Dec 19, 2010

बलात्कारी सेना, हत्यारी फौज


संभव है यह विडियो देख आप अपने बच्चों की आंखें ढंक लें,परिवार के दूसरे सदस्यों को भी देखने से मनाही करें और खुदा से कहें कि वह आपको इस शोक  से उबरने का साहस दे। शोक और घृणा से भर देने वाला यह विडियो उस श्रीलंकाई सेना की जीत का है जिसकी खुशी में साझीदार हमारी सरकार भी रही है।

यह विडियो लिट्टे विद्रोहियों के 25साल पूराने संघर्ष के खात्मे और 70 वर्ष पूराने इतिहास के छिन्न-भिन्न किये जाने का है जिसकी खुशी हमारे देश के शासकों को भी है। केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने तो बकायदा बयान दिये कि आतंकियों से निपटने में श्रीलंका ने मिसाल कायम की है। गृहमंत्री का यह उत्साही बयान भारतीय संदर्भों में अधिक चिंताजनक है। क्योंकि हमारे देश में भी माओवादी-व्यवस्था परिवर्तन के लिए सरकार के खिलाफ हथियार बंद संघर्ष चला रहे हैं और पूर्वोत्तर और कश्मीर में अलगाववादियों के संघर्ष चरम पर हैं।

लिट्टे विद्रोहियों पर श्रीलंकाई सेना की फैसलाकून जीत की घोषणा के तीन महीने बाद लंदन स्थित चैनल फोर ने यह विडियो प्रसारित किया था। तब श्रीलंका की सरकार ने इसे फर्जी करार दिया था। मगर बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ की जांच  में प्रसारित विडियो का सही पाया गया।



दुबारा यह विडियो पहले के मुकाबले ज्यादा विस्तार से इस वर्ष नवंबर माह में चैनल ने उस समय प्रसारित किया जब श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे लंदन पहुंचे। राजपक्षे लंदन में इस बार व्यक्तिगत कारणों से आये थे। विडियो में साफ सुना जा सकता है कि कैसे मृत नंगी महिलाओं का विडियो बनाते हुए श्रीलंकाई सेना के जवान गालियां दे रहे हैं और उन्हें इसी काबिल बता रहे हैं।

चैनल 4न्यूज के विदेश संवाददाता जोनाथन मिलेर कहते हैं कि ‘हमने पांच मिनट तीस सेकेंड का विडियो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों को भेजा था जिसे देख उन्होंने राय जाहिर किया कि इसकी ‘अंतराष्ट्रीय युद्ध अपराध’के तहत जांच होनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संस्था एमनेस्टी इंटरनेशल के सैम जैरिफी ने कहा कि ‘हमने नये विडियो में कुछ नये तथ्य ये पाये हैं। विडियों में दिखायी दे रही दो महिला कैदियों की स्थिति देख लग रहा है कि उनके साथ यौन अपराध हुआ है।’जबकि इस विडियो को श्रीलंका के उच्चायोग ने फर्जी बताया है और विडियो को पश्चिम के लिट्टे और अलगाववादी समर्थकों की करतूत करार दिया है।

यह विडियो लंबे समय तक यूट्यबू पर भी था। बाद में इसे कश्मीर में सेना की ज्यादतियों को लेकर जारी विडियो के साथ ही वहां से हटा दिया गया। विडियो देख साफ हो जाता है कि श्रीलंकाई सरकार गृहयुद्ध में अपने ही देश के नागरिकों के विद्रोह से कैसे निपटी।

ऐसे में सवाल है कि क्या हमारे देश में भी विद्रोहियों से निपटने का यही तरीका अपनाया जायेगा या अपनाया जा रहा है। क्योंकि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने तमिल विद्राहियों के खिलाफ श्रीलंकाई सरकार और सेना की कार्यवाही की वाहवाही की थी और उसे कार्रवाई का जायज तरीका बताया था।

Dec 17, 2010

और मैं ठगी रह गयी !


करीब तीन घंटे के बाद मेरे नंबर पर घंटी बजी। एक अनजान नंबर देख मेरी उत्सुकता वैसी ही थी जैसी उस अनजान व्यक्ति के दरवाजा खटकाने पर हुई थी...


विभा सचदेवा

जब भी  किसी घर का दरवाजा खुलता है तो दरवाजा खोलने वाले को उत्सुकता होती है कि आखिर कौन है। वही उत्सुकता मुझे भी हुई। दरवाजा खोलते ही मैंने पूछा, ‘कौन, किससे मिलना है?’

जवाब में सामने वाले ने कहा,मैडम मैं आपके दूधवाले का भाई हूं। मैं बताने आया था हमारी मां बहुत बीमार हो गई है और हमलोग मां को आल इंडिया मेडिकल (एम्स)ले जा रहे हैं। उसने मुझसे बताया है चार-पांच दिन नहीं आ पाएगा, तब तक आप कहीं और से दूध ले लेना।

तब मेरे मन में ख्याल आया कि अब थैली वाला दूध पीना पड़ेगा। दूसरे ही पल मेरे मन की भावनाऐं उस बीमार मां के प्रति जाग उठी और वो बोली,‘कोई बात नहीं भईया, हम मैनेज कर लेंगे।’ ये सुनते ही उस आदमी ने कहा ‘मैडम अपना फोन नंबर दे दीजिए,वो आने से पहले आपको बता देगा’। तब मैंने एक पल के लिए सोचा कि नम्बर दूँ की नहीं, फिर   दूसरे ही पल में फोन नंबर दे दिया और वह नंबर लेकर चला गया।

करीब तीन घंटे के बाद मेरे नंबर पर घंटी बजी। एक अनजान नंबर देख मेरी उत्सुकता वैसी ही थी जैसी उस अनजान व्यक्ति के दरवाजा खटकाने पर हुई थी। मेरे फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘मैडम मैं आपका दूध वाला बोल रहा हूं,मेरी मां बहुत बीमार है। प्लीज आप मेरे भाई को कुछ पैसे दे दीजिएगा,बाकी मैं आकर हिसाब कर लूंगा।’ मैंने ठीक है कह, फोन रख दिया। थोड़ी देर बाद वही आदमी आया जो सुबह आया था।

उसे देख मैं बटुआ लेने चली गयी। बटुआ खोलते वक्त मैं दुविधा में रही कि इसको कितने पैसे दूं। एक तरफ दिमाग आ रहा था उतना ही दूं जितने दूध के बनते हैं तो दूसरी तरफ दिल बोल रहा था,‘बेचारे को जरूरत है,इतने से उसका क्या होगा।’ दिल और दिमाग दोनों के इस द्वंद में मैंने अपनी सुनी और 600 रुपये निकालकर दे दिए। बाहर जाकर उसके ये बोलने की देर थी कि पैसा, तो मैंने कहा ये लो भईया। हाथ में नोट लेते हुए उसने कहा ‘मैडम बस इतने से,इतने में तो कुछ नहीं होगा।’

थोडे और दे दीजिए।’ फिर मैंने 500 रुपये और निकाल कर उसे दे दिये। पहले के छह सौ रूपये और अभी दिये 500 रुपये और मिलते ही वह व्यक्ति वहां से छूमंतर हो गया और मैं भी संतुष्टि की भावना के साथ अंदर चली गई। अंदर जाते ही बाहर से किसी के आने की आवाज आई। बाहर की तरफ देखा तो मेरी मां थी। मैंने पूरी बात मां को बताई तो उन्होंने पूछा ‘उसको फोन नंबर कैसे पता चला हमने तो कभी दिया नहीं था।’तब मैंने मां को बताया कि आज ही सुबह मैने ही दिया था। उसके बाद पूरी बात बतायी।

मां चौंकते हुए बोली,‘तुझे कैसे पता वो दूधवाला ही था? तूने पहले कभी उसकी आवाज फोन पर सुनी है।’इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैंने उस नंबर पर फोन मिलाया जिससे उस दूधवाले का फोन आया था। लेकिन जो जवाब मुझे मिला उससे मैं ठगी रह गयी। जिस नंबर से फोन आया था वो मेरी गली के अगली गली में स्थित एसटीडी का नंबर था। जबकि दूधवाला तो शहर से 25 किलोमीटर किसी गांव से आत है।

फोन रखते ही मेरी मां ने पूछा और जवाब सुनने के बाद बोली,‘इतने पढ़े-लिखे होने के बाद भी तेरे में अकल नहीं आई। लड़की के अंदर की अच्छी लड़की जैसे टूट-सी गई थी और बुरी लड़की उसको बार-बार कह रही थी कि देख लिया मेरी बात न मानने का नतीजा। फिर भी उस लड़की ने अपने मन को तसल्ली दी और वो यही दुआ करती रही कि,‘हे भगवान कल दूधवाला न आये और मेरा शक  झूठा साबित हो।

सुबह रोज की तरह आज भी दरवाजा खटकने की आवाज आयी। मैं झट से उठकर बाहर की तरफ भागी तो देखती हूं सामने कि दूधवाला खड़ा है। तभी मेरी मां भी बाहर आ गयी और बोलने लगी ‘और करो अच्छाई। ये कलयुग है रामयुग नहीं, किसी दिन इस अच्छाई के चक्कर मे घर मत लूटवा देना।

इतना बोल मां ने दूधवाले के सामने बर्तन रख दिया। दूधवाला भी मां के गुस्से को ताड़ गया और पूछा,‘अरे क्यों डांट रहीं हैं बीटिया को।’उसके पूछते ही मां षुरू हो गयीं। पूरा किस्सा सुनते ही वह जोर-जोर से हंसने लगा। उसके बाद दूधवाले ने ठगी के ऐसे इतने मामले बताये कि मुझे एकबारगी लगने लगा कि भले लोगों की जगह समाज में बहुत कम रह गयी है। हालांकि मन में द्वंद भी था कि अगर मैंने इसे मान्यता बना ली तो वह बहुतेरे लोग जिन्हें कभी मदद की जरूरत होगी वे भी वंचित रह जायेंगे. 


  •      पुणे स्थित इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ ब्रोडकास्टिंग एंड जर्नलिज्म से इसी वर्ष पत्रकारिता  कर लेखन की शुरुआत. सामाजिक विषयों  और फ़िल्मी  लेखन  में रूची.उनसे sachdeva.vibha@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Dec 16, 2010

सपा और कांग्रेस की शांति में 'पीस पार्टी ' का दखल

मुसलमानों के पक्ष में उलेमा काउंसिल बनी, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी(नेलोपा) ने लड़ाई लड़ी और अब भविष्य की उम्मीदें लेकर पीस पार्टी उभरी है। मुसलमानों को लगता है कि इन तीनों पार्टियों के नेतृत्वकर्ता मुस्लिम है,इसलिए वह समुदाय को संदिग्ध बनाने की कोशिश के खिलाफ मैदान में उतरेंगे।

अजय प्रकाश की रिपोर्ट

बाटला हाउस कांड के बाद उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में राजनीतिक नेतृत्व की चाहत पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर ढंग से उभर कर आयी है। यह चाहत उत्तर प्रदेश में उन दलों के लिये चुनौती साबित होने जा रही है जो अपने को धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अलंबरदार कहते रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से मुसलमानों का भरोसा उठने के तर्कसंगत कारण हैं और अब उनके बीच यह साफ हो चुका है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जवाब एक नया मुस्लिम ध्रुवीकरण ही है।

मुस्लिम समुदाय ने प्रदेश के दो विधानसभा सीटों के लिए हाल ही में हुए उपचुनावों में पीस पार्टी को मुकाबले में खड़ाकर और कांग्रेस को लड़ाई से बाहर कर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। वहीं दोनों सीटों डुमरियागंज और लखीमपुरपर जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी भी इस नये राजनीतिक उभार से सकते में है और आरोप लगा रही है कि पीस पार्टी को गोरखपुर के मठाधीश और सांसद आदित्यनाथ से शह मिल रही है।

मुस्लिम समुदाय की इस तरह की चाहत के कारण पहले भी उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में ऐसी कई पार्टियों या संगठनों का उदय होता रहा है जो मुसलमानों का हिमायती होने की कोशिश में लगे रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में पंजीकृत कुल एक हजार पार्टियों में मुसलमानों की हिमायती करीब 35हैं। केवल उत्तर प्रदेश में पीपुल्स डेमोके्रटिक फ्रंट,   पीस पार्टी ऑफ  इंडिया, मजलिस ए मशवरत, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, भारतीय परचम पार्टी,इंसान दोस्त पार्टी सक्रिय हैं।

मगर दोबारा से इस अहसास को मुकम्मिल जमीन बाटला हाउस कांड ने दी। कारण कि अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पहला मौका था जब उत्तर प्रदेश (खासकर पूर्वी)के मुसलमानों को लगा कि उन्हें नागरिक नहीं मुसलमान समझा जाता है।

आजमगढ़ के युवाओं को जब दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी होने के आरोप में जामिया इलाके के बाटला हाउस में मार गिराया और गिरफ्तार किया था तो मुस्लिमों की नुमांईदगी का दावा करने वाली सपा और कांग्रेस ने खुफिया एजेंसियों के दावों के करीब खड़ा होना मुनासिब समझा। यहां तक कि पार्टियों के स्थानीय और छोटे नेताओं ने आजमगढ़ और आसपास के जिलों से पार्टी समर्थक मुसलमानों से बातचीत बंद कर दी और दिल्ली में बैठे बड़े नेता किंतु-परंतु में बयान देते रहे और फायदा आखिरकार खुफिया एजेंसियों और पुलिस को ही होता रहा।

दिल्ली में 13 सितंबर को हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में शामिल रहने के संदेह में 19 सितंबर 2008 को बाटला हाउस में मारे गये साजिद और आतिफ,और उसके बाद एक टीवी चैनल के बाहर से गिरफ्तार आरोपी सैफ की वजह से पूरे आजमगढ़ की तस्वीर तकरीबन आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर उभरने लगी।

राजधानी दिल्ली में इस घटना के बाद मुसलमानों को खासकर आजमगढ़ से ताल्लुक रखने वालों को हर स्तर पर सामाजिक बहिष्कार और लानत-मलानत झेलनी पड़ी। दिल्ली में रहकर पढ़ाई और नौकरी कर रहे ज्यादातर युवा अपने घर भाग गये,या गुमनाम होने को मजबूर हुए। प्राइमरी स्कूल के शिक्षक परवेज अहमद बताते हैं कि ‘इस पूरे घटनाक्रम ने धर्मनिरपेक्ष और न्याय की आस रखनेवालों को संदेह भर दिया और मुस्लिमों ने मजबूरी में ही सही मुस्लिम नेतृत्व को फिर गले लगाया।’

आजमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता मसीउद्दीन के मुताबिक,‘भारत के जिन नागरिकों के परिजन देश की उन्नती और विकास में सदियों से लगे रहे उन्हें इन आरोपों ने जब संदिग्ध बना दिया तो उनकी अंतिम उम्मीद उन जनप्रतिनिधियों पर टिकी जो उनसे वोट लेते हैं। मगर वह भी ताल ठोककर खुफिया एजेंसियों के गलत तौर-तरीकों के खिलाफ मैदान में नहीं उतरे। यहां तक कि सैफ की गिरफ्तारी के बाद जब यह उजागर हुआ कि उसके पिता समाजवादी पार्टी के नेता हैं तो तत्काल प्रभाव से सपा ने इससे इनकार कर दिया था।’

'जनप्रतिनिधियों का नार्को टेस्ट हो'
राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अयूब  



पीस पार्टी की कई वैकल्पिक मांगों में से एक ‘नार्को टेस्ट’भी है। पीस पार्टी का मानना है-धार्मिक ग्रंथों  पर हाथ रख नेता झूठी कसमें-वादे करते हैं। इसलिए सभी पार्टियों के अध्यक्षों का नार्को जांच हो कि उनके पार्टी चलाने का मकसद देशहित है या माफियाहित।



ऐसे समय में मुसलमानों के पक्ष में उलेमा काउंसिल बनी,नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी(नेलोपा)ने लड़ाई लड़ी और भविष्य की उम्मीदें लेकर पीस पार्टी उभरी। आजमगढ़ के संजरपुर गांव के तारिक कहते हैं,‘मुसलमानों को लगता है कि इन तीनों पार्टियों के नेतृत्वकर्ता मुस्लिम है,इसलिए वह समुदाय को संदिग्ध बनाने की कोशिश के खिलाफ मैदान में उतरेंगे।’

आज यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम प्रतिनिधित्व वाली इन तीनों पार्टियों को राजनीतिक विश्लेषक इसे एक नयी बयार के रूप में देख रहे हैं। हालांकि इन पार्टियों की एक दूसरी ऐतिहासिक सच्चाई कुछ ही दिन मैदान में बने रहने की भी है, जिसका फायदा अंततः दूसरी बड़ी चुनावी पार्टियों को ही होता रहा है।

बाटला हाउस के बाद एक मात्र भरोसेमंद बनी उलेमा काउंसिल के निर्माण के दो साल भी नहीं बीते कि वह खंडित हो गयी और काउंसिल के प्रमुख सदस्य डॉक्टर जावेद अलग हो चुके हैं। आजमगढ़ से  पत्रकार अंबरीश राय कहते हैं,-काउंसिल मुसलमानों का कितना भला कर सकेगी इसका अंदाजा संसदीय चुनाव में आजमगढ़ से भाजपा की जीत से लगाया जा सकता है। जो भाजपा यहां से कभी नहीं जीती थी वह मुस्लिम विरोधी होते हुए भी यहां से पहली बार जीती और सपा हार गयी।’उलेमा काउंसिल के महासचिव असद हयात कहते हैं,‘सपा की हार का कारण काउंसिल नहीं बल्कि सपा का जातिवादी और मुसलमानों को ठगने का इतिहास रहा है।’

उलेमा काउंसिल ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की पांच सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये थे जिनमें लालगंज और आजमगढ़ सीट पर सपा को हारने का कारण बनी। वहीं पीस पार्टी ने पिछले लोकसभा में कुल इक्कीस प्रत्याशी खड़े किये थे और उसे इन क्षेत्रों में चार फीसदी मतदाताओं ने वोट दिये। जाहिर तौर पर ये दोनों पार्टियां सर्वाधिक नुकसान सपा का करने वाली हैं।

 इसलिए इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। पर इस नजरिये से नेलोपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरसद खान ऐतराज रखते हैं। उनकी राय में ‘मुस्लिमों और समाज के कमजोर तबके को सभी पार्टियाँ  ठगती रहीं हैं,इसलिए मुस्लिम नेतृत्व का खालिस मतलब यह न निकाला जाये कि हम सिर्फ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करेंगे।’

आगामी चुनावों में मुस्लिम नेतृत्व की मांग करने वाली इन पार्टियों का प्रदर्शन कैसा होगा,यह तो अभी परखा जाना है। मगर इतना तो साफ है कि पीस पार्टी की बढ़ती ताकत के मद्देनजर बसपा,कांग्रेस और इनसे भी बढ़कर सपा पेरशान है कि प्रदेश में वह अपने को मुसलमानों की हितैषी मानती है।

(पाक्षिक पत्रिका द पब्लिक  एजेंडा से साभार व संपादित)

Dec 14, 2010

कागजों पर पौष्टिक भोजन



कमजोर आदमी ने न्यायालय की अवमानना की होती तो जेल जाना पड़ता,लेकिन सरकार जब ऐसी लापरवाही दिखाती है तो उच्चतम अदालत विवश हो तल्ख टिप्पणियों से अपनी खीझ निकालती है।


संजय स्वदेश


देश की जनता को भुखमरी और कुपोषण से बचाने के लिए सरकार नौ तरह की योजनाएं चला रही है,पर बहुसंख्यक गरीबों को इन योजनाओं के बारे में पता नहीं है। गरीब ही क्यों पढ़े-लिखों को भी पता नहीं होगा कि पांच मंत्रालयों पर देश की भुखमरी और कुपोषण से लड़ने की अलग-अलग जिम्मेदारी है।

इसके लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके जो भी परिणाम आ रहे हैं, वे संतोषजनक नहीं हैं। जिस सरकार की एजेंसियां इन योजनाओं को चला रही हैं, उसी सरकार की अन्य एजेसियां इसे धत्ता साबित करती हैं। निजी एजेंसियां तो हमेशा से ऐसा करती रही हैं।

पिछले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ कि देश के करीब 46प्रतिशत नौनिहाल कुपोषण की चपेट में हैं। 49प्रतिशत माताएं खून की कमी से जूझ रही हैं। इसके अलावा अन्य कई एजेंसियों के सर्वेक्षणों से आए आंकड़ों ने यह साबित किया कि सरकार देश की जनता को भुखमरी और नौनिहालों को कुपोषण से बचाने के लिए जो प्रयास कर रही है, वह नाकाफी हैं।

इसका मतलब कि सरकार पूरी तरह असफल है। समझ में नहीं आता आखिर सरकार की पांच मंत्रालयों की नौ योजनाएं कहां चल रही हैं। मीडिया की तमाम खबरों के बाद भी विभिन्न योजनाएं भुखमरी और कुपोषण का मुकाबला करने के बजाय मुंह की खा रही हैं।

वर्ष 2001में उच्चतम न्यायालय ने भूख और कुपोषण से लड़ाई के लिए 60दिशा-निर्देश दिये थे। इन दिशा-निर्देशों को जारी किये हुए एक दशक पूरा  होने वाला  है, पर सब धरे के धरे रह गये। सरकार न्यायालय के दिशा-निर्देशों का पालन करने में नाकाम रही है। कमजोर आदमी ने न्यायालय की अवमानना की होती तो जेल जाना पड़ता,लेकिन सरकार जब ऐसी लापरवाही दिखाती है तो उच्चतम अदालत विवश होकर तल्ख टिप्पणियों से अपनी खीझ निकालती है।

यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि सड़ते अनाज पर उच्चतम न्यायालय  की तीखी  टिप्पणी के बाद भी सरकार बेसुध है। जनता तो बेसुध है ही। नहीं तो सड़ते अनाज पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी एक राष्ट्रव्यापी जनांदोलन   को उकसाने के लिए पर्याप्त थी।

गोदामों में हजारों  क्विंटल अनाज सड़ने की खबर फिर आ रही है। भूख से बेसुध रियाया को सरकार पर भरोसा भी नहीं है। इस रियाया ने कई आंदोलन और विरोध की गति देखी है। उसे मालूम है कि आंदोलित होने तक उसके पेट में सड़ा अनाज भी नहीं मिलने वाला।

कुछ दिन पहले एक मामले में महिला बाल कल्याण विकास मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय से कहा था कि देश में करीब 59प्रतिशत बच्चे 11लाख आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से पोषाहार प्राप्त कर रहे हैं। जबकि मंत्रालय की ही एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के करीब अस्सी प्रतिशत हिस्सों के नौनिहालों को आंगनबाड़ी केंद्रों का लाभ मिल रहा है,महज 20प्रतिशत बच्चे ही इस सुविधा से वंचित है।

सरकारी और अन्य एजेंसियों के आंकड़ों के खेल में ऐसे अंतर भी सामान्य हो चुके हैं। सर्वे के आंकड़े हमेशा यथार्थ के धरातल पर झूठे साबित हो रहे हैं। मध्यप्रदेश के एक सर्वे में यह बात सामने आई कि एक वर्ष में 130 दिन बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराया जा रहा है, वहीं बिहार और असम में 180 दिन पोषाहार उपलब्ध कराने की बात कही गई। उड़ीसा में एक वर्ष में 240 और 242 दिन पोषाहार उपलब्ध कराने का दावा किया गया,जबकि सरकार वर्ष में आवश्यक रूप से 300दिन पोषाहार उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताती है।

हकीकत यह है कि पोषाहार की योजना में नियमित चीजों की आपूर्ति ही नहीं होती है। किसी जिले में कर्मचारियों की कमी की बात कही जाती है, तो कहीं पोषाहार के लिए कच्ची वस्तुओं की आपूर्ति नहीं होने की बात कहकर  जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया जाता है।

जब पोषाहार की सामग्री आती है तो नौनिहालों में वितरण कर इतिश्री कर लिया जाता है। सप्ताह भर के पोषाहार की आपूर्ति एक दिन में नहीं की जा सकती है। नियमित संतुलित भोजन से ही नौनिहाल शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनेंगे। पढ़ाई में मन लगेगा।

असम, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के दूर-दराज के क्षेत्रों में कुपोषण और भुखमरी से होने वाली मौतों की खबर तो कई बार मीडिया में आ ही नहीं पाती। जो खबरें आ रही हैं उसे पढ़ते-देखते संवेदनशील मन भी सहज हो चुका है। ऐसी ख़बरें अब इतनी सामान्य हो गई हैं कि बस मन में चंद पल के लिए टिस जरूर उठती है।

मुंह से सरकार के विरोध में दो-चार भले बुरे शब्द निकलते हैं,फिर सबकुछ सामान्य हो जाता है। सब भूल जाते हैं। कहां-क्यों हो रहा है, कोई मतलब नहीं रहता। यह और भी गंभीर चिंता की बात है। फिलहाल सरकारी आंकड़ों के बीच एक हकीकत यह भी है कि आंगनवाड़ी केंद्रों से मिलने वाला भोजन कागजों पर ही ज्यादा पौष्टिक  होता है। जिनके मन में तनिक भी संवदेनशीलता है, उन्हें हकीकत जानकर यह चिंता होती है कि सूखी रोटी, पतली दाल खाकर गुदड़ी के लालों का कल कैसा होगा?


शहर में सफ़र


आपकी धर्मपत्नी की आवाज आती है और वो आपको घर के कामों में रुचि न दिखाने के लिए कोसती है कि आपने  टूटे हुए नल को ठीक कराने के लिए प्लम्बर को नहीं बुलाया। ये अलग बात है कि प्लम्बर सिर्फ सुबह 10से शाम 6बजे तक ही मौजूद होता है और उस समय आप ऑफिस में होते हैं...

हैनसन टीके

हम सभी  रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ ऐसी घटनाओं का अनुभव करते हैं,जिससें कभी  बेइज्जत तो कभी खुद को कुंठित महसूस करते है। इसके पीछे कोई आम कारण भले ही न हो,पर हर दिन ऐसी घटनाओं का सामना करना ही पड़ता है। ऐसी घटनाएं यात्रा करते समय,घर पर,रेस्तरां में खाना खाते समय,पान या शराब की दुकान पर,यहां तक कि आप टेलीफोन की लाइन या कहीं और कभी भी घट सकती हैं।

दिल्ली में रहने वालों के लिए ऐसा होना स्वाभाविक है। यहां पर मैं साधारण जनता की बात कर रहा हूं,क्योंकि उच्चवर्ग के जीने के तौर-तरीके और रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। आप जब सुबह-सुबह एक अच्छी नींद से उठते हैं तो चाहते हैं कि बाकी का दिन भी इसी सपने की तरह अच्छा हो।

इतने में रसोई से आपकी धर्मपत्नी की आवाज आती है और वो आपको घर के कामों में रुचि न दिखाने के लिए कोसती है,क्योंकि आपने रसोई के टूटे हुए नल को ठीक कराने के लिए प्लम्बर को नहीं बुलाया। ये अलग बात है कि प्लम्बर सिर्फ सुबह 10से शाम 6बजे तक ही मौजूद होता है और उस समय आप ऑफिस में होते हैं। फिर भी आपको सुनना पड़ता है,क्योंकि घर के मुखिया और पुरुष होने के नाते यह आपका कर्तव्य है।

बीबी का यह विचित्र बर्ताव टूटे हुए नल से शुरू होता है,लेकिन कहां जाकर खत्म होगा ये किसी को नहीं पता। ये तो सिर्फ शुरुआत है। तभी  अचानक आपकी पत्नी टूटे हुए नल से लेकर उस दिन के लिए आपको कोसना शुरू कर देती है जब आप शराब पीकर घर आये थे। चाहे उस शराब ने आपको पियक्कड़ न बनाया हो,फिर भी शराब की वजह से आपकी पत्नी की नाक पूरे समाज के सामने नीची जरूर हो जाती है,ऐसा उसका सोचना होता है।

 कभी-कभी तो वह ये तक कह देती है कि आपने मुझे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा और उसकी आंखों में भरे आंसू आपको यह अहसास दिलाते हैं कि आपसे शादी करने से पहले वह कितनी खुश थी। उस समय इतना गुस्सा आता है कि उस पर जोर से चिल्लायें, लेकिन आप ऐसा कुछ नहीं करते क्योंकि आप जानते हैं कि चुप रहने में ही भलाई है। इसलिए अंदर ही अंदर किलसते रहते हैं और यहां से कुंठा का दौर शुरू होता है।

अगले ही पल जब आप देरी की वजह से नजदीकी मेट्रो स्टेशन तक जाने के लिए ऑटो रिक्शा लेने के बारे में सोचते हैं तो कोई भी ऑटो वाला रुकने को तैयार ही नहीं होता। फिर अचानक से एक ऑटो आकर रुकता है तो आपको लगता है कि जल्दी से बैठ जाऊं,लेकिन फिर याद आता है कि दिल्ली में ऑटो में लगे मीटर तो केवल नाम के हैं। इसके बाद शुरू होती है किराए के लिए बहस। ऑटो चालक तो दोगुना किराया मांगता है,लेकिन आप उसके साथ बहस करके बीच का कोई रास्ता निकाल लेते है,क्योंकि देर हो रही होती है। इसके अलावा आपके पास कोई और रास्ता नहीं होता।

ऑटो-रिक्शे में बैठते ही लगता है कि चलो अब ऑफिस समय पर पहुंच जाऊंगा। मैट्रो स्टेशन ऑटो में बैठे-बैठे दिख रहा है,मगर उसी पल ऑटो वाला ऑटो को गैस भरवाने के लिए दूसरी तरफ मोड़ लेता है। तब मन तो करता है कि उसे दो-चार गाली दे दें, लेकिन आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आप एक सज्जन इंसान है और गाली-गलौच करना आपको शोभा  नहीं देता। इस समय आपके अंदर एक आग फूट रही होती है,जिसे चाहकर भी आप बाहर नहीं निकाल सकते और इसे चुपचाप पी जाते हैं।

घटनाओं का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। मैट्रो में अनाउंसमैंट के बाद ट्रेन आती है और आप दरवाजे के बीच में जाकर खड़े हो जाते है,लेकिन जैसे ही दरवाजा खुलता है बाहर से अंदर आने वालों की भीड़ आपको अंदर की तरफ धकेल देती है। जब आप उनको धकेलने की कोशिश करते है तो आपको उनकी तरफ से अभद्र शब्द सुनाई देते हैं, लेकिन आप उस समय कुछ नहीं कर सकते क्योंकि दिल्ली में यह सब चीजें आम हैं।

ऑफिस की तरफ पैदल जाते हुए अचानक से एक कार सामने आकर आपका रास्ता रोक देती है और आपको दूसरा रास्ता लेने को मजबूर करती है। तब आपको लगता है कि क्या ये थोड़ा आगे या पीछे गाड़ी नहीं रोक सकता था। फिर दूसरे ही पल याद आता है कि वह क्यों रोकेगा,वह तो लाखों की गाड़ी में सफर कर रहा है,मेरी दो पहिए वाली गाड़ी उसको दिखाई थोड़े ही देगी। इस बात पर आपको गुस्सा आना लाजिमी है। मगर आपके लिए अच्छा होगा कि आप गाड़ी में बैठे व्यक्ति के साथ किसी तरह की कोई बहस न करें,क्योंकि ऐसा करना आपके लिए भैंस  के आगे बीन बजाने जैसा होगा।

सुबह-सुबह ऑफिस पहुंच लोगों की शुभकामनाएं लेकर और गरम चाय का प्याला पीकर आप अपने केबिन में बैठकर शांति महसूस करते हैं। आपको लगता है कि यही एकमात्र जगह है जहां कोई आपको परेशान नहीं करेगा, लेकिन फिर समय आता है स्टॉफ मीटिंग का। मीटिंग में आपका बॉस आपको उस गलती के लिए सबके सामने डांटता है जो आपने की ही नहीं है। आपको एकबारगी लगता है कि यह सब छोड़कर भाग जाऊं। फिर भी आप सुनते हुए खुद को समझाने लगते हैं कि बॉस तो बॉस होता है, उसमें गलती-सही नहीं होता।

तभी आपको लगता है मेरा फोन काफी समय से बज रहा है। आप फोन उठाते हैं और दूसरी तरफ से आवाज आती है ‘आप कौन बोल रहे हैं?’ आपको लगता है कि सारा गुस्सा इस पर ही निकाल दूं, लेकिन फिर आप सोचते हैं कि यह कोई नयी बात थोड़ी है। दिल्ली में रहकर ऐसी घटनाओं का सामना करना तो आम बात है। इससे बेहतर यह है कि आप खुद ही अपना नाम बताकर पूछ लें कि मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं।

मैं जानता हूं कि जो भी बातें मैंने ऊपर लिखी है उसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सारी घटनाएं आपके साथ हर रोज घटती हैं,लेकिन अगर आप हर दिन होनी वाली इन छोटी-छोटी बातों को दिन के खत्म होने पर याद करेंगे तो ये बाते आपको बहुत हास्यास्पद और मजेदार लगेंगी, जो आपको एक अलग-सा एहसास देंगी।
(अंग्रेजी से अनुवाद - विभा सचदेवा)


लेखक सीपीएम के सदस्य हैं और सामाजिक-राजनितिक मसलों पर लिखते हैं,उनसे hanskris@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है.


Dec 13, 2010

एसटीएफ़ के फरेब से उठेगा पर्दा



जनज्वार ब्यूरो. मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल)ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से प्रदेश की जेलों में बंद तारिक कासमी और खालिद की गिरफ्तारी की जांच के लिए बने आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल  प्रभाव से सार्वजनिक करने की मांग की।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी,फ़ैजाबाद और लखनऊ कचहरी में २७नवम्बर २००७को हुए छह  श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के आरोपी तरीक कासमी और खालिद अंसारी की गिरफ़्तारी के तीन साल से अधिक का समय गुजार चुका है .  संगठन के प्रदेश संगठन मंत्री मसीहुद्दीन संजरी,तारिक शफीक और विनोद यादव ने कहा कि कासमी और खालिद पर जो आतंकवादी होने का  आरोप लगा है वह झूठा है. मगर धमाकों बंद ये दोनों  बेगुनाह इसलिए जेलों से बाहर नहीं हो पा रहे हैं कि आरडी निमेश कमिटी की जाँच रिपोर्ट सार्वजानिक नहीं हुई है.

तारिक कासमी: बाराबंकी जेल में बंद

पीयुसीएल  के सदस्यों के मुताबिक यूपी एसटीएफ को जाँच के बहाने जो विशेष अधिकार दिए गए हैं वो अपने अधिकारों का उल्लंघन कर रही है. एसटीएफ़ जहां राष्ट् के आम नागरिकों को गैर कानूनी तरीके से फंसा  रही है तो वहीं गैरकानूनी तरीके से खतरनाक विस्फोटक और असलहे राष्ट् विरोधी तत्वों से प्राप्त कर रही है।

पीयूसीएल के मसीहुद्दीन संजरी, तारिक शफीक, विनोद यादव, अंशु माला सिंह, अब्दुल्ला एडवोकेट, जीतेंद्र हरि पांडे, आफताब, राजेन्द्र यादव,तबरेज अहमद ने मायावती सरकार से मांग की कि आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल लायी जाय।

संगठन ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजे ज्ञापन में कहा कि हम आपको याद दिलाना चाहेंगे कि आजगढ़ के तारिक कासमी का 12 दिसंबर 2007 को रानी की सराय चेक पोस्ट पर कुछ असलहाधारियों ने अपहरण कर लिया, जिस पर स्थानीय स्तर पर तमाम राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों ने धरने प्रदर्शन किए और जनपद की स्थानीय पुलिस ने तारिक को खोजने के लिए एक पुलिस टीम का गठन भी किया।

 वहीं खालिद को जिला जौनपुर के   बाजार मड़ियांहूं से 16 दिसंबर 2007 की शाम चाट की दुकान से कुछ असलहाधारी टाटा सूमों सवार उठा ले गए थे, जिसके मड़ियाहूं बाजार में दर्जनों गवाह हैं। जिस पर भी काफी धरने-प्रदर्शन हुए और मांग की गई कि जल्द से जल्द उसको खोजा जाय। और इसी के बाद 22 दिसंबर 2007 को यूपी एसटीएफ ने दावा किया कि उसने यूपी के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी कचहरी बम धमाकों के आरोपी तारिक कासमी और खालिद को उसने सुबह बाराबंकी रेलवे स्टेशन से भारी मात्रा में विस्फोटक पदार्थों और असलहों  के साथ गिरफ्तार किया।

यूपी एसटीएफ के इस दावे के बाद मानवाधिकार संगठनों के लोगों का यह दावा पुख्ता हो गया कि इन दोनों को यूपी एसटीएफ ने गैर कानूनी तरीके से उठा कर अपने पास गैर कानूनी तरीके से पहले से रखे विस्फोटक पदार्थों को दिखा कर गिरफ्तार किया। जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इस घटना की जांच के लिए आरडी निमेष जांच आयोग का गठन किया गया. आयोग को  छह महीने के भीतर अपनी जांच प्रस्तुत करनी थी।

मगर गिरफ्तारी के  तीन साल बीत जाने के बाद भी जांच आयोग की निष्क्रियता के चलते रिपोर्ट नहीं पेश की गई जो मानवाधिकार हनन का गंभीर मसला है। जबकि जांच आयोग को मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक दलों तक ने अपने पास उपलब्ध जानकारियां दी। मड़ियाहूं से गिरफ्तार खालिद की गिरफ्तारी के विषय में स्थानीय मड़ियाहूं कोतवाली तक ने सूचना अधिकार के तहत यह जानकारी दी कि खालिद को 16 दिसंबर 2007 को मड़ियाहूं से गिरफ्तार किया गया था। जो यूपी एसटीएफ के उस दावे की कि उसने उसको बाराबंकी से विस्फोटक के साथ गिरफ्तार किया था, के दावे को खारिज करता है।

ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल राष्ट् की सुरक्षा के लिए भी है  कि यूपी एसटीएफ के पास कहां से इतनी भारी मात्रा में अवैध विस्फोटक और असलहे आए। साथ ही  आरडी निमेष जाँच आयोग की रिपोर्ट आते ही असल गुनहगारों पर शिकंजा  कसेगा और बाराबंकी की जेल में बंद बेगुनाहों को न्याय मिलेगा.

वैश्विक पत्रकारिता का नया दौर


विकीलिक्स के खुलासों ने दुनिया भर में  जिस तरह से खलबली मचाई  है,वह इस बात का सबूत है कि इसके असर से मुख्यधारा और उससे इतर वैकल्पिक पत्रकारिता के स्वरुप,चरित्र और कलेवर में आ रहे परिवर्तनों का कितना जबरदस्त प्रभाव पड़ने लगा है.


आनंद प्रधान


विकीलिक्स ने मुख्यधारा की पत्रकारिता को निर्णायक रूप से बदलने की जमीन तैयार कर दी है.हम-आप आज तक पत्रकारिता को जिस रूप में जानते-समझते रहे हैं,विकीलिक्स के बाद यह तय है कि वह उसी रूप में नहीं रह जायेगी.

अभी तक हमारा परिचय और साबका मुख्यधारा की जिस कारपोरेट पत्रकारिता से रहा है,वह अपने मूल चरित्र में राष्ट्रीय,बड़ी पूंजी और विज्ञापन आधारित और वैचारिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान के व्यापक हितों के भीतर काम करती रही है लेकिन विकीलिक्स ने इस सीमित दायरे को जबरदस्त झटका दिया है.यह कहना तो थोड़ी जल्दबाजी होगी कि यह प्रतिष्ठानी पत्रकारिता पूरी तरह से बदल या खत्म हो जायेगी लेकिन इतना तय है कि विकीलिक्स के खुलासों के बाद इस पत्रकारिता पर बदलने का दबाव जरूर बढ़ जायेगा.

असल में,विकीलिक्स के खुलासों ने दुनिया भर में खासकर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में जिस तरह से खलबली मचाई हुई है,वह इस बात का सबूत है कि विकीलिक्स के असर से मुख्यधारा और उससे इतर वैकल्पिक पत्रकारिता के स्वरुप,चरित्र और कलेवर में आ रहे परिवर्तनों का कितना जबरदस्त प्रभाव पड़ने लगा है.


इसमें कोई दो राय नहीं है कि विकीलिक्स की पत्रकारिता शुरूआती और सतही तौर पर चाहे जितनी भी ‘अराजक’,‘खतरनाक’और ‘राष्ट्रहित’को दांव पर लगानेवाली दिखती हो लेकिन गहराई से देखें तो उसने पहली बार राष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के संकीर्ण और काफी हद तक अलोकतांत्रिक दायरे को जोरदार झटका दिया है.

इस अर्थ में,यह सच्चे मायनों में २१ वीं सदी और भूमंडलीकरण के दौर की वास्तविक वैश्विक पत्रकारिता है.यह पत्रकारिता राष्ट्र और उसके संकीर्ण बंधनों से बाहर निकलने का दु:साहस करती हुई दिखाई दे रही है,भले ही उसके कारण देश और उसकी सरकार को शर्मिंदा होना पड़ रहा है.

सच पूछिए तो अभी तक विकीलिक्स ने जिस तरह के खुलासे किए हैं, उस तरह के खुलासे आमतौर पर मुख्यधारा के राष्ट्रीय समाचार मीडिया में बहुत कम लगभग अपवाद की तरह दिखते थे.लेकिन विकीलिक्स ने उस मानसिक-वैचारिक संकोच,हिचक और दबाव को तोड़ दिया है जो अक्सर संपादकों को ‘राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा’के नाम पर इस तरह की खबरों को छापने और प्रसारित करने से रोक दिया करता था.

दरअसल,राष्ट्र के दायरे में बंधी पत्रकारिता पर यह दबाव हमेशा बना रहता है कि ऐसी कोई भी जानकारी या सूचना जो कथित तौर पर ‘राष्ट्रहित’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के अनुकूल नहीं है, उसे छापा या दिखाया न जाए. इस मामले में सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि आमतौर पर ‘राष्ट्रहित’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की परिभाषा सत्ता प्रतिष्ठान और शासक वर्ग तय करता रहा है. वही तय करता रहा है कि क्या ‘राष्ट्रहित’ में है और किससे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ को खतरा है?

सरकारें और कारपोरेट मीडिया भले ही लोकतंत्र,अभिव्यक्ति की आज़ादी,पारदर्शिता,जवाबदेही,सूचना के अधिकार,मानव अधिकारों जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते न थकते हों लेकिन सच्चाई यही है कि शासक वर्ग और सत्ता प्रतिष्ठान आम नागरिकों से जहां तक संभव हो,कभी ‘राष्ट्रहित’और कभी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर सूचनाएं छुपाने की कोशिश करते रहे हैं.

इसकी वजह किसी से छुपी नहीं है.कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि नागरिकों को वे सूचनाएं मिलें जो उनके वैध-अवैध कारनामों और कार्रवाइयों की पोल खोले.सच यह है कि सरकारें ‘राष्ट्रीय हित और सुरक्षा’के नाम पर बहुत कुछ ऐसा करती हैं जो वास्तव में,शासक वर्गों यानी बड़ी कंपनियों, राजनीतिक वर्गों, ताकतवर लोगों और हितों के हित और सुरक्षा में होती हैं.

असल में,शासक वर्ग एक एक आज्ञाकारी प्रजा तैयार करने के लिए हमेशा से सूचनाओं को नियंत्रित करते रहे हैं. वे सूचनाओं को दबाने, छुपाने, तोड़ने-मरोड़ने से लेकर उनकी अनुकूल व्याख्या के जरिये ऐसा जनमत तैयार करते रहे हैं जिससे उनके फैसलों और नीतियों की जनता में स्वीकार्यता बनी रहे.मुख्यधारा का मीडिया भी शासक वर्गों के इस वैचारिक प्रोजेक्ट में शामिल रहा है.

लेकिन विकीलिक्स ने सूचनाओं के मैनेजमेंट की इस आम सहमति को छिन्न-भिन्न कर दिया है.इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वह किसी एक देश और उसकी राष्ट्रीयता से नहीं बंधा है.वह सही मायनों में वैश्विक या ग्लोबल है.यही कारण है कि वह राष्ट्र के दायरे से बाहर जाकर उन लाखों अमेरिकी केबल्स को सामने लाने में सफल रहा है जिसमें सिर्फ अमेरिका ही नहीं,अनेक राष्ट्रों की वास्तविकता सामने आ सकी है.

राष्ट्रों के संकीर्ण दायरे को तोड़ने में विकीलिक्स की सफलता का अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि जूलियन असान्जे ने केबल्स को लीक करने से पहले उसे एक साथ अमेरिका,ब्रिटेन,फ़्रांस और जर्मनी के चार बड़े अख़बारों को मुहैया कराया और उन अख़बारों ने उसे छापा भी.

यह इन अख़बारों की मजबूरी थी क्योंकि अगर वे उसे नहीं छापते तो कोई और छापता और दूसरे, उन तथ्यों को सामने आना ही था, उस स्थिति में उन अख़बारों की साख खतरे में पड़ जाती. यह इस नए मीडिया की ताकत भी है कि वह तमाम आलोचनाओं के बावजूद मुख्यधारा के समाचार मीडिया का भी एजेंडा तय करने लगा है.


 मामूली बात नहीं है कि विकीलिक्स से नाराजगी के बावजूद मुख्यधारा के अधिकांश समाचार माध्यमों ने उसकी खबरों को जगह दी है.यह समाचार मीडिया के मौजूदा कारपोरेट माडल की जगह आम लोगों के सहयोग और समर्थन पर आधारित विकीलिक्स जैसे नए और वैकल्पिक माध्यमों की बढ़ती ताकत और स्वीकार्यता की भी स्वीकृति है.

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि पिछले डेढ़-दो दशकों से मुख्यधारा की कारपोरेट पत्रकारिता के संकट की बहुत चर्चा होती रही है.लेकिन यह संकट उनके गिरते सर्कुलेशन और राजस्व से ज्यादा उनकी गिरती साख और विश्वसनीयता से पैदा हुआ है.


विकीलिक्स जैसे उपक्रमों का सामने आना इस तथ्य का सबूत है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता ने खुद को सत्ता प्रतिष्ठान के साथ इस हद तक ‘नत्थी’(एम्बेडेड)कर लिया है कि वहां इराक और अफगानिस्तान जैसे बड़े मामलों के सच को सामने लाने की गुंजाईश लगभग खत्म हो गई है.

ऐसे में,बड़ी पूंजी की जकडबंदी से स्वतंत्र और लोगों के समर्थन पर खड़े विकीलिक्स जैसे उपक्रमों ने नई उम्मीद जगा दी है.निश्चय ही,विकीलिक्स से लोगों में सच जानने की भूख और बढ़ गई है.इसका दबाव मुख्यधारा के समाचार माध्यमों को भी महसूस हो रहा है.जाहिर है कि विकीलिक्स के बाद पत्रकारिता वही नहीं रह जायेगी/नहीं रह जानी चाहिए.


('राष्ट्रीय सहारा' से  साभार  )

हर गांव में तीन एनजीओ


पहाड़ में की बढ़ती तादात यहां के सामाजिक एवं आर्थिक बनावट को नुकसान पहुंचाने वाली है। एनजीओ विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से एनजीओ जो काल्पनिक खतरे पैदा करते हैं,उनके समाधान के लिए बड़ा बजट भी प्राप्त करते हैं।

 
राजेंद्र पंत 'रमाकांत'

उत्तराखण्ड में पर्यावरण,जल,जंगल और जमीन के संरक्षण एवं संवर्धन के नाम पर बड़ी संख्या में स्वयंसेवी संगठनों की घुसपैठ बढ़ रही है। सरकार की निर्भरता लगातार इस संगठनों पर बढ़ती जा रही है। अधिकतर काम सरकार एनजीओ से करा रही है।

इससे जहां सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने का काम करती है,वहीं ऐसे संगठनों को फलने-फूलने का मौका भी मिल रहा है। अब स्थिति यह है कि पूरे राज्य में जितने गांव हैं,उसके तिगुने एनजीओ हैं। एक अनुमान के अनुसार राज्य के प्रत्येक गांव में औसतन तीन संगठन काम कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में राज्य बनने से पहले इन संगठनों की घुसपैठ शुरू हो गयी थी। पर्यावरण संरक्षण,पानी के संवर्धन से लेकर जन कल्याणकारी परियोजनाओं तक उनके जुडऩे की लंबी फेहरिस्त रही है। धीरे-धीरे वे यहां के विकास की अगुवाई के सबसे बड़े पुरोधा बन गये।


इस समय राज्य में पचास हजार के करीब स्वंयसेवी संगठन कार्य कर रहे हैं। उन्हें देश-विदेश की वित्तीय संस्थाओं के अलावा सरकार भी काम देती है। इस समय राज्य एनजीओ के लिए सबसे मुनाफा देने वाली जगह साबित हो रही है। यहां किसी उद्योग या उत्पादन का नहीं, बल्कि समाजसेवा से एनजीओ लाभ कमा रहे हैं।


राज्य में स्वयंसेवी संस्थाओं के आंकड़ों में देखें तो इस समय तेरह जिलों में कुल 49954संस्थाएं जनसेवा में लगी हैं। यह आंकड़ा बहुत दिलचस्प है कि राज्य में कुल गांवों की संख्या 17हजार के आसपास है। अर्थात प्रत्येक गांव में तीन एनजीओ कार्यरत हैं। सरकारी संरक्षण में फलते-फूलते एनजीओ अब पहाड़ की दशा-दिशा तय करने लगे हैं।


एक तरह से एनजीओ एक नई इंडस्ट्री के रूप में स्थापित हो गये हैं। इस समय पहाड़ में मौजूद हजारों एनजीओ उन सारे कामों में हस्तक्षेप कर रहे हैं जो सरकार ने अपने विभागों के माध्यम से कराने थे। पर्यावरण, महिला कल्याण, शिक्षा, पौधारोपण, स्वास्थ्य, एड्स, टीवी और कैंसर के प्रति जागरूकता पैदा करने से लेकर यहां की सांस्कृतिक विरासत को बचाने तक का ठेका इन्हीं संगठनों के हाथों में है।



एनजीओ की जिलेवार संख्या

देहरादून 8249
हरिद्वार 4350
टिहरी 5483
पौड़ी 5292
रुद्रप्रयाग 1357
चमोली 2885
उत्तरकाशी 3218
उधमसिंहनगर 4654
पिथौरागढ़ 3203
बागेश्वर 940
अल्मोड़ा 4166
चम्पावत 806
नैनीताल 5351


कुल योग 49954


यही कारण है कि पहाड़ की मूल समस्याओं से ध्यान हटाकर विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से नये और काल्पनिक खतरों से बचने के लिए फंडिंग एजेंसियों और सरकार से बड़े बजट पर हाथ साफ किया जाता है। असल में सरकारी तंत्र की नाकामी और कार्य संस्कृति ने इस तरह की समाजसेवा की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाया है।

जहां सरकार के पास जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए भारी-भरकम विभाग और ढांचागत व्यवस्था है,वहीं इन कामों को करने के लिए सरकार स्वयंसेवी संगठनों की मदद लेती है। दुनिया के विकसित देशों ने तीसरी दुनिया के देशों में घुसपैठ बनाने के लिए एक रास्ता निकाला।

इनमें अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए वह एक जनपक्षीय मुखौटा भी ओढ़ते हैं। विश्व बैंक और अन्य बड़ी फंडिंग एजेंसियों के माध्यम से आने वाले पैसे को उसी तरह खर्च किया जाता है, जैसा वह चाहते हैं। यही कारण है कि जिन कामों को सरकार ने करना था, वे अब इन संगठनों के हाथों में हैं।


पहाड़ में एनजीओ की बढ़ती तादात यहां के सामाजिक एवं आर्थिक बनावट को नुकसान पहुंचाने वाली है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से एनजीओ जो काल्पनिक खतरे पैदा करते हैं, उनके समाधान के लिए बड़ा बजट भी प्राप्त करते हैं।

नब्बे के दशक में अल्मोड़ा में कार्यरत ‘सहयोग’संस्था ने जिस तरह पहाड़ के सामाजिक ताने-बाने को एक साजिश के तहत तोडऩे की रिपोर्ट तैयार की थी, उसका भारी विरोध हुआ था। कमोबेश आज भी यही स्थित है। अब एड्स जागरूकता के नाम पर यदा-कदा जमीनी सच्चाई से दूर रिपोर्ट तैयार कर उसके खिलाफ जागरूकता लाने के नाम पर भारी फर्जीवाड़ा हो रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पहाड़ में जिन मामलों को लेकर ये संगठन काम करते रहे हैं, उन्हें पिछले पच्चीस-तीस सालों में ज्यादा नुकसान हुआ है। यहां की आंदोलन की धार को कुंद करने का काम भी ये कर रहे है।


यदि पहाड़ में स्वयंसेवी संगठन यहां की तस्वीर बदल रहे होते तो एक गांव में औसतन तीन से ज्यादा एनजीओ इस प्रदेश को स्वावलंबी ही नहीं,बल्कि दुनिया के बेहतर देशों में शुमार कर सकते थे। सरकार और एनजीओ का यह गठजोड़ कहां जाकर समाप्त होगा, यह आने वाला समय बतायेगा, लेकिन लगातार बढ़ते इन संगठनों पर समय रहते लगाम लगाने की जरूरत है।


(पाक्षिक पत्रिका जनपक्ष आजकल से साभार)