Mar 20, 2011
Mar 19, 2011
भूमिका में स्त्री
रामजी यादव
मैंने बचपन से देखा है बस यही
उछाह में भर कर गाने लगना
जैसे चलाना हो कुआं खोदने के लिए पहला फावड़ा
और हुलास से भर देना सारे वातावरण को
मैं जब भी ध्यान करता हूं सिहरने लगता हूं
सुध खोकर रोना पूरे राग में
जिंदगी के गद्य को कविता में बदलते हुए
ढेरों-ढेरों कहावतों, मुहावरों और निष्कर्षों से
एकाग्र कर देना सारे सत्य और विगलित यथार्थ को
मेरी मां की यही दो विशेषतायें हैं
मां की भूमिका इन्हीं दो महाबंधों के बीच
चलती रही उम्रभर
थोड़ी सी जिद रही जीने की थोड़ी सी उम्मीद
कि मनाया जायेगा उसे नाराज होने पर
वह उस वर्ग की है जो अपनी भूमिका को ही
मान चुका है अपनी हैसियत
और हैसियत से हिलता नहीं जौ भर
गोबर उठाना, पाथना
उसिन देना भात और बटलोई में दाल चढ़ा देना
चुटकी भर हल्दी और नमक के साथ
मिला देना अपनी ऊब विषण्णता और थकान भी उसमें
न कुछ सूझे तो गाली देना स्त्रियोचित
और हार कर रोने लगना सचमुच
जिसकी तस्दीक सिर्फ आंसू करते हैं
पोछती जाती है जिन्हें बार-बार पल्लू से
जब दुलहिन थी मां
पकाया करती थी ससुराल में जौ की रोटी
खेसारी की दाल
उबालकर दाल रख देती थी दौरी से तोपकर
मैं नहीं हुआ होऊंगा तब तक
दिन बिताया होगा मां ने कोठार, कछरों, घड़ों और गगरियों
से परिचित होने में
और जैसे-जैसे जानती गयी होगी ससुराल में
जौ और खेसारी की उपज
तो कैसे हुई होगी दुखी
और कितना कोसा होगा अपनी किस्मत को?
उन दिनों गेहूं नहीं बोया जाता था हमारे खेतों में
थोड़ा-बहुत बदल लिया जाता था जब कभी मेहमान आते
वे आते ही मेह की तरह बिना बताये
और उसी तेजी से मां बैठ जाती जांत पर बुआ के साथ
फटाक से पीस लेती सेर-दो सेर पिसान
फिर पूरे मन से बनाती उजली-उजली रोटियां
कि देखते ही एक और खाने का मन करे किसी का भी
बताया था उसने एक बार
चुपके से रख ली दो रोटी अलग से
फिर लग गयी रसोई में
पता नहीं किसके आदेश पर कि जो कहता रहा भौंरे की तरह
भन्नाते हुए कि
जे गिहथिन खाती है चुपके से रोटी बिना बताये और
लिये आदेश मालिक से
उसके सात पुरखे हो जाते हैं कुपित
और खंडहर हो जाता है एक दिन उसका घर
रख दिया दोनों रोटियां उस दुलहिन ने वापस कठवत में
और समझती रही पता नहीं कब तक अपराधिनी स्वयं को
कि बचाया जिस स्त्री ने दो रोटियों को
अपनी विराट इच्छाओं की उफनती नदी में बह जाने से
और बचा लिया इस तरह एक परिवान को विपन्न होने से
जो लाखों-लाख स्त्रियां हैं ऐसी ही
और जो बचे हुए हैं परिवार के परिवार
जो गांव के गांव बनते हुए उगाते हुए गेहूं और उम्दा चावल
भेज रहे हैं ‘ाहरों को बड़ी आबादी खटने के लिए
अफसर ने कम्प्यूटर आपरेटर और हम्माल
राजमिस्त्री, अढ़िया ढोते मजदूर, कवि और चैकीदार
अध्यापक और नेता जो चलाते हैं यह राजसत्ता
जो भूल चुकी है श्रम का अर्थ
एकमुश्त सिखाती है चोरी और दमन
और झूठ बोलने के हजारों हजार तरीके
उस स्त्री की भूमिका का क्या है महत्व?
उन स्त्रियों को कैसे देखेंगे आप जो
धज में भले हों अलग लेकिन मन का एक
विराट आकाश है बिना देखा गया?
साहित्य की सभी विधाओं में दखल . देश में चल रहे संघर्षों और संघर्षशील जनों के विमर्श को साहित्य के केंद्र में लाने के पक्षधर. उनसे yadav.exploremedia@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
Mar 18, 2011
ले चलो जनता के बीच कविता
दिल्ली में कविता पाठ की इस श्रृंखला में मजदूरों से लेकर बुद्धिजीवी तक शामिल हो रहे हैं और इसका आयोजन भी सीधे लोगों के बीच जाकर हो रहा है...
जनज्वार. नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच के बैनर तले नागार्जुन-केदार-शमशेर जन्मशती पर कविता यात्रा की शुरूआत यहां दिल्ली से छह फरवरी को हुई। फिलहाल दिल्ली में ही यह कार्यक्रमों के जरिये अपनी निरंतरता बनाये रखेगी फिर दिल्ली से कलकत्ता की ओर यह प्रस्थान करेगी।
इस यात्रा की शुरूआत करते हुए कवियों ने डेढ़-दो सौ श्रमिकों से भरे हुए जमरूदपुर गुरूद्वारा कम्युनिटी हॉल में कविताएं पढ़ी। कविगण थे -शिवमंगल सिद्धांतकर,रंजीत वर्मा, मिथिलेश श्रीवास्तव, कुमार मुकुल और रामजी यादव। इस मौके पर पत्रकार एवं आलोचक अनिल सिन्हा भी उपस्थित थे जिन्होंने आम जीवन में कविता के महत्व को रेखांकित करते हुए संक्षिप्त सा लेकिन सारगर्भित व्याख्यान दिया। मंच का संचालन कर रहे थे कामरेड नरेंन्द्र। इस कविता यात्रा का उद्देश्य कविता में लोगों की भागीदारी को बढ़ाना है ताकि कविता में व्याप्त गुरूबाजी और गुटबाजी खत्म हो सके साथ ही जिनके लिए कविता लिखी जा रही है उस तक वह पहुंच सके।
गोष्ठी की शुरूआत करते हुए कवि रंजीत वर्मा ने कहा कि कविता के भूमंडलीकरण के खिलाफ यह यात्रा है। उन्होंने कहा कि वास्तविक कवि वे होते हैं जो स्थानीय कथ्यों, पात्रों, संबंधों, घटनाओं, स्मृतियों,आकांक्षाओं,सपनों को इस तरह बुनने की कोशिश करते हैं कि वह सबके सपने,सबकी आकांक्षाएं,सबकी स्मृतियां और सभी को अपने जीवन की घटनाएं लगने लगती हैं क्योंकि वैसे कवि के सामने दुनिया के तमाम पीड़ित समुदाय अभिव्यक्ति के लिए आकार ले रहे होते हैं। यहीं विश्व दृष्टि का निर्माण होता है और दुनिया का समस्त वंचित तबका साहित्य में अपना अक्श देखता है और साथ ही ताकत भी पाता है। उसके बाद 13फरवरी को मोरी गेट पर और फिर 21फरवरी को संसद मार्ग पर कविता पाठ का आयोजन हुआ जिनमें नीलाभ,मंगलेश डबराल और मदन कश्यप ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया।
इसके बरक्स कुछ कवि ऐसे होते हैं जो वास्तव में कवि नहीं होते हैं बल्कि वे शब्दों के महज शिल्पकार भर होते हैं। ये अपनी कमी खूब समझते हैं और इसे पाटने के लिए वे भूमंडलीकरण का सहारा लेते हैं। इसके तहत किया यह जाता है कि कई भाषाओं, कई देशों के रचनाकारों को एक मंच पर बुलाया जाता है और करोड़ों खर्च कर माहौल को उत्सवी बनाया जाता है और उसे वैश्विक बनाने की कोशिश की जाती है। वहां पहला उसूल यह होता है कि न किसी को कोई चुनौती दी जाए और न किसी की चुनौती स्वीकार करने की कोशिश की जाए।
जयपुर साहित्य उत्सव सहित साहित्य के जितने भी उत्सव दुनिया भर में आयोजित किये जा रहे हैं चाहे वह गाले का हो या और कहीं का उसका मकसद है मेहनतकश जनता को साहित्य से हमेशा के लिए बाहर कर देना। यूं ही वहां ‘तेरा क्या होगा कालिया’जैसी पंक्तियों के लेखकों या ‘कजरारे कजरारे ’जैसे गीत लिखने वाले गीतकारों को साहित्यकार के रूप में स्थापित करने की कोशिश नहीं की जाती। वैसे इसके पीछे आयोजकों का तर्क यह होता है कि जनता उन्हें ही सुनना चाहती है और वही उन्हें हाथों हाथ लेती है। विश्व-दृष्टि का यहां नितांत अभाव होता है और इस कमी की पूर्ति वैश्विकता के जरिये करने की कोशिश की जाती है।
इसके उलट कविता यात्रा का उद्देश्य कविता को लोगों के बीच एक गंभीर मसले की तरह ले जाना है न कि मनोरंजन की तरह। और इसी रूप में लोग भी इसे ले रहे हैं यह बात तीन जगहों पर कविता पाठ किये जाने के बाद सिद्ध भी होती है। यात्रा में शामिल कवियों ने भी माना कि लोगों ने इसे एक गंभीर कार्यक्रम की तरह लिया। यह बात समझने की है कि हर आदमी का जीवन गंभीर मसलों से भरा होता है जिनमें कविता भी शामिल है।
कबीर और तुलसी को गाने वाली और तमाम लोकगीतों की रचयिता इस मेहनतकश जनता के सहज विवेक पर विश्वास न करना और फिर कविता न समझने का आरोप लगाते हुए उसे कविता से बाहर रखना दरअसल उसके खिलाफ एक गहरी साजिश है जिसे सत्ता और ताकत के चाटुकार रचनाकार महीनी से अंजाम देते रहते हैं। दुख तो तब होता है जब जनपक्षधर रचनाकार भी आश्वस्त भाव से समर्थन में सिर हिलाते नजर आते हैं। यह सारा खेल शास्त्रीयता के आड़ में चलता है। कविता यात्रा को इस छद्म अवधारणा को तोड़ने के एक प्रयास के रूप में देखने की जरूरत है।
यहां पर कुछ सवाल खुद से करने की जरूरत है कि जब कविता उनकी जिंदगी से निकल कर आप तक आ सकती है तो वही कविता तैयार होकर उस तक क्यों नहीं जा सकती?आप कैसे निकाल सकते हैं उन्हें उन कविताओं की दुनिया से जो उनकी ही जिंदगी से निकल कर आयी है आप तक? या इस तरह भी सोचा जा सकता है कि क्या हम जो लिख रहे हैं वह सचमुच उनकी जिंदगी से ताल्लुक रखता है या यह हमारा सिर्फ भ्रम है?
अगर ऐसा है तो फिर क्या फर्क है एक जनपक्षधर रचनाकार और एक कलावादी रचनाकार के बीच? या इस फर्क की अवधारणा ही गलत है?लोग समझते हैं कि उनके लिए लिखने का मतलब नारा लिखना है। क्या यह सोच सही है? क्या उनकी जिंदगी महज एक नारा भर है? क्या आपने उन्हें सिर्फ जुलूसों में या हड़ताल पर बैठे देखा है?क्या ऐसा नहीं लगता कि वह सरकार हो या कोई कार्पोरेट घराना दोनों की लुटेरी निगाहें उनकी संपदा पर ही टिकी हैं?इस वजह से उनकी सामान्य जिंदगी में जो बवंडर बवडंर उठ खड़ा हुआ है क्या उनसे टकराने वाली कविता उन्हें नहीं चाहिए?
इन्हीं चीजों को शिदत्त से महसूस करते हुए कविता यात्रा की तैयारी की जा रही है। फिलहाल यह दिल्ली के ही विभिन्न इलाकों में घूम घूम कर मजदूर इलाकों में कविता पाठ का आयोजन रखा जा रहा है। और जब तैयारी पूरी हो जाएगी तो यह कविता यात्रा दिल्ली से निकल कर कलकत्ता की ओर रवाना होगी। यानी कि देश की इस नई राजधानी से देश की पुरानी राजधानी की ओर।
दिल्ली को राजधानी बने सौ साल हो गए हैं। कलकत्ता पीछे छूट गया है। ठीक उसी तरह जैसे विकास की इस दौड़ में रोज करोड़ों लोग पीछे छूटते जा रहे हैं। उन्हें भारी संख्या में विस्थापन का शिकार होना पड़ रहा है, महंगाई की मार उन्हें ही सबसे ज्यादा झेलनी पड़ रही है, उनकी संस्कृति, उनका रोजगार उनसे छीना जा रहा है और उन्हें अपरिचित संसार में भटकने और बर्बाद होने को हर क्षण जबरन ठेला जा रहा है। कविता यात्रा इन्हीं पीछे छूट गए रास्तों से होकर गुजरेगी ताकि आगे के रास्ते का नक्शा तैयार किया जा सके।
Mar 16, 2011
करोड़ों की मिलें, कौड़ियों के मोल
चीनी मिलें एकाएक बीमारू या कम क्षमता की नहीं हुईं। यह प्रक्रिया 1990 में नयी आर्थिक नीतियों की शुरूआत के बाद से शुरू हुई जब सरकारों ने मिलों की क्षमता बढ़ाने के बजाय निजी मिल मालिकों के लिए पलक बिछाना शुरू किया...
अजय प्रकाश
उत्तर प्रदेश में सरकारी चीनी चीनी मिलों का इतिहास इतनी जल्दी पलटेगा इसका अनुमान किसी को नहीं था। जिन निजी मिल मालिकों की चीनी मिलों को सत्तर और अस्सी के दशक में सरकार ने अधिगृहित कर जान डाली थी,उनकी लॉबी अब इतनी मजबूत हो जायेगी कि सरकार अपनी चीनी मिलों की क्षमता बढ़ाने की बजाय उसे बंद करना राज्य के हित में मानेगी और फिर कौड़ियों के भाव बेचना राज्य की उन्नति, ये अंदाजा भी नहीं था।
वह भी सरकार ऐसा तब करेगी जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मिलों की संपत्ति बेचने पर फैसला न दिया हो। मगर ऐसा हो रहा है और राज्य की मायावती सरकार बंद पड़ी सरकारी चीनी मिलों की पूरी संपत्ति को कौड़ियों के भाव अपने नजदीकियों को बेच रही हैं।
उत्तर प्रदेश स्टेट ‘शूगर कॉरपोरशन लिमिटेड (यूपीएसएससीएल), 'शूगर कॉआपरेटिव मिल और निजी चीनी मिलों को मिलाकर कुल 108 मिलों के साथ यह प्रदेश देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य हुआ करता था। जिसमें 35 चीनी मिलें सरकार की, 28 की और शेष निजी घरानों की थीं। जिसमें अब सरकारी एक भी नहीं बची हैं और कोआपरेटिव को भी सरकार ने बेचने का बिगुल बजा दिया है। अब उत्तर प्रदेश शूगर कॉरपोरेशन कर्मचारी संघ के मात्र 200लोग बचे हैं।
| भटनी चीनी मिल : कौड़ियों के मोल बिकी फोटो- अनिल मिश्र |
कॉरपोरेशन के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ‘अगर सही तहकीकात हो तो प्रदेश की मिलों के बेचने में मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटाला से बड़ा घपला सामने आयेगा। कॉरपोरशन की जिस मिल में 22 करोड़ का सीरा और चीनी थी, उसे मात्र आठ करोड़ में बेच दिया गया, जबकि जमीन, मशीनों और बिल्डिंग की कीमत तो अभी अलग है।’
राज्य विभाजन के बाद उत्तराखंड में जा चुकी किच्छा और देहरादून की मिलों को छोड़ दें तो निगम की हरेक चीनी मिल में हजार से पंद्रह सौ कर्मचारी तो काम करते थे। यानी बेकारी से त्रस्त इस राज्य में सरकार की सिर के बल खड़ी नीतियों ने 33 मिलों के करीब 35 हजार मजदूरों को बेकार कर उनके लाखों आश्रितों को बदहाली में रहने को बाध्य किया।
भटनी और सहारनपुर में किस भाव बिकी मिलें
सहारनपुरचीनी मिल के पास कुल जमीन - 61.84 हेक्टेयरसर्किल रेट के मुताबिक इसका रेट- 486.70 करोड़मशीनों और प्लांट का रेट- 1.27 करोड़बिल्डिंग की कीमत - 2.63 करोड़चीनी और सीरा के स्टॉक की कीमत - 22.53 करोड़कुल अनुमानित कीमत- 513.13 करोड़सरकार द्वारा निर्धारित दर - 70.90 करोड़कंपनियों द्वारा लगायी गयी अधिकतम कीमत- 35.85 करोड़कुल घाटा - 513.13 - 35.85 - 477.20 करोड़
भटनीउत्तर प्रदेश शूगर कॉरपोरेशन लिमिटेड, भटनी यूनिटचीनी मिल के पास कुल जमीन - 13.873 हेक्टेयरसर्किल रेट के मुताबिक जमीन की कीमत - 66 करोड़मशीनों और प्लांट की कीमत - 50 करोड़
बिल्डिंग की कीमत - 1.50 करोड़कुल अनुमानित कीमत - 117.50 करोड़त्रिकाल फुड्स एंड एकता प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने मील की संपत्ति खरीदी- 4.75 करोड़कुल घाटा- 117.50 - 4.75- 112.75 करोड़घाटे का कुल योग- 112.75 करोड़
चीनी मिलें एकाएक बीमारू या कम क्षमता की नहीं हुईं। यह प्रक्रिया 1990 में नयी आर्थिक नीतियों की शुरूआत के बाद से शुरू हुई जब सरकारों ने मिलों की क्षमता बढ़ाने के बजाय निजी मिल मालिकों के लिए पलक बिछाना शुरू किया। नहीं तो 1987-88 तक उत्तर प्रदेश कुल चीनी उत्पादन का करीब 48प्रतिशत पैदा कर देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य और देश में कुल गन्ना उत्पादन क्षेत्र 32.87 लाख हेक्टेयर में से सबसे अधिक 18.07 हेक्टेयर गन्ना बोने वाला राज्य रहा है।
अब उसी राज्य की चीनी मिलों की 20हजार करोड़ की संपत्ति को कौड़ियों के भाव बेचने के लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है। देवरिया,भटनी और बैतालपुर चीनी मिल को मात्र 70करोड़ में बेच दिया गया है। जबकि अकेले भटनी चीनी मिल की संपत्ती लगभग 112 करोड़ की है। भारतीय किसान यूनियन के महासचिव राकेश टिकैत कहते हैं कि ‘निजी कंपनियों को संयंत्र लगाने के लिए बजट देने वाली सरकारें अपने मिलों के लिए बजट देती तो आधुनिक मशीनों के साथ क्या मिलों को बचा नहीं लिया जाता?’
गौरतलब है कि 1988 तक देश की कुल 356 चीनी मिलों में मात्र 109 मिलें निजी घरानों की थीं। लेकिन 1993 में ही प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार बीमारू के नाम पर छह सरकारी चीनी मिलों के बंद करने और बेचने का रास्ता खोज निकाला था। इसमें बुढ़वल और बलरामपुर मिल को सिंह शूगर मिल्स को सरकार ने बेच भी दिया था,जिसे उत्तर प्रदेश कॉरपोरशन कर्मचारी संघ ने अदालत जाकर बचाया था और दोनों कंपनियां फिर कॉरपोरेशन के कब्जे में आयी थीं।
अदालत को संघ ने आगाह कराया था कि सरकार ने बीमारू घोषित करने वाली अद्र्व न्यायिक संस्था डीआइएफआर और बीआइएफआर के इजाजत बगैर ही मिलें बेच दी हैं। इसके बाद मुलायम सरकार राज्य सचिव डीके मित्तल के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय पहुंचती है जिसके बाद अबतक का मामला अदालतों में घिसट रहा है। अगर इस बीच कुछ हुआ तो सिर्फ एक के बाद एक सरकारी चीनी मिलों का बंद होना और कौड़ियों के भाव बिकना।
प्रदेश में चीनी मिलों के इतिहास देखें तो जब निजी चीनी मिल घाटे के नाम पर बंद होने लगीं थीं तो 1971 में नारायण दत्त तिवारी की सरकार ने मजदूरों, किसानों, फसलों और उत्पादन को बचाने के लिए चीनी मिल कॉरपोरशन का गठन कर मिलों का सरकारीकरण शुरू किया। यह प्रक्रिया 1984 तक चली और 25मिलों को सरकार ने कॉरपोरेशन की मिल बनाया। इसी प्रक्रिया में 28मीलों को कोआपरेटिव के तहत संचालित कराया।
मगर धीरे-धीरे सरकारी और कोआपरेटिव चीनी मिलों में राजनीतिक पैठ और नौकरशाही का बोलबाला बढ़ा और जनप्रतिनिधि किसानों-मजदूरों के हितैषी होने के बजाय कमीशनखोरी की नैया पर सवार हो निजी मालिकों के पक्ष में कानून बनाने लगे। उसी का असर है कि चीनी के सर्वाधिक उत्पादन वाले जिला कुशीनगर और देवरिया से संबद्ध प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शिव प्रताप ‘शाही पूरे विधान सभा सत्र में एक दिन भी मील का सवाल नहीं उठा पाते। बची कांग्रेस को उसको अपने महासचिव राहुल गांधी बनाम मायावती से फुर्सत ही नहीं है कि वह मुद्दा बना सके।
अगर 1990 के बाद से देखा जाये तो राज्य में वह सत्ताधारी पार्टी हो या विपक्षी किसी ने राज्य की सरकारी चीनी मिलों को बचाने के लिए कभी संजीदा प्रयास नहीं किया। दूसरा कि इससे सिर्फ कर्मचारी ही नहीं प्रभावित हो रहे थे बल्कि राज्य की जनता इन मिलों के बंद होते जाने से बेकारी के भी नजदीक पहुँच रही थी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई लाखों किसानों के जिवीका का जरिया छिन गया। जरवल चीनी मिल के पूर्व कर्मचारी राकेश बहादुर कनौजिया बताते हैं,‘अभी 6से 10 चीनी मिलों में जितने कर्मचारी निजी कंपनियों में काम करते हैं उतने अकेले किसी एक सरकारी मिल के कर्मचारी थे।’
बावजूद इसके 1999से बीमारू और घाटे के नाम पर बंद पड़ी मिलों के बेचने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसे मायावती सरकार जारी रखे हुए है। प्रगति इतनी भर है कि मौजूदा सरकार बंद मिलों को पोंटि चड्ढा जैसे अपने नजदीकियों को कबाड़ के भाव बेच रही हैं। अगर बेचने में अदालत या जिम्मेदार संस्थाएं अड़चन डाल रही हैं तो मायावती मुकाबले के लिए प्रसिद्ध वकील और अपने सिपहसालार सतीश चंद्र मिश्र को निपटने के लिए तैनात कर देती हैं। वैसे में जनता क्या यह मान ले कि सर्वजन हिताय का यही ढांचा है।
साथ में सेवाकांत शिवेश
द पब्लिक एजेंडा से साभार
बीहड़ फिल्म महोत्सव 17 मार्च से और 23 मार्च से मऊ फिल्म महोत्सव
गांव -गिरांव से उठती सिनेमाई लहर
शाह आलम
अवाम का सिनेमा का सफर जो 2006 में अयोध्या से शुरू हुआ, पहले दौर में कुछ खामियों को दूर करने के बाद,अब धीरे धीरे संस्थाबद्ध हो रहा है। इन पांच वर्षों में हमने बहुत सारे उत्साही दोस्त बनाये हैं. शायद यही वजह है कि अयोध्या फिल्म उत्सव ने प्रदेश में एक सांस्कृतिक लहर पैदा की है.ऐसा इसलिए संभव हो सका है कि यहाँ फिल्मे ही नहीं दिखाई जाती बल्कि कला के विभिन्न माध्यमों के जरिये आमजन के बीच बेहतर संवाद बनाने,उनके दुःख में शामिल होने और अपनी खोई विरासत से रु-ब-रु होने का मौका मिलता है.
बहुत सारे शुभचितकों और मित्रों के कारण ही हम कई पहलकदमियां ले पा रहे हैं, जो हमें लगातार इसे बेहतर और व्यापक बनाने के लिए प्रोत्साहित करते रहें हैं। गावं-गिरांव में फिल्म उत्सव का प्रयोग फिल्म सोसाइटी के गठन के साथ फिल्म निर्माण, प्रदर्शन , वितरण,प्रकाशन, संग्रहालय, डिजिटल डायरी, फेलोशिप, फिल्म निर्माण प्रशिक्षण आदि परियोजनाओं पर गंभीरता से काम हो रहा है, ताकि यह व्यापक दायरे में आकार ले सकें।
हम मानते हैं कि यह आन्दोलन तभी सफल होगा जब लोग खुद सिनेमा का निर्माण करें। जिसमें उनकी अपनी सोच हो। हम सच्चे सार्थक सिनेमा को जन-जन तक पहुंचाना चाहते हैं। जिसके तहत हमसे जुड़े साथियों ने 2006 से कई फिल्मों का निर्माण किया, इसे कई उत्सवों में जारी एवं प्रदर्शित किया गया। अयोध्या ,मऊ, जयपुर , औरैया, इटावा में कई स्थानों पर फिल्म उत्सव करते आ रहे हैं। सबसे जरुरी है कि इसकी निरंतरता बनी रहे.
आप से आग्रह है कि आप भी अपने गांव, शहर, कस्बों में ऐसे आयोजन कर अवाम के साथ खड़े हो। इन आयोजनों कि सार्थकता तभी सही साबित होगी जब लोगो के छोटे छोटे सहयोग से इसे हम अपने उत्सव के तौर पर जगह जगह आयोजित कर पाएंगे। निजी कम्पनियों, सरकारी सहायता या किसी एनजीओ के स्पांसरशिप के बिना छोटे-छोटे स्तर पर सहायता लेकर बनने वाली फिल्मों को एक मॉडल के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई।
अवाम का सिनेमा का यह प्रयास रंग ला रहा है। इससे जुड़े कई युवा अब अपने सीमित संसाधनों और छोटे कैमरों की मदद से गांव-कस्बों की समस्याओं,राजनैतिक उथल-पुथल और बदलावों को दुनिया के सामने पेष कर रहे हैं। अवाम का सिनेमा की इस श्रृंखला ने एक माडल रखा है.कि किस तरह जनता कि हिस्सेदारी और सहयोग से सामाजिक परिवर्तन का आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है।
सत्रह मार्च से दूसरा बीहड़ और 23मार्च 20011से तीसरा मऊ फिल्म उत्सव शुरु हो रहा है। इस मौके पर ‘हू इज तपसी’फिल्म भी रिलीज की जाएगी। पिछले उत्सव कि तर्ज पर सिनेमा जन सरोकारों पर केन्द्रीत पुस्तक श्रृंखला का प्रकाशन हो रहा है। उम्मीद है कि चम्बल घाटी और मऊ का यह आयोजन आप को पसंद आएगा।
मां-बाप पर होगी करवाई, जायेंगे जेल
आयोग बच्चों पर हिंसा रोकने व उन्हें तनाव से दूर करने के लिए बच्चों की सुरक्षा के लिए शीघ्र ही एक कठोर कानून को भी असली जामा पहनाने जा रहा है...
संजीव कुमार वर्मा
राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग बच्चों पर हो रही हिंसा के मामलों को लेकर बेहद गंभीर है। माता-पिता द्वारा अपने तनाव को बच्चों पर निकालना अब माता-पिता को काफी महंगा पड़ सकता है। बच्चों पर अनावश्यक दबाव बनाने और उन पर हिंसा करने के मामलों को लेकर राष्ट्रीय बाल आयोग बहुत सख्त कदम उठा रहा है।
आयोग बच्चों पर हिंसा रोकने व उन्हें तनाव से दूर करने के लिए बच्चों की सुरक्षा के लिए शीघ्र ही एक कठोर कानून को भी असली जामा पहनाने जा रहा है। इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद यदि घर की चार दीवारी में बच्चों के माता-पिता,अभिभावक केयर टेकर, बच्चों के ऊपर हाथ उठाते हैं तो ऐसी शिकायत मिलने पर संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कठोर कार्रवाई होगी और उसे जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया जायेगा।
पिछले दिनों राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा शांता सिन्हा एक कार्यक्रम में भाग लेने मेरठ में आयी थी। चाइल्ड लाइन संस्था के इस कार्यक्रम में उन्होंने बच्चों की पिटाई और हिंसा पर नाराजगी व्यक्त की। साथ ही माता-पिता और अभिभावकों से भी कहा कि वो अपने जीने का अंदाज बदल लें। अपना तनाव बच्चों पर हिंसा कर न उतारे।
बच्चों की पिटाई करने पर उनके मन मस्तिष्क पर गलत प्रभाव पड़ता है। घरों के अंदर खुद माता-पिता ही बच्चों पर हिंसा कर उनका मन कमजोर करते हैं। बच्चों पर हो रही घरेलू हिंसा पर आयोग दृष्टि केन्द्रीत किये हुए हैं। बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए उन्हें हिंसा मुक्त रखने के लिए शीघ्र ही प्रस्तावित कानून जल्द घोषित कर दिया जायेगा। स्कूलों में बच्चों पर हिंसा के मामले पहले ही कानूनी कार्रवाई की सीमा में आ चुके हैं।
शांता सिन्हा उस दर्द को महसूस कर रही थी,जिसमें बगैर किसी ठोस कारण के अधिकतर माता-पिता घर से बाहर के अपने तनाव को बच्चों की पिटाई कर निकालते हैं। यह सब बहुत गलत तरीके से होते हैं। कई बार कोमल बच्चों का जीवन उनकी राह को ही बदल देता है। इन घटनाओं की अनुमति नहीं दी जा सकती।
माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों को हिंसा मुक्त माहौल देने के लिए अपने घर से ही पहल करनी होगी। गुमशुदा बच्चों के जो मामले आते हैं। उनमें 95 प्रतिशत बच्चे तो माता-पिता की हिंसा खीज व तनाव देने के कारण अपना घर छोड़ते हैं। ऐसे बच्चे माता-पिता से डरने लगते हैं और अपने जीवन में घबराहट और असुरक्षा की भावना का अनुभव करते हैं।
| मेरठ में बाल अधिकार पर बोलतीं शांता सिन्हा |
इसलिए जिस घर में बच्चे का जन्म हुआ है,वहीं अगर हिंसा की पाठशाला व जुल्म का कारखाना बन जाये तो बच्चे कहां सुरक्षित रह पायेंगे। बच्चों पर हो रही इस तरह की घटना ही बाल अपराध का भी प्रमुख कारण है। घरों में बच्चों के प्रति हिंसा पर विदेशों में कई सख्त कानून है। वहां माता-पिता अभिभावक को जेल जुर्माना या दोनों सजाएं तक भोगनी पड़ जाती है।
देश में भी इस कानून को लागू करने के लिए विदेशों के बाल अधिकारों से संबंधित बाल कानूनों का अध्ययन किया जा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस कानून के लागू होने के बाद माता-पिता अभिभावक बच्चों पर हिंसा नहीं कर पायेंगे। बच्चों को अपने घर में ही सुरक्षित वातावरण मिलेगा और इससे बच्चों के गुमशुदगी के मामलों में भी कमी आयेगी,क्योंकि अधिकतर बच्चों के घर से जाने के पीछे माता-पिता की हिंसा और घरेलू कारण सामने आते हैं।
Mar 15, 2011
नौकरशाहों को बचाने में जुटा सूचना आयोग
बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन लोक सूचना अधिकारियों एवं प्रथम अपील अधिकारियों का इतना साहस कैसे बढ़ गया कि वे उपलब्ध एवं वांछित सूचना को आवेदकों को उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं...
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में राज्य सूचना आयोग ने एक तरह से अपने हाथ खड़े करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘अब हम इन लोक सूचना अधिकारियों का कुछ नहीं कर सकते.' यह निराशापूर्ण बयान उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना ने बनारस में सूचना अधिकार पर आधारित एक कार्यक्रम में दिया. उन्होंने कहा कि 'उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में हरेक आयुक्त 30 से 100 अपील रोज़ाना सुनता है, लेकिन इसके बावजूद लम्बित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली जा रही है.'
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘राज्य में सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने वाले 90 प्रतिशत लोगों को राज्य सूचना आयोग में अपील दायर करनी पड़ती है, जिससे आयोग का काम लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसा लोगों को इसलिए करना पड़ता है कि जिम्मेदार विभाग के अधिकारी सुचना ही मुहैया नहीं कराते और थककर लोग आयोग में अपील करने को मजबूर होते हैं.
अकेले यह स्थिति उत्तर प्रदेश की नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों और केन्द्रीय सूचना आयोग में भी यही हालात हैं. यहाँ पर प्रतिदिन अपीलों का अम्बार लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन दु:खद बात यह है कि अपीलों के इस बढ़ते अम्बार के लिये सूचना आयोगों के आयुक्त अपील करने वाले आवेदकों को जिम्मेदार ठहराकर असल बात से मीडिया एवं लोगों को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं और अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त होते हुए दिखने का प्रयास कर रहे हैं.
सच्चाई इससे उलट है. बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन लोक सूचना अधिकारियों एवं प्रथम अपील अधिकारियों का इतना साहस कैसे बढ गया कि वे उपलब्ध एवं वांछित सूचना को आवेदकों को उपलब्ध नहीं करवा रहे है, जिसके कारण व्यथित होकर 90प्रतिशत आवेदकों को सूचना आयोग के समक्ष अपील पेश करने को विवश होना पड़ रहा है.
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘राज्य में सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने वाले 90 प्रतिशत लोगों को राज्य सूचना आयोग में अपील दायर करनी पड़ती है, जिससे आयोग का काम लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसा लोगों को इसलिए करना पड़ता है कि जिम्मेदार विभाग के अधिकारी सुचना ही मुहैया नहीं कराते और थककर लोग आयोग में अपील करने को मजबूर होते हैं.
अकेले यह स्थिति उत्तर प्रदेश की नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों और केन्द्रीय सूचना आयोग में भी यही हालात हैं. यहाँ पर प्रतिदिन अपीलों का अम्बार लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन दु:खद बात यह है कि अपीलों के इस बढ़ते अम्बार के लिये सूचना आयोगों के आयुक्त अपील करने वाले आवेदकों को जिम्मेदार ठहराकर असल बात से मीडिया एवं लोगों को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं और अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त होते हुए दिखने का प्रयास कर रहे हैं.
सच्चाई इससे उलट है. बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन लोक सूचना अधिकारियों एवं प्रथम अपील अधिकारियों का इतना साहस कैसे बढ गया कि वे उपलब्ध एवं वांछित सूचना को आवेदकों को उपलब्ध नहीं करवा रहे है, जिसके कारण व्यथित होकर 90प्रतिशत आवेदकों को सूचना आयोग के समक्ष अपील पेश करने को विवश होना पड़ रहा है.
इन सबकी हिम्मत किसने बढ़ाई है?सूचना न देने वाले अधिकारियों और प्रथम अपील अधिकारियों की बदनीयत का पता लग जाने एवं जानबूझकर आवेदकों को उपलब्ध सूचना,उपलब्ध नहीं करवाने का अवैधानिक कृत्य प्रमाणित हो जाने के बाद भी उनके विरुद्ध सूचना आयोगों द्वारा जुर्माना न लगाना या नाम-मात्र का जुर्माना लगाना तथा जुर्माने की तत्काल वसूली को सुनिश्चित नहीं करना, क्या सूचना नहीं देने वाले अफसरों को, स्वयं सूचना आयोग द्वारा प्रोत्साहित करना नहीं है
इसके अलावा अपील पेश करके और अपना किराया-भाड़ा खर्च करके सूचना आयोग के समक्ष उपस्थित होने वाले आवेदकों को स्वयं सूचना आयुक्तों द्वारा सार्वजनिक रूप से डांटना-डपटना क्या सूचना नहीं देने वाली ब्यूरोक्रसी को सूचना नहीं देने को प्रोत्साहित नहीं करता है?सूचना आयोग निर्धारित अधिकतम पच्चीस हजार रुपये के जुर्माने के स्थान पर मात्र दो से पॉंच हजार का जुर्माना अदा करने के आदेश करते हैं और जानबूझकर सूचना नहीं देना प्रमाणित होने के बाद भी सूचना अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही के बारे में सम्बद्ध विभाग को निर्देश नहीं देते हैं.
ऐसे हालात में अगर अपीलों का अम्बार बढ रहा है तो इसके लिये केवल और केवल सूचना आयोग ही जिम्मेदार हैं. उसे सूचना अधिकार कानून का उपयोग करने वाले लोगों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय,स्वयं का आत्मालोचना करना होगा और अपनी वैधानिक जिम्मेदारी का कानून के अनुसार निर्वाह करना होगा. दूसरा सूचना उपलब्ध होने पर भी कोई अधिकारी निर्धारित तीस दिन की अवधि में सूचना नहीं देता है, तो उस पर अधिकतम आर्थिक दण्ड अधिरोपित करने के साथ-साथ ऐसे अफसरों के विरुद्ध तत्काल अनुशासनिक कार्यवाही करके दण्ड की सूचना प्राप्त कराने के लिये भी उनके विभाग को सूचना आयोग द्वारा निर्देशित करना होगा
सूचना आयोग अफसरशाही के प्रति इस प्रकार का रुख अपनाने लगे तो एक साल के अन्दर दूसरी अपीलों में 90 प्रतिशत कमी लायी जा सकती है . साथ ही सूचना का अधिकार कानून के अनुसार सभी सूचनाओं को जनता के लिये सार्वजनिक कर दिया जावे तो सूचना चाहने वालों की संख्या में भी भारी कमी लायी जा सकती है.
(लेखक राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनसे dr.purushottammeena@yahoo.in पर संपर्क किया जा सकता है.)
(लेखक राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनसे dr.purushottammeena@yahoo.in पर संपर्क किया जा सकता है.)
गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल 23 मार्च से
गोरखपुर.प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का सोलहवां और गोरखपुर का छठा फिल्म फेस्टिवल इस बार आधी दुनिया के संघर्षों की शताब्दी और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा की स्मृति को समर्पित होगा. २३ मार्च की शाम को ५ बजे प्रमुख नारीवादी चिन्तक उमा चक्रवर्ती के भाषण से फेस्टिवल की शुरुआत होगी.
![]() |
| चौथे फिल्म फेस्टिवल में पहुंची लेखिका अरुंधती राय |
यह वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष है.इस मौके बहाने इस बार गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों और महिला मुद्दों को ही प्रमुखता दी जा रही है.इसके अलावा जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा सिन्हा स्मृति को भी छठा फेस्टिवल समर्पित है.गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही पहले अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत होगी.पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान फेस्टिवल के दूसरे दिन २४ मार्च को शाम मशहूर भारतीय चित्रकार अशोक भौमिक "चित्तप्रसाद और भारतीय चित्रकला की प्रगतिशीलधारा" पर देंगे.
पांच दिन तक चलने वाले छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में इस बार १६ भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्मों को जगह दी गयी है. इन फिल्मकारों में से इफ़त फातिमा, शाजिया इल्मी, पारोमिता वोहरा और बेला नेगी समारोह में शामिल भी होंगी.छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल को पिछले फेस्टिवल की तरह ही इस बार फिर दो नयी फिल्मों के पहले प्रदर्शन का गौरव हासिल हुआ है. ये फिल्में हैं - नितिन के की "मैं तुम्हारा कवि हूँ "और दिल्ली शहर और एक औरत के रिश्ते की खोज करती समीरा जैन की फिल्म "मेरा अपना शहर".बेला नेगी की चर्चित कथा फिल्म "दायें या बाएं" से फेस्टिवल का समापन होगा.
इस बार के फेस्टिवल के साथ-साथ दूसरी कला विधाओं को भी प्रमुखता दी गयी है. अशोक भौमिक के व्याख्यान के अलावा उदघाटन वाले दिन उमा चक्रवर्ती पोस्टरों के अपने निजी संग्रह के हवाले महिला आन्दोलनों और राजनैतिक इतिहास के पहलुओं को खोलेंगी.मशहूर कवि बल्ली सिंह चीमा और विद्रोही का एकल काव्य पाठ फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण होगा.
पटना और बलिया की सांस्कृतिक मंडलियाँ हिरावल और संकल्प के गीतों का आनंद भी दर्शक ले सकेंगे.महिला शताब्दी वर्ष के खास मौके पर हमारे विशेष अनुरोध पर संकल्प की टीम ने भिखारी ठाकुर के ख्यात नाटक बिदेशिया के गीतों की एक घंटे की प्रस्तुति तैयार की है.बच्चों के सत्र में रविवार के दिन उषा श्रीनिवासन बच्चों को चाँद -तारों की सैर करवाएंगी.
फिल्म फेस्टिवल में ताजा मुद्दों पर बहस शुरू करने के इरादे से इस बार भोजपुरी सिनेमा के ५० साल और समकालीन मीडिया की चुनौती पर बहस के दो सत्र संचालित किये जायेंगे. इन बहसों में देश भर से पत्रकारों के भाग लेने की उम्मीद है.
गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही 2006 में प्रतिरोध का सिनेमाका अभियान शुरू हुआ था.पांच वर्ष फिर से गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने ही इस बार एक महत्वपुर्ण पहलकदमी ली है. यह पहल है देश भर में स्वंतंत्र रूप से काम कर रही फिल्म सोसाइटियों के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन की.फेस्टिवल के दूसरे दिन इन सोसाइटियों का पहल सम्मेलन होगा जिसमे प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के बारे में महत्वपूर्ण विचार विमर्श होगा और के राष्ट्रीय नेटवर्क का निर्माण भी होगा.
इरानी फिल्मकार जफ़र पनाही के संघर्ष को सलाम करते हुए उनकी दो महत्वपूर्ण कथा फिल्मों ऑफ़साइड और द व्हाइट बैलून को फेस्टिवल में शामिल किया गया है.गौरतलब है कि इरान की निरंकुश सरकार ने जफ़र पनाही के राजनैतिक मतभेद के चलते उन्हें ६ साल की कैद और २० साल तक किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगा दी है.
प्रतिरोध का सिनेमा की मूल भावना का सम्मान करते हुए इस बार का फेस्टिवल भी स्पांसरशिप से परे है और पूरी तरह जन सहयोग के आधार पर संचालित किया जा रहा है.आयोजन गोकुल अतिथि भवन,सिविल लाइंस, गोरखपुर में सम्पन्न होगा. आयोजन में शामिल होने के लिए किसी भी तरह के प्रवेश पत्र या औपचारिकता की जरुरत नही है.आप सब सपरिवार सादर आमंत्रित हैं.सलंग्न फ़ाइल में फेस्टिवल का विस्तृत विवरण देखें.
Subscribe to:
Posts (Atom)






