Jul 18, 2011

यूपी का पत्रकार मतलब डिक्टेशन ब्वाय

हद तो यहां तक है कि मुख्यमंत्री मायावती की प्रेस कांफ्रेस का पूर्वाभ्यास किया जाता है और माननीया से पूर्व निर्धारित और रटाए गये प्रश्न ही पूछे जाते हैं। प्रेस कांफ्रेस में बड़े से बड़ा पत्रकार अपनी मर्जी से सवाल पूछने की हिमातक नहीं करता...

आशीष वशिष्ठ

बात 25अक्टूबर 1996की है। बसपा के संस्थापक कांशीराम के दिल्ली स्थित आवास के बाहर मीडिया का जमावड़ा था। असल में देशभर का मीडिया कांशीराम से यूपी में त्रिषंकु विधानसभा चुने जाने पर बसपा की भावी योजना और तमाम दूसरे सवालों के जवाब जानने के लिए जमा हुआ था। लेकिन पत्रकारों के प्रश्नों से झुंझलाए और तमतमाए कांशीराम और उनके सर्मथकों और सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। इस हमले में आज तक चैनल के पत्रकार आशुतोष गुप्ता और बीआई टीवी के पत्रकार इसार अहमद को छाती पर गहरी चोटें आई और उन्हें अस्पताल भर्ती कराना पड़ा। मौजूदा समय में भी उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता के कुछ ऐसे ही हालात दिखने लगे हैं.


डिक्टेशन पर उठा सवाल तो लो मैं उठ गयी


हालिया घटना में राजधानी लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के चेयरमैन प्रो० निशीथ राय के साथ घटी है। प्रो.राय के इलाहाबाद स्थित पैतृक निवास में सरकार के इशारे पर कई थानो की पुलिस ये कहकर कि उनके घर में धड़धड़ाते हुये घुसी कि उनके घर में अपराधी छिपे होने की खबर है। यूपी पुलिस को वहां कोई अपराधी नहीं मिला। गौरतलब है कि इस घर में प्रो. राय की वृद्व माताजी रहती हैं। प्रो0राय जनहित से जुड़े मुद्दों और मसलों पर पूरी ईमानदारी और सच्चाई से अपनी आवाज मुखर करते हैं।

असल में मायावती अपनी बुराई और आलोचना सुनने की क्षमता ही खो चुकी है। इसीलिए उनके षासन में प्रेस पर हमले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं और मायावती पार्टी जनों और नौकरशाहों के आचरण और व्यवहार को बदलने की कोशिश करने के स्थान पर अपने विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को डंडे के डर से चुप कराने के अलोकतांत्रिक तरीके का प्रयोग खुलकर कर रही हैं। जेल में बंद डा0 सचान की हत्या से जुड़े खुलासे प्रेस ने करने शुरू किये तो मायावती सरकार पूरी तरह से बौखला गई।

प्रेस के खुलासों और खोज से डा0सचान की आत्महत्या वाली थ्योरी झूठी साबित होने लगी तो सरकार के इशारे पर एएसपी और सीओ स्तर के अधिकारी ने आईबीएन 7चैनल के पत्रकार शलभमणि त्रिपाठी और मनोज राजन त्रिपाठी से दुर्व्यवहार और मारपीट की। मनोज तो किसी तरह से पुलिस की चंगुल से भाग निकले पर शलभ को पुलिस अधिकारी हजरतगंज थाने में ले आये और अपने मातहतों को उन्हें पीटने और झूठे आरोपों में बंद करने का हुक्म दिया। लेकिन पत्रकार बिरादरी के मुखर विरोध और प्रदर्शन से घबराई पुलिस ने शलभ को छोड़ दिया और मजबूरन सरकार को आरोपी पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर मुकदमा दर्ज करना पड़ा।

यूपी में पत्रकारिता दिनों-दिन जोखिम का काम साबित हो रहा है। 2007में बसपा सरकार बनने के बाद से ही प्रदेश में गिने-चुने चम्मच पत्रकारों को छोड़ अधिकतर पत्रकारों को सरकारी मकान से बेदखल करने और मान्यता समाप्त करने कार्यवाही चल री है। प्रदेश से छपने वाले बड़े-बड़े बैनर के अखबार सरकार की चम्मचागिरी और चरणवंदना में लगे हैं। चंद चंपू टाइप चाटुकार पत्रकारों के अलावा बसपा सरकार का मीडिया से मधुर संबंध नहीं है। हद तो यहां तक है कि सीएम की प्रेस कांफ्रेस का पूर्वाभ्यास किया जाता है और माननीया मुख्यमंत्री पूर्व निर्धारित और रटाए गये प्रष्न पूछे जाते है। प्रेस कांफ्रेस में बड़े से बड़ा पत्रकार हिमाकत करके अपनी मर्जी से सवाल पूछने का आजाद नहीं है।

एक तरह से मायावती पत्रकारों को जो डिक्टेट करती हैं और पत्रकार बंधु सुनते,समझते और छापते हैं। असल में मायावती हर काम को डंडे के जोर पर कराने की आदी है। ऐसे में वो प्रेस को अपने मनमुताबिक चलाना और हांकना चाहती है,और जो कलम या आवाज सच को जनता के सामने लाने का साहस करती है उसको प्रो0राय और शलभ की तरह सरकारी गुस्से का शिकार होना पड़ता है।

आंकड़ों का खंगाला जाय तो पूरे देश में ही पत्रकारों पर हमलों का आंकड़ा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। जेडे हत्याकाण्ड ने पूरे देश और पत्रकार बिरादरी को हिला कर रख दिया था। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो साल 2008 से लेकर जून 2011 तक देश में लगभग 181 पत्रकारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। दिसंबर 2010 में छत्तीसगढ़ में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक और जनवरी 2011 में नई दुनिया के पत्रकार उमे राजपूत, जुलाई 2010 में इलाहाबाद में इण्डियन एक्सप्रेस के पत्रकार विजय प्रताप सिंह, जुलाई 2010 में ही स्वतंत्र पत्रकार हेम चंद्र पाण्डेय की आंध्र प्रदेश में हुयी हत्याओं ने पूरे देश को यह सोचने को विवश कर दिया था कि क्या वास्तव में हम लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश का हिस्सा हैं।

प्रदेश में पत्रकारों का बोलना तो मायावती को अखर ही रहा है वहीं सरकार के विरोध में उठने वाले स्वर को दबाने के लिए सरकार ने सूबे में धरना,प्रदर्शन और आंदोलन की नियमावली बनाकर आम आदमी की आवाज को दबाने का कुत्सित प्रयास किया है। आज प्रदेश में सत्ताधारी दल के कई नेता अपना अखबार और पत्रिकाएं और चैनल चला रहे हैं।

राजधानी में पिछले दिनों शुरू हुये एक हिन्दी दैनिक को भी सत्ताधारी दल से जुड़ा बताया जा रहा है। सत्ताधारी दल से जुड़े अनेक प्रकाशन सरकारी विज्ञापनों के जरिये हर माह लाखो-करोड़ो की कमाई कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि सूबे में नयी-नवेली पत्र पत्रिकाओं की बाढ़ पिछले चार साल में आई है,लेकिन इन सब के बीच में पत्रकारिता कहीं खो या दब चुकी है।



स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक- सामाजिक मसलों के टिप्पणीकार.




 

 

आतंक की राजनीति की जद में फिर आया आजमगढ़


मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL)ने 13जुलाई को हुए मुंबई बम धमाकों की जांच पर मुंबई आतंकवाद निरोधी दस्ते के प्रमुख राकेश मारिया और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक बृजलाल के अंर्तविरोधी बयानों पर सवाल उठाया है। पीयूसीएल ने के प्रदेश संगठन सचिव शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा कि एक तरफ राकेश मारिया कह रहे हैं कि मुंबई एटीएस उत्तर प्रदेश भेजी जा चुकी है,वहीं बृजलाल कह रहे हैं कि मुंबई एटीएस नहीं आई है।


2007 धमाकों के आरोपी  का घर : ना जाने और कितने


 पीयूसीएल के मुताबिक अगर बृजलाल कहते हैं कि मुंबई एटीएस की कोई टीम यूपी नहीं आई है और मुंबई धमाकों का यूपी कनेक्सन नहीं मिला है,तब उन्हें मुंबई आतंकवाद निरोधी दस्ते के प्रमुख मारिया द्वारा लगातार आ रहे बयानों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्योंकि मुंबई एटीएस के यूपी आने और उसके द्वारा युवकों से पूछताछ और उठाने की खबर लगातार छापी जा रही है और इन खबरों का आधार मुंबई एटीएस और यूपी पुलिस और खूफिया विभाग हैं।

इसके साथ पीयूसीएल ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वो तत्काल कथित पुलिसिया और खूफिया स्रोतों द्वारा अखबारों में सांप्रदायिक मंशा से प्लांट की जा रही खबरों पर रोक लगाए। संगठन के मुताबिक दैनिक जागरण में आजमगढ़ से छपी खबर ‘एटीएस पहुंची आजमगढ़, एक को उठाया’ की सत्यता पर सवाल उठाया है। पीयूसीएल के मसीहुद्दीन संजरी,और तारिक शफीक ने कहा कि इस खबर के माध्यम से जिले में डर व दहशत का माहौल बनाने की कोशिश की गई है। संगठन  के  मुताबिक  हिंदी दैनिक अमर उजाला लखनऊ ने अपने १६ जुलाई के अंक में पहली लीड स्टोरी ‘‘संजरपुर के सैकड़ों मोबाइल फोन पर खूफिया निगाहें’’लगायी है,यह खबर न सिर्फ आजमगढ़ को बदनाम करने की शातिर कोशिश है बल्कि कई पहलुओं से तो हास्यास्पद भी बन गई है।

मसलन यह खबर अपने राजनीतिक और सांप्रदायिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए यहां तक कहती है ‘‘लखनऊ जेल में बद आईएम के आंतकी सलमान व तारिक कासमी से भी पूछताछ की गई है।’’ जबकि सच्चाई तो यह है कि सलमान जिसे कुछ महीनों पहले ही दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली विस्फोटों के आरोप से बरी कर दिया है और वह अब दूसरे आरोप में जयपुर की जेल में बंद है और जहां तक तारिक कासमी से पूछताछ की बात है तो उसकी सच्चाई यह है कि बकौल तारिक के ही उससे किसी ने इस मामले में पूछताछ नहीं की है। यह बात खुद तारिक कासमी से मिलकर आए उनके वकील और चर्चित मानवाधिकार नेता मो. शोएब ने इस झूठी खबर को पढ़ने के बाद पीयूसीएल की तरफ से जारी प्रेस नोट में कहा।

दरअसल कोर्ट ने यह पाया कि सलमान जिसे एटीएस ने उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर से गिरफ्तार करने का दावा किया था, के साथ पुलिस ने जिस नेपाली पासपोर्ट के बरामद होने का दावा किया था उसे वह कभी पेश नहीं कर पाई। दूसरे, पुलिस ने एक फर्जी फोटो स्टेट जिसमें सलमान की उम्र 27 साल दिखाई गई थी जबकि उसकी वास्तविक उम्र पन्द्रह साल थी को कोर्ट में पेश किया और तीसरे पुलिस ने सलमान के पास से जो सउदी अरब का हेल्थ कार्ड बरामद होने का दावा किया था वो भी फर्जी निकला।

कोर्ट ने पुलिस और एटीएस पर सलमान जैसे निर्दोष को फसाने के लिए पुलिसिया करतूतों की काफी आलोचना की और सख्त हिदायत दी कि पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाए। यहां दिलचस्प बात है कि सलमान की गिरफ्तारी के वक्त भी मीडिया द्वारा इन्हीं झूठे सुबूतों का पुलिंदा बनाकर उसकी एक खतरनाक छवि बनाने का प्रयास किया गया था। दरअसल सलमान के सहारे पुलिस और खूफिया एक मीडिया ट्रायल कर रहे हैं कि सलमान भले ही सुबूतों के आभाव में बरी हो गया है लेकिन वह आतंकवादी है।

यह राज्य की नीति  है कि वह अपने द्वारा अपने हितों के लिए पकड़े गए लोग जो न्यायालय से बरी भी हो गए हैं,उनको समाज में अस्वीकार बना दें। इसी खबर में कहा गया है कि सलमान जो की छोटी उम्र का है इसलिए उससे छोटी उम्र के लड़कों के बारे में जानकारी इकट्ठी की जा रही है के सहारे छोटी उम्र के आजमगढ़ के लड़कों पर जहां एक ओर मनोवैज्ञानिक रुप से दबाव बनाया जा रहा है। वहीं समाज के नजर में उन्हें एक संदिग्ध मुस्लिम पीढ़ी के बतौर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

आजमगढ़ के मुसलमानों के खिलाफ यह ऐसी साजिश बाटला हाउस के वक्त भी की गई थी जब 16साल के साजिद को बाटला हाउस (बाटला हाउस कांड को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी वेब साइट पर फर्जी मुठभेड़ो की लिस्ट में रखा है।)फर्जी मुठभेड़ में मारकर कांग्रेस ने आजमगढ़ के बच्चों पर यह आरोप मढ़ा कि वह आतंकवादी होते हैं। इस रणनीति से फायदा यह है कि हिंदुत्वादी दिशा अख्तियार कर चुके राजनीतिक माहौल में टेरर पालिटिक्स को लंबे समय तक जिन्दा रखा जा सकता है.

हरियाणा से लौटे दर्जनभर मजदूरों की मौत



उत्तर प्रदेश के सोनभद्रसे काम की तलाश में हरियाणा गए दर्जनों मजदूर अपने शरीर में मौत लेकर लौटें हैं.इनमें से करीब एक दर्जन से भी ज्यादा मजदूरों की विगत एक वर्ष में टीबी से मौत हो चुकी है और दो दर्जन से भी ज्यादा टीबी की बीमारी से ग्रसित है।यह जानकारी जन संघर्ष मोर्चा के जांच दल ने प्रेस को दी। गौरतलब है कि सोनभद्र के चोपन ब्लाक के कोन क्षेत्र के गिधिया गांव सैकड़ों मजदूर हरियाणा के फरीदाबाद जिले में पाली पहाड़ पर पत्थर खदान और क्रशर में काम करने पिछले वर्ष काम करने गए थे।

बारह घंटे के काम की मजदूरी इन मजदूरों को सौ रूप्ए प्रतिदिन के हिसाब से मिलती थी। काम के दौरान ही इन मजदूरों के सीने में दर्द,बुखार और खांसी की शिकायत होने पर खदान मालिक ने इन मजदूरों को वापस भेज दिया। यहां वापस आने पर इन मजदूरों ने जांच करायी तो टीबी निकला। इनमें से करीब दर्जनभर से ज्यादा मजदूरों की दवा के अभाव में अब तक मौत हो चुकी है।

मरने वाले मजदूरों में बीरबल चेरो पुत्र रूपचंद उम्र 18वर्ष,संजय कुमार गोड़ पुत्र बसंत 30वर्ष, उदय कुमार पुत्र बसंत 25 वर्ष, अजय कुमार कलवार पुत्र मिश्रीलाल 30 वर्ष, शिवभजन गोड़ पुत्र रामलाल उम्र 42 वर्ष, जोगेन्द्रर चेरो पुत्र मुन्नीलाल उम्र 28 वर्ष, जयनाथ गोड़ पुत्र करीमन उम्र 35 वर्ष, जगरनाथ गोड़ पुत्र करीमन उम्र 25 वर्ष, धनेश्वर चेरो पुत्र बरसावन उम्र 28 वर्ष, देवकुमार चेरो पुत्र रामभरोस उम्र 25 वर्ष, भगवान दास चेरो पुत्र बुटाई उम्र 45 वर्ष, रामविचार चेरो पुत्र श्री 22 वर्ष, सुनरदेव चेरो पुत्र श्री 20 वर्ष, शिवप्रसाद चेरो पुत्र विश्वनाथ उम्र 45 वर्ष, कृपाशंकर चेरो पुत्र बैजनाथ उम्र 20 वर्ष है।

इसी प्रकार गांव में करीब दो दर्जन से ज्यादा मजदूर अभी भी टीबी के मरीज है। जिसमें से आनंद गोड़, देवकुमार गोड, मंगरू चेरों, नागेष्वर गोड़, संजय कुमार गोड़, अक्षय कुमार गोड़, राजकुमार गोड़, अशोक चेरो, कुन्त बिहारी गोड़, प्रमोद कलवार, मोहनदास चेरो, सुखराज, आषीष कलवार, गोपी चेरो, रामधनी चेरो, इन्द्रदेव गोड़, संजय गोड़, विद्यानाथ गोड़ की हालत तो बेहद गम्भीर है। जसमों जांच दल को ग्रामीणों ने बताया कि चोपन ब्लाक के 23 ग्रामसभाओं वाले इस कोन क्षेत्र में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है जिसमें आयुर्वेदिक के एक डाक्टर नियुक्त है वह भी आमतौर पर केन्द्र पर नहीं रहते परिणामतःह दवा के लिए हमें झारखण्ड़ के नगरउटांरी में जाना पड़ता है और यहां इलाज कराना इतना महंगा पड़ता है कि हम लोग इलाज नहीं करा पाते।

ग्रामीणों ने बताया कि गाँव में मनरेगा में यदि हमें साल में सौ दिन काम मिलता तो हमें हरियाणा में काम के लिए गांव से पलायन करने की जरूरत ही न पड़ती लेकिन यहां तो स्थिति यह है कि काम तो मिलता नहीं और जो काम हम करते भी है उसकी भी मजदूरी सालों बकाया रहती है। ग्रामीणों ने उदाहरण देते हुए बताया कि वर्ष 2006में ब्लाक द्वारा बंधी का निर्माण कराया गया पर आज तक उसकी मजदूरी नहीं मिली।

इसी प्रकार विगत वर्ष ग्रामसभा के परसहीया और चिवटहीया टोला में आरईएस विभाग द्वारा कराए गए खंडजा निर्माण,पीडब्लूडी द्वारा बनवायी गयी सड़क और वनविभाग द्वारा खोदवाएं गए ट्रेच व गड्डों की मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है। इसलिए अपने परिवार के जीवनयापन के लिए मजबूरी में हमें पलायन करना पड़ता है। काम की तलाश में हम हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र जाते है। जहां पर काम करन से हमें बीमारी मिलती है।

जन संघर्ष मोर्चा के जिलाध्यक्ष और गांव के प्रधान सोहराब ने बताया कि इस क्षेत्र के अस्पताल में डाक्टरों की समुचित व्यवस्था और ग्रामीणों के इलाज के लिए हमने बार-बार पत्रक दिए,मजदूरों का पलायन न हो इसके लिए मनरेगा में काम और बकाया मजदूरी के भुगतान के संदर्भ में आंदोलन किया गया पर प्रशासनिक अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेगी। जांच दल का नेतृत्व करते हुए जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलायी जा रही सचल चिकित्सा दल योजना इस जनपद में हाथी का दिखाने वाला दांत साबित हो रही है।

इस जिले के लिए दी गयी सचल चिकित्सा दल की गाड़ियां शहरों में धूमते हुए सरकार का प्रचार करते तो मिल जायेगी लेकिन कोन,भाठ जैसे सदूर इलाकों में जहां इसकी सर्वाधिक आवश्यकता आदिवासियों और ग्रामीणों को है वहां इसका दर्शन तक दुर्लभ है। उन्होनें कहा कि इस इलाके के बसपा और सपा के चुने गए विधायक और सांसद ने अपनी भूमिका अदा नहीं कि अन्यथा न तो इस इलाके के  लोगों को काम की तलाष में पलायन करना पड़ता और न ही उन्हे दवा के अभाव में दम तोड़ना पड़ता। जन संघर्ष मोर्चा ग्रामीणों और आदिवासी नौजवानों की मौत के इस मामले को राजनीतिक मुद्दा बनायेगा और मानवाधिकार आयोग को पत्र भेजा जायेगा।

Jul 16, 2011

और वह मरा अपने ही खेत में !


बच्चे सुबह जागे और पिता को पास में नहीं पाया तो बाहर निकलकर चिल्लाने लगे। गांव वालों के सहयोग से जब सुरेश को ढूंढ़ा गया तो उसकी लाश अपने ही दो बीघा बन्धक बने बंजर खेत में पायी गयी...

आशीष सागर

बांदा जिला के फतेहगंज थाना के बघेला बारी गांव में 18 जून को 42 वर्षीय किसान सुरेश यादव की कई दिनों से भूखे रहने और टीबी की लंबी बीमारी के कारण मौत हो गयी। उनकी मौत के बाद अब उनके तीन बच्चे अनाथों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बच्चों की सबसे बड़ी आसरा कही जाने वाली मां का साया तीन साल पहले 2008 में ही उठ गया था, जब सुरेश अपनी पत्नी सरस्वती के केंसर का ईलाज दो बीघा जमीन बेचकर भी नहीं करा सके थे और उनकी की मौत हो गयी थी।

छिन गया बचपन : जीवन की कठिन डगर


पत्नी की असामयिक मौत ने सुरेश की समस्याएं और बढ़ा दीं,जिसके कारण वह लंबे समय से निराश थे और बच्चों पर खुद को भार मान रहे थे। बिटिया संगीता की बढ़ती हुयी उम्र के साथ उसके ब्याह की चिन्ता और विकास, अन्तिमा के भविष्य की ऊहा-पोह में पिसते हुए 18 जून को अपने ही खेत पर खून की उल्टियों के साथ सुरेश इस दुनिया से चले गये। जब बच्चे सुबह जागे और पिता को पास में नहीं पाया तो बाहर निकलकर चिल्लाने लगे। गांव वालों के सहयोग से जब सुरेश को ढूंढ़ा गया तो उसकी लाश अपने ही दो बीघा बन्धक बने बंजर खेत में पायी गयी।

अब परिवार का सारा जिम्मा सुरेश यादव के सबसे बड़े बेटे 14वर्षीय नाबालिग विकास यादव पर है, जिसने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है। विकास बताता है कि पिता के बीमार होने के कारण उनके जीते जी भी परिवार का खर्च चलाने के लिए उसे मजदूरी करने जाना पड़ता था, जिसके कारण परीक्षा में मात्र 54 फीसदी अंक प्राप्त हुए हैं। परिवार में तंगहाली के कारण विकास की सबसे छोटी बहन अंतिमा पिछले वर्ष स्कूल छोड़ चुकी है तो बड़ी बहन संगीता मां के मरने के बाद से ही घर में चौका-बर्तन की पूरी जिम्मेदारी निभा रही है और स्कूल नहीं जाती।

पहले मां और अब पिता की मौत ने विकास से खिलंदड़ी बचपन को छीन लिया है और वह अपने हम उम्र बच्चों से बड़ा दिखता है। कुछ भी पूछने पर उसकी आंखे भर आती हैं, लेकिन वह पिता की मौत को अपने उपर हावी होने देने से लगातार जूझता है और गमछे से आंखों को पोछ कहता है, ‘घर और पढ़ने की व्यवस्था हो जाये तो बाकी का मैं संभाल लुंगा।’ एक जिम्मेदार नागरिक के गहरे अहसासों भरा विकास बताता है कि ‘मां के मरने के बाद जो बाकी दो बीघा जमीन बची थी उसे पिता ने त्रिवेणी ग्रामीण बैंक, बदौसा में 21 हजार रूपये के किसान क्रेडिट कार्ड के बदले गिरवी रख छोड़ा है।’

ग्रामीण बताते हैं,पत्नी सरस्वती की मौत के बाद से सुरेश यादव मानसिक रूप से तन्हा,अवसाद ग्रस्त और क्षय रोग से पीड़ित हो गया था। कुल चार बीघा जमीन में से दो बीघा जमीन उसने पहले ही पत्नी के इलाज में बेच दी थी और इधर बच्चों के पालन पोषण व खेती को करने के लिये सुरेश ने त्रिवेणी ग्रामीण बैंक बदौसा से 21 हजार रूपये, साहूकार से 50 हजार रूपये बतौर कर्ज ऋण लिया था। गांव वालों के मुताबिक टीबी के रोग से पीड़ित सुरेश को नरैनी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, जिला अस्पताल बांदा से नियमित रूप से डाट्स की दवायें भी उपलब्ध नहीं होती थी। परिवार की माली हालत ऐसी थी कि सुरेश के मरने के बाद विकास के पास इतना भी पैसा नहीं था कि वह अपने पिता को धर्म मुताबिक फूंकने की व्यवस्था कर पाता। गांव वालों ने आनन-फानन में सुरेश की लाश को एक चादर में लपेटकर रसिन बांध में प्रवाहित कर दिया।

मीडिया ने जब इस मुद्दे को तूल देना शुरू किया तो जनपद के तत्कालिक जिलाधिकारी कैप्टन एके द्विवेदी अपने लाव लश्कर के साथ मौके पर पहुंचे और पीड़ित परिवार के तीन अनाथ बच्चों से बातचीत की। प्रदेश की मुखिया के दिशा निर्देश के अनुसार भूख से कोई मौत न होने पाये और कोई किसान कर्ज और मर्ज से आत्महत्या न करे इस फतवे के डर से जिलाधिकारी ने तुरन्त ही विकास को बरगलाना शुरू किया और सुरेश के क्षय रोग कार्ड को मीडिया के सामने दिखाते हुये कहा कि सुरेश की मौत कर्ज से नहीं बल्कि टीबी के रोग से हुयी है।


विकास की छोटी बहनें  अंतिमा और संगीता

जिलाधिकारी के साथ मौजूद अधिकारियों ने जब मृतक के घर जाने की जहमत उठायी तो मीडिया के सामने घर की हालत देख उनके भी होश फाख्ता हो गये। सबके मूंह से एक ही आवाज आयी, ऐसे में भला कैसे जलता और कैसे चलता घर का चूल्हा ?मौके नजाकत को भांपते हुए जिलाधिकारी ने तुरंत इन्दिरा आवास, पारिवारिक लाभ योजना, एक लाख रूपये मुआवजा कृषक बीमा योजना से और बीपीएल कार्ड द्वारा मुफ्त राशन का निर्देश कोटेदार को देते हुए बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी जिला प्रशासन द्वारा वहन करने की घोषणा कर दी।

इस बीच इलाके के कुछ सामाजिक सहयोगी भी विकास की मदद के लिए सामने आये हैं,जिनमें सन्त मेरी सीनियर सेकण्डरी स्कूल के डॉ फेड्रिक डिसूजा,फादर रोनाल्ड डिसूजा, शिवप्रसाद पाठक शामिल हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार और स्वंय सेवी समूहों के विस्तृत जाल के बावजूद सुरेश यादव और उन जैसे हजारों किसानों आत्महत्याओं,भूख और बीमारियों के जबड़े में क्यों स्वाहा होते चले जा रहे हैं। क्यों विकास जैसे बच्चे अनाथ हो रहे हैं और उनका बचपन उनसे छिनता चला जा रहा है,जबकि अरबों के पैकेज की लूट में न जाने कितने लूटेरों की पीढ़ियों के लिए अकूत धन जमा होता जा रहा है। आखिरकार इन सवालों का जवाब कौन देगा ?



बुन्देलखंड के प्रमुख सूचना अधिकार कार्यकर्ता और स्वयं सेवी संगठन 'प्रवास' के प्रमुख.

नए धमाके पर पुरानी सियासत

हर बार की तरह बयानबाजी,हल्ला-गुल्ला,गहमागहमी और मुआवजे आदि की फौरी कार्यवाही के अलावा कुछ नया होने वाला नहीं है। असल मे हमारे यहां आंतक को सरकार और सरकारी अमले ने एक खास समुदाय से जोड़कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है...

आशीष वशिष्ठ

बुधवार 13 जुलाई को मुंबई में हुये सीरियल ब्लास्ट में  19 लोगों की मौत ने  सुरक्षा तंत्र की पोल-पट्टी तो खोली ही है, सरकारी दावों और बयानों की सच्चाई भी पूरे देश के सामने ला दी है। संसद पर हमले से लेकर ताजा बम ब्लास्ट तक हर बार आंतकी हमले के बाद सरकार ने आंतकवाद से सख्ती से निपटने के बयान तो जरूर जारी किये हैं, लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं है।

सरकार चाहे जितने लंबे-चौड़े दावे और कार्यवाही का आश्वाशन दे,लेकिन आंतकी घटनाएं रूकने का नाम नहीं ले रही हैं। 1993 से 2011 तक मुंबई बई पर पांच बार आंतकी हमले हुए हैं और इनमें लगभग मृतकों की संख्या लगभग 1658 और घायलों का आंकड़ा 700 के करीब है। गौरतलब है कि पिछले एक दशक में देश भर में हुये आंतकी हमलों में मृतकों और घायलों का आंकड़ा हजारों में है।

असल में समस्या हमारे तंत्र और व्यवस्था की भी है। 8 दिसंबर 1989 को तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री डा0 रूबिया सईद का जम्मू कश्मीर लिबरेसन फ्रंट के आंतकियों ने अपहरण कर लिया था। रूबिया को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए तत्कालीन वीपी सिंह की सरकार ने पांच हार्ड कोर आंतकवादियों शेख अब्दुल हमीद, गुलाम नबी भट्ट, नूर मुहम्मद कलवल, मुहम्मद अल्ताम, और जावेद अहमद जरगर को 13 दिसंबर को आजाद किया था। इसी कड़ी में 24 दिसम्बर 1999 को इंडियन एयरलाइन्स के विमान आई सी 814को जिस तरह अपहरण करके कांधार ले जाया गया और जिस तरह सरकार ने हाई प्रोफाइल तीन आंतकवादियों मुषताक अहमद जरगर, अहमद उमर सैयद शेख और मौलाना मसूद अजहर को रिहा करके अपहरणकर्ताओं के समक्ष घुटने टेके उससे भारत के सॉफ्ट स्टेट होने का संदेश संपूर्ण विश्व में गया था।

दरअसल जब देश की आंतरिक सुरक्षा और जान-माल से जुड़े गंभीर मसले पर राजनीतिक दल और नेता रोटिया सेंकना और दहशतगर्दों के खिलाफ सख्त या कड़ी कानूनी कार्यवाही करने में हीला हवाली करना राजनीतिक इच्छाशक्ति और सरकार की नीति और नीयत में खोट को सिद्व करता है।

विश्व भर में इस्लाम के अलावा भी अनेक धर्मों और संप्रदायों का नाम आंतक से जुड़ा है,लेकिन हमारे यहां सबकुछ जानते समझते हुये भी आंतक को किसी धर्म या संप्रदाय से जोड़ना राजनीतिक दलों का कुचक्र और सत्ता हासिल करने का घटिया रास्ता है। बयानबाजी करके हमारे नेता चाहे जितना दहाड़े लेकिन हमारे कागजी शेर नेता वोट बैंक की राजनीति के कारण देश की आंतरिक सुरक्षा और जान-माल से खिलवाड़ कर रहे हैं।

हर बार की तरह इस बार भी बयानबाजी,हल्ला-गुल्ला,गहमागहमी और मुआवजे आदि की फौरी कार्यवाही के अलावा कुछ नया होने वाला नहीं है। असल मे हमारे यहां आंतक को सरकार और सरकारी अमले ने एक खास समुदाय से जोड़कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है। आम भारतवासी को तो रोजी-रोटी के फेर से ही फुर्सत नहीं है ऐसे में उसके पास किसी पर आरोप लगाने या फिर उंगली उठाने का वक्त ही नहीं है।

हमारे यहां राजनीतिक दल और नेताओं ने सत्ता सुख के लिए आंतकवाद को जाति और संप्रदाय से जोड़कर आंतक पर प्रभावी और सख्त कार्यवाही से परोक्ष व अपरोक्ष रूप में रोड़े अटकाए हैं। सीमापार से होने वाले आंतकवाद हो या फिर देश में फलते-फूलते आंतक पर प्रभावी रोक और कार्यवाही तभी लग सकती है जब राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल धर्म,जात और संप्रदाय की संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर देंखेगे।

मौजुदा समय में आंतकवाद की समस्या से विश्व के कई राष्ट्र ग्रस्त हैं। यह एक वैष्विक समस्या है जो दिनों दिन बदतर रूप लेती जा रही है। यद्यपि आंतकवाद की कोई सर्वमान्य व्याख्या दे पाना मुष्किल है। जिसक एक देश या किसी समाज द्वारा आंतकवादी का दर्जा दिया जाता है,उन्हें ही किसी अन्य देष या समाज में महानायक का दर्जा प्राप्त हो सकता है। आंतकवाद की उत्पति में कई कारणों यथा ऐतिहासिक, राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक कारकों का मुख्य योगदान है। दुनियाभर में हथियारों की सुलभ उपलब्धता, धन की पर्याप्त आपूर्ति, सैन्य प्रषिक्षण की वजह से आंतकवादियों का गहरा संजाल विकसित हो गया है। पिछले दो दशकों से आंतकवादी हिंसा की घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्वि हुई है। कई सरकारों द्वारा आंतकवाद की चुनौती को स्वीकार करने पर उसे रोकने की मंषा के बावजूद, यह समस्या दिन प्रतिदिन जटिल एवं घातक होती जा रही है। भारत में ये समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है।

अफसोस जनक पहलू यह है कि मुंबई में हुये सीरियल ब्लास्ट के बाद एक बार फिर राजनीतिक दलों की बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने यह बयान देकर कि ‘सभी हमलों को रोक पाना मुमकिन नहीं है। देश में 99 फीसदी आंतकी हमले रोक लिए गए है। ऐसा खुफिया तंत्र में सुधार की वजह से हुआ है। लेकिन सभी हमले रोक पाना मुश्किल है।’ राहुल के इस बयान ने आंतक से प्रभावितों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।

वहीं गृहमंत्री चिंदबरम ने जो कुछ भी मुंबई में मीडिया के समक्ष कहा वो भी देशभर ने सुना। जब देश का गृहमंत्री यह बयान दे रहा हो कि ‘भारत के हर शहर पर खतरा है’तो आम आदमी का भगवान ही मालिक है। ऐसे में जब जिम्मेदार ओहदों पर बैठे सज्जन बचकानी बयानबाजी और किसी ठोस और सख्त कार्यवाही की उम्मीद करना बेमानी ही होगा।



    स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक.



 
 

Jul 15, 2011

साहित्य का फ़िल्मकार

मणि कौल अकेले फिल्मकार हैं, जिनकी कला के मूल में सबसे पहले साहित्य और कविता,फिर संगीत और शिल्प की प्रेरणाएं रहीं...

मंगलेश डबराल

एक फिल्म में एक स्त्री थी जो सड़क पर,एक खास जगह पर खाना लेकर आती थी और अपने पति का इंतजार करती थी। उसका ट्रक ड्राइवर पति खाना लेने के लिए रुकता और फिर घरघराते हुए ट्रक को लेकर चला जाता। यह क्रम बार-बार दोहराया जाता था जिसे देखते हुए बंबइया फिल्मों के पिलपिले दिमाग वाले दर्शकों को ऊब भी होती थी। लेकिन यह भारतीय स्त्री की स्थिति और नियति का एक सार्थक बिंब था।

मोहन राकेश की कहानी पर आधारित मणि कौल की यह फिल्म ‘उसकी रोटी’सन् 1969 में बनी थी और इसे फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ आलोचक पुरस्कार मिला। मृणाल सेन की पहली हिंदी फिल्म 'भुवन सोम’ भी सन् 1969 में ही प्रदर्शित हुई थी। दरअसल हिंदी सिनेमा में इन दो फिल्मों के माध्यम से एक नया युग शुरू हुआ जिसे ‘नयी धारा’का सिनेमा या ‘समांतर सिनेमा’कहा गया। इसके बाद ‘सारा आकाश’,‘अंकुर’,‘भूमिका’,‘माया दर्पण’जैसी फिल्मों से हिंदी में सामांतर सिनेमा की जीवंत धारा बनी। बंबई के व्यावसायिक सिनेमा को गहरी चुनौती देने लगी। दुर्भाग्य से इस नयी धारा को सरकारी संस्थाओं से प्रोत्साहन नहीं मिला और सार्थक सिनेमा धीरे-धीरे धुंधला पड़ता गया।

मणि कौल निस्संदेह सार्थक सिनेमा के अग्रणी फिल्मकार थे। चौबीस दिसंबर 1944को जन्मे मणि कौल पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के छात्र थे जहां बांग्ला के प्रमुख फिल्मकार ऋत्विक घटक ने उन्हें पढ़ाया था। घटक की फिल्म-शैली बहुत सघन और कुछ-कुछ अतिनाटकीय थी। बाद में मणि कौल ने फ़्रांस के एक बड़े और प्रयोगधर्मी फिल्मकार रॉब्येर ब्रेसां से की फिल्म कला की शिक्षा ली जिनका सिनेमा अतिनाटकीयता और तादात्म्य शैली से बिलकुल उलट था और वे अभिनेताओं को फिल्म की दूसरी चीजों की तरह सिर्फ एक वस्तु मानते थे।

मणि कौल पर सिनेमा की इन दोनों लगभग विपरीत शैलियों का प्रभाव पड़ा। फिल्म कला के अलावा मणि कौल ने भारतीय सौंदर्य शास्त्र और संगीत और चित्रकला का भी गहरा अध्ययन किया था। वे ध्रुपद के गहरे जानकार और गायक थे और उन्होंने संगीत पर ‘ध्रुपद’ और ‘सिद्धेश्वरी’ जैसे बहुचर्चित वृतचित्र भी बनाये। उसकी रोटी के बाद दुविधा मणि कौल की दूसरी उल्लेखनीय और पहली रंगीन फिल्म थी जिसके लिए उन्हें निर्देशन का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। राजस्थानी कथाकार विजय दान देथा द्वारा संकलित एक लोककथा पर आधारित इस फिल्म में मणि कौल ने सचमुच एक लोककथा जैसा परिवेश निर्मित किया था और यह व्यापार करने के लिए दिशावर यानी परदेश गये पति की उपेक्षित पत्नी की नियति को चित्रित करती थी।

इस फिल्म की शैली को लेकर मणि कौल की आलोचना भी हुई और कहा गया कि वे कठोर सामाजिक यथार्थ को एक रूपवादी ढंग से पेश कर रहे हैं। दरअसल मणि कौल सिनेमा में यथार्थवाद और नव-यथार्थवाद दोनों को विखंडित करके उसे एक कला अनुभव में बदलना चाहते थे जबकि हमारा प्रचलित सिनेमा एक आदर्शपरक यथार्थवाद के वर्णन से बाहर नहीं आया था। यह भी कहा गया कि मणि कौल की शैली यूरोपीय फिल्मों से उधार ली हुई है, उसकी जड़ें हमारी जमीन में नहीं हैं, और उनका सिनेमा अपनी परंपरा से विद्रोह नहीं करता।

मणि कौल अकेले फिल्मकार है जिनकी कला के मूल में सबसे पहले साहित्य और कविता,फिर संगीत और शिल्प की प्रेरणाएं रहीं। उनकी ज्यादातर फिल्में हिंदी की कृतियों पर ही आधारित थीं। ‘उसकी रोटी’ और ‘आषाढ़ का एक दिन’ मोहन राकेश की रचनाओं पर बनी तो ‘दुविधा’, ‘सतह से उठता आदमी’ और ‘नौकर की कमीज’ क‘मशः विजयदान देथा, मुक्तिबोध और विनोद कुमार शुक्ल की कृतियों पर ‘नजर’,‘द क्लाउड डोर’ और ‘इडियट’जैसी बाद की कृतियों का आधार भी दोस्तोव्स्की की रचनाएं और बहुत सी कविताएं थी। मणि कौल अपने माध्यम के अनोखे चिंतक थे और उन्होंने अपने खास सौंदर्यबोध के साथ बिना किसी व्यवसायिक समझौते के,स्वांतः सुखाय ढंग से फिल्में बनायीं जो सिनेमा के व्यवसायिक तंत्र में नहीं समा सकती थी। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर सबसे अधिक फिल्में बनाने वाले कलाकार को सिनेमा के हाशिए पर ही रहना पड़ा।

इस हाशिए पर रहते हुए मणि कौल को लोकप्रियता या कामयाबी भले ही नहीं मिली,लेकिन वह स्वतंत्रता जरूर हासिल हुई कि अपनी सौंदर्य दृष्टि के साथ अपना सिनेमा बना सके। दरअसल मणि कौल का सिनेमा इतना निजी था कि कभी-कभी वे सौंदर्यशास्त्र को ही फिल्माने लगते थे। वे अपने गुरु ब्रेसां के शिल्प से भी परे जाकर व्यक्तियों और वस्तुओं के आपसी संबंधों को इतना विच्छिन्न कर देते थे कि सिर्फ एक समग्र सौंदर्यशास्त्रीय संबंध उजागर होता था। इस लिहाज से उनकी कई फिल्में फिल्म विधा की उच्चस्तरीय पाठ्य पुस्तकों की तरह थीं।

मणि कौल का निधन ऐसे समय में हुआ जब समांतर सिनेमा की जीवंत धारा लगभग सूख चुकी है और उसके प्रमुख फिल्मकार और अभिनेता,शाम बेनेगल,सईद मिर्जा, कुमार शहानी, गोविंद निहलानी, प्रकाश झा, नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी, शबाना आजमी या तो व्यावसायिक समझौते कर चुके हैं या थक कर बैठ चुके हैं। अब एक ऐसा हिंदी सिनेमा बन रहा है जिसमें कलात्मकता और व्यावसायिकता, साहित्य और बाजार,शिष्टता और गालियां सब आपस में घुलमिल चुके हैं, सार्थक और बाजारू सिनेमा एक हो चुके हैं। आश्चर्य नहीं कि मणि कौल के अंतिम संस्कार पर उनके एक गहरे प्रशंसक फिल्मकार अनुराग कश्यप जब उन्हें श्रद्धांजलि देने आये तो उन्हें देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि फिल्मी दुनिया का कोई व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था।


 
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित और हिंदी पत्रिका द पब्लिक एजेंडा के कार्यकारी संपादक. यह लेख इस बार के पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित हुआ है.
 
 

 

हेल्लो बस्तर का विमोचन


मंच पर राहुल पंडिता, दिग्विजय सिंह, बीडी शर्मा और सागरिका घोष

भारत के माओवादी आंदोलन के आधार इलाकों पर केंद्रीत किताब ‘हल्लो बस्तर- द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ माओइस्ट मूवमेंट’ का कल दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर में विमोचन हुआ। वेस्टलैंड प्रकाशक की ओर से अंग्रेजी पत्रकार राहुल पंडिता की छपी इस पुस्तक का विमोचन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और गांधीवादी नेता बीडी शर्मा ने किया।

माओवादी नेताओं से बातचीत और आधार इलाकों का दौरा कर लिखी गयी इस किताब की चर्चा के दौरान दिग्विजय सिंह ने कहा कि सरकार माओवादी चरमपंथ को देश का मुख्य खतरा मानती है,लेकिन मेरी राय में सांप्रदायिकता और कट्टरता भी उतने ही खतरनाक हैं।’ सलवा जुडूम के बारे में दिग्विजय सिंह ने कहा कि उसे ठीक ढंग से चलाया नहीं गया,जबकि उन्होंने स्वीकार किया कि आजादी के बाद से ही सरकारें आदिवासियों के हितों की रक्षा करने में असफल रही हैं।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम बंद करने के आदेश के बावत विमोचन समारोह का संचालन कर रहीं अंग्रेजी पत्रकार सागरिका घोष के सवाल के जवाब में कांग्रेस नेता ने कहा कि इस मामले में पुनरीक्षण याचिका दायर करने की कोई जरूरत नहीं है।

कार्यक्रम में और भी महत्वपूर्ण मसलों पर वक्ताओं ने अपनी विस्तृत राय रखी और बहस किया, जिसे आप यहां पूरा सुन सकते हैं...


आस्था के खजाने


मंदिरों को दान दिए जाने वाले धन में से कितना सफेद होता है और कितना काला, यह कहना कठिन है। पिछले कुछ बरसों में बाबाओं और भगवानों की बाढ़ सी आ गई है और उनके चेहरे टी. वी. चैनलों और अखबारों में अक्सर देखे जाने लगे हैं...

राम पुनियानी 

ऐसा लगता है कि हमारी इस फ़ानी दुनिया में सबसे अधिक धन उन लोगों के पास नहीं है जो दिन-रात उसके पीछे दौड़ते रहते हैं। असली धन कुबेर तो वे हैं जो मायामोह से ऊपर उठ चुके हैं, जिनके लिए धन-संपत्ति का कोई मोल नहीं है और जिनके जीवन का लक्ष्य, मात्र इश्वर की आराधना और समाजसेवा है। पुट्टपर्थी के भगवान सत्यसाईं बाबा न केवल 40,000 करोड़ रूपये से अधिक की संपत्ति के मालिक थे वरन् उनके शयनकक्ष में भी टनों सोना और नोटों के ढ़ेर थे।
 
देश के योग शिक्षकों के बेताज बादशाह और विदेशों में जमा कालेधन को देश में वापिस लाने के लिए अपनी जान तक न्यौछावर करने को तत्पर बाबा रामदेव, लगभग 1,100 करोड़ रूपये की संपत्ति के नियामक और नियंता हैं। यह तथ्य बाबा रामदेव द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में किए गए आमरण अनशनके बाद सामने आया। और यह तो दो उदाहरण मात्र हैं। कई अन्य बाबा, जिनमें श्री श्री रविशंकर मोरारी बापू, आसाराम बापू व मां अमृतानंदामाई शामिल हैं, भी करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं। कबीर, तुकाराम, नरसी मेहता और रैदास जैसे नीची जातियों के संतों के विपरीत, आज भगवानों के बाजार के सभी प्रमुख उत्पाद, भारी-भरकम संपत्ति के मालिक हैं।

आस्था के एक अन्य केन्द्र- मंदिर- भी अकूत संपदा के स्वामी हैं। यह सर्वज्ञात है कि तिरूपति के बालाजी
, शिर्डी के साईंबाबा व मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिरों में सोने और नोटों के पहाड़ हैं। यह संपत्ति मुख्यतः भक्तों द्वारा दान दिए गए धन से इकट्ठा हुई है। हाल में कुछ भाजपा-शासित राज्यों, जैसे कर्नाटक में सरकारों ने भी मंदिरों को दान देना शुरू कर दिया है। कई भक्तजन यह दावा करते हैं कि इस संपत्ति का उपयोग जनहित के लिए किया जाता है। यह अर्धसत्य है। अभी हाल में, कुछ नास्तिकों ने यह हिसाब लगाया कि सत्यसाईं बाबा की संपत्ति का मात्र 0.5 प्रतिशत हिस्सा जनहित के कार्यों पर व्यय किया गया।

मंदिरों को दान दिए जाने वाले धन में से कितना सफेद होता है और कितना काला
, यह कहना कठिन है। पिछले कुछ बरसों में बाबाओं और भगवानों की बाढ़ सी आ गई है और उनके चेहरे टी. वी. चैनलों और अखबारों में अक्सर देखे जाने लगे हैं। यही कारण है कि इन बाबाओं की संपत्ति आजकल चर्चा का विषय बन गई है।

बाबाओं और भगवानों की संपत्ति के खुलासे से लगे धक्के से देश उबरा भी नहीं था कि हाल में (जुलाई
2011) यह सामने आया कि तिरूअनंतपुरम् के पद्मनाभस्वामी मंदिर में अथाह संपत्ति छिपी हुई है। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर इस मंदिर के लाकर खोले गए। ऐसा प्रतीत होता है कि पद्मनाभस्वामी, धरती के सबसे धनी भगवान हैं। कई सदियों से इस मंदिर के तहखानों में लाखों करोड़ रूपयों की संपत्ति भरी हुई है। इस संपत्ति का कुछ हिस्सा भक्तों द्वारा दिए गए दान से आया था। खजाने को भरने में सबसे बड़ा योगदान त्रावणकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा का था। और राजा मार्तण्ड वर्मा की आमदनी का स्रोत था गरीब किसानों से वसूला गया लगान, गुलामों के व्यापार पर लगाया गया कर और उन राजाओं की संपत्ति, जिनके राज्यों पर मार्तण्ड वर्मा ने विजय प्राप्त की थी। संपत्ति का स्रोत चाहे कुछ भी रहा हो परंतु आज इसका मालिक मंदिर का ट्रस्ट है। दिमाग को चकरा देने वाले इतने बड़े खजाने के सामने आने से यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि आखिर इस संपत्ति पर असली अधिकार किसका है।

मार्तण्ड वर्मा ने कई छोटे-छोटे राजाओं को कुचलकर और उनकी संपत्ति लूटकर यह खजाना इकट्ठा किया था। कहा जाता है कि एक ब्राहम्ण पुरोहित के प्रभाव में आकर उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति और अपनी तलवार पद्मनाभस्वामी मंदिर को समर्पित कर दी और स्वयं को पद्मनाभदास घोषित कर इस संपत्ति के संरक्षक बन गए। इस संपत्ति के कुछ हिस्से का इस्तेमाल ब्राहम्णों के लिए लंगर चलाने में किया गया। परंतु अधिकांश हिस्सा मंदिर के तहखानों में सुरक्षित रहा आया। इस मंदिर का प्रबंधन एक समिति के हाथ में है और खजाने के नियंत्रक हैं मार्तण्ड वर्मा के उत्तराधिकारी।


क्या किसी भगवान या देवता को इतनी संपत्ति की जरूरत हो सकती है
? क्या संपत्ति के इस पहाड़ से समाज को कोई लाभ पहुंचा है? इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संपत्ति का कुछ हिस्सा आध्यात्मिक उदेश्यों की पूर्ति के लिए खर्च किया जा रहा है परंतु क्या किसी व्यक्ति की भौतिक जरूरतें,  उसकी आध्यात्मिक जरूरतों से कमतर होती हैं? कुछ हिन्दू संगठनों और कांग्रेस सहित कई पार्टियों के नेताओं ने यह मांग की है कि इस खजाने को जस का तस रहने दिया जाए।

स्वतंत्रता के बाद हमारे देश में चुने हुए जनप्रतिनिधियों का शासन स्थापित हुआ। राजाओं- जो यह दावा करते थे कि उन्हें राज करने का दैवीय अधिकार है- के प्रीवीपर्स समाप्त कर दिए गए। इस परिपेक्ष्य में इस प्रश्न पर विचार किया जाना जरूरी है कि क्या इस संपत्ति के उपयोग का निर्धारण केवल कानूनी प्रावधानों की रोषनी में किया जाना चाहिए
? या फिर पूरे समाज की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए इसका इस्तेमाल होना चाहिए। भगवान किससे ज्यादा खुश होंगे?  इस संपत्ति के चन्द लोगों की मुट्ठी में रहने से या इसके पूरे समाज की भलाई के काम में इस्तेमाल से?

यह मांग की जा रही है कि भारतीयों द्वारा विदेशों में जमा धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसका इस्तेमाल समाज कल्याण के लिए किया जाए। क्या यही नीति बाबाओं और मंदिरों की संपत्ति के संबंध में भी नहीं अपनाई जानी चाहिए
? जो लोग गला फाड़-फाड़ कर काले धन के राष्ट्रीयकरण की मांग कर रहे हैं-और इसमें कुछ गलत भी नहीं है-वे मंदिरों और बाबाओं की संपत्ति के बारे में चुप क्यों हैं? यह सचमुच एक पहेली है कि जो लोग काले धन के मुद्दे पर अनशन और आंदोलन करते रहते हैं, उनके होंठ तब क्यों सिल जाते हैं जब बात उस संपत्ति की आती है जो किसी बाबा या चन्द ट्रस्टियों के कब्जे में है।

मंदिर हमेशा से धन-संपदा के केन्द्र रहे हैं। कई राजाओं ने इस संपत्ति की खातिर मंदिरों को जमींदोज किया। महमूद गजनवी की नजर सोमनाथ मंदिर के विशाल खजाने पर थी परंतु उसने मंदिर पर हमला करने के लिए यह बहाना ढूढ़ा कि वहां बुतपरस्ती होती है
, इस्लाम जिसकी इजाजत नहीं देता। इस और इसी तरह की अन्य ऐतिहासिक घटनाओं का इस्तेमाल, साम्प्रदायिक ताकतों ने समाज को विभाजित करने के लिए किया। तथ्य यह है कि हिन्दू राजा भी मंदिरों को लूटने में पीछे नहीं रहे। कल्हण की राजतरंगिनी में वर्णित है कि कश्मीर के 11वीं सदी के राजा हर्षदेव के दरबार में देवोत्पतननायकनामक एक अधिकारी होता था जिसका काम था मंदिरों से कीमती मूर्तियों को उखाड़कर राजा के खजाने में पहुंचाना।

धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दे इन दिनों देश में छाए हुए हैं। गरीबी
, अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को सुलझाने से ज्यादा तरजीह मंदिरों के निर्माण को दी जा रही है। जहां आमजनों की आस्था का सम्मान किया जाना ज़रूरी है वहीं यह भी जरूरी है कि देश की संपत्ति का उपयोग जनहित में हो। पद्मनाभस्वामी मंदिर में दबे खजाने और इसी तरह की अन्य संपत्तियों को संपूर्ण समाज के नियंत्रण में लाया जाना आज की ज़रूरत है। इन खजानों की एक-एक पाई का इस्तेमाल गरीबी उन्मूलन और कमजोर व दरिद्र लोगों के सशक्तिकरण के कार्यक्रम चलाए जाने पर किया जाना चाहिए। भगवान का काम बिना पैसों के चल जाएगा। 


पोवई आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर राम पुनियानी वरिष्ठ स्तंभकार हैं. उनका यह हिंदी लेख लोकसंघर्ष ब्लॉग से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.