Apr 2, 2017

देश का पहला छात्रसंघ जो प्रवेश परीक्षा की कराता है तैयारी

विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के लिए कराई जाने वाली तैयारियों की कक्षाएं 5 अप्रैल से शुरू होकर मई के पहले सप्ताह तक चलेंगी...


देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू में पहला ऐसा छात्रसंघ है, जो वहां पढ़ने के इच्छुक छात्रों की प्रवेश परीक्षा को आसान बनाने के लिए निशुल्क तै​यारियांं करवाता है। 

छात्र कार्यकर्ताओं के मुताबिक वे ऐसा वंचित पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले ऐसे छात्रों के मद्देनजर करते हैं, जो प्रवेश परीक्षाओं के लिए मोटी—मोटी फीस वसूलने वाले कोचिंग्स सेंटर में तैयारियां नहीं कर पाते हैं। हालांकि छात्रसंघ सिर्फ गरीब छात्रों को ही तैयारी नहीं करवाता, बल्कि इन कक्षाओं में कोई भी छात्र नि:शुल्क तैयारी कर सकता है।

विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के लिए कराई जाने वाली तैयारियों की कक्षाएं 5 अप्रैल से शुरू होकर मई के पहले सप्ताह तक चलेंगी। इच्छुक छात्रों को कोर्स का नाम और संबंधित जानकारी जेएनयू छात्रसंघ आफिस में पहले ही दर्ज करनी होती है।  

जेएनयू छात्रसंघ से जुड़े सीनियर छात्रों ने एक पर्चा निकालकर अपील की है कि जो छात्र तैयारी के इच्छुक हैं और छात्र कार्यकर्ताओं से प्रवेश परीक्षाओं के लिए मदद लेना चाहते हैं, वो जल्द से जल्द संबंधित जानकारी दे दें। साथ ही उन्होंने प्रवेश परीक्षा करवाने वाले छात्रों के फोन नंबर भी पर्चे में दर्ज किये हैं, ताकि इच्छुक छात्रों को उनसे संपर्क करने में कोई कठिनाई न हो। 

गौरतलब है कि लंबे समय से लगातार विवादों में रहे जेएनयू में पिछले दिनों एमफिल/पीएचडी की भारी संख्या में सीटें कम कर दी गई हैं, ऐसे में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए जेएनयू में पढ़ने के ​इच्छुक छात्रों के लिए छात्रसंघ की इस पहल को सकारात्मक कहा जा सकता है, खासतौर पर वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रोंं के लिए। 

हालात यही रहे तो इंदौर जेल के कैदी होते जाएंगे टीबी मरीज

चूने से साफ करने पड़ते हैं दांत, नहीं मिलता भरपेट खाना, सभी कैदियों का गिर रहा लगातार वजन  

इंदौर जेल से लौटकर दीपक असीम की रिपोर्ट 

इंदौर के पत्रकार दीपक असीम वही शख्स हैं जिनको ओशो का लिखा अपने अखबार में छापने पर हिंदूवादियों ने जेल पहुंचवा दिया था। उन्हें 4 से 12 मार्च तक जेल में रहना पड़ा। जेल में रहने के दौरान हुए अनुभवों को उन्होंने जनज्वार से साझा किया है। उन अनुभवों को हम इसलिए भी प्रकाशित कर रहे हैं कि जेल की स्थितियों को लेकर जो काम एक खोजी पत्रकार को करना चाहिए था, उसे बहुत ही शानदार तरीके से एक कैदी रहते हुए दीपम असीम ने किया है। रिपोर्ट तीन किस्तों में प्रकाशित होगी, पेश है पहली किस्त... 


इस बार जब जेल गया तो डरा हुआ था। जो आदमी देवी-देवताओंं के अपमान के (झूठे ही सही) आरोप में जेल गया हो, उसे अंदर उन कैदियों से खतरा हो सकता है, जो रोज़ शाम को ज़मानत और रिहाई की आस में आवाज़े बाबुलंद में आरती करते हों और चोटी भी रखते हों।  जब ऐसे कैदी पूछते थे कि धारा २९५ ए का क्या मतलब होता है और मतलब सुनकर भड़कने लगते थे, तो अपनेराम यही पूछते थे कि आप खुद बताइये, क्या पुलिस जो आरोप लगाती है, वो सच्चे होते हैं? इतना सुनकर ही वे हलवा हो जाते थे। फिर उनका सवाल यह होता था - आखिर आपको पुलिस ने फंसाया क्यों? फिर वे खुद बताने लगते थे कि उन्हें क्यों फंसाया गया है। 

तो एक तो यह पुलिस वाली तरकीब काम कर गई। दूसरी राहत यह रही कि सेंट्रल जेल में इस समय कोई बड़ा दादा-पहलवान नहीं है। किसी की नक्शेबाजी अब इस जेल में नहीं चलती। जो सीओ (पुराने कैदी) पहले 'नई आमद' को मारते-कूटते थे, वो सब भी अब एकदम बंद...। पहले कैदी की हैसियत देख कर उसके घर से पैसा मंगाने का रैकेट चलता था। वो रैकेट भी अब बिल्कुल खत्म हो चुका है। 

अपन वहां 12  दिन रहे। बारह दिनों में यही देखा कि अव्वल तो शेर बचे ही नहीं हैं और जो शेर हैं, वो बकरी की खाल ओढ़ कर रह रहे हैं। जिन रोटियों को पहले जलाकर अपना खाना अलग बनाया जाता था, उन रोटियों की कीमत हो गई है। उन रोटियों को अब बचा कर रखा जाता है और कैदी नाश्ते बतौर जब भूख लग जाए खा लेते हैं। 

अव्वल तो पांच रोटियां कैदियों को कम पड़ती हैं, क्योंकि बाहर के खाने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है। पाबंदी इतनी सख्त है कि नमक तक के लिए लोग तरसते हैं। भोपाल में जब से सिमी के कैदियों का एनकाउंटर हुआ, तब से जेल के नियम बहुत सख्त हो गए हैं। चूंकि भोपाल में यह कहा गया था कि कैदियों ने टूथ ब्रश से चाबी बना ली सो यहां के सभी कैदियों से टूथब्रश धऱवा लिये गए। कहा गया था कि तौलियों से रस्सी बना ली, सो सारे तौलिये जब्त। 

हालांकि जो काम तौलिये जोड़ कर हो सकता है, वो चादर जोड़ कर भी हो सकता है। पेस्ट भी नहीं मिलता। कैदी ऐसे पाउडर से दांत साफ करते हैं, जो मुंह पर लग कर होंठ  फाड़ देता है (शायद चूना है)। सो कैदियों के मुंह बास रहे हैं। नहाएं तो बदन कैसे पोछें? तेल कंघा साबुन छीन लिया गया है और जेल में खोपरे का जो तेल मिलता है, उसमें पाम आइल मिला होता है। इसे चेहरे पर लगाओ तो चेहरा काला पड़ जाता है और चमड़ी फटने लगती है। 

कैदियों से उनका सारा सामान छीन लिया गया है। जिस थाली में खाना खाते हैं, चाय तक कैदी उसी से पी रहे हैं। शौचालय में इस्तेमाल होने वाली पानी की बोतलें तक कम पड़ने लगी हैं। मगर जेल नियमों के खिलाफ कोई चूं तक नहीं कर सकता। 

जेल नियमों के हिसाब से कैदी की खुराक पर एक दिन में लगभग 140 रुपये खर्च करने का प्रावधान है, जो वाकई अगर ईमानदारी सो हो, तो कैदी आराम से रह सकते हैं, मगर मात्र बीस-पच्चीस रुपये ही कैदी की खुराक पर खर्च हो रहे हैं। पांच रोटियां (जो गेंहू में न जाने कौन से आटे की मिलावट से बनाई जाती हैं), एक डंका पतली पानी जैसी दाल और एक पतली पानी जैसी ही सब्जी। 

एक कैदी की खुराक में दिन भर में तीस ग्राम खाने का तेल होना चाहिए, मगर तीन ग्राम भी नहीं होता। तीन मिलीग्राम शायद होता हो। अगर कोई पुराना कैदी सब्जी की तरी निकाल ले, तो उसकी पिटाई हो जाती है। कैदियों का वजन तेजी से कम हो रहा है। दस्तावेज के हिसाब से अपन जब 4 मार्च को जेल गए थे, तब वजन था सौ किलो और 14 मार्च की दोपहर को जब जेल में वजन हुआ तो वजन बैठा 92  किलो। 

मोटे आदमी के लिए यह कमाई है कि दस दिनों में वजन आठ किलो कम हो जाए। मगर जो बेचारे पहले ही दुबले हैं, उनके लिए तो यह डेढ़ आषाढ से भी बदतर है। बहुत से कैदियों ने बताया कि जब हम जेल आए थे तो हमारा वजन ज्यादा था, जो भोपाल वाली घटना के बाद तेजी से कम हुआ है और लगातार हो रहा है। 

पर जेल प्रशासन पर सख्ती की सनक सी सवार है। वो कुछ सुनने को तैयार नहीं है। कुछ पुराने कैदी कहते हैं कि अगर यही हाल रहा तो कुछ महीने में कैदी टीबी से मरने लगेंगे। बहरहाल कुछ कैदियों ने पहचान लिया कि ये साहब तो पहले भी आ चुके हैं और गुल खिला चुके हैं। मगर ये वाला किस्सा कल के लिए...। 

editorjanjwar@gmail.com

कोर्ट का सवाल, सांप्रदायिक दंगों में योगी के​​ खिलाफ क्यों नहीं शुरू हुई जांच

लखनऊ 1 अप्रैल 2017।  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने के आरोपों की जांच के लिए 153 (ए) के तहत सरकार द्वारा अनुमति देने पर सवाल किया है। इस मामले में 31 मार्च को एक याचिका की सुनवाई करते हुए उच्च अदालत ने सरकार से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा कि  प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच क्यों नहीं हुई ? 

सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सक्रिय संगठन रिहाई मंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट इस फैसले का स्वागत किया है। सामाजिक कार्यकर्ता परवेज परवाज और असद हयात ने 2007 में गोरखपुर में हुए साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि इस मामले में आदित्यनाथ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच की जाए। 


याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से जानना चाहा कि योगी और अन्य आरोपियों के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच के लिए 153 (ए) के तहत सरकार ने अबतक अनुमति क्यों नहीं दी। 153 (ए) आईपीसी के तहत साम्प्रदायिक भड़काऊ भाषण के आरोप में न्यूनतम तीन साल की सजा का प्रावधान है। लेकिन इस मामले में कोर्ट तभी संज्ञान लेती है जब राज्य या केंद्र सरकार मुकदमें की मंजूरी देती हो।

मुकदमे की पृष्ठभूमि बताते हुए रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव कहते हैं कि 27 जनवरी 2007 की रात गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर विधायक राधामोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की मेयर अंजू चौधरी की मौजूदगी में हिंसा फैलाने वाला भाषण दिया। भाषण के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने हिंदुओं को उकसाते हुए कहा कि वो मुहर्रम में ताजिया नहीं उठने देंगे और खून की होली खेलेंगे। इस भाषण के बाद भीड़ ‘कटुए काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे’ के नारों के साथ मुसलमानों की दुकानें फूंकी गयीं।  

याचिका में कहा गया है कि इसके साथ ही गोरखपुर के दूसरे क्षेत्रों, देवरिया, पडरौना, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में योगी के कहे अनुसार ही मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई। मुसलमानों की करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ लेकिन एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ। 

ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ता परवेज परवाज और असद हयात द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट पेटिशन दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई। लेकिन अदालत ने उसे खारिज करते हुए सेक्शन 156 (3) के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया। जिसके बाद सीजेएम गोरखपुर की कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए गुहार लगाई गई। जिस पर कुल 10 महीने तक सुनवाई चली और अंततः मांग को खारिज कर दिया गया। 

मामला खारिज कर दिए जाने के बाद याचिकाकर्ताओं द्वारा हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल हुआ। तब जाकर इस मामले में एफआईआर दर्ज हो पायी। एफआईआर के बाद योगी के साथ सहअभियुक्त अंजू चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और जांच पर स्टे ले लिया। पर 13 दिसम्बर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने अंजू चौधरी की एसएलपी को खारिज कर दिया और जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सीबीसीआईडी की इस जांच के लिए अखिलेश  यादव सरकार ने अपने जांच अधिकारी को अनुमति ही नहीं दी और मामला वहीं का वहीं पड़ा रहा।

सरकार द्वारा सीबीसीआइडी जांच की अनुमति नहीं देने पर सरकार को हाईकोर्ट ने तीन हफ्ते में जवाब देने को कहा है। अगर जांच सही पाई जाती है तो इस मामले में प्रदेश के मुख्यमंत्री को तीन साल की सजा हो सकती है। 

पर सब जानते हैं कि जब अखिलेश सरकार ने जांच के आदेश नहीं दिए फिर योगी जी अपने खिलाफ ही जांच के आदेश क्यों देंगे? 

Apr 1, 2017

दलित युवक को प्रेम करने की मिली सजा, आंखें निकाली फिर लिंग काटा

नृशंस हत्या के मामले में पुलिस ने दर्ज किया आत्महत्या का केस, कल गांव में बहुजन सेना और बहुजन स्टूडेंट फेडरेशन का होगा प्रचंड प्रदर्शन

जनज्वार। आप तस्वीर देख कर विचलित हो सकते हैं पर जनज्वार का मानना है कि आपको नृशंसता के इस वारदात की तस्वीर देखनी चाहिए, क्योंकि मारे गए उस 25 वर्षीय दलित युवक की भावनाएं कम कोमल नहीं रही होंगी, जिसकी मोहब्बत के बदले आंखें निकाल ली गयीं हैं, लिंग काट लिया गया। 


प्रेम करने का खामियाजा कुछ इस तरह चुकाया मधुकर ने : आँखें निकालीं, लिंग काटा और बुरी हालत में मौत के घाट उतार दिया 
एक पिछड़ी जाति की लड़की से प्रेम करने वाले युवक की नृशंस हत्या कर उसका लिंग और दोनों आँखें  निकाल लिए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। उससे भी सनसनीखेज यह है कि पुलिस ने इस मामले में आत्महत्या का मुकदमा दर्ज कर अपना काम पूरा कर लिया है। 
घटना तेलंगाना के करीमनगर जिले के  मंथानी गांव की है। 30 मार्च को नृशंसतापूर्वक मारा गया 25 वर्षीय मधुकर दलित जाति से है। बहुजन सेना के प्रोफेसर कादिर कृ​ष्णा बताते हैं, 'मधुकर गांव के ही पिछड़ी जाति के आदमी के यहां ट्रैक्टर चलाने का काम करता था। काम करने के दौरान ट्रैक्टर मालिक की बेटी से उसे प्यार हो गया। घर वालों  को यह बात पता चली तो उन्होंने उसे न सिर्फ जान से मार दिया, बल्कि दोनों आंखें निकाल लीं और लिंग काट दिया।'

गौरतलब है कि लड़की ने मधुकर से शादी करने के लिए घर वालों पर दबाव डाला और नहीं मानने पर जहर खा लिया। लेकिन लड़की की जान बच गयी. बाद में लड़की को जब पता चला कि उसके घरवालों ने मधुकर के साथ कुछ बुरा किया है तो उसने अपने प्रेमी मधुकर के घरवालों को फोन किया। घरवालों को मधुकर की लाश क्षत—विक्षत हालत में मिली। 
 दलित युवक मधुकर : प्रेम के बदले मिली मौत 
कल सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के साथ मंथानी  गांव जा रहे कादिर बताते हैं, 'लड़की पिछड़ी जाति के 'मुनरू कापोस' उपजाति से है जिनकी टाइटिल 'डोरा' है। टीआरएस पार्टी के स्थानीय एमएलए पुट्टा मधु भी लड़की की ही जा​ति से हैं और उनका लड़की के ​परिवार से गहरा ताल्लुक है।' 

प्रोफेसर कादिर के अनुसार, ' मुनरू कापू जाति वाले अपने को रेड्डी सवर्णों के बहुत करीब पाते हैं और दलितों से वह वैसे ही नफरत करते हैं, जैसे दूसरी ताकवर जातियां। उसी नफरत का नतीजा है उनकी लड़की से प्रेम करने वाले युवक की यह नृशंस हत्या है।' 

दलित युवक की हत्या से व्यथित अर्चना सोंटी अपने फेसबुक पर तस्वीर शेयर करते हुए लिखती हैं, 'कहां गए पिछड़ी जातियों के वो ठेकेदार जो खुद को मजबूत बनाने के लिए बहुजन कहते हैं। वह टीवी पर बैठने वाले ब्राह्मण कहां हैं, क्यों चुप हैं जब एक दलित को प्यार के गुनाह में इस तरह से मारा गया।' 

इसी तरह सतीश कुमार कहते हैं, 'यह फिर हुआ है एक जातिवादी समाज में। फिर एक बार एक ​दलित की हत्या की गयी है। पर अबकी हत्यारों की झुंड में सवर्ण जाति कम्मा और रेड्डी नहीं हैं। वेलमा भी नहीं है, ​​बल्कि 'मुनरू कापू' पिछड़ी जाति के लोगों ने हत्या की है,जो धीरे—धीरे एक हत्यारे गैंग में तब्दील होते जा रहे हैं।

वीडियो में देखें मधुकर के भाई और मां क्या कह रहे हैं


मेट्रो में यौन उत्पीड़न रोकने का नायाब तरीका


अगर आप भी मेट्रो यात्री हैं तो इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि मेट्रो में यात्रा करने वाली लड़कियों—महिलाओं को कई बार मर्दों द्वारा जानबूझकर किए जाने वाले धक्का—धुक्का और शरीर सटाने की हरकतों का शिकार होना पड़ता है। पर भारत में इस तरह के यौन उत्पीड़न को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अलबत्ता कई बार विरोध करने वाली औरतों को ही दोषी करार दिया जाता है। 

पर दक्षिण अमेरिकी देश मैक्सिको ने इसे गंभीरता से लिया है। तमाम तरह के विज्ञापनों और समझाइस के बाद भी जब मर्द सहयात्री महिला यात्रियों को धक्का देने, औरतों के पीछे खड़ा होकर लिंग सटाने या उनके स्तनों को दहिने—बाएं होकर चोरी—छिपे दबा देने से बाज नहीं आए तो मेट्रो ने एक नायाब तरीका निकाला।

यौन उत्पीड़न रोकने के तरह—तरह के प्रयोग दुनिया भर में हो रहे हैं। मैक्सिको ने सार्वजनिक परिवहन में स्त्रियों के यौन उत्पीड़न रोकने का एक अदभुत प्रयोग किया है। मैक्सिको सिटी की व्यस्ततम मेट्रो में 'पेनिस सीट' लगाई है। पुरुषों के लिए रिज़र्व इस सीट के सामने लिखा है, "यहां बैठना असुविधाजनक है, लेकिन यह उसके मुकाबले कुछ नहीं है, जो महिलाएं अपनी रोज़ाना यात्रा के दौरान झेलती हैं।"

इस प्रयोग​ कि पुरी दुनिया में भर में सराहना—आलोचना हो रही है। पर इस प्रयोग को आजमाने वाली टीम का कहना है​ कि मेट्रो में औरतों से सटने या उन्हें छेड़ने या उनके शरीर में धक्का देने से उन्हें कैसा अहसास होता है, उसका अंदाजा मर्दों को लगना ही चाहिए। और यह तरीका सबसे सटीक है। 

वीडियो में देखें यात्रियों की प्रतिक्रिया 


Mar 31, 2017

आज देश सेलीब्रेट कर रहा #fenkudivas और #pappudivas



आज 1 अप्रैल पुरी दुनिया में 'मुर्ख दिवस' के रूप में मनाया जाता है। तमाम लोग एक—दूसरे को किस्से, कहानियां या उटपटांग बातें या वायदे कर उल्लू या बकलोल बनाते हैं और यह कह कर खुश होते हैं, 'अप्रैल फूल बनाया, बहुत मजा आया।' 

पर भारत में आज का यह दिन पप्पू और फेंकू दिवस के ​रूप में मनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर यह दोनों ही ट्रेंड कर रहे हैं। ट्वीटर पर फेंकू दिवस पहले स्थान पर ट्रेंड कर रहा है तो पप्पू दिवस चौथे पर है। 

व्यंग्यात्मक लहजे में समझें तो यह पूप्पू और फेंकू दोनों नाम देश की दो राष्ट्रीय पार्टियों के सुरमाओं के नाम हैं। पहले हैं राहुल गाँधी और दूसरे हैं प्रधानमंत्री मोदी। 

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लोग पप्पू और प्रधानमंत्री मोदी को फेंकू कह कर मजाक बनाते हैं। इन नेताओं के बारे में जनता का आम ख्याल ये है कि राहुल गाँधी राजनीति के बबुआ हैं तो मोदी बड़बोले हैं, जो वायदों और भाषणों से आगे कुछ नहीं करते। 

इन दोनों नेताओं के उपनाम का इतिहास यह है कि मोदी और भक्तों ने राहुल गांधी के उटपटांग बयानों के चलते पप्पू कहना शुरू किया तो राहुल गांधी और उनके लोगों ने मोदी के बड़े—बड़े वायदों के मद्देनजर फेंकू। पर देश के आमलोगों के ये दोनों उपनाम बहुत प्रिय है. आज मुर्ख दिवस १ अप्रैल पर इन नामों का ट्विटर पर ट्रेंड करना इसका प्रमाण भी है। 

13 मजदूरों के उम्रकैद के खिलाफ जंतर मंतर पर प्रतिवाद सभा

जनज्वार। मारुति मजदूरों को उम्रकैद की सजा के विरोध में मज़दूर संघर्ष अभियान (MASA) की तरफ़ से जंतर मंतर, नई दिल्ली में आज 31 मार्च को एक प्रतिवाद सभा आयोजित की गयी। इसमें मासा के विभिन्न घटक मज़दूर सहयोग केंद्र गुड़गांव, रूद्रपुर, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, जन संघर्ष मंच हरियाणा, इंकलाबी केंद्र पंजाब, कर्नाटका श्रमिक शक्ति, हिंदुस्तान मोटर SSKU, AIWC, ICTU, IFTU, IFTU (सर्वहारा), TUCI, मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन मानेसर, होंंडा, डाइकिन, मारुति प्रोविजनल कमिटी के प्रतिनिधि और सहयोगी शामिल रहे।


सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि 13 मारुति मजदूरों को सरकार और पूंजीपतियों के इशारे पर न्यायपालिका ने उम्रकैद की सजा सुनाई है, उसके माध्यम से मज़दूर वर्ग को धमकी दी गयी कि अगर मज़दूर ट्रेड यूनियन बनाने के लिए, ठेका प्रथा खत्म करने के लिए, प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाएंगे तो उनका इस तरह से दमन किया जाएगा। सारे तथ्य, सबूत, न्याय, क़ानून, व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में मज़दूरों के ख़िलाफ़ हैं। 

मारुति मजदूरों का संघर्ष स्थायी ठेका मज़दूर की एकता के साथ मालिकाना दमन के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग के संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था। इसलिए इस वर्ग संघर्ष में यूनियन नेतृत्व को निशाना बनाया गया, ताकि मज़दूरों में से कोई नेतृत्व करने के लिए आगे ना आये। मगर सत्ता द्वारा मारुति के आंदोलन को कुचलने के प्रयास के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया के मज़दूर भी अपनी वर्गीय एकजुटता के साथ खड़े दिखाई दिए।

मासा ने सभी संघर्षशील मजदूरों और संगठनों से अपील की कि इस संघर्ष को उसी जुझारू तरीके से बरकरार रखें, जिसकी मिसाल मारुति के मज़दूरों ने कायम की है। मालिकों द्वारा बनाये गए ठेका, स्थायी, अप्रैंटिस के विभाजन से आगे बढ़कर इस हमले का विरोध करना होगा, क्योंकि क्योंकि ये विभाजन मालिक के मुनाफे को बढ़ाने के लिए शोषण करने का आधार हैं। 

सभा के दौरान  4—5 अप्रैल के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विरोध कार्यक्रम  को सफ़ल बनाने की भी अपील की गयी जिसमें सभी मौजूद संगठनों ने 4—5 अप्रैल को अपने सम्बंधित शहरों में अपने स्तर पर प्रतिवाद करने की घोषणा की। कार्यक्रम के दौरान मासा की तरफ़ से श्रम मंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा गया।

इसमें 13 मारुति मज़दूरों को रिहा करने, सभी झूठे मुक़दमे वापस लेने, 117 बरी मजदूरों सहित सभी बर्खास्त मज़दूरों को काम पर वापस लेने की मांग की गई। मारुति मज़दूरों को न्याय दिलाने हेतु जंतर मंतर दिल्ली में आयोजित प्रतिवाद सभा में रुद्रपुर, उत्तराखंड से महिंद्रा सीआईए श्रमिक संगठन के साथी भी शामिल थे।

छात्राओं को नंगा करने वाली वॉर्डन बर्खास्त

आरोपी वार्डन ने रखा अपना पक्ष, कहा यह उन शिक्षकों की साजिश जो पढ़ाना नहीं चाहते 
 

मुजफ्फरनगर से संजीव चौधरी की रिपोर्ट 

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर के कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय में 30 मार्च को हॉस्टल वार्डन सुरेखा तोमर द्वारा विद्यालय की छात्राओं को निर्वस्त्र कर कक्षा में बैठाने का एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया है। हॉस्टल वार्डन की इस घिनौनी करतूत का पीड़ित छात्राओं ने विरोध किया है। आरोपी वॉर्डन को सरकार ने फिलहाल बर्खास्त कर दिया है। घटना के बाद कई छात्राओं के अभिभावक अपनी बच्चियों को स्कूल से घर ले गए हैं। 

गौरतलब है कि मुज़फ्फरनगर के खतौली थाना क्षेत्र के तिगरी गांव स्थित सरकारी कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय का है। विद्यालय में आमतौर पर गरीब परिवार की बच्चियां पढ़ती हैं। इनमें से कुछ बच्चियां महज आठ वर्ष की हैं, जिन्हें अभी ना खाने का पता है और ना ही पीने का। विद्यालय में आठ साल से लेकर 12 वर्ष की बच्चियां अपने परिवार से दूर शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। 

खतौली के कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय में वार्डन ने रविवार 26 मार्च को विद्यालय में अध्यनरत 65 छात्राओं को संयुक्त रूप से कक्षा में ले जाकर नग्न अवस्था में खड़ा किया। वार्डन सुरेखा ने कई घंटों तक कई छात्राओं को पूर्ण रूप से निर्वस्त्र रखा। छात्रायें खुद को अपमानित महसूस करती रहीं, लेकिन वार्डन ने छात्राओं की एक न सुनी। 

महिला वॉर्डन ने छात्राओं के साथ यह सनकी सलूक क्यों किया, यह तथ्य और चौंकाने वाला है। दरअसल वॉर्डन को विद्यालय के टॉयलेट में ब्लड के धब्बे मिले थे जिसे देख विद्यालय की वार्डन आग बबूला हो गईं। जिसके बाद उसने सभी छात्राओं को क्लास रूम में ले गयीं और कुछ छात्राओं को निर्वस्त्र होने के​ लिए कहा और एक—एक कर छात्राओं के मासिक धर्म होने की जांच करने लगीं। 

इस बीच छात्राएं रोती—बिलखती रहीं, लेकिन हिटलर बनी हॉस्टल की वार्डन न तो शर्मिंदा हुई और न छात्राओं की हालत पर उसे तरस आया। वार्डन टॉयलेट में ब्लड को देख समझ चुकीं थीं कि विद्यालय की किसी छात्रा को मासिक धर्म हुआ है, जिसने ये टॉयलेट गंदा किया है। बस वार्डन ने उस छात्रा को ढूंढने के लिए इस घिनौनी करतूत को अंजाम दिया। 

वार्डन की इस हरकत के बाद छात्राओं ने विद्यालय में जमकर नारेबाजी कर विरोध शुरू कर दिया। बवाल मचने पर पहुंचे बेसिक शिक्षा अधिकारी चंद्रकेश यादव ने आनन—फानन में सात सदस्यों की टीम बनाकर इस पूरे मामले की जाँच कर वार्डन सुरेखा पर आरोप सिद्ध होने तक निलंबित कर दिया था। पर अब सरकार ने आरोपी वॉर्डन को बर्खास्त कर दिया है।  

आठवीं पढ़ने वाली छात्रा ने बताया, 'बाथरूम की कुण्डी में खून लग गया था। बड़ी मैम 'वार्डन मैम' ने उसका कुछ उल्टा मतलब निकाला। फिर बड़ी मैम ने हम सभी लड़कियों के कपड़े उतरवाए और दो लड़कियों के गुप्तांग दबाकर चेक करने को कहा। इस बीच मैम लगातार धमकाती रहीं कि जल्दी बताओ कि किसका डेट आया है, नहीं तो सबको पीटूंगी। 

छठवीं कक्षा की छात्रा के मुताबिक, 'मैम ने हमें नीचे बुलाया और कहा कि जिसके—जिसके मासिक धर्म हो रहे हैं वह खड़े हो जाओ। फिर नंगा होने का कहा। हमने बीएसए से इनकी शिकायत कर दी है। अगर यह रहेंगी तो हम लड़कियां यहां नहीं रहेंगी।' 

बवाल मचने के बाद मौके पर पहुंचे परिजन संजीव त्यागी कहते हैं, 'मेरी बेटी कक्षा 6 में है। उसने मुझे पर बताया कि मैडम बच्चियों से कपड़े उतारने को बोल रही हैं। बेटी ने फोन पर बताया कि किसी बच्ची के मासिक धर्म आने पर बाथरूम में कहीं खून का धब्बा लग गया था, जिसके कारण वार्डन ने ऐसा किया। 

आरोपी वार्डन सुनिता का कहना है, 'मैंने ऐसा कुछ नहीं किया, यह सब यहां के स्टाफ की साजिश है। वह नहीं चाहता कि मैं स्कूल में रहूं। उन्हें मेरे होने से ड्यूटी करनी पड़ती है। नंगा कराने वाली बात झूठ है। बाथरूम की दीवार पर खून लगा था इसलिए मैंने जानने के लिए बच्चियों को बुलाया कि किसी के साथ कोई समस्या तो नहीं। कई बार 10—12 साल की लड़कियों का ​मासिक धर्म होता है पर उन्हें कुछ पता नहीं रहता। दूसरा लड़कियां पैड ट्वायलेट के कमोड में डाल देती हैं फिर सैनीटेशन की भारी समस्या हो जाती है। मैंने इस बारे में भी बात की।'