Jun 25, 2011

पर्यावरण और विकास के बीच पाखंड


सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं...
 
डॉ0 आशीष वशिष्ठ

हाल ही में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने विश्व की विशालतम स्टील कंपनी ‘पास्को’को उड़ीसा में प्लांट लगाने की सशर्त इजाजत दी है। जिस क्षेत्र में ये प्लांट स्थापित किया जाएगा वो क्षेत्र वनस्पतियों और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। सरकार को भलीभांति मालूम है कि उस क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने से जंगल और जमीन को भारी नुकसान होगा,बावजूद इसके प्लांट लगाने देने की अनुमति प्रदान करना उसकी की नीति और नीयत को ही दर्शाता है। 

सरकार का पक्ष है कि देश के विकास के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है। दुनिया के हर मुल्क में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हैं, लेकिन भारत में सरकारी मशीनरी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि एक बार उद्योग स्थापित होने के बाद लेनदेन का खेल शुरू हो जाता है। किसी भी उद्योग को देंखे, ऐसा हो ही नहीं सकता कि वहां पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन न होता हो। और सरकारकी आंख तब तक नहीं खुलती, जब तक कोई हादसा न हो जाए। 

पिछले दिनों ही लखनऊ के रिहायशी इलाके राजाजीपुरम में प्लाई बनाने की यूनिट और एक अन्य कारखाने में भीषण आग लगने के बाद प्रशासन की आंख खुली। आनन-फानन में इन औद्योगिक इकाईयों पर सख्त कार्रवाई का नाटक किया गया। लखनऊ की तरह  देश के हर छोटे-बड़े शहर के रिहायशी इलाकों में धडल्ले से सैकड़ों कारखाने चल रहे हैं। इनमें पर्यावरण कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे मानकों को ताक पर रखकर पर्यावरण और समूचे समाज की सेहत से खिलवाड़ आम बात है।

देश में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियत्रंण के लिए कानूनों का भारी बस्ता तो हमारे पास है, लेकिन उनका पालन करवाने की इच्छाशक्ति नहीं है। सरकारी तंत्र की उदासीनता और सरकार की लाहपरवाही के कारण ही अन्य देशों से खतरनाक कचरा हमारे तटबंधों पर आसानी से उतार जाता है। ऐसी कई घटनाएं पूर्व में घट चुकी हैं और अक्सर ऐसे वाकया सुनाई देते रहते हैं।

कुछ समय पहले दिल्ली में संपन्न हुए सतत विकास शिखर बैठक-2011में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि ‘सतत विकास को सुनिष्चित करने की रणनीति का केन्द्रीय सिद्धांत   यह है कि आर्थिक पहलुओं का फैसला करने वाले सभी लोगों या संगठनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वे पर्यावरण अनुकूल बातों को हमेशा ध्यान में रखें।’अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के मौजूदा मानकों को नाकाफी बताया। उनके मुताबिक अवशिष्ट प्रदूषण से निपटने के लिए ऐसा प्रवधान होना चाहिए कि प्रदूषण फैलाने वाले भुगतान करें। उनके विचार और सरकार के कारनामों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। वाकई पीएम पर्यावरण को लेकर इतने चिंतित है तो ‘पास्को’ को अनुमति क्यों दी गई।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी कितनी गंभीर है उसकी सच्चाई हाल ही में भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट से पता चलती है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के कामकाज पर पहली बार जारी पर्यावरण ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने जंगलों की सेहत सुधारने, जैव-विवधता और नदियों को बचाने समेत कईं मोर्चे पर योजनाओं के क्रियान्वयन में उदासीनता को लेकर फटकार लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजनाओं के लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र के अंबार को लेकर भी आश्चर्य जताया है। 

इसके अलावा पर्यावरण मंत्रालय में वित्त वर्ष 2008-09के आंकड़ों की पड़ताल में पाया कि परियोजनाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई, जिसके कारण वे अपना उद्देश्य ही पूरा नहीं कर पाई। रिपोर्ट के अनुसार पेड़ लगाने की 93 फीसदी परियोजनाएं अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई है। कैग सरकारी संस्था है और जब सरकारी संस्था स्वयं सरकार की गतिविधियों पर सवाल उठा रही है तो जमीनी हालातों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

सरकारी उदासीनता और ओछी राजनीति के कारण ही देश में नदी प्रदूषण की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप धारण करती जा रही है। चाहे नदियों को प्रदूषण मुक्त करने से लेकर नदियों पर बांध बनाने तक की हर छोटी-बड़ी योजना और पर्यावरण से जुड़े अहम् मसलों पर केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य विवाद आम बात है। केंद्र और राज्य सरकारों की राजनीति के फेर में पर्यावरण जैसा अहम् मुद्दा पिस जाता है।

गंगा और यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करोड़ों रूपये खर्च किए जा चुके हैं, बावजूद इसके अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाए हैं। जिन राज्यों से होकर गंगा नदी गुजरती है वहां की सरकारों का अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण गंगा को प्रदूषणमुक्त कर पाने में दिक्कतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वहीं केन्द्र सरकार के साथ ही साथ राज्य सरकारें भी गंगा को साफ-सुथरा बनाने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना पर काम नहीं कर रही हैं। 

उत्तराखंड में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की बाढ़ आई हुई है,वहीं उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेस हाईवे योजना अपने उफान पर है। वर्तमान में गंगा एक्षन प्लान को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के साथ विलय कर दिया गया है, बावजूद इसके स्थिति में मामूली सुधार भी नहीं आया है। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए विश्व बैंक ने भी मदद का हाथ आगे बढ़ाया है। उसने इस कार्य के लिए 26 लाख अरब डालर की राशि स्वीकृत की है, जो पीएम की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के माध्यम से खर्च किया जाएगा। अगर ईमानदारी से इस धनराशि से उपयोग किया गया तो स्थिति में सुधार हो सकता है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद कानपुर में चमड़ा शोधन इकाईयों को बड़ी मुश्किल से बंद करवाया जा सका है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा के तट पर बसा कानपुर देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। गंगा की भांति यमुना नदी में भी प्रदूषण का स्तर सारी हदें पार कर रहा है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश मे स्थित औद्योगिक इकाईयां और घरेलू कचरा नदी जल को जहर में तब्दील कर रहा है। पिछले साल चम्बल अभ्यारणय में जहां यमुना नदी का प्रदूषित जल आकर चम्बल नदी में मिलता है,वहां सैंकड़ों घड़ियालों की मौत सुर्खियों में रही है। हाल ही में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में मछलियों के भी मरने की खबरें आ रही हैं। इन सब घटनाओं के बाद भी सरकार महज कागजी कार्रवाई कर अपनी डयूटी पूरी कर रही है।


भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए विषिष्ट प्रावधान है। लेकिन यहां पर्यावरण की स्थिति गंभीर रूप धारण करती जा रही है। सरकार के एजेंडे में पर्यावरण का स्थान काफी नीचे है, तभी तो कड़ाई से पर्यावरण कानूनों और प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है। असलियत यह है कि हमारी विकास रणनीति में पर्यावरण और विकास के बीच सांमजस्य बैठाने का प्रयास कभी किया ही नहीं गया है। यही कारण है कि समूची विकास योजनाआं में पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न उपेक्षित ही रहता है। ज्यादातर मामलों में विकास का तर्क देकर जंगल के जंगल उजाड़ना, नदियों का रूख मोड़ने से लेकर उनके पानी को प्रदूषित करना, भूजल का अंधाधुंध दोहन, खेती के लिए रासायनिक उर्वरकों-कीटनाषको के बेलगाम इस्तेमाल आदि को खुद सरकारें प्रोत्साहित करती रही है।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए अनेक परियोजनाएं चलाई जा रही हैं,लेकिन सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, शहरीकरण, खेती के लिए कम होती धरती, बढ़ता औद्योगिककरण, अनियंत्रित  विकास और पर्यावरण के महत्ता को न समझने के कारण देश में आने वाले दिनों में पर्यावरण से जुड़ी समस्यायों  में बड़ा इजाफा होना तय है।


 
स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनितिक -सामाजिक मसलों के जानकार.


 

दलित महिलाओं पर शिक्षा मंत्री की दबंगई

इस बात पर किसी ने भी यह गौर करना उचित नहीं समझा कि आखिर पुष्पा देवी और उनके बेटे को हंगामा काटने पर क्यों मजबूर होना पड़ा। सबने बस वही सुना और लिखा जो पुलिस या मंत्री के समर्थकों ने कहा...

नरेन्द्र देव सिंह

पुष्पा देवी : उत्पीडन की शिकार
उत्तराखण्ड के नैनीताल जनपद के धारी ब्लाक के अन्तर्गत गांव सुई, रयूरीगाड़ निवासी पुष्पा सुयाल, उसके बेटे दीपक और सामाजिक कार्यकर्त्ता मुन्नी टम्टा को शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह बिष्ट के पीआरओ मदन पांडे की तहरीर पर धारा 151 के तहत जेल भेज दिया गया। गौरतलब है कि पुष्पा देवी और अनुसूचित जाति-जनजाति महिला उत्थान समिति की अध्यक्ष मुन्नी टम्टा दस जून को शिक्षा मंत्री के छडायल स्थित घर पर अपनी शिकायत दर्ज करने पहुंचे थे। जब पुष्पा देवी अपनी हिमायती महिला नेता के साथ गांव में दबंगों के हाथों उत्पीडित होने की शिकायत लेकर आयी थी, तब गोविन्द सिंह बिष्ट एक अधिकारी से बात कर रहे थे। 

शिक्षा मंत्री और  उनके समर्थकों के मुताबिक, पुष्पा देवी और  मुन्नी टम्टा कमरे में जबरन घुसने लगी. मना करने पर अनुसूचित जाति-जनजाति महिला उत्थान समिति की अध्यक्ष मुन्नी टम्टा  ने चप्पल उतार दी और शिक्षा मंत्री से अपशब्द कहे। इसी कारण मंत्री समर्थकों ने दोनों को बाहर खदेड़ा और उनकी पिटाई कर दी। इसके बाद कोतवाल प्रमोद शाह मुन्नी, पुष्पा और पुष्पा के बेटे को कोतवाली हल्द्वानी ले आये।

इस मामले में प्रमोद शाह शिक्षा मंत्री की आज्ञा का पालन करते दिखाई दिए, क्योंकि जब वह इन लोगों को गिरफ्तार करने आये तो उनके साथ कोई भी महिला पुलिसकर्मी नहीं थी। कोतवाली जाने के बाद पुष्पा देवी के बेटों का गुस्सा आक्रोश बनकर पुलिस की हीलाहवाली पर फूट पड़ा। करीब चार घंटे हंगामा होने के बाद उन्हें पुलिस की एकतरफा कार्रवाई का सामना करना पड़ा। 

इस पूरे मामले में इस बात पर किसी ने भी यह गौर करना उचित नहीं समझा कि आखिर पुष्पा देवी और उनके बेटे को हंगामा काटने पर क्यों मजबूर होना पड़ा। सबने बस वही सुना और लिखा जो पुलिस या मंत्री के समर्थकों ने कहा। असरदार लोगों की ऊंची आवाज से गरीब-दलित लोगों की चीखों को एक बार फिर से दबा दिया गया। 

पुष्पा देवी के बेटे सतीश ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि 16  मार्च को ग्राम सुई का ग्राम प्रधान सुभाष ब्रजवासी अपने 10-12 साथियों के साथ नशे में धुत  होकर लाठी-डंडों के साथ हमारे घर में घुस गया. उसने और उसके साथियों ने विधवा पुष्पा देवी और उसके तीनों बेटों की जमकर पिटाई की। साथ ही घर में तोडफोड़ भी की. 

जब सुभाष ब्रजवासी पुष्पा देवी और उसके परिवार को बेहोशी (अधमरी) की हालत में छोड़कर चला गया तो कुछ स्थानीय लोगों ने 108 एम्लेंबुस बुलाकर इन्हें पदमपुरी चिकित्सालय भिजवाया। जहां से इन्हें हल्द्वानी बेस अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। गौरतलब है कि यह मामला आपसी रंजिश के साथ-साथ सुभाष बृजवासी के गंदी नीयत का भी है। आरोप है कि सुभाष बृजवासी गांव की महिलाओं पर गंदी नीयत रखता है तथा अपनी दबंगई से गरीब और कमजोर लोगों को सताता है।

अस्पताल से कुछ ठीक होकर होने के बाद पुष्पा देवी ने मुक्तेश्वर थाने में सुभाष बृजवासी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी. उक्त नामजद लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने के कारण पीड़ित पक्ष इस सम्बन्ध में तहसीलदार, जिलाधिकारी नैनीताल, एस.एस.पी. नैनीताल से भी मिल चुका था, मगर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। इसीलिए मजबूर होकर पीड़ित परिवार अपनी फरियाद लेकर शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह बिष्ट के पास गया, परन्तु गोविन्द बिष्ट द्वारा मिलने से मना करने पर मामला बिगड़ गया। 


पुष्पा देवी ने शिक्षा मंत्री पर आरोप लगाया है कि सुभाष बृजवासी को गोविन्द सिंह बिष्ट का समर्थन प्राप्त है। इस कारण पुलिस भी सुभाष के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से बचती है। फिलहाल पुष्पा सुयाल और मुन्नी टम्टा जमानत पर रिहा हो चुकी हैं। दलितों के साथ इतना सबकुछ होने के बाद भी दलित हितों की बड़ी-बड़ी बात करने वाले कोई भी दलित नेता इन लोगों की सुध् लेने नहीं आया। जेल से रिहा होने के बाद मुन्नी टम्टा ने शिक्षा मंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘पुलिस शिक्षा मंत्री  के दबाव में काम कर रही है. जब हमें शिक्षा मंत्री के निवास स्थान से गिरफ्तार किया गया था तो कोई भी महिला पुलिस नहीं थी.'


इसके साथ ही शिक्षा मंत्री ने भी हम लोगों से अपशब्द कहे तथा अशोभनीय बर्ताव किया। मुन्नी टम्टा और पुष्पा देवी के साथ हुआ वाकया यह दर्शाता है कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री गोविन्द बिष्ट ने इन महिलाओं के प्रति बर्बरतापूर्वक कार्यवाही करवायी है, लेकिन सत्ता पाने के लिए तत्पर विपक्ष भी इन मुद्दों पर ध्यान देता हुआ नहीं दिख रहा है।


युवा पत्रकार  नरेन्द्र देव सिंह  उत्तराखंड के सामाजिक-राजनीतिक  मसलों पर लिखते हैं .



Jun 24, 2011

स्लट वॉक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का पहला प्रदर्शन जुलाई में


भारत में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर का तमगा हासिल कर चुकी दिल्ली में 25जून को आयोजित होने वाला स्लट वाक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का पहला प्रदर्शन अब जुलाई के पहले सप्ताह में होने की संभावना है...

विभा सचदेव

लड़कियों के छोटे कपड़े मर्दों को उत्तेजित करते हैं और वह लड़कियां ऐसे कपड़े पहनकर खुद ही बलात्कार और छेड़छाड़ को आमंत्रित करती हैं,जैसे तर्क आमतौर पर सार्वजनिक स्थलों पर सुनने को मिल जाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब बलात्कार के खिलाफ कार्यवाही करने वाली संस्थाएं भी इसी तरह का तर्क देती हैं। लेकिन अब इस एकतरफा मर्दाना समझ पर लगाम की तैयारी शुरू हो गयी। इस मर्दाना सोच को चुनौती देने के लिए अगले महीने दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की छात्रा उमंग सबरवाल के नेतृत्व में भारत में पहला बेशर्मी मोर्चा का प्रदर्शन दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में होने वाला है। गौरतलब है कि स्लट शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर मर्द उन औरतों के लिए करते हैं, जिन्हें वह बदचलन मानते हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा अर्पणा शर्मा कहती हैं,‘आखिरकार इस असुरक्षित शहर में हमारी आजादी के लिए कुछ तो होने जा रहा है। मैंने तो 25 जून को दिल्ली के कनॉट प्लेस में आयोजित होने वाले बेशर्मी मार्चा में शामिल होने के लिए आलमारी से सबसे छोटे कपड़े विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिये निकाले थे, मगर वह टल गया है।’ क्यों टला होगा, के सवाल पर अर्पणा कहती हैं, ‘जहां तक मुझे पता है नैतिकता के चौधरियों, जिसमें सरकार भी शामिल है, उसी का दवाब है।’

जनवरी2011में कनाडा के एक पुलिस अधिकारी द्वारा लड़कियों को यौन उत्पीड़न से बचने के लिए ‘कुलटा की तरह कपड़े’ न पहनने के सुझाव से इस विरोध की शुरुआत इस वर्ष टोरंटों शहर से हुई। पुलिस अधिकारी के सुझाव के विरोध में कनाड़ा की सड़के ‘हमें नहीं बलात्कारी को सजा दो’, ‘हम चाहे जो पहने, हमारी न का मतलब न है’ नारों से गूंज उठी। उसके बाद लंदन में ी लगग 5000 महिलाओं ने कम कपड़े पहनकर सड़क पर उतर कर ‘स्लट वॉक’का आगाज किया गया। केवल कनाडा और लंदन नहीं दुनिया के सी बड़े शहरों में ‘स्लट वॉक’ की आग देखने को मिली रही है और अब भारत की बारी है। इस मार्च में शामिल लड़कियां और महिलाएं वह कपड़े पहनती हैं, जिन्हें समाज नैतिकता के आधार पर पहनने की इजाजत नहीं देता और पहनने वालों को बदचलन कहने से गुरेज नहीं करता।

अगर एक आम व्यक्ति इस स्लट वॉक के बारे में सुनेगा तो उसकी धारणा कुछ अलग ही होगी। लेकिन वह यह अनुमान कभी  नहीं लगा पायेगा कि यह महिलाओं द्वारा छेड़ा गया एक सामाजिक आंदोलन है। भ्रष्टाचार   से लड़ने के लिए छेड़ा गया ‘फाइट अगेंस्ट करप्शन’, भूमि  अधिग्रहण को रोकने के लिए चला भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन’तो सुना है लेकिन बेशर्मो को सबक सिखाने के लिए खुद ही बेशर्म मोर्चा बना देना पहली बार देखा गया है।

देह का व्यापार करने वाली महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला यह अपमानजनक शब्द ‘स्लट’ का प्रयोग इन संघर्ष में शामिल महिलाओं द्वारा उन पुरुषों के मुंह पर तमाचा मारने के लिए किया गया जो   कभी किसी  लड़की को स्लट कहने में नहीं हिचकिचाते। भारत में इस विरोध प्रदर्शन का नाम बदलकर ‘बेशर्मी मोर्चो’ कर दिया गया है, क्योंकि यहां पर बहुत से पुरुष ऐसे मौजूद है जो इस शब्द का मतलब तक नहीं जानते, लेकिन उनके शब्दकोष में और ऐसे कई अपमानजनक शब्द मौजूद है जो किसी भी महिला को अपमानित करने के लिए काफी हैं।

महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक माने गये देशों की सूची में देश की राजधानी दिल्ली को चौथा स्थान प्राप्त है और भारत के असुरक्षित शहरों में पहला. यह वही शहर है जहां बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों को कहते सुना जाता है कि ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती,उस लड़की ने भी  कुछ न कुछ जरूर किया होगा’। प्रदेश की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का ऐसी घटनाएं कैसे रूकें पर राय है कि ‘लड़कियों को रात में बाहर नहीं निकलना चाहिए।’ सवाल है की क्या यह उपाय स्त्रियों को दोयम नागरिक बनाये रखने की ही साजिश नहीं है.

उसके बाद बारी आती है कार्ट की। कोर्ट में लड़की के चरित्र को लेकर बहस होती है और अगर किसी कारणों से एक पक्ष लड़की के चरित्र के साथ बदचलन शब्द लगाने में कामयाब हो जाता है तो पूरे केस का रुख ही बदल जाता है और पुरुष द्वारा किया गया अपराध, अपराध नहीं रह जाता। इसका मतलब यह है कि अगर लड़की का चरित्र साफ नहीं है तो कोई भी  उसके साथ कुछ ी कर सकता है। भारतीय मानसिकता के मुताबिक तो अगर लड़की छोटे कपड़े पहनकर घर से निकलती है तो उसका चरित्र ठीक होता।
दिल्ली की सड़कों का हाल तो कुछ इस तरह है कि अगर कोई लड़की छोटे कपड़े पहनकर निकलती है तो आस-पास चल रहे लोग उसको ऊपर से नीचे तक देखते हैं और झट से उनके मुंह से एक ही वाक्य निकलता है, ‘फिर कहेंगी हमारा रेप हो गया।’ ऐसे में शुक्र मनाना चाहिए कि आखिर किसी ने तो इसकी शुरूआत की और सड़ांध मार रही मानसिकता पर सवाल उठाया है। लेकिन इस विरोध आंदोलन की सफलता को लेकर एक सवाल अभी भी जेहन में है कि क्या भा रत में भी इस आंदोलन को उसी तरह समर्थन मिल पायेगा, जिस तरह विदेश में मिला है।

भारत की संस्कृति,मानसिकता और रहन-सहन सब कुछ बिलकुल अलग है। देश की सड़कों पर जब लड़कियां अर्धनग्न रूप में विरोध करते हुए उतरेगी तो यहां के लोगों का क्या रवैया होगा। क्योंकि यहां के मर्दो के इस ‘बेशर्मी मोर्चा’को लेकर अपमानजनक तर्क को अभी से आने शुरू हो गये हैं, और मर्द कहने लगे हैं कि ‘वी आर रेडी टू सी स्लटस ऑन दा रोड’।


पुणे स्थित इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ ब्रोडकास्टिंग एंड जर्नलिज्म से इसी वर्ष पत्रकारिता कर लेखन की शुरुआत.  सामाजिक विषयों और फ़िल्मी लेखन में रूची.


फोर्ड फाउंडेशन का सीआइए गठजोड़ और भारत के जनांदोलनों में घुसपैठ


'वर्ल्ड सोशल फोरम की राजनीति और अर्थशास्त्र, भूमंडलीकरण के खिलाफ संघर्ष के लिए सबक' नाम से www.globalresearch.ca पर उपलब्ध लम्बे पर्चे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अनुदित कर यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है. सामाजिक- राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़े लोगों के लिए यह एक जरुरी मसविदा है जो बताने के लिए काफी है कि स्वयंसेवी संगठनों ( NGOs) के जरिये किये जा रहे सामाजिक बदलावों के संघर्षों का असल राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या है, फोर्ड फाउन्डेशन जैसे दानदाताओं के पीछे असल साम्राज्यवादी मंशा क्या है. यह पर्चा  2003   मुंबई में आयोजित वर्ल्ड सोशल फोरम के समय प्रकाश में आया था...
अनुवाद - राजेश चन्द्र
 
 
फोर्ड फाउनडेशन-विदेशी फंडिंग के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन

"कभी न कभी कोई फोर्ड फाउनडेशन द्वारा भारत में किए जा रहे कार्यों का ब्योरा ज़रूर अमरीकी जनता के सामने रखेगा। देश में फोर्ड फाउनडेशन का कुछ लाख डॉलर में आने वाला कुल खर्च इस कहानी का दसवां हिस्सा भी शायद ही बयान कर सके"- चेस्टर बाउलन (भारत में पूर्व अमरीकी राजदूत)।

फोर्ड फाउनडेशन द्वारा विश्व सामाजिक मंच को दिए जा रहे अकूत धन के प्रवाह ने इस संस्थान की पृष्ठभूमि और इसकी वैश्विक गतिविधियों को जगजाहिर कर दिया है। यह न सिर्फ़ इसके बल्कि इस जैसी दूसरी संस्थाओं के अध्ययन की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। फोर्ड फाउनडेशन (एफएफ) की स्थापना 1936 में फोर्ड के विशाल साम्राज्य के हित में टैक्स बचाने की जुगत के तौर पर हुई थी, लेकिन इसकी गतिविधियाँ स्थानीय तौर पर मिशिगन के स्टेट को समर्पित थीं। 1950 में जब अमरीकी सरकार ने इसका ध्यान "कम्युनिस्ट धमकियों" से मुठभेड़ पर केंद्रित किया, फोर्ड  फाउनडेशन  एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फाउनडेशन में तब्दील हो गया।

फोर्ड फाउनडेशन और अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी  सीआईए का गठजोड़

सच तो यह है कि अमरीका की केन्द्रीय गुप्तचर संस्था (सीआइए) लम्बे समय से अनेकानेक लोकोपकारी फाउनडेशनों (खासकर फोर्ड फाउनडेशन) के माध्यम से कार्य करती आ रही थी। जेम्स पेत्रास के शब्दों में फोर्ड और सीआईए का अंतर्सम्बंध "अमरीका के साम्राज्यवादी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को मजबूती देने और वामपंथी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों की जड़ें खोदने के लिये एक सोची-समझी और सजग संयुक्त पहलकदमी थी। " फ्रांसिस स्टोनर इस दौर पर अपने एक अध्ययन में कहते हैं - इस समय फोर्ड फाउनडेशन ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक दुष्प्रचार के क्षेत्र में सरकार का ही एक विस्तार हो। फाउनडेशन के पास इसका पूरा ब्योरा है कि उसने यूरोप में मार्शल प्लान और सीआईए अधिकारियों के विशिष्ट अभियानों में कितनी प्रतिबद्धता और अंतरंगता के साथ कार्य किया है। "

रिचर्ड बिशेल ,जो 1952 -54 के दरम्यान फाउनडेशन के प्रमुख रहे, तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन ड्यूल्स के साथ खुले तौर पर मिलते-जुलते रहे थे। उन्होंने फोर्ड फाउनडेशन को सीआईए की विशेष मदद के लिये प्रेरित किया। ड्यूल्स के बाद जॉन मैकक्लॉय फोर्ड के प्रमुख बने। इससे पहले का उनका कैरिअर वार (War) के सहायक सचिव, विश्व बैंक के अध्यक्ष, अधिकृत जर्मनी के उच्चायुक्त, रौकफेलर के चेज मैनहट्टन बैंक के अध्यक्ष और सात बड़ी तेल कंपनियों के वाल स्ट्रीट अटोर्नी के तौर पर काफी विख्यात रहा था। मैकक्लॉय ने सीआईए और फोर्ड की साझेदारी को तीखा किया - फाउनडेशन के अंतर्गत एक प्रशासनिक इकाई गठित की जो खास तौर से सीआईए के साथ तालमेल बिठा सके और उन्होंने निजी तौर पर भी एक परामर्शदात्री समिति का नेतृत्व किया ताकि फोर्ड फाउनडेशन फंड के लिए एक आवरण और वाहक के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। 1966 में मैक जॉर्ज बंडी , जो उस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में विशेष सहायक थे, फोर्ड फाउनडेशन के प्रमुख बने।

यह फाउनडेशन और सीआईए के बीच एक व्यस्त और सघन साझेदारी थी। "सीआईए के बहुसंख्य "दस्तों" ने फोर्ड फाउनडेशन से भारी अनुदान प्राप्त किया। बड़ी संख्या में सीआईए प्रायोजित तथाकथित " स्वतन्त्र " सांस्कृतिक संगठनों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने सीआईए /फोर्ड फाउनडेशन से अनुदान प्राप्त किया। फोर्ड फाउनडेशन द्वारा दिए गए सबसे बड़े दानों में एक वह था जो सीआईए प्रायोजित सांस्कृतिक आज़ादी (स्वायत्तता ) कांग्रेस को 1960 में दिया गया था - सात मिलियन यानि सत्तर लाख डॉलर। सीआईए से जुड़कर काम करने वाले बहुतेरे लोगों को फोर्ड फाउनडेशन में पक्की नौकरी मिलती रही और यह घनिष्ठ साझेदारी परवान चढ़ती रही।"

बिशेल के अनुसार फोर्ड फाउनडेशन का मकसद "केवल इतना भर नहीं था कि वह वामपंथी बुद्धिजीवियों को वैचारिक समर में हरा दे, बल्कि यह भी था कि प्रलोभन देकर उन्हें उनकी जगह से उखाड़  दे ।"  1950 के सांस्कृतिक स्वायत्तता कांग्रेस (सीसीएफ) को सीआईए ने फोर्ड फाउनडेशन की कीप से फण्ड दिया। सीसीएफ की सबसे प्रसिद्ध गतिविधियों में से एक थी वैचारिक पत्रिका "एनकाउन्टर "। बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी जैसे बिकने को तैयार बैठे थे। सीआईए और फाउनडेशन ने विशिष्ट कलात्मक परम्पराओं, जो अमूर्त अभिव्यक्तियों पर आधारित थीं, को प्रोत्साहित करना शुरू किया - ताकि वह उस कला को जो सामाजिक सरोकारों को वाणी देती है, को कड़ी चुनौती दे सके।

अमरीकी फाउनडेशनों में सीआईए की अत्यन्त व्यापक घुसपैठ थी। अमरीकी सीनेट द्वारा 1976 में गठित एक कमिटी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि 1973-76 के दरम्यान दस हज़ार डॉलर से अधिक के 700 अनुदान जो 164 फाउनडेशनों के माध्यम से बांटे गए थे, उनमे से 108 आंशिक तौर पर अथवा शत प्रतिशत सीआईए  पोषित थे। पेत्रास के अनुसार, "फोर्ड फाउनडेशन के शीर्ष पदाधिकारियों और अमरीकी सरकार के बीच का सम्बन्ध सुस्पष्ट है और यह जारी है। हाल के दिनों के कुछ फंडेड प्रोजेक्ट का एक अध्ययन भी साफ बताता है कि फोर्ड फाउनडेशन ने किसी भी ऐसे बड़े प्रोजेक्ट को फण्ड नहीं किया है जो अमरीकी नीतियों की खिलाफत करता हो।"
फोर्ड फाउनडेशन कबूल करता है (अपने नयी दिल्ली ऑफिस की वेबसाइट पर) कि सन् 2000 की शुरुआत में इसने 7.5 विलियन डॉलर ग्रांट के रूप में दिया है और 1999 में इस क्षेत्र में कुल मिलाकर 13 विलियन डॉलर दान में दिया है। वह यह भी दावा करता है कि "सरकारों अथवा अन्य श्रोतों से फण्ड प्राप्त नहीं करता," पर वास्तव में, जैसा कि हमने देखा है, यह एक उल्टी बात है।

फोर्ड फाउनडेशन और  भारत

फोर्ड फाउनडेशन की नई दिल्ली ऑफिस के वेब पेज के अनुसार -"भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर फाउनडेशन ने 1952 में भारत में एक ऑफिस की स्थापना की।" वास्तव में चेस्टर बाउल्स जो 1951 में भारत में अमरीका के राजदूत थे, ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी। अमरीकी विदेश नीति की स्थापना में लगे बाउल्स को गहरा धक्का तब लगा जब 'चीन हाथ से निकल गया' (राष्ट्रीय स्तर पर वहां 1949 में कम्युनिस्ट सत्ता में आ गए थे)। इसी तरह वे इस बात से भी दुखी थे कि तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए हथियारबंद आन्दोलन को कुचलने में भरतीय सेना नाकाम रही थी (1946-51) " जब तक कि कम्युनिस्टों ने स्वयं ही हिंसा का रास्ता बदल नहीं लिया। " भारतीय किसानों की अपेक्षा थी कि अंग्रेजी राज की समाप्ति के बाद उनकी इस दीर्घकालीन मांग को पूरा किया जाएगा कि जमीन जोतने वाले को मिलनी चाहिए। और यह दबाव तेलंगाना आन्दोलन की समाप्ति के बाद भी आज भारत में हर कहीं महसूस किया जा सकता है।

पॉल हॉफमैन को जो फोर्ड फाउनडेशन के तत्कालीन अध्यक्ष थे, बाउल्स ने लिखा-"स्थितियां चीन में बदल रही हैं पर यहाँ भारतीय परिस्थितियां स्थिर हैं.....अगर आने वाले चार-पाँच वर्षों में वैषम्य बढ़ता है, या फ़िर अगर चीनी भारतीय सीमाओं को धमकाए बगैर अपना उदारवादी और तर्कसंगत रवैया बनाये रखते हैं .... भारत में कम्युनिस्म का बड़ा भारी विकास हो सकता है। नेहरू की मृत्यु अथवा उनके रिटायरमेंट के पश्चात् यदि एक अराजक स्थिति बनती है तो सम्भव है यहाँ एक ताक़तवर कम्युनिस्ट देश का जन्म हो।" हॉफमैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए एक मज़बूत भारतीय राज्य की जरूरत पर बल दिया -"एक मज़बूत केन्द्र सरकार का गठन होगा, उग्र कम्युनिस्टों को नियंत्रित किया जाएगा....प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जनता तथा दूसरे स्वतंत्र (बीमार) देशों से तालमेल, सहानुभूति और मदद की अत्यन्त आवश्यकता है। "

नई दिल्ली ऑफिस फौरन स्थापित किया गया, और फोर्ड फाउनडेशन ने कहा- "यह अमरीका से बाहर फाउनडेशन का पहला कार्यक्रम है और नई दिल्ली ऑफिस इसकी क्षेत्रीय कार्रवाइयों का काफ़ी बड़ा हिस्सा पूरा करेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र नेपाल और श्रीलंका तक व्याप्त है।

"फोर्ड फाउनडेशन की गतिविधियों का क्षेत्र तय कर दिया गया ( अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा) है "- जॉर्ज रोजेन लिखते हैं ,- " हमारा अनुभव है कि एक विदेशी (अमरीकी) सरकारी एजेंसी का ...................में काम करना अत्यन्त संवेदनशील मसला है .......दक्षिण एशिया बड़ी तेजी से फाउनडेशन की गतिविधियों के लिए एक संभावित क्षेत्र के रूप में सामने आया है.........भारत और पाकिस्तान दोनों ही चीन की ज़द में हैं और कम्युनिज्म द्वारा निशाने पर लिए हुए प्रतीत होते हैं। इसलिए वे अमरीकी नीतियों के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गए हैं..... ।"

फोर्ड फाउनडेशन ने भारतीय नीतियों पर आधिपत्य जमा लिया है। रोजेन कहते हैं कि "1950 से लेकर 1960 के बीच विदेशी विशेषज्ञों ने भारतीयों के मुकाबले  उच्च अधिकार हासिल कर लिए हैं ", और फोर्ड फाउनडेशन तथा (फोर्ड फाउनडेशन/सीआइए फंडेड) एमआईटी सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज "योजना आयोग के आधिकारिक सलाहकार" की तरह कार्य कर रहे हैं। बाउल्स लिखते हैं कि " डगलस एन्समिन्जर के नेतृत्व में, भारत में फोर्ड के कर्मचारी योजना आयोग के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं जो पंचवर्षीय योजनाओं का संचालन करता है। जहाँ भी दरार दिखती है, वे उसे भरते हैं, चाहे वह खेती का, स्वास्थ्य शिक्षा का अथवा प्रशासनिक मामला हो। वे ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ता प्रशिक्षण विद्यालयों में साथ जाते हैं, संचालन करते हैं और वित्तीय मदद देते हैं।"



 

Jun 23, 2011

सर्वमान्य धर्म बन गया है रिश्वतखोरी

राज्य सरकारें रिश्वतखोरी को वैध कर दें,ताकि लोग एक निश्चित राशि देकर सरकारी विभागों में अपना काम करा लें। रिश्वतखोरी की दर तय होने से लोगों को भी रिश्वत देने में आसानी होगी तथा इससे हर आदमी को पता लग जाएगा कि अमुक काम के लिए उसे कितनी रिश्वत देनी है...

राजेन्द्र राठौर

छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों में जिस तरह से घूसखोर अधिकारी-कर्मचारी और  नेता एंटी करप्शन ब्यूरो के शिकंजे में फंसते जा रहे हैं, उससे ऐसा लगता है यहां घूसखोरी चरम पर है। हर विभाग में रिश्वत का बोलबाला है, रिश्वत के बिना कुछ भी काम होना संभव नहीं है। एक तरह से रिश्वतखोरी देश का सर्वमान्य धर्म  बन गया है, जिसका पालन देश के अधिकांश लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रहे हैं।

देश के एक छोटे कर्मचारी से लेकर नेता, मंत्री सब रिश्वतखोर हो गए हैं। इस वजह से समझ में नहीं आता कि कौन सच्चा है। आज किसी कमजोर या गरीब तबके के व्यक्ति का छोटा-मोटा काम भी रिश्वत के बगैर नहीं हो पाता, जो सर्वाधिक दुख की बात है। हमारे देश में विशेषकर राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार हरामखोरी तथा अपराधीकरण जैसी विसंगतियां नई बात नहीं हैं। लगभग छह दशक पहले की बात करें, तो देश की स्वतंत्रता के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही सरकारी खरीद में घोटालों की खबरें आनी शुरु हो गई थी।

रिश्वतखोरी आज एक ऐसा भयानक रूप धारण कर चुकी हैं, जिसने पूरे देश के विकास के अलावा यहां की अर्थव्यवस्था को भी तहस-नहस कर दिया है। भारत आज कहने भर को स्वतंत्र है। समझ से परे है कि यह कैसी आजादी है जहां टैक्स चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी तथा अन्य तमाम गलत तरींकों से कमाई गई नेताओं, अधिकारियों, भ्रष्टाचारियों तथा निजी कंपनियों के मालिकों की पूंजी अब इतनी बढ़ गई है कि वाशिंगटन के एक संस्था ग्लोबल फाईनेंशियल इंटिग्रिटी को इस विषय पर आंकड़े जारी करने पड़े हैं। जिसमें बताया गया है कि भारत में आजादी से लेकर अब तक कम से कम 450 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है।

अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार दिवस के मौके पर जारी रिपोर्ट की बात करें तो पिछले साल भारत में काम करवाने के लिए 54 फीसदी लोगों ने रिश्वत दी। जबकि पूरी दुनिया में सिर्फ चौथाई आबादी घूस देने को मजबूर है। यह बात ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में सामने आई है। जर्मनी के बर्लिन स्थित एनजीओ ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वे में दुनियाभर में घूसखोरी को लेकर आंकड़ें इकट्ठे किए गए। इसके लिए 86 देशों में 91,000 लोगों से बात की गई। भारत में 74 फीसदी का कहना है कि पिछले 3 सालों में रिश्वतखोरी बढ़ी है, जबकि दुनिया में यह बात स्वीकार करने वालों की संख्या 60 प्रतिशत है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा भ्रष्ट पुलिस विभाग है। पुलिस विभाग से सरोकार रखने वाले 29 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने रिश्वत दी है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल 2003 से भ्रष्टाचार पर रिपोर्ट जारी करती रही है। यह उसकी 7 वीं रिपोर्ट है, जिसमें पहली बार चीन, बांग्लादेश और फलीस्तीनी को शामिल किया गया है। वर्ष 2010 के ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर के मुताबिक, पिछले 12 महीनों में हर चौथे आदमी ने नौ संस्थानों में से एक में काम करवाने के लिए घूस दी, इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और टैक्स अधिकारी शामिल हैं। सर्वे में भारत को इराक और अफगानिस्तान सहित सबसे भ्रष्ट देशों में गिना गया है। रिश्वतखोरी के आधार पर बनाए गए भ्रष्ट देशों की सूची में भारत, अफगानिस्तान, कंबोडिया, कैमरून, इराक, नाइजीरिया और सेनेगल जैसे देशों के साथ सबसे ऊपर है, जहां हर दूसरे व्यक्ति ने रिश्वत देने की बात मानी है।

यदि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का दीमक हमारे देश के नेताओं और अधिकारियों के रूप में देश को न चट करता तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत अब तक विकास के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ चुका होता। एक तरह से देश की राजनीति का अधिकांश भाग इस समय भ्रष्टाचार के दलदल में सिर से पांव तक डूबे हुए हैं। मगर हमारे जनप्रतिनिधि और जनसेवक (अधिकारी वर्ग) खुद को भोलीभाली जनता के सामने पाक साफ जरूर बताते हैं।

वे सचमुच रिश्वतखोर नहीं हैं और अपने मेहनत की कमाई खाते हैं, तो यह भी स्पष्ट करें कि उनके पास करोड़ों-अरबों रूपए आखिर कहां से आते हैं। फैक्ट्री, आलीशान बंगला, कीमती वाहन और विदेशी सामान वे कैसे खरीद पाते हैं। एक कर्मचारी से लेकर विधायक और सांसद को सरकार जो वेतन देती है, उससे महज परिवार ही चल सकता है। एक अहम बात यह है कि वर्तमान दौर में रिश्वखोरी हमारे देश का सर्वमान्य धर्म है। यही एक मात्र ऐसा धर्म है जिसका पालन देशवासी बड़ी निष्ठा से करते हैं। एक भृत्य से लेकर कलेक्टर, कमिश्नर, सांसद, विधायक और मंत्री तक इस धर्म के पालन पर एकमत हैं। वे अपने धर्मों को लेकर आपस में चाहे जितना सिर फुटौवल करें, लेकिन रिश्वत धर्म निभाने में सभी एकमत हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से गुजरात तक हमें रिश्वतखोरी के मजबूत धागे ने ही एकमत होने पर विवश किया है।

हमारे देश की एकता और अखण्डता का सबसे बड़ा सबूत रिश्वतखोरी को ही माना जा सकता है। सोचने वाली बात यह है कि टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा 12 वर्ष बीत जाने के बाद कहते सुनाई दिए कि उनसे एक केन्द्रीय मंत्री ने टाटा समूह सिंगापुर एयरलाईंस के साथ मिलकर देश में एक निजी विमानन कंपनी स्थापित करने के लिए लाइसेंस स्वीकृत कराने 15 करोड़ रुपए की रिश्वत मांगी थी। इससे साफ हो गया कि उद्योगपति भी अपना काम चलाने के लिए रिश्वत देते हैं।

आश्चर्य तब ज्यादा होता है जब एक विभाग में कार्यरत कर्मचारी ही अपने स्टाफ के किसी व्यक्ति से काम करने के एवज में रिश्वत की मांग करता है और बिना लेनदेन के कलम भी नहीं चलाता। एक ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले में कुछ दिन पहले ही सामने आया। सहकारिता विभाग के हेड क्लर्क ने अपने रिटायर्ड अधिकारी से ही पेंशन प्रकरण स्वीकृत कराने के एवज में 2000 रूपए रिश्वत मांगे थे, लेकिन उसे रिटायर्ड अधिकारी ने अपनी चतुराई से एंटी करप्शन ब्यूरों के जाल में फंसा दिया। ऐसे मामले आए दिन सामने आ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर करते हुए बीते अक्टूबर माह में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि सरकारी विभागों, खासतौर पर आयकर, पुलिस, राजस्व, बिक्रीकर और आबकारी विभागों में कोई भी काम बिना पैसा दिए नहीं होता। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की पीठ ने कहा भारत के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि अब भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।  भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाई गई इकाईयां ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खासतौर पर शासकीय विभागों में व्याप्त रिश्वतखोरी पर चिंता जाहिर की। साथ ही व्यंग्य करते हुए कहा बेहतर हो कि राज्य सरकारें रिश्वतखोरी को वैध कर दें, ताकि लोग एक निश्चित राशि देकर सरकारी विभागों में अपना काम करा लें। रिश्वतखोरी की दर तय होने से लोगों को भी रिश्वत देने में आसानी होगी तथा इससे हर आदमी को पता लग जाएगा कि अमुक काम के लिए उसे कितनी रिश्वत देनी है।

दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है, वे देश में लोकपाल विधेयक लागू कराना चाहते है। वहीं रिश्वतखोरी और कालेधन के खिलाफ योगगुरू बाबा रामदेव छह माह पहले से ही लड़ाई लड़ रहे हैं। वे बड़े नोंटो को बंद कराने के पक्षधर हैं, साथ ही विदेशों में जमा कालेधन को वापस भारत लाने की जिद पर अड़े हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को आखिर ऐसे आंदोलन की जरूरत ही क्यों पड़ रही है। क्या सचमुच आज देश के शीर्षस्थ नेता बिक चुके हैं? वे सबकुछ जान-समझकर भी रिश्वतखोरी पर शिकंजा कसने कोई कदम नहीं उठना चाहते या फिर उन्हें खुद के अवैध कमाई बंद होने की चिंता है।



छत्तीसगढ़ के जांजगीर के राजेंद्र राठौर पत्रकारिता में 1999से जुड़े हैं और स्वतंत्र लेखन का शौक रखते हैं. लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 'जन-वाणी' ब्लॉग लिखते है. 




Jun 22, 2011

सच के साहस का संपादकीय


अरिंदम के  एक या दो लेखों  में ऐसा होता तो इसे इत्तेफाक कहकर छुटकारा मिल जाता, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. वे लगातार ऐसे मुद्दों पर लिख रहे है,जिन्हें लिखने पर भारत में आप सहज ही सरकार-संविधान-राष्ट्र विरोधी घोषित किये जा सकते हैं...

विष्णु शर्मा 

ताज्जुब है कि इतनी तीखी और सच्ची बात लिखने पर भी सरकार अरिंदम चौधुरी को अब तक बर्दाश्त  कैसे कर रही है? प्रोफेसर चौधुरी, जो प्लानमैन ग्रुप ऑफ कम्प्नीज  के संस्थापक  और दी सन्डे इंडियन के प्रधान संपादक हैं,को क्यों सरकार माओवादी कहकर किसी कुख्यात दफा में  आजीवन कारावास नहीं दे देती! वे उन चंद उद्योगपतियों (शायद वे अकेले ही है) में  से हैं, जिन पर लक्ष्मी का वाहन उल्लू की पुरानी भारतीय कहावत असर नहीं करती. उनके लेखों,खासकर दी सन्डे इंडियन के सम्पादकीय में, भारतीय जनमानस की भावना को लगातार स्थान मिलता है.

वे उन विचारों को व्यक्त करने में भी नहीं झिझकते, जिनके बारे में लिखने की कल्पना बहुत से जनपक्षधर लेखक कर तो सकते है, लेकिन लिखने का साहस नहीं जुटा पाते. उन्हें पढ़ते  हुए आश्चर्य होता है कि एक उद्योगपति जिसका दिल्ली के सीआर पार्क जैसे पाश इलाके में आलीशान मकान  हो, जिसके सामने ढेरों गार्ड पहरेदारी करते हों , वह आम जनता के सरोकार को इतनी संवेदनशीलता से कैसे रख सकता है.

यदि अरिंदम के  एक या दो लेखों  में  ऐसा होता तो इसे इत्तेफाक कह कर छुटकारा मिल जाता, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. वे लगातार ऐसे मुद्दों पर लिख रहे है जिन्हें लिखने पर भारत में आप सहज ही सरकार-संविधान-राष्ट्र विरोधी घोषित किये जा सकते हैं! और यदि आप इस तरह के लेखों का व्यापक प्रसार किसी भारतीय भाषा में  करते हैं  तो जेल जाना आपकी नियति है. अरिंदम चौधुरी तो एक कदम आगे बढ़ कर भारत की चौदह भाषाओं में  एक साथ इस तरह के लेखों को प्रकाशित करते है, बढ़ावा देते है! 

मार्च 2011 में  अरिंदम चौधुरी ने राजद्रोह कानून पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए लिखा ‘यह बड़े शर्म की बात है कि आज भी हम औपनिवेशिक अतीत और उस दौर के पक्षपाती कानूनों के चंगुल से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए हैं,जिनका मकसद लोगों को सरकार चलाने वाले चुनिंदा लोगों के तलवे चाटने पर मजबूर करना है.’  पेशे से अर्थशास्त्री कहलाना  पसंद करने वाले प्रोफेसर चौधुरी सार्वजनिक जीवन में  सरकार की हिस्सेदारी को जरुरी मानते है.वे अंधाधुन्ध निजीकरण के खिलाफ हैं,   जिसका मकसद मुठ्ठी भर लोगों को असीमित संसाधनों का मालिक बना देना है.

11 मार्च 2011 के अपने लेख मे वे लिखते है ‘हम अजीबो-गरीब अर्थव्यवस्था हैं, जहां अरबपतियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है,जबकि हमारे पास अरब डॉलर वाला शायद ही कोई वैश्विक उत्पाद है. ऐसी अजीब,गूढ़ और अद्भुत बात- जहां बगैर किसी वैश्विक उत्पाद के ही अरबों बनाए जा रहे हों- यह केवल भारत में ही संभव है.’

भूमि अधिग्रहण के सवाल पर उनका मानना है कि ‘भारत में जमीन खरीदने वाला कानून 110 साल से भी अधिक पुराना है (भूमि अधिग्रहण कानून-1894). हालांकि इस कानून में कई बार संशोधन हुए, लेकिन संशोधनों ने सरकार की जमीन हथियाने की ताकत में और इजाफा ही किया.’और ‘राजनेताओं से लेकर नौकरशाह और उद्यमी तक, सभी की निगाहें विभिन्न विकास योजनाओं पर लगी रहती हैं,ताकि मौके की जमीन का एक टुकड़ा हथियाया जा सके.’

अरिंदम माओवादी आन्दोलन को बिना समझे आतंकवाद कहकर नकार  देने के खिलाफ है. 16 मई 2010 की सम्पादकीय  ‘हमारी सरकारों ने मानवता के खिलाफ माओवादियों से अधिक आतंकवाद मचा रखा है’ मे उन्होंने लिखा ‘जब भारत और भारतीय मीडिया फोर्ब्स सूची में अरबपतियों की बढ़ती संख्या का जश्न मनाती है, तब ये गरीबी और भूख की वजह से अनजाने और अनसुने ही दम तोड़ रहे होते हैं. इस धारणा के उलट सरकार जिन माओवादियों को आतंकवादी बनाना चाहती है,वे गरीब परिवारों से आते हैं,जिन्हें हाशिए पर धकेल कर भूखे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. दुनियाभर में जब नेता इस तरह से बड़ी संख्या में लोगों को हाशिए पर डाल देते हैं तो वहां क्रांतियां जन्म लेती हैं.’

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद जब सभी मीडिया घराने वाम पार्टियों की हार को वाम दर्शन की हार के रूप मे प्रस्तुत कर रहे थे, तब अपने सम्पादकीय में उन्होंने बड़े सीधे तर्कों के साथ सीपीएम की हार के कारणों पर लिखा -‘यह बंगाल में मार्क्सवाद के सात दुष्कर्म का अंत है’. उन्होंने आगे लिखा‘मार्क्सवाद के नाम पर जो कुछ भी किया गया,वह सब गैर मार्क्सवादी था, और मार्क्सवाद विचारधारा के केंद्र में रहने वाले गरीबों को ही सबसे अधिक आतंकित किया गया.उन्हीं का सबसे अधिक शोषण हुआ.’

अरिंदम : सच का साहस
अरिंदम मानते है कि सीपीएम ने अपने कुख्यात शासन के शुरुआती दस सालों में पूरी ईमानदारी के साथ काम किया, लेकिन वह बाद में ‘स्तालिनवादी’सोच का शिकार होकर जनविरोधी बन गई. अभी हाल में बाबा रामदेव के  भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन  पर हुए सरकारी जुल्म पर जिस प्रकार से उन्होंने लिखा है वह उनकी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता  को व्यक्त करता है.

‘चापलूसों की तानाशाही’शीर्षक अपनी सम्पादकीय मे उन्होंने लिखा है,‘रामलीला मैदान पर हुआ आधुनिक जालियांवाला बाग कांड, केंद्र सरकार के दानवी रवैये, विपक्ष की कमजोर रीढ़ और भारत के प्रति मीडिया के पाखंड का दर्शन कराता है!मेरा सवाल यह है कि हम किसी लोकतंत्र में रह रहे हैं या फिर गलती न मानने वाले तानाशाही शासन में? क्या सरकार नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. या फिर वे मानते हैं कि देश के लोग मूर्ख हैं और वे चुपचाप इस तरह की तानाशाही स्वीकार कर लेंगे तथा 2014में एक बार फिर उन्हें वोट देकर सत्ता में वापस ले आएंगे?’

भारत के बड़े मीडिया संस्थानों में शायद दी सन्डे इंडियन ही एक मात्र पत्रिका है,जिसने इतने कड़े शब्दों मे रामलीला में  सरकारी आतंक की निंदा की हो. बीजेपी के पूर्व अध्धक्ष लाल कृष्ण आडवाणी  1975-1977की भारतीय आपातकाल का हवाला देते हुए अक्सर कहते हैं  कि ‘उस वक्त पत्रकारों को झुकने का आदेश मिला तो वो रेंगने लगेंगे.’

लेकिन आज जबकि औपचारिक तौर पर आपातकाल नहीं है,ऐसे में  सरकार की तानाशाही को बिना सवाल किये स्वीकार करना लोकतंत्र में अक्षम्य है. ऐसे में अरिंदम चौधुरी की गिनती उन संपादकों में हैं जो अपने वर्ग की सीमा को तोड़ने का प्रयास करते है और लोकतंत्र पर विश्वास रखते हुए ‘लीक’ से हटकर सोच सकते है.



राह चलते किसान को तहसीलदार ने उठवाया


आजमगढ़. मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की उत्तर प्रदेश इकाई के आजमगढ़ जिला प्रभारी तारिक शफीक और विनोद यादव ने जहांनागंज के बबुरा गांव निवासी यशवंत यादव का अतिरिक्त मजिस्टेªट नुरुल हसन के समक्ष 20 जून 2011 को बयान दर्ज करवाया। पीयूसीएल ने कर्ज के बोझ से दबे किसानों को गैरकानूनी व अपराधिक तरीके से उठाकर तहसीलों और जेलों के हवालातों में दी जा रही यातनाओं को मानवाधिकार हनन का गंभीर मसला बताते हुए किसानों के ऐसे सवालों को उठाया है।

यह बयान पीयूसीएल के प्रदेश संगठन सचिव राजीव यादव और प्रदेश संयुक्त सचिव मसीहुद्दीन संजरी द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग को 15 अप्रैल 2011 को भेजे शिकायती पत्र के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा आजमगढ़ के मण्लायुक्त को भेजे गई नोटिस के बाद कि ‘‘वह प्रकरण की निष्पक्ष जांचकर आख्या आयोग को एक माह में प्रेषित करें’’ के बाद दर्ज किया गया है।

यशवंत 29 मार्च को जब दो पहिया वाहन से जा रहे थे तो सेमा और रोशनपुर गांव के बीच में राह चलते तहसीलदार ने यशवंत को उठवा लिया। इस बात की जानकारी दूसरे दिन समाचार पत्रों में छपी खबरों से मालूम हो पायी। यशवंत की पत्नी नरमी ने बताया कि यशवंत ने उससे बताया था कि जब उसे तहसील के हवालात में बंद कर दिया गया तो उसकी तबीयत काफी बिगड़ गई। जिसके बाद उसे जिला अस्पताल आजमगढ़ लाया गया जहां से उसे जेल भेज दिया गया। यशवंत यादव ने अपने बयान में दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाई की मांग करते हुए भारत सरकार से मांग की कि उसका कृषि ऋण माफ किया जाय।

पीयूसीएल नेता तारिक शफीक और विनोद यादव ने कहा कि जिस तरह से आपराधिक तरीके से यशवंत को तहसील के लोगों ने उठाया और परिवार को कोई सूचना नहीं दी इस पर सख्त कार्यवाई की जाय। जिस तरह से किसान देश में आत्महत्या कर रहें हैं वैसी स्थिति में इस तरह से किसानों को जलील करने पर अगर कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए राज्य जिम्मेदार होगा।

 

Jun 21, 2011

कोसी जन संवाद यात्रा जुलाई में

जनज्वार. बिहार में कोसी की भयानक त्रासदी के तीन वर्ष भी पूरे नहीं हुए कि फिर एक बार कोसी के पूर्वी तटबंध पर पानी के बढ़ते दबाव से लोग भयाक्रांत हैं। सरकार ने कुसहा बांधते समय दावा किया था कि अब 25 वर्षों तक कोई खतरा नहीं होगा। वही सरकार अब हल्ला मचा रही है कि कोसी को ऐसे खतरों से बचाने के लिए ‘मुख्यधारा’ में पायलट चैनल बनाना जरूरी है।

पायलट चैलन नहीं बना पाने का दोष बिहार सरकार नेपाल पर मढ़ रही है। सरकार द्वारा तय मानकों के मुताबिक  30 अप्रैल तक कोशी में बाढ़ निरोधक सभी काम पूरा करना होता है, क्योंकि मई से पानी बढ़ने लगता है। लेकिन राज्य सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 31 मई को केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर नेपाल सरकार से कोसी मामले में बात करने का अनुरोध करते हैं।

कोसी त्रासदी के बाद 9 सितंबर, 08 को राज्य सरकार ने ‘कोसी बांध कटान न्यायिक जांच आयोग’ का गठन किया था। इसे एक साल के अंदर रिपोर्ट देनी थी। अब तीन वर्ष पूरा होने को हैं। 70 लाख से ज्यादा रूपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन अब तक आयोग ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर एक भी जनसुनवाई नहीं की है। आयोग की शर्त्तें एवं जांच के बिन्दुओं को इस तरह निर्धारित किया गया है कि उसमें वर्तमान सरकार को बचाने का पहले से ही पक्का इंतजाम हो।
कुसहा बांध पीड़ित : पुनर्वास का इंतजार  

वीरपुर से बिहारीगंज तक 10 से 14 जुलाई के बीच जनसंवाद यात्रा के मुद्दे
  • बाढ़ की दीर्घकालिन समाधन के लिए जन भागीदारी निर्णायक हो
  • न्यायिक जांच आयोग अविलंब जन सुनवाई शुरू करे
  • बांध टूटने के दोषियों की सजा के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन
  • पुनर्वास प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध किया जाये
  • कोसी पुनर्निर्माण योजनाओं के चयन व निर्माण में पंचायती राज संस्थाओं एवं नागरिक संगठनों की निर्णायक भागीदारी

सच्चाई यह है कि कुसहा बांध टूटने के बाद आज तक एक भी पदाधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। तब के सिंचाई मंत्री आज भी बेशर्मी के साथ नीतीश सरकार के चहेते बने हुए हैं। पुनर्वास की तमाम योजनाओं में जटिल प्रक्रियाओं, सरकारी उदासीनता एवं सुस्ती से भ्रष्टाचार का रास्ता खुल गया है।  सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुल दो लाख छत्तीस हजार छः सौ बत्तीस (236632) घर ध्वस्त हुए थे, लेकिन अब तक मात्र 258 मकान बने हैं और 2164 मकान अधूरे  बने हैं।  यह तो केवल एक उदाहरण है। क्षतिग्रस्त घरों का मुआवजा हो या फसल क्षति का, खेतों से बालू हटाने का मुद्दा हो या उनके सीमांकन का, इन सभी मामलों में आम आदमी और किसानों की कठिनाईयां बढ़ी हैं। मौजुदा समय में भी अनेक गांवों को जोड़ने वाले पुल, सड़कें और पुलिया क्षतिग्रस्त हैं और हल्की वारिश से ही लोगों का जीवन दूभर हो जाता है।

इतना ही नहीं राहत के तौर पर आयी योजनाओं जैसे परिजनों की मृत्यु तथा मृत पशुओं के मुआवजे की क्रूर व अव्यवहारिक प्रक्रियाओं ने लोगों के जख्मों को बार-बार कुरेदा है। स्कूल और अस्पतालों की बदतर स्थिति अभी भी सबके सामने है। लाखों लोग जो अपनी आजीविका से हाथ धो बैठे उनके लिए नई रोज़गार की योजनाएं शुरु करना तो दूर पहले से चल रही मनरेगा एवं स्वावलम्बन की योजनाएं भी भ्रष्टाचार के चलते उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

जाहिर है ऐसे में सामाजिक संगठनों, कार्यकर्त्ताओं, प्रबुद्व नागरिकों, विभिन्न दलों के ईमानदार नेताओं व कार्यकर्त्ताओं का दायित्व बनता है कि पुनर्वास योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करें। सरकार के असंवेदनशील रवैये का पर्दाफाश करें तथा बाढ़ समस्या के दीर्घकालीन समाधान एवं जनपक्षीय पुनर्वास नीति के लिए पहल करें। इसी पहल को संगठित करने की दृष्टि से 10 से 14 जुलाई के बीच वीरपुर से बिहारीगंज तक एक जनसंवाद यात्रा का आयोजन ‘कोसी विकास संघर्ष समिति एवं कोशी नवनिर्माण मंच’ की ओर से किया जा रहा है, जिसमें आपकी भागीदारी पीड़ितों को न्याय दिलाने में मदद करेगी।