May 1, 2017

जाटों ने किया दलित बस्ती पर हमला, किसी हाथ का तोड़ा तो किसी का पैर

दलितों पर हमले  के लिए चर्चित हरियाणा फिर  एक बार सुर्ख़ियों में है. लाठी—डंडों और धारदार हथियारों से लैस 100 से ज्यादा जाट हमलावर दलितों पर टूट पड़, महिलाओं,  ल​ड़कियों के साथ की बदसलूकी।

बालू गांव  से लौटकर राजेश कापड़ो
हरियाणा के जिला कैथल के गांव बालू में मई दिवस की सुबह गुस्साए जाटों ने बाल्मीकि बस्ती पर हमला कर दिया। लाठी, डंडों व तेजधार हथियारों से लैश 100 से ज्यादा हमलावर दलित बस्ती पर टूट पड़े और बस्ती के बाहर खड़े दलित युवकों को ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। घरों के दरवाजे तोड़ डाले, जमकर पथराव किया और म​हिलाओं—लड़कियों के साथ बदसलूकी की।

हमलावर गाड़ी ही ईंट—पत्थर डालकर लाए थे। इस हमले में दर्जनभर से ज्यादा दलित युवकों को चोट लगी है। दलितों के 20-25 घरों में तोड़फोड़ की गई है। मकानों के दरवाजे तोड़ डाले। घरों से निकाल—निकालकर दलितों को पीटा गया। हमलावर एक मोटरसाईकिल भी उठा कर ले गए। 

चार-पांच दलित युवकों को कलायत सरकारी अस्पताल में स्थानीय पुलिस ने भर्ती करवाया था, जिन्हें बाद में हालत गम्भीर होने के कारण कैथल शहर के अस्पताल में रैफर कर दिया गया। हमले में घायल संजीव व संदीप दोनों का इलाज फिलहाल यहीं चल रहा है। गांव में दहशत का वातावरण व्याप्त है। लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे। कैथल में दाखिल घायलों ने बताया कि कई घायल लोग अभी भी गांव में ही हैं जो डर के मारे नहीं आ पा रहे। उन्हें भी डाक्टरी सहायता की आवश्यकता है।

क्या कहते हैं घायल

घायलों ने बताया कि हमला सुबह आठ बजे ही हो गया था, लेकिन पुलिस साढे नौ बजे गांव में पहुंची और फिर भी हमलावरों की तरफ ही बैठी रही। बड़ी मुश्किल से चार-पांच घायलों को अस्पताल में दाखिल करवाया और अभी तक कोई मुकदमा पुलिस ने दर्ज नहीं किया । एस एच ओ कलायत  से जब यह पूछा कि इस वारदात में अब तक कितने हमलावरों को गिरफ्तार किया गया है तो उनका जवाब था कि अभी तक इस घटना के संबंध में उनके पास कोई शिकायत नहीं आई है इसलिए कोई केस अभी तक दर्ज नहीं किया गया है। जबकि पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को सुबह से ही है ।

पुलिस खुद घायलों को उठाकर अस्पताल लाई थी। जिला पुलिस कप्तान के रीडर के अनुसार एक डीएसपी रैंक का अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ गांव में डटा हुआ है। रात नौ बजे तक भी कोई पुलिस अधिकारी घायलों के ब्यान दर्ज करने कैथल के सरकारी अस्पताल नहीं पहुंचा था।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि तीन महीने पहले भी दलित समाज के युवकों ने एससी/एसटी आयोग को एक लिखित शिकायत दी थी कि जाट जाति के कुछ बदमाश किस्म के लोग दलित बस्ती में आकर रौब जमाते है और दलित महिलाओं पर बूरी नियत रखते हैं । यह शिकायत पुलिस थाना कलायत ने यह कह कर वापस करवा दी कि तकनीकी आधार पर यह एक कमजोर शिकायत है । दलितों ने पुलिस के दबाव में उक्त शिकायत वापस ले ली ।

डीएसपी से मिले दलित,  सरपंच सहित 90 से ज्यादा के खिलाफ एफआई दर्ज
आज सुबह ही गांव बालू के 50 से ज्यादा दलित समाज के बुजुर्ग व नौजवान जिला मुख्यालय पर आए । 1 मई को हुई दलित उत्पीड़न की घटना में जिला पुलिस ने आज सुबह तक कोई गिरफ्रतारी नहीं की थी । दलित समाज के लोगों ने डीएसपी सतीश गौतम से मिल कर अपनी समस्या बताई । डीएसपी ने बताया कि 90 से ज्यादा लोगों के खिलाफ एस सी/एस टी अधिनियम तथा 148/149 आईपीसी आदि धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है । यह डीएसपी इस मुकदमें का जांच अधिकारी भी हैं । घायलों के बयान पुलिस ने लिख लिए है । घायल संजीव और संदीप के एक्स-रे आज सुबह ही हो पाए हैं । इनको लगी चोटों पर डाक्टरों की राय अभी नही आई है ।

सरपंच की फर्जी डिग्री से उठा विवाद
हाल ही में दो दलित युवकों संजीव व मोहन लाल ने वर्तमान सरपंच के खिलाफ एक लिखित शिकायत सीएम विन्डो के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय को दी जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सरपंच रमेश कुमार का दसवीं का प्रमाण-पत्र फर्जी है । इसकी जांच का जिम्मा जिला शिक्षा अधिकारी कैथल को सौंपा गया। जांच अभी चल रही है । 27 अप्रैल के पंजाब केसरी के स्थानीय संस्करण में इसी शिकायत के संबंध में एक समाचार छपा जिसमें सरपंच के दसवीं के प्रमाण-पत्र पर उंगली उठाई गई थी । दलित युवकों की यह हिम्मत जाट सरपंच बरदाश्त नही कर सका । इसलिए अल सुबह लाठी,डंडों व तेजधार हथियारों से लैश उन्मादी बदमासों को लेकर दलित बस्ती पर टूट पड़ा । दो गंभीर रूप से घायलों में एक शिकायत कर्ता संजीव है जिसकी दोनों बाजूओं की हड्डियां तोड़ डाली गई है । घायलों ने बताया कि हमलावर उसको मरा हुआ समझकर छोड़ कर गए हैं ।

गांव में अभी भी दहशत का माहौल
कई दलित परिवार गांव छोड़कर सुरक्षित जगहों पर चले गए हैं । दलित समुदाय के रमेश, हरिकेश पुत्र महाली तथा रामपाल पुत्र धूला राम का परिवार कल हुए हमले से भयभीत होकर गांव छोड़कर चले गए हैं । कल हुए हमले में हुए नुकसान की जानकारी भी दलित संमाज के लोगों ने दी । एक युवक नरेश ने बताया कि हमलावरों कुर्सी, मेज, दरवाजे, खिड़कियां सब कुछ तहस नहस कर दिया । रमेश पुत्र महालि राम के चौबारे की खिड़की उखाड़ दी । बलराज के घर का लोहे का मेन गेट तोड़ दिया । 6-7 साईकिल भी तोड़ डाले । बालू गांव की इस बस्ती के ज्यादातर बाल्मीकि दलित साईकिलों पर पंजाब में फेरी लगा कर बाल खरीदते हैं । इस कार्य में साईकिल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है,  इसलिए सोच समझ कर साईकिलों को निशाना बनाया गया।

जो यूनियन मजदूर विरोधी उसी की सदस्यता सबसे ज्यादा

देश की सबसे ज्यादा सदस्य संख्या वाली वह ट्रेड यूनियन है जो लगातार मजदूर हकों के खत्म होते का दशकों से तमाशा देखती रही है। 

कृपा शंकर, आंदोलनकारी 

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर सभी मजदूरों को मुबारकवाद।

आज हम मई दिवस को एक परम्परा की तरह मनाते हैं। परन्तु आज विश्वपरिस्थिति कैसी है? 

मजदूर वर्ग के लिए कार्ल मार्क्स ने नारा दिया था, 'दुनिया के मेहनतकशो एक हो। तुम्हारे पास खोने के लिए बेड़ी के अलावे कुछ नहीं है और पाने को पूरी दुनिया है।'



परन्तु आज हम क्या पाते हैं, मार्क्स के नारे को किस रूप में अमल होते देखते हैं?  

दुनियाभर के पूँजीपति इस फिराक में जुटे हैं कि पूंजी​पतियों एक हो। लूटने के लिए पूरी दुनिया को एक करो। मेहनतकशों को लड़ाओ और मेहनत कर दो जून की रोटी खाने वालों में अंधराष्ट्रवाद फैलाओ।

धनपशु जानते हैं कि मेहनतकशों की एकता और उनके जीवन की बुनियादी जरूरतों की हकबंदी से ही पूंजीपतियों की लूट का रास्ता बंद होता है। 

ऐसे हमें यह गंभीरता से सोचना चाहिए कि वह कौन सी परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से मजदूर तेजी से प्रतिक्रियावादी यूनियनों में शामिल हो रहे हैं। हालांकि ये हालात अकेले भारत के नहीं हैं। दुनिया में हर कहीं ऐसी ताकतों के पीछे मजदूर और किसान गोलबंद हो रहे हैं जो स्वयं उनकी विरोधी हैं, जो मजदूर और किसान हकों को दीमक की तरह चट कर रही हैं। 

भारत में सबसे प्रतिक्रियावादी, नग्न पूँजीवाद की पोषक, अमरीकी पूँजीवाद की चाकरी के लिये लालायित, हिन्दू ब्राह्मणिक सामंतवाद की पैरोकार आरएसएस और भाजपा के नेतृत्व वाली ट्रेड यूनियन 'भारतीय मजदूर संघ' की सदस्य संख्या सबसे ज्यादा है। 

भारतीय मजदूर संघ जैसी ट्रेड यूनियनें मेहनतकशों के ऊपर दमन बढ़ने पर कुछ कवायदें कर चुप्पी मार जाती हैं। उनकी ही सरकारें मजदूर विरोधी नीतियां ला रही हैं और वह तमाशा देख रही हैं। ये ट्रेन यूनियनें खुलेतौर पर पूँजीवाद का हित पोषण कर रही हैं, मेहनतकशों को आपस मे बांटकर लड़ा रही है, जनता में युद्धोउन्माद फैला रही हैं, फिर भी मेहनतकश इनकी ही शरण में मुक्ति का रास्ता तलाश रहा है, आखिर ऐसा क्यों है?

आज मेहनतकशों की एकता को शोषक वर्ग तोड़ने में सफल क्यों हो रहा है? 

जाहिर है हमारी फूट, हमारा बिखराव और हमारा हो असंगगित हो संघर्षों की अगुवाई करना पूंजीपतियों की ताकत बनता जा रहा है। इसलिए मई दिवस पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि अपने बीच के भेदों को मित्रवत हल करते हुए शासकवर्ग के अंधराष्ट्रवादी बटवारे में नहीं फंसना है। ब्राह्मणवादी जातिभेद से पीड़ित सभी तबकों,  अल्पसंख्यकों, मजदूर किसान वर्गों, महिलाओं और बुद्धिजीवी समुदायों की एकता पर बल देना है। 
नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।

Apr 30, 2017

एकजुट होंगे तो ही रूकेगा शोषण का पहिया

मई दिवस पर विशेष 

मई दिवस मजदूर आंदोलन की वो विरासत है जो मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बताता है, नये संघर्ष की प्रेरणा देता है। 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों ने जो लड़ाई लड़ी वो किसी खास प्लांट या मजदूरों के किसी खास हिस्से की मांग को लेकर नहीं अपितु दुनिया के सभी मजदूरों के लिए थी यानी मजदूर वर्ग के लिए।



सुमित

आठ घंटे काम की मांग मई दिवस के संघर्षों से उभरकर सामने आयी थी और आज 129 सालों बाद ये अधिकार इस मौजूदा पीढ़ी से पूँजीपतियों ने छीन लिया है। 4 मई 1886 यानी मई दिवस की घटना के पीछे सतत संघर्ष मौजूद था जिसने मालिकों और उनकी दलाल सरकारों के तमाम षडयंत्र और दमन-शोषण का मुँह तोड़ जवाब देते हुए हार मानने से लगातार इंकार किया था।

मई दिवस तथाकथित न्यायपालिका का मजदूर विरोधी चरित्र उजागर करता है। आठ घण्टे काम की मांग करने पर मई दिवस के शहीदों को जिस प्रकार पूँजीपतियों के षड़यंत्र के मुताबिक अदालत ने फांसी की सजा सुनाई आज ठीक उसी प्रकार यूनियन बनाने की मांग करने पर मारुति के 13 मजदूरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। एक बार फिर मालिकों ने मजदूरों को डराने के लिए अदालत का इस्तेमाल करते हुए ये बताना चाहा कि अगर मजदूर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने आगे आएंगे तो फांसी और उम्रकैद के जरिए उन्हें और उनके आंदोलन को कुचल दिया जाएगा।

बदलाव के नये रूप
तमाम उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए आज पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में लगातार बदलाव हो रहा है। इसी के साथ शोषण की प्रक्रिया में अलग-अलग बदलाव हुए हैं। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था ने जहाँ मुनाफे की रफ्तार तेज कर दी है, वहीं सामाजिक बंटवारे को तीखा कर दिया है। दूसरी तरफ राजकीय नियंत्राण को घटा कर निजीकरण को खुला रूप दे दिया है।

उदारीकरण के पिछले तीस साल में उत्पादन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ढांचागत बदलाव हुआ है। वे उच्च तकनीक से थोड़े से स्थाई और भारी पैमाने पर ठेका, ट्रेनी, स्किल डेवलपमेण्ट आधारित कम वेतन और कभी भी निकालने के अधिकार के साथ उत्पादन व भारी मुनाफा बटोरने में जुटे हैं। आज मज़दूर  स्थाई-ठेका-ट्रेनी, मुख्य प्लाण्ट, वैण्डर, सब वैण्डर जैसे बहु संस्तरों में बंटा-बिखरा है।

अधिकारों को छीनने का दौर
मई दिवस की परम्परा में लम्बे संघर्षों के दौर में हासिल सीमित कानूनी अधिकारों को छीनने का यह दौर है। मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से ही इसे तेज कर दिया। एक-एक कर कानूनों को मालिकों के हित में बदलना उसका प्रमुख एजेण्डा है। जिसके मूल में है हायर एण्ड फायर, यानी जब चाहो काम पर रखो, जब चाहो निकाल दो। कम से कम वेतन पर ज्यादा से ज्यादा खटाओ।

नस्ल-धर्म आधरित बंटवारे तेज
आज पूरी दुनिया में मेहनतकश आवाम पर धर्म, नस्ल व जाति के आधार पर बंटवारे जुनूनी हद तक तेज हो गये हैं। पूरी दुनिया में नस्लवादी, फासीवादी मजदूर विरोधी ताकतें जाति और धर्म की पहचान को उभारकर जनता को घृणा और उन्माद के जरिए लामबंद कर सत्ता में आ रही हैं। देश के भीतर जातीय व मजहबी हमले और बंटवारे बेहद तीखे हो गये हैं। इसी के साथ, वाट्सऐप, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया झूठ और भ्रम फैलाने के महत्वपूर्ण उपकरण बन गये हैं।

मुनाफाखोरों की चालों को पहचानो
यह मालिकों के मुनाफे को कायम रखने के लिए मजदूरों का शोषण बढ़ाने का मामला है। इनके खिलाफ मजदूरों को ठेका, स्थायी, कैजुअल के बंटवारे की दीवार को तोड़कर व्यापक एकता बनानी होगी - जाति और धर्म की पहचान से परे समान काम समान वेतन, सम्मानजनक वेतन व ठेका प्रथा के खात्मे जैसी तत्कालिक मांगों को लेकर ना सिर्फ प्लांट स्तर पर बल्कि इलाका स्तर पर एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। इन संघर्षो का नेतृत्व भी खुद मजदूरों को करना होगा और जिस तरह संघर्ष आगे बढ़ेगे नेतृत्व करने वाले मजदूर भी निकलकर आएंगे। लेकिन मौजूदा भ्रमपूर्ण स्थिति में मज़दूरों के सामने वैचारिक स्थिति भी साफ करना होगा। मई दिवस की विरासत हमें बताती है कि जब तक उत्पादन और राज-काज पर मेहनतकश वर्ग का नियंत्रण नहीं होगा, तब तक मज़दूरों की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए मज़दूरों को अपने तात्कालिक माँगों के साथ अपनी मुक्ति के दीर्घकालिक मुद्दों पर भी सतत संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

नयी राह पर आगे बढ़ना होगा!
ऐसे में मई दिवस का रास्ता मजदूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई में ऐसा प्रेरणा स्रोत है जिसे हमें लगातार अपने सामने रखकर मजदूरों को संगठित करना होगा। आज वो दौर नहीं है कि लगातार बड़ी बड़ी हड़ताले हो रही हैं और मजदूर खूद अपनी पहलकदमी से मालिकों को, उत्पादन को चुनौती दे रहा है। स्थिति ठीक विपरीत है। आज के हालात में मजदूर आन्दोलन बिखरा हुआ है और लगातार पीछे जा रहा है। हालांकि बढ़ते शोषण के खिलाफ लगातार उठते स्वतःस्पफूर्त आन्दोलन प्रतिरोध की स्थितियां भी बयां कर रहे हैं।

इन्हीं मौजूदा चुनौतियों के बीच मई दिवस पर ये सवाल उपस्थित है कि मज़दूर आन्दोलन को नयी राह पर आगे कैसे बढ़ाया जाये?
                                                                (‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका से)

Apr 29, 2017

योगेंद्र यादव ने की एक स्कूल की ग्राउंड रिपोर्टिंग

आपने कभी किसी नेता को ऐसा करते नहीं देखा होगा। आप ऐसा वीडियो पहली बार देख रहे हैं जब कोई नेता देश ​की किसी समस्या को लेकर रिपोर्टिंग कर रहा है। हरियाणा के मेवात से स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र ने एक स्कूल में पढाई लिखाई का जायजा लिया फिर एक रिपोर्टर की तरह स्कूल की एक—एक  मुश्किलों से देश को अवगत कराया।


आप भी देखिये 'रिपोर्टर' योगेंद्र यादव की ग्राउंड रिपोर्टिंग





हार के बाद कार्यकर्ताओं में हीरो बनकर उभरे कुमार विश्वास

कुमार के इस तरह के इंटरव्यू देखकर वालंटियर्स का गुस्सा ठंडा हो जाता है। उन्हें लगने लगता है अभी भी उनकी पार्टी में शुचिता बची है। अभी पार्टी नहीं आंदोलन है आप। अभी आप को नहीं छोड़ना चाहिए.....

दिल्ली से भूपेंदर चौधरी की रिपोर्ट


आप मुखिया अरविंद केजरीवाल द्वारा पार्टी में हाशिए पर डाले गए कवि कुमार विश्वाश आम आदमी पार्टी के भीतर कूटनीतिक राजनीति में माहिर होते जा रहे हैं। पंजाब, गोवा और दिल्ली एमसीडी चुनाव के बाद कार्यकर्ताओं का उन पर भरोसा बढ़ता जा रहा है। 

दिल्ली एमसीडी चुनाव में मिली आम आदमी पार्टी को मिली अकल्पनीय हार के बाद सभी मीडिया घराने इस आस में बैठे थे कि पहले से ही पार्टी में हाशिए पर पड़े कुमार विश्वास अब तो पक्के तौर पर पार्टी छोड़ देंगे। पर हार के बाद कुमार विश्वास पार्टी के भीतर बिल्कुल नए अवतार में उभरे हैं।

कल शाम जब वह एक सनसनीखेज छवि वाले टीवी चैनल को साक्षात्कार दे रहे थे तो सभी पत्रकारों को यही आस थी कि आप में फूट ही आज की सबसे बड़ी खबर होगी। पर कीबोर्ड पर बैठे डेस्क पत्रकारिता के माहिरों को निराशा हाथ लगी। और इसके उलट कुमार विश्वास फिर एक बार पार्टी कार्यकर्ताओं में नया विश्वास कायम करने में कामयाब हुए। हालांकि अरविंद केजरीवाल पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं, मगर विश्वास कार्यकर्ताओं की पहली पसंद बन गए हैं।

गौरतलब है कि लगातार तीसरी हार पंजाब, गोवा और अब दिल्ली एमसीडी में मिली करारी शिकस्त के बाद कार्यकर्ता बेहद निराश, हताश और राजनीतिक संबल खो देने की स्थिति में पड़े हुए थे। ऐसे में कुमार कार्यकर्ताओं में एकता के प्रतीक बनकर उभरे हैं। कार्यकर्ता स्वीकार कर रहे हैं कि जब भी पार्टी पर संकट आता है, जब भी पार्टी हारती है तो कुमार पार्टी से अलग लाइन लेकर कार्यकर्ताओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। 

दरअसल कुमार की सारी कवायद पार्टी के वालंटियर्स को जोड़े रखने की है। पार्टी से जुड़े वालंटियर्स अक्सर अपने बड़े नेताओं के फैसले से नाराज़ लगते हैं और मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल उनको शह देने का काम करते हैं। ऐसे में कुमार पार्टी के पालनहार—खेवनहार बनकर प्रकट हो जाते हैं। 

कुमार का एमसीडी से पहले आया वीडियो हो या कल उनका टीवी पर चल रहे इंटरव्यू को देखकर विपक्षी दल ये सोचकर खुश हुए जा रहे थे कि पार्टी में फूट पड़ रही है, पर उन्हें ये समझ नहीं आ रहा कि कुमार की इस पार्टी विरोधी दिखती लाइन से पार्टी का वालंटियर्स अपने को कुमार से कनेक्ट देखता है। कुमार की बात को अपनी बात समझता है, क्योंकि कुमार पार्टी के वालंटियर्स की नब्ज पकड़ते हैं। 

कुमार की खरी—खरी बातें सुनकर पार्टी के वालंटियर्स राहत महसूस करते हैं कि कोई तो है जो उनकी बोली बोलता है। जो वो बोलना चाहते हैं वो कुमार विश्वास बोल रहे हैं। कुमार को पार्टी के अधिकतर वालंटियर्स भैया ही कहकर संबोधित करते हैं। 

कुमार के इस तरह के इंटरव्यू देखकर वालंटियर्स का गुस्सा ठंडा हो जाता है। उन्हें लगने लगता है अभी भी उनकी पार्टी में शुचिता बची है। अभी पार्टी नही आंदोलन है आप। अभी आप को नहीं छोड़ना चाहिए। 

इस तरह पार्टी के खिलाफ बोलकर कुमार पार्टी को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसकी नींव को मजबूत ही करते हैं क्योंकि पार्टी की नींव उसके वालंटियर्स ही हैं। इस बात को पार्टी के सूत्र भी बताते हैं कि एक तरफ कुमार वीडियो निकाल कर पार्टी और पार्टी के बड़े नेता अरविंद पर हमला करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुमार अरविंद के घर में बैठ कर चाय पीते हैं। 

जो चैनल चला रहे हैं कि कुमार आप मुखिया केजरीवाल का संयोजक पद ​छीनने का सपना देख रहे हैं, वो शायद ये भूल गए कि कुमार अपनी कविता का बिज़नेस छोड़कर  इस तरह पार्टी मे नहीं आ रहे। 

कुमार खुलेआम बोलते भी आये हैं कि वो बिज़नेस क्लास से चलते हैं। ऐशो आराम से रहते है  और ऐशो आराम नहीं छोड़ना चाहते। ऐसे में उनके पार्टी संयोजक बनने की खबर निराधार है।

पिछड़ी जाति के पत्रकार पर बरसा योगी की पुलिस का प्रेम

सत्ता बदली है पर यूपी पुलिस नहीं। योगी की घोषणाएं बस जुबानी तीर साबित हो रही हैं और हकीकत में पुलिस अपने उसी रंग में  है, जिसको भाजपा गुंडाराज कहते नहीं अघाती थी...

आस मोहम्मद कैफ की रिपोर्ट  


विजय वर्मा पुलिसवालों से कहता रहा कि वह पत्रकार है, मगर पुलिस वालों ने उनकी एक न सुनी। उन्हें खंभे से बांधकर बुरी तरह पीटा गया। इस बात की भनक जब नुमायश ग्राउंड में मौजूद कुछ पत्रकारों को लगी तो वो ​अस्थायी चौकी में पहुंचे और इस घटना का विरोध किया। काफी कहासुनी के बाद देर रात विजय वर्मा को छोड़ा गया। 

28 अप्रैल की सुबह जब इस बात की जानकारी जब पत्रकारों को हुई तो उन्होंने पीड़ित पत्रकार विजय वर्मा के साथ उच्चाधिकारियों से भेंट की। पीड़ित ने अपने कपड़े उतारकर चूतड़ और पीठ पर पुलिसिया बर्बरता के निशान दिखाये। घटना की तहरीर मुकदमे के रूप में दर्ज करने के लिए जब पत्रकार कोतवाली नगर गए तो वहां मौजूद अफसर सुलह-समझौते की बात करने लगे मगर पत्रकारों ने भी इसको सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा विषय बताकर किसी भी कीमत पर समझौता करने से मना कर दिया। 

उच्चाधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद किसी तरह अपराध सं0-594/17 के अंतर्गत धारा- 147, 323, 504 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज हुआ। मुकदमा दर्ज होते ही आरोपी दरोगा यदुवीर सिंह यादव और पांच सिपाहियों को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने तत्काल प्रभाव से निलम्बित कर दिया। 

घटना की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी दी गयी और मानवाधिकार आयोग को भी अवगत कराया गया है। पीड़ित पत्रकार विजय वर्मा पिछड़ी जाति के हैं. वे हिन्दी-अंग्रेजी और लखनऊ-आगरा से प्रकाशित आधा दर्जन अखबारों के स्थानीय स्तर पर स्टाफ रिपोर्टर रहे हैं और साप्ताहिक रहस्य संदेश के जिला प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त हैं।

किसान पहलू खान के घरवालों को आज भेंट में दी जाएगी गाय

हरियाणा में सक्रिय सद्भावना मंच एक ऐतिहासिक पहल लेने जा रहा है। राजस्थान के अलवर में गौरक्षक गुंडों द्वारा मारे गए किसान और दूध का व्यवसाय करने वाले पहलू खान के परिजनों को मंच आज गाय भेंट करेगा।


गौरक्षक गुंडों द्वारा की गयी हिंसा के विरोध में और सामाजिक सद्भाव बरकरार रखने के इस सकारात्मक पहल में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेन्द्र यादव भी शामिल होंगे। मंच की ओर से यह जानकारी सुरेंद्र पाल सिंह ने दी। 

सुरेंद्र पाल सिंह ने बताया कि पिछले वर्ष हरियाणा राज्य में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान घटित हिंसा और आगज़नी की घटनाओं और 35 बनाम 1 बिरादरी के नाम पर समाज में जातिगत ध्रुवीकरण के विभाजनकारी जहरीले प्रचार के खिलाफ गठित सद्भावना मंच ने ना केवल राज्य भर में सामाजिक ताने बाने को बचाए रखने के पक्ष में सद्भावना यात्रा निकाली बल्कि प्रबुद्ध भूतपूर्व आई ए एस, आई पी एस, आई एफ एस, प्रोफ़ेसर और वकीलों को मिला कर एक जन आयोग का गठन करके तमाम प्रभावित इलाकों में जन सुनवाई भी की। 

अभी हाल ही में राजस्थान के अलवर जिले में गौरक्षा के नाम पर नफ़रत और हिंसा फैलाने की साजिश के तहत हरियाणा के एक किसान पहलू खान को इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया कि वो मुसलमान था।

एक बड़ा सवाल आज हमारे सामने मुँह बाए खड़ा है कि गौरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ हिंसा और नफ़रत फैलाने वाले स्वयम्भू ठेकेदारों को क्या हिंदुत्व के नाम पर कुछ भी करने की खुली छूट मिल गई है? 

तय कार्यक्रम के मुताबिक सद्भावना मंच के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता हिंसा के शिकार मृतक पहलू खान के घर जाकर उसके परिवार को गौ पालन और दूध के काम काज के लिए आपस में इकट्ठी गई धन राशि से खरीद कर एक गाय भेंट करेंगे। ये गतिविधि मुख्यतः एकता और प्रेम के प्रतीक के तौर पर होगी ताकि सामाजिक ताने बाने को जोड़ने वाले एक रचनात्मक परम्परा को मजबूत किया जा सके।

Apr 28, 2017

सरकारी दिवसों के बूते न पुस्‍तकें बचेंगी, न भारतीय भाषाएं

बिखरती पुस्‍तकों की दुनिया

जिस हिन्‍दी के गाने, संगीत, शब्‍द हर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दुनियाभर के लोगों का मन मोह लेते  हों, घर—बाहर, बाजार, केरल से लेकर आसाम, अरुणाचल, कश्‍मीर तक जिस भाषा के बूते लोग जुड़ते हों, वह सरकारी दरवाजों पर पहुंचते ही भिखारी, दयनीय बना दी जाती है... 

प्रेमपाल शर्मा


23 अप्रैल दुनियाभर में पुस्‍तक दिवस के रूप में घोषित है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की विश्‍व संस्‍था ने सारी दुनिया में किताबों की महत्‍ता को मानते हुए एक दिन किताबों के लिए रखा है जिससे दुनियाभर के नागरिक किताबों के महत्‍व को समझ सकें। पढ़े, लिखें और उसमें अपना योगदान करें। पुस्‍तक दिवस में कापी राइट आदि भी शामिल है। 

दुनियाभर के मनीषियों के इन कदमों का मानव जाति की सुख समृद्धि शांति के लिए बडे़ दूरगामी प्रभाव हैं। अपनी अपनी मातृभाओं के लिए 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस, योग दिवस, जल, वातावरण जैसे कई दिवस इसीलिए मनाए जाते हैं।

संयुक्‍त राष्ट्र के चार्टर से बंधे होने के कारण मनाते तो हम भी हैं, कई संस्‍थान, सरकारें आयोजन भी करती हैं लेकिन यह एक रीति से ऊपर क्‍यों नहीं उठ पाता? किताबों की महत्‍ता जितनी भारत जैसे अविकसित, अर्धशिक्षित देश के लिए है उतनी तो अमेरिका, यूरोप की भी नहीं। कहने की जरूरत नहीं शिक्षा, ज्ञान को जन जन तक पुस्‍तकें तो ही पहुंचायेंगी। यह तो सभ्‍यता का वाहन है। इसलिए पुस्‍तकों की दुनिया का सबसे बड़ा आविष्‍कार कहा जाता है। क्‍या रामायण, कुरान, बाईबिल आज जिंदा रह पाते यदि इन्‍हें पुस्‍तकों के रूप में संरक्षित नहीं किया होता? 

हमारी भारतीय मनीषा, ग्रंथ भी बार बार पुस्‍तकों, विद्या को पूज्‍य रूप में स्‍वीकार करते हैं। कई त्‍यौहारों पर्व पर पुस्‍तकों को पूजा भी जाता है लेकिन मौजूदा समाज क्‍या वाकई उनके महत्‍व को समझ पा रहा है? मैं एक–दो उदाहरणों से बात को रखूंगा। 

फरवरी मार्च के महीने ज्‍यादातर विश्‍वविद्यालयों, सरकारी संस्‍थानों में कुछ-कुछ बजट को ठिकाने लगाने, कुछ अकादमिक सरगर्मी के होते हैं। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के एक कॉलिज में शिक्षा संस्‍कृति के आसपास के विषय का सेमिनार था। अच्‍छी बात यह भी कि उन दिनों पूरा कॉलिज सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों, नाटक, नृत्‍य, पेन्टिग्‍स, कविता, भांगड़ा से लेकर खेल के कार्यक्रमों में तरबतर था। 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस था। मैंने सुझाव दिया कि अच्‍छा हो अपनी भाषा- हिन्‍दी पंजावी-उर्दू की किताबों का एक स्‍टॉल भी लगा दिया जाए और उसकी महत्‍ता भी बताई जाए। यूएन का घोषित दिवस है अच्‍छी तरह मनाया जा सकता है। 

विशेषकर जब कॉलिज में हजार-पांच सौ विद्यार्थी हों तो और भी बड़ी बात है वरना आजकल ऐसे दिवस मनाने के लिए राजभाषा सप्‍ताह की तरह लोगों को पकड़—पकड़कर लालच देकर शामिल किया जाता है। प्राचार्य हिन्‍दी की थीं उन्‍होंने लगभग अनसुना कर दिया। फिर समझाया तो बोली जो प्रकाशक किताबें लगायेगा, यहां बेचेगा वो हमारे लिए क्‍या करेगा-बदले में। 

इस सौदेबाजी से कोई भी चौंक सकता है। उन्‍होंने खुद ही कहा-वे हमारे बच्‍चों के आई कार्ड बनवा दें या कोई और मदद कर दें तो किताबों की स्‍टॉल लगा सकते हैं। मुझे कहना पड़ा कि मेरा कोई प्रकाशक जानने वाला नहीं है आप जिसे चाहे बुलायें। मैं तो बस मातृभाषा की सार्थकता के बारे में कह रहा हूं। आखिर मातृभाषा दिवस यूं ही चला गया। 

ऐसा ही एक अनुभव एक मंत्रालय का। कुछ वर्ष पहले सोचा कि पुस्‍तक दिवस पर कुछ अच्‍छी किताबें कर्मचारियों को दी जाएं। राजभाषा विभाग तुरंत तैयार, लेकिन जब बांटते वक्‍त किताबों का बंडल खोला तो न उसमें प्रेमचंद थे न टैगौर न, गांधी, नेहरू। कुछ कुंजीनुमा किताबें उन्‍होंने अपने किसी कमीशन के तहत मंगा ली थी। 

सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं रोजाना की जिंदगी में यानि की वही पुराना जुमला-आप घोड़े को तालाब के किनारे खींच तक ला सकते हो, पानी नहीं पिला सकते। यू एन घोषित करे या भारत सरकार, हमारे सारे दिवसों की यही नियति बन चुकी है। जरूरत है तो समाज को चेताने की कि किताबें क्‍यों जरूरी हैं? क्‍यों शिक्षा में सिर्फ पाठयक्रम की चंद किताबों से काम नहीं चलने वाला? 

हर मां-बाप और शिक्षक को किताबों का महत्‍व बताने की जरूरत है। पुस्‍तकालय को समृद्ध करने की कि इनके बिना शिक्षा ज्ञान के किनारों तक भी नहीं पहुंच सकते। लेकिन सबसे मुश्किल यही काम है। विशेषकर पढ़े लिखे मध्‍यम वर्ग को समझाना क्‍योंकि उन्‍हें भ्रम है कि वे सब समझते हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइस्‍टाइन ने इन्‍हीं को इशारा करके कहा है कि किसी भी नए ज्ञान की वाधा ऐसे ही लोगों का पूर्व ज्ञान और अभिमान है।


पुस्‍तक दिवस के बहाने बार बार इसी भूमिका को पहचानने, जानने और परखने की जरूरत है। लेकिन वक्‍त के साथ बदलने की जरूरत भी है। अब केवल पिछले पांच सात सौ साल से चली आ रही जिल्‍द को ही पुस्‍तक न माना जाए। अब उसके अनेकों रूप हैं। कम्‍पयूटर पर, किंडल पर। नाम पुस्‍तक ही है। प्रयोजन भी वही तो सिर्फ कागज पर छपी पुस्‍तक हठ का  क्‍यों?दुनिया भर में इस नए रूप का स्‍वागत हो रहा है। इसी उपयोगिता के कारण एक मुटठी में बंद उपकरण और उसमें चार-छ: सौ किताबें। अनेकों भाषाओं की। 

आप विदेश यात्रा पर हैं या पहाड़ की सैर या किसी सेमिनार में इतना बोझ न लाद सकते, न जरूरत। पूरी नयी पीढी़ इसका आनंद ले रही है। कभी हाथ से लिखी किताब होती थी, फिर छपाई शुरू हुई। हर रूप में किताब ने दुनिया को बदला है। वस एक ही शर्त कि किताबों के बिना काम नहीं चलने वाला और पश्चिमी सभ्यता ने इसे समझ लिया है। अब बारी हमारे जैसे पूर्व उपनिवेश देशों की है।

इसी से एक बड़ा प्रश्‍न और जन्‍म लेता है। कौन सी किताबें? किस भाषा में? किस विषय की। यहां सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष अपनी भाषा का है। शिक्षा का बुनियादी शब्‍द। पढ़ने का जो आनंद अपनी भाषा में होता है वह परायी में नहीं। इसलिए विदेशी भाषा यदि जरूरत हो तो हम सीखें, सिखायें लेकिन मातृभाषा की कीमत पर नहीं। दुर्भाग्‍य से हिन्‍दुस्‍तान जैसे पूर्व गुलाम देशों में आज यही हो रहा है और इसलिए पूरी नयी पीढ़ी किताबों से दूर भाग रही है। हर स्‍कूल, कॉलिज में बच्‍चों, छात्रों पर अंग्रेजी माध्‍यम लाद दिया गया है। लादने की यह प्रक्रिया पिछले 20 वर्षों में शिक्षा के निजीकरण और ग्‍लोलाइजेशन की आड़ में और तेज हुई है और उसी अनुपात में पुस्‍तक पढ़ने की संस्‍कृति में कमी आई है।

हमारे लोकतंत्र में कुछ शासक भी पिछले दिनों ऐसे आये जो आक्‍सफोर्ड, केंब्रिज, वाशिंगटन को ज्‍यादा जानते हैं बजाए इस देश, उसकी भाषा, संस्‍कृति को। इसलिए जब तक अंग्रेजी एक विषय के रूप में छठी के बाद पढ़ाई जाती रही नुकसान नहीं हुआ। माध्‍यम बनाने से शिक्षा भी चौपट हुई, किताबें पढ़ने की रूचि, अभिरूचि भी। बच्‍चे रटते जरूर हैं लेकिन किताबों की तरफ उस आनंद से नहीं देखते जैसा हम सब ने अपने अपने बचपन में प्रेमचंद, रवीन्‍द्र, गोर्की को अपनी अपनी भाषाओं में सारी दोपहरी फिर सूरज छिपने तक या फिर ढिबरी, लालटेन जलाकर पढ़ा था। किताबों की इसी दुनिया ने पूरी दुनिया को हमें इतना मोहक दिखाया, बनाया।

किताबों की संस्‍कृति बढ़ाने के लिए इस बुनियाद पर काम करने की जरूरत है। यह कोई नयी बात नहीं है। आजा़दी के बाद देश के सभी कर्णधारों में अपनी अपनी भाषा, संस्‍कृतियों के लिए यह भावना थी और उसके विकास, संवर्धन के लिए प्रयास भी किए गए। 1964- 1966 में गठित कोठारी आयोग और भारतीय भाषाओं के पक्ष में उनकी सिफारिशों इसी दिशा में बढ़ाने का प्रयास था। समान शिक्षा और अपनी भाषाओं में। 

वर्ष 1968 में संसद ने भी माना इन सिफारिशों को।फिर उल्‍टा क्‍यों हुआ?  बहुलता वाद, बहु भाषावाद के ऊपर अकेली अंग्रेजी क्‍यों हावी होती गयी? कौन सी पार्टी सत्ता में थी? इन सब कारणों से जहां हिन्‍दी के बड़े बड़े पत्र धर्मयुग, दिनमान डूबते गए, बडे़ बड़े लेखक भी सिकुड़ कर तीन सौ के संस्‍करणों तक आ गए। जब अपनी भाषा की किताबें बिकेंगी ही नहीं तो लिखेगा भी कोई क्‍यों? सामाजिक विषयों की किताबें अपनी भाषा में दरिद्रता का एकमात्र यही कारण है। 

इतिहास के पन्‍ने पलटकर देखने पर यह संतोष होता है कि आज़ादी के वक्‍त लगभग हर भारतीय भाषा का साहित्‍य ज्‍यादा समर्थ पठनीय था। जाने माने समाज शास्‍त्री, लेखक, इतिहासकार पार्थो चटर्जी ने एक लेख में लिखा है कि उन्‍नीसवी सदी के अंत में बंगला में समाज विज्ञान, विज्ञान की किताबें मूल बंगला में पहले लिखी गयी हैं, उनका अंग्रेजी में अनुवाद बाद में हुआ और इसके पीछे कोई सरकारी प्रश्रय संरक्षण नहीं था। सब निजी प्रयास थे। ज्ञान को फैलाने की तमन्‍ना थी। कुछ कुछ यही अनुभव हिन्‍दी का है। नागरी प्रचारणी, महावीर प्रसाद द्विवेदी,  प्रेमचंद, रामचंद शुक्‍ल प्रमृति विद्वानों ने अपने अपने बूते भाषा पुस्‍तकों की दुनिया को समृद्ध किया है।

सबक यह भी कि केवल सरकारी आयोजन, ग्रांट, वजीफे से ही संस्‍कृति के स्रोत जिंदा नहीं रहते । कई बार तो बर्बाद ही करते हैं। ऐसा नहीं कि सरकार या स्‍कूल इस गिरावट से अनभिज्ञ हैं। इसे चाहे यूएन के आदेशों का पालन कहिए या दुनियाभर के शिक्षाविदों की बातें, आग्रह कि लाइब्रेरी, पठन—पाठन की दुनिया को बढ़ावा दिए बिना वांछित अकादमिक स्‍तर तक नहीं पहुंचा जा सकता। 

कुछ वर्ष पहले संभवत: एनसीईआरटी या माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड की पहल पर केन्‍द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने कुछ पहल भी की थी जिसमें देशभर में  6000 पुस्‍तकालय खोलना आदि भी शामिल था। सीबीएसई के स्‍कूलों में पाठयक्रम में भी साहित्‍य की किताबें –प्रेमचंद, मंटो, रवीन्‍द्र शेक्‍सपियर को पढ़ने  की छूट दी थी ओर उसका आकलन यानि नंबर भी। बड़ज्ञ अच्‍छा लगा जानकर लेकिन स्‍कूलों में वह कभी उस रूप में लागू नहीं हुआ। कुछ स्‍कूलों ने इसी आड़ में अंग्रेजी की कुछ और नीरस किताबें बच्‍चों को थमा दीं। पैसे भी कमाए। लेकिन बच्‍चों ने उन्‍हें नहीं पढ़ा। 

गलती स्‍कूलों की भी उतनी नहीं है जितनी अंग्रेजी की तरफ लालच से देखते अभिभावकों की। वे खुद अंग्रेजी की किताबों की मांग करते हैं। अंग्रेजी ठीक करने का ऐस दौरा पड़ा हुआ है कि मैट्रो, एयरपोर्ट, रेलवे स्‍टेशन पर न हिन्‍दी की किताबें दिखती न कोई पढ़ता हुआ। क्‍या अस्‍सी के आसपास हमें गुलशन नंदा, इब्‍ने सफी कोई पढ़ने देता था? लेकिन आज ऐसी ही प्रेमकथा की किताब हॉफ गर्ल फ्रेंड-चेतन भगत मां बाप बच्‍चों को खरीद कर पढ़ने के लिए इसलिए ला रहे हैं कि अंग्रेजी तो ठीक हो जाए। सारी नैतिकता चली गई चूल्‍हे में। इसलिए पुस्‍तक संस्‍कृति पर बात करते हुए भाषा के इस प्रश्‍न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अब जिस पीढी़ ने पहली क्‍लास से कॉलिज, इंजीनियरिंग कॉलिज, मेडिकल, लॉ या किसी भी पाठयक्रम में अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाई की है अपनी अंग्रेजी को विदेशी विश्‍वविद्यालयों में दाखिले की खातिर, अंग्रेजी नावेल, फिल्‍में, सेमिनार सुन सुनकर मांजा है, उसे क्‍या भारतीय संस्‍कृति, अपनी भाषा, संस्‍कृत की विरासत के एकाध इंजेक्‍शन से बदला जा सकता है? यह सूखे पेड़ की पत्तियों पर पानी छिड़कने से ज्‍यादा नहीं है। पानी की जरूरत जमीन और उनकी जड़ों को है और यह जड़ है स्‍कूली, माध्‍यमिक और उच्‍च शिक्षा में अपनी भाषा। अंग्रेजी या दूसरी भाषाएं भी हों, लेकिन उच्‍च शिक्षा में पहुंचने पर। उससे पहले नहीं।

आश्‍चर्य की बात है कि जिस हिन्‍दी के गाने, संगीत, शब्‍द हर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दुनियाभर के लोगों का मन मोह लेते  हों, घर बाहर बाजार केरल से लेकर आसाम, अरूणाचल, कश्‍मीर तक जिस भाषा के बूते लोग जुड़ते हों, वह भाषा सरकारी दरवाजों पर पहुंचते ही कैसे भिखारी, दयनीय बना दी जाती है। संकेत साफ है- सरकारी दिवसों के बूते न पुस्‍तकें बच सकती, न भारतीय भाषाएं। 

मंडी हाउस के मैट्रो के अंदर आक्‍सफोर्ड बुक्‍स ने लगभग बीस किताबों के सुदंर विज्ञापन लगा रखे हैं। सभी अंग्रेजी में। लेकिन कई उनमें से हिन्‍दी, बांगला, मलयालम की किताबों के अनुवाद भी हैं। अच्‍छा संकेत है पुस्‍तकों को पढ़ने को प्रेरित करने का लेकिन क्‍या हिन्‍दी का भी कोई प्रकाशक या लेखक ऐसा करने की पहल करेगा?  

ऐसा नहीं कि भारतीय भाषाओं में  अच्‍छा नहीं लिखा जा रहा, कारण वे सब हैं जो पूरी शिक्षा संस्‍कृति और सरकार पर हावी है। पुस्‍तक संस्‍कृति को यदि बदलना है तो लेखक, प्रकाशक, अभिभावक, शिक्षक सभी को अपनी अपनी भूमिकाओं पर पुर्नविचार करना होगा।