अधीक्षक कल्लूरी ने दिया था।'

गौरतलब है कि इस गांव की बलात्कार पीड़ित महिलाओं का वीडियो यू ट्यूब पर डालने के कारण पुलिस ने आदिवासी पत्रकार लिंगा कोड़ोपी के मलद्वार में मिर्च लगा डन्डा घुसा दिया था और ढाई साल तक जेल मे डाल दिया था। अब सीबीआई की रिपोर्ट मे सच्चाई सामने आने के बाद आईजी कल्लूरी की गिरफ्तारी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के जज मदन बी लोकूर और आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने सरकार ने जोर देकर सलाह दी है कि छत्तीसगढ़ में हो रही हिंसा को लेकर माओवादियों से शांतिवार्ता करें। केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसीटर जेनेरल को तुशार मेहता को कहा कि वह नागालैंड और मिजोरम के ​भी विद्रोही गुटों से शांतिवार्ता की पहल करे। मेहता ने कोर्ट से वादा किया है कि वह इस बारे में सरकार के उच्चस्तरीय प​दाधिकारियों से बात करेंगे। मेहता ने कोर्ट के समक्ष माना कि पुलिसिया कार्रवाई विद्रोहियों से निपटने का दीर्घकालिक उपाय नहीं हो सकता।

जो अपनी महिलाओं के नहीं हो सके, उनका देश क्या खाक होगा

यह और कुछ नहीं, गुंडई है। खुलेआम गुंडई! पहले आप घर में करते थे, अब चौराहों पर चौड़े होकर कर रहे हैं। धर्म, परिवार, समाज और सियासत का वास्ता देकर अपनी औरतों को आपने सदियों तक चुप कराया । पर वो चुप नहीं हुईं ? वह खड़ा होने का साहस कर गयीं। तो अब आप सड़क और सरकार के सामने सरेआम नंगा हो उतर आए हैं।

आप किसी के अधिकार को खत्म करने को लेकर धरना—प्रदर्शन कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों को मजबूर कर रहे हैं कि लोकतंत्र में आपकी औरतों की अधिकार बहाली की वे मुखालफत करें। आप कौम के नौजवानों तक को मुर्ख बना रहे हैं कि यह धर्म पर हमला है, औरत को अधिकार देने की पहल नहीं। 

हद तो यह कि इन मूर्खताओं के बावजूद आप धर्मं और खुद को प्रगतिशील कहते हैं? महान ईस्लाम और मुसल्लम ईमान वाले मुसलमान होने की बात कहते हैं? हद तो यह है कि जब आपके धर्म में औरतों की हालत पर बहस हो रही है तो आप कभी कूद कर हिन्दू धर्म की तो कभी किसी और धर्म की गंदगी उभार कर अपनी गलाजत को सही ठहराने की तरकीब तलाशते हैं. आपकी चिंता यह नहीं होती कि अपनी गन्दगी दूर कर दूसरे की मोरियों को उभार कर पूरे समाज से औरतों के दोयम स्थिति को ठीक  किया जाये बल्कि आप अपनी टट्टी ढंकने के लिए दूसरे की टट्टी उभार देते हैं और सोचते हैं बच गया धर्म,  हो गए हम मुसलमान। 

आखिर आप भारत को कैसा लोकतंत्र बनाना चाहते हैं जो औरतों के जुल्म को धर्म के चिलमन में जायज ठहरा दे।

पर दिक्कत क्या है कि ऐसा सिर्फ आप औरतों के लिए चाहते हैं। अपने लिए पैमाना आपका बिल्कुल अलग है। क्या यह ठीक वैसी ही गुंडई है नहीं है जैसी आपके साथ हिंदूवादी और सरकार करती है। तब तो आप चाहते हैं कि मुल्क आपके साथ खड़ा हो जाए, तब आपको मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और बराबरी के सवाल चतुर्दिक नजर आते हैं। तब आपको लगता है देश में संविधान की सरकार नहीं चल रही, संघियों की शाखा जारी है।

मगर आप अपनी महिलाओं के मामले में सरे राह डंडा लिए खड़े हैं और आधुनिक होते समय में आप दम ठोंककर कहते हैं — वह हमारी औरते हैं, उनका फैसला हम करेंगे...लोकतंत्र नहीं, सरकार नहीं। फिर यही भाषा आपके लिए हिंदू धार्मिक कट्टरपंथी, उन्मादी और दंगाई बोलें तो देश क्यों बोले? क्यों आपके साथ धर्मनिरपेक्षता का ढोल बजे और क्यों कोई कहे कि देश सबका है, क्यों न कहे कि यह देश हिंदुओं का है।

ऐसे में यह याद रखिए कि जो कौम और जिनके नुमाईंदे अपनी महिलाओं के साथ नहीं खड़े हो सकते, जो अपनी आधी आबादी के हक में नहीं हो सकते, उन्हें यह सोचने और चाहने का कोई हक नहीं कि पूरा देश उनके हक—हकूक के साथ खड़ा हो जाए, धार्मिक उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करे। 
अगर यह देश और इसका लोकतंत्र मुसलमान मर्दों के दबाव में झुक जाता है और तीन तलाक जैसे अमानवीय धार्मिक प्रथा को बरकरार रखने के लिए मजबूर होता है तो यह सिर्फ मुस्लिम औरतों की हार नहीं होगी। यह हार आप मर्दों की बड़ी होगी क्योंकि इससे आप हिंदूवादियों को वह लॉजिक देंगे जिससे वह सांस्थानिक स्तर पर  दशकों तक साबित करते रहेंगे कि आप कितने लोकतंत्र विरोधी, धार्मिक दकियानूस और स्त्री विरोधी हैं।

Oct 20, 2016

भाजपा आपको भटका रही है और आप भटकने के एक्सपर्ट बनते जा रहे हैं

पिछले दो दशकों से जनसंघर्षों की अगुवाई कर रहे हिमांशु कमार का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए...

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत सरकार ने गरीबों को राशन मिलने के तरीके में कुछ बदलाव किये हैं। अब गरीबों के लिए दो नए नियम बनाये गए हैं।

पहला तो यह की राशन उसी को मिलेगा जिसके पास आधार कार्ड होगा। अब आधार कार्ड तो उसी का बन सकता है जिसके पास पहले से कोई पहचान पत्र हो। लेकिन जो लोग फुटपाथ पर रहते हैं, ट्रांसजेंडर, बेघर और प्रवासी मजदूर हैं इनके पास कोई पहचान पत्र नहीं हैं, इसलिए इनका आधार भी नहीं बनेगा .

और इनका आधारकार्ड नहीं बनेगा तो इन्हें राशन भी नहीं मिलेगा, जबकि सस्ते राशन की ज़रूरत तो सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को है। यानि जिन लोगों को राशन की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उन्हें ही सरकार नें धक्के मार कर बाहर खदेड़ दिया है। इसके अलावा सरकार नें राशन दुकानों में अंगूठे और उँगलियों के निशान के मार्फत ही राशन देने का नियम बना दिया है।

अब जो मजदूर पत्थर ढोने का काम करते हैं या अमीरों के घरों में बर्तन साफ़ करने वाली महिलायें हैं, उनकी उँगलियों के निशान घिस जाते हैं या सर्दियों में उंगलियों की खाल फट जाती हैं। इन हालातों में दूकान पर दी गयी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती, बुढापे में झुर्रियां पड़ने से भी मशीन उँगलियों के निशान नहीं पहचानती।

इसकी वजह से मजदूर, महिलायें और बुजुर्ग लोग कई किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं और मशीन के द्वारा उँगलियों के निशान ना पहचाने जाने पर खाली हाथ वापिस चले जाना पड़ता है। कई महीनों तक राशन ना देने के बाद दुकानदार लिख देता है की यह व्यक्ति राशन लेने नहीं आता है। क्योंकि सरकार द्वारा दूकान वालों को यही आदेश दिया गया है, इसके बाद ऐसे लोगों के राशन कार्ड रद्द कर दिए जाते हैं।

जाहिर है लाखों गरीबों का राशन लेने का हक सरकार साजिश करके मार रही है। एक तरफ अंबानी जैसे धनिकों को पैसे के बल पर सारे देश की आबादी की दाल से मुनाफा कमाने और तीन गुना कीमत कर देने की सहूलियत दी जा रही है। वहीं जान—बूझ कर गरीब को राशन की दूकान से भगा कर बाज़ार से सामान खरीदने की साजिश पर काम चालू है ताकि गरीब मजदूर की जेब से भी मुनाफ़ा निकाल कर तिजोरी में डाला जा सके।

हम सरकार को चुनौती देते हैं कि सरकार में दम है तो गरीब जनता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति कर के दिखाए। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे काल्पनिक मुद्दों पर सारे देश का ध्यान भटकाने की साजिश बंद करी जाय। चुनाव भी देश की गरीब जनता के मुद्दे पर लड़ कर दिखाइये।

देश की गरीब जनता की बात कोई नहीं सुन रहा है। भाजपा बड़ी चालाकी से सारी राजनैतिक बहस को असली मुद्दों से हटा कर गाय, मुसलमान, पाकिस्तान जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ले गयी है। इनकी साजिश को पहचानिए, इन्हें असली मुद्दों पर खींच कर लाइए, अगर आप भाजपा के मुद्दों पर बहस में फंसेंगे तो वो आपको अपने मैदान में पीट कर भगा देंगे। इन संघियों को अपने मैदान में घसीट कर लाइए,
ये यहाँ मार खायेंगे कि ये हिन्दुओं की नहीं अमीरों के गुलामों की सरकार है।

घटिया होती पत्रकारिता का जिन्हें गम है सिर्फ वही पढ़ें

इस लेख को उन पत्रकारों को जरूर पढ़ना चाहिए जो सच को सामने लाने के लिए खुद में हलचल महसूस करते हैं और मानते हैं कि उनमें पत्रकारिता की धारा बदल देने का माद्दा है...

प्रेम से बोलो जय भारत माता की  

शेखर गुप्ता
पाकिस्तानी पत्रकार अौर टिप्पणीकार प्राय: कहते हैं कि जब विदेश और सैन्य नीतियों की बात आती है तो भारतीय मीडिया उनके मीडिया की तुलना में सत्ता के सुर में अधिक सुर मिलाता है। कड़वा सच तो यह है कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकार (ज्यादातर अंग्रेजी के) साहसपूर्वक सत्ता प्रतिष्ठानों की नीतियों व दावों पर सवाल उठाते रहे हैं। इनमें कश्मीर नीति में खामी बताना तथा अातंकी गुटों को बढ़ावा देने जैसे मुद्‌दे शामिल हैं। इसके कारण कुछ पत्रकारों को निर्वासित होना पड़ा (रजा रूमी, हुसैन हक्कानी) या जेल जाना पड़ा (नजम सेठी)।

भारतीय पत्रकारों की अपनी दलील है : भारत में कहीं ज्यादा असली लोकतंत्र है व सेना राजनीति से दूर है, इसलिए तुलना अप्रासंगिक है। जहां जरूरत होती है, हम सवाल खड़े करते ही हैं। श्रीलंका सरकार के खिलाफ लिट्‌टे को पहले ट्रेनिंग व हथियार देने में सरकार का अंध समर्थन करने (इंडिया टुडे ने 1984 में मुझे यह स्टोरी ब्रेक करने दी थी। इंदिरा गांधी ने तब मुझे राष्ट्र विरोधी कहा था।) और बाद में भारतीय शांतिरक्षक बल के द्वारा वहां हस्तक्षेप करने के समर्थन का भारतीय मीडिया पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।

किंतु यह परिपाटी अब बदल रही है और यह सिर्फ उड़ी हमले के बाद नहीं हुआ जब इंडिया टुडे के करण थापर ही एकमात्र एेसे पत्रकार थे, जिन्होंने सवाल उठाया कि कैसे चार गैर-सैनिक ब्रिगेड मुख्यालय की सारी सुरक्षा को चकमा देने में कामयाब हुए। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लौ आलोचनात्मक आकलन करने वाले एकमात्र रिटायर्ड जनरल थे। वे उन पांच ब्रिगेड में से एक के कमांडर थे, जो 1987 के अक्टूबर में सबसे तेज गति से जाफना पहुंची थीं। वह भी न्यूनतम नुकसान के साथ।

मैं स्वीकार करूंगा कि बदलाव करगिल के साथ हुआ। करगिल युद्ध तीन हफ्तों के इनकार के बाद शुरू हुआ। पाकिस्तानियों ने इनकार किया कि वे वहां मौजूद हैं, हमारी सेना ने इतनी गहराई और विस्तार में हुई घुसपैठ से इनकार किया। जनरलों के पहले जर्नलिस्ट वहां पहुंच गए। वहां पत्रकारों और सैन्य इकाइयों में एक-दूसरे के लिए फायदेमंद रिश्ता स्थापित हो गया। अंतिम नतीजा सबके लिए अच्छा रहा : भारत की विश्वसनीयता बढ़ी, क्योंकि इसने स्वतंत्र प्रेस को रणभूमि में बेरोक-टोक पहुंचने की अनुमति दी।

सेना को यह फायदा हुआ कि उसके असाधारण पराक्रम की कहानियां पूरे देश में पहुंचीं। इस सारी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण खबर रह गई : इतने सारे पाकिस्तानी इतने भीतर तक कैसे घुस आए, हमें इसका पता लगने में इतना वक्त क्यों लगा, हमने इसकी आधे-अधूरे मन से (छोटे गश्ती दलों का इस्तेमाल कर) पड़ताल क्यों की या ऐसे विमान क्यों इस्तेमाल किए, जो कंधे से चलाई जा सकने वाली मिसाइलों का निशाना बन सकते थे, जबकि बेहतर विकल्प मौजूद थे।

नतीजा यह हुआ कि किसी की बर्खास्तगी नहीं हुई। स्थानीय ब्रिगेड कमांडर सशस्त्र बल न्यायाधीकरण में भेजे गए और बच गए। युवा अफसरों व सैनिकों की वीरता की खबरें देकर हमने ठीक ही किया, लेकिन राजनीतिक व सैन्य प्रतिष्ठानों को अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाही चाहे न भी कहें, बहुत बड़ी अक्षमता के साथ बच निकलने देकर ठीक नहीं किया। सैन्य कमांडरों की नाकामी से बढ़कर खतरनाक कोई नाकामी नहीं होती और यही वजह है कि परम्परागत सेना जवाबदेही पर इतना जोर देती है। इस बीच भारतीय मीडिया को ताकत बढ़ाने वाले तत्व (फोर्स मल्टीप्लायर) के रूप में सराहना मिल रही थी।

हम उस पल में डूब गए, लेकिन गलत छाप भी छोड़ गए : पत्रकार देश के युद्ध प्रयासों के आवश्यक अंग हैं, उसकी सेना की शक्ति बढ़ाने वाले कारक। वे दोनों हो सकते हैं, लेकिन सच खोजने की चाह दिखाकर, सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरलों पर चीखकर नहीं या चंदमामा शैली के सैंड मॉडल के साथ स्टूडियो को वॉर रूम में बदलकर नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहां सिरिल अलमिडा और आयशा सिद्दीका नहीं हैं, जो ‘शत्रु’ के प्रवक्ता घोषित होने का जोखिम मोल लेकर कड़वा सच बोलने को तैयार हों। भारतीय न्यूज टीवी सितारों (मोटतौर पर) का बड़ा हिस्सा स्वेच्छा से प्रोपेगैंडिस्ट बनकर रह गया है।

जब पत्रकार अपने लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की परिभाषा स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रश्नों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। बेशक उड़ी और बाद की घटनाएं इस लेख की वजह हैं। इसने मीडिया को दो ध्रुवों में बांट दिया है, एक तरफ अत्यंत प्रभावी पक्ष उनका है, जो न सिर्फ कोई प्रश्न नहीं पूछते बल्कि वे दावे करने में सरकार व सेना से भी आगे निकल जाते हैं। इन दावों को भरोसेमंद बनाने के लिए रात्रिकालीन कमांडो कवायद के ‘सांकेतिक’ फुटेज का इस्तेमाल किया जाता है। साफ कहें तो कोई भी विश्वनीयता के साथ यह बताने की स्थिति में नहीं है कि तीन हफ्ते पहले हुआ क्या था। या तो हमारी सरकार तथ्यों को गोपनीय बनाए रखने में माहिर हो गई है या हम पत्रकारों ने उन्हें खोजना बंद कर दिया है।

दूसरी तरफ बहुत ही छोटा और सिकुड़ता ध्रुव है, खुद को दूसरों से बेहतर समझने वाले संदेहवादियों का। वे सरकार के किसी दावे पर भरोसा नहीं करते, लेकिन कोई तथ्य नहीं रखते, खोजकर कोई बड़ा धमाका नहीं करते। वे बहुत ही मार्मिक ढंग से सरकार से अपने दावों की पुष्टि करने वाले सबूत देने को कहते हैं। पत्रकारिता महाविद्यालय में जाने वाले हर युवा को सिखाया जाता है कि सरकार छिपाती है और पत्रकार को खोजना होता है। यहां हमारे सामने संदेहवादी खेमे में सबसे उदार, श्रेष्ठतम शिक्षा पाए, प्रतिष्ठित, ख्यात सेलेब्रिटी पत्रकार हैं, वे धमाकेदार खबर खोजते नहीं, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस की मांग करते हैं।

 वे खबर नहीं प्राप्त कर सकते, लेकिन वे मानक तय कर देते हैं, जिनका दूसरों को पालन करना ही चाहिए। एक समूह कहता है, आप मुझे जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा में भरोसा करता हूं, मुझे सबूत नहीं चाहिए। दूसरा कहता है, आप जो भी कह रहे हैं, उसमें किसी बात पर मुझे भरोसा नहीं है, इसलिए सैन्य अभियान को सार्वजिनक करें वरना मैं मान लूंगा कि आप झूठ बोल रहे हैं। अब यह न पूछें कि मैं क्यों कह रहा हूं कि भारतीय पत्रकारिता आत्म-विनाश के पथ पर है। जब यह नारा लगाने को कहें : ‘प्रेम से बोलो, जय भारत माता की’ तो कौन भारतीय इसमें दिल से शामिल नहीं होना चाहेगा, लेकिन यदि आप आपकी सरकार को मातृभूमि और राष्ट्र मान लें तो आप पत्रकार नहीं, भीड़ में शामिल एक और आवाज भर हैं।
(दैनिक भास्कर से साभार)