Apr 15, 2017

कश्मीरियों की जान ले सकती हैं बंदूकें पर उनका दिल नहीं जीत सकतीं

श्रीनगर के हालातों पर सुनील कुमार की रिपोर्ट

जिस तरह एक कश्मीरी नौजवान को सुरक्षाबल गाड़ी के बोनट पर बांध कर घुमा रहे हैं उससे साफ है कि सरकार श्रीनगर के 7 फीसदी वोट से अभी चेती नहीं। ऐसे में सवाल यह है कि वहां के किशारों में भारत के प्रति नफरत भरने का काम सरकार खुद क्यों कर रही है? 



यह सवाल श्रीनगर में हुए उपचुनाव के बाद और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इतना कम वोट तो उस समय भी नहीं पड़ा था जब वहां आतंकवादी गतिविधियां चरम पर थीं और अतिवादियों का जमीनी स्तर पर जनता के बीच व्यापक असर था।

कश्मीर घाटी में दो लोकसभा सीटों श्रीनगर और अनंतनाग पर उपचुनाव होना था। एक सीट महबूबा मुफ्ती के अनंतनाग सीट पर इस्तीफा देने से खाली हुई थी और दूसरी श्रीनगर बड़गाम लोकसभा की थी। श्रीनगर की सीट इसलिए खाली हुई कि सांसद तारिक हामिद कारा ने अपनी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और संसद सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इस्तीफा पार्टी के जनविरोधी नीतियों से तंग आकर दिया था। 

श्रीनगर लोकसभा सीट पर 9 अप्रैल को चुनाव हुआ तथा अनंतनाग सीट पर 12 अप्रैल को चुनाव होना था। यह चुनाव इसलिए महत्वूपर्ण था कि राज्य में संयुक्त मोर्चे की सरकार को ढाई साल हो चुके हैं और कश्मीर घाटी में होने वाले प्रदर्शनों के बाद पहला चुनाव था।

एक तरह से कश्मीरी जनता और सरकार दोनों के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी। कश्मीर में हो रहे प्रदर्शन को भारत सरकार कहती थी अलगाववादियों द्वारा राज्य में पैसे बांट कर प्रदर्शन कराये जा रहे हैं। यहां तक की नोटबंदी के दौरान उस समय के रक्षा मंत्री रहे मनोहर पार्निकर ने कह दिया कि नोटबंदी से कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हो गई है।

लेकिन श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव में ​​करीब 7 फीसदी ​के वाटिंग सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है जो जनता की भावनाओं को समझ नहीं पाई। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है।

श्रीनगर लोकसभा चुनाव के आंकड़े पर नजर डालें तो 1998 में 30.1 प्रतिशत, 1999 में 11.9 प्रतिशत, 2004 में 18.6 प्रतिशत, 2009 में 25.6 प्रतिशत, 2014 में 25.9 प्रतिशत ही मतदान हुये हैं यानी बहुसंख्यक जनता ने भारत के ‘लोकतंत्र’ में आस्था नहीं दिखाई है।

इस बार के उपचुनाव में भारतीय ‘लोकतंत्र’ में आस्था रखने वाले लोगों में और कमी आई है और मतदान का प्रतिशत 6.5 प्रतिशत तक सिमट कर रह गया।

इसके उलटे वहां के विधानसभा चुनाव में लोगों ने मतदान किया है 1996 के विधानसभा चुनाव में 53.9 प्रतिशत, 2002 में 45.0 प्रतिशत, 2008 में 60.6 प्रतिशत तथा 2014 के चुनाव में 65.23 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि दिल्ली की संसद में लोगों की उतनी दिलचस्पी नहीं है जितना उनकी अपनी विधानसभा में।

यह चुनाव राजनीतिक दलों, भारत सरकार और राज्य सरकार के लिये भी महत्वपूर्ण है जहां सरकार की तीन साल की कार्यशैली के लिये जनादेश माना जा सकता है वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिये भी महत्वपूर्ण था कि इन दोनों पार्टी के साझा उम्मीदवार भूतपूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला स्वयं थे; यानी जो भी भारत की संसदीय पार्टी है इस चुनाव में अपनी आस्था प्रकट किया था फिर भी करीब 12 लाख 60 हजार मतदाताओं में से करीब 80 हजार मतदाताओं ने ही वोट डाले। लोगों ने साफ संदेश देने की कोशिश की है कि बुलेट और बैलेट साथ साथ नहीं चल सकता है।

गृह मंत्रालय अभी भी समस्याओं से मुंह छिपाते हुये इस स्थिति के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार मान रहा है। उन गालियों, हत्याओं और सरकार के खिलाफ बनते झुकाव को नहीं।

मंत्रालय के अनुसार उपचुनाव पंचायत चुनाव के बाद किया जाना चाहिये लेकिन चुनाव आयोग ने उसके सुझाव को अनदेखी करते हुये श्रीनगर और अनंतनाग का उपचुनाव 9 और 12 अप्रैल की घोषणा कर दी। गृहमंत्रालय ने 9 अप्रैल का चुनाव सम्पन्न कराने के लिये तीस हजार, अतिरिक्त अर्धसैनिक बल दिये थे फिर भी इतने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें 8 लोगों की जानें गई और 150 से ज्यादा लोग घायल हुये।

गृहमंत्रालय के अुनसार 1500 मतदान केन्द्र बनाए गये थे जिसमें से 120 पोलिंग बूथ में तोड़-फोड़ हुई और 24 ईवीएम मशीन लूटी गई, 190 जगह पत्थर फेंकने की हिंसक वादरात हुई। हिंसा की वजह से 38 पोलिंग बूथ पर दुबारा 13 अप्रैल को चुनाव कराया गया जिसमें 35169 मतदाता में से 709 मतदाताओं यानी दो प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाला।

इसका मतलब है कि 10 फीसदी से भी कम जगहों मतदाता हिंसक हुए लेकिन ज्यादातर जगहों पर लोगों ने शांतिपूर्वक तरीके से इस उपचुनाव को नकार दिया।

मिलिटेंसी के दौर में भी कश्मीर में मत प्रतिशत इतना कम नहीं रहा है। चुनाव के बाद 10 अप्रैल को भी घाटी में बाजार, स्कूल व सरकारी दफ्तरें बंद रहें। वहां तैनात एक अफसर के अनुसार पिछले पन्द्रह सालों में इतनी हिंसा की वारदात एक दिन में नहीं हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि बीस साल की राजनीतिक जीवन में चुनाव की इससे बदतर हालत उन्हांने देखा है इसके साथ ही वह केन्द्र व राज्य सरकार के साथ-साथ चुनाव आयोग को फेल बताया।

श्रीनगर के उपचुनाव के हालात को देखते हुये चुनाव आयोग अनंतनाग उपचुनाव को 12 अप्रैल से टालकर 25 मई कर दिया है। यह सीट महबूबा मुफ्ती के लिये भी नाक का सवाल है, इस सीट से महबूबा के भाई तसादुक हुसैन मुफ्ती चुनाव लड़ रहे हैं और इसी के सहारे दिल्ली के पार्लियामेंट तक पहुंचना चाहते हैं।

अब देखना होगा कि सरकार, चुनाव आयोग की क्या रणनीति होती है। इस चुनाव का फैसला चाहे जो भी आये लेकिन कश्मीरी जनता ने यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि बातचीत की जगह अगर बंदूक से उनकी आवाज को दबाया जायेगा तो वह इसका जवाब अपने तरीके से देने के लिये तैयार हैं।
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Apr 14, 2017

गाल बजाने की बजाय केजरीवाल करें आत्मावलोकन

लोगों का आप से मोहभंग शुरू हो गया है और लोग फिर से उन्हीं पार्टियों की तरफ़ लौटने लगे हैं जिनकी अकर्ण्यमनता और भ्रष्टाचार से तंग आकर उन्होंने केजरीवाल को विकल्प के रूप अपनाया था।        
                                                                                                     
पीयूष पंत, वरिष्ठ पत्रकार

दिल्ली की राजौरी गार्डन विधान सभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की हुयी करारी हार से  दिल्ली में पार्टी के भविष्य को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गयी है।  जो पार्टी दो साल पहले ही विधान सभा की 70 में से 67 सीटें जीत कर सत्ता में आई थी उसके प्रत्याशी द्वारा अपनी ज़मानत राशि गवां बैठना कोई छोटी-मोटी बात नहीं कही जा सकती।

आखिरकार 2015 में जिस पार्टी को इसी चुनाव क्षेत्र में 46.55 फीसदी वोट मिले थे उपचुनाव में उसे केवल 13.12  फीसद वोट से ही संतुष्ट होना पड़ा है। निसंदेह आप की लोकप्रियता में ये भारी गिरावट है कुछ उसी तरह की जैसी शेयर बाज़ार में गिरावट आती है जब निवेशक का विश्वास डोलने लगता है। तो क्या दिल्ली की जनता का आम आदमी पार्टी से मोहभंग होने लगा है ?

अगर गोवा के चुनाव में पार्टी का खराब प्रदर्शन और पंजाब के चुनाव में तमाम दावों के बावजूद मात्र 22 सीटों में जीत हासिल करने को भी पार्टी के भविष्य का आकलन करने के लिए शुमार किया जाय तो क्या यह कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी का शिराज अब बिखर रहा है ?
जहां तक राजौरी गार्डन उप-चुनाव में पार्टी को मिली शिकस्त का सवाल है तो वोट प्रतिशत में आयी भारी गिरावट तो यही संकेत दे रही है कि धीरे-धीरे अब दिल्ली के लोगों का आप से मोहभंग शुरू हो गया है और लोग फिर से उन्हीं पार्टियों की तरफ़ लौटने लगे हैं जिनकी अकर्ण्यमनता और भ्रष्टाचार से तंग आकर उन्होंने आम आदमी पार्टी का विकल्प अपनाया था।

ग़ौर किया जाए तो कांग्रेस का जो वोट बैंक 2015 में पूरी तरह कांग्रेस का साथ छोड़ कर उम्मीदों भरी पार्टी आप के साथ चला गया था उसके एक बड़े हिस्से ने घर वापसी कर ली है।  यही कारण है कि कांग्रेस का मत प्रतिशत 2015 के 12 फीसद से लम्बी छलांग लगाते हुए 33.23 फीसद पर जा पहुंचा।  इसी तरह भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत 38.04 से बढ़ कर 51.99 पर जा पहुंचा।

इसका मतलब है कि राजौरी गार्डन चुनाव क्षेत्र के उच्च, मध्यम वर्ग के और अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों का, जो आम आदमी पार्टी की साफ़-सुथरी और ईमानदार वैकल्पिक राजनीति की परिकल्पना से आकर्षित हो कर आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित जीत का कारण बने थे, पार्टी से मोहभंग हो चुका है। लेकिन आप प्रत्याशी हरजीत सिंह संभवतः उस निचले तबके का दस हज़ार वोट हासिल करने में सफल रहे जो आम आदमी का कोर सपोर्टर है और जिसे आम आदमी की सरकार द्वारा बिजली और पानी में दी गयी सब्सिडी का सबसे अधिक फ़ायदा पहुंचा है।

हालांकि मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उप चुनाव से पहले ही नगर पालिका चुनावों के सन्दर्भ में यह बात कह कर अमीरों को रिझाने की कोशिश की थी कि वे दिल्ली में प्रॉपर्टी टैक्स ख़त्म कर देंगे लेकिन उसका भी असर राजौरी गार्डन के अमीरों पर पड़ता नहीं दिखाई दिया जबकि इस चुनाव क्षेत्र में अमीर पंजाबी और सिक्ख बनियों की भरमार है।

संभवतः आप की हार का सबसे बड़ा कारण रहा पूर्व विधायक जर्नेल सिंह का दिल्ली छोड़ कर पंजाब के चुनाव में कूद पड़ना। पहले से ही विधायक के कार्यों से पूरी तरह संतुष्ट न रहने वाले मतदाताओं ने इसे अपना अपमान माना। कभी जिस तरह अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली के लोग भगोड़ा कहने लगे थे उसी तरह राजौरी गार्डन के लोग जर्नैल सिंह को भी भगोड़ा मानने लगे।

दूसरा बड़ा कारण रहा आप प्रत्याशी हरजीत सिंह का कद के स्तर  पर भाजपा प्रत्याशी मजिंदर सिंह सिरसा के सामने नहीं टिक पाना। सिरसा दिल्ली के चुनावी परिदृश्य में पुराने खिलाड़ी हैं। वो मूलतः शिरोमणी अकाली दल के सदस्य हैं। वो 2008 में जंगपुरा से विधान सभा का चुनाव लड़ कर हार चुके हैं। 2013 में उन्होंने राजौरी गार्डन से विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीता लेकिन 2015 के विधान सभा चुनाव में वो आप के जर्नैल  सिंह से हार गए थे।

वैसे भी दिल्ली की गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में शिरोमडी अकाली दल का दबदबा है जिसका अनुभव खुद केजरीवाल गुरूद्वारे के चुनाव लड़कर कर चुके हैं। दिल्ली के सिक्खों में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का खासा प्रभाव है। चूँकि सिरसा इस बार भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे इसलिए भाजपा वोट बैंक और अकाली दल वोट बैंक की मिली-जुली ताक़त ने उन्हें भारी जीत दिला दी।


तो क्या यह मान लिया जाय कि उप चुनाव में हुई आम आदमी पार्टी की हार दिल्ली के नगर निगम चुनाव में भी उसकी हार का सबब बनेंगे ? ज़रूरी नहीं है कि ऐसा हो। विधान सभा उप-चुनाव में मुद्दे दूसरे थे और नगर पालिका चुनाव में मुद्दे कुछ दूसरे हैं।

विधान सभा उप-चुनाव में आप के लिए नकारात्मक वोट पड़ा लेकिन नगर पालिका चुनावों में भारतीय जनता पार्टी नकारात्मक वोट का शिकार हो सकती है क्योंकि पिछले दस सालों से वहां इसकी सत्ता रही है जिसका अनुभव लोगों के लिए बहुत सुखद नहीं रहा है।

आप के लिए तो यह पहला चुनाव होगा। कुछ समय पहले नगर पालिका के लिए हुए उप-चुनावों में आम आदमी पार्टी ने खासी जीत हासिल की थी। वैसे भी नगर पालिकाओं के कई वार्डों में आम आदमी पार्टी के कोर वोटरों की बहुतायत है जिन्हें बिजली, पानी की सब्सिडी और सरकारी स्कूलों में की गयी बेहतरी का खासा फायदा पहुंचा है।

ऊपर से अरविन्द केजरीवाल ने दूर की कौड़ी ला कर दिल्ली में रहने वाले किरायदारों को अलग बिजली मीटर की व्यवस्था कर बिजली और पानी की सब्सिडी का पूरा फायदा पहुंचाने का वायदा किया है।  ग़ौरतलब है कि दिल्ली में बिहार और उत्तर प्रदेश से आये ऐसे हज़ारों विद्यार्थी और कामगार किराए के मकानों में रहते हैं जिनसे मकान मालिक बिजली और पानी का अनाप-शनाप दाम वसूलते हैं।
(editorjanjwar@gmail.com)

आंबेडकर ने लिखा है गो मांस खाते थे हिंदू



पिछले वर्ष आज के ही दिन 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर पर बीबीसी हिंदी में यह लेख छपा था जिसमें मोदी जी के आदर्श बाबा साहब आंबेडकर ने गोमांस सेवन के बारे मेें बताया है...  

भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक डॉक्टर बीआर अंबेडकर अच्छे शोधकर्ता भी थे. उन्होंने गोमांस खाने के संबंध में एक निबंध लिखा था, 'क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया?'

यह निबंध उनकी किताब, 'अछूतः कौन थे और वे अछूत क्यों बने?' में है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर शम्सुल इस्लाम ने इस निबंध को संपादित कर इसके कुछ हिस्से बीबीसी हिंदी के पाठकों के लिए उपलब्ध करवाए हैं.

'पवित्र है इसलिए खाओ'

अपने इस लेख में अंबेडकर हिंदुओं के इस दावे को चुनौती देते हैं कि हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया और गाय को हमेशा पवित्र माना है और उसे अघन्य (जिसे मारा नहीं जा सकता) की श्रेणी में रखा है.

अंबेडकर ने प्राचीन काल में हिंदुओं के गोमांस खाने की बात को साबित करने के लिए हिन्दू और बौद्ध धर्मग्रंथों का सहारा लिया.

उनके मुताबिक, "गाय को पवित्र माने जाने से पहले गाय को मारा जाता था. उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रों के विख्यात विद्वान पीवी काणे का हवाला दिया. काणे ने लिखा है, ऐसा नहीं है कि वैदिक काल में गाय पवित्र नहीं थी, लेकिन उसकी पवित्रता के कारण ही बाजसनेई संहिता में कहा गया कि गोमांस को खाया जाना चाहिए." (मराठी में धर्म शास्त्र विचार, पृष्ठ-180).

अंबेडकर ने लिखा है, "ऋगवेद काल के आर्य खाने के लिए गाय को मारा करते थे, जो खुद ऋगवेद से ही स्पष्ट है."

ऋगवेद में (10. 86.14) में इंद्र कहते हैं, "उन्होंने एक बार 5 से ज़्यादा बैल पकाए'. ऋगवेद (10. 91.14) कहता है कि अग्नि के लिए घोड़े, बैल, सांड, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई. ऋगवेद (10. 72.6) से ऐसा लगता है कि गाय को तलवार या कुल्हाड़ी से मारा जाता था."

'अतिथि यानि गाय का हत्यारा'

अंबेडकर ने वैदिक ऋचाओं का हवाला दिया है जिनमें बलि देने के लिए गाय और सांड में से चुनने को कहा गया है.

अंबेडकर ने लिखा "तैत्रीय ब्राह्मण में बताई गई कामयेष्टियों में न सिर्फ़ बैल और गाय की बलि का उल्लेख है बल्कि यह भी बताया गया है कि किस देवता को किस तरह के बैल या गाय की बलि दी जानी चाहिए."

वो लिखते हैं, "विष्णु को बलि चढ़ाने के लिए बौना बैल, वृत्रासुर के संहारक के रूप में इंद्र को लटकते सींग वाले और माथे पर चमक वाले सांड, पुशन के लिए काली गाय, रुद्र के लिए लाल गाय आदि."

"तैत्रीय ब्राह्मण में एक और बलि का उल्लेख है जिसे पंचस्रदीय-सेवा बताया गया है. इसका सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, पांच साल के बगैर कूबड़ वाले 17 बौने बैलों का बलिदान और जितनी चाहें उतनी तीन साल की बौनी बछियों का बलिदान."

अंबेडकर ने जिन वैदिक ग्रंथों का उल्लेख किया है उनके अनुसार मधुपर्क नाम का एक व्यंजन इन लोगों को अवश्य दिया जाना चाहिए- (1) ऋत्विज या बलि देने वाले ब्राह्मण (2) आचार्य-शिक्षक (3) दूल्हे (4) राजा (5) स्नातक और (6) मेज़बान को प्रिय कोई भी व्यक्ति.

कुछ लोग इस सूची में अतिथि को भी जोड़ते हैं.

मधुपर्क में "मांस, और वह भी गाय के मांस होता था. मेहमानों के लिए गाय को मारा जाना इस हद तक बढ़ गया था कि मेहमानों को 'गोघ्न' कहा जाने लगा था, जिसका अर्थ है गाय का हत्यारा."
'सब खाते थे गोमांस'

इस शोध के आधार पर अंबेडकर ने लिखा कि एक समय हिंदू गायों को मारा करते थे और गोमांस खाया करते थे जो बौद्ध सूत्रों में दिए गए यज्ञ के ब्यौरों से साफ़ है.

अंबेडकर ने लिखा है, "कुतादंत सुत्त से एक रेखाचित्र तैयार किया जा सकता है जिसमें गौतम बुद्ध एक ब्राह्मण कुतादंत से जानवरों की बलि न देने की प्रार्थना करते हैं."

अंबेडकर ने बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय(111. .1-9) के उस अंश का हवाला भी दिया है जिसमें कौशल के राजा पसेंडी के यज्ञ का ब्यौरा मिलता है.

संयुक्त निकाय में लिखा है, "पांच सौ सांड, पांच सौ बछड़े और कई बछियों, बकरियों और भेड़ों को बलि के लिए खंभे की ओर ले जाया गया."

अंत में अंबेडकर लिखते हैं, "इस सुबूत के साथ कोई संदेह नहीं कर सकता कि एक समय ऐसा था जब हिंदू, जिनमें ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों थे, न सिर्फ़ मांस बल्कि गोमांस भी खाते थे."


Apr 13, 2017

मूर्ति आंबेडकर की और नारे जय श्रीराम के

 कहीं दूध पी रहे आंबेडकर तो कहीं हो रहा आंबेडकर यज्ञ, महिलाएं सिर पर कलश लेकर पूज रहीं आंबेडकर को

भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते हैं। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुई है....
भंवर मेघवंशी 

जयपुर में आज 13 अप्रैल को अम्बेडकर के नाम पर "भक्ति संध्या" होगी। दो केंद्रीय मंत्री इस अम्बेडकर विरोधी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे। अम्बेडकर जैसा तर्कवादी और भक्तिभाव जैसी मूर्खता! इससे ज्यादा बेहूदा क्या बात होगी?

भीलवाड़ा में बाबा साहब की जीवनभर विरोधी रही कांग्रेस पार्टी का एस.सी. डिपार्टमेंट दूसरी मूर्खता करेगा। 126 किलो दूध से बाबा साहब की प्रतिमा का अभिषेक किया जायेगा। अभिषेक होगा तो पंडित भी आएंगे, मंत्रोच्चार होगा, गाय के गोबर, दूध, दही, मूत्र आदि का पंचामृत भी अभिषेक में काम में लिया ही जायेगा। अछूत अम्बेडकर कल भीलवाड़ा में पवित्र हो जायेंगे!

तीसरी वाहियात हरकत रायपुर में होगी 5100 कलश की यात्रा निकाली जाएगी। जिस औरत को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब ने मंत्री पद खोया, उस औरत के सर पर कलश, घर घर से एक एक नारियल लाया जाएगा। कलश का पानी और नारियल आंबेडकर की प्रतिमा पर चढ़ाये जायेंगे। हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जायेंगे। जिस अम्बेडकर के समाज को आज भी नरेगा, आंगनवाड़ी और मिड डे मील का मटका छूने की आज़ादी नहीं है, उनके नाम पर कलश यात्रा! बेहद दुखद! निंदनीय!

एक और जगह से बाबा साहब की जयंती की पूर्व संध्या पर भजन सत्संग किये जाने की खबर आयी है। एक शहर में लड्डुओं का भोग भगवान आंबेडकर को लगाया जायेगा।

बाबा साहब के अनुयायी जातियों के महाकुम्भ कर रहे हैं, सामूहिक भोज कर रहे हैं, जिनके कार्डों पर गणेशाय नमः और जय भीम साथ साथ शोभायमान है। भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते हैं। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुई है।

बड़े बड़े अम्बेडकरवादी हाथों में तरह तरह की अंगूठियां फसाये हुए हैं,गले में पितर भैरू देवत भोमियाजी लटके पड़े हैं और हाथ कलवों के जलवों से गुलज़ार है, फिर भी ये सब अम्बेडकरवादी हैं।

राजस्थान में बाबा साहब की मूर्तियां दलित विरोधी बाबा रामदेव से चंदा लेकर डोनेट की जा रही हैं। इन मूर्तियों को देख़ कर ही उबकाई आती है। कहीं डॉ आंबेडकर को किसी मारवाड़ी लाला की शक्ल दे दी गयी है, कहीं हाथ नीचे लटका हुआ है तो कहीं अंगुली "सबका मालिक एक है " की भाव भंगिमा लिए हुए है।

ये बाबा साहब है या साई बाबा? मत लगाओ मूर्ति अगर पैसा नहीं है या समझ नहीं है तो।

कहीं कहीं तो जमीन हड़पने के लिए सबसे गंदी जगह पर बाबा साहब की घटिया सी मूर्ति रातों रात लगा दी जा रही है।

बाबा साहब की मूर्तियां बन रही हैं, लग रही हैं, जल्दी ही मंदिर बन जायेंगे, पूजा होगी, घंटे घड़ियाल बजेंगे, भक्तिभाव से अम्बेडकर के भजन गाये जायेंगे। भीम चालीसा रच दी गयी है, जपते रहियेगा।

गुलामी का नया दौर शुरू हो चुका है। जिन जिन चीजों के बाबा साहब सख्त खिलाफ थे, वो सारे पाखण्ड किये जा रहे। बाबा साहब को अवतार कहा जा रहा है। भगवान बताया जा रहा है। यहाँ तक कि उन्हें ब्रह्मा—विष्णु—महेश कहा जा रहा है। 

हम सब जानते है कि डॉ अम्बेडकर गौरी, गणपति, राम कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भय, भाग्य, भगवान् तथा आत्मा व परमात्मा जैसी चीजों के सख्त खिलाफ थे।

वे व्यक्ति पूजा और भक्ति भाव के विरोधी थे। उन्होने इन कथित महात्माओं का भी विरोध किया, उन्होंने कहा इन महात्माओं ने अछूतों की धूल ही उड़ाई है।

पर आज हम क्या कर रहे है बाबा साहब के नाम पर? जो कर रहे हैं वह बेहद शर्मनाक है, इससे डॉ अम्बेडकर और हमारे महापुरुषों एवं महान स्त्रियों का कारवां हजार साल पीछे चला जायेगा। इसे रोकिये। 

बाबा साहब का केवल गुणगान और मूर्तिपूजा मत कीजिये। उनके विचारों को दरकिनार करके उन्हें भगवान मत बनाइये। बाबा साहब की हत्या मत कीजिये। आप गुलाम रहना चाहते हैं, बेशक रहिये,भारत का संविधान आपको यह आज़ादी देता है, पर डॉ अम्बेडकर को प्रदूषित मत कीजिये।

आपका रास्ता लोकतंत्र और संविधान को खा जायेगा। फिर भेदभाव हो, जूते पड़े, आपकी महिलाएं बेइज्जत की जायें और आरक्षण खत्म हो जाये तो किसी को दोष मत दीजिये।

इन बेहूदा मूर्तियों और अपने वाहियात अम्बेडकरवाद के समक्ष सर फोड़ते रहिये। रोते रहिये और हज़ारों साल की गुलामी के रास्ते पर जाने के लिए अपनी नस्लों को धकेल दीजिये। गुलामों से इसके अलावा कोई और अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है।

जो बाबा साहब के सच्चे मिशनरी साथी है और इस साजिश और संभावित खतरे को समझते हैं, वो बाबा साहब के दैवीकरण और ब्राह्मणीकरण का पुरजोर विरोध करें। मनुवाद के इस स्वरुप का खुल कर विरोध करें अम्बेडकरवाद में भक्तिभाव  के लिए कोई जगह नहीं है ।

(भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

Apr 12, 2017

दलित लड़कियों का किया घर में घुसकर बलात्कार, 30 घंटे बाद दर्ज हुआ मुकदमा

ख़ामोशी तोड़ो दलितो, यह चुप्पी भयानक है...

आखिर राजस्थान में दो दलित छात्राओं से बलात्कार व आत्महत्या की नृशंस घटना पर इस देश में कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली.... 

भंवर मेघवंशी


राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना क्षेत्र के भगेगा गाँव के एक दलित बलाई परिवार की बीए प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली दो सगी बहनों के साथ तीन सवर्ण युवाओं बजरंग सिंह, पिंकू सिंह और एक अन्य ने घर में घुसकर  बलात्कार किया। बजरंग सिंह और पिंकू सिंह जहां जाति के राजपूत हैं, वहीं तीसरा बलात्कारी ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता है।

पुलिस कर रही मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार

पीड़िताओं के छोटे भाई के आ जाने के बाद बलात्कारी घटनास्थल से भाग गए। 17 व 18 साल की इन दोनों दलित छात्राओं ने घटना के एक घंटे के बाद पास के रेलवे लाइन पर रेवाड़ी से फुलैया जाने वाली ट्रेन के सामने दिन में 11:30 बजे कूदकर जान दे दी। इस मामले में पुलिस अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। नीमथाना के डीवाईएसपी कुशाल सिंह का कहना है कि पुलिस आरोपियों को तब तक गिरफ्तार नहीं करेगी, जब तक पीड़िताओं की मेडिकल रिपोर्ट जयपुर से आ नहीं जाती।

ये दर्दनाक और शर्मनाक घटना 5 अप्रैल, 2017 को दिन में 11 बजे घटी। घर में उस वक्त इन दो बहनों के अलावा कोई नहीं था। बड़ी बहन एमए की परीक्षा देने शहर गई थी, जबकि मां खेती के काम से बाहर गई थी और पिता लालचंद वर्मा भट्टे पर मजदूरी करने। छोटा भाई भी घर पर नहीं था।

सामाजिक कार्यकर्ता और एनएपीएम से जुड़े कैलाश मीणा के मुताबिक बड़ी जोर—जबर्दस्ती और प्रयासों के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ वारदात के लगभग 30 घंटे बाद 6 अप्रैल की शाम 5 बजे मुकदमा दर्ज किया।

मामला बलात्कार, दलित अत्याचार,नाबालिग के लैंगिक शोषण का होने के बावजूद भी जान-बूझकर सिर्फ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण की धारा 306 में दर्ज किया गया। इस मामले में डीवाईएसपी कुशाल सिंह खुद जाति से राजपूत हैं और परिजनों का मानना है कि उनके रहते जांच सही दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती। इतना ही नहीं इलाके के सरपंच और विधायक भी आरोपियों की जाति के हैं।

इस मामले में महिला दलित तथा मानव अधिकार संगठनों का संयुक्त दल भगेगा पहुंचा तथा पीड़ित परिवार, जाँच अधिकारी तथा ग्रामीणों से मुलाकात कर मामले की जानकारी ली। यह दल 15 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट जारी करेगा।

पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों पर से देशद्रोह का मुकदमा वापस, 58 छात्रों को भेजा 14 दिन की न्यायिक हिरासत में


पुलिस ने पहले दर्ज किया था 124ए के तहत देशद्रोह का मुकदमा पर दबाव बढ़ने पर सभी छात्रों पर से लिया वापस। लेकिन अब भी दंगा करने और सरकारी संपत्ति नुकसान करने के आरोप में 3 छात्राओं समेत 67 छात्रों पर है मुकदमा दर्ज। 67 में से 58 को कर चुकी है पुलिस गिरफ्तार। छात्राओं की जमानत पर अदालत करेगी 15 अप्रैल को सुनवाई।

जनज्वार। चण्डीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में कल हुई फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिसिया हिंसा के बाद सैकड़ों छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तारी के बाद 66 छात्रों पर पुलिस ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, दंगा करने के साथ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया। पर छात्रों पर से देशद्रोह का मुकदमा 11 बजे रात  में वापस ले लिया गया।

आंदोलनकारी 3 छात्राओं की जमानत लेने पहुंचे वकील अंकित ने जनज्वार को बताया कि फीस वापसी की वाजिब मांग कर रहे छात्रों पर इतने संगीन मुक़दमें दर्ज करना बताता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार छात्रों को अपराधी बनाने पर तुली है। 

कितनी बढ़ी है फीस
फार्मा कोर्स की फीस 5080 रुपये से बढ़ाकर 50 हजार कर दी गई है । जर्नलिज्म कोर्स की फीस 5290 रुपये से बढ़ाकर 30 हजार रुपये कर दी गई है। डेंटल कोर्स  की फीस Rs 86,400 to Rs 1.5 लाख कर दी गई है ।

हिंसक कैसे हुआ आंदोलन 

चं​डीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय ने इस सत्र के ज्यादातर पाठ्यक्रमों की फी 11 गुना बढ़ा दी थी। इस फीसवृद्धि के खिलाफ तमाम संगठनों के छात्र पिछले 10 दिनों से एकजुट विरोध कर रहे थे। पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी मांग पर कोई सुनवाई नहीं।

ऐसे में छात्र संगठनों ने 11 मार्च को विश्वविद्यालय बंद का आह्वान किया था। छात्र विश्वविद्यालय में पहुंचते उससे पहले ही वहां पुलिस पहुंची हुई थी। सैकड़ों की संख्या में छात्र वीसी से मिलने पर अड़े हुए थे लेकिल पुलिस ने उनकी एक न सुनी।

छात्र जब रोष में आने लगे तो पुलिस ने पानी का बौछार किया। बौछार से एमफील प्रथम वर्ष की छात्रा जगजीत कौर घायल हो गयी और उसकी आंख पर गंभीर चोट आई। ऐसे में मामले को पुलिस संभालती उसने आंसू गैस के गोले छोड़ दिए। गोले में एक छात्र के चेहरे पर बुरी तरह झुलसा दिया।

उसके बाद फिर फिर क्या हुआ उसे पूरे देश ने ​देखा कि कैसे वाजिब मांग कर रहे छात्रों को पुलिस ने दौड़ा—दौड़ के मारा और गिरफ्तार किया। 

66 आंदोलनकारी छात्रों पर दर्ज किया देशद्रोह का मुकदमा, नहीं ली अबतक फीस वापस


तस्वीर में खून से लथपथ दिख रहा छात्र पंजाब यूनिव​र्सिटी का छात्र है जो फीस बढ़ोतरी के खिलाफ कल विश्वविद्यालय में कुलपति से मिलने का प्रयास कर रहे छात्रों में शामिल था। छात्र विश्वविद्यालय की बढ़ाई गयी 11 गुना फीस का विरोध कर रहे थे। 

पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में कल 11 अप्रैल को छात्र 11 गुनी बढ़ाई गयी फीस के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। विरोध कर रहे छात्र अपनी बात का संज्ञान दिलाने के लिए कुलपित अरुण कुमार ग्रोवर से मिलने का प्रयास कर रहे थे। 

लेकिन कुलपति ने छात्रों से मिलने से इनकार कर दिया। फिर भी छात्र कुलपति से मिलने और फीस वापसी कराने की मांग पर अड़े रहे तो तनाव बढ़ा। 

कानून—व्यवस्था बहाल करने के नाम पर आई पुलिस ने छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज किया। आँसू गैस के गोले छोड़े। कई छात्र-छात्राएँ बुरी तरह घायल हुए हैं।

पुलिस ने सरकार के इशारे पर आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है। इसके साथ ही दंगा फैलाने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का भी मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि पुलिस का कहना है कि छात्र एहतियात के तौर पर हिरासत में ले लिए गए हैं। 

आंदोलन में स्टूडेंट फार सोसायटी (एसएफएस), नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई), पंजाब यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (पुसु) के सदस्योंं समेत दूसरे संगठनों के भी छात्र शामिल हैं। 

दिल्ली में सेना अधिकारियों के यहां काम करते हैं 143 बंधुआ मजदूर

न छुट्टी मिलती है न सैलरी, गर्भपात होने पर भी नहीं देते आराम का मौका, काम नहीं करने पर सेना अधिकारी और परिजन करते हैं पिटाई 

संबंधित अधिकारियों समेत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजी गयी शिकायत, पर नहीं हो रही है सुनवाई, संगठन ने की अब हाईकार्ट जाने की तैयारी.....

सेनाधिकारियों के यहां काम करे बंधुआ मजदूर, 143 ने जमा किया एफिडेविट
जनज्वार। आर्मी फोर्स ऑफिसर्स के घरों में बेगारी करते-करते मजदूर परिवारों की तीन पीढ़ियां गुजर गईं। एडवांस के रूप में मिलता है मजदूरों को केवल एक कमरा। मजदूर काम नहीं कर पाते तो उनके बच्चों से लिया जाता था जबरन काम। पहले अंग्रेजों के घरों में की गुलामी फिर हिंदुस्तानी ऑफिसरों के बने गुलाम।    

नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर ने दिल्ली के इंडिया गेट के समीप बसे प्रिंसेस पार्क में लगभग 3 एकड़ की जमीन पर बने 205 टूटे—फूटे घरों जिन्हें सर्वेंट रूम कहा जाता है, के मजदूरों  से बात की तब पता चला की दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों से आर्मी अफसरों के घरों में कई दशकों से गुलामी (बंधुआ मजदूरी) करवाई जा रही है। गुलाम मजदूरों की संख्या 143 है। 

काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि आर्मी अफसरों के ऑफिस और घरों में इन मजदूरों से गुलामों की तरह काम कराया जाता है। मजदूर यहां घरेलू कामगार, सफाई मजदूर, माली और धोबी के रूप में काम करते हैं। 

हर परिवार का एक मेंबर अफसरों की गुलामी करता जिसे बेगारी कहते हैं, जबकि संविधान के आर्टिकल 23 में बेगारी एक गैरक़ानूनी अपराध है। काम के बदले मजदूरो को कोई भी दाम (वेतन, मजदूरी, तनख्वाह) नहीं मिलता है। मजदूरों के पास दिल्ली में रहने को घर न होने व गरीबी की वजह से मजदूर, मालिक और मेस कमेटी के चंगुल में फंसे हैं। इन मजदूरों की गुलामी का इतिहास आजादी के 2 साल पहले शुरू ही शुरू हो गया था। 

आजादी से पहले 1945 में कुछ दलित लोगों से प्रिंसेस पार्क में ही चौकीदारी का काम करवाया जाता था। गुलामी के शिकार हुए इन मजदूरों ने बताया की किसी समय में प्रिंसेस पार्क अंग्रेजों के घोड़े का अस्तबल हुआ करता था. धीरे-धीरे मजदूर काम की तलाश में आते गए और प्रिंसेस पार्क की मेस कमेटी के जाल में फंसते गए और बंधुआ मजदूरी प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 1976  के पारित होने पर भी उन्हें आजादी नहीं मिली। 

लाजू (बदला हुआ नाम) नामक एक महिला ने बताया की उसका जन्म ही गुलामी की चार दीवारों में हुआ। पहले उसने अपने नाना को फिर माता-पिता और अपने पड़ोस के कई लोगों को गुलामी करते हुए देखा है। अपनी बंधुआ बनने की कहानी कहते हुए लाजू कहती है, 'माँ की एवज में आये दिन मालिकों के घर बंधुआ मजदूरी करते करते—करते बचपन में ही घरेलु कामगार बन गई। 

लाजू गुलामी में ही ब्याही गई। पहली गुलामी मालिक और दूसरी गुलामी पति की करनी पड़ी। बंधुआ मजदूरी की शिकार लाजू तब फूट-फूट के रोने लगती है वह बताती है, 'गर्भपात के समय में भी मालिक और उनकी पत्नी ने मुझ पर रहम नहीं किया। पहले घर का पूरा काम कराया फिर उसे बड़ी मुश्किल से दवा लेने जाने दिया। कई बार मालिकों से परेशान होकर आत्महत्या का भी प्रयास किया।'

तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं इस हालत में, इस एक छत के भरोसे
रेखा देवी (बदला हुआ नाम) के अनुसार वो एक एक सफाई कामगार है। रेखा की सास ने जिंदगीभर गुलामी करके अपनी बहू को विरासत में ये गुलामी की नौकरी दे दी। जब बेगारी का ठीकरा रेखा के सर फोड़ा गया तो उसने एक बार काम का मेहनताना मांगने की हिम्मत की, किन्तु उसको मेस कमेटी की ओर से मिली धमकी ने फिर से उसे उस उदास मौसम की तरफ धकेल दिया जहाँ दास बनकर ही जीना था। 

रेखा के मुताबिक, मालिकों द्वारा बताए काम को पूरा न करने और रेस्ट कर सो जाने की स्थिति में मालिकों द्वारा उसे इतना पीटा गया कि उसका हाथ ही  टूट गया। मेस कमेटी ने रेखा की कोई सहायता नहीं की, उल्टा रेखा को ही पुलिस कार्रवाही से यह कहके रोक लिया की तुम्हारे घर पर ताला लगाने जा रहे है। 

रेखा कहती हैं, एक छत की मज़बूरी गुलामी में जीने को मजबूर करती रही। आज भी रेखा एक गुलाम की भांति मेस कमेटी के आदेश पर सफाई के काम को कर रही है।

कपड़े धुलाई का काम करने वाली अनुमति देवी बताती हैं, हम मजदूर बाद में हैं, पहले मजबूर है और यही हमारी गुलामी का प्रमुख कारण है। हमारी पीढ़ियां गुजर गईं सेना मालिकों की गुलामी करते-करते। 

अनुमति उम्मीद जताते हुए कहती हैं, 'प्रधानमंत्री ने जब सबको आवास देने की बात की तो एकाएक हमें लगा की हमें जब घर मिल जायेगा तो शायद उस दिन हमारी मुक्ति होगी, लेकिन वो दिन आज तक नहीं आया। पता नहीं कौन सी योजना है जिससे बेघर और गरीबों को घर मिलता है।' 

अनु​मति देवी सेना अधिकारियों के कपड़े धोते और प्रेस करते करते बूढी हो चुकी हैं। अनुमति कहती हैं, 'पहले पति कमा के मेरा पेट भरता था अब बेटा भरता है। मैं आज भी बेगारिन हूँ और इन अमीरों की सेवा करती हूं। यदि पेट भरने के लिए मालिकों के भरोसे रह जाते तो अब तक भूख से मर जाते। हमें हमारे काम का आज तक कोई दाम नहीं मिला। एक टूटी छत देकर हमसे हमारी मज़बूरी का फायदा उठाकर काम लिया गया। अगर हमारे काम का हमें भी दाम मिलता तो आज हमारा भी महल जैसा घर बन गया होत।'

गौरतलब है कि हाल ही में रक्षा मंत्रालय की ओर से एक फरमान जारी कर बंधुआ मजदूरों को उनके घर खाली करवाकर उनको भगाया जा रहा है।

मोनिका नामक कामगार ने बताया कि प्रिंसेस पार्क में म्यूजियम बनने जा रहा है। मोनिका पूछती हैं, 'जिन्दा इंसानों को उजाड़कर सरकार शहीदों की याद में म्यूजियम बना रही है। यही है हम मजबूर कामगारों के जिंदगी की कीमत और यही है हमारे लिए सामाजिक न्याय।'

नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर के संयोजक ने बताया कि उन्होंने ईमेल करके उपायुक्त और चाणक्यपुरी उपखंड अधिकारी को शिकायत पत्र भेजा है और बंधुआ मजदूरों के मुक्ति एवं पुनर्वास की मांग की है। किन्तु प्रशासन की कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। गोराना ने शिकायत की एक प्र​ति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजी है।

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