Mar 22, 2011

'गर्म हवा जैसी फ़िल्में रोज नहीं बना करतीं'


 
यूं   तो सआदत हसन मंटो, इसमत चुगताई, भीष्म साहनी और राही मसूम रज़ा जैसे कई लेखकों ने विभाजन की त्रासदपूर्ण पीड़ा का बयान अपने दस्तावेजों में किया और इस विषय पर बहुत सी फिल्में भी बनीं। मगर ’गर्म हवा’ और ’तमस’ का अपना अलग महत्व है। ’गर्म हवा’ इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली फिल्म थी जिसने बंटवारे के ध्वंस के बाद छायी कथित शान्ति की पड़ताल की। एक चीखती चुप्पी जिसमें घुटता हुआ आदमी समाज ही नहीं खुद से भी बिलग हो कर अपनी पहचान तलाशता है। अपने सकारात्मक अंत के अलावा इस फिल्म का एक ऐतिहासिक महत्व यह भी है कि यह बलराज साहनी द्वारा अभिनीत अन्तिम फिल्म थी। साहनी जी का अभिनय और एमएस सथ्यू के सधे हुए निर्देशन का कमाल है ’गर्म हवा’। यह फिल्म न सिर्फ कान फेस्टिबल में दिखायी गयी बल्कि आस्कर के लिए भी नामांकित हुई थी...


'गर्म हवा’ के निर्देशक  एमएस सथ्यू से पवन मेराज की बातचीत

सत्तर के दशक में रिलीज हुई फिल्म गर्म हवा कि आज के दौर क्या प्रासंगिकता है ?


कभी-कभी ऐसी फिल्में बन जाती हैं जो अपने मायने कभी नहीं खोतीं। वैसे भी आजकल हम धर्म, जाति और क्षेत्रीयता को लेकर अधिक संकीर्ण होकर सोचने लगे हैं। इन सब सच्चाईयों को देखते हुए गर्म हवा की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

ऐसे समय में कला की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है?
समाज के यथार्थ को सामने लाना ही कला की मुख्य जिम्मेदारी है। मैं इस बात का हामी नहीं कि कला सिर्फ कला के लिए होती है। कला के सामाजिक सरोकार होते हैं।
लेकिन व्यवसायिक सिनेमा भी तो यथार्थ को सामने लाता है,फिर समानान्तर सिनेमा इससे अलग कैसे ?

 वे फिल्मों के जरिये बुनियादी तौर पर पैसा बनाते हैं। उनके लिए समस्याएं भी बिकाऊं माल है। गरीबी से लेकर विधवा के आंसू तक को बेचते हैं। समस्याओं को देखने का नजरिया, समाज के प्रति सरोकार और समानान्तर सिनेमा को बनाने का तरीका ही इसे व्यवसायिक सिनेमा से अलग करता है।

अपने तरीके (ट्रीटमेन्ट) में ’गर्म हवा’ कैसे अलग है ?

पहली बात तो यह कि हम एक विचारधारा से जुड़े हुए लोग थे इसीलिए यह फिल्म बन पायी। पूरी फिल्म इसमत चुगताई की एक कहानी से प्रभावित है। एक पत्र राजेन्द्र बेदी की कहानी से भी प्रेरित था। आपको हैरानी होगी पूरी फिल्म आगरा और फतेपुर सीकरी में शूट की गयी और इसमें बनावटी चीज कुछ भी नहीं है।
आज इस तरह सोचना भी मुश्किल है क्योंकि आज की फिल्मों में बहुत बनावटीपन है। कहानी हिन्दुस्तान की होती है शुटिंग विदेश में...(हंसते हैं।) शादियां तो ऐसे दिखाई जाती हैं गोया सारी शादियां पंजाबी शादियों की तरह ही होती हैं। इस फिल्म में दृश्यों की अर्थवत्ता और स्वाभाविकता को बनाये रखने के लिए कम से कम सोलह ऐसे सीन हैं जिसमें एक भी कट नहीं है। कैमरे के कलात्मक मूवमेन्ट द्वारा ही यह संभव हो सका। आज के निर्देशक ऐसा नहीं करते।

बिना कट किये पूरा सीन फिल्माना तो कलाकारों के लिए भी चुनौती रही होगी ?

 वे सब थियेटर के मजे हुए कलाकार थे, जिन्हें डायलाग से लेकर हर छोटी से छोटी बात याद रहती थी। यहाँ तक यह भी कि कितने कदम चलना है और कब घूमना है .रंगमंच का अनुभव कलाकारों को परिपक्व बना देता है इसलिए कभी कोई दिक्कत पेश नहीं आयी।

’इस फिल्म में जब नायिका मर जाती है तो पिता के रोल में बलराज साहनी की आंखों से कोई आंसू नहीं गिरता, यह अस्वाभाविक नहीं था ?

असल में बलराज जी की जिन्दगी में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। उनकी एक बेटी ने आत्महत्या कर ली थी और बलराज उस समय शूटिंग से लौट कर आये थे और उन्होंने कुछ इसी तरह सीढ़ियां चढ़ीं थी जैसा फिल्म में था। बलराज उस समय इतने अवसन्न हो गये थे कि रो भी नहीं पाये। उस वक्त उनसे पारिवारिक रिश्तों के चलते मैं वहीं था। फिल्म बनाते समय मेरे जेहन में वही घटना थी पर मैं बलराज जी से सीधे-सीधे नहीं कह सकता था इसलिए मैंने सिर्फ इतना कहा कि आपको इस सीन में रोना नहीं है। बलराज समझ गये थे और उन्होंने जो किया वो आपके सामने है।
लेकिन इस फिल्म का अन्त बहुत सकारात्मक था ?

दरअसल यह भी बलराज जी का ही योगदान था और उन्होंने ही इस तरह के अन्त को सुझाया। दो बीघा जमीन,गर्म हवा और दूसरी कई फिल्मों में अपने शानदार अभिनय के बावजूद उन्हें कभी नेशनल अवार्ड नहीं मिला तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे कम्यूनिस्ट पार्टी के मेम्बर थे।

फिल्म रिलीज होने के बाद खुद बलराज जी की क्या प्रतिक्रिया थी ?

दुर्भाग्य से फिल्म रिलीज होने तक जिन्दा नहीं रहे। फिल्म के अन्त में वे कहते कि मैं इस तरह अब अकेला नहीं जी सकता और संघर्ष करती जनता के लाल झण्डे वाले जुलूस में शामिल हो जाते हैं,वही उनके अभिनय जीवन का भी अन्तिम शाट था।

आपने अभी बताया कि बलराज साहनी कम्यूनिस्ट पार्टी के मेंबर थे। क्या आप मानते हैं कि एक कलाकार की राजनैतिक भूमिका होना जरूरी है?

जी हां बिलकुल !कोई भी चीज राजनीति से अलग नहीं है। कलाकार का भी एक राजनीतिक सरोकार होता है जो उसकी कला में दिखता भी है। अगर कोई यह कहता है कि उसका राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है तो वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है।

कला समाज को प्रभावित करती है, समाज कला को किस तरह प्रभावित करता है ?

मैं दोनों को अलग करके नहीं देखता। समाज के तात्कालिक प्रश्न ही कलाकृति का आधार बनते हैं। वे बुराईयां जिन्हें हम लम्बे समय से स्वीकार करते आ रहे हैं,एक कलाकार उन्हें अपनी कला के जरिए समाज के सामने दुबारा खोलकर रखता है और अपने प्रेक्षक को उन पर सोचने पर मजबूर कर देता है।

सत्तर के दशक में वामपंथी राजनीति के उभार से कला, साहित्य और फिल्म प्रभावित रही, इप्टा जैसा सांस्कृतिक आंदोलन भी चला। लेकिन अब वह उतार पर नज़र आता है,ऐसा क्यों ?
जहां तक आंदोलन का सवाल है तो इसने हमें एक बेहतर दुनिया का सपना दिया। हम सब इससे प्रभावित थे। मैंने पहले भी कहा आन्दोलन से जुड़े होने के कारण ही हम लोग ’गर्म हवा’ बना सके। लेकिन यह ग्लोबलाईजेशन का दौर है और हम बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को नया नहीं बना सके, इसीलिए ऐसा हुआ। माक्र्स ने भी कहा था कि यह परिवर्तन का दर्शन है। हमें इस तरफ भी सोचना होगा।

लेकिन आज आन्दोलन की हर धारा इस पर विचार कर रही है और नेपाल में माओवादियों का प्रयोग आपके सामने है ?

हां,वहां कुछ बातें अच्छी हैं। आजकल के जमाने में कई लोग माओवादियों को वामपंथ विरोधी मानते हैं। ऐसा करने वालों में वामपंथी भी शामिल हैं। हालांकि नेपाल में मोओवादियों ने अच्छा उदाहरण पेश किया है।

आपको नहीं लगता कि ’गर्म हवा’ जैसी फिल्में एक विशेष वर्ग में सिमट कर रह जाती हैं?

जैसे साहित्य में घटिया साहित्य ज्यादा छपता और पढ़ा जाता है,उसी तरह फिल्मों में भी है। मल्टीप्लेक्स में वेलकम जैसी फिल्म देखने वाले ऐसी फिल्में नहीं देख सकते। फिल्म देखना भी एक कला है जिसके लिए आंखें होनी चाहिए। इसकी ट्रेनिंग  शुरू से ही लोगों को दी जानी चाहिए।

समानान्तर सिनेमा के सामने आज कौन सी चुनौतियां हैं ?

फिल्म बनाना एक महंगा काम है और इसके लिए प्रायोजक कीजरूरत होती है। जैसे लगान की चर्चा आस्कर नामांकन में जाने की वजह से भी बहुत हुई लेकिन इसकी टीम ने फिल्म को वहां प्रदर्शित करने में करोड़ों रूपये फूंक दिये जिसमें नई फिल्म बन सकती थी।

मजे की बात यह है कि लगान के पास आस्कर में नामांकन का वही सर्टिफिकेट है जो ’गर्म हवा’ को आज से 30-35 साल पहले मिला था। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिबल में भी दिखाई गयी और तब आस्कर के चयनकर्ताओं ने इसे आस्कर समारोह में दिखाने को कहा। मैं सिर्फ पैसे की तंगी के चलते वहाँ नहीं जा सका। हां फिल्म मैंने जरूर भेज दी थी जिसका प्रमाण पत्र मेरे पास आज भी पड़ा है।

क्या पैसे की तंगी ने फिल्म बनने की प्रक्रिया में भी बाधा डाली ?

फिल्में सिर्फ पैसे से नहीं पैशन से भी बनती हैं, लेकिन पैसा भी चाहिए। उस जमाने में 2.50 लाख निगेटिव बनने में लगा। हमारे पास साउण्ड रिकार्डिंग के भी पैसे नहीं थे। हम लोग आगरा और सीकरी में शूटिंग कर रहे थे। साउण्ड रिकार्डिंग का सामान बम्बई से आता था और उसके साथ एक आदमी थी।

इसका 150 रू0 प्रतिदिन का खर्च था और हमारे पास इतने भी नहीं थे अन्नतः सारी शूटिंग बिना साउण्ड रिकार्डिंग के ही हुई। फिल्म बाद में बम्बई जा कर डब की गयी। तकरीबन 9 लाख कुल खर्चा आया पूरी फिल्म तैयार होने में। कई कलाकारों को मैं उनका मेहनताना भी नहीं दे सका। मेरे ऊपर बहुत सा कर्जा हो गया और नौ साल लगे इससे उबरने में।

इसके अलावा और क्या-क्या समस्याएं आयीं ?

रिलीज के लिए सेंसर सर्टीफिकेट नहीं मिला एक साल की जद्दोजहद के बाद इन्दिरा जी ने खुद पूरी फिल्म देखीं और कहा रिलीज कर दो,लेकिन यूपी में नहीं (मुस्कुराते हैं)। वहां चुनाव होने वाले थे। इस तरह की तैयार फिल्म 74 में सबसे पहले बंगलौर में रिलीज हो सकी।

आज रंगमंच में भी काफी सक्रिय रहे फिल्म और रंगमंच में आप मुख्यतः क्या अन्तर पाते हैं ?
अपनी बात कहने की दो अलग-अलग विधाएं हैं। कैमरे की वजह से काफी सहूलियत हो जाती है लेकिन रंगमंच एक संस्कार है। यहां कलाकार और दर्शक का तादात्म्य स्थापित होता है। यह विधा बहुत पुरानी है और कभी नहीं मरेगी।

आपकी दूसरी फिल्मों को ’गर्म हवा’ जितनी चर्चा नहीं मिली ?

’गर्म हवा’ जैसी फिल्में कोई रोज नहीं बना सकता। ऐसी फिल्में बस बन जाती हैं कभी-कभी। पाथेर पांचाली, सुवर्ण रेखा जैसी फिल्में हमेशा नहीं बन सकतीं।



Mar 21, 2011

एक आदमी के 'फिल्म' बनने की कथा


अमिताभ बच्चन को देखकर अभिनेता बनने का स्वप्न देखने वाले शिवा की जिंदगी  एक दुःस्वप्न तक पहुंच गयी। अब वह क़र्ज और जिम्मेदारियों  से लदी हुई एक विचित्र फ़िल्मी  पटकथा जीने को मजबूर है...


अजय प्रकाश

वह एक ऐसा अभिनेता है जिसे हर पल सूदखोरों के हाथों बेइज्जत होने का डर सताता रहता है। उसे बैंककर्मियों से भी खतरा है, जो कर्ज के बदले कभी भी उसके घर की कुर्की कर सकते हैं। प़डोस के राशन दुकानदार से भी डर है जो सुबह-शाम बिना नागा बकाये की वसूली के लिए ‘शिवा-शिवा’ चिल्लाता रहता है। देवरिया जिले केरुद्रपुर कस्बे के शिवा की यह दास्तान किसी फिल्म सरीखी लगती है लेकिन यह फिल्मी पटकथा नहीं, उसकी रोज-रोज की जिंदगी है जिसे वह अपने पांच बच्चों और पत्नी के साथ पिछले कई वर्षों से निभा रहा है।


शिव शर्मा : एक  सपना जो बर्बादी तक ले आया  
 ऐसा नहीं है कि शिवा में काबिलियत नहीं रही। इसी के दम पर उसे चार भोजपुरी फिल्मों में काम करने का मौका मिला था और उसने मुंबई से लेकर देवरिया तक सैक़डों सफल स्टेज शो भी किये थे। हाल ही में गोरखपुर में भोजपुरी के एक समाचार चैनल ने कॉमेडियन का ऑडिशन लिया जिसमें शिवा पहले स्थान पर रहा। मगर शिवा को सूचित नहीं किया गया। अब शिवा ने चैनल के खिलाफ इस उम्मीद में मुकदमा किया है कि शायद सुनवाई इस तरह हो सके।

मुंबई के शांताराम थियेटर से हुई ठगी की शुरुआत से लेकर भोजपुरी फिल्मों में मिले रोल तक शिवा ने एक के बाद एक इतने झटके खाये कि उसके जीवन यापन का जरिया आज भी बाल काटना ही बना हुआ है,जिसे कभी उसने अभिनेता बनने की सी़ढी के तौर पर शुरू किया था। फिलहाल वह 6.50लाख रुपये का कर्जदार है। यह कर्ज उसके सिनेमाई सपने की देन है,जिसकी उम्मीद उसने अब भी नहीं छो़डी है।

शिवा के कलाकार बनने की कहानी 1980में कानपुर से शुरू हुई। उस समय तक नयी आर्थिक नीतियों का भारत पर असर नहीं था और कानपुर उŸार भारत के सबसे ब़डे औद्योगिक शहर के सम्मान को जी रहा था। शिवा का बचपन कानपुर के शिवाला में गुजरा, जहां उनके पिता फजलगंज के लक्ष्मी कॉटन मिल्स में मजदूरी करते थे। शिवा बताते हैं, ‘मेरे पिता के पास हमें गाइड करने का वक्त ही नहीं था।’

शिवाला की गलियों में शिवा को घूमने और सिनेमा देखने का चस्का लगा। धीरे-धीरे सिनेमाहाल ही घर और अमिताभ बच्चन रोल मॉडल लगने लगे। शिवा कहते हैं,‘अमिताभ की फिल्मों में गरीब घरों की कहानियां, उनका संघर्ष, पुरबिया जुबान और इन सबके खिलाफ अमिताभ का विद्रोही तेवर मुझे उनका दीवाना बनाते गये। अमिताभ जी की ‘दीवार’फिल्म ने मुझमें इतना साहस भर दिया कि मैं खुद को अभिनेता के रूप में ढालने लगा।’

इस फेर में शिवा ने एकाध बार पिता की जेब से पैसे चुराकर फिल्में देखीं। घर से पैसा बंद हुआ तो कबा़ड और लोहा-लक्क़ड चुना और फिर पहलवान साबुन फैक्ट्री में काम किया। शिवा ब़डा हुआ तो अमिताभ बच्चन की ही तरह के कप़डे पहनने लगा। दोस्त के सुझाव पर शिवा अभिनेता बनने मुंबई पहुंचा। इधर-उधर भटकने के दौरान एक सैलून में काम मिला। काम के बदले खाना और सोने के लिए दुकान के पायदान वाली जगह मिलने लगी।

शिवा बताते हैं,‘दुकान बंद होने के बाद मैं वहीं अखबार बिछा कर सो जाता और दुकान की सफाई कर मैं दूसरे काम पर भी निकल जाता,जिससे कुछ कमाई हो जाती। हफ्ते भर की कमाई को मैं छुट्टी के दिन मंगलवार को अमिताभ के घर के सामने इंतजार में खर्च कर देता। आखिरकार छह साल बाद एक दिन अमिताभ के दर्शन हुए। अमिताभ को देख कर मुझे आभास हुआ मानो मेरे अंदर परमात्मा समाहित हो रहा हो।’

इस दौरान शिवा की जिंदगी में एक दूसरी कहानी कलाकार बनने की भी चलती रही। ‘शांताराम ग्रुप के कारण मैं बतौर कलाकार उभरा। इससे लोग यह मानने और चर्चा करने लगे कि शिवा की मिमिक्री, डांस और कॉमेडी का कोई जोर नहीं है। ‘दीवार’ फिल्म का वह डायलॉग ‘खुश तो तुम बहुत होगे’ लोग मुझसे हर स्टेज शो में आज भी सुनते हैं। इसके अलावा मैं प्राण, नाना पाटेकर, जगदीप, महमूद, मिथुन चक्रवर्ती और न जाने कितने ही कलाकारों की आवाज निकालता था।’

इसके बाद शिवा की पहचान बनी और इसी के साथ ठगे जाने का सिलसिला भी शुरु हुआ। मुंबई में काका इंटरनेशल के बैनर तले बन रही फिल्म ‘न घर का न घाट का’शिवा की पहली फिल्म थी। काम के बदले उससे 1990में पांच हजार रुपये लिये गये,लेकिन पैसा लेने वाले लोग भाग गये। शिवा के मुताबिक, ‘यह मेरी सालभर की कमाई थी जो मुझे बाल काटने के एवज में मिली थी।’


शिवा शर्मा का परिवार : सपना अभी बाकि है
 फिर शिवा ने पैसे जो़डने के लिए फोटो सेशन, मेकअप और स्ट्रगलर कलाकारों के एलबम बनाने का काम शुरू किया। तभी एक बार फिर उसकी जिंदगी में कानपुर लौट आया। ह़डताल के कारण पिता की कमाई बंद हो गयी तो परिवार पालने की जिम्मेदारी शिवा पर आ प़डी। वह इस प्रयास में लगा ही था कि कुछ महीनों में उसके पिता की मौत हो गयी।

शिवा बताते हैं,‘निधन से पहले पिताजी मेरी शादी कर गये थे,लेकिन गौना उनकी मृत्यु के बाद हुआ। पत्नी के आने के बाद ब़ढे खर्च से निपटने के लिए मैंने बाल आदि काटने के हुनर का इस्तेमाल किया और एक ब़डी दुकान खोल दी। दुकान चल प़डी और मैं कमाई का बचा हिस्सा लेकर मुंबई के प्रोड्यूसरों और निर्देशकों के पीछे भागता रहा। सैलून में मेरी उपस्थिति कम होने के कारण कारीगरों ने मनमानी शुरू की और दुकान का वह जलवा नहीं रहा।

अभिनेता और अच्छी कमाई के नाम पर कर्जदार भी बहुत मिले और सूदखोरों ने खुले हाथ से कर्ज दिये। मुंबई में बैठे भोजपुरी फिल्म निर्देशकों और निर्माताओं ने रोल देने और अच्छा पैसे देने के लालच में रुद्रपुर तहसील के आसपास के गांवों में सेट की जिम्मेदारी थमा दी। मुझे याद है कि ‘तुलसी’ फिल्म की साइट के इंतजाम में लाखों रुपये खर्च हुए और आज तक मेहनताने में मात्र 16 रुपये मिले। ‘तुलसी’ में मैंने बतौर अभिनेता काम भी किया।’

इसके बाद शिवा को भोजपुरी की दो और फिल्मों ‘हमार रजउ दरोगा नंबर वन,’‘पिया तोहसे नैना लागे’ में काम मिला और निर्मल पांडे, मोहन जोशी जैसे मंजे हुए कलाकारों के साथ काम करने का मौका भी। मगर आमदनी फूटी कौ़डी नहीं। सिनेमा के पर्दे पर देखने वालों को लगता कि शिवा अब ऊंची चीज हो गया है, पर असलियत तो वही जानता था कि कैसे ऋण लेकर घी पी रहा है।

बाद में उसे पूर्वांचल क्षेत्र में मनोज तिवारी,राधेश्याम रसिया,तरुण तूफानी और गुड्डू रंगीला जैसे भोजपुरी फिल्मों के नामचीन कलाकारों के शो में एंकरिंग और डांस का मौका मिलने लगा। इसके बावजूद शिवा ने किसी से अपनी बदहाल स्थिति की चर्चा नहीं की। शिवा कहते हैं,‘मैं सोचता था, अगर लोगों को यह बात पता चल जायेगी तो मुझे काम नहीं मिलेगा और अभिनेता बनने का सपना धरा रह जायेगा।’

रुद्रपुर में गिरने को हो रहे पैतृक घर की ओर देखते हुए शिवा कहते हैं,‘आज मेरी हालत इस घर की तरह है जो कभी भी ढह सकता है, लेकिन आखिरी उम्मीद इसे भी अपनी नींव पर है और मुझे भी।’शिवा इस तंगहाली के बावजूद यह मानते हैं कि ‘मैं कलाकार हूं और मरने से पहले इसे मैं किसी कीमत पर नहीं छो़ड सकता।’ अच्छी बात यह है कि जिले के लोग आज भी उन्हें पूर्वांचल का ब़डा कलाकार मानते हैं।

'' द पब्लिक एजंडा'' से साभार


Mar 20, 2011

होली की हार्दिक शुभकामनाएं

रंगों के त्योहार होली पर पाठकों और लेखकों हार्दिक शुभकामनाएं. आइए इस अवसर पर हम दूसरों के जीवन में खुशियों के  रंग भरें और उनके चेहरे पर मुस्कान लाएं.

जनज्वार टीम

Mar 19, 2011

भूमिका में स्त्री




रामजी यादव


मैंने बचपन से देखा है बस यही

उछाह में भर कर गाने लगना

जैसे चलाना हो कुआं खोदने के लिए पहला फावड़ा

और हुलास से भर देना सारे वातावरण को



मैं जब भी ध्यान करता हूं सिहरने लगता हूं

सुध खोकर रोना पूरे राग में

जिंदगी के गद्य को कविता में बदलते हुए

ढेरों-ढेरों कहावतों, मुहावरों और निष्कर्षों से

एकाग्र कर देना सारे सत्य और विगलित यथार्थ को

मेरी मां की यही दो विशेषतायें हैं



मां की भूमिका इन्हीं दो महाबंधों के बीच

चलती रही उम्रभर

थोड़ी सी जिद रही जीने की थोड़ी सी उम्मीद

कि मनाया जायेगा उसे नाराज होने पर



वह उस वर्ग की है जो अपनी भूमिका को ही

मान चुका है अपनी हैसियत

और हैसियत से हिलता नहीं जौ भर



गोबर उठाना, पाथना

उसिन देना भात और बटलोई में दाल चढ़ा देना

चुटकी भर हल्दी और नमक के साथ

मिला देना अपनी ऊब विषण्णता और थकान भी उसमें

न कुछ सूझे तो गाली देना स्त्रियोचित

और हार कर रोने लगना सचमुच

जिसकी तस्दीक सिर्फ आंसू करते हैं

पोछती जाती है जिन्हें बार-बार पल्लू से



जब दुलहिन थी मां

पकाया करती थी ससुराल में जौ की रोटी

खेसारी की दाल

उबालकर दाल रख देती थी दौरी से तोपकर



मैं नहीं हुआ होऊंगा तब तक

दिन बिताया होगा मां ने कोठार, कछरों, घड़ों और गगरियों

से परिचित होने में

और जैसे-जैसे जानती गयी होगी ससुराल में

जौ और खेसारी की उपज

तो कैसे हुई होगी दुखी

और कितना कोसा होगा अपनी किस्मत को?



उन दिनों गेहूं नहीं बोया जाता था हमारे खेतों में

थोड़ा-बहुत बदल लिया जाता था जब कभी मेहमान आते

वे आते ही मेह की तरह बिना बताये

और उसी तेजी से मां बैठ जाती जांत पर बुआ के साथ

फटाक से पीस लेती सेर-दो सेर पिसान



फिर पूरे मन से बनाती उजली-उजली रोटियां

कि देखते ही एक और खाने का मन करे किसी का भी



बताया था उसने एक बार

चुपके से रख ली दो रोटी अलग से

फिर लग गयी रसोई में



पता नहीं किसके आदेश पर कि जो कहता रहा भौंरे की तरह

भन्नाते हुए कि

जे गिहथिन खाती है चुपके से रोटी बिना बताये और

लिये आदेश मालिक से

उसके सात पुरखे हो जाते हैं कुपित

और खंडहर हो जाता है एक दिन उसका घर



रख दिया दोनों रोटियां उस दुलहिन ने वापस कठवत में

और समझती रही पता नहीं कब तक अपराधिनी स्वयं को



कि बचाया जिस स्त्री ने दो रोटियों को

अपनी विराट इच्छाओं की उफनती नदी में बह जाने से

और बचा लिया इस तरह एक परिवान को विपन्न होने से



जो लाखों-लाख स्त्रियां हैं ऐसी ही

और जो बचे हुए हैं परिवार के परिवार

जो गांव के गांव बनते हुए उगाते हुए गेहूं और उम्दा चावल

भेज रहे हैं ‘ाहरों को बड़ी आबादी खटने के लिए



अफसर ने कम्प्यूटर आपरेटर और हम्माल

राजमिस्त्री, अढ़िया ढोते मजदूर, कवि और चैकीदार

अध्यापक और नेता जो चलाते हैं यह राजसत्ता

जो भूल चुकी है श्रम का अर्थ

एकमुश्त सिखाती है चोरी और दमन

और झूठ बोलने के हजारों हजार तरीके



उस स्त्री की भूमिका का क्या है महत्व?

उन स्त्रियों को कैसे देखेंगे आप जो

धज में भले हों अलग लेकिन मन का एक

विराट आकाश है बिना देखा गया?





साहित्य की सभी विधाओं में दखल . देश में चल रहे संघर्षों और संघर्षशील  जनों के विमर्श को साहित्य के केंद्र में लाने  के पक्षधर. उनसे  yadav.exploremedia@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है.

Mar 18, 2011

ले चलो जनता के बीच कविता


दिल्ली  में कविता पाठ   की इस श्रृंखला  में मजदूरों से लेकर बुद्धिजीवी तक शामिल हो रहे हैं और इसका आयोजन भी सीधे लोगों के बीच जाकर हो रहा है...


जनज्वार. नव सर्वहारा सांस्कृतिक  मंच के बैनर तले नागार्जुन-केदार-शमशेर जन्मशती पर कविता यात्रा की शुरूआत यहां दिल्ली से छह फरवरी को हुई। फिलहाल दिल्ली में ही यह कार्यक्रमों के जरिये अपनी निरंतरता बनाये रखेगी फिर दिल्ली से कलकत्ता की ओर यह प्रस्थान करेगी।

इस यात्रा की शुरूआत करते हुए कवियों ने डेढ़-दो सौ श्रमिकों से भरे हुए जमरूदपुर गुरूद्वारा कम्युनिटी हॉल में कविताएं पढ़ी। कविगण थे -शिवमंगल सिद्धांतकर,रंजीत वर्मा, मिथिलेश श्रीवास्तव, कुमार मुकुल और रामजी यादव। इस मौके पर पत्रकार एवं आलोचक अनिल सिन्हा भी उपस्थित थे जिन्होंने आम जीवन में कविता के महत्व को रेखांकित करते हुए संक्षिप्त  सा लेकिन सारगर्भित व्याख्यान दिया। मंच का संचालन कर रहे थे कामरेड नरेंन्द्र। इस कविता यात्रा का उद्देश्य कविता में लोगों की भागीदारी को बढ़ाना है ताकि कविता में व्याप्त गुरूबाजी और गुटबाजी खत्म हो सके साथ ही जिनके लिए कविता लिखी जा रही है उस तक वह पहुंच सके। 



गोष्ठी  की शुरूआत करते हुए कवि रंजीत वर्मा ने कहा कि कविता के भूमंडलीकरण के खिलाफ यह यात्रा है। उन्होंने कहा कि वास्तविक कवि वे होते हैं जो स्थानीय कथ्यों, पात्रों, संबंधों, घटनाओं, स्मृतियों,आकांक्षाओं,सपनों को इस तरह बुनने की कोशिश करते हैं कि वह सबके सपने,सबकी आकांक्षाएं,सबकी स्मृतियां और सभी को अपने जीवन की घटनाएं लगने लगती हैं क्योंकि वैसे कवि के सामने दुनिया के तमाम पीड़ित समुदाय अभिव्यक्ति के लिए आकार ले रहे होते हैं। यहीं विश्व दृष्टि का निर्माण होता है और दुनिया का समस्त वंचित तबका साहित्य में अपना अक्श देखता है और साथ ही ताकत भी पाता है। उसके बाद 13फरवरी को मोरी गेट पर और फिर 21फरवरी को संसद मार्ग पर कविता पाठ का आयोजन हुआ जिनमें नीलाभ,मंगलेश डबराल और मदन कश्यप ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया।

इसके बरक्स कुछ कवि ऐसे होते हैं जो वास्तव में कवि नहीं होते हैं बल्कि वे शब्दों के महज शिल्पकार भर होते हैं। ये अपनी कमी खूब समझते हैं और इसे पाटने के लिए वे भूमंडलीकरण का सहारा लेते हैं। इसके तहत किया यह जाता है कि कई भाषाओं, कई देशों के रचनाकारों को एक मंच पर बुलाया जाता है और करोड़ों खर्च कर माहौल को उत्सवी बनाया जाता है और उसे वैश्विक बनाने की कोशिश की जाती है। वहां पहला उसूल यह होता है कि न किसी को कोई चुनौती दी जाए और न किसी की चुनौती स्वीकार करने की कोशिश की जाए।

जयपुर साहित्य उत्सव सहित साहित्य के जितने भी उत्सव दुनिया भर में आयोजित किये जा रहे हैं चाहे वह गाले का हो या और कहीं का उसका मकसद है मेहनतकश जनता को साहित्य से हमेशा के लिए बाहर कर देना। यूं ही वहां ‘तेरा क्या होगा कालिया’जैसी पंक्तियों के लेखकों या ‘कजरारे कजरारे ’जैसे गीत लिखने वाले गीतकारों को साहित्यकार के रूप में स्थापित करने की कोशिश नहीं की जाती। वैसे इसके पीछे आयोजकों का तर्क यह होता है कि जनता उन्हें ही सुनना चाहती है और वही उन्हें हाथों हाथ लेती है। विश्व-दृष्टि का यहां नितांत अभाव होता है और इस कमी की पूर्ति वैश्विकता के जरिये करने की कोशिश की जाती है।

इसके उलट कविता यात्रा का उद्देश्य कविता को लोगों के बीच एक गंभीर मसले की तरह ले जाना है न कि मनोरंजन की तरह। और इसी रूप में लोग भी इसे ले रहे हैं यह बात तीन जगहों पर कविता पाठ किये जाने के बाद सिद्ध भी होती है। यात्रा में शामिल कवियों ने भी माना कि लोगों ने इसे एक गंभीर कार्यक्रम की तरह लिया। यह बात समझने की है कि हर आदमी का जीवन गंभीर मसलों से भरा होता है जिनमें कविता भी शामिल है।

कबीर और तुलसी को गाने वाली और तमाम लोकगीतों की रचयिता इस मेहनतकश जनता के सहज विवेक पर विश्वास न करना और फिर कविता न समझने का आरोप लगाते हुए उसे कविता से बाहर रखना दरअसल उसके खिलाफ एक गहरी साजिश है जिसे सत्ता और ताकत के चाटुकार रचनाकार महीनी से अंजाम देते रहते हैं। दुख तो तब होता है जब जनपक्षधर रचनाकार भी आश्वस्त भाव से समर्थन में सिर हिलाते नजर आते हैं। यह सारा खेल शास्त्रीयता के आड़ में चलता है। कविता यात्रा को इस छद्म अवधारणा को तोड़ने के एक प्रयास के रूप में देखने की जरूरत है।

यहां पर कुछ सवाल खुद से करने की जरूरत है कि जब कविता उनकी जिंदगी से निकल कर आप तक आ सकती है तो वही कविता तैयार होकर उस तक क्यों नहीं जा सकती?आप कैसे निकाल सकते हैं उन्हें उन कविताओं की दुनिया से जो उनकी ही जिंदगी से निकल कर आयी है आप तक? या इस तरह भी सोचा जा सकता है कि क्या हम जो लिख रहे हैं वह सचमुच उनकी जिंदगी से ताल्लुक रखता है या यह हमारा सिर्फ भ्रम है?


 अगर ऐसा है तो फिर क्या फर्क है एक जनपक्षधर रचनाकार और एक कलावादी रचनाकार के बीच? या इस फर्क की अवधारणा ही गलत है?लोग समझते हैं कि उनके लिए लिखने का मतलब नारा लिखना है। क्या यह सोच सही है? क्या उनकी जिंदगी महज एक नारा भर है? क्या आपने उन्हें सिर्फ जुलूसों में या हड़ताल पर बैठे देखा है?क्या ऐसा नहीं लगता कि वह सरकार हो या कोई कार्पोरेट घराना दोनों की लुटेरी निगाहें उनकी संपदा पर ही टिकी हैं?इस वजह से उनकी सामान्य जिंदगी में जो बवंडर बवडंर उठ खड़ा हुआ है क्या उनसे टकराने वाली कविता उन्हें नहीं चाहिए?

इन्हीं चीजों को शिदत्त से महसूस करते हुए कविता यात्रा की तैयारी की जा रही है। फिलहाल यह दिल्ली के ही विभिन्न इलाकों में घूम घूम कर मजदूर इलाकों में कविता पाठ का आयोजन रखा जा रहा है। और जब तैयारी पूरी हो जाएगी तो यह कविता यात्रा दिल्ली से निकल कर कलकत्ता की ओर रवाना होगी। यानी कि देश की इस नई राजधानी से देश की पुरानी राजधानी की ओर।

दिल्ली को राजधानी बने सौ साल हो गए हैं। कलकत्ता पीछे छूट गया है। ठीक उसी तरह जैसे विकास की इस दौड़ में रोज करोड़ों लोग पीछे छूटते जा रहे हैं। उन्हें भारी संख्या में विस्थापन का शिकार होना पड़ रहा है, महंगाई की मार उन्हें ही सबसे ज्यादा झेलनी पड़ रही है, उनकी संस्कृति, उनका रोजगार उनसे छीना जा रहा है और उन्हें अपरिचित संसार में भटकने और बर्बाद होने को हर क्षण जबरन ठेला जा रहा है। कविता यात्रा इन्हीं पीछे छूट गए रास्तों से होकर गुजरेगी ताकि आगे के रास्ते का नक्शा तैयार किया जा सके।




Mar 16, 2011

करोड़ों की मिलें, कौड़ियों के मोल

चीनी मिलें एकाएक बीमारू या कम क्षमता की नहीं हुईं। यह प्रक्रिया 1990 में नयी आर्थिक नीतियों की शुरूआत के बाद से शुरू  हुई जब सरकारों ने मिलों की क्षमता बढ़ाने के बजाय निजी मिल मालिकों के लिए पलक बिछाना शुरू किया...


अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेश में सरकारी चीनी चीनी मिलों का इतिहास इतनी जल्दी पलटेगा इसका अनुमान किसी को नहीं था। जिन निजी मिल मालिकों की चीनी मिलों को सत्तर और अस्सी के दशक में सरकार ने अधिगृहित कर जान डाली थी,उनकी लॉबी अब इतनी मजबूत हो जायेगी कि सरकार अपनी चीनी मिलों की क्षमता बढ़ाने की बजाय उसे बंद करना राज्य के हित में मानेगी और फिर कौड़ियों के भाव बेचना राज्य की उन्नति, ये अंदाजा भी नहीं था।

वह भी सरकार ऐसा तब करेगी जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मिलों की संपत्ति बेचने पर फैसला न दिया हो। मगर ऐसा हो रहा है और राज्य की मायावती सरकार बंद पड़ी सरकारी चीनी मिलों की पूरी संपत्ति को कौड़ियों के भाव अपने नजदीकियों को बेच रही हैं।

उत्तर प्रदेश स्टेट ‘शूगर कॉरपोरशन लिमिटेड (यूपीएसएससीएल),  'शूगर  कॉआपरेटिव मिल और निजी चीनी मिलों को मिलाकर कुल 108 मिलों के साथ यह प्रदेश देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य हुआ करता था। जिसमें 35 चीनी मिलें सरकार की, 28    की और शेष निजी घरानों की थीं। जिसमें अब सरकारी एक भी नहीं बची हैं और कोआपरेटिव को भी सरकार ने बेचने का बिगुल बजा दिया है। अब उत्तर प्रदेश शूगर कॉरपोरेशन कर्मचारी संघ के मात्र 200लोग बचे हैं।

भटनी चीनी मिल : कौड़ियों  के मोल बिकी                             फोटो- अनिल मिश्र

 कॉरपोरेशन के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ‘अगर सही तहकीकात हो तो प्रदेश की मिलों के बेचने में मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटाला से बड़ा घपला सामने आयेगा। कॉरपोरशन की जिस मिल में 22 करोड़ का सीरा और चीनी थी, उसे मात्र आठ करोड़ में बेच दिया गया, जबकि जमीन, मशीनों और बिल्डिंग की कीमत तो अभी अलग है।’

राज्य विभाजन के बाद उत्तराखंड में जा चुकी किच्छा और देहरादून की मिलों को छोड़ दें तो निगम की हरेक चीनी मिल में हजार से पंद्रह सौ कर्मचारी तो काम करते थे। यानी बेकारी से त्रस्त इस राज्य में सरकार की सिर के बल खड़ी नीतियों ने 33 मिलों के करीब 35 हजार मजदूरों को बेकार कर उनके लाखों आश्रितों को बदहाली में रहने को बाध्य किया।


भटनी और सहारनपुर में किस भाव बिकी मिलें

सहारनपुर                                                                               
चीनी मिल के पास कुल जमीन - 61.84 हेक्टेयर
सर्किल रेट के मुताबिक इसका रेट- 486.70 करोड़
मशीनों और प्लांट का रेट- 1.27 करोड़
बिल्डिंग की कीमत - 2.63 करोड़
चीनी और सीरा के स्टॉक की कीमत - 22.53 करोड़
कुल अनुमानित कीमत- 513.13 करोड़
सरकार द्वारा निर्धारित दर - 70.90 करोड़
कंपनियों द्वारा लगायी गयी अधिकतम कीमत- 35.85 करोड़
कुल घाटा - 513.13 - 35.85 - 477.20 करोड़

भटनी
उत्तर प्रदेश शूगर कॉरपोरेशन लिमिटेड, भटनी यूनिट
चीनी मिल के पास कुल जमीन - 13.873 हेक्टेयर
सर्किल रेट के मुताबिक जमीन की कीमत - 66 करोड़
मशीनों और प्लांट की कीमत - 50 करोड़
बिल्डिंग की कीमत - 1.50 करोड़
कुल अनुमानित कीमत - 117.50 करोड़
त्रिकाल फुड्स एंड एकता प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने मील की संपत्ति खरीदी- 4.75 करोड़
कुल घाटा- 117.50 - 4.75- 112.75 करोड़
घाटे का कुल योग- 112.75 करोड़
चीनी मिलें एकाएक बीमारू या कम क्षमता की नहीं हुईं। यह प्रक्रिया 1990 में नयी आर्थिक नीतियों की शुरूआत के बाद से शुरू  हुई जब सरकारों ने मिलों की क्षमता बढ़ाने के बजाय निजी मिल मालिकों के लिए पलक बिछाना शुरू किया। नहीं तो 1987-88 तक उत्तर प्रदेश कुल चीनी उत्पादन का करीब 48प्रतिशत पैदा कर देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य और देश में कुल गन्ना उत्पादन क्षेत्र 32.87 लाख हेक्टेयर में से सबसे अधिक 18.07 हेक्टेयर गन्ना बोने वाला राज्य रहा है।

अब उसी राज्य की चीनी मिलों की 20हजार करोड़ की संपत्ति को कौड़ियों के भाव बेचने के लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है। देवरिया,भटनी और बैतालपुर चीनी मिल को मात्र 70करोड़ में बेच  दिया गया है। जबकि अकेले भटनी चीनी मिल की संपत्ती लगभग 112 करोड़ की है। भारतीय किसान यूनियन के महासचिव राकेश टिकैत कहते हैं कि ‘निजी कंपनियों को संयंत्र लगाने के लिए बजट देने वाली सरकारें अपने मिलों के लिए बजट देती तो आधुनिक मशीनों के साथ क्या मिलों को बचा नहीं लिया जाता?’

गौरतलब है कि 1988 तक देश की कुल 356 चीनी मिलों में मात्र 109 मिलें निजी घरानों की थीं। लेकिन 1993 में ही प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार बीमारू के नाम पर छह सरकारी चीनी मिलों के बंद करने और बेचने का रास्ता खोज निकाला था। इसमें बुढ़वल और बलरामपुर मिल को सिंह शूगर  मिल्स को सरकार ने बेच भी दिया था,जिसे उत्तर प्रदेश कॉरपोरशन कर्मचारी संघ ने अदालत जाकर बचाया था और दोनों कंपनियां फिर कॉरपोरेशन के कब्जे में आयी थीं।

अदालत को संघ ने आगाह कराया था कि सरकार ने बीमारू घोषित करने वाली अद्र्व न्यायिक संस्था डीआइएफआर और बीआइएफआर के इजाजत बगैर ही मिलें बेच दी हैं। इसके बाद मुलायम सरकार राज्य सचिव डीके मित्तल के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय पहुंचती है जिसके बाद अबतक का मामला अदालतों में घिसट रहा है। अगर इस बीच कुछ हुआ तो सिर्फ एक के बाद एक सरकारी चीनी मिलों का बंद होना और कौड़ियों के भाव बिकना।

प्रदेश में चीनी मिलों के इतिहास देखें तो जब निजी चीनी मिल घाटे के नाम पर बंद होने लगीं थीं तो 1971 में नारायण दत्त तिवारी की सरकार ने मजदूरों, किसानों, फसलों और उत्पादन को बचाने के लिए चीनी मिल कॉरपोरशन का गठन कर मिलों का सरकारीकरण शुरू किया। यह प्रक्रिया 1984 तक चली और 25मिलों को सरकार ने कॉरपोरेशन की मिल बनाया। इसी प्रक्रिया में 28मीलों को कोआपरेटिव के तहत संचालित कराया।

मगर धीरे-धीरे सरकारी और कोआपरेटिव चीनी मिलों में राजनीतिक पैठ और नौकरशाही का बोलबाला बढ़ा और जनप्रतिनिधि किसानों-मजदूरों के हितैषी होने के बजाय कमीशनखोरी की नैया पर सवार हो निजी मालिकों के पक्ष में कानून बनाने लगे। उसी का असर है कि चीनी के सर्वाधिक उत्पादन वाले जिला कुशीनगर और देवरिया से संबद्ध प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शिव प्रताप ‘शाही  पूरे विधान सभा सत्र में एक दिन भी मील का सवाल नहीं उठा पाते। बची कांग्रेस को उसको अपने महासचिव राहुल गांधी बनाम मायावती से फुर्सत ही नहीं है कि वह मुद्दा बना सके।

अगर 1990 के बाद से देखा जाये तो राज्य में वह सत्ताधारी पार्टी हो या विपक्षी किसी ने राज्य की सरकारी चीनी मिलों को बचाने के लिए कभी संजीदा प्रयास नहीं किया। दूसरा कि इससे सिर्फ कर्मचारी ही नहीं प्रभावित हो रहे थे बल्कि राज्य की जनता इन मिलों के बंद होते जाने से बेकारी के भी नजदीक पहुँच  रही थी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई लाखों किसानों के जिवीका का जरिया छिन गया। जरवल चीनी मिल के पूर्व कर्मचारी राकेश बहादुर कनौजिया बताते हैं,‘अभी 6से 10 चीनी मिलों में जितने कर्मचारी निजी  कंपनियों में काम करते हैं उतने अकेले किसी एक सरकारी मिल के कर्मचारी थे।’

बावजूद इसके 1999से बीमारू और घाटे के नाम पर बंद पड़ी मिलों के बेचने का जो सिलसिला शुरू  हुआ था, उसे मायावती सरकार जारी रखे हुए है। प्रगति इतनी भर है कि मौजूदा सरकार बंद मिलों को पोंटि चड्ढा जैसे अपने नजदीकियों को कबाड़ के भाव बेच रही हैं। अगर बेचने में अदालत या जिम्मेदार संस्थाएं अड़चन डाल रही हैं तो मायावती मुकाबले के लिए प्रसिद्ध वकील और अपने सिपहसालार सतीश चंद्र मिश्र को निपटने के लिए तैनात कर देती हैं। वैसे में जनता क्या यह मान ले कि सर्वजन हिताय का यही ढांचा है।
 
साथ में सेवाकांत शिवेश
द पब्लिक एजेंडा से  साभार 

बीहड़ फिल्म महोत्सव 17 मार्च से और 23 मार्च से मऊ फिल्म महोत्सव


गांव -गिरांव से उठती सिनेमाई लहर

शाह आलम


अवाम का सिनेमा का सफर जो 2006 में अयोध्या से शुरू हुआ, पहले दौर में कुछ खामियों को दूर करने के बाद,अब धीरे धीरे संस्थाबद्ध हो रहा है। इन पांच वर्षों में हमने बहुत सारे उत्साही दोस्त बनाये हैं. शायद यही वजह है कि अयोध्या फिल्म उत्सव ने प्रदेश में एक सांस्कृतिक लहर पैदा की है.ऐसा इसलिए संभव हो सका है कि यहाँ फिल्मे ही नहीं दिखाई जाती बल्कि कला के विभिन्न माध्यमों के जरिये आमजन के बीच बेहतर संवाद बनाने,उनके दुःख में शामिल होने और अपनी खोई विरासत से रु-ब-रु होने का मौका मिलता है.


बहुत सारे शुभचितकों और मित्रों के कारण ही हम कई पहलकदमियां ले पा रहे हैं, जो हमें लगातार इसे बेहतर और व्यापक बनाने के लिए प्रोत्साहित करते रहें हैं। गावं-गिरांव में फिल्म उत्सव का प्रयोग फिल्म सोसाइटी के गठन के साथ फिल्म निर्माण,  प्रदर्शन  , वितरण,प्रकाशन, संग्रहालय, डिजिटल डायरी, फेलोशिप, फिल्म निर्माण प्रशिक्षण  आदि परियोजनाओं पर गंभीरता से काम हो रहा है, ताकि यह व्यापक दायरे में आकार ले सकें।

हम मानते हैं कि यह आन्दोलन तभी सफल होगा जब लोग खुद सिनेमा का निर्माण करें। जिसमें उनकी अपनी सोच हो। हम सच्चे सार्थक सिनेमा को जन-जन तक पहुंचाना चाहते हैं। जिसके तहत हमसे जुड़े साथियों ने 2006 से कई फिल्मों का निर्माण किया, इसे कई उत्सवों में जारी एवं प्रदर्शित किया गया। अयोध्या ,मऊ, जयपुर , औरैया, इटावा में कई स्थानों पर फिल्म उत्सव करते आ रहे हैं। सबसे जरुरी है कि इसकी निरंतरता बनी रहे.

आप से आग्रह है कि आप भी अपने गांव, शहर, कस्बों में ऐसे आयोजन कर अवाम के साथ खड़े हो। इन आयोजनों कि सार्थकता तभी सही साबित होगी जब लोगो के छोटे छोटे सहयोग से इसे हम अपने उत्सव के तौर पर जगह जगह आयोजित कर पाएंगे। निजी कम्पनियों, सरकारी सहायता या किसी एनजीओ के स्पांसरशिप के बिना छोटे-छोटे स्तर पर सहायता लेकर बनने वाली फिल्मों को एक मॉडल के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई।

अवाम का सिनेमा का यह प्रयास रंग ला रहा है। इससे जुड़े कई युवा अब अपने सीमित संसाधनों और छोटे कैमरों की मदद से गांव-कस्बों की समस्याओं,राजनैतिक उथल-पुथल और बदलावों को दुनिया के सामने पेष कर रहे हैं। अवाम का सिनेमा की इस श्रृंखला ने एक माडल रखा है.कि किस तरह जनता कि हिस्सेदारी और सहयोग से सामाजिक परिवर्तन का आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है।

सत्रह मार्च से दूसरा बीहड़ और 23मार्च 20011से तीसरा मऊ फिल्म उत्सव शुरु हो रहा है। इस मौके पर ‘हू इज तपसी’फिल्म भी रिलीज की जाएगी। पिछले उत्सव कि तर्ज पर सिनेमा जन सरोकारों पर केन्द्रीत पुस्तक श्रृंखला का प्रकाशन हो रहा है। उम्मीद है कि चम्बल घाटी और मऊ का यह आयोजन आप को पसंद आएगा।




मां-बाप पर होगी करवाई, जायेंगे जेल


आयोग बच्चों पर हिंसा रोकने व उन्हें तनाव से दूर करने के लिए बच्चों की सुरक्षा के लिए शीघ्र ही एक कठोर कानून को भी असली जामा पहनाने जा रहा है...


संजीव कुमार वर्मा


 राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग बच्चों पर हो रही हिंसा के मामलों को लेकर बेहद गंभीर है। माता-पिता द्वारा अपने तनाव को बच्चों पर निकालना अब माता-पिता को काफी महंगा पड़ सकता है। बच्चों पर अनावश्यक दबाव बनाने और उन पर हिंसा करने के मामलों को लेकर राष्ट्रीय बाल आयोग बहुत सख्त कदम उठा रहा है।

आयोग बच्चों पर हिंसा रोकने व उन्हें तनाव से दूर करने के लिए बच्चों की सुरक्षा के लिए शीघ्र ही एक कठोर कानून को भी असली जामा पहनाने जा रहा है। इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद यदि घर की चार दीवारी में बच्चों के माता-पिता,अभिभावक केयर टेकर, बच्चों के ऊपर हाथ उठाते हैं तो ऐसी शिकायत मिलने पर संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कठोर कार्रवाई होगी और उसे जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया जायेगा।

पिछले दिनों राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा शांता सिन्हा एक कार्यक्रम में भाग लेने मेरठ में आयी थी। चाइल्ड लाइन संस्था के इस कार्यक्रम में उन्होंने बच्चों की पिटाई और हिंसा पर नाराजगी व्यक्त की। साथ ही माता-पिता और अभिभावकों से भी कहा कि वो अपने जीने का अंदाज बदल लें। अपना तनाव बच्चों पर हिंसा कर न उतारे।

बच्चों की पिटाई करने पर उनके मन मस्तिष्क पर गलत प्रभाव पड़ता है। घरों के अंदर खुद माता-पिता ही बच्चों पर हिंसा कर उनका मन कमजोर करते हैं। बच्चों पर हो रही घरेलू हिंसा पर आयोग दृष्टि केन्द्रीत किये हुए हैं। बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए उन्हें हिंसा मुक्त रखने के लिए शीघ्र ही प्रस्तावित कानून जल्द घोषित कर दिया जायेगा। स्कूलों में बच्चों पर हिंसा के मामले पहले ही कानूनी कार्रवाई की सीमा में आ चुके हैं।

शांता सिन्हा उस दर्द को महसूस कर रही थी,जिसमें बगैर किसी ठोस कारण के अधिकतर माता-पिता घर से बाहर के अपने तनाव को बच्चों की पिटाई कर निकालते हैं। यह सब बहुत गलत तरीके से होते हैं। कई बार कोमल बच्चों का जीवन उनकी राह को ही बदल देता है। इन घटनाओं की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मेरठ में  बाल अधिकार पर बोलतीं शांता सिन्हा
 माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों को हिंसा मुक्त माहौल देने के लिए अपने घर से ही पहल करनी होगी। गुमशुदा बच्चों के जो मामले आते हैं। उनमें 95 प्रतिशत बच्चे तो माता-पिता की हिंसा खीज व तनाव देने के कारण अपना घर छोड़ते हैं। ऐसे बच्चे माता-पिता से डरने लगते हैं और अपने जीवन में घबराहट और असुरक्षा की भावना का अनुभव करते हैं।

इसलिए जिस घर में बच्चे का जन्म हुआ है,वहीं अगर हिंसा की पाठशाला व जुल्म का कारखाना बन जाये तो बच्चे कहां सुरक्षित रह पायेंगे। बच्चों पर हो रही इस तरह की घटना ही बाल अपराध का भी प्रमुख कारण है। घरों में बच्चों के प्रति हिंसा पर विदेशों में कई सख्त कानून है। वहां माता-पिता अभिभावक को जेल जुर्माना या दोनों सजाएं तक भोगनी पड़ जाती है।

 देश में भी इस कानून को लागू करने के लिए विदेशों के बाल अधिकारों से संबंधित बाल कानूनों का अध्ययन किया जा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस कानून के लागू होने के बाद माता-पिता अभिभावक बच्चों पर हिंसा नहीं कर पायेंगे। बच्चों को अपने घर में ही सुरक्षित वातावरण मिलेगा और इससे बच्चों के गुमशुदगी के मामलों में भी कमी आयेगी,क्योंकि अधिकतर बच्चों के घर से जाने के पीछे माता-पिता की हिंसा और घरेलू कारण सामने आते हैं।




(लेखक पत्रकार हैं, उनसे   goldygeeta@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है. )