Jun 19, 2017

कहीं पार्टी का सफाया न कर दें 'आप के वॉलंटियर्स'

चूंकि योगेंदर यादव की तरह कुमार विश्वास को नेशनल कौंसिल के सदस्यों से नहीं निकलवा सकते, इसलिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिससे वो खुद पार्टी छोड़ दें....
दिल्ली से स्वतंत्र कुमार की रिपोर्ट
दिल्ली। आम आदमी पार्टी में कुमार विश्वास के विपक्ष में बने माहौल को देख सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी उन्हें निपटाने की तैयारी में है। सवाल यह भी कि चूंकि योगेंदर यादव की तरह कुमार विश्वास को नेशनल कौंसिल के सदस्यों से नहीं निकलवा सकते, इसलिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिससे वो खुद पार्टी छोड़ दें।

आप में आजकल सबसे ज्यादा किसी नेता की चर्चा है तो वो खुद को पहले कवि कहने वाले नेता कुमार विश्वास की है। सबसे पहले विधायक अमानतुल्ला ने कुमार पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगाया। इसके बाद तो मानो कुमार के खिलाफ बोलने वाले पार्टी नेताओं की कतार सी लग गई। अब तो ऐसे लगने लगा है जो जितना कुमार के खिलाफ बोलेगा, उसे उतना ही निष्ठावान माना जायेगा।

आज इस कड़ी में एक नया नाम जुड़ गया है, वंदना सिंह। वंदना आप यूथ विंग की नेशनल इंचार्ज हैं। जैसा कि उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर अपना परिचय दिया है। आज वंदना ने एक के बाद एक 4 ट्वीट करके कुमार को सीधा टारगेट पर ले लिया।
एक ट्वीट में वंदना ने एक खबर को टैग करते हुए कहा कि एक नेता नेशनल कन्वेनर और 3 दिन में नया सीएम देने की बात कर रहा था अब क्या हुआ। दूसरे ट्वीट में वंदना ने कहा के एक बड़े भाई हैं जो रोज सुबह पार्टी बचाने के नाम पर पार्टी को गाली देते हैं।
तीसरे ट्वीट में वंदना ने कुमार को टैग करते हुए कहा कि आप रोज टीवी बाईट और इंटरव्यू में पार्टी से सवाल पूछते हो तो मेरे जैसे वालंटियर्स ट्वीटर पर भी आपसे सवाल नहीं पूछ सकता क्या?
आखिरी में वंदना ने और तीखा हमला करते हुए कहा कि जब अपने लड़ना तय कर लिया है तो सामने से लड़ो और आप जवाब दो। साथ ही वंदना ने कहा कि आपकी सोशल मीडिया मोदी सोशल मीडिया आर्मी की भाषा बोलती है।
इन सारे हमलों से एक बात पार्टी को अच्छे से समझ आ रही है कि नेशनल कौंसिल के जरिये कुमार को वैसे पार्टी से बाहर नहीं किया जा सकता, जैसे योगेंदर यादव को किया था। कुमार की वालंटियर्स के बीच अच्छी पकड़ है और बहुत सारे वालंटियर्स नेशनल कौंसिल के सदस्य भी हैं। योगेंदर की वालंटियर्स के बीच वैसी पकड़ नहीं थी इसलिए उन्हें नेशनल कौंसिल की मीटिंग में एक प्रस्ताव लेकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। लेकिन कुमार के केस में यह संभव नहीं है।
सूत्र बताते हैं कि पार्टी कुमार को ठिकाने लगाने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी की ओर से ऐसे नेताओं के माध्यम से कुमार पर आक्रमण किया जा रहा है जो खुद को वालंटियर्स ज्यादा दिखाने की कोशिश करते हैं। इसलिए दीपक वाजपेयी हो या वंदना दोनों ने खुद को वालंटियर्स दिखाते हुए कुमार पर अटैक किया है।
दीपक वाजपेयी ने खुद को अपने ट्वीटर पर पार्टी का वालंटियर ही बताया है, जबकि वो पार्टी के राष्ट्रीय खजांची हैं। वहीं वंदना ने अपने एक ट्वीट में खुद को एक वालंटियर कहा है। दरअसल इस रणनीति की वजह है कि पार्टी दिखाना चाह रही है जिस कुमार को वालंटियर्स ही सबसे ज्यादा पसंद करते थे अब वो ही वालंटियर्स कुमार के खिलाफ बोल रहे हैं। जिससे पार्टी ये जनमत बना सके कि पार्टी के नेता ही नहीं, कार्यकर्ता भी कुमार को अब पार्टी में नहीं चाहते हैं।
वहीं दूसरी ओर कुमार भी बड़ी मजबूती से पार्टी में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। देखते हैं कि कुमार के पैर जमे रहेंगे या राज्यसभा से पहले ही न कुमार को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

राष्ट्रपति बनाने की रबर स्टांप परंपरा कायम

मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में....
बिहार के राज्यपाल और कानपुर वासी रामनाथ कोविंद होंगे एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कौन हैं रामनाथ कोविंद, कहां से लाए गए यह रबर स्टांप।
पूर्व आइएएस अधिकारी कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय। राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद का नाम आते ही लोग खोजने लगे गूगल पर उनकी कोविंद की जाति।

अगर बने तो कोविंद होंगे देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति। इससे पहले दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले के आर नारायणन रह चुके राष्ट्रपति।
उपराष्ट्रपति के नाम पर अभी कोई चर्चा नहीं है। पर संभावना है कि दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद भाजपा उपराष्ट्रपति के लिए महिला सवर्ण नाम को प्राथमिकता देगी। माना जा रहा है दलित राष्ट्रपति के नॉमिनेशन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के दूसरे दावेदारों के मुंह पर जाबी लगा दी है।
मोदी को थी दलित राष्ट्रपति की खोज, हुई पूरी। दलित महिला राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू, दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चंद गहलोत का नाम था चर्चा में। मीडिया ने मेट्रो मैन श्रीधरण के नाम पर भी लगाई थीं अटकलें।
बीजेपी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का सोमवार को ऐलान कर दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बिहार के गवर्नर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोविंद के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि कोविंद को हमने इसलिए चुना है कि पार्टी गरीब समाज से ताल्लुक रखने वाले शख्स को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में थी।
कानपुर देहात में पैदा हुए कोविंद बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। यूपी से दो बार राज्यसभा गए हैं। पेशे से वकील कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं।

भाजपा सरकार ने की कृषि बजट में 17 फीसदी की कटौती

प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद प्रदेश में पहली बार किसी किसान के आत्महत्या की बात सामने आई, सवाल यह कि ऐसे हालात में किसान खुदकुशी न करें तो क्या करें...
देहरादून से अरविंद शेखर की रिपोर्ट
जब तन खटाकर भी खेती फायदे का सौदा न रह गई हो। खेती से अपने बच्चों-परिवार के भले के लिए लिया कर्ज किसान आत्मा पर बोझ बन जा रहा हो। ऋण देने वाली सरकारी संस्थाएं क्रूर सूदखोर महाजन की याद दिलाते हुए नोटिस पर नोटिस भेज रही हों। चुनावी वादे के बावजूद केंद्र और प्रदेश की सरकारें किसानों की कर्ज माफी से इनकार कर चुकी हों। ऐसे अंधेरे हालात में किसी के सामने दो रास्ते होते हैं या तो वह हालात या व्यवस्था से लड़ने का रास्ता चुने या नाउम्मीदी में मौत को गले लगा ले।

बेरीनाग के सरतोला के किसान सुरेंद्र सिंह ने दूसरा रास्ता चुना। जहर खाकर खुदकुशी कर ली। संभवत: प्रदेश में किसी अन्नदाता की कर्ज के कारण की गई यह पहली आत्महत्या है। सवाल यह है कि सरकार क्या इस घटना से जागेगी और अपनी नीतियों में सुधार करेगी और कृषि बजट में की गई कटौती पर पुनर्विचार करेगी। गौरतलब है कि उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार ने कृषि बजट में 17 फीसदी कटौती की भारी कटौती कर दी है, जबकि प्रदेश के किसान पहले से ही 11 हजार करोड़ के कर्जदार हैं। 
उत्त्तराखंड में भी दूसरे प्रदेशों की तरह किसान खुदकुशी की ओर बढ़े इसके हालात लंबे समय से बन रहे हैं। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि 2003 से 2013 यानी 10 साल में राज्य के किसानों पर बकाया कर्ज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है।
2003 में 7.2 फीसद किसान की कर्ज के जाल में थे 2013 तक यह तादाद 38.27 फीसद पहुंच गई। देश के 11 पहाड़ी राज्यों में बकाया कर्ज वाले किसानों के औसत यानी 24.9 फीसद से यह कहीं ज्यादा है। इन हालात में किसान कहां जाएं।
प्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र ही नहीं बुवाई वाला क्षेत्रफल भी लगातार घटता जा रहा है, जबकि एनएसएसओ के 70वें चक्र के सव्रेक्षण के मुताबिक राज्य की 59.9 फीसद परिवारों की आय का मुख्य स्रोत खेती है और केवल 0.6 फीसद आबादी ही ऐसी है जिसकी आय का अधिकांश हिस्सा कृषि से जुड़े कामों से नहीं आता।
कृषि वृद्धि दर भी 2013-14 में ऋणात्मक यानी - 2.19 फीसद हो गई थी जो 2015-16 में कुछ सुधरी और 4.19 हो गई। प्रदेश में 74 फीसद किसान सीमांत किसान है। जबकि 17 फीसद लघु, सात फीसद अर्ध मध्यम, दो फीसद मध्यम और बड़े किसान लगभग नगण्य हैं। सवाल यही नहीं है 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश में कुल कर्मकरों में से पहाड़ में 55.46 फीसद तो हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर यानी मैदान में 51.23 फीसद कृषि कर्मकर हैं।
पहाड़ की तो 93 फीसद किसान छोटी या बिखरी जोतों वाले हैं। 2005 और 2013 के यानी पांचवें व छठे आर्थिक सर्वेक्षण पर नजर डालें तो जहां कृषि से मिलने वाले रोजगार में 34.25 फीसद कमी आई है। वहीं कृषि विभाग के ही आंकड़े बताते हैं कि राज्य स्थापना के समय कृषि क्षेत्र 7.70 लाख हेक्टेयर था लेकिन 2015-16 में यह 0.72 हेक्टेयर घटकर 6.98 लाख हेक्टेयर ही रह गया। इतना ही नहीं प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में भी कृषि के योगदान में लगातार कमी आ रही है।
2004-05 के स्थिर मूल्यों पर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का अंश जहां 16.60 फीसद था वह 2013-14 में घटकर करीब आधा यानी 8.94 फीसद ही रह गया। राज्य की आर्थिकी में भी कृषि व उससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान को भी देखें तो पिछले दस बरस में करीब 23 फीसद से घटकर महज 14 फीसद ही रह गया है।
पहाड़ में तो कुल कृषि क्षेत्र के महज नौ फीसद में ही खेती हो रही है और वह भी जंगली जानवरों के हमलों और सिंचाई की व्यवस्था न होने के चलते दिक्कत में है। ये ही वजहें है कि खेती किसानी को अलाभकारी सौदा मानते हुए किसान खेती छोड़ बेहतर जिंदगी की तलाश में कहीं और चले जा रहे हैं। एनएसएसओ के ही आंकड़े बताते हैं कि 2003 में जहां प्रदेश की 74.94 फीसद आबादी खेती पर निर्भर थी वहीं दस साल यानी 2013 तक वह घटकर 64.3 फीसद ही रह गई।
17 फीसद घटाया कृषि का बजट
कृषि संकट से जूझ रहे उत्तराखंड में प्रदेश सरकार ने कृषि का बजट 17 फीसद से अधिक घटा दिया है। 2016-17 में कृषि बजट 37476.89 लाख रुपये रखा गया था। मौजूदा सरकार ने 2017-18 के लिए 30971.46 लाख रुपये का प्राविधान रखा है। जो कि पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में लगभग 17.35 फीसद कम है। इस मसले पर जब कृषिमंत्री सुबोध उनियाल से संपर्क किया गया तो पहले को कहा गया कि कृषि मंत्री बैठक में व्यस्त हैं बाद में बात करा दी जाएगी मगर बाद में संपर्क करने पर फोन स्विच ऑफ मिला।
किसानों पर 10968 करोड़ का कर्ज
राज्य विधानसभा में वित्त व संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 699094 किसानों ने 10968 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। इस कर्ज का एक वर्ष का ब्याज ही 934. 32 करोड़ है। यह तो वह कर्ज है जो किसानों ने सरकारी बैंकों या सहकारी संस्थाओं से लिया है। सूदखोरों से लिए कर्ज के आंकड़े तो न जाने कितने होंगे। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कह ही चुके हैं कि किसानों की कर्ज माफी में केंद्र मदद नहीं कर सकता।

ये खेल है सैन्य प्रोजेक्ट नहीं बंधु!

क्रिकेट में मिली हार की भरपाई कल ही भारत—पाक के बीच हुए हॉकी टूर्नामेंट में भारत को मिली जीत से करने की कोशिश जरूर की गई, जिसका कि कल तक कोई नामलेवा तक नहीं था....


जनज्वार दिल्ली। कल भारत—पाकिस्तान के बीच हुए क्रिकेट मैच में चैंपियनशिप पाकिस्तान ने जीती। मैच से पहले तक खेल को खेल तक न सीमित कर भारत की जीत को देशभक्ति से जोड़कर देखने वाला हमारा मीडिया पाकिस्तान की जीेत के बाद बगलें झांकता नजर आया। किसी भी अखबार की हैडिंग एक लाइन में यह नहीं बता पा रही है कि पाकिस्तान ने भारत से चैंपियनशिप जीती या भारत पर शानदार जीत दर्ज की।
आज के सभी प्रमुख अखबारों ने गोलमोल हैडिंग लगाई हुई है, कहीं से पाकिस्तान की जीत जैसा संदेश नहीं जाता। वहीं अगर कल मैच भारत ने जीता होता तो हमारे न्यूज चैनल के एंकर और प्रमुख समाचार पत्रों की हैडिंगें आग बरसाती प्रतीत होतीं। अखबारों के फ्रंट पेज उन्मादपूर्ण शीर्षकों से पटे होते तो न्यूज चैनल कहते कि भारत ने पाकिस्तान को हराकर सैनिकों की मौत का बदला लिया। भारत ने पाकिस्तान को रौंद डाला। गोया कि क्रिकेट खेल के मैदान में न होकर जंग में तब्दील हो गया होता। हां, इस हार की भरपाई हॉकी में मिली जीत से करने की कोशिश जरूर की गई, जिसका कि कल तक कोई नामलेवा तक नहीं था। कल तक हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी जो हाशिए की हैडिंग तक सिमटा हुआ था, पाकिस्तान से हॉकी में मिली जीत और क्रिकेट में मिली शिकस्त के बाद फ्रंट पर जगह पा गया। 

मगर इस मामले में सोशल मीडिया की तारीफ करनी होगी कि उसने क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत के बाद पाकिस्तानी टीम को बधाई दी और इसे देशभक्ति से जोड़ने की जमकर आलोचना की।
सतपाल सिंह अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, 'खेलों की शुरुआत ही युद्ध के विरोध में हुई थी कुछ मूर्ख लोग इसे जंग बना देते हैं।'
पाकिस्तान की सीमा से लगे पंजाब जिसने आंतकवाद और विभाजन की सबसे ज्यादा पीड़ा झेली है और जहां हाल ही में एक सिख सैनिक का पाकिस्तानी सेना द्वारा गला काट लिया गया था, में कल के मैच के बाद खेल से संबंधित फेसबुक पोस्ट या तो मुख्यधारा की मीडिया को इसे जंग और देशभक्ति की पराकाष्ठा बताने के लिए जमकर लताड़ा गया है। वहीँ बहुत से लोगों ने बहुत गर्मजोशी से पाकिस्तान के बढ़िया खेल की न सिर्फ प्रशंसा और जीत पर ख़ुशी प्रकट की, बल्कि दोनों देशों के बीच खेल को अमन और दोस्ती का जरिया कहा।
हरमिंदर सिंह सिद्धू ने लिखा पाक बैटिंग देखकर मेरा भांजा बोला, "भारत पाकिस्तान एक हो जाए तो हम सुपर पावर हैं।"
वैभव सिंह ने लिखा है, उन चैनलों को माफी मांगनी चाहिए जिन्होंने मैच को सैन्य युद्ध की तरह प्रोजेक्ट किया था।' वहीं अजीत साहनी लिखते हैं, 'जिस तरह होली दिमाग़ की गंदगी निकलने की नाली की तरह काम करती है, उसी तरह भारत पाक क्रिकेट मैच के बहाने लोग मुस्लिम, कश्मीर और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुंठा निकाल लेते हैं। चलो इसी बहाने बॉर्डर पर दोनों देशों के वीर जवानों का ख़ून थोड़ा कम बहता है।'
गौरतलब है कल मैच से पहले प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने पूरी तरह पाकिस्तान के खिलाफ सारा दिन न सिर्फ नफरत फैलाने का काम किया, बल्कि हर तरह से इसे देशभक्ति और दुश्मन के साथ युद्ध की तरह पेश किया। ये उन्माद इस हद तक फैलाया गया कि कुछ देशभक्त चैनलों के एंकर यहां तक कह गए पाकिस्तान को क्रिकेट मैच में हराकर सैनिकों की मौत का बदला लिया जाएगा। मैच से पहले तक तमाम भविष्यवक्ता चैनलों पर भविष्यवाणी करते नजर आए कि चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की विराट विजय होगी।

Jun 18, 2017

उत्तर प्रदेश से निकलने वाला डीएनए होगा बंद

डीएवीपी की नई पॉलिसी से सैकड़ों मीडियाकर्मी होंगे बेरोजगार 

डीएवीपी की नयी नीति के कारण डीएनए के एडिटोरियल विभाग में करीब 60 लोग आगामी 30 जून को सड़क पर आ जाएंगे। इसके अलावा डीएनए के विज्ञापन, प्रसार और अन्य कई लोग बेरोजगार हो जाएंगे...

जनज्वार लखनऊ। मोदी सरकार की नयी डीएवीपी नीति का जमीनी असर अब दिखने लगा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित इलाहाबाद, कानपुर, फैजाबाद, वाराणसी से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के बंद होने की खबर आ रही है। शनिवार 17 जून को अखबार के सर्वासर्वा डाॅ निशीथ राय, प्रबंधक डी0के0 पाण्डेय और सम्पादक अरविंद चतुर्वेदी ने मीटिंग कर स्टाफ को आगामी 30 जून के बाद अपना बंदोबस्त करने का फरमान सुनाया है। 


इस खबर के बाद से डीएनए कर्मियों में हड़कम्प मचा है। अखबार से जुड़े सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों अखबार में चार-पांच का स्टाफ दिखाई देगा, जो अखबार की फाइल काॅपी छापेगा। रविवार 18 जून को भी अखबार प्रबंधन की मीटिंग अखबार प्रमुख डाॅ निशीथ राय की अध्यक्षता में हुई। मतलब साफ है कि प्रबंधन अखबार बंद करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। 

मोदी सरकार की नयी डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) नीति के लागू होने के बाद से ही इस बात का इल्हाम हो गया था कि आने वाले दिन लखनऊ के पत्रकारों के लिये बुरी खबर लेकर आने वाला है। नयी पाॅलिसी की वजह से लखनऊ में सैंकड़ों छोटे-बड़े समाचार पत्र बंद अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हैं। नयी पाॅलिसी के चलते अखबार प्रबंधन प्रकाशन बंद करने में ही भलाई समझ रहे हैं। 

अखबार बंद होने से सैकड़ों अखबार कर्मी सड़क पर आ गये हैं। जानकारी के अनुसार अकेले डीएनए के एडिटोरियल विभाग में करीब 60 लोग आगामी 30 जून को सड़क पर आ जाएंगे। इसके अलावा डीएनए के विज्ञापन, प्रसार और अन्य कई लोग बेरोजगार हो जाएंगे। इस खबर के बाद से डीएनए कर्मी सदमे में हैं और उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो गया है।

लखनऊ में पिछले एक साल में कई अखबार बंद हुये। इनमें श्रीटाइम्स, कैनविज टाइम्स, कल्पतरू एक्सप्रेस, पत्रकार सत्ता आदि प्रमुख हैं। इन संस्थानों के नौकरी गंवाने वाले पत्रकार व अन्य कर्मियों को किसी दूसरे संस्थान में समायोजन नहीं हो पाया है। नयी नीति के चलते चंद दो-चार बड़े अखबार छोड़कर अधिकतर अखबार एक ही नाव पर सवार हैं। 

सबसे हैरानी के बात यह है कि लखनऊ में कोई बड़ा पत्रकार संगठन बेरोजगार पत्रकार साथियों की आवाज उठाने की बजाय निजी स्वार्थ साधने और योगी सरकार से सेटिंग करने में व्यस्त हैं। एक दो छोटे पत्रकार संगठनों ने नयी नीति के खिलाफ आवाज उठाई भी, लेकिन वो नक्कारखाने की तूती बनकर रह गयी। लखनऊ में चंद बड़े अखबारों के अलावा अधिकतर अखबारों में पत्रकारों को वेतन के नाम पर दिहाड़ीदार मजदूर से कम वेतन मिल रहा है। 

गौरतलब है कि डीएवीपी की नयी नीति के तहत लगातार अखबारों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। लखनऊ में छोटे व मझोले अखबार के मालिक अपने-अपने स्तर से नयी पाॅलिसी का विरोध कर रहे हैं। लेकिन एकता के अभाव में सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। असल में सोची समझी रणनीति व षडयंत्र के तहत मोदी सरकार की नई विज्ञापन नीति की गाज छोटे-मध्यम अखबारों पर गिरनी शुरू हो चुकी है। 

देश के इतिहास में पहली बार हुआ है जब लगभग 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल कैंसिल किये गये हैं और तकरीबन दो हजार के अखबारों को डीएवीपी ने अपनी विज्ञापन सूची से बाहर निकाल दिया है। इस कदम से छोटे और मझोली अखबार संचालकों में हड़कम्प मच गया है। 

वर्तमान में लखनऊ समेत वर्तमान में 90 फीसदी छोटे अखबार डीएवीपी की शर्तों को पूरा नहीं कर सकते। नई नीति के लागू होने से बड़े राष्ट्रीय और प्रादेशिक अखबारों को ही अब केंद्र एवं राज्य सरकारों के विज्ञापन जारी हो सकेंगे। जिसके चलते छोटे व मझोले अखबारों के दरवाजों पर ताला लग रहा है, और हजारों मीडियाकर्मी बेरोजगार हो रहे हैं। सरकार इन अखबारों की आवाज सुनने को तैयार नहीं है। 

चूंकि सरकार इन अखबारों की आवाज नहीं सुन रही है इसलिये इनका बंद होना तय है। नतीजतन स्थानीय-सामाजिक मुद्दे उठाने वाले इन अखबारों के दफ्तरों पर ताला जड़ जाएगा और इस कारोबार से जुड़े लाखों लोग बेरोजगारी की दहलीज पर आ जाएंगे। लखनऊ में इस व्यापक असर दिखने लगा है। 

क्रिकेट शुरू हो उससे पहले इन तथ्यों पर भी गौर ​कीजिए

खेल में देश अव्वल हो इससे किसको ऐतराज हो सकता है, पर खेल देश की जनता के जीवन की कीमत पर हो तो इसे यूं ही 'बी कूल' होकर आप नहीं देख सकते...
प्रेमा नेगी
क्रिकेट के बुखार में देशभक्ति की तपिश से आप पाकिस्तान की सीमा पर जलजला ला दें, उससे पहले इन आंकड़ों को पढ़ लीजिए कि कैसे आप किसानों के लिए सिर्फ स्यापा करते हैं और हकीकत में मुनाफे की लाल कालीन उनके लिए बिछाते हैं, जिनकी मुनाफाखोरी की वजह से इस देश में हर रोज सैकड़ों किसान, मजदूर और बेरोजगार आत्महत्या करते हैं, भूख, गरीबी और गुर्बत में मरते हैं, मरते हुए जीने को मजबूर होते हैं।

अब से कुछ ही घंटों बाद भारत-पाकिस्तान के बीच लंदन के ओवल में चैम्पियंस ट्रॉफी का फाइनल मैच खेला जाएगा। इसका लाइव टेलीकास्ट करने वाले स्टार स्पोर्ट्स ने अपने सभी चैनल्स पर विज्ञापन के रेट 10 गुना तक बढ़ा दिए हैं। इन चैनल्स पर मैच के दौरान दिखाए जाने वाले 30 सेकंड के विज्ञापन के लिए 1 एक करोड़ रुपए लिए जा रहे हैं।
जबकि आम दिनों में इन चैनल्स पर इतने वक्त के विज्ञापनों के लिए 10 लाख रुपए चार्ज किए जाते हैं। यानी आज आपकी देशभक्ति मुनाफाखोरों को 10 गुना ज्यादा मुनाफा दिलाएगी! आज के मैच को करीब दुनियाभर के 100 करोड़ लोग देखने वाले हैं। प्रतिशत में देखें तो यह विश्व की कुल आबादी का 12.5 प्रतिशत होगा।
30 सेकेंड का 1 करोड़। उतना वक्त जितने वक्त में एक रोटी नहीं सेंकी जा सकती, किसान अपने जानवरों के लिए एक बाल्टी नहीं भर सकता और विद्यार्थी अपने पाठ का पूरा का एक पैराग्राफ नहीं पढ़ सकता। सिर्फ इतने वक्त का 1 करोड़ मिलेगा।
कौन देगा? आपकी आंखें!
खैर! आप अपनी आंखें उन्हें दे दीजिए लेकिन दृष्टि तो अपने पास रखिए। कभी सोचा है कि जब आपकी आंखें इतनी कीमती हैं तो आपको उस कीमत का क्या मिलता है? आपकी क्या भागीदारी होती है।
यह भी सोचिए कि जिन विज्ञापनों का रेट आपकी वजह से 10 गुना बढ़ा है, 10 लाख के 30 सेकेंड का स्लॉट 1 करोड़ हुआ है, तो 90 लाख जो कंपनियां स्टार स्पोर्ट्स को वहन करेंगी वह किसकी जेब से आएगा, वह रोकड़ा किसकी मेहनत की कमाई का होगा?
सवाल यह भी है कि क्या एक देशभक्त युवा, नौजवान, छात्र ऐसा होगा जो अपनी दृष्टि की कमी के कारण अपनी आंखें पूंजीपतियों और मुनाफाखोरों के यहां यूं ही जाया कर देगा और किसानों, मजदूरों के लिए सिर्फ फेसबुक और अन्य मीडिया माध्यमों पर सरकार और व्यवस्था को कोसेगा, रूदन करेगा? या यह सच जानकर उसकी आंखें खुलेंगी और वह लौटा लाएगा अपनी बची आंखों की गर्मी।
जब ढलती दोपहर में आप अपने पेप्सी—कोक की बोतलें लिए अंकल चिप्स का कुरकुराता पैकेट दांतों से मसल रहे होंगे, ठीक उन्हीं घंटों में देश का कोई किसान आत्महत्या कर रहा होगा और उसी आत्महत्या की कीमत पर बने अंकल चिप्स को लेकर आप ये मारा—वो मारा, ले ली पाकिस्तान की करते हुए आह्लादित हो रहे होंगे। अपने दोस्तों के साथ 'हाय फाइव' कर रहे होंगे।
आपको इस आह्लाद से कोई रोक नहीं सकता। रोकना भी क्यों चाहिए। आप खुश होइए! देश खेल में अव्वल बने इससे किसको ऐतराज हो सकता है। पर खेल देश की जनता के जीवन की कीमत पर होने लगे तो ऐतराज तो बनता है। ऐतराज तब और गंभीर बनता है जब वह हमारी आंखों के साथ हमारी दृष्टि भी मुनाफों के तिजोरियों में कैद हो जाएं।
आखिर वह कौन सा जादू है जिसके बूते 2 किलो का आलू आपकी चिप्स बनते—बनते 4 सौ रुपए किलो का हो जाता है। कभी तो आप सोचते होंगे? यह तथ्य तो आपकी जानकारी में वर्षों से है? इसपर जिरह इसलिए क्योंकि आप सब, हम सभी किसान आत्महत्याओं पर स्यापा खूब करते हैं।
थोड़ा इस पर सोचिएगा कि आपकी पेप्सी की एक बोतल तब बनती है जब पानी का सौ लीटर बर्बाद होता है।
यह दो मामूली आंकड़े इसलिए जरूरी हैं कि तमिलनाडु, आंध्र, विदर्भ, बुंदेलखंड, मध्यप्रदेश, पंजाब और दूसरे अन्य राज्यों में किसान आत्महत्याओं का मुख्य कारण पानी की कमी और उनके उपज को न मिलने वाली कीमत ही है।
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"हाँ, में क्रिकेट खेलता हूँ। लेकिन क्या मैं किसी की जान बचा सकता हूँ? क्या गेहूं का एक दाना उगा सकता हूं? क्या एक ईंट जोड़ सकता हूँ? हीरो बनाना है तो डॉक्टर को, किसान को, मज़दूर को बनाइए।
मैं काहे का हीरो हूँ? मैं आपका मनोरंजन करने के पैसे लेता हूँ। आपका चहेता परफॉर्मर हूँ, जैसे फिल्मी सितारे होते हैं।
मुक्ति योद्धाओं ने गोलियों का सामना पैसे के लिए नहीं किया। वे हीरो थे, परफॉर्मर नहीं। हीरो क्रिकेटर रकीबुल हसन था जो मुक्तियुद्ध के पहले ही अपने बल्ले पर जय बांग्ला लिखकर मैदान पर उतरा था।
वे कौन अहमक (मूर्ख) हैं जो देशभक्ति को क्रिकेट से जोड़कर खेल बना रहे हैं। वे ख़तरनाक खिलाड़ी हैं। वे सच्चे देशभक्तों की बेइज़्ज़ती करते हैं।..."

जिन्हें गर्व है आर्य होने पर वे गर्वानुभूति के लिए पढ़ें ये लेख

आर्य आक्रमण और भारत के उत्थान—पतन के प्रश्न को समेटता यह लेख आपको जानने में मदद करेगा कि भारत में विकास की महागाथा लिखने में आर्यों का कितना योगदान है...
पढ़िए, युवा समाजशास्त्री संजय जोठे का महत्वपूर्ण विश्लेषण
अभी एक महत्वपूर्ण जेनेटिक रिसर्च सामने आई है, जो आर्य आक्रमण थ्योरी को सही सिद्ध कर रही है. अभी तक मेट्रीलिनियल डीएनए (स्त्रीयों से प्राप्त) की रिसर्च इस दिशा में बहुत मदद नहीं कर पाई थी. लेकिन अब हाल ही में जो वाय क्रोमोसोम (पुरुषों से प्राप्त) डीएनए की रिसर्च आई है वह सिद्ध करती है कि अतीत में (जो काल आर्य आक्रमण का काल माना जाता है ) उस दौर में भारतीय जीन पूल में एक बड़ा बाहरी मिश्रण हुआ है. ये संभवतः यूरेशिया से आये आर्यों के आक्रमण और धीरे-धीरे उनकी मूल भारतीय जनसंख्या में मिश्रण को बतलाता है.
इस नई रिसर्च को कुछ हाल ही की अन्य रिसर्च से जोड़कर सरल भाषा में यहाँ रखना चाहता हूँ. ये नवीन रिसर्च उन पुराने अध्ययन परिणामों के साथ एक गजब की कहानी कहते हैं. आये इसे विस्तार से समझें.
अभी तक के भाषाशास्त्रीय (लिंग्विस्टिक) एनालिसिस और साहित्यिक दार्शनिक एनालिसिस सहित किन्शिप (नातेदारी) और मानवशास्त्रीय सबूत आर्य आक्रमण को पूरा समर्थन करते हैं. साहित्यिक, मानवशास्त्रीय या भाषाशास्त्री सबूत अभी भी दुर्भाग्य से महत्वपूर्ण नहीं माने जाते हैं क्योंकि इनमे विचारधारा के पक्षपात का प्रश्न बना रहती है. लेकिन अब हार्ड कोर जेनेटिक्स अगर आर्य आक्रमण थ्योरी को समर्थन दे रही है तो आर्य आक्रमण थ्योरी को और अधिक बल मिलता है.
किन्शिप (नातेदारी) और सांस्कृतिक मानवशास्त्र (कल्चरल एन्थ्रोपोलोजी) पर मैं अभी कुछ खोज रहा था और मुझे कुछ गजब की स्टडीज नजर आईं। गुप्त काल के दौर में (पहली शताब्दी के मध्य के प्लस माइंस दो सौ साल) अर्थात इसवी सन 300 से लेकर 550 तक की जेनेटिक रिसर्च बताती है कि इस दौर में अचानक इन्डोगेमी (सगोत्र विवाह यानि जाति के भीतर विवाह) आरंभ होते हैं अर्थात जाति प्रथा आरंभ होती है (बासु एट आल. 2016).
ये आज से लगभग 70 पीढ़ियों पहले की बात है. ठीक से देखें तो यह ब्राह्मणवाद के शिखर का काल है. इसी दौर में जातियों का विभाजन काम के आधार पर ही नहीं, बल्कि रक्त शुद्धि और धार्मिक सांस्कृतिक भाषागत शास्त्रगत और आचरण की शुचिता आदि के आधार पर मनुष्य समुदायों का कठोर बटवारा आरंभ होता है. इसी तरह एक अन्य विद्वान् (मूर्जानी एट आल. 2013) के अध्ययन के अनुसार इंडो यूरोपियन भाषा बोलने वालों में 72 पीढ़ियों पहले इन्डोगेमी अर्थात अंतरजातीय विवाह आरंभ हुए.
मतलब साफ़ है कि पहले आर्य आक्रमणकारियों ने खुद में ही जातियां पैदा कीं और बाद में शेष भारत पर धीरे—धीरे लादना शुरू किया. (मूर्जानी एट आल. 2013) इस काल को आज से 72 पीढ़ियों पहले यानी लगभग 1900 से 3000 साल पुरानी घटना बताते हैं. यह बात डॉ. अंबेडकर की खोज की तरफ इशारा करती है.
डॉ. अंबेडकर ने अपने धर्मशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय शोध के आधार पर कहा है कि पहले अंतरजातीय विवाह ब्राह्मणों में शुरू हुए फिर शेष वर्णों जातियों में फ़ैल गये. यहाँ उल्लेखनीय है कि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण को स्वीकार नहीं करते थे लेकिन वे ब्राह्मणी षड्यंत्र और आधिपत्य की बात को जरूर स्वीकार करते थे और ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को भारत में वर्ण और जाति व्यवस्था के जन्म सहित भारत के सांस्कृतिक और नैतिक पतन के लिए जिम्मेदार मानते थे.
आगे के नगरीय सभ्यता के नाश विवरण भी इसी दौर से जुड़े हुए हैं. भारत में नगरीय सभ्यता का नाश ब्राह्मणवाद के उदय से जुदा हुआ है. नए अध्ययन बताते हैं कि मूल भारतीय संस्कृति नागर संस्कृति थी जिसमे व्यापार को अधिक महत्व दिया गया था. नागर संस्कृति में एक साथ नजदीक रहवास के कारण सामाजिक सौहार्द्र और लोकतंत्र भी बना रहता था. इससे ज्ञान विज्ञान और सभ्यता का विकास भी तेजी से हुआ था.
लेकिन यूरेशियन आर्यों को मूल भारतीयों से निकटता पसंद न थी लेकिन इन पुरुष आर्यों को भारतीय स्त्रियां भी चाहिए थीं. इसलिए उन्हें पसंद नापसंद और दूरी और निकटता का बड़ा जटिल सवाल सुलझाना पड़ा. इसी क्रम में वर्ण और जाति ने जन्म लिया. इसी कारण स्त्रियों को भी अन्य भारतीयों की तरह शूद्र कहा गया और उन्हें आर्य शास्त्रों को पढने की इजाजत नहीं दी गयी.
इस तरह आर्य ब्राह्मणों ने राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक कारणों से स्वयं अपने समुदाय में भेदभाव और दूरियाँ निर्मित की और इस भेदभाव के बावजूद समाज को एक रखने के लिए वर्ण व्यवस्था आश्रम व्यवस्था और ईश्वर सहित देवी देवताओं और मिथकों का निर्माण किया.
इस प्रकार जेनेटिक और मानवशास्त्रीय खोजों को अगर समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विकास या पतन के नजरिये से देखें तो आर्य आक्रमण के आबाद जेनेटिक मिक्सिंग, भाषाई सांस्कृतिक बदलाव और नागरी सभ्यता के पतन सहित भारत के नैतिक और दार्शनिक पतन सहित वर्ण व्यवस्था और जाती व्यवस्था के उभार की एक पूरी तस्वीर साफ़ होना शुरू होती है.
आर्य आक्रमण थ्योरी के सच साबित हो जाने के बाद अब कुछ आर्यों की तरफ से एक नई बात आयेगी, वे कहेंगे कि पहले अफ्रीका से इंसान आये भारत को खोजा और इसे आबाद किया, फिर शक, हूण आये और बस गये, फिर तुर्क, मंगोल, मुगल आये. लेकिन वे अंग्रेजों का नाम नहीं लेंगे, वरना उनसे पूछा जाएगा कि अंग्रेजों को भगाया क्यों?
हालाँकि मूलनिवासी की बहस भी पूरी तरह ठीक नहीं है कोई भी किसी जगह का मूलनिवासी होना सिद्ध करे तो उसके पक्ष और विपक्ष में पर्याप्त तर्क हैं और मूलनिवासी होने के दावे से फायदे और खतरे भी बराबर हैं.
वैसे अंग्रेजों की शेष मेहमानों से तुलना ठीक भी नहीं है. अंग्रेजों के आक्रमण की आर्य आक्रमण से तुलना करना इसलिय पसंद नहीं की जाती क्योंकि अंग्रेजों ने शक, हूण, मंगोल, तुर्क, मुगल आदि की तरह भारतीयों से विवाह और खानपान के रिश्ते नहीं स्वीकार किये, वे हमेशा एलीट ही बने रहे और लूटते रहे. उनकी लूट भौगोलिक दृष्टि से साफ़ थी. वे भारत को लूटकर लूट का माल ब्रिटेन भेजते थे. जमीन के भूगोल में उनकी लूट साफ़ नजर आती थी.
लेकिन यही काम आर्य भी करते हैं, वे भी शेष भारतीयों से भोजन और विवाह के रिश्ते नहीं बनाते, इसीलिये उन्होंने वर्ण और जाति बनाई. अंग्रेजों की लूट से आर्य ब्राह्मणों की लूट कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हुई है. इन्होंने जमीन के भूगोल से ज्यादा समाज के भूगोल में लूट और लूट का संचय किया है. भारत की 85 प्रतिशत से अधिक आबादी को अपने ही गाँव गली मुहल्ले और देश में अपनी ही जमीन पर सामाजिक भूगोल (सोशल जियोग्राफी) में अलग—थलग और अधिकारहीन बनाया गया है. आर्य ब्राह्मणों ने इन बहुसंख्यकों से की गयी लूट का माल अपनी जातियों और वर्णों में भरने का काम किया है.
गौर से देखिये, ये लूट अभी भी जारी है और बहुत भयानक पैमाने पर चल रही है.
भारत के मंत्रियों, (कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री) आईएएस, आईपीएस, मुख्य ठेकेदार, मन्दिरों के पुजारी, न्यायपालिका के जज, विश्वविद्यालयों के कुलपति, डीन, विभाग प्रमुख, प्रोफेसर और टीचर कौन हैं? किस वर्ण और जाति से आते हैं इसे ध्यान से देखिये. इन सभी पदों पर 50 से लेकर 70 प्रतिशत तक यूरेशियन ब्राह्मण आर्य बैठे हुए हैं. जो शेष भारत की जनसंख्या से भोजन और विवाह के संबंध रखना पसंद नहीं करते हैं.
असल भारतीय जनसंख्या में भारत के जमीनी भूगोल में इन यूरेशियन आर्यों की आबादी 3 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन भारत के सामाजिक भूगोल में इन्होने 70 प्रतिशत स्थान घेरा हुआ है. जो लोग गहराई से जानते हैं वे समझते हैं कि भारत हर मामले में पिछड़ा क्यों है.
जिन जिन विभागों और मुद्दों पर आर्यों ने कमान संभाल रखी है उन विभागों और मुद्दों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब है. आप सभी पिछड़े हुए विभागों को उठाकर देखिये इनकी कमान किसने कब से कैसे संभाल रखी है.
तीन उदाहरण देखिये, पहला शिक्षा व्यवस्था जिसमें 60 प्रतिशत से अधिक आर्य ब्राह्मण हैं, दूसरा भारत की न्याय व्यवस्था जिसमें 70 प्रतिशत तक आर्य ब्राह्मण हैं. और तीसरा मीडिया जिसमें नब्बे प्रतिशत तक यूरेशियन आर्यों के वंशज हैं। इन तीनों की क्या स्थिति है हम जानते हैं. भारत की शिक्षा व्यवस्था दुनिया में सबसे पिछड़ी नहीं तो बहुत पिछड़ी जरूर है. न्यायपालिका में करोड़ों मुकदमे पेंडिंग हैं और मीडिया तो अभी चुड़ैल का श्राप, अश्वत्थामा की चड्डी और स्वर्ग की सीढियां खोज रहा है.
भारत को अगर सभ्य बनाना है तो सभी जातियों और वर्णों का प्रतिनिधित्व होना जरूरी है. ये देश के हित की सबसे महत्वपूर्ण बात है. ग्लोबल डेवेलपमेंट या सोशल डेवेलपमेंट की जिनकी थोड़ी सी समझ है वे जानते हैं कि पार्टिसिपेटरी डेवेलपमेंट या गवर्नेंस क्या होता है. सहभागी विकास ही सच्चा तरीका है. इसीलिये भारत में यूरेशियन आर्यों को आवश्यकता से अधिक जो अधिकार दिए गये हैं उन्हें एकदम उनकी मूल जनसंख्या अर्थात तीन प्रतिशत तक सीमित कर देने चाहिए ताकि 85 प्रतिशत भारतीयों - क्षत्रिय, राजपूत, वैश्य, वणिक, छोटे व्यापारी किसान, शूद्र दलितों आदिवासियों और स्त्रियों को समानता और प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके.
ये भारत के भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है.
इस पोस्ट से कईयों को गलतफहमी और तकलीफ हो सकती है. मैं दुबारा स्पष्ट कर दूँ कि मैंने ये पोस्ट इसीलिये मूलनिवासी के मुद्दे को गैर महत्वपूर्ण बनाकर लिखी है, मेरी ये पोस्ट इस बात पर केन्द्रित है कि हम या आप या कोई और मूलनिवासी हों या न हों, हम भारतीय नागरिक के रूप में भोजन और विवाह के व्यवहारों में एकदूसरे को कितना शामिल करते हैं. यही अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात है. समानता और बंधुत्व सहित स्वतंत्रता भारत की ऐतिहासिक संस्कृति रही है. लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था बनाकर समता, स्वतन्त्रता और बंधुत्व को बाधित करने वालों को देश के दुश्मनों की तरह पहचानना भी जरूरी है.

थानेदार कहता है, 'छेड़छाड़ के खिलाफ मुकदमा तब दर्ज होगा जब डब्बू भैया कहेंगे'

मोबाइल की वजह से हम तीनों मां—बेटियों की हालत ऐसी कर दी कि मोबाइल छूने से डर लगने लगता, हमें डर के मारे रातों में नींद नहीं आती। हमारी हालत पागलों जैसी हो गयी.....
जनज्वार, देवरिया। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार और उनके लोग बेटियों के अधिकार और सम्मान बचाने में कितने तत्पर हैं, यह मामला उसका प्रतिनिधि उदाहरण है। आप भी यह रपट पढ़िए और सुनिए उस औरत की आवाज जिसकी बेटियां छेड़ी जा रही हैं और मुकदमा भी उसी के परिवार वालों के खिलाफ दर्ज हो जा रहा है, क्योंकि हिंदू युवा वाहिनी के नेता दीपक सिंह उर्फ डब्बू भैया यही चाहते हैं।

हिंदी सिनेमा और भारतीय समाज की असलियत का बड़ा मेल है। जैसे सिनेमा में कोई एक ईलाकाई गुंडा सरीखा नेता अधिकारियों से चरण—चाटन कराता है, कुछ ऐसा ही मामला देवरिया के मदनपुर थाने का सामने आया है।
पीड़िता के परिजनों ने जब मदनपुर थाने के थानाधिकारी प्रभात श्रीवास्तव से गुहार लगाई तो एसओ साहब ने दो टूक कहा, 'डब्बू भैया ने कहा तो तुम्हारे लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया, वह कहेंगे तो तुम्हारी तरफ से भी दर्ज कर देंगे।' हालांकि दो दिन पहले एसओ प्रभात श्रीवास्तव का ट्रांसफर देवरिया हो गया है लेकिन एसओ साहब ने न सिर्फ पीड़िता के परिजनों की नहीं सुनी, बल्कि अतिरिक्त पुलिस अधिक्षक और पुलिस अधिक्षक के कहने के बावजूद मुकदमा नहीं दर्ज किया। एसओ श्रीवास्तव कहते रहे, 'तफ्शीश हो रही है साहब।'
मदनपुर थानाक्षेत्र के बरडीहा दल गांव में नूरतमा अपनी दो बेटियों के साथ रहती हैं। नूरतमा का परिवार भूमिहीन है और उनके पति रोजी—रोटी के लिए देश से बाहर अरब में मजदूरी करते हैं। गांव में कुल 600 से उपर घर हैं जिसमें से 60 घर मुसलमानों के हैं। ऐसे में हिंदुओं का दबदबा है। बरडीहा गांव के मौजूदा ग्राम प्रधान गोविंद निषाद कहते हैं, 'डब्बू बाबू के हस्तक्षेप के कारण लड़कियों के साथ हुआ अपराध हिंदू बनाम मुसलमान हो गया। क्या बेटियों की इज्जत और आबरू जाति देखकर बचायी जाएगी। हमने सभी अधिकारियों से दरख्वास्त कर ली लेकिन मुकदमा नहीं दर्ज हुआ।'
मामला कहां से शुरू हुआ, इस बारे में नूरतमा बताती हैं कि मेरे पास एक मोबाइल है। उस पर अक्सर कोई फोन करके चुप हो जाता था। लेकिन जैसी ही मैं मोबाइल बेटियों को देती वह अश्लील बातें करने लगता, गालियां और धमकियां देता। उसने मोबाइल की वजह से हम तीनों मां—बेटियों की हालत ऐसी कर दी कि मोबाइल छूने से डर लगने लगता, हमें डर के मारे रातों में नींद नहीं आती। हमारी हालत पागलों जैसी हो गयी।
फिर मेरे विकलांग भसूर के पता चला। उनके बेटे ने फोन मिलाया तो पता चला कि गांव के ही हरिजन जाति का एक लड़का विजय फोन कर तंग करता है। उसके साथ दूसरे लड़के भी शामिल हैं। हमने मना किया तो वह गाली—गलौच पर उतर आए। मुझसे मारपीट की। बात में मैं मोबाईल छीनकर साथ ले आई तो वह हमें मारने घर आ गए, बेटियों से बदतमीजी का प्रयास किया।
फोन करने वालों की ओर से दर्जनों लोग हमारे घर पर चढ़ आए। दोनों से मारपीट हुई। नूरतमा के भसुर बताते हैं, 'फोन पर बदतमीजी करने वाले लड़के हिंदू युवा वाहिनी से जुड़े हैं। हम थाने गए तो हमारे ही 13 लोगों के यानी मुस्लिमों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया। एसओ ने कहा, 'डब्बू भैया बीच में हैं, जबतक वह कहेंगे नहीं करेंगे। मामला हिंदू मुसलमान का नहीं बनाना है।'
जनज्वार ने हिंदू युवा वाहिनी के नेता डब्बू भैया उर्फ दीपक सिंह संपर्क करने का प्रयास किया पर बातचीत नहीं हो सकी। दो दिन पहले आए नए थानेदार ज्ञान प्रताप पाठक ने जरूर कहा कि मैंने पीड़ितों को सूचित कर दिया है कि वह एक बार आकर मिलें।
पर नूरतमा का सवाल यह है कि जब एसएसपी के कहने पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ तो थानेदार क्या कर पाएंगे?
पंचायत प्रतिनिध संघ के पदाधिकारी चतुरानन ओझा का कहना है, 'सरकार बदलने के बाद अपराध की गंभीरता की पहचान धर्म देखकर की जाने लगी है, यह लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक स्थिति है। इस प्रवृत्ति पर और हिंदू युवा वाहिनी के लोगों के कानून व्यवस्था से उपर होते जाने को अगर समय रहते नहीं रोका गया तो राज्य की स्थितियां भयावह हो जाएंगी।'