Jun 27, 2011

'हिंसा प्रेमी है हमारी सरकार' - पीवी राजगोपाल

भूमि सुधार की मांगों को लेकर 2007 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर से 25 हजार किसान पदयात्रा कर दिल्ली पहुंचे थे,जिसे ‘जनादेश’यात्रा कहा गया। एकता परिषद के बैनर तले हुई जनादेश यात्रा के बाद सरकार ने भूमि सुधारों को सामयिक बनाने के लिए ‘भूमि सुधार परिषद्’ का गठन किया था। हाल ही में एकता परिषद् के अध्यक्ष पीवी राजगोपाल दिल्ली दौरे पर थे। उनसे कई मसलों पर विस्तृत बातचीत हुई थी, पेश है प्रमुख अंश...  

पीवी राजगोपाल से अजय प्रकाश की बातचीत 


कालेधन के खिलाफ दिल्ली में अनशन कर रहे बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों पर  हमला कर सरकार ने आखिर क्या संदेश देना चाहा है?
तानाशाही और धोखे की यह सरकारी नीति बहुत दिन तक कारगर नहीं होगी। अगर देश की जनता लाइन लगाकर सरकारों को बना सकती है तो वह सरकार की चूलें भी हिला सकती है। हमारी सरकार अहमक है और उसे हिंसा पसंद है। पहले सरकार कश्मीरी युवकों को गोली मारती है फिर बात करती है, किसानों पर गोली दागती है फिर मांगें मानती है, उल्फा के युवाओं को तबाह करने के बाद शांतिवार्ता करती है। यहां तक कि अहिंसा में विश्वास  करने वाले संगठनों को सरकार पहले हिंसक घोषित  करती है,फिर वार्ता की तरफ बढ़ती है। हमारी हिंसाप्रेमी सरकार को अपनी जनता के प्रति इस व्यवहार को जितनी जल्दी हो सके बदल लेना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में एकता परिषद् पर माओवादियों से संबंध और उस पर प्रतिबंध की खबरों की क्या सच्चाई है?
यह सरकार के उसी अभियान का हिस्सा है ,जिसके तहत वह अहिंसक संगठनों को हिंसक करार देने पर तुली है। दरअसल, आदिवासी इलाकों के जल, जंगल और जमीन की लूट का निर्णय सरकार कर चुकी है। अब वह सिर्फ लूट के समर्थकों को ही राज्य हितैषी मानती है और बाकियों को दुश्मन। इस लूट के खिलाफ पहला मोर्चा आदिवासियों ने संभाला है इसलिए सरकार के वे सबसे बड़े दुश्मन हैं। सरकार आदिवासियों और उनके संघर्षों के साथ खड़े विभिन्न संगठनों-समूहों को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठी है। सबक सिखाने के लिए वह नक्सलवाद से निपटने के बहाने आदिवासियों के पक्ष में खड़े हो रहे लोगों को नक्सली करार देकर दमन के एक ही डंडे से सबका आसान शिकार कर रही है। आसान इसलिए है कि जिनका नक्सलवाद में विश्वास नहीं है,जो संगठन अहिंसा के रास्ते आदिवासियों की लूट का पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनको भी राज्य नक्सली बताकर आदिवासियों के संघर्षों से अलग कर देना चाहता है। उसी के नतीजे के तौर पर एकता परिषद पर भी प्रतिबंध की खबरें उड़ाई जा रही हैं।

छत्तीसगढ़ में एकता परिषद् पर प्रतिबंध की खबर के बाबत राज्य प्रशासन  से संगठन की कोई बात हो पायी है ?
छत्तीसगढ़ के एक दैनिक में पीयूसीएल के प्रतिबंध लगाने संबंधी समाचार छपा था। उसी में एकता परिषद की गतिविधियों को संदिग्ध और प्रतिबंध लगाये जाने की खबर थी। इस बाबत परिषद के कुछ साथी राज्य के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन  से मिले थे। महानिदेशक ने ऐसी किसी कार्यवाही से इनकार किया और अनभिज्ञता जाहिर की। दरअसल, इसमें मुझे राजनीतिक खेल ज्यादा लगता है।

कैसा राजनीतिक खेल?
छत्तीसगढ़ के ज्यादातर जिलों में एकता परिषद् का मजबूत जनाधार होने के कारण राज्य की भाजपा सरकार और आरएसएस समय-समय पर हमारे खिलाफ दुष्प्रचार  करते रहते हैं। पहले आरएसएस ने एकता परिषद् पर क्रिश्चियन  धर्म फैलाने का आरोप लगाया और अब माओवादियों से संदिग्ध संबंध होने की अफवाह फैला रहे हैं। एकता परिषद् पर यह आरोप दिग्विजयसिंह जब मुख्यमंत्री थे तब भी लगता था, और अब भी लग रहा है। जो मुद्दों से भटकाने की साजिश है। मैंने सभी मंत्रियों को पत्र लिखा कि पुलिस,फॉरेस्ट गॉर्ड कब से माओवाद और समाजवाद के ज्ञाता हो गये,जो सबको माओवादी बताते रहते हैं। मैंने मंत्रियों से पूछा कि क्या इन गार्डों को गांधी दर्शन और माओ दर्शन  का पाठ पढ़ाया गया है।
दरअसल, इन्हें चुनौती हमारे अहिंसात्मह आंदोलन से है, जिसको किसी आसान रास्ते ये किनारे लगा देने की फिराक में हैं। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में जनता को सही राजनीति की तरफ मोड़ना, अधिकारियों को जिम्मेदार बनने के लिए मजबूर करना राजनीतिक पार्टियों के लिए मुख्य खतरा है। वह ऐसे किसी संगठन को जनता के बीच पैठ  नहीं बनाने देना चाहते, जो सही मायने में जनता को लोकतंत्र में भागीदारी के लिए उत्तेजित करे।

कुछ महीनों पहले आपने सरकार और माओवादियों से बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की बात कही थी, क्या सरकार ने कोई दिलचस्पी दिखायी ?
हमने इच्छा इसलिए जाहिर की,क्योंकि चंबल क्षेत्र में डाकुओं को समर्पण कराने का एक अनुभव हमारे पास है। हम जानते हैं कि हिंसा में भरोसा करने वाले संगठनों से कैसे वार्ता की जाये, लेकिन यह वार्ताएं आदिवासी हितों को ताक पर रखकर संभव नहीं हैं। कौन नहीं जानता कि आदिवासी इलाकों में जारी अन्याय,अत्याचार और शोषण को रोककर माओवादियों को पसरने से रोका जा सकता है, मगर सरकार मदद नहीं लेना चाहती क्योंकि वह हिंसा को खत्म नहीं करना चाहती। अगर मैं पत्रकार पी.साईनाथ की किताब के शीर्षक ‘एव्रीबॉडी लव ड्रॉट्स’की तर्ज पर कहूं तो आदिवासी इलाकों में ‘एव्रीवन लव कंफ्लिक्ट’।

मतलब हिंसा को जान-बूझकर कायम रखा जा रहा है?
बिल्कुल। इसका सबसे बड़ा फायदा खनन कंपनियों को है। किसी ने 50एकड़ की लीज ली और खुदाई 100 एकड़ में हो रही है। कौन उसकी तहकीकात करने वाला है? अगर जनता लूट पर ऐतराज करती है तो उसे राज्य माओवादी समर्थक या उनका जासूस बताकर सारी जिम्मेदारी से ही बच जाता है। संघर्ष का इलाका है,सुरक्षा बल और नक्सली एक दूसरे को मार रहे हैं,आदि का बहाना बनाकर सरकारी कर्मचारी कभी सुचारू रूप से काम नहीं करते । जबकि संघर्ष के इन इलाकों में कर्मचारियों को सामान्य क्षेत्रों से अधिक भत्ता मिलता है। तीसरे हैं ठेकदार जो इस इलाके में बहुत खुश हैं। उन्होंने सड़क,पुल,स्कूल बनाये या नहीं, कोई पूछने वाला नहीं है। कहीं से कोई सवाल उठे तो इस क्षेत्र में एक ही जवाब है नक्सली समस्या।
ऐसा नहीं कि माओवादियों को इसमें कोई नुकसान है। राज्य के अत्याचारी रवैये से लगातार उनके कॉडरों की भर्ती हो रही है और उन्हें अवैध खनन से भरपूर टैक्स मिल रहा है। मैं नक्सलियों से पूछना चाहता हूं कि अगर वे हथियार से ही देश की तकदीर बदलने में भरोसा करते हैं तो उन्होंने कभी किसी मित्तल, टाटा या एस्सार जैसों को शिकार क्यों नहीं बनाया? माओवादी अगर खनन के विरोध में हैं तो कभी किसी खनन मालिक और माफिया को क्यों नहीं बंधक बनाते। मेरी राय में आदिवासियों की जीत एक अहिंसक मजबूत आधार वाले जनांदोलन के जरिये ही हो सकती है।

कई बार सरकार जनता के दबाव में कुछ कानून बनाने के लिए तैयार हो भी जाती है, लेकिन उसका अमल कैसे सुनिश्चित हो?
जिन अधिकारियों के कारण क्षेत्र में काम पूरा नहीं हुआ है,जब तक उन्हें सजा देने का कड़ा प्रावधान नहीं होगा, तब तक सही ढंग से कानून के लागू किये जाने की उम्मीद बेमानी है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ को लीजिए। वहां पिछले 63 वर्षों में दस से अधिक आइएएस और आईपीएस मुस्तैद हुए होंगे। उनकी मुस्तैदी के परिणाम के तौर पर सरकार अब स्वीकार करती है कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। फिर इन अधिकारियों की सजा क्यों नहीं है?अगर किसी नौकर के रहते घर में चोरी हो जाये तो माना जाता है कि वह अपने काम के काबिल नहीं है। उसी तर्ज पर इन अधिकारियों की पेंशन क्यों नहीं बंद होती, सस्पेंड क्यों नहीं किये जाते।

ऐसी हालत क्यों है?
आपातकाल के दौर में मेरे यहां केरल में एक नाटक होता था। उसमें राजा का आदेश था कि जब वह सोया हो तो किसी तरह का शोर नहीं होना चाहिए। एक दिन रात में चोर आया तो कुत्ते भोंकने लगे। चूंकि राजा का आदेश शोर नहीं करने का था, इसलिए सभी कारिंदे कुत्तों की ओर दौड़े। चोरों ने इत्मीनान से लूट का सामान बांधा और चलते बने। कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे देश की है। शांति और न्याय की बात करने वाले लोग देश के दुश्मन होते जा रहे हैं और कॉरपोरेट डकैत सरकार के हितैषी बने बैठे हैं।

लेकिन विरोध की ताकत भी तो बहुत बिखरी हुई है?
इसे हम भी शिद्दत से महसूस करते हैं,इसलिए एकता परिषद् की कोशिश है कि छोटे-मोटे अंतरविरोधों को छोड़, व्यापक एकता की ओर बढ़ा जाये।

गरीबों के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई माहौल क्यों नहीं बन पाता है?
गरीबों के बीच असल मुद्दा तो जल,जंगल और जमीन का ही है। मगर ऐसा नहीं है कि गरीबों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर देश में कई संघर्ष हुए हैं,बेशक उसकी व्यापकता अन्ना हजारे के मध्यवर्गीय आंदोलन की तरह नहीं रही है।

तो क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्यवर्ग और गरीब एक मंच पर आ सकते हैं?
पहले आजादी,फिर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के जरिये यहां के मध्यवर्ग ने अपने हिस्से में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाईयां तो लड़ीं,मगर जैसे ही मामला गरीबों के ऊपर किये जा रहे भ्रष्टाचार का आया तो ये बिदक गये। कारण कि गरीबों के लिए पहले भ्रष्टाचारी (ज्यादातर)यही लोग थे, जो अन्ना के साथ संघर्ष में भ्रष्टाचार के  खिलाफ दिख रहे थे।
मध्यवर्ग अपने लिए बेहतर लोकतंत्र चाहता है,लेकिन अपने से नीचे के तबके के लिए वह भी शोषक है। वह क्षणभर भी कोक और पेप्सी या दूसरी कंपनियों के उत्पादन से जुड़े भ्रष्टाचार को, कामगारों पर हो रहे भ्रष्टाचार को नहीं सुनना चाहता। वह नहीं चाहता कि किसान उसको कोल्ड ड्रिंक त्यागने के लिए कहे और बताये कि उसके खेत और पारिस्थिकी कैसे इन कंपनियों ने बर्बाद कर रखे हैं। इसलिए अन्ना के आंदोलन को पूरा समर्थन देते हुए भी एकता परिषद् की कोशिशरहेगी कि मध्यवर्ग और देश के गरीबों को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ खड़ा किया जाये। शुचिता और त्याग की भावना वाले जुझारू युवा ऐसा कर सकते हैं और उसी कीमत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुकम्मल लड़ाई संभव हो सकती है।

क्या यह एकता संभव होगी। खासकर तब जबकि दोनों वर्गों की जरूरतें अलग-अलग हैं?
इस देश के नब्बे फीसदी आंदोलन जल, जंगल, जमीन और जीवन जीने के संसाधनों की मांग को लेकर हैं। ऐसे में जरूरी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली से शुरू हुए आंदोलन को व्यापक पहुंच वाला बनाया जाये और समाज के सभी तबकों को साथ लाया जाये। इस मसले पर तमाम संगठनों की बैठक हुई है और शीघ्र ही अन्ना हजारे के हस्ताक्षर से देशभर के संगठनों को चिट्ठियांजायेंगी और एक राष्ट्रव्यापी बैठक की तैयारी है।

लोकपाल मसौदा समिति में शामिल अन्ना हजारे की टीम को चुनावी पार्टियों ने चुनाव लड़ने की चुनौती दी है, इस बारे में आप क्या कहते हैं?
इस बहस में दम नहीं है। देश का हर आदमी जानता है कि हमारे देश के ज्यादातर जनप्रतिनिधि गुंडई, पैसा और जातिगत आधार पर चुने जाते हैं। दूसरी बात कि अगर चुनावी दल नागरिक समाज के लोगों के लिए चुन के आने की पात्रता की शर्त रखते हैं तो पहला सवाल देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और योजना आयोग की उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहुलवालिया पर उठता है,जो बिना चुने ही इस देश की तकदीर का फैसला कर रहे हैं। ऐसे में मेरी राय है कि जो देश आजादी के 63 साल बाद जनता को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने में अक्षम रहा हो,उस देश के शासकों को जनता की ओर से उठ रहे सवालों पर चिढने और तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाने की बजाय संयत हो समाधान खोजना चाहिए।

छात्र नेता संदीप सिंह को एनएसयूआई के गुंडों ने लातों—जूतों से सरेआम पीटा

जनज्वार. झारखंड की राजधानी रांची में 23 जून को लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को कारगर बताने पहुंचे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को विरोध का सामना करना पड़ा था। विरोध कर रहे संगठन ‘आइसा’ से जुड़े छात्र मांग कर रहे थे कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री के भ्रश्टाचार की जांच को शामिल किया जाये। लेकिन मंत्री साहब के सामने किया गया आइसा का यह विरोध कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को पच नहीं सका और उससे जुड़े छात्रों ने विरोध कर रहे छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर बुरी तरह पीटा। मारपीट में आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संदीप सिंह समेत कई छात्रों को चोट आयी है।

 गौरतलब है कि लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को लेकर अन्ना हजारे की टीम और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच उभरे मतभेद के बाद कांग्रेस ने तय किया है कि उसके नेता और मंत्री जनता में अपने अच्छे और सच्चे लोकपाल के बारे में जनता को जानकारी देंगे। उसी अभियान के तहत रांची के अशोक होटल में मीडिया को संबोधित करने सिब्बल पहुंचे थे, जहां कांग्रेस के राजनीतिक भविश्य एनएसयूआइ ने नागरिक समाज द्वारा तैयार लोकपाल को लागू करने की मांग पर लातों-घूसों से अपना पक्ष रखा।

एनएसयूआइ की गुंडई का यह ‘अहिंसात्मक’ प्रदर्शन  संगठन के प्रदेश अध्यक्ष कुमार राजा और महासचिव शाहनवाज के नेतृत्व में रांची के अशोक होटल के सामने हुआ। एनएसयूआइ के लोग संदीप सिंह के इस बात से खफा थे कि उन्होंने पत्रकार के बतौर कपिल सिब्बल से सवाल पूछ दिया था और मंत्री जी असहज हो गये थे। संदीप सिंह के मुताबिक ‘वह आइसा के राश्ट्रीय अध्यक्ष के साथ समकालीन जनमत नाम की पत्रिका के नियमित लेखक है। इसी हैसियत से उन्होंने जानना चाहा कि ‘सरकार प्रतिदिन टैक्सों में कॉरपोरेट समूहों को 240 करोड़ की छूट क्यों देती है।’

उनके इस सवाल का कपिल सिब्बल जवाब देते उससे पहले ही एनएसयूआइ से जुड़े पांच-छह लोगों ने संदीप को धक्का देना और फिर पहचान पत्र मांगना शुरू कर दिया। पहचान पत्र नहीं दिखा पाने की स्थिति में उनलोगों ने संदीप को धक्का मारकर बाहर कर दिया। पहचान के बावत संदीप ने बताया कि ‘समकालीन जनमत पंजीकृत पत्रिका नहीं है, इसलिए पहचान पत्र जारी नहीं करती।’

कांफ्रेंस हाल से बाहर कर दिये जाने के बाद संदीप अपने साथियों के साथ मिलकर कपिल सिब्बल और कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, जिसका जवाब कांग्रेस के छात्र संगठन ने ‘अहिंसात्मक’ लातों-घूसों से दिया। हालांकि हमलावरों और प्रदर्शनकारियों की संख्या बराबर थी, लेकिन प्रदर्शनकारी टकहराहट में नहीं गये और उन्होंने बचाव करना ही लोकतंत्र के लिए जरूरी समझा।

पहले पत्रकार और फिर छात्र संगठन के नेता के रूप में संदीप ने दोहरी भूमिका क्यों निभायी के बारे में उनकी सफाई है, ‘अगर चिदंबरम्-सिब्बल-अभिषेक  मनु कांग्रेस के नेता और पूंजीपति समूहों के वकील हो सकते हैं तो मैं छात्र नेता और पत्रकार क्यों नहीं हो सकता।’

बहरहाल, आइसा के  अध्यक्ष संदीप सिंह ने कुमार राजा और अन्य के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी है, लेकिन अबतक किसी आरोपी की गिरफ्तारी रांची पुलिस नहीं कर सकी है। सीपीआइएमल की राज्य समिति ने भी बयान जारी कर घटना की भर्त्सना की है और दोषियों की गिरफ्तारी मांग की है। पत्रकार संगठन जेयूसीएस की ओर से जारी विज्ञप्ती में इसे पत्रकार बिरादरी पर हमला बताया गया।

अमेरिकी ‘रडार’ पर अब पाक परमाणु ठिकाने?

एबटाबाद की कार्रवाई में पाकिस्तान ने अपनी क्षमता व चौकसी का जो प्रदर्शन किया था वह भी अमेरिका देख चुका है। एबटाबाद में की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी विरोध के स्वर का स्तर भी अमेरिका भांप चुका है...

तनवीर जाफरी


पाकिस्तान की इस्लामाबाद स्थित सबसे बड़ी सैन्य अकादमी के बिल्कुल निकट एबटाबाद नामक संवेदनशील रिहायशी क्षेत्र में जहां कि कई पूर्व व वर्तमान सैन्य अधिकारियों के बंगले हैं,अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने गत् 1/2मई की रात अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लाडेन को ढूंढ निकाला तथा उसे वहीं मार गिराया।

इस घटना के बाद अमेरिका ने भी पाकिस्तान से यह कहा था कि ‘वह प्रमाणित करे कि ओसामा बिन लाडेन के एबटाबाद में गत् कई वर्षों से छिपे होने की जानकारी पाक सेना को नहीं थी’। ऐसे में अगला सवाल यह उठता है कि क्या ओसामा बिन लाडेन के खात्मे के बाद अब ‘अमेरिकी रडार’पर पाकिस्तान स्थित परमाणु शस्त्र आ चुके हैं?
पिछले दिनों पाकिस्तान में एक आला सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर अली को पाक सेना द्वारा आतंकवादियों व आतंकी संगठनों से संबंध होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया है। ब्रिगेडियर अली का परिवार गत् तीन पुश्तों से पाक सेना की ‘सेवा’करता आ रहा है। अली स्वयं गत् दो वर्षों से रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में तैनात थे।

पाकिस्तानी परमाणु सैन्य केंद्र : कैसे बचे आतंकियों से
ब्रिगेडियर अली की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर पिछले दिनों कराची के नेवल बेस पर हुए पाकिस्तान के अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को लेकर बने उस संदेह की पुष्टि हो जाती है,जिसमें यह कहा जा रहा था कि कराची के अति सुरक्षित नेवल बेस पर इस प्रकार का सुनियोजित आतंकी हमला तथा इसमें लड़ाकू विमानों को नष्ट किए जाने सहित भारी सैन्य सामग्री को नुकसान पहुंचाया जाना आदि बिना किसी भीतरी सहायता या जानकारी के कतई संभव नहीं था।

उधर पाकिस्तान-अफग़ानिस्तान सीमांत क्षेत्र के वज़ीरिस्तान इलाक़े में बढ़ते जा रहे चरमपंथी वर्चस्व को लेकर भी पाकिस्तान दोहरी भूमिका में दिखाई दे रहा है। उत्तरी वज़ीरिस्तान वही इलाक़ा है जहां बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाके तो मौजूद हैं ही इनके साथ ही अलकायदा के लड़ाके भी इस क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं। और इसी क्षेत्र में हक्क़ानी नेटवर्क से जुड़े आतंकी संगठनों का भी पूरा दबदबा है। इसी क्षेत्र में चरमपंथी संगठनों ने नाटो सेना के कई सैन्य काफिलों  पर हमले किए। कई रसद सामग्रियों से भरी कानवाई तबाह कर दी और कई बार इनके तेल डिपो व पार्किंग में खड़े तेल टैंकर व टैंक आदि तबाह कर डाले।
इस क्षेत्र को जहां अमेरिका दुनिया का सबसे अशांत क्षेत्र व आतंकवादियों का सबसे बड़ा केंद्र मान रहा है वहीं पाकिस्तान इसी इलाक़े को शांत व स्थिर क्षेत्र बता रहा है। अब यहां सवाल यही उठता है कि पाकिस्तान उत्तरी वज़ीरिस्तान में इन चरमपंथी संगठनों के विरूद्ध भरपूर ताक़ त इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा है। क्या इसलिए कि पाक सेना इन आतंकी संगठनों से खौफ़ खाती है या फिर इसलिए कि ‘अपनों’के विरूद्ध ऐसी कार्रवाई की पाकिस्तान कोई खास ज़रूरत महसूस नहीं कर रहा है।

 यदि उपरोक्त दोनों ही बातें गलत हैं फिर अमेरिका से चरमपंथी संगठनों के विरूद्ध कार्रवाई के नाम पर धन उगाही किए जाने का आखिर  क्या औचित्य है?हां उत्तरी वज़ीरिस्तान में बड़ी सैन्य कार्रवाई न करने को लेकर पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण बात यह ज़रूर कर रहा है कि ‘पाकिस्तान फ़िलहाल  उत्तरी वजीऱीस्तान में बड़ी सैन्य कार्रवाई करने की जल्दी नहीं महसूस कर रहा है’। पाकिस्तान का कहना है कि वह अपने ‘हितों’को ध्यान में रख कर ही कोई भी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

‘हित’ और ‘अहित’ के इसी परिपेक्ष में अब कयास इस बात के भी लगाए जाने लगे हैं कि अमेरिका अपने दूरगामी हितों के मद्देनज़र क्या पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियारों पर भी अपना नियंत्रण करने की योजना बना रहा है? क्या ओसामा बिन लाडेन जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी के खात्मे के बाद अब ‘अमेरिकी रडार’पर पाकिस्तान स्थित परमाणु शस्त्र आ चुके हैं?

पाकिस्तान में निरंतर बढ़ती जा रही आतंकी हिंसक घटनाएं,वहां सिलसिलेवार हो रहे आत्मघाती हमले,आए दिन किसी वकील,पत्रकार,नेता या अधिकारियों का मारा जाना,सैन्य ठिकानों तथा सुरक्षा संस्थानों को निशाना बनाकर किए जाने वाले चरमपंथी हमले तथा पीरों-फकीरों की दरगाहों पर व मस्जिदों में नमाज़ पढऩे वालों पर होने वाले चरमपंथी हमले अमेरिका को यह सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं कि चरमपंथी ताकतों के बढ़ते हुए यह हौसले कहीं किसी दिन उन्हें इस योग्य न बना दें कि वह पकिस्तान में रखे परमाणु हथियारों पर भी अपना नियंत्रण कर बैठें।

खासतौर पर ऐसी परिस्थितियों में जबकि चरमपंथी पाकिस्तान के सैन्य व सुरक्षा तंत्र के भीतर भी अपनी सेंध लगा चुके हों? इन हालात में यदि अमेरिका आप्रेशन जेरोनिमों की ही तर्ज  पर उससे भी कई गुणा बड़ा कमांडो आप्रेशन कर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने नियंत्रण में लेने तथा पाकिस्तान से अन्यत्र ले जाने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जहां तक पाकिस्तान के प्रतिरोध की क्षमता का प्रश्र है तो दोनों ही देश यानी अमेरिका व पाकिस्तान एक दूसरे की ताकत व एक दूसरे के पास मौजूद हथियारों से भी भली भांति वाकिफ  हैं। एबटाबाद की कार्रवाई में भी पाकिस्तान ने अपनी क्षमता व चौकसी का जो प्रदर्शन किया था वह भी अमेरिका देख चुका है। इतना ही नहीं बल्कि एबटाबाद में की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी विरोध के स्वर का स्तर भी अमेरिका भांप चुका है। इन हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि लाडेन की मौत के बाद अब अमेरिकी ‘रडार’ पर पाक स्थित परमाणु ठिकानों के आने की भी पूरी संभावना है।

लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.


 
 

Jun 26, 2011

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिसिया हमला


जनज्वार.छिंदवाड़ा जिले के अदानी पेंच पावर प्रोजेक्ट द्वारा की गयी मनमानी के खिलाफ आज 26 जून को आयोजित किसान महापंचायत पर पुलिस दमन का कहर बरपा हुआ है। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर बर्बर लाठी चार्ज किये और आंसू गैर के गोले छोड़े। पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बगैर हुए अवैध निर्माण कार्यो को ध्वस्त करने और जमीनें वापस लौटाने की मांग को लेकर किसान संघर्ष समिति की ओर से आज किसानों ने महापंचायत का आयोजन किया था।

किसान महापंचायत में भाग लेने जा रहे किसानों को पुलिस ने धमकाया तथा अलग अलग गांव से गिरफ्तार किया। विरोध में भाग लेने पहुंचे पूर्व विधायक और किसान नेता सुलीलम् को तड़के छिन्दवाडा पुलिस ने रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर शाम को नागपुर रेलवे स्टेशन पर रिहा किया। वहीं किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आराधना भार्गव को पुलिस ने भूलामोहगांव से जबरदस्ती घसीटकर गिरफ्तार किया। उनके साथ मौके पर पूर्व विधायक महेशदत्त मिश्रा भी मौजूद थे।

प्रशासन पर दबाव न बने इसके लिए पुलिस ने 12किसानों को अमरवाडा उपजेल भेज दिया है तो 44 किसान छिन्दवाड़ा जेल में बंद हैं। सुनीलम ने  राज्य सरकार की दमनकारी भूमिका पर आक्रोश  व्यक्त करते हुए कहा है कि 22मई के जानलेवा हमले के बाद किसान संघर्ष  समिति की और से शांतिपूर्ण तरीके से पदयात्रा की गई थी तथा 10हजार किसानों ने छिन्दवाडा पहुंचकर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए जिलाधीश महोदय को ज्ञापन सौंपा था। किसानों का कहना है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन अदानी कम्पनी के एजेन्ट के तौर पर कार्य कर रहा है। जिन लोगों ने किसानों की जमीनों पर अवैधानिक निर्माण कार्य किया है उनकी गिरफ्तारी करने की बजाय किसानों को गिरफ्तार किया जा रहा है।

डॉ0सुनीलम् ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि हर नागरीक को संविधान में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार दिया,लेकिन सरकार संविधान पर कुठाराघात करने पर आमदा है। डॉ0सुनीलम् ने कहा कि जानलेवा हमले,पुलिस की लाठी और गिरफ्तार ने किसानों को आक्रोषित करने का काम किया है। जिसके गंभीर परिणाम सरकार को भुगतने पड सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानिय पुलिस प्रशासन की होगी।

आंदोलनकारियों की अगली रणनीति के मुताबिक 27जून को जनसंगठनों का प्रतिनिधि मण्डल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मुलाकात करेगा और वे 30जून को भोपाल में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात कर किसानों के मानव अधिकार बहाल कराने की मांग करेंगे।



सरकारी नीतियों के विरोधी हू जिया रिहा


चीन में सरकार की नीतियों के एक प्रमुख विरोधी हू जिया को जेल से रिहा कर दिया गया है.उनकी पत्नी ज़ेंग जिंज्ञान ने इस ख़बर की पुष्टि की है और कहा है कि वे बीजिंग में अपने परिवार के साथ हैं...

ग़ौरतलब है कि पिछले बुधवार को चीन के जाने माने कलाकार और कार्यकर्ता आई वेईवेई को दो महीने की पुलिस हिरासत के बाद रिहा कर दिया गया था. हू जिया की रिहाई उस समय हुई है जब चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ यूरोप की यात्रा पर हैं और शनिवार रात को ब्रिटेन में बरमिंघम पहुँचे हैं.वे ब्रिटेन की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान ब्रिटेन में चीनी पूँजी निवेश को बढ़ाने के प्रयासों पर चर्चा करेंगे.

हू जिया पर चीन की सरकार ने विद्रोही गतिविधियों को उकसाने के आरोप लगाए थे. वर्ष 2008 में 37 वर्षीय हू जिया को दोषी पाया गया था और उन्हें साढ़े तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी.

मेरे पति घर लौट आए हैं और अपने माता-पिता और मेरे साथ हैं.मैं इस समय इंटरव्यू नहीं देने चाहती क्योंकि इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं हू जिया पर पांच लेख लिखने से संबंधित आरोप लगाए गए थे. साथ ही उन पर आरोप थे कि पत्रकारों को इंटरव्यू देते समय उन्होंने चीनी सरकार की आलोचना की थी.

उस समय चीन की सरकार समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हू ने 'अफ़वाहें फैलाईं और लोगों को उकसाया था.' हू जिया नागरिक अधिकारों के मुद्दों पर, पर्यावरण और एड्स से संबंधित मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं. वर्ष 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान उन्होंने चीन की सरकार के नाम एक 'ओपन लेटर' लिखी थी जिसका शीर्षक था - द रियल चाइना एंड द ओलंपिक्स यानी 'चीन का असली चेहरा और ओलंपिक खेल.'

इस पत्र में चीन में मानवाधिकारों के हनन के ख़त्म करने का आहवान किया गया था. वर्ष 2007 में हू जिया और उनकी पत्नी ने लगातार पुलिस की निगरानी में रहने के अपने अनुभवों का एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसके बाद उन्हें घर पर नज़रबंद कर दिया गया था.उन्हें यूरोपीय संघ ने अपने सर्वोच्च मानवाधिकार पुरस्कार साखारोव अवार्ड से सम्मानित किया था.

हू जिया की पत्नी ज़िंग जिंज्ञान ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया,"मेरे पति घर लौट आए हैं और अपने माता-पिता और मेरे साथ हैं. मैं इस समय इंटरव्यू नहीं देना चाहती क्योंकि इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं."मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लगातार चिंता ज़ाहिर की है कि हू जिया की रिहाई के बाद चीन की सरकार उन पर कड़े प्रतिबंध लगा सकती है. चीन की सरकार ने फ़िलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है.

बीबीसी से साभार

झारखण्ड में कलाकार को फांसी


जनज्वार.झारखण्ड के गिरिडीह जिले की अदालत ने चिलखारी हत्याकांड मामले में 23जून को चार माओवादियों को फांसी की सजा सुनाई है.झारखण्ड के इतिहास में यह पहली बार है कि माओवादियों को किसी मामले में फांसी की सजा हुई है. सजायाफ्ता लोगों में मनोज रजवार, छत्रपति मंडल, अनिल राम और जीतन मरांडी हैं, जिनमें जीतन मरांडी झारखंड के प्रसिद्ध प्रगतिशील लोक कलाकार हैं.

चिलखारी में 26अक्टूबर 2007 को हुई गोलीबारी में 19 लोगों की जान गई थी. मृतकों में झारखण्ड के  पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का बेटा अनूप भी था.माओवादियों ने यह हमला तब किया था जब वहां एक रंगारंग  कार्यक्रम चल रहा था.इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ़ द  रेयर मानते हुए  जिला और सत्र न्यायधीश इन्द्रदेव मिश्र ने सजा सुनाई है.  हालाँकि अदालत के इस फैसले का झारखंड में व्यापक विरोध हो रहा है.फांसी की सजा के विरोध में झारखण्ड के कई जेलों में बंद कैदी भी हैं और वे  आमरण अनशन कर रहे हैं.

बायीं  ओर जीतन और उनकी पत्नी : एक नए विनायक  
 जीतन मरांडी के खिलाफ हुए फैसले के बारे में झारखण्ड बचाओ आन्दोलन और पीयूसीएल का कहना है कि जीतन को फर्जी तरीके से फंसाया गया है.  संगठन के मुताबिक संदिग्धों में एक जीतन मरांडी था, जो फरार होने में सफल रहा. पुलिस उसे पकड़ने में अब तक नाकाम रही है और हमारे संगठन के मानवअधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी को इस मामले में अभियुक्त बना दिया,जबकि हत्याकांड के वक्त वह गांव में नहीं थे.संगठन का दावा है कि पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी के खिलाफ फर्जी गवाह पेश कर उन्हें मौत की सजा दिलाने में सफल रही है. 

संगठन की जारी विज्ञप्ति के मुताबिक  जीतन मरांडी नक्सलवादी नहीं है,वे एक सांस्कृतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. जीतन मरांडी एक प्रतिभाशाली कलाकार है, वे संगीत बनाते है, गीत लिखते है,और नुक्कड़ नाटक करते है.वे अपनी कला का इस्तेमाल गिरिडीह जिले के गावों में लोगो का मनोरंजन करने और उनकी जीवन की समस्यों के बारे में उन्हें जागरूक करने में करते है.ऐसे में जाहिर है कि वहां के प्रशासन और पुलिस के लिए वे एक खतरनाक व्यक्ति थे और वे उन्हें सबक सिखाने का मौका तलाश रहे थे.

झारखण्ड बचाओ आन्दोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि 'पुलिस ने हत्याकांड में शामिल असली जीतन मरांडी को पकड़ने का किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया.उनके लिए हमारे साथी को पकडना और उसे आरोपी बताना बहुत आसान था.पुलिस के लिए तथा कथित ‘गवाह को पेश करना कोई बड़ी बात नहीं थी जो अदालत में कबूल करते कि उन्होंने मरांडी को हत्याकांड की जगह देखा था और कोर्ट के लिए ये तथा कथित  गवाह सजा मुकर्रर  करने के लिए काफी थे.

वो सुबह कभी तो आएगी

जैसे ही कोर्ट ने सजा दी मरांडी ने कोर्ट परिसर में जोर जोर से ‘वो सुबह कभी तो आएगी’गीत गाना शरू कर दिया.जीतन की पत्नी अपर्णा ने भी 2साल के अपने बच्चे को गोद में उठाये हुए उनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिला दी.इस सजा के पीछे की कहानी एक राजनीतिक षड़यंत्र है जो पूर्व मुख्य मंत्री की पार्टी के नेताओं और पुलिस की मिलीभगत में रचा गया है ताकि जनता को डरा कर चुपचाप दमन सहते रहने को मजबूर किया जा सके.

 कोर्ट में जतीन ने घोषणा की कि वे इस सजा के खिलाफ अपील करेंगे. कोर्ट से बाहर  उनकी बीबी अपर्णा ने भी इस बात की पुष्टि की.अपर्णा के कहा कि वह न केवल उच्च न्यायालय  में बल्कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में भी सजा के खिलाफ अपील करेंगी.

Jun 25, 2011

राष्ट्रपति से माओवादियों के कुछ सवाल जवाब

छत्तीसगढ़ की विधानसभा को सम्बोधित करते हुए 24 जून को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा . राष्ट्रपति की इस अपील पर माओवादी क्या और क्यों  सोचते हैं, उस पूरे तर्कशास्त्र  को रखती  माओवादियों की ओर से  जारी प्रेस विज्ञप्ति ...


रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि 'माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्यधारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें।' राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें।

राष्ट्रपति ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।


देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है।

दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीजल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है, जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!

भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं, जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है, जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।

60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं, ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।

इसलिए देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।


सीपीआइ (माओवादी) के केन्द्रीय  कमेटी की यह विज्ञप्ति अभय के नाम से जारी हुई है, इसे यहाँ दखल की
दुनिया ब्लॉग से साभार प्रकाशित किया जा रहा है .

पर्यावरण और विकास के बीच पाखंड


सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं...
 
डॉ0 आशीष वशिष्ठ

हाल ही में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने विश्व की विशालतम स्टील कंपनी ‘पास्को’को उड़ीसा में प्लांट लगाने की सशर्त इजाजत दी है। जिस क्षेत्र में ये प्लांट स्थापित किया जाएगा वो क्षेत्र वनस्पतियों और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। सरकार को भलीभांति मालूम है कि उस क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने से जंगल और जमीन को भारी नुकसान होगा,बावजूद इसके प्लांट लगाने देने की अनुमति प्रदान करना उसकी की नीति और नीयत को ही दर्शाता है। 

सरकार का पक्ष है कि देश के विकास के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है। दुनिया के हर मुल्क में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हैं, लेकिन भारत में सरकारी मशीनरी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि एक बार उद्योग स्थापित होने के बाद लेनदेन का खेल शुरू हो जाता है। किसी भी उद्योग को देंखे, ऐसा हो ही नहीं सकता कि वहां पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन न होता हो। और सरकारकी आंख तब तक नहीं खुलती, जब तक कोई हादसा न हो जाए। 

पिछले दिनों ही लखनऊ के रिहायशी इलाके राजाजीपुरम में प्लाई बनाने की यूनिट और एक अन्य कारखाने में भीषण आग लगने के बाद प्रशासन की आंख खुली। आनन-फानन में इन औद्योगिक इकाईयों पर सख्त कार्रवाई का नाटक किया गया। लखनऊ की तरह  देश के हर छोटे-बड़े शहर के रिहायशी इलाकों में धडल्ले से सैकड़ों कारखाने चल रहे हैं। इनमें पर्यावरण कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे मानकों को ताक पर रखकर पर्यावरण और समूचे समाज की सेहत से खिलवाड़ आम बात है।

देश में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियत्रंण के लिए कानूनों का भारी बस्ता तो हमारे पास है, लेकिन उनका पालन करवाने की इच्छाशक्ति नहीं है। सरकारी तंत्र की उदासीनता और सरकार की लाहपरवाही के कारण ही अन्य देशों से खतरनाक कचरा हमारे तटबंधों पर आसानी से उतार जाता है। ऐसी कई घटनाएं पूर्व में घट चुकी हैं और अक्सर ऐसे वाकया सुनाई देते रहते हैं।

कुछ समय पहले दिल्ली में संपन्न हुए सतत विकास शिखर बैठक-2011में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि ‘सतत विकास को सुनिष्चित करने की रणनीति का केन्द्रीय सिद्धांत   यह है कि आर्थिक पहलुओं का फैसला करने वाले सभी लोगों या संगठनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वे पर्यावरण अनुकूल बातों को हमेशा ध्यान में रखें।’अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के मौजूदा मानकों को नाकाफी बताया। उनके मुताबिक अवशिष्ट प्रदूषण से निपटने के लिए ऐसा प्रवधान होना चाहिए कि प्रदूषण फैलाने वाले भुगतान करें। उनके विचार और सरकार के कारनामों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। वाकई पीएम पर्यावरण को लेकर इतने चिंतित है तो ‘पास्को’ को अनुमति क्यों दी गई।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी कितनी गंभीर है उसकी सच्चाई हाल ही में भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट से पता चलती है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के कामकाज पर पहली बार जारी पर्यावरण ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने जंगलों की सेहत सुधारने, जैव-विवधता और नदियों को बचाने समेत कईं मोर्चे पर योजनाओं के क्रियान्वयन में उदासीनता को लेकर फटकार लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजनाओं के लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र के अंबार को लेकर भी आश्चर्य जताया है। 

इसके अलावा पर्यावरण मंत्रालय में वित्त वर्ष 2008-09के आंकड़ों की पड़ताल में पाया कि परियोजनाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई, जिसके कारण वे अपना उद्देश्य ही पूरा नहीं कर पाई। रिपोर्ट के अनुसार पेड़ लगाने की 93 फीसदी परियोजनाएं अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई है। कैग सरकारी संस्था है और जब सरकारी संस्था स्वयं सरकार की गतिविधियों पर सवाल उठा रही है तो जमीनी हालातों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

सरकारी उदासीनता और ओछी राजनीति के कारण ही देश में नदी प्रदूषण की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप धारण करती जा रही है। चाहे नदियों को प्रदूषण मुक्त करने से लेकर नदियों पर बांध बनाने तक की हर छोटी-बड़ी योजना और पर्यावरण से जुड़े अहम् मसलों पर केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य विवाद आम बात है। केंद्र और राज्य सरकारों की राजनीति के फेर में पर्यावरण जैसा अहम् मुद्दा पिस जाता है।

गंगा और यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करोड़ों रूपये खर्च किए जा चुके हैं, बावजूद इसके अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाए हैं। जिन राज्यों से होकर गंगा नदी गुजरती है वहां की सरकारों का अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण गंगा को प्रदूषणमुक्त कर पाने में दिक्कतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वहीं केन्द्र सरकार के साथ ही साथ राज्य सरकारें भी गंगा को साफ-सुथरा बनाने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना पर काम नहीं कर रही हैं। 

उत्तराखंड में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की बाढ़ आई हुई है,वहीं उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेस हाईवे योजना अपने उफान पर है। वर्तमान में गंगा एक्षन प्लान को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के साथ विलय कर दिया गया है, बावजूद इसके स्थिति में मामूली सुधार भी नहीं आया है। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए विश्व बैंक ने भी मदद का हाथ आगे बढ़ाया है। उसने इस कार्य के लिए 26 लाख अरब डालर की राशि स्वीकृत की है, जो पीएम की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के माध्यम से खर्च किया जाएगा। अगर ईमानदारी से इस धनराशि से उपयोग किया गया तो स्थिति में सुधार हो सकता है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद कानपुर में चमड़ा शोधन इकाईयों को बड़ी मुश्किल से बंद करवाया जा सका है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा के तट पर बसा कानपुर देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। गंगा की भांति यमुना नदी में भी प्रदूषण का स्तर सारी हदें पार कर रहा है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश मे स्थित औद्योगिक इकाईयां और घरेलू कचरा नदी जल को जहर में तब्दील कर रहा है। पिछले साल चम्बल अभ्यारणय में जहां यमुना नदी का प्रदूषित जल आकर चम्बल नदी में मिलता है,वहां सैंकड़ों घड़ियालों की मौत सुर्खियों में रही है। हाल ही में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में मछलियों के भी मरने की खबरें आ रही हैं। इन सब घटनाओं के बाद भी सरकार महज कागजी कार्रवाई कर अपनी डयूटी पूरी कर रही है।


भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए विषिष्ट प्रावधान है। लेकिन यहां पर्यावरण की स्थिति गंभीर रूप धारण करती जा रही है। सरकार के एजेंडे में पर्यावरण का स्थान काफी नीचे है, तभी तो कड़ाई से पर्यावरण कानूनों और प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है। असलियत यह है कि हमारी विकास रणनीति में पर्यावरण और विकास के बीच सांमजस्य बैठाने का प्रयास कभी किया ही नहीं गया है। यही कारण है कि समूची विकास योजनाआं में पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न उपेक्षित ही रहता है। ज्यादातर मामलों में विकास का तर्क देकर जंगल के जंगल उजाड़ना, नदियों का रूख मोड़ने से लेकर उनके पानी को प्रदूषित करना, भूजल का अंधाधुंध दोहन, खेती के लिए रासायनिक उर्वरकों-कीटनाषको के बेलगाम इस्तेमाल आदि को खुद सरकारें प्रोत्साहित करती रही है।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए अनेक परियोजनाएं चलाई जा रही हैं,लेकिन सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, शहरीकरण, खेती के लिए कम होती धरती, बढ़ता औद्योगिककरण, अनियंत्रित  विकास और पर्यावरण के महत्ता को न समझने के कारण देश में आने वाले दिनों में पर्यावरण से जुड़ी समस्यायों  में बड़ा इजाफा होना तय है।


 
स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनितिक -सामाजिक मसलों के जानकार.