पीयूष पन्त की कविता
शब्द हुए बंधक
कलम हुई दासी
जनता में फैली अजब उदासी
मुट्ठी जब भिंचती है उठने को ऊपर
त्योरियां तब चढ़ जाती हैं उनकी क्यों कर
नारे उछलते हैं गगनभेदी
मानो बजती हो दुन्दुभी जनयुद्ध की
होते इशारे फिर कहर है बरपाता
जनता पर डंडे और गोली बरसाता
बार- बार लोकतंत्र की कसमें है खाता
सत्ता के नशे में रहता मदमाता
फिर भी वो जनता का नेता कहलाता
कैसा ये लोकतंत्र कैसी आज़ादी
बोलने समझने की, जहाँ ना हो मुनादी
विदेशी मामलों के महत्वपूर्ण टिप्पणीकार और सामाजिक आन्दोलन से जुडी 'लोक संवाद' पत्रिका के संपादक.
Jul 10, 2011
अलीगढ में कांग्रेस की सियासी महापंचायत
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भट्ठा-पारसौल से लेकर अलीगढ़ के नुमाइश मैदान तक जो भी किया वो मीडिया में छाया रहा,लेकिन असल सवाल यह है कि क्या राहुल किसानों के एक बेहतर और सर्वमान्य भूमि अधिग्रहण कानून अपने दल की सरकार के रहते बनवा पाएंगे...
आशीष वशिष्ठ
आजादी के 67 सालों के भीतर जब कोई भी सरकार (सर्वाधिक 55 सालों तक) किसानों की भलाई के लिए काम नहीं कर पायी तो राजनीति में ट्रेनी राहुल किसानों के भले के लिए कोई ठोस कार्यवाही या पुख्ता कानून बनवा पाएंगे, ये पत्थर में से पानी निकालने जैसा ही होगा। एक तरह से देखा जाए तो राहुल की पदयात्रा और किसान महापंचायत ने मायावती को कम और अजित सिंह की रालोद को ही ज्यादा नुकसान पहुँचाया है,क्योंकि राहुल ने जिन किसानों की बात जोर-शोर से उठाई है उनमें से अधिकतर जाट बिरादरी से हैं।
दलितों के पास यूपी क्या देशभर में ही जमीन का बहुत छोटा हिस्सा है, ऐसे में भट्ठा-पारसौल को राजनीति का अखाड़ा बनाकर और मौजूदा भूमि अधिग्रहण को नकारा बताकर कांग्रेस के नौसिखिये युवराज ने स्वयं अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। वैसे में उम्मीद बहुत कम है कि राहुल ऐसा कर पाएंगे, लेकिन राजनीतिक नफा-नुकसान से वाकिफ राहुल फौरी राहत के लिए किसानों का कुछ भला तो करेंगे ही।
भट्ठा-पारसौल के कंधें पर बंदूक रखकर राहुल कहां निशाना लगा रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं है। लेकिन यूपी की माया सरकार पर दर्जनभर चापलूस मंत्रियों की फौज के साथ अलीगढ़ के नुमाइश मैदान से मायावती को ललकारने वाले राहुल ये क्यों भूल जाते हैं कि देश के जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारे हैं वहां के किसान भी यूपी की तरह दुःखी और परेशान हैं।ऐसे में किसानों के मुद्दे पर ओछी,घटिया और वोट बटोरू राजनीति कृषि प्रधान देश में किसानों के साथ भद्दा और घिनौने मजाक से बढ़कर कुछ और नहीं है।
उदारीकरण की 1991 में जो बयार देश में बही उसने कृषि प्रधान देश की उपाधि हमसे छीन ली। यह कड़वी सच्चाई है कि आज देश में कृषि पर से निर्भरता कम हुई है और विकास, विशेष आर्थिक क्षेत्र, उद्योगों की स्थापना और एक्सप्रेस हाईवे के नाम पर किसानो की उपजाऊ जमीनों को कोड़ियों के दामों पर खरीदकर सरकार कारपोरेट घरानों और बिल्डरों को खुश करने में मगन है। सीधे अर्थों में सरकार जनता और अन्नदाता किसानों के साथ गद्दारी और धोखाधड़ी कर रही है। क्योंकि सरकार जिस मकसद से किसानों से जमीन लेती है उसका उपयोग उसके काम में नही होता है और सरकार और उसकी पालतू मशीनरी कमीशन की मलाई से पेट तर कर रही है।
अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा में यूपी सरकार द्वारा अधिग्रहित की गई जमीन किसानों को वापिस करने का आदेश देकर सरकार को तगड़ा झटका और किसानों को बड़ी राहत दी है। ऐसा नहीं है कि केवल यूपी की में ही किसानों की जमीनें सरकार ने हड़पी है। उपजाऊ जमीनों की ये लूट देशभर में जारी है। देश के भोले-भाले किसान सरकारी चालबाजियों और गलत नीतियों से ठगे जा रहे हैं। यूपी की वर्तमान माया सरकार और पूर्ववर्ती मुलायम सिंह की सरकार ने औद्योगिक घरानों और बिल्डरों को प्रदेश की उपजाऊ जमीनें थाली में सजाकर देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। आगरा, टप्पल, इलाहाबाद, लखनऊ और हाल ही भट्ठा-पारसौल की घटना ने सूबे में किसान राजनीति को तो गर्माया ही है, वहीं यह भी सोचने को मजबूर किया है कि आखिरकार सरकार विकास के नाम पर जिस उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण कर रही है उसका क्या औचित्य है?
विकास के नाम पर पिछले एक दशक में नोएडा में सरकार ने 8500 एकड़ जमीन अधिग्रहित की है, उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण रोजी-रोटी की समस्या को बढ़ाने में अहम् भूमिका निभा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के तलख तेवरों के बाद शायद इस प्रवृत्ति पर आंशिक रोक लगने की उम्मीद तो जगी है, लेकिन भ्रष्ट और कारपोरेट घरानों के हाथों बिकी सरकार षडयंत्र और कुचक्र रचने से तौबा करेगी इसकी संभावना कम ही है।
देश के लगभग हर राज्य में स्थानीय सरकारें औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए अधिक से अधिक खेती योग्य भूमि का अधिग्रहण कर तो लेती है, लेकिन जिन उद्देश्यों के लिए जमीन ली जाती है वो जमीन उस काम न लाकर व्यवासियक या अन्य बिजनेस में व्यर्थ गंवा दी जाती है। यूपी में यमुना और गंगा एक्सप्रेस हाईवे के नाम पर हजारों एकड़ जमीन किसानों से हथियाकर जेपी ग्रुप को दी है। सरकार अपनी योजनाओं के लाभ बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है, लेकिन एक्सप्रेस हाईवे और राजमार्गो के निकलने से भूमिहीन किसानों को क्या लाभ होगा ये बात समझ से परे हैं। जब किसान अपनी जमीन ही बेच देगा तो वो क्या किसी कारखाने में मजदूरी करेगा या फिर हाईवे के किनारे फल या सब्जी का ठेला लगाएगा।
सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई को अगर 'भूमि हड़प' कहकर संबोधित किया जाए तो कोई बुराई नहीं होगी। क्योंकि इस प्रक्रिया में छोटे व सीमांत किसान तेजी से भूमिहीन श्रमिक बन रहे हैं। इसीलिए, स्थानीय किसान और समुदाय सरकारी जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहा है। हालांकि इन किसानों का रोजगार, बिजली, सड़क, उत्पादकता और आय में बढ़ोतरी, तकनीकी हस्तांतरण आदि का प्रलोभन दिया जा रहा है, लेकिन इससे होने वाले नुकसान के बारे में स्थानीय सरकारें खामोश हैं। फिर मुआवजा, रोजगार, आय आदि के मामले में असंगठित और छोटे किसानों के हितों की अनदेखी की जा रही है।
विडंबना यह है कि देश के किसान भी भूमि अधिग्रहण से जुड़ी अनेक समस्याओं को समझ नहीं पा रहे हैं। कर्ज के बोझ तले दबे और नगदी फसलों की पैदावार के लोभ के फेर में पड़े किसान आत्महत्या से मुक्ति पाने के जिस गलत मार्ग पर चल पड़े हैं वो इस देश और देशवासियों के लिए अफसोसजनक और दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।
नंदीग्राम से भट्ठा-पारसौल तक किसानों का दुःख-दर्द ज्यों का त्यों बरकरार है और नेता नगरी राजनीति करने में मशगूल है। अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में कांग्रेस के युवराज ने किसान पंचायत (नुमायश) करके किसानों का सबसे बड़ा हितैषी और हमदर्द बनने की जो पॉलिटिक्स की है वो ऊपर से तो भली और सार्थक पहल लगती है कि कोई युवा और प्रभावशाली नेता जमीन और किसान की बात कर रहा है, लेकिन दर्द और गुस्सा तब आता है कि वो नेता सक्षम होने के बावजूद भी किसानों को मीठी गोली और झूठे वायदों की चाशनी में डूबी जलेबी खिलाकर अपने साथ जोड़ने और वोट बटोरने को अधिक आतुर दिखाई देता है।
राहुल अगर असल में ही किसानों के साथ हैं तो आगामी मानसून सत्र में उन्हें भूमि अधिग्रहण के लिए एक पुख्ता कानून बनवाने का पूरा प्रयास करना चाहिए। वहीं किसानों को भी नेतागिरी और नेताओं से जुदा होकर खुद एकजुट होकर अपनी समस्याओं के लिए संघर्ष करना चाहिए। क्योंकि जो हाथ जमीन से सोना पैदा कर सकते हैं, वो हाथ मिलाकर अपने हक-हकूक की लड़ाई लड़ और जीत भी सकते हैं।
स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक .
धरातल की राजनीति करते राहुल
राहुल ने लगभग 70किलोमीटर की अपनी पहली सबसे लंबी दूरी की पदयात्रा पूरी करने के बाद राज्य के किसानों से मिलकर यह एहसास कराना चाहा कि वे उनकी मांगों व समस्याओं के प्रति गंभीर हैं...
तनवीर जाफरी
कल अलीगढ में किसान महापंचायत करके कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य पर अपनी राजनीति केंद्रित करने का पुख्ता प्रमाण दे दिया है। गौरतलब है कि केंद्र में स्वतंत्रता के पश्चात चार दशकों तक लगातार शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य में हमेशा अपना पूरा प्रभाव रखती थी। परंतु उत्तर प्रदेश की सत्ता गैर कांग्रेसी दलों विशेषकर समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के हाथों में जाने का सिलसिला शुरू होने के बाद कांग्रेस लडख़ड़ाती नज़र आने लगी। अब एक बार फिर राहुल गांधी ने केंद्र में कांग्रेस पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाए जाने के दृष्टिगत् उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से अपनी राजनीति केंद्रित कर दी है। और उत्तर प्रदेश में मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी की सक्रियता ने पिछले पांच वर्षों में बड़ी तेज़ी से जो जान फूंकी है उसका राज्य के कांग्रेसजन भी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे।
ग़ौरतलब है कि 72 जि़लों वाला यह राज्य लोकसभा के लिए 80 सांसद निर्वाचित करता है। वर्ष 2004 में मात्र 4 लोकसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश में किए गए तूफानी दौरों के बाद कांग्रेस पार्टी को इस स्थिति तक पहुंचा दिया कि पार्टी 2009 के लोकसभा चुनावों में 23 सीटों तक पहुंच गई। कांग्रेस की इस अप्रत्याशित सफलता ने एक ओर राज्य में जहां कांग्रेसियों के हौसले बुलंद किए, वहीं कांग्रेस विरोधी दलों विशेषकर राज्य की सत्तारुढ़ बहुजन समाज पार्टी की नींद हराम कर डाली। परंतु राहुल गांधी हैं कि अपने विशेष अंदाज़ से लोगों से मिलने, आम गरीब लोगों के बीच जाने तथा उन्हीं के घरों में खाना खाने व चारपाई पर सोकर रात बिताने का सिलसिला नहीं छोड़ रहे हैं। राहुल गांधी के इस धरातलीय ‘गांधी दर्शन’ से प्रदेश की मुख्यमंत्री इतना घबराई हुई हैं कि वे स्वयं प्रेस कांफ़्रेंस बुलाकर कई बार राहुल गांधी की ऐसी यात्राओं व जनसंपर्क को ‘नौटंकी’ कहकर संबोधित कर चुकी हैं।
भारतीय जनता पार्टी भी राहुल गांधी के इस धरातलीय राजनीतिक अंदाज़ से काफी घबराई हुई है। कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में जहां मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को पार्टी प्रभारी बनाया हुआ है, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने भी दिग्विजय सिंह के बराबर का कार्ड खेलने के लिए मध्य प्रदेश की ही पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को पहले तो पुन: भाजपा में शामिल किया और बाद में उन्हीं को उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी भी बना दिया। यह और बात है कि मध्य प्रदेश की जनता द्वारा खारिज की जा चुकी उमा भारती के उत्तर प्रदेश भाजपा प्रभारी बनते ही भाजपा में भी ज़बरदस्त घमासान छिड़ गया है।
राहुल गांधी से जुड़ा ताज़ातरीन घटनाक्रम किसानों के ज़मीन अधिग्रहण मामले से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश व दिल्ली की सीमा से सटे नोएडा के भट्टा-पारसौल नामक गांवों में इसी वर्ष 7 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस और किसानों के मध्य भीषण संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष में पांच व्यक्ति मारे गए थे। इस संघर्ष के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे क्षेत्र में धारा 144 लगा दी थी। इस घटना के चौथे दिना 11 मई को प्रात:काल लगभग 5 बजे राहुल गांधी पुलिस-प्रशासन को चकमा देकर भट्टा-पारसौल गांवों में पहुंच गए थे। वहां उन्होंने यह पाया कि पुलिस के भयवश पूरे गांव के मर्द,युवा व बुज़ुर्ग अधिकांशतया गांव को छोडक़र अन्यत्र चले गए थे।
राहुल गांधी ने 11 मई को भट्टा-पारसौल गांव में पहुंच कर राज्य सरकार के विरुद्ध धरना दिया तथा किसानों व उनके परिजनों को यह आश्वासन दिया कि वे राज्य सरकार द्वारा किसानों की भूमि जबरन अधिग्रहण किए जाने के विरुद्ध हैं। वे अंत तक किसानों की लड़ाई लड़ेंगे तथा उनके साथ खड़े रहेंगे। अभी इस घटना को मात्र दो महीने ही बीते थे कि 4जुलाई को राहुल गांधी पुन: भट्टा-पारसौल गांव जा पहुंचे तथा उन्होंने भट्टा-पारसौल से अलीगढ़ तक का पैदल मार्च भी कर डाला। राहुल गांधी की इस पदयात्रा को कांग्रेस द्वारा किसान संदेश यात्रा का नाम दिया गया जो 9 जुलाई को अलीगढ़ के नुमाईश मैदान में किसान महापंचायत में पहुंचने पर समाप्त हुई।
राहुल ने लगभग 70किलोमीटर की अपनी पहली सबसे लंबी दूरी की पदयात्रा पूरी करने के बाद राज्य के किसानों से मिलकर यह एहसास कराना चाहा कि वे उनकी मांगों व समस्याओं के प्रति गंभीर हैं। राहुल ने किसान महापंचायत में जहां प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती पर यह कहते हुए सीधा आक्रमण किया कि ‘अपना हक मांगने पर किसानों को उत्तर प्रदेश सरकार गोली मार देती है। वहीं उन्होंने किसानों को यह आश्वासन भी दिया कि भूमि अधिग्रहण कानून में आवश्यक संशोधन की सिफारिश की जाएगी।

भूमि अधिग्रहण अधिनियम नि:संदेह केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून है तथा इसमें संशोधन के भी सभी अधिकार केंद्र सरकार के ही पास हैं। लिहाज़ा इसमें कोई शक नहीं कि भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों को होने वाली परेशानियों का समाधान केंद्र सरकार ही कर सकती है। परंतु जिस प्रकार राहुल गांधी किसानों के बीच स्वयं जाकर बार-बार किसानों से यह कह रहे थे कि 'भूमि अधिग्रहण किस प्रकार हो रहा है इसे मैं समझना चाहता हूं और भूमि अधिग्रहण पर बने नए कानून के बारे में लोगों की राय जानना चाहता हूं।' इससे यह ज़ाहिर हो रहा है कि राहुल गांधी एक तीर से कई शिकार खेल रहे हैं। अर्थात् अपने ही कथनानुसार जहां वे भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून के वास्तविक प्रभाव तथा इस कानून से किसानों को होने वाले नफे-नुकसान,उनकी शिकायतों व परेशानियों के बारे में जान व समझ रहे हैं, वहीं वे अपने अत्यंत धरातलीय जनसंपर्क के माध्यम से किसानों के दिलों में अपनी गहरी छाप भी छोड़ रहे हैं। यही वजह है कि 2012 में विधानसभा चुनावों का सामना करने जा रहे कांग्रेस विरोधी दल राहुल गांधी के इस प्रकार के आश्चर्यचकित कर देने वाले दौरों से काफी भयभीत नज़र आ रहे हैं।
राहुल गांधी कभी बुंदेलखंड में किसी दलित परिवार में जाकर उसका हालचाल पूछते हैं और रात वहीं बिताते हैं। और कभी बहराईच जैसे दूर-दराज़ इलाकों में गरीबों व दलितों के घर जाकर उन्हें अपनत्व का एहसास कराते हैं। बलात्कार के लिए पिछले दिनों चर्चा में रहे उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी कभी बांदा के बीएसपी विधायक द्वारा किए गए बलात्कार की पीडि़ता से संपर्क करते हैं, तो कभी लखीमपुर के निघासन में अचानक पहुंचकर उस कन्या के परिजनों को ढाढ़स बंधाते हैं जिसे पुलिसवालों ने कथित रूप से मारकर पेड़ पर लटका दिया था।
और अब राहुल ने किसानों के बीच जाकर उनके दु:ख-दर्द को समझने और उसमें शरीक होने तथा समय आने पर उसका समाधान करने का संकल्प लिया है। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ साधारण किसानों के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर उन्हें किसानों की समस्याओं से भी अवगत करा चुके हैं। गोया राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के शीर्ष नेता एवं पार्टी महासचिव जिस ज़मीनी स्तर पर आकर राजनीति में ज़ोर-आज़माईश कर रहे हैं, उसे देखकर यही अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि कांग्रेस राहुल गांधी के कठोर परिश्रम और उनकी ‘गांधी दर्शन’ का आभास कराती धरातलीय राजनीतिक शैली के बलबूते पर केंद्र में पूर्ण बहुमत में आने की दूरगामी रणनीति पर काम कर रही है।
लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.
राहुल की महापंचायत किसानों के साथ धोखा
लखनऊ. पूरे देश में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत किसानों की उठ रही मांग के अनुरूप मानसून सत्र में केन्द्र की यूपीए सरकार द्वारा अंग्रेजों के बनाए 1894 के भूमि अधिग्रहण के काले कानून को रद्द करने की स्पष्ट घोषणा न करके राहुल गांधी ने कल अलीगढ किसान पंचायत में बुलाए किसानों को धोखा ही दिया है। यह प्रतिक्रिया जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने आज अलीगढ़ में कांग्रेस द्वारा बुलायी किसान पंचायत पर दी।अखिलेन्द्र ने कहा कि कारपोरेट का हित और किसानों के भले के लिए लफ्फाजी एक साथ नही चल सकती। हरियाणा जिसका राहुल बार-बार जिक्र कर रहे है वहां भी किसानों के लिए कोई स्वर्गराज नहीं है और यह भी कि इस इलाके के सभी किसान विकास के लिए जमीन देना चाहते है सच नहीं है। क्योकि ग्रेटर नोएडा के दादरी, भट्टा पारसोल, अलीगढ़ के टप्पल, कृपालपुर, जहानगढ़, कनसेका, आगरा के एत्मादपुर, खंदौली, चौगान, छलेसर, गढ़ीरामी और मथुरा तक में कई किसान है जो किसी भी कीमत पर अपनी जीविका के साधन जमीन को नही देना चाहते है।
हाल ही में दिए अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट तक ने इस बात को माना है कि विकास के नाम पर ही किसानों को छला गया है। दरअसल 1894 के कानून में जनहित की स्पष्ट व्याख्या न होने से ही सरकारें किसानों को विकास के नाम पर ठगती रही है और यही काम हरियाणा में भी कांग्रेस की सरकार कर रही है। बिल्डरों और कारपोरेट घरानों के हितों के लिए किसानों को बर्बाद करने की कांग्रेस और मायावती की नीतियां एक ही है।
उन्होनें कहा कि 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द करने और नयी भूमि उपयोग नीति बनाने के सवाल पर जन संघर्ष मोर्चा, भारतीय किसान पार्टी समेत देष में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत किसान संगठनों के प्रतिनिधि आगामी 8 अगस्त को दिल्ली में किसान सम्मेलन करेगें।
Jul 9, 2011
नीतीश की कृपा से जेल से बाहर आया रणवीर सेना का मुखिया
बिहार में तीन सौ दलितों और पिछड़ों के नरसंहार के लिए जिम्मेदार रणवीर सेना प्रमुख ब्रम्हेश्वर मुखिया को कल जहानाबाद की एक अदालत ने 22 में से 16 मामलों में बरी कर दिया और शेष में जमानत दे दी. 2002 में पटना से गिरफ्तार हुआ मुखिया आरा जेल में बंद था, जहाँ रिहाई के समय उसका भव्य स्वागत किया गया...
नवल किशोर कुमार
ब्रम्हेश्वर मुखिया ने 1994से लेकर 2000तक जिन तीन सौ दलितों और पिछड़ों की हत्याओं को अंजाम दिलवाया था,वह किसी एक आवेग में नहीं बल्कि रणवीर सेना का गठन करके 22 बार हमला करके अंजाम दी गयी थीं.ब्रम्हेश्वर के इशारे पर दलितों और पिछड़ों की बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया। सैंकड़ों मासूमों का गर्दन एक झटके में उड़ा दिया गया.रणवीर सेना का मास्टरमाइंड ब्रम्हेश्वर मुखिया खुलेआम कहता था कि दलितों और पिछड़ों के बच्चों को मारकर उसने और उसके साथियों ने कोई गलती नहीं की,आखिर बड़े होने पर वे नक्सली ही बनते।
महिलाओं का बलात्कार कर उन्हें जान से मार देने वाले इस दरिंदे का कहना था कि ये महिलायें नक्सलियों को जन्म देतीं,इसलिये इनका मारा जाना अनिवार्य है। सच कहा जाये तो आदमी के रुप में यह जिंदा शैतान जेल की सलाखों से बाहर आ चुका है। अदालत ने इस दरिंदे को 22में से 16मामलों में पहले ही बरी कर दिया था और पांच मामलों में इसे जमानत मिल चुकी थी। कल इस दरिंदे को अदालत ने एक और मामले में जमानत दे दी। इस प्रकार ब्रम्हेश्वर मुखिया को जेल से बाहर आने की अनुमति मिल गई।
| ब्रम्हेश्वर मुखिया : नरसंहारों का मास्टरमाइंड |
ब्रहमेश्वर के खिलाफ़ सबूत नही
यह कानून का मजाक नहीं तो और क्या है?जिस दरिंदे ने 300लोगों की हत्या कर दी और जिसने बाथे नरसंहार जैसी निंदनीय घटनाओं को अंजाम दिया,उसके खिलाफ़ सरकार को कोई सबूत नहीं मिला। कानून के कई जानकार यह बताते हैं कि सरकार ने अपनी ओर से ब्रहमेश्वर मुखिया के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। वर्ष 2006 से वह बिहार के विभिन्न जेलों में सरकारी मेहमान के रुप में रह रहा था। दलितों और पिछड़ों का खून पीने वाले इस खूनी भेड़िये को बिहार सरकार की ओर से वह हर सुविधा हासिल थी,जो एक राजनीतिक कैदी को मिलता है। यानी बिहार सरकार की नजर में वह दलितों और पिछड़ों का कातिल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता था.
नीतीश ने निभाई वफ़ादारी
अपने मूल स्वभाव के अनुसार नीतीश कुमार ने अपनी वफ़ादारी साबित करते हुए ब्रह्मेश्वर मुखिया के खिलाफ़ कोई सबूत न पेशकर अपनी स्वामी भक्ति साबित कर दी। हालांकि यह दूसरा अवसर था, जब नीतीश कुमार ने ब्रह्मेश्वर मुखिया और इनके खूनी सेना यानी रणवीर सेना अर्थात भूमिहार सेना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करते हुए जनवरी 2006में ही अमीरदास आयोग को भंग कर दिया। अमीरदास आयोग का गठन तत्कालीन राजद सरकार ने रणवीर सेना के कारनामों को जगजाहिर करने के लिये किया था। जस्टिस अमीरदास भी मानते हैं कि उनकी ओर से सारी कार्रवाई पूरी हो चुकी थी,केवल रिपोर्ट देना ही शेष रह गया था। लेकिन इससे पहले कि मौत के दरिंदे और इसकी खूनी सेना का काला सच लोगों के सामने आ पाता, नीतीश कुमार ने उस आयोग को ही भंग कर दिया।
ब्रम्हेश्वर मुखिया और रणवीर सेना का काला इतिहास
बिहार में ब्रहमेश्वर मुखिया ने वर्ष 1994के अंत रणवीर सेना यानि भूमिहार सेना का गठन किया था। इस सेना के गठन का एकमात्र उद्देश्य था- दलितों और पिछड़ों की आवाज को कुंद करना। खूनी दरिंदों की इस सेना ने दिनांक 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के खोपिरा में पहली बार कहर बरपाया। इस दिन ब्रहमेश्वर मुखिया की मौजूदगी में उसके इशारे पर रणवीर सेना के राक्षसों ने 5 दलितों की हत्या कर दी। इसके बाद करीब 3 महीने बाद रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के ही उदवंतनगर प्रखंड सरथुआं गांव में दिनांक 25 जुलाई 1995 को 6 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी।
इस घटना को अंजाम देने के ठीक 10 दिन बाद ही रणवीर सेना ने दिनांक 5 अगस्त 1995 को भोजपुर के बड़हरा प्रखंड के नूरपुर गांव में हमला कर 6लोगों की हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद रणवीर सेना के दरिंदों ने गांव से 4महिलाओं का अपहरण कर लिया था और सभी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार करने के बाद उनका कत्ल कर दिया गया था। मारी गई इन महिलाओं में एक 13साल की बच्ची भी शामिल थी। पुलिसिया रिकार्ड में यह आज भी दर्ज है कि इस बच्ची का बलात्कार किसी और ने नहीं,बल्कि ब्रह्मेश्वर मुखिया ने ही की थी और अपना मुंह काला करने के बाद इसी दरिंदे ने उसके जननांग में गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी।
दिनांक 7 फ़रवरी 1996 को रणवीर सेना के दरिंदों ने एक बार फ़िर भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के चांदी गांव में हमला कर 4 लोगों की हत्या कर दी। इसके बाद दिनांक 9 मार्च 1996 को भोजपुर के सहार प्रखंड के पतलपुरा में 3, दिनांक 22 अप्रैल 1996 को सहार प्रखंड के ही नोनउर नामक गांव में रणवीर सेना ने 5लोगों की हत्या कर दी। सहार में रणवीर सेना का खूनी तांडव रुका नहीं। दिनांक 5 मई 1996 को नाढी नामक गांव में 3 लोगों की हत्या करने के बाद रणवीर सेना ने दिनांक 19 मई यानि ठीक 14वें दिन एकबार फ़िर नाढी गांव पर कहर बरपाया और 3 और लोगों की हत्या कर दी। दिनांक 25 मई 1996 को रणवीर सेना ने उदवंतनगर के मोरथ नामक गांव में 3 लोगों की हत्या कर दी। यानी दिनांक 29 अप्रील 1995 से लेकर 25 मई 1996 तक के बीच रणवीर सेना ने कुल 38 लोगों की हत्या कर दी।
इसके बाद दिनांक 11जुलाई 1996के दिन पूरा बिहार कांप उठा था। वजह यह था कि आज के नीतीश कुमार के भगवान यानि ब्रहमेश्वर मुखिया के नेतृत्व में रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के ही बथानी टोला नामक दलितों और पिछड़ों की बस्ती पर हमला बोलकर 21 लोगों की गर्दन रेतकर हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद रणवीर सेना ने दिनांक 25 नवंबर 1996 को सहार के पुरहारा में 4, दिनांक 12 दिसंबर 1996 को संदेश प्रखंड के खनेऊ में 5, दिनांक 24 दिसंबर 1996 को सहार के एकवारी गांव में 6, और दिनांक 10 जनवरी 1997 को तरारी प्रखंड के बागर नामक गांव में 3 लोगों की हत्या कर दी गई। इस प्रकार बिहार में मौत का नंगा नाच नाचने वाले रणवीर सेना ने केवल भोजपुर जिले में कुल 77 लोगों की निर्मम हत्या की थी।
वर्ष 1997 में रणवीर सेना ने भोजपुर जिले के बाहर कदम रखा और 31 जनवरी 1997 को जहानाबाद के मखदूमपुर प्रखंड के माछिल गांव में 4 दलितों की हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद रणवीर सेना का हौसला इस कदर बढा कि उसने पटना जिले के बिक्रम प्रखंड् के हैबसपुर नामक गांव में 10 लोगों की हत्या कर दी। इस घटना को रणवीर सेना ने दिनांक 26 मार्च 1997 को अंजाम दिया। इसके बाद दिनांक 28 मार्च 1997 को ही जहानाबाद के अरवल प्रखंड(वर्तमान में अरवल जिला बन चुका है) के आकोपुर में 3, भोजपुर के सहार प्रखंड के एकवारी गांव में दिनांक 10 अप्रैल 1997 को 9 और भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के नगरी गांव में दिनांक 11 मई 1997 को 10 लोगों की हत्या रणवीर सेना ने कर दी।
| निजी सेनाओं का बिहार : हत्याएं ही संघर्ष |
दिनांक 2 सितंबर 1997 को रणवीर सेना के दरिंदों ने जहानाबाद के करपी प्रखंड के खडासिन नामक गांव में 8 और दिनांक 23 नवंबर 1997 को इसी प्रखंड के कटेसर नाला गांव में 6 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। इसके बाद दिनांक 31 दिसंबर 1997 को ब्रहमेश्वर मुखिया की उपस्थिति में रणवीर सेना ने जहानाबाद के लक्ष्मणपुर-बाथे नामक गांव में एक साथ 59लोगों की निर्मम हत्या कर दी। यह बिहार में हुए अबतक का सबसे बड़ा सामूहिक नरसंहार है। पाठकों को बता दें कि इस नरसंहार के मामले में कुल 18लोगों को आजीवन उम्रकैद की सजा दी गई है। जबकि मुख्य अभियुक्त ब्रहमेश्वर मुखिया को इस मामले में बरी कर दिया गया और इसका श्रेय भी रणवीर सेना के दलाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही जाता है।
खैर,दिनांक 25 जुलाई 1998 को जहानाबाद के करपी प्रखंड के रामपुर गांव में एक बार फ़िर रणवीर के दरिंदों ने मौत का खेल खेला और 3 लोगों की जान ले ली। दिनांक 25 जनवरी 1999 को रणवीर सेना ने जहानाबाद में एक और बड़े नरसंहार को अंजाम दिया। जहानाबाद के अरवल प्रखंड के शंकरबिगहा नामक गांव में 23 लोगों की हत्या कर दी गई। इसके बाद दिनांक 10 फ़रवरी 1999 को जहानाबाद के नारायणपुर में 12, दिनांक 21 अप्रैल 1999 को गया जिले के बेलागंज प्रखंड के सिंदानी नामक गांव में 12, दिनांक 28 मार्च 2000 को भोजपुर के सोनबरसा में 3, नोखा प्रखंड के पंचपोखरी में 3 और दिनांक 16 जून 2000 को रणवीर सेना ने औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में 33 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी।
(नवल किशोर 'अपना बिहार' वेबसाइट के मॉडरेटर हैं. यह लेख वहीं से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.)
Jul 8, 2011
सांसद निधि में वृद्धि क्यों?
सांसद निधि के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश के छह जिलों में तो इस मद में जारी 64करोड़ रुपए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखकर उनसे ब्याज कमाया जा रहा था...
राजेंद्र राठौर
देश के आधे से अधिक सांसदों ने वर्ष 2010-11 में विकास निधि का 35फीसदी हिस्सा खर्च नहीं किया है। देश में 20सांसद ऐसे भी है, जिन्होंने तो अपने क्षेत्र के विकास में फूटी कौड़ी खर्च नहीं की है,जबकि कुछ सांसद विकास निधि बांटने में अव्वल है,उन्होंने कमीशनखोरी कर प्राइवेट संस्थाओं को सांसद निधि की राशि रेवड़ी की तरह बांटी है। ऐसे में सांसद निधि की राशि दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ किए जाने का आखिर औचित्य ही क्या है?
सांसद निधि के सही उपयोग से कई क्षेत्रों की तस्वीर बदल गई है, वहीं कई क्षेत्रों में तो सांसद निधि का जमकर दुरूपयोग हुआ है। अपने प्रतिनिधियों के साथ मिलकर सांसदों ने इस निधि में करोड़ों की हेराफेरी की है, जिससे उस क्षेत्र में विकास कार्य नहीं हो सका है। कुछेक सांसदों को छोड़कर बात करें तो कई राज्यों के ज्यादातर सांसद ऐसे हैं,जिन्होंने अपनी निधि से राशि स्वीकृत करने के एवज में एक निश्चित राशि कमीशन बतौर ली है।
काम व राशि के हिसाब से सांसदों ने कमीशन भी तय कर रखा है,जिसे देकर कोई भी व्यक्ति या प्राइवेट संस्था,सांसद निधि से अनुदान प्राप्त कर सकता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण छत्तीसगढ़ राज्य में देखा जा सकता है। यहां जरूरतमंद या सरकारी संस्थाओं को लाभ भले ही न मिले,लेकिन प्राइवेट संस्थाओं को सांसद निधि की राशि आसानी से मिल रही है। भाजपा शासित राज्य होने के बावजूद यहां के ज्यादातर भाजपाई सांसदों ने अपने निधि से सरकारी संस्थाओं के बजाय प्राइवेट स्कूल,कालेज व संगठनों को लाखों रूपए अनुदान दिया है।
कई प्राइवेट संस्था तो ऐसे भी है,जिन पर सांसद भारी मेहरबान है और एक सत्र में ही उन्हें तीन-चार बार अनुदान राशि दी गई है। सांसद निधि स्वीकृत करने के पीछे का खेल बहुत लंबा-चौड़ा है। सांसदों ने अपने चहेतों को अनुदान राशि बिना किसी स्वार्थ के खैरात की तरह नहीं दी है,अनुदान राशि स्वीकृत करने के लिए सांसदों ने कुल राशि में से 20 से 30 फीसदी कमीशन लिया है। अनुदान राशि भी उन्हीं लोगों को दी गई है,जिन्होंने कमीशन पहले दिया है। यही नहीं सांसद निधि स्वीकृत कराने के लिए दलाल एक महत्वपूर्ण कड़ी बने हुए हैं,जो सांसदों को ग्राहक ढूंढ़कर देने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं।
सांसद निधि के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश के छह जिलों में तो इस मद में जारी 64करोड़ रुपए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखकर उनसे ब्याज कमाया जा रहा था। नियमों के मुताबिक यह राशि राष्ट्रीय बैंकों के बचत खाते में ही रखी जा सकती है,ताकि जरूरत पड़ने पर उसे फौरन उपयोग में लाया जा सके। मामले की शिकायत के बाद छानबीन में पाया गया कि कई राजनेताओं ने अपने रिश्तेदारों के स्कूलों और क्लबों तक में सांसद निधि खर्च करवा दी।
चार साल पहले एक स्टिंग ऑपरेशन में कुछ सांसदों को इस योजना के ठेकों में कमिशन की बात करते पकड़ा गया था। इससे स्पष्ट होता है कि बहुत से सांसद इस निधि से व्यक्तिगत हित ही साधना चाहते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं,तो वे इसके उपयोग में ही हीलाहवाली करते हैं। इस कारण सांसद निधि खर्च ही नहीं हो पाती। पिछले 16 वर्षों में सरकार द्वारा जारी की गई सांसद निधि के 1053.63 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए गए। सांसद निधि योजना तो अच्छी है, लेकिन इस योजना के तहत् राशि स्वीकृत करने के पीछे तमाम तरह की खामियां है।
इस बात को केन्द्र सरकार भी भलीभांति जानती है,फिर भी आंख बंद किए हुए देश की बर्बादी तमाशा देख रही है। सांसद निधि के दुरूपयोग की शिकायतें छत्तीसगढ़ राज्य ही नहीं बल्कि, देश के कई राज्यों से आए दिन सामने आ रही है, लेकिन एक भी मामले में सांसद के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे साफ जाहिर होता है कि सरकार ही नहीं चाहती कि जनता को उनका जायज हक मिले। यही वजह है कि जनता के लिए सरकार से मिलने वाली राशि का ज्यादातर हिस्सा सांसद व उनके चमचे ही हजम कर जा रहे है, फिर भी सांसदों को निधि के तहत् मिल रहा 2 करोड़ रूपए कम लग रहा था।
केन्द्र सरकार से सांसद बार-बार विकास निधि बढ़ाए जाने की मांग कर रहे थे। राशि बढ़ाने के संबंध में सांसदों का तर्क था कि महंगाई के इस दौर में 2 करोड़ रूपए विकास कार्यो के लिए पर्याप्त नहीं है। राशि कम होने की वजह से क्षेत्र में अपेक्षित विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं। सांसद निधि में वृद्धि को लेकर केन्द्र सरकार लंबे समय से विचार कर रही थी। आखिरकार 7 जुलाई को कैबिनेट ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि योजना के तहत प्रत्येक सांसद को मिलने वाली दो करोड़ की राशि को बढ़ाकर पांच करोड़ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
इससे इस योजना के तहत विकास कार्यों के लिए सांसदों को मिलने वाली राशि प्रतिवर्ष 1580से बढ़कर 3950करोड़ रुपए हो जाएगी और सरकारी खजाने पर प्रतिवर्ष 2370करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। कैबिनेट की बैठक में यह भी बताया है कि सांसद विकास निधि योजना के शुरू होने से लेकर 31 मार्च 2011 तक 22490.57 करोड रुपए जारी किए जा चुके हैं। वहीं इस योजना के तहत 31 मार्च 2011 तक 13.87 लाख कार्यों की सिफारिश सांसदों ने की तथा जिला अधिकारियों ने 12.30 लाख कार्यों को मंजूर किया एवं 11.24लाख कार्य पूरे किए गए।
हाल ही में 15 वीं लोकसभा के 2011-11 के कामकाज पर स्वयंसेवी संस्था मास फार अवेयरनेस के वोट फार इंडिया अभियान द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की बात करें तो देश के आधे से अधिक सांसदों ने सही तरीके से इस निधि का उपयोग नहीं किया है। रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि इस निधि का महज 35 फीसदी हिस्सा ही सांसद खर्च कर पाए हैं। देश में 20 सांसद ऐसे भी हैं, जिन्होंने वर्ष के दौरान निधि से एक पैसा भी खर्च नहीं किया है,जिनमें भारतीय जनता पाटी के सांसद शाहनवाज हुसैन तथा कांग्रेस के सीपी जोशी भी शामिल है,जबकि सांसद निधि का कम उपयोग करने वाले सांसदों में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी, राहुल गांधी, सचिन पायलट, जनता दल यूनाईटेड के शरद यादव, राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह के नाम शामिल है। सांसद निधि का मिजोरम के सांसदों ने भरपूर उपयोग किया है।
बहरहाल, अगर इस धन का सही उपयोग हुआ होता, तो इतने वर्षों में ग्रामीण भारत की तस्वीर ही बदल चुकी होती, लेकिन यह निधि सार्वजनिक धन की बर्बादी का ही जरिया बनती जा रही है। ऐसे में सांसद निधि की राशि 2करोड़ से बढ़कर 5करोड़ हो जाए,या फिर 10करोड़, सांसदों के कमीशनखोरी की भूख मिटने वाली नहीं है और न ही देश के पिछले क्षेत्रों में विकास के कोई बड़े कार्य होने की उम्मीद है।
छत्तीसगढ़ के जांजगीर के राजेंद्र राठौर पत्रकारिता में 1999से जुड़े हैं.लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 'जन-वाणी' ब्लॉग लिखते है.
जानलेवा उत्पादों से सावधान!
कहीं से किसी इन्वेर्टर के फट जाने की खबर मिलती है तो कहीं इन्वर्टर के साथ की बैटरी में धमाका हो जाता है। कहीं फ्रिज का कम्प्रेसर फट रहा है तो कहीं एयर कंडीशनर में धमाके की खबरें मिल रही हैं...
निर्मल रानी
ज़ाहिर है अपने प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार को रचनात्मक रूप देने और इसे निर्मित कर उत्पाद का रूप देने के अपने मानदंड भी इन वैज्ञानिकों ने स्थापित किए। इन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि अमुक उत्पाद के लिए उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्रियां किस श्रेणी की हों, कितनी हों तथा उन्हें किस प्रकार इस उत्पाद का अंग बनाकर इसे उसमें शामिल किया जाए।
लगता है कि समय बीतने के साथ-साथ वैज्ञानिकों की आशाओं और आकांक्षाओं पर पानी फिरता जा रहा है, क्योंकि उन्होंने किसी उत्पाद विशेष का आविष्कार कर उसके उत्पादन के कुछ मानदंड स्थापित किये थे। शायद कुछ उसी तरह जैसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान-माल की कुर्बानी देकर हमारे देश को इसलिए आज़ाद कराया था, ताकि भावी पीढ़ी स्वाधीन होकर अपने पैरों पर खड़ी हो और स्वतंत्र,शक्तिशाली एवं समृद्ध भारत का निर्माण करे। मगर देश की स्थिति इसके ठीक विपरीत है. आज देश के रक्षक ही भक्षक बनते दिखाई दे रहे हैं। कुछ ऐसा ही हाल वैज्ञानिकों और उनके आविष्कार को लेकर उनकी आकांक्षाओं तथा उनके आविष्कार को उत्पादन के स्तर तक ले जाने वाले मुनाफाखोर उत्पादकों के बीच देखा जा रहा है।
आए दिन ऐसे-ऐसे समाचार अवश्य प्राप्त होते हैं, जिनके द्वारा कभी कहीं से किसी इन्वेर्टर के फट जाने की खबर मिलती है तो कहीं इन्वर्टर के साथ की बैटरी में धमाका हो जाता है। कहीं फ्रिज का कम्प्रेसर फट रहा है तो कहीं एयर कंडीशनर में धमाके की खबरें मिल रही हैं। यहां तक कि विदेशी कम्पनियों के मोबाईल फोन और उनमें लगी बैटरी में भी धमाके कि खबरें आ चुकी हैं।
कुछ दिन पहले ऐसा ही दिल दहलाने वाला हादसा उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद के ब्रहमपुरी इलाके में हुआ। यहां एक युवा दंपत्ति अपने बेटे के साथ कमरे में सो रहा था। इसी दौरान अचानक इन्वर्टर के साथ रखी बैटरी में ज़ोरदार धमाका हुआ, जिससे बैटरी और इन्वर्टर दोनों में विस्फोट हो गया। कमरे में आग लग गई तथा पूरे कमरे में धुआं भी फैल गया। इस तीन सदस्यों के बदनसीब परिवार को इतनी मोहलत भी न मिल सकी कि वे कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल खुद बचा पाते। दम घुटने से तीनों की मौत हो गई। प्रारंभिक जांच पड़ताल में यही पाया जा गया कि इन्वर्टर तथा बैटरी दोनों ही किसी स्थानीय फैक्टरी में बनवाए गए थे जो उत्पाद के मानक पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते थे।
इस तरह के हादसे हमारे देश में कहीं न कहीं होते ही रहते हैं। कुछ समय पूर्व पंजाब में भी एसी फटने की खबर आई थी। नोएडा व दिल्ली से भी ऐसे कई समाचार आ चुके हैं। ऐसा लगता है कि चंद पैसों की बचत के लिए ऐसे उद्योगों के मालिक आम लोगों की जान-माल की कोई परवाह नहीं करते। निजी क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार अपनी गहरी जड़ें बना चुका है। उदाहरण के तौर पर यदि आप छब्बीस या सत्ताईस प्लेट की बैटरी खरीदने जाएं तो दुकानदार या बैटरी बनाने वाली स्थानीय फैक्टरी का मालिक बाईस या तेईस प्लेट कि बैटरी को ही पच्चीस या सत्ताईस प्लेट की बता देगा। ऐसी बैटरी में सिक्का तथा तांबा भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पड़ता। यही हाल इनवर्टर तथा स्टेबलाईजऱ जैसी संवेदनशील विद्युत सामग्रियों का है।
इस तरह के हादसे हमारे देश में कहीं न कहीं होते ही रहते हैं। कुछ समय पूर्व पंजाब में भी एसी फटने की खबर आई थी। नोएडा व दिल्ली से भी ऐसे कई समाचार आ चुके हैं। ऐसा लगता है कि चंद पैसों की बचत के लिए ऐसे उद्योगों के मालिक आम लोगों की जान-माल की कोई परवाह नहीं करते। निजी क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार अपनी गहरी जड़ें बना चुका है। उदाहरण के तौर पर यदि आप छब्बीस या सत्ताईस प्लेट की बैटरी खरीदने जाएं तो दुकानदार या बैटरी बनाने वाली स्थानीय फैक्टरी का मालिक बाईस या तेईस प्लेट कि बैटरी को ही पच्चीस या सत्ताईस प्लेट की बता देगा। ऐसी बैटरी में सिक्का तथा तांबा भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पड़ता। यही हाल इनवर्टर तथा स्टेबलाईजऱ जैसी संवेदनशील विद्युत सामग्रियों का है।
एल्युमिनियम की बांईंडिग किये गए ट्रांसफार्मर को तमाम अधिक मुनाफाखोर व ठग प्रवृति के दुकानदार कॉपर का बताकर ग्राहक से मोटे पैसे ठग लेते हैं। ऐसे दुकानदारों व लघु उद्योगों के मालिकों को उपभोक्ताओं की जान-माल की परवाह कतई नहीं होती। बल्कि इनका ध्यान तो केवल इस ओर रहता है कि कम से कम लागत में ज़्यादा से ज़्यादा पैसे किस प्रकार कमाए जाएं। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि लोगों की जान-माल से खिलवाड़ करने की शर्त पर कमाई गई दौलत पर भी यह खुद को एक सफल व्यवसायी कहने से बाज़ नहीं आते।
साधारण उपभोक्ताओं के इस प्रकार के संकटों में पडऩे तथा जान-बूझकर अपनी व अपने परिवार के जान-माल पर खेल जाने का एक कारण यह भी है कि स्थानीय अथवा देसी उत्पाद आमतौर पर उपभोक्ताओं को न केवल सस्ते उपलब्ध होते हैं, बल्कि ऐसी सामग्रियां किश्तों पर भी उपलब्ध हो जाती हैं। इसी लालचवश या फिर आर्थिक तंगी के चलते मध्यमवर्गीय व निम्र मध्यमवर्गीय उपभोक्ता ऐसे घटिया उत्पाद खऱीदने को मजबूर हैं। परिणामस्वरूप घटिया उत्पाद के बाज़ार में बिकने का सिलसिला निर्बाध चलता रहता है। न तो प्रशासन इनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करता है न ही गरीब व मध्यमवर्गीय उपभोक्ता इनसे सामान खरीदने या किश्तों पर सामान लेने से बाज़ आता है।
ऐसा भी नहीं है कि इस प्रकार के हादसे केवल देसी उत्पादों के साथ ही घटित होते हों। पिछले दिनों तो भारत में पूरे देश से दर्जनों ऐसे समाचार मिले जिनसे यह पता चला कि विश्वस्तरीय नोकिया कंपनी के मोबाईल फोन में डाली जाने वाली बैटरी में कई जगह धमाका हुआ। कई लोग इसमें घायल भी हुए। किसी की जेब में रखा मोबाईल फोन फटा तो किसी का फोन उस समय फटा जब वह किसी व्यक्ति से फोन पर बात कर रहा था।
नोकिया जैसी कंपनी जिसमें गुणवत्ता नियंत्रण पर ज़ोर दिया जाता है तथा ऐसी बड़ी कंपनियों में उत्पाद की गुणवत्ता नियंत्रण के लिए विशेष विभाग भी बनाए गए हैं, उससे इस बात की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती कि चंद पैसे बचाने की खातिर अपना घटिया माल भारतीय बाज़ारों में उतार दिया हो। यही वजह थी कि जैसे ही नोकिया को मीडिया के माध्यम से पता चला कि उनके मोबाईल फोन की बैटरियों में विस्फोट हो रहा है तथा उपभोक्ताओं की जान को खतरा पैदा हो गया है, कंपनी ने अत्यंत साहसिक कदम उटाते हुए पूरे भारतवर्ष में उन बैटरीज़ को ग्राहकों से वापस लेने तथा उनके स्थान पर दूसरी नई बैटरी देने का फैसला कर लिया।
यहां सोचने का विषय है कि नोकिया ने अपना विवादित उत्पाद वापस लेकर सैकड़ों करोड़ का घाटा आखिर क्यों उठाया गया। सिर्फ इसलिए कि नोकिया की बाज़ार में जो प्रतिष्ठा कायम थी वह बनी रहे। इस फैसले के कारण ही भारतीय बाज़ार में आज भी नोकिया की वही प्रतिष्ठा बरकरार है जो इस घटना से पूर्व थी। परंतु हमारे देश में तो तमाम देसी उत्पाद बनाने वाले उद्योगपत्ति मान-प्रतिष्ठा और इज़्ज़त नाम की चीज शायद जानते ही नहीं। उन्हें तो केवल अपने लिए अधिक से अधिक पैसा कमाने से ही वास्ता है। इसीलिए आये दिन हादसे होते रहते हैं।
ऐसे में जबकि तमाम देसी सामग्री के भारतीय उत्पादक अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हों, उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे स्वयं अपनी जान-माल की रक्षा करें। सर्वप्रथम उपभोक्ता सस्ते सामानों के चक्कर में पडऩे व घटिया उत्पाद खरीदने से परहेज़ करें। कोशिश करें कि जहां वह देसी उत्पाद खरीदने के लिए थोड़े पैसों का प्रबंध कर रहे हैं वहीं कुछ और पैसों का इंतज़ाम कर स्टैंडर्ड की कंपनी का गारंटेड माल ही खरीदें। और यदि जेब इजाज़त नहीं दे और मजबूरीवश सस्ता व देसी माल खरीदना ही पड़े तो विक्रेता से माल के विषय में पूरा विवरण हासिल करें। लिखित रूप से उससे उत्पाद की विश्वसनीयता की पूरी गारंटी लें, ताकि ज़रूरत पडऩे पर वह अपनी बात से मुकर न सके।
प्रशासन का भी कर्तव्य है कि वह बाज़ार पर इस बात की नज़र रखे कि दुकानदार द्वारा उपभोक्ताओं को कौन सा माल क्या कहकर व क्या बताकर बेचा जा रहा है। झूठ बोलकर व गुमराह कर सामान बेचने वाले व्यापारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की भी ज़रूरत है। अन्यथा उपभोक्ताओं के जान-माल के नुकसान को शायद रोका नहीं जा सकेगा।
लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.
Jul 7, 2011
संतों-समाजसेवियों के संघर्षों पर सवाल क्यों?
विपक्षी दल मुंह बंद किए हों, तथाकथित समाजसेवी, नौकरशाह, शिक्षक, वकील, प्रबुद्वजन और पत्रकार सत्ता की चाटुकारिता और गुणगान में मगन हों तो देश के आम आदमी हक और हकूक की बात आखिरकर कौन करेगा...
आशीष वशिष्ठ
अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, निखलानंद, नागनाथ और जैन मुनि श्री मैत्रि सागर को विश्व के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र में अपनी बात सत्ता तक पहुंचाने के लिए आमरण अनशन का रास्ता क्यों चुनना पड़ता है। क्यों सत्ता को आम आदमी की आवाज और दुःख-दर्दे सुनाई नहीं देता है। क्यों ऐसे हालात बनाए जाते हैं कि किसी निगमानंद को राष्ट्रीय नदी गंगा को बचाने के लिए अपने प्राणों की बलि देनी पड़ती है,ये सवाल इस देश के प्रत्येक नागरिक के मनोमस्तिष्क उमड़-घुमड़ रहा है कि लोकतंत्र में आमरण अनशन क्यों?
लोकतांत्रिक व्यवस्था को विश्व की उत्तम व्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन हमारे यहां खाने और दिखाने के दांतों में फर्क है। हमारे तथाकथित नेताओं और प्रतिनिधियों की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। चुनावी बेला पर आश्वासनों का लाली पॉप देने वाले नेता चुनाव जीतते ही वीआईपी हो जाते हैं। चुनाव से पूर्व देश और दुनिया की तकदीर बदलने के दावे और वायदे करने वाले वक्त पड़ने पर स्ट्रीट लाइट की एक टयूब बदलवाने के लिए भी आम आदमी से दस-बीस चक्कर लगवाते हैं।
जब देश में विपक्षी दल मुंह बंद किए बैठे हों, तथाकथित समाजसेवी, नौकरशाह, शिक्षक , वकील, प्रबुद्वजन और पत्रकार सत्ता की चाटुकारिता और गुणगान में मगन हों,तो देश के आम आदमी, किसान, मजदूर, महिलाओं, बच्चों और निचले तबके के हक और हकूक की बात आखिरकर कौन करेगा। ऐसे निराष और भ्रष्ट माहौल में जब लाखों-करोड़ों की भीड़ में से कोई संत या समाजसेवी उठकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करता है, और सोयी हुई जनता को जगाने का पुनीत कर्म करता है तो व्यवस्था और सत्ता को उससे परेशानी होने लगती है।
आखिरकर रामदेव,अन्ना,निखलानंद,नागनाथ और जैन मुनिश्री मैत्रि सागर भी तो इसी देश के नागरिक हैं। उन्हें भी देश के संविधान ने वहीं अधिकार प्रदान कर रखे हैं, जो देश के अन्य करोड़ों नागरिकों को प्राप्त हैं। आखिरकर सत्ता उनकी बात क्यों नहीं सुनना चाहती। सत्ता को इनसे क्या वैर और दुष्मनी है। सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वाले महानुभावों का भी इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था और संसदीय प्रणाली में पूर्ण विश्वास और आस्था है। अगर सत्ता ने ये समझ लिया है कि वोट डालने और प्रतिनिधि चुनने तक ही आम आदमी के लिए लोकतंत्र की परिभाषा है तो इस परिभाषा का उल्लंघन गुनाह की श्रेणी में ही आएगा।
रामदेव, अन्ना, निखलानंद, नागनाथ और जैन मुनि श्रीमैत्रि सागर ने यही अपराध किया है कि उन्होंने अपने द्वारा चुनी सरकार से काम-काज का हिसाब-किताब मांग लिया,लोकपाल कानून बनाने में सिविल सोसायटी की भागीदारी मांग ली या फिर सरकार को ये बताने का अपराध कर डाला कि देश के हजारों-करोड़ की ब्लैक मनी विदेशी बैंकों में जमा है। लेकिन सत्ता को देश और जनहित की ये बात कतई बर्दाश्त नहीं आयी कि कोई अन्ना या रामदेव उठकर उससे तर्क-वितर्क करे और उसे राज-काज के तौर तरीके बताएं।
हम सब मिलकर लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटते तो जरूर हैं लेकिन असल में हमारे यहां लोकतंत्र नाममात्र का ही बचा है। प्रेस की आजादी सत्ता को सताने लगी है और समाज के भीतर से उठ रही विरोधी आवाजों को कुचलने-मसलने और दबाने की पुरजोर कोषिषें जारी हैं। कभी उस विरोधी स्वर को निखलानंद की भांति देशहित में प्राण गंवाने पड़ते हैं तो कभी रामदेव की तरह लाठी-डंडों की मार सहनी होती या फिर अन्ना की भांति धमकियों और मानसिक प्रताड़ना और तनाव का सामना करना पड़ता है। सत्ता की जनहित के मुद्दों और विरोधी स्वरों के विरूद्व रूखा,अड़ियल और अलोकतांत्रिक व्यवहार ही आज गहरी सोच और चिंतन का विषय है कि अगर एक लोकतान्त्रिक देश में जनता की चुनी हुई सरकार अलोकतांत्रिक रीतियो, नीतियों और कारगुजारियों पर उतर आएगी तो फिर लोकतंत्र की रक्षा कैसी होगी।
सवाल लोकपाल बिल के निर्माण,गंगा के घाटों से अवैद्य खनन रोकने और विदेशों में जमा काला धन वापिस लाने से बढ़कर यह है कि आखिकर जनता द्वारा चुनी हुई कोई सरकार प्रजातांत्रिक रीति-नीति और नियम छोड़कर तानाशाही पर उतारू क्यों है। आखिरकर क्यों देष और लोकहित से जुड़े मुद्दे और मांगे मनवाने के लिए संत और समाजसेवी आमरण अनषन के कठोर रास्ते पर चलने को मजबूर हैं?जब देश में आम आदमी की आवाज का कोई महत्व ही शेष नहीं है तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा चुनी सरकार को गद्दी पर बैठने का क्या अधिकार है। सत्ता के नशे में मदमस्त सरकार और व्यवस्था अपनी कमियों,दोषों और गुनाहों पर विचार किये बिना अपने खिलाफ उठ रही आवाज को सुनने और समझने के बजाए उसे दबाने,डराने,धमकाने और कुचलने पर आमादा हो रही है।
पिछले दो-तीन दशकों में इस लूट-खसोट की प्रवृत्ति ने खासा जोर पकड़ा है। ऐसा भी नहीं है कि कोई एक ही राजनीतिक दल और नेता ही गुनाहगार है असलियत यह है कि हमाम में सभी नंगे हैं। नेता सत्ता के नषे में मदमस्त है और विपक्ष पस्त है और अगर ऐसे वातावरण में अन्ना, रामदेव या फिर कोई दूसरा आदमी उठकर सरकार से सवाल-जवाब करता है तो इसमें बुराई ही क्या है। वो अपने लिए तो कुछ मांग नहीं रहे हैं, जनहित और देशहित के लिए सोचना और आवाज बुलंद करना अगर गुनाह है, तो अन्ना और रामदेव सत्ता की नजर में गुनाहगार हैं।
सोलह अगस्त से अन्ना ने एक बार फिर अनशन का ऐलान किया है। ऐसे में सवाल है कि क्या इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमें और आपकों गर्व है। क्या यही है जनता की चुनी हुई सरकार जो हक मांगने पर आम आदमी पर को डंडे मारे और प्रताड़ित करे। अगर एक लोकतांत्रिक देश में अपनी बात मनवाने के और हक पाने के लिए आमरण अनशन की जरूरत है तो फिर काहे का लोकतंत्र और काहे की लोकतांत्रिक व्यवस्था।
स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक.
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