Apr 24, 2010

ठगी का सामाजिक अभियान


अजय प्रकाश

बुनियादी सुविधाओं से महरूम जनता की समस्याओं को किस तरह बेचा जा रहा है, इसे देखने और झेलने का मौका मुझे हाल ही में मिला. यह मौका इंफोसिस के पूर्व सह अध्यक्ष और अब यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुखिया नंदन नीलेकणी की पत्नी रोहिणी नीलेकणी के एनजीओ आरघ्यम की दिल्ली स्थित उपशाखा इंडिया वाटर पोर्टल की ओर से पंजाब के भटिण्डा में दो दिवसीय कार्यशाला में मिला.


इंडिया वाटर पोर्टल मुख्य रूप से पानी पर सूचनाओं के प्रसारण का काम करती है.साथ ही वह पानी पर काम करने वाले एनजीओ की दानदाता एजेंसी भी है.पोर्टल की हिंदी वेबसाइट की संचालक मीनाक्षी अरोड़ा और सिराज केसर की तरफ से 26 मार्च को पत्रकारों के लिए एक लिखित निमंत्रण आया. निमंत्रण पंजाब के मालवा क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें बताया गया था कि पानी में यूरेनियम की अधिकता से सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है. अंत में बताया गया था कि 29 मार्च को दिल्ली से एक गाड़ी जायेगी जिसमें इच्छुक पत्रकार सवार हो सकते हैं.

29 तारीख को मैं भी उस गाड़ी में सवार हो गया. गाड़ी में किसी और पत्रकार को न देख मुझे आश्चर्य हुआ. पूछने पर मेजबानों ने बाजारू पत्रकारिता का हवाला देकर मुझे सामाजिक पत्रकारिता का वीर पुरुष करार दिया. अफसोस भी जताया कि हमने तो मेल कई हजार लोगों को भेजे थे, उनमें आपके अलावा सिर्फ एक और पत्रकार मणिमाला साथ जा रही हैं.मणिमाला से परिचय के बाद जब हमलोग चाय के लिए रूके तो उन्होंने एनजीओ के अनुभवों को साझा किया कि,एक नहीं सभी अपने बजट का 85 फीसदी हिस्सा बड़े पदाधिकारियों के खर्चे और तामझाम में लगा देते हैं.

भटिंडा का सर्किट हाउस : ठगा सा महसूस करते लोग
भटिंडा में पहले दिन का सत्र शुरु होने के बाद भी दूसरे किसी भागीदार पत्रकार को न देख हमें संदेह हुआ. पूछने पर कि हमलोग इलाके में कब चलेंगे, सिराज केसर ने बताया कि पहली पारी की बैठक खत्म हो जाये तो हम सभी क्षेत्र में चलेंगे. एक घंटा फूलों के लेन-देन और स्वागत में लगाने के बाद गुरुनानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से आये भौतिकी के प्रोफेसर डॉक्टर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम पर 20 साल पहले का एक अध्ययन पेश किया. डेढ़ घंटे के भाषण में वे एक दफा भी नहीं बता पाये कि यूरेनियम की वजह से कोई रोग हो रहा है.

इस पर सवाल उठा तो दिल्ली और भटिंडा के आयोजक हमें यह समझानें में लग गये कि यह जबाव भौतिकी के प्रोफेसर का बनता ही नहीं है. तो जवाब कौन देगा, इस पर आयोजकों ने चुप्पी साध ली. हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?
हमने प्रोफेसर सुरिंदर सिंह से पूछना उचित समझा कि बीस साल पहले किये गये अध्ययन को आज पेश कर आप क्या बताना चाहते हैं.जिन प्रोफेसर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम में पानी पर डेढ़ का लंबा भाषण दिया था, उन बेचारे ने डेढ़ मिनट में जो कुछ बताया वह इस प्रकार से है- मालवा क्षेत्र के कुछ इलाकों में पानी में यूरेनियम ज्यादा है जिसका 90 प्रतिशत स्रोत प्राकृतिक है. रही बात बीस साल पहले के अध्ययन को पेश करने की तो यहां इन्होंने बुलाया था, इसलिए हमने पेश किया. इसकी वजह से कोई बीमारी होती है या किन रोगों की संभावना होती है,ऐसा कोई अध्ययन मैंने क्या, किसी ने नहीं किया है.

दिल्ली से गये दानदाताओं ने बताया कि इस फर्जी जानकारी के सूत्रधार तो स्थानीय संयोजक एनजीओ ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह और उनके सहयोगी शिक्षक चंद्रप्रकाश हैं. हिंदी वाटर पोर्टल के सिराज के मुताबिक,"खेती विरासत ने ही पानी में अधिक यूरेनियम होने की वजह से क्षेत्र में सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है, की जानकारी मुहैया करायी थी." लेकिन हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?
प्रो. राजकुमार : सब कहा, बस इतना नहीं बता पाए कि आर्सेनिक से दक्षिण- पश्चिम पंजाब में केंसर  है.

इसमसले पर बहस में जाने केबजाय अब हम फिर क्षेत्र में जाने के कार्यक्रम पर आगये. लेकिन ‘खेतीविरासत’ के संयोजक सुरिंर सिंह पीड़ितोंसे मिलाने ले जाने को अनसुना करते रहे.काफी जद्दोजहद के बाद वह दूसरे दिन सुबह आठ बजे हमें पीड़ितों से मिलाने को तैयार हुए.

दूसरे दिन वे पहुंचे तो सही, मगर नये बहानों के साथ. बहाना था कि साथ जाने वाला कोई नहीं है और आपलोग पंजाबी जानते नहीं हैं, इसलिए वहां बात कैसे कर पायेंगे. यह सब होते-हवाते दिन के ग्यारह बज गये, जबकि हमें वहां लौटकर तीन बजे दिल्ली के लिए रवाना भी होना था. मौके की नजाकत और आयोजकों का टालू रवैया देख पत्रकार मणिमाला ने क्षेत्र में जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और कहा कि मुझे यहां किताबों का वितरण करना है, सो मैं नहीं जा पाउंगी.

अब मैं जाने वालों में अकेला बचा था. इनकी ठगी पर जितना कोफ्त हो रहा था, उससे कहीं ज्यादा अपनी समझदारी पर कि गर मैंने दिल्ली में मित्रों से राय ले ली होती तो एनजीओ के भरोसे रिपोर्टिंग के मुगालते से बच गये रहते. इस अफसोस के साथ थोड़ी खुशी भी थी. खुशी इसलिए कि पहली दफा की ही मुफ्तखोरी ने अहसास करा दिया था कि देशी-विदेशी दानदाताओं की पेटियों से झरझराते सिक्के हमारे जैसे पत्रकारों के लिए नहीं हैं. तभी ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह ने कहा कि भटिंडा जिले की तलवंडी साबो तहसील में कई ऐसे गांव हैं, जहां पानी में आर्सेनिक की अधिकता की वजह से केंसर और अन्य घातक रोग हो रहे हैं.

यानी अब मामला यूरेनियम से खिसकर आर्सेनिक पर आ गया था. बात को जायज ठहराने के लिए खेती विरासत से जुड़े चंद्र प्रकाश ने कुछ नामचीन अखबारों, रेडियो और टीवी चैनलों का हवाला भी दिया कि वह इस मसले पर कई बड़ी खबरें कर चुके हैं.अपनी तीन दिन की छुट्टी और उर्जा को किसी तरह बचा लेने की अंतिम कोशिश करते हुए मैंने उनके आर्सेनिक वाले प्रस्ताव को स्वीकार लिया. मैंने आयोजकों से कहा कि कुछ गांवो के नाम और दो-चार संपर्क बता दें, जिससे सुविधा हो.

बड़ी मुश्किल से सुरिंदर ने मलकाना गांव के एक सज्जन का नंबर दिया, जिनका भूरा सिंह नाम था. इस गांव के बारे में स्थानीय आयोजकों ने मुझे बताया गया कि यहां न सिर्फ सेरीब्रल पैल्सी बल्कि केंसर, नपुंसकता, दस पंद्रह की उम्र के बाद एकाएक न्यूरो तंत्र का शरीर से नियंत्रण खत्म हो जाने वाला रोग और गर्भपात के रोगियों की एक बड़ी संख्या है.भटिंडा से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर जब इस गांव में पहुंचे तो भूरा सिंह गुरूद्वारे के पास हमारा इंतजार कर रहे थे.
उनके साथ चार-पांच और लोग खड़े थे.भूरा सिंह ने बताया कि यह सभी लोग किसी की तेरही में खाने आये हैं. बातचीत में पता चला कि गांव में सात हजार आबादी और बत्तीस सौ वोट हैं. पीने के पानी की समस्या पर लोगों ने बताया कि अब गांव में सरकार की मदद से पंचायत ने आरओ (पानी शुद्ध करने का यंत्र) लगा दिया है.

पानी में आर्सेनिक की अधिकता की वजह से केंसर के बारे में गांव वालों ने इनकार किया. इनकार तो उस कार्यक्रम में आये गुरूनानक देव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजकुमार ने भी किया था. श्रोताओं ने जब यह पूछा कि क्या कोई ऐसा अध्ययन है जो बताता है कि पानी में आर्सेनिक की बढ़ी मात्रा की वजह से केंसर हो रहा है तो प्रोफेसर राजकुमार ने हाथ खड़े कर लिये. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पानी में आर्सेनिक के मुख्यतः स्रोत प्राकृतिक हैं.’ तब वहां सवाल भी उठा था कि फिर इस आयोजन का मकसद क्या है और प्रोफेसर साहब चुप हो गये थे.दरअसल प्रोफेसर लगातार यह समझा रहे थे कि जहां पानी में आर्सेनिक अधिक है, वहां केंसर रोगी ज्यादा हैं. मगर जो नक्शा दिखाकर जानकारियां दे रहे थे, वह उनके रिसर्च का हिस्सा नहीं बल्कि पंजाब के एक अंग्रेजी दैनिक का उतरन था.

बहरहाल हम यह सब झेलकर उस जगह पर आ गये थे,जिस गांव के एक डॉक्टर ने बताया कि "चंडीगढ़ पीजीआई की टीम आई थी जिसने कहा कि पानी में आर्सेनिक नहीं बल्कि क्लोरोमिअम ज्यादा है, जिसका कारण भारी मात्रा में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक हैं." बताते चलें कि मालवा क्षेत्र का भटिंडा जिला पंजाब में इस्तेमाल किये जाने वाले कुल कीटनाशकों का एक बड़ा उपभोक्ता है.

फिर पानी में आर्सेनिक की वजह से मलकाना गांव में लोग केंसर पीड़ित हैं,को लेकर हंगामा क्यों है.गांव के नौजवान और क्लब सदस्य रणधीर सिंह ने बताया कि ‘क्षेत्र के किसी गांव में चले जाइये, आमतौर पर 40 से 50 प्रतिशत लोग नशाखोरी की जद से त्रस्त मिल जायेंगे. वहीं कीटनाशकों के इस्तेमाल से पानी की गड़बड़ी की शिकायत आम है.वैसे में एनजीओ वाले आर्सेनिक पर जोर ज्यादा इसलिए देते हैं कि इसमें खतरे कम हैं.अगर नशाखोरी के खिलाफ लड़ना है तो पहली लड़ाई माफियाओं से है. पेस्टीसाइड के खिलाफ लड़ेंगे तो सरकार, कंपनी और माफिया तीनों से भिड़ना है. इन सबसे से उपर यह है कि इन लड़ाईयों और जागरूकता के संसाधन जनता से जुटाने हैं, जबकि एनजीओ उन्हीं पूंजीपति घरानों के दान से चलते हैं जो पहले हमारे पानी को जहरीला करते हैं, फिर हमें आरओ सिस्टम बेच जाते हैं.’

मलकाना गाँव : केंसर रोगी हैं पर आर्सेनिक के नहीं
ग्रामीण गुरूतेज सिंह एक दूसरा मामला भी उजागर करते हैं- ‘मलकाना समेत कई गांवों के बारे में मीडिया और एनजीओ ने मिलकर केंसर का एक ऐसा हौवा खड़ा किया कि अब हमारे गांवों में कोई शादी नहीं करना चाहता.’

ग्राम सदस्य ज्ञानी जगदेव सिंह गांव के उन युवाओं में से एक हैं जिनकी शादी इसी हौवे की वजह से नहीं हो रही है. जगदेव सिंह ने धार्मिक पढ़ाई की है और वे धर्म का वास्ता देते हुए कहते हैं कि "नशाखोरी का चलन इतना ज्यादा है कि आमतौर पर चालीस की उम्र पार करते कोई न कोई रोग नशेड़ियों को हो ही जाता है.ईलाज की कोई व्यवस्था न होने के कारण रोग जब अपने चरम पर होता है और रोगी अंतिम समय में. कुछ अस्पताल आते-जाते मरते हैं तो कुछ पहुंचने से पहले ही. वैसे में जो मरा वही केंसर रोगी हो गया.अभी तो बकायदा भटिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम ही मीडिया ने ‘केंसर ट्रेन’ रख दिया है."

अब हम गांव से लौट रहे थे, जहां किसी एक ने भी नहीं कहा था कि आर्सेनिक की वजह से कैंसर हो रहा है.लेकिन इंडिया वाटर पोर्टल और आरघ्यम को 'खेती विरासत'की आंखों से पानी में आर्सेनिक और यूरेनियम की वजह से केंसर और सेरीब्रल पैल्सी रोग होता क्यों दिख रहा था,यह समझना मुश्किल था. इस सवाल पर दिल्ली रवाना होने से पहले आयोजकों के ही एक सहयोगी ने बताया कि पैसे आने के माध्यम से एनजीओ में समस्याएं और सामाजिक संकट तय होते हैं.
 http://www.raviwar.com/ से साभार


Apr 17, 2010

जहां गुंडे भी विधायक हैं


अजय प्रकाश

‘चाचा हमार विधायक हउवें ना घबराइब हो, ए डब्बल चोटी वाली तहके टांग ले जाइब हो’- भारतीय राजनीति को जनता किस रूप में समझती है,भोजपुरी भाषी क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय यह गीत इसकी एक बानगी भर है। 

राजनीति में अपराध के बढ़े शेयर का न तो इससे बेहतर विश्लेषण हो सकता है और न ही इससे बड़ा तिरस्कार। अभी हालत यह है कि देश के सबसे बड़ी आबादी और विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश के 40प्रतिशत से अधिक विधायक अपराधी हैं। जिनमें से ज्यादातर हत्या,बलात्कार, गैंगवार, फिरौती, राहजनी, उठाईगीर जैसे कई अपराधों में नामजद, सजायाफ्ता, नहीं तो भगोड़ा घोषित हैं।

कोलसला विधायक अजय राय :  गुंडा एक्ट के तहत गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस
                                                                                                 फोटो- वाराणसी व्यू ब्लॉग  
ऐसे जनप्रतिनिधि जनता की भलाई कितना करते हैं, वह तो आंकड़ों में फंसकर फाइलों में दफ्न हो जाता है मगर इनकी गुंडई का असर लोगों में दिन-रात रहता है। सिर्फ मार्च महीने में प्रदेश के 6विधायकों श्रीपति आजाद,दीप नारायण सिंह, सुल्तान बेग, विजय कुमार मिश्रा, अजय राय और यशपाल रावत पर हत्या, हत्या का प्रयास, वाहन चोरी गैंग और अपहरण के मुकदमें दर्ज हुए हैं। समाजवादी पार्टी के महाराजगंज सदर के विधायक श्रीपती आजाद ने रामपुर बुजुर्ग गांव की एक विधवा महिला सावित्री देवी को सिर्फ इसलिए जला दिया कि वह अब उन्हें पसंद नहीं कर रही थी। वहीं संत रविदास नगर जिले के ग्यानपुर के सपा विधायक विजय कुमार मिश्रा वाहन चोर गैंग के नेता निकले तो बरेली जिले के कंवर क्षेत्र के सपा विधायक के खिलाफ चोर गैंग के सरगना होने का मुकदमा दर्ज हुआ।

वाराणसी के कोलासला क्षेत्र के विधायक अजय राय ने भानू प्रताप सिंह नाम के बीज व्यापारी को एक संपत्ति विवाद में 25 मार्च को जिंदा जला दिया। पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले अजय राय 2007 चुनाव से पहले भाजपा में थे,चुनाव के वक्त सपा ने समर्थन दिया और फिलहाल कांगे्रसी कार्यकर्ताओं ने,गुंडा एक्ट में उन्हें गिरफ्तार किये जाने के बाद वाराणसी में खूब हंगामा किया। बाहुबली अजय राय प्रदेश के इकलौते नेता नहीं हैं जो अपराध की राजनीति के बदौलत प्रदेश की हर बड़ी पार्टी में रसूख रखते हैं। इस तरह के नेताओं की भरमार है जो पार्टियों में बेहतर राजनीति की पैरोकारी करने वालों को हाशिये पर डाल देते हैं और शीर्ष  नेताओं की क्षत्रछाया में मलाई मारते हैं। मुख्तार अंसारी, राजा भैया, अमरमणि त्रिपाठी, हरिशंकर तिवारी, अतिक अहमद, गुड्डु पंडित, डीपी यादव, अखिलेश सिंह जैसे नेता इस राजनीति के स्थापित नाम हैं।

उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उनके उतने हैं अपराधी’ वाली बात है। पिछले 2007के विधानसभा चुनावों में दलितों-ब्राम्हणों के गठजोड़ से ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली बसपा के 206 प्रतिनिधि हैं जिनमें से 71 पर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का मुकदमा दर्ज है। जबकि प्रदेश को संभालने वाले कैबिनेट के मंत्रियों में अपराधिक छवि वाले कितने हैं उसका अंदाजा बुंदेलखंड क्षेत्र से आने वाले उन पांच  मंत्रियों से लगाया जा सकता है जिनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिस पर कि आपराधिक मुकदमा नहीं है। भाजपा से बसपा में आये और मौजुदा सरकार में लघु उद्योग मंत्री बने बादशाह सिंह पर लगभग डेढ़ दर्जन मुकदमें दर्ज हैं।

ऐसा भी नहीं है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराधियों की भरमार एकाएक हो गयी है। पिछली विधानसभा में तो आधे से अधिक 403 में से 207 जनप्रतिनिधियों पर संगीन मुकदमें दर्ज थे जिसमें सर्वाधिक संख्या 84 सपा विधायकों की थी। वैसे भी सपा के बारे में राजनीतिक विश्लेषकों की आम राय रही है कि जब वह सत्ता में होती है तो अराजकता बढ़ जाती है। याद होगा कि मुलायम सिंह ने राजनीति में अपराधियों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर मैनपुरी में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अपराधियों को राजनीतिक तंत्र से खदेड़ने की जरूरत है और चाहिए कि असमाजिक तत्वों को जगह न दें। इसकी शुरूआत में अपनी पार्टी से करने जा रहा हूं।’प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की यह चिंता काबिले तारिफ थी लेकिन खालिश भाषण साबित हुई। मौजूदा विधानसभा में उनकी पार्टी के 97विधायकों में से 48 यानी आधे असमाजिक और आपरधिक टैग वाले हैं।

राजनीतिक सुचिता और शुद्धता पर सर्वाधिक शोर मचाने वाली पार्टी भाजपा के शाहाहाबाद क्षेत्र के विधायक कांशीराम दिवाकर पर बरेली के एक व्यापारी नरेंद्र सिंह ने हत्या और वसूली का मुकदमा दर्ज कराया है। प्रदेश में लगातार जनाधार खो रही भाजपा को आखिरकार अब आपराधिक राजनीति की वही राह चुननी पड़ी है,जिसका सिद्धांतों में ही सही वह विरोध करती रही है। इस बार विधानसभा में भाजपा के मात्र 50 विधायक ही पहुंच सकें हैं जिसमें से 19 अपराधियों की बिरादरी से आते हैं। अब कांग्रेस को देखें तो उत्तर  प्रदेश में उसके सबसे कम गुंडा विधायक हैं कि  सबसे कम 20 विधायक हैं।

प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में 160 से उपर माफियाओं और अपराधियों की भागीदारी में जनता से जुड़े मुद्दे किस कदर हाशिये पर जाते हैं उसकी एक बानगी मौजूदा विधानसभा के चले सत्र को देखकर समझा जा सकता है। पूरे सत्र में एक सप्ताह भी सदन नहीं चला और न ही जनता से सीधे जुड़े किसी मसले पर चर्चा हो सकी। सवाल है कि जिस सत्र को कमसे कम साल में तीन महीने चलना चाहिए वह एक सप्ताह भी नहीं चलता है और विपक्ष इस पर विरोध की खानापूर्ति कर चुप्पी साध लेता है।


Apr 16, 2010

माओवादियों का गांधीवादी प्रयोग


अजय प्रकाश

यह अदभुत तो नहीं, आश्चर्यजनक जरूर है। साथ ही चिंतलनार में छह दर्जन से अधिक सुरक्षाबलों की हत्या के बाद यह खबर सुकून देने वाली है। सुनने में थोड़ा अटपटा लग सकता है कि माओवादियों ने गांधीवादी प्रयोग शुरू कर दिये हैं, पर यह सच है। यह उतना बड़ा सच है जितना कि चिंतलनार हमले से पहले माओवादियों ने आसपास के दस गांवों का सर्वे किया था और पाया कि महीने दिन के भीतर वहां 70 से अधिक महिलाओं का सुरक्षाबलों ने बलात्कार किया और गांव के गांव फूंक डाले।
ऑपरेशन ग्रीन हंट :  पहले यहाँ आदिवासी घर था

माओवादियों के नेता गुड्सा उसेंडी के इस बयान को लिखने के साथ ही हो सकता है कि मैं ‘खूनी दरिंदों’ का हमसफर मान लिया जाऊं। हो सकता है उन 70 महिलाओं के साथ हुई हिंसा को माओवादी दुष्प्रचार मान लिया जाये। ठीक उसी तरह जिस तरह से पिछले नवंबर से लेकर अब तक 107 हत्याओं की लिस्ट लेकर घूम रहे आदिवासियों की दिल्ली से लेकर दंतेवाड़ा तक कोई सुनने वाला नहीं है। वे अभी-अभी दिल्ली स्थित कांस्टिच्यूशन क्लब में ‘इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ की तीनदिनी बैठक में दंतेवाड़ा का हालात बताने आये भी थे। मगर उनको चिंता यह सताये जा रही थी कि यहां से जाने के बाद दंतेवाड़ा से अपने गांव सकुशल पहुंच पायेंगे कि नहीं।

अब मूल मुद्दे पर आयें तो सुरक्षा बलों के मुकाबले में भारी जान-माल गंवा रहे माओवादी और उनकी समर्थक जनता ने झारखंड में संघर्ष का एक नया प्रयोग किया है। सरकार कि घोषणा के मुताबिक झारखंड के 22 में से अठारह जिले माओवाद प्रभावित हैं। प्रभावित जिलों में से एक खूंटी है। बाकी जिलों की तरह वहां भी केंद्र सरकार की मदद से राज्य सरकार आपरेशन ग्रीनहंट चला रही है। रांची से लगभग पचास किलोमीटर दूर जिले के अड़की थाना क्षेत्र में जब लोगों ने आपरेशन का हल्ला सुना तो, सुरक्षा बलों के अत्याचारों से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय में जुट गये। उन्हीं में से चार गांवों के लोगों ने तय किया कि क्यों न जब तक आपरेशन हो तब तक हम थाने ही में रहें और जब सुरक्षा बल आपरेशन कर लौट आयें तो हम वापस गांव जायें।

फिर क्या था, इन गांवों के लोग इकठ्ठा होकर अपनी ढोर-डंगर, सामान और मुर्गे-मुर्गियां लेकर भोर में ही अड़की थाना परिसर पहुंच गये और वहां डेरा डाल लिया। पुलिस के लिए यह अचंभित करने वाला था। पुलिस अधिकारियों के पूछने पर लोगों ने बताया कि आज हमारे गांवों में आपरेशन ग्रीन हंट होना है इसलिए पहले ही हम लोग थाने आ गये। जो जांच-पड़ताल करनी है, जिन माओवादियों को पकड़ने हमारे गांव जाना है, यहीं पहचान कर लीजिए।

माओवादी इलाकों में चल रहे आपरेशन से त्रस्त जनता के बीच का यह सामान्य अनुभव है कि ग्रामीणों पर सुरक्षा बल माओवादी या समर्थक होने का आरोप लगाकर तरह-तरह के अत्याचार करते हैं। जिससे बचने के लिए लोग भागकर जंगलों में जाते हैं। वैसे में सुरक्षा बलों की निगाह किसी पर पड़ गयी तो गोली मार देते हैं, नहीं तो माओवादी बताकर प्रताड़ित करते हैं। कुछ नहीं मिलने पर गांव के गांव फंकने में भी वह नहीं हिचकते। जाहिर है यह अनुभव अड़की थाना क्षेत्र के उन ग्रामीणों का भी रहा होगा जो डेरा डाल चुके थे।

ग्रामीणों ने पुलिस वालों  को यह भी सुझाव दिया कि अगर आप लोगों को हम लोगों की बात में कोई फरेब नजर आता है तो, हमारे गांवों   में जांच कर आइये। जब तक आप लोग वापस नहीं आते, तब तक हम लोग यहीं थाने में ही रहेंगे। बस गांव वालों ने यह मांग रखी कि हमारे खाने-पीने का इंतजाम कर दिया जाये, जिससे सुरक्षा बल आराम से दो-चार दिन तक अभियान चला सके।

कल तक जो लोग सुरक्षा बलों के डर से भागे फिरते थे वे आज थाने में बेहद संतुष्ट होकर इत्मीनान से बैठे हुए थे, जबकि पुलिस की घिग्घी बंधी हुई थी कि कैसे वह लोगों को वापस गांवों में भेजे। आखिरकार बहुत समझाने-बुझाने और इस आश्वासन पर कि ‘आपके गांवों में कोई आपरेशन नहीं चलाया जायेगा’ ग्रामीण वापस अपने गांव लौटे। उस दिन ग्रामीणों के पास सुरक्षा बलों से मुकाबले के लिए हथियार तो नहीं थे, मगर उन्होंने जो संघर्ष का तरीका अख्तियार किया था, वह हमेशा ही हथियार की हर राजनीति पर भारी रहा है और रहेगा। अब देखना है कि सरकार  माओवादियों के इस  गांधीवादी   प्रयोग पर क्या प्रतिक्रिया करती है. 

                                                        

Apr 14, 2010

घरवाली नहीं, घरवालियों की जीत

अजय प्रकाश

हरियाणा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब एक अदालती फैसले ने जातीय पंचायतों की चूलें हिला दी हैं। फैसला करोड़ा गांव की बनवाला खाप पंचायत मामले में आया है जो हरियाणा की उन 47 पंचायतों में से एक है जो गोत्र, गांव और बिरादरी की शुद्धता को बरकरार रखना लोकतंत्र में पहली और अंतिम जिम्मेदारी मानती हैं। इन पंचायतों की चाहतों और फरमानों से अलग जिस किसी ने भी जिंदगी की दीगर राह चुनी, उनकी चौधरियों ने परिवार पर जोर डालकर या तो हत्या करा दी, परिवार समेत बेदखल कर किया या फिर उन्हें ताजिंदगी भटकने को मजबूर कर दिया। लेकिन यह पहली बार हुआ है जब पंचायत में शरीक रहे हत्यारों को फांसी और उम्रकैद की सजा हुई है। महत्वपूर्ण यह भी है कि सजा दिलाने वाला कोई चौधरी नहीं, एक चौधरी की  घरवाली है.


यह मामला कैथल जिले के करोड़ा गांव का है जहां मनोज और बबली का घर था और पंचायत ने उनकी शादी के बाद हत्या कर दी थी। गांव के खाप समर्थक जाट जो शादियों में गोत्र की शुद्धता के मामले में सीना तानकर ‘खाप कहे सो अंतिम सै’, कहा करते थे वे 30 मार्च को हुए अदालती फैसले के बाद यह कहने में ही भलाई समझ रहे हैं कि जिसने जैसा किया है, वैसा भुगतेगा। 64 सुनवाईयों और 41 गवाहों के बयानों के मद्देनजर दोषियों में पांच को फांसी की सजा हुई है जिनमें बबली के भाई सुरेश, चाचा राजिंदर, मामा बारूराम, मामा के दो बेटे गुरुदेव और सतीश शामिल हैं। वहीं कांग्रेस नेता गंगाराज जो कि खाप के प्रमुख और दबंग सदस्य थे, को उम्रकैद और अपहरण करने वाली गाड़ी के चालक संदीप को सात साल की सजा मुकर्रर हुई है। चंडीगढ़ उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील राजीव गोदारा कहते हैं कि ‘इस ऐतिहासिक फैसले पर समाज की चुप्पी ने साबित कर दिया कि हरियाणवी लोग भी आधुनिक मूल्यों को स्वीकारने को तैयार है। जो लोग भी खापों की ताकत को बढ़ाचढ़ाकर आंकते थे, उनकी आंखें खुलेंगी।’

इस मामले में खास बात यह है कि हत्यारों को चुनौती देने का साहस किसी और ने नहीं, बल्कि मनोज की विधवा मां चंद्रपति ने किया। बबली के परिवार वालों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होने के बाद कई दफा पंचायत वाले चंद्रपति के दरवाजे चढ़कर आये कि पैसे लेकर समझौता कर लो। मगर बेटे-बहू को गंवा चुकी मां अड़ी रही कि हमारा हर समझौता दोषियों की सजा मुकर्रर किये जाने के साथ ही पूरा होता है। विधवा मां के इस साहसिक बयान पर समाज ऐंठा तो बहुत, लेकिन कानूनी डर से अगली हत्या का दुस्साहस न कर सका। मनोज के भागने के दिन से ही सामाजिक बहिष्कार झेल रहे उसके परिवार वालों पर गांव ने और कड़ाई कर दी ताकि वे हिम्मत हारकर मुकदमा वापस ले लें। चंद्रपति हत्या के अगले दिन 16 जून से घोषित सामाजिक बहिष्कार के दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि ‘हमारे बच्चों की हत्या के बाद गांव का दूकानदार समान नहीं देता था, टेंपो वाले नहीं बैठाते थे, माचिस के लिए भी यहां से दूर बाजार जाना पड़ता था। जब भैंस के लिए चारा तक नहीं मिला तो हमने उसे भूसा खिलाकर जिंदा रखा।’ हरियाणा में चंद्रपति अकेली नहीं हैं जिन्होंने समाज का ऐसा रवैया भुगता। पंचायती इच्छा के विरूद्ध जाने पर यह रिवाज यहां बड़ी आम है।


चंद्रपति का परिवार आज भी अघोषित बहिष्कार भुगत रहा है। पिछले तीन वर्षों से किसी पड़ोसी का उनके यहां आना-जाना नहीं है। दस घरों की पट्टीदारी से लेकर रिश्तेदारों तक ने कभी उनके घर झांकने की जहमत नहीं उठायी। इतना ही नहीं, बेटे की हत्या के बाद मातम में डूबे इस परिवार से मेलजोल करने वालों पर पंचायत ने 25 हजार जुर्माना करने का भी फरमान सुना दिया। चंद्रपति से यह पूछने पर कि इस माहौल में आपको डर नहीं लगता, वे कहती हैं, ‘अब मैं क्यों डरूं, डरने के दिन तो हत्यारों  और उनके हिमायतियों के आये हैं। जब मेरे साथ कोई नहीं था, तब मैंने हार नहीं मानी, आज मेरे साथ मीडिया और अदालत दोनों खड़े हैं।’ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि औरत को घरवाली और गोबरवाली से अधिक की औकात न देने वाले उस जाट समाज को चंद्रपति ने संविधान और कानून का रास्ता दिखाया है, जो अपने क्रूर अमानवीय फैसलों का महिमामंडन करता है और उसे परंपरा का हिस्सा मानता है।

एक ही गांव, गोत्र और जाति के होने के नाते तीन साल पहले स्थानीय थाने की मिलीभगत से बबली के परिवार वालों ने उसे और उसके पति मनोज को बस से खींचकर गांव के खेत में हुई पंचायत के बाद 15 जून की रात को मार डाला था। इसी तारीख को यह जोड़ा कैथल अदालत में बयान दर्ज कराने आया था। बयान की जरूरत इसलिए पड़ी कि लड़की पक्ष वालों ने राजौन थाने में लड़के के घर वालों पर अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया था। चंद्रपति रोते हुए कहती हैं, ‘मनोज-बबली की शादी से पहले मैं बबली की मां से मिली कि इन दोनों की खुशी इसी में है तो शादी कर देते हैं। लेकिन उसने मुझे अपने घर से दुत्कार कर भगा दिया था कि ‘अब फैसला तो पंचायत ही करेगी।’ उधर जिंदगी साथ गुजारने की अंतिम इच्छा लिए मनोज-बबली भागकर चंडीगढ़ के एक मंदिर में 7 अप्रैल को शादी कर चुके थे। शादी की खबर फैलते ही पंचायती चैधरियों के बढ़ते दबाव के खौफ में उन्होंने सुरक्षा के लिए अदालत में अर्जी लगायी जिस पर कोर्ट ने नवविवाहित युगल और मनोज के परिवार वालों को सुरक्षा देने का आदेश दिया था।

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की जनवादी महिला समिति की हरियाणा इकाई की सचिव जगमति सांगवान और नौजवान सभा की मदद से हत्यारों को सजा दिलाने में चंद्रपति अंततः सफल रही, लेकिन इसके लिए अदालतों और थानों के इतने चक्कर लगाने पड़े कि उसे हर बात तारीख और दिन के साथ याद है। उसे याद है कि पचीस हजार आबादी वाले इस गांव में सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में जब उन्हें मार डाला गया तो किसी एक का भी दिल नहीं पसीजा। किसी ने यह बताने की हिम्मत नहीं की थी कि वे मार डाले गये। मनोज-बबली के मरने की जानकारी एक नहीं, पूरे पंद्रह रोज बाद 30 जून को मिली जब हिसार जिले के नारनौंद नहर में दो लाश मिलने की खबर चंद्रपति तक पहुंची। लेकिन जब तक चंद्रपति, बेटी सीमा और बहन के बेटे नरेंद्र के साथ थाने पहुंची, पुलिस वाले लावारिश लाशें बताकर जला चुके थे और शिनाख्त के लिए उन्हें थाने में बहू के गहने और बेटे का शर्ट दिया गया।

हत्यारों के सजायाफ्ता होने के बाद से हरियाणा ही नहीं, देश भर से बर्बर खापों के समर्थक लगातार इस फिराक में लगे हुए हैं कि कैसे अपराधियों की कानूनी-सामाजिक मदद की जाये। इसके लिए राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के  खाप प्रतिनिधि लगातार हरियाणा के अलग-अलग जिलों में हो रही खाप महापंचायतों  में लगातार पहुँच रहे हैं. लेकिन ऐसा पहली बार है कि प्रतिनिधि जुटाये नहीं जुट रहे हैं।

मनोज के परिवार के वकील लाल बहादुर कहते हैं ‘पंचायत फैसला चाहे जो ले, मगर जो काम पुलिस, जनप्रतिनिधि नहीं कर पाये वह अदालत ने करके चौधरियों को बता दिया कि उन्हें लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की इज्जत करना सीखना पड़ेगा।’ दूसरी तरफ देखें तो पंचायत चौधरियों के इशारों पर हो रही हत्याओं में अभी कोई कमी आयी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन अदालत के फैसले से उम्मीद जरूर बंधती हैं जब करोड़ा गांव के खाप समर्थक बुजुर्ग हेर सिंह हमारे पीछे-पीछे दौड़कर सिर्फ यह बताने आते हैं कि ‘मेरा नाम न छापना, मैं उस पंचायत में नहीं था।’


द पब्लिक एजेंडा  में प्रकाशित रिपोर्ट का सम्पादित अंश

Apr 2, 2010

लेखक 'ककउनादा' हैं

अजय प्रकाश



अख़बार के दफ्तर से फ़ोन आया कि आपके भेजे गए आवेदन को स्वीकार कर लिया गया है.

सुनकर प्रसन्नता हुई और मैं अगले दिन दफ्तर पहुँच गया. पहुंचते ही मुझे एक बंद कमरे में भेज दिया गया जहाँ तीन लोग विराजमान थे. सेकंडों  की नमस्कार-बंदगी के बाद सवालों का दौर शुरू हुआ.

आपको पता है कि किस पेज के लिए यहाँ रखे जा रहे हैं?

जी, सम्पादकीय के लिए.

इस पेज का एक दूसरा नाम क्या है?

जी, कुछ लोग इसे गंभीर पृष्ठ भी कहते हैं.


तो फिर गंभीरता शब्द के  मायने  बताएं?

 समाज में जो लोग कम हंसते- बोलते है, बच्चे
 देखकर जिन्हें दूर भागते हैं, महिलाएं जिनके सामने चुप रहना जरुरी समझती हैं और नौजवान जिनके सामने बूढों जैसे दिखने लगते हैं, ऐसे लोगों को देखकर जो अहसास होता है उसे गंभीरता  कहते हैं.

पर यहाँ काम करते हुए आपका वास्ता गंभीर लेखन से होगा, इस बारे में आपकी राय?

अख़बारों के जिस लिखे  को सबसे कम पढ़ा जाता है उसे गंभीर लेखन कहा जाता है. इस पेज की  खासियत होती है कि पहले पाठकों को बताया जाय कि यहाँ लेखक लोग ही लिखते हैं, चोर-उचक्के नहीं. उसके बाद यह लिखना अवश्यम्भावी  होता हैं कि लेखक बटमारी- राहजनी के धंधे से नहीं साहित्य, पत्रकारिता, संगीत, कला, दर्शन, नाटक, राजनीति जैसी विधाओं से वास्ता रखते हैं. जैसे लेखक सामाजिक विषयों के जानकार  हैं, लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं आदि. बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि लेखक अपने क्षेत्र में कितने वरदहस्त या  पारंगत हैं, यह भी बताना कलम क्लर्क यानी हमारे जैसों की बुनियादी जिम्मेदारी है.

आप इन विशेषताओं को लिखे जाने से सहमती जताते हैं? 

यह सोचकर कि लेखन में कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो असमाजिक विषयों पर लिखते होंगे इसीलिए यहाँ सामाजिक हैं, परतंत्र पत्रकारों की भी एक जमात होगी इसलिए हमारे यहाँ स्वतन्त्र हैं. साथ ही दूसरी जगहों पर राहजनी, बटमारी, करने वालों की भरमार होगी जबकि हमारे यहाँ शुक्र  है कि लेखक ही अभी लिख रहे हैं.

बहुत खूब. लेकिन आप हमारे लिए विशेष क्या करेंगे जिसकी वजह से हम, आपको ही रखें?

वैसे तो गंभीर पेज पर करने के लिए कुछ होता नहीं है इसलिए मैं क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता. लेकिन मैं लेखकों के परिचय के लिए एक एक्सक्लुसिव शब्द  लेकर आया हूँ "ककउनादा". इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार हमलोग ही एक्सक्लूसिवली करेंगे, जैसे लेखक ककउनादा हैं.

मेरे इस प्रस्ताव पर सामने बैठे तीनों महानुभाव खुश हुए. और पूछ लिए कि , 'मगर  इसका मतलब तो बताएं.'

मैंने कहा,  "ककउनादा" -  का मतलब हुआ कि लेखक कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और दार्शनिक हैं. अगर किसी का परिचय इससे आहत होगा तो आगे-पीछे  उत्सर्ग-प्रत्यय जोड़ लिया जायेगा.

मेरे इस सुझाव पर तीन स्तरों के संपादकों के  समूह ने मुझे काम के योग्य माना. उन्हें यह शब्द इतना पसंद आया कि वे इसे कॉपीराईट कराने पहुँच गए. संयोग से यह शब्द  दूरदर्शन के  किसी सीरीअल का जूठन निकला...........लेकिन हमारे यहाँ आज भी एक्सक्लुसिव वर्ड है...........और मैं खोजकर्ता.


Mar 27, 2010

असलहे.....इनके दोस्त हैं



देश के लाखों सिपाही इस तस्वीर की तरह जीते हैं. सिपाही के लिए साँस लेना जितना जरूरी होता है,  यहाँ दिखने वाली हर चीज़ भी उससे कम जरूरी नहीं होती.  रंगरूट  जहाँ भी जाते  हैं इसमें से कुछ भी छोड़ कर नहीं जाते.
धर्मं-अधर्म, न्याय-अन्याय, रोटी-पानी सबकुछ इस  बक्से में  है और  दीवार पर पड़े असलहे इस बात के गवाह हैं कि जिंदगी यहीं से चलती है.

उत्तर प्रदेश पीएसी का रंगरूट :  हमने नहीं , रोटी ने  जिंदगी को चुना है.                                        फोटो- अजय प्रकाश






Mar 23, 2010

मैं चाहता हूँ, बेटा इस्लामिक स्कूल में पढ़े !



पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक "डान"  में हर बुधवार को 'स्मोकर्स कार्नर' के नाम से नदीम एफ़ पारचा कॉलम लिखते हैं. इस बार बुधवार को उन्होंने एक बेहद  जरूरी मसले को बड़े नायाब तरीके से पेश किया है. हमें उम्मीद है कि  मसला और उसे बताने का तरीका दोनों ही आप सबको  पसंद आएगा.


नदीम एफ़ पारचा

कुछ दिन पहले की बात है, मैं  ट्रैफिक   सिग्नल पर लाल बत्ती के हरा होने का इंतजार कर रहा था। तभी एक बच्चा मुझे एक पर्चा पकड़ा गया। आम तौर पर ऐसे पर्चों को मैं फेक दिया करता हूं लेकिन उस दिन मैंने यह सोच कर रख लिया कि देखता हूं इसमें छपा क्या है।


पर्चा एक मान्टेसरी स्कूल ‘मॉडल इस्लामिक मॉन्टेसरी’ के दाखिले के विज्ञापन का था। घर पहुंचकर मैंने तय किया कि क्यों न इसके प्रिंसिपल  से बात की जाये और जाना जाये कि यह किस तरह का स्कूल है।

मैंने प्रिंसिपल को फोन लगाया और कहा ‘हेलो, अस्सलामालेकुम’।

सामने से किसी महिला ने जवाब दिया-‘वालेकुमअस्सलाम’।

मैने पूछा, ‘क्या मैं मॉडल इस्लामिक मान्टेसरी की प्रिंसीपल से बात कर रहा हूं।’

‘जी हां, बोल रही हूं, क्या मदद कर सकती हूं।’

‘मेरा एक तीन साल का बेटा है जिसका मैं आपके स्कूल में दाखिला दिलाना चाहता हूं।’ - मैंने कहा

‘जी हां, उसका स्वागत है’- उन्होंने जवाब दिया।

फिर मैंने कहा, ‘लेकिन मेरे कुछ सवाल हैं’।

‘जरूर, आप हमसे कुछ भी पूछ सकते हैं’- प्रिंसिपल  ने कहा।

मैंने सवाल किया, ‘आपका स्कूल गैर-इस्लामिक स्कूलों से अलग कैसे है?’

‘क्या मतलब?’- उन्होंने पूछा।

यही कि आपका स्कूल एक इस्लामिक मॉन्टेसरी है न ?- मैंने पूछा

कुछ हिचकते हुए उन्होंने जवाब दिया, ‘जी हां।’

‘तो हमें आप ये बतायें कि एक इस्लामिक मॉन्टेसरी, गैर इस्लामिक मॉन्टेसरी से अलग कैसे है’ - मैंने जानना चाहा।

‘हां, हमारे यहां इस्लाम की परंपरा और तहजीब जैसे कि रोजा, सलात आदि की शिक्षा दी  जाती है।’


मैंने प्रिंसिपल  की बात काटते हुए पूछा कि ‘आप नमाज की बात कर रही हैं।’

‘जी.....नमाज.....एक ही बात है’- उन्होंने समझाया।

‘अच्छा ठीक है, लेकिन ये बतायें कि आप लोग बच्चों और क्या-क्या पढ़ाते क्या हैं’- मैंने पूछा।

उनका जवाब था, ‘हम बच्चों को अच्छी आदतें सिखाते हैं.....।’

मैं उन्हें बीच में रोककर पूछ पड़ा, ‘इस्लामिक आचरण’।

‘जी........बिल्कुल’- प्रिंसिपल  दुबारा हिचकीचाते हुए बोलीं।

‘बहुत अच्छा। मगर आप ये बतायें कि क्या इस्लामिक आचरण, गैर इस्लामिक आचरण के मुकाबले ज्यादा अच्छा और सभ्य है?’

इतना सुनते ही प्रिंसिपल  ने बहुत विनम्र होकर पूछा, -‘सर.......मैं आपसे क्या एक सवाल कर सकती हूं।’

‘जरूर.... मैडम।’

‘आखिर आप इस्लामिक-गैर इस्लामिक बहस में क्यों उलझ रहे हैं’- उन्होंने ऐतराज उठाया।

मैंने जवाब में कहा,- ‘मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा इस्लामिक स्कूल में पढ़े। इसलिए संतुष्ट हो लेना चाहता हूं कि आपका ‘मॉडल इस्लामिक मॉन्टेसरी’ दूसरे इस्लामिक स्कूलों जैसा तो नहीं।’

तब उन्होंने पूछा- ‘आपका बेटा कितने साल का है।’

‘तीन साल का’

‘तो फिर आप खुद स्कूल में ही आकर सबकुछ क्यों नहीं देख लेते’- उन्होंने राय दी।

‘क्या आप उन्हें अल्लाह के लिए गाये जाने वाले गीत (नात) सिखाती हैं- मैंने पूछा

उन्होंने कहा, ‘जी हां, क्यों नहीं?’

‘तो आप बच्चों को अंग्रेजी के वे बालगीत सिखाती हैं जिसमें यहूदीवाद के क्रुर सन्देश दिये होते हैं? - मैंने पूछा

हल्के अंदाज में हंसते हुए प्रधानाध्यापिका बोलीं, ‘सर इस बारे में मैं नहीं जानती, लेकिन शिक्षकों  को हम जरूर इसकी मनाही करते हैं कि ऐसी कविताएं नर्सरी में न पढ़ायी जायें।’

‘इस बारे में आपका ऐसा सोचना अच्छा लगा,....... बतायेंगी कि कव्वाली के बारे में आपका क्या ख्याल है।’ वैसे मुझे तो कव्वालियां बेहद पसंद हैं। इतना कहने के साथ मैं गुनगुनाने लगा-  'भर दो झोली मेरी।’

मुझे रोकते हुए उन्होंने कहा, ‘नहीं सर..........यह सब नहीं.....सिर्फ इस्लामियत की बुनियादी चीजें।’

‘लेकिन क्या बच्चे आमतौर पर एक गैर इस्लामी स्कूल में भी यह सब नहीं सीखते। फिर आपका स्कूल इस्लामिक कैसे हुआ।’- मैंने पूछा

प्रिंसिपल ने जोर देकर आग्रह किया, ‘सर आप खुद ही स्कूल में आकर क्यों नहीं देख लेते। हमें विश्वास है कि हमारे सांस्कृतिक परिवेश  से आप जरूर प्रभावित होंगे। आपको बता दूं कि शहर का यह इकलौता मॉन्टेसरी है जहां छोटी लड़कियां भी हिजाब करती हैं और लड़के परंपरागत इस्लामिक ड्रेस पहनते हैं।’

मैंने खुशी  जाहिर करते हुए कहा, ‘लेकिन ये बताइये लड़कियां तो हिजाब में आती है मगर लड़के।’

‘उन्हें स्कूल में सिर्फ शलवार-कमीज और इस्लामी टोपी पहनकर आने की ही इजाजत है।’- उन्होंने कहा

‘मगर शलवार-कमीज तो हमारे मुल्क का राश्ट्रीय पहनावा है, न कि इस्लामी पोशाक। आप ऐसा करें कि लड़कों को अरबी चोगा पहनायें। मैं आपको भरोसा दिलाता हूं उनमें से एक मेरा बेटा भी होगा।’

तभी उन्होंने बात बदलते हुए पूछा- आपके बेटे का नाम क्या है?’ ‘पॉल नील फर्नांडिस जूनियर’- बेटे का नाम बताते ही फोन की दूसरी तरफ चुप्पी छा गयी।

‘हेलो....हेलो.......प्रिंसिपल साहिबा ....आप हैं.........।’- उधर से सख्त आवाज आयी,.....‘आप मजाक कर रहे हैं क्या.....।’

‘नहीं साहिबा.......मैं गंभीरता से कह रहा हूं’- मैंने जवाब दिया

‘लेकिन आप तो क्रिष्चियन हैं। फिर क्यों चाहते हैं कि आपके बेटे का नाम इस्लामिक स्कूल में दर्ज किया जाये।’- उन्होंने पूछा

‘सीधी सी बात है। ऐसा में इसीलिए चाहता हूं कि मैं एक इस्लामिक गणतंत्र का क्रिश्चियन हूं। साहिबा क्या आप जानती हैं कि एक इस्लामिक गणतंत्र में धार्मिक अल्पसंख्यक होने का एहसास क्या होता है।’

फिर चुप्पी......... मैं अपनी बात जारी रखते हुए कहता हूं, ‘इसलिए मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा सभी इस्लामिक कायदे सीखे जिससे कि वह समाज में बेमेल होने से बच सके।’


‘तो फिर आप धर्म परिवर्तन क्यों नहीं कर लेते’- उधर से यह ठोस सुझाव मुझे सुनायी दिया।

तो मैंने पूछा, ‘मैं ही क्यों?’

‘इसलिए कि आप ऐसा महसूस कर रहे हैं’- उन्होंने कहा।

‘लेकिन आप ही क्यों नहीं बदल जातीं’- मैंने जानना चाहा।

‘हम बदल जायें?’- इसमें जवाब और सवाल दोनों मिलाजुला था।

मैंने कहा, ‘हां जो सलूक हमारे साथ यहां होता है कभी आप भी महसूस किजीए।’

‘देखिये सर, मैं इस झंझट में नहीं पड़ना चाहती। रही बात आपके बच्चे का हमारे यहां प्रवेश  पाने की तो, यह संभव नहीं लगता।’- प्रिंसिपल ने कहा।

मैंने पूछा,- ‘सिर्फ इसलिए कि वह क्रिश्चियन  है।’

‘ऐसा ही लगता है’- उधर से जवाब मिला।

मैने विरोध किया, ‘लेकिन पाकिस्तानी मुसलमानों के तमाम बच्चे क्रिश्चियन  स्कूलों में पढ़ते हैं। तो फिर मेरे बच्चे के साथ भी आप एक पाकिस्तानी की तरह क्यों नहीं व्यवहार कर रही हैं। मैं तो चाहता हूं कि आप इससे भी आगे बढ़कर एक इंसान के तौर पर पेश  आयें।’

मेरे इस सवाल पर प्रधानाध्यापिका ने कहा, ‘सर माफ कीजिए, हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते।’

मैंने उन्हें सुझाया, - ‘अगर मैं आपको स्कूल की फीस दोगुनी दूं तो आप मेरे बेटे को दाखिला देंगी?’

उनका जवाब था-‘सर....यह तो घुसखोरी मानी जायेगी।’

फिर मैंने सुझाव दिया, ‘अरे नहीं, इसे जजिया मानकर रख लिजियेगा।’



अनुवाद- अजय प्रकाश



Mar 20, 2010

बर्फ में नौ सौ किलोमीटर

दुनिया की सबसे ठंढी जगह अंटार्टिका के दक्षिणी पोल पर पहुंचने वाली भारत की पहली महिला रीना कौशल धर्मसत्तु से अजय प्रकाश  की बातचीत




आप भारत की पहली महिला हैं जो बर्फीले रास्तों पर नौसौ किलोमीटर की यात्रा कर अंटार्कटिका पहुंची , उस अनुभव को आप कैसे साझा करना चाहेंगी?

हजारों मील तक फैली बर्फ की चादरों के बीच जहां किसी और का कोई अस्तित्व नहीं दिखता, उस ठंढ के विस्तार को महसूसने के लिए जब कभी मैं आंख मुंदती हूं तो मेरा दिल मगन हो गाने लगता है। वहां पहुंचने के बाद एकबारगी लगता है कि दुनिया के बाकी रंग न हों, तो भी प्रकृति ने बर्फ को जिस सफेद रंग की नेमत से संवारा है, उसकी स्वच्छता एक खुबसूरत संसार रच सकती है। अंटार्कटिका के दक्षिणी पोल पर पहुंचकर कीर्तिमान बनाने के रिकॉर्ड के साथ मैं अपनी जिंदगी में एक नयापन लेकर लौटी हूं और खुश  हूं।

इस नये कीर्तिमान को छूने के लिए भारत से अंटार्कटिका आप कैसे पहुंचीं?

यह कोई मेरा बहुत बड़ा सपना तो नहीं था लेकिन मैं स्की करने के रोमांच को जीना चाहती थी। मैं पर्वतारोहण की प्रशिक्षक हूं मगर स्की करने का मेरा यह पहला मौका था। संयोग से अगस्त 2008 के एक अखबार में छपे विज्ञापन पर मेरी निगाह पड़ी और मैंने इंटरनेट के जरिये आवेदन कर दिया। देश  भर से 130 लड़कियों द्वारा किये गये आवेदन में से दिल्ली स्थित ब्रिटीष काउंसिल में 10 को बुलाया गया जिसमें से मुझे और पश्चिम  बंगाल की अपर्णा को चुना गया। राश्टमंडल के आठ देश  न्यूजीलैंड, सिंगापुर, भारत, ब्रिटेन, साइप्रस, बु्रनै, घाना और जमैका से दो-दो लोगों को चुनकर नार्वे प्रशिक्षण के लिए ले जाया गया। वहां हमें दो हफ्ते का प्रषिक्षण मिला और आखिरकार सभी देषों से एक-एक प्रतियोगियों को अंटार्कटिका यात्रा के लिए चुना गया। उसके बाद हम सभी अपने देष लौट आये और नार्वे कैंप मिले प्रषिक्षण हिदायतों के हिसाब से तैयारियों में जुट गये।

भारत में आपने किस तरह की तैयारी की और सरकार से आपको क्या मदद मिली?

सारी तैयारी शारीरिक  चुस्ती-फुर्ती से जुड़ी थी जिसको हमने पूरे लगन से किया। लेकिन हमारे सपने को पूरा होने में सबसे बड़ा रोड़ा प्रायोजक का मिलना था। खेल मंत्रालय के मुताबिक ‘रोमांच का खेल-स्की’ किसी तय कटगरी में नहीं आता इसलिए उसने आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया। उसके बाद मैंने बहुत से कॉरपोरेट घरानों से संपर्क किया मगर वह भी नहीं तैयार हुए। सिर्फ भारतीय पर्वतारोहण संस्थान ‘आइएमएफ’ और बजाज ग्रुप ने मदद की। लेकिन यात्रा को प्रायोजित करने की पूरी जिम्मेदारी रूस की एक एंटीवायरस कंपनी ‘कैस्पर्सकी’ ने ‘कैस्पर्सकी कॉमनवेल्थ अंटार्कटिका एक्सपेडिषन’ योजना के तहत उठायी। अब जबकि मैं अंटार्कटिका के दक्षिणी पोल पर झंडा फहरा कर आ चुकी हूं मगर फिर भी किसी सरकार ने न तो हमसे संपर्क किया और न ही आर्थिक मदद मिली। एक उम्मीद जरूर है कि सरकार बढ़ते रूझान को देख तवज्जो देना शुरू  करेगी।

पर्वतारोहण जैसे रोमांचकारी खेल में आपकी दिलचस्पी कैसे बनी, उस बारे में कुछ बताइये?

हमारे पापा द्वारका नाथ कौषल फौज में थे और उनका तबादला होता रहता था। रिटायर होने के बाद वह दार्जीलिंग में बस गये। मेरा जन्म तो उत्तर प्रदेष के बरेली में हुआ लेकिन दार्जीलिंग के पहाड़ों के बीच पली-बढ़ी। दार्जीलिंग से मेरा एक भावनात्मक लगाव भी था। मुझे बचपन से ही पहाड़, उनकी उचाइयां  और दूर तक का उनका फैलाव अपनी ओर आकर्षित  करता था। सामने खड़ी कंचनजंघा की बर्फ से ढकी चोटियों को देख उस पर चढ़ने का मन करता था।
दार्जीलिंग के लॉरेटो कान्वेंट स्कूल से बारहवीं पास कर मैंने वहीं के सेंट  जोसेफ कॉलेज से बीकाम किया। फिर मेरे जीवन की असली तैयारी षुरू हई और मैंने पवर्तारोहण में ‘हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान’ से प्रषिक्षक तक षिक्षा हासिल की। षादी के बाद मेरे पति लवराज सिंह धर्मसक्तु से काफी मदद मिली। लवराज मुझसे बड़े पर्वतारोही हैं और आप कह सकते हैं कि हमदोनों का साथ पेषे और जीवन साथी दोनों के तौर पर एक सफल जोड़ी का है। उसके बाद हर साल मैं एक न एक पर्वत चढ़ती ही रही।

अंटार्कटिका में स्की यानी बर्फीली यात्रा आपलोगों ने कैसे पूरी की?

नवंबर 21 को रोनी आइस सेल्फ नामक स्थान से हम आठ लोगों को दक्षिणी पोल के लिए रवाना कर दिया गया। हवाई जहाज से मेसनर्स स्टार्ट तक पहुंचने तक हममें से एक साथी को स्वास्थ कारणों से वापस होना पड़ा। अब हम सात ही थे जिन्होंने मेसनर्स स्टार्ट जो कि विख्यात पवर्तारोही रोनाल्ड मसनर्स के नाम पर बनाया गया बेस है, जहां से स्की करने के लिए चल पड़े। और इस तरह मेसनर्स स्टार्ट से साउथपोल की नौसौ किलोमीटर की बर्फीली यात्रा को हमने 40 दिनों में पूरा किया। पूरे सफर के दौरान इंसानों की कौन कहे कोई जानवर भी रास्ते में नहीं मिला।
इन चालीस दिनों के बीच हमने बर्फीले तुफान, थोड़ा भय और शुन्य  से तीस डिग्री नीचे तक का ठंढा मौसम झेला। मगर साहस और सहनषक्ति भी प्रकृति के उन महान दृष्यों से ही मिला जिसे आज भी हम याद कर आह भरते हैं।

खाने,पहनने और बचाव के लिए आपलोग क्या ले गये थे?

हममें से हरेक के पास साठ किलो का सामान का था जिसमें टेंट, पेटोल, स्टोव, खाना, दवा, रेडियो टांसमीटर और ट्वायलेट किट्स थे। सामान हमलोग पीठ पर नहीं बल्कि अपने से पीछे की ओर बांधकर खिंचते रहते थे। हमलोगों में जबर्दस्त टीम भावना थी इसलिए कभी कोई दिक्कत ही नहीं हुई। रोज कमसे कम दस घंटे बर्फीले रास्तों पर स्की कर आगे बढ़ते जाना था। एक बार में डेढ़ घंटा चलकर सात मिनट का आराम करते।
किसी के पैर छाले पड़ गये या किसी को पैरों या कहीं तनाव रहा तो हमलोग आराम के दौरान एक दूसरे की मालिश  कर आगे बढ़ लेते। प्रतिदिन हमलोंगो को साढ़े चार हजार कैलारी खाना होता था जो कि आम आदमी के भोजन की कैलोरी से तीन गुना था। इसी तरह पानी भी कम से कम एक सदस्य को तीन लीटर पीना होता था।

लेकिन वहां बर्फ के सिवा कुछ था ही नहीं तो, पानी?

बर्फ को स्टोव पर गर्म कर पानी बनाते थे। पानी का इस्तेमाल पीने और सूखे खाने को उबालने में करते थे। चूंकि पूरे यात्रा के दौरान हम लोग एक ही कपड़ा पहने रहे और नहाने का मौका तो 54 दिन बाद मिल पाया था, इसलिए पानी की और जरूरत नहीं पड़ी।

यात्रा के दौरान जो कूड़ा निकला, उसका आप लोगों ने क्या किया?

यह जानना दिलचस्प होगा कि हम लोगों ने इस लंबी यात्रा में एक तिनका भी वहां नहीं छोड़ा। एक विषेश तरह का बैग अपने साथ ले गये थे, जिसमें अपना सारा कचरा साथ ढोकर ले आये। स्की पर जाने से पहले हमें ग्लोबल वार्मिंग और उसमें अंटार्कटिका की भूमिका के बारे में विशेष  तौर पर बताया गया था।

इस यात्रा का मकसद सिर्फ दुनिया को रोमांच के बारे में बताना था या कुछ और?

रोमांच तो उस यात्रा का हिस्सा है लेकिन मकसद ग्लोबल वार्मिंग और प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ को लेकर समाज में जागरूकता पैदा करना था। अपने साथ साठ किलो का भार लेकर उन कठिन बर्फीले रास्तों पर आगे बढ़ना मुष्किल होता था। बावजूद इसके हम लोग वहां से ट्वायलेट तक उठा लाये। दूसरा मकसद कॉमनवेल्थ की साठवीं सालगिरह पर साउथ पोल की चढ़ाई के पीछे महिला सषक्तीकरण के संदेष को भी दुनिया भर में प्रचारित करना था।

इन चालीस दिनों में किसी दिन बर्फीले तुफान से सामना नहीं हुआ?

दूसरे दिन स्की करने के बाद जब हम लोग टेंट में सो रहे थे तो हमारे साथियों का टेंट झोंके से उड़ गया। बहुत डरावना था सब कुछ। उतनी ठंढ में अगर किसी को चोट लग जाये या जैकेट षरीर से हट जाये तो बचना मुष्किल होता है। लेकिन सुविधा यह थी कि वहां कभी रात नहीं होती थी इसलिए हमारे लिए देख पाना संभव था। बहरहाल, पूरी रात सातों लोग एक ही टेंट के पायों को मजबूती से थामकर बैठे रहे लेकिन वह भी सूबह होते-होत फट गया।

सुबह तो वहां होती नहीं थी। घड़ी ने जब चीले देष के हिसाब से सुबह होना बताया, तब तक तुफान थम चुका था। दूसरा खतरा खाइयों से गिरने या बर्फीली तेज हवाओं से उठती-गिरती बर्फ की लहरों से भी होता है। संयोग कहिए हमारी टीम इससे बचकर साउथ पोल पर झंडा फहरायी, जहां अमेरिका का अनुसंधान केंद्र है। हम बहुत खुष हुए थे जब चालीस दिनों बाद हमने सात के अलावा आठवां इंसान देखा था।

यात्रा में सबसे यादगार लम्हा?

बर्फीली लहरें और रात का न होना। हम सोच भी नहीं सकते कि वहां रात नहीं होती होगी और बर्फ की भी लहरें हवाओं के साथ उठती-गिरती होंगी। दूसरी यादगार है क्रिसमस पर अपने घरवालों से बातचीत क्योंकि इस बीच सिर्फ एक बार क्रिसमस के रोज अपने घर फोन करने का मौका मिला.

courtesy - The Public Agenda