Mar 14, 2011

आवाम के शायर हबीब जालिब की याद में


हबीब जालिब पहली बार अय्यूब खान के सैनिक शासन में जेल गए। यह जेल अय्यूब खान की पूंजीवादी नीतियों के विरोध का सिला थी। इस दौरान जेल में उन्होंने अपनी मशहूर नज्म ‘दस्तूर’ लिखी...


सचिन  श्रीवास्तव  


यह पोस्ट कल डाली जानी थी,लेकिन वक्त की कमी और अखबारी मसरूफियत की वजह से यह हो न सका। कल हबीब जालिब की पुण्यतिथि थी। 12 मार्च 1993 को वे हमारे बीच नहीं रहे थे, लेकिन वे ऐसे शायर हैं,जिन्हें याद करने के लिए तारीखों की जरूरत नहीं।

हबीब : अवाम की आवाज
हबीब उन चंद नामों में से हैं कि कोई पूछे कि एक शायर, कवि, साहित्यिक या इंसान को कैसा होना चाहिए, तो हम बिना दिमाग पर जोर डाले जिन नामों को जवाब की शक्ल में उछाल सकते हैं,उनमें से एक नाम इस आवाम के शायर का भी है। जिन लोगों ने हबीब को पढा-सुना है वे मेरी बात से सहमत होंगे। हालांकि ऐसे लोग कम ही होंगे,जिन्होंने हबीब जालिब को नहीं पढा। फिर भी उन बदकिस्मत लोगों के लिए अफसोस के अलावा चंद बातें और कुछ नज्में।

पाकिस्तान में 24मार्च 1928 को पैदा हुए जालिब उम्र भर अपनी कविताओं के माध्यम से पाकिस्तान के सैनिक कानून, तानाशाही और राज्य की हिंसा के खिलाफ लिखते, बोलते और तकरीरें करते रहे। उम्र भर सत्ता की आंख में चुभते रहे जालिब की कविताएं पाकिस्तान की सीमा पर कर दुनिया के हर संघर्ष और सत्ता की खिलाफत करने वाले इंसान की आवाज बन गई हैं।

अंग्रेजी राज में पैदा हुए जालिब का शुरुआती नाम हबीब अहमद था। बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान का रुख कर गए और कराची से निकलने वाले डेली इमरोज में प्रूफरीडर हो गए। प्रगतिशीलता के पक्षधर जालिब ने इसी दौरान कुछ अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद किया, जिनसे वे पाठकों की नजरों में आए। उस दौर के स्थापित नामों से अलग शैली अपनाते हुए उन्हें सपाट बयानी और पाठक को संबोधित करने वाली भाषा की बुनावट में जुल्म,ज्यादती,मुफलिसी और गैर बराबरी को अपनी कविताओं का हिस्सा बनाया। अपने समय की राजनीति पर लयबद्ध कविताओं के जरिए चोट करने वाले जालिब जल्द ही आवाम के शायर हो गए थे।
पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे जालिब मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित थे और अपनी कविताओं के विषय कम्यूनिज्म की बारीकियों से ही चुनते थे। पाकिस्तान में जब कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया गया था और इसके सदस्य राष्ट्रीय आवामी पार्टी के बैनर तले काम कर रहे थे, तब हबीब जालिब भी एनएपी के साथ जुड़ गए। इस दौरान भी हबीब जालिब के तेवर तीखे ही रहे और इसी कारण उन्हें अपना ज्यादातर समय जेल में बिताना पड़ा।

वे पहली बार अय्यूब खान के सैनिक शासन में जेल गए। यह जेल अय्यूब खान की पूंजीवादी नीतियों के विरोध का सिला थी। इस दौरान जेल में उन्होंने अपनी मशहूर नज्म ‘दस्तूर’लिखी। 1962 में जब अय्यूब खान के संविधान को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी मुहम्मद अली ने लायलपुर के क्लॉक टॉवर से सराहा,तो हबीब ने इसके जवाब में नज्म ‘मैं नहीं मानता’लिखी। शासन के विरुध अपने तीखे तेवरों के कारण उस दौर के सरकारी मीडिया में जालिब को प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन वे झुके नहीं और अन्य मोर्चों पर निरंकुश शासन की खिलाफत करते रहे।
फातिमा जिन्ना ने जब अय्यूब खान के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी की,तो तमाम लोकतांत्रिक ताकतें उनके इर्दगिर्द इकट्ठा हो गईं  और सरकारी प्रतिबंध के बावजूद जालिब ने पूरी पाकिस्तानी आवाम के दर्द को अपनी लेखनी में उतारते हुए बड़े जनसमूहों को उस दौर में अपनी शायरी के जरिए संबोधित किया। उस दौर में उन्होंने ‘मां के पांव तले जन्नत है,इधर आ जाओ’ जैसी कविताएं भी लिखीं,जो उनकी भावुकता का चरम मानी जाती है। यूं भी जालिब को अपनी कविताएं पूरी भावुकता के साथ पढ़ने के लिए भी याद किया जाता है।

घटनाएं जालिब को शायरी के लिए किस कदर प्रभावित करती थीं, इसका एक और बड़ा उदाहरण है। यह घटना पाकिस्तान की प्रतिरोधी संस्कृति की लोकगाथाओं में भी शुमार की जाती है। हुआ यूं कि एक बार पश्चिमी पाकिस्तान (तब बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था और मूल पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान कहा जाता था)के गर्वनर से मिलने ईरान के शाह रेजा पहलवी आए। उनके मनोरंजन के लिए गवर्नर ने फिल्म कलाकार नीलू को डांस करने के लिए बुलाया। नीलू ने इससे इंकार कर दिया,तो उसे लेने के लिए पुलिस भेजी गई। जिस पर नीलू ने आत्महत्या का प्रयास किया। इस घटना पर हबीब जालिब ने कविता लिखी,जो बाद में नीलू के पति रियाज शाहिद ने अपनी फिल्म ‘जर्का’ में इस्तेमाल की। ये कविता थी- ‘तू क्या नावाकिफ-ए-आदाब-ए-गुलामी है अभी/ रक्स जंजीर पहन कर भी किया जाता है।’

जब जुल्फिकार अली भुट्टो के शासन 1972 में आने के बाद जालिब के कई साहित्यिक और राजनीतिक साथी सत्ता का लुत्फ लेने लगे और भुट्टो के साथ हो लिए। जालिब ने इस दौरान विपक्ष की भूमिका को ही पसंद किया। बताया जाता है कि एक बार जालिब भुट्टो से मिलने उनके घर पहुंचे। भुट्टो ने अपनी पार्टी में आने का न्यौता देते हुए जालिब से पूछा-‘कब शामिल हो रहे हो?’ जिस पर जालिब ने जवाब दिया-‘क्या कभी समुंदर भी नदियों में गिरा करते हैं?’तब भुट्टो ने जवाब दिया- ‘कभी-कभी समुद्र नदियों की तरफ जाते हैं, लेकिन नदियां ही उन्हें पीछे धकेल देती हैं’। अपनी शासन विरोधी कार्रवाइयों के कारण जालिब को एक बार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, तब जुल्फिकार भुट्टो ने ही उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था।



पत्रकार हसन अली के साथ हबीब जालिब  
 इसके बाद जनरल जिया उल हक की तानाशाही के दौरान जालिब ने लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने अपनी मशहूर कविता ‘क्या लिखना’ लिखी। जिया का अर्थ होता है, प्रकाश और जालिब इसीलिए पूछते हैं, ‘जुल्मत को जिया क्या लिखना’। जिया उल हक के शासन में ज्यादातर वक्त जालिब जेल में रहे।

1988 में जनरल जिया उल हक की हवाई दुर्घटना में मौत के बाद हुए आम चुनाव जीतकर बेनजीर भुट्टो शासन में आर्इं,उन्होंने हबीब जालिब को जेल से रिहा कराया। तानाशाही के बाद आए लोकतंत्र में कुछ लोगों को राहत मिली,लेकिन आवाम के तरफदारों के लिए यह मुसीबत का दौर था। निरंकुश तानाशाही के बाद लोकतंत्र की बयार में पाकिस्तान के कई लेखकों-शायरों के लिए वैचारिक संकट था।

अगर वे बेनजीर के लोकतंत्र की खिलाफत करते थे,तो उन्हें तानाशाही की याद दिलाई जाती थी, कि उस दौर से तो यह दौर बेहतर है। ऐसे में एक बार जालिब से पूछा गया कि वे इस लोकतंत्र में क्या बदलाव चाहते हें,तो उन्होंने अपनी एक नज्म के जरिए मुल्क पर चढ़े कर्ज और औरतों के हालात का जिक्र करते हुए जवाब दिया-हाल अब तक वही हैं गरीबों के,दिन फिरे हैं फकत वजीरों के हर ‘बिलावल’ है देश का मकरोज पांव नंगे हैं ‘बेनजीरों’ के

जालिब की कविता में उनके दर्शन और जिंदगी की करीबी सच्चाइयों को साफ-साफ पढ़ा जा सकता है। वे कभी अपने रास्ते से नहीं डिगे। वे इंसान से प्यार करते थे,मजलूमों के लिए उनके दिल में हमदर्दी थी और यह उनके हर एक लिखे,बोले हर्फ में दिखाई देती है। हबीब अपने समय के उन दुर्लभ कवियों में शामिल हैं,जिनका अन्याय और क्रूरता के खिलाफ गुस्सा ताजिंदगी रचनात्मक ऊर्जा के साथ एक राजनीतिक हस्तक्षेप भी मुहैया कराता रहा। जालिम हमारे दौर के क्रूर सामाजिक ढांचे के भुक्तभोगी भी हैं। उन्हें कई बार ऐसे अपराधों में फंसाकर जेल भेजा गया, जो उन्होंने किए ही नहीं थे।

अपने आखिरी वक्त तक जालिब पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। उनकी मौत के बाद 1994 में कम्यूनिस्ट पार्टी का मजदूर किसान पार्टी में विलय हो गया, अब इसे कम्यूनिस्ट मजदूर किसान पार्टी के नाम से जाना जाता है। कम्यूनिस्ट मजदूर किसान पार्टी के दो सदस्यों शहराम अजहर और तैमूर रहमान ने उनकी याद में एक म्यूजिक वीडियो लांच किया था। जालिब के संघर्ष के रूपक को इस्तेमाल करते पाकिस्तान बैंड ‘लाल’ ने भी काफी काम किया है। 2009 में इस बैंड ने ‘उम्मीद ए सहर’ नाम से भी एक अलबम निकाला। 2009 में 23 मार्च को पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने हबीब जालिब को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिया।

जालिब के बारे में लिखने-पढ़ने-कहने-सुनने को इतना कुछ है कि उसे एक बार में याद नहीं किया जा सकता। फिलवक्त उनकी चंद नज्मों,गजलों का लुत्फ उठाएं। और इजाजत दें। फिर वक्त मिला तो किसी और फनकार के साथ हाजिर होउंगा। शब्बा खैर।




मेरठ से प्रकाशित दैनिक जनवाणी में फीचर संभाल रहे सचिन पत्रकारिता के साथ साहित्य में दखल रखते हैं. उनसे   chefromindia@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.


 
 

 

लीबिया के विद्रोह पर साम्राज्यवादियों की गिद्ध दृष्टि


अमेरिका अगर लीबिया में लोकतंत्र स्थापितकरने का हिमायती है तो उससे   मधुर संबंध रखने  वाले कई  देशों में राजशाही -तानाशाही है। कई देश अमेरिका के मित्र हैं जहां लीबिया से अधिक भूख,बेरोज़गारी, मंहगाई व भ्रष्टाचार है...

तनवीर जाफरी

ट्यूनीशिया तथा मिस्र के जनविद्रोह के बाद लीबिया में उपजे जनाक्रोश से ऐसा लगने लगा था कि  कर्नल मोअमार गद्दाफी भी उन  देशों के राष्ट्र प्रमुखों की ही तरह पद को त्याग कर देश छोड़ अन्यत्र चले जाऐंगे। ईरान सहित कई उन यूरोपिय देशों के नाम भी सामने आने शुरू हो गए थे जहां गद्दाफी को पनाह मिल सकती है। ऐसी ख़बरें भी आयीं   कि गद्दाफी देश छोड़ कर जाने को तैयार हैं बशर्ते   उनके परिवार के किसी भी व्यक्ति को कोई शारीरिक नुकसान न पहुंचाया जाए तथा उनकी धन संपत्ति तथा सोना- आभूषण आदि को उनके पास सुरक्षित रहने दिया जाए।

लेकिन इन खबरों की विश्वसनीयता तब संदिग्ध हो जाती है जब कभी कर्नल गद्दाफी तो कभी उनके पुत्र किसी टीवी चैनल को साक्षात्कार देते समय यह कहते सुनाई देते हैं कि -'मैं लीबिया का हूं और लीबिया में ही जिऊंगा और यहीं मरूंगा।' गद्दाफी का दावा है कि लीबिया में रह रहे तमाम अलग अलग क़बीलों के लोगों को संगठित कर एकजुट रखना केवल उन्हीं जैसे नेता के वश की बात है। बकौल गद्दाफी अगर उनकी पकड़ ढीली हुई तो देश टूट जाएगा तथा इसका हश्र बोसनिया जैसा होगा।


लीबिया में मची उथल पुथल पर नज़र डाली जाए  तो  कोई शक नहीं कि पूरे लीबिया में गद्दाफी के विरुद्ध भारी जनाक्रोश है। कारण वही हैं  भूख,बेरोज़गारी,भ्रष्टाचार,गरीबी तथा मंहगाई जो मिस्र व ट्यूनीशिया में  थे। इतना ज़रूर है कि एक प्रमुख तेल उत्पादक देश होने के कारण लीबिया की आर्थिक स्थिति अन्य इस्लामिक देशों की तुलना में काफी सुदृढ़ ज़रूर है।

 मगर  मिस्र तथा लीबिया  में एक  बड़ा अंतर है.जहां मिस्र के शासक हुस्नी मुबारक को अमेरिका का समर्थन प्राप्त था वहीं कर्नल गद्दाफी दुनिया के उन कुछेक  शासकों में हैं जो अमेरिका के विरुद्ध मुखर हैं. ऐसे में लीबिया जैसा तेल उत्पादक देश और उस देश का गद्दाफी जैसा मुखिया जो कि अमेरिका विरोधी विचारधारा रखता हो, आखिर  अमेरिका ज्य़ादा समय तक यह स्थिति कैसे बर्दाश्त कर सकता है? 
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा इस बात को लेकर चिंतित नज़र आ रहे हैं कि कर्नल गद्दाफी अपने विद्रोहियों को कुचलने के लिए सेना के साथ-साथ हवाई हमलों का सहारा भी ले रहे हैं। अमेरिका गद्दाफी द्वारा चलाए जा रहे इस दमनचक्र को रोकने हेतु जहां लीबियाई आकाश को उड़ान निषिध क्षेत्र अर्थात् (नो फलाई ज़ोन ) बनाना चाह रहा है वहीं अमेरिका यह भी चाहता है कि लीबिया में नॉटो सेना दखल अंदाज़ी करे।

ओबामा ने स्वयं पिछले दिनों यह कहा भी कि-'ब्रसेल्स में नॉटो कई विकल्पों पर विचार कर रहा है जिसमें संभावित सैन्य कार्रवाई भी एक विकल्प है। यह लीबिया में जारी हिंसा के जवाब में किया जा रहा है। हम लीबिया की जनता को स्पष्ट संदेश देते हैं कि इस अनचाही हिंसा के सामने हम उनके साथ खड़े होंगे। हम लोकतांत्रिक आदर्शों के जवाब में दमनचक्र देख रहे हैं। उधर लीबिया को नो फ्लाई   ज़ोन बनाने की बात भी  अमेरिका ने  शुरु की थी परंतु बाद में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के ऊपर यह निर्णय छोड़ दिया।

गौरतलब है गद्दाफी की सेना विद्रोहियों पर हवाई हमला भी कर रही है. विद्रोहियों व सैनिकों के बीच के इस टकराव में अब तक एक हज़ार से अधिक लोगों के मारे जाने का भी समाचार है। ऐसे में यदि लीबिया को उड़ान निषिध क्षेत्र घोषित कर दिया जाता है फिर किसी भी विमान को लीबियाई आकाश पर उडऩे की इजाज़त नहीं होगी। कोई विमान लीबिया पर उड़ता नज़र आया तो अंतर्राष्ट्रीय सेना उस जहाज़ के विरुद्ध कोई भी कार्रवाई कर सकती है।

लीबिया में नॉटो की दखलअंदाज़ी के विषय में भी फैसला सुरक्षा परिषद् को ही लेना है। सवाल यह है कि लीबिया को लेकर अमेरिका की नीति कितनी स्पष्ट व पारदर्शी है। यदि अमेरिका लोकतंत्र स्थापित करने तथा विद्रोहियों द्वारा राजनैतिक सुधार लागू करने का हिमायती है तो अमेरिका के मधुर संबंध और भी तमाम ऐसे देशों से हैं जहां या तो राजशाही है या तानाशाही है। कई देश अमेरिका के मित्र हैं जहां लीबिया से कहीं अधिक भूख, बेरोज़गारी, मंहगाई व भ्रष्टाचार है।

ऐसे में अमेरिका द्वारा गद्दाफी का हटाने की जि़द क्यों?क्या सिर्फ इसलिए कि कर्नल गद्दाफी अमेरिका की कठपुतली बनकर नहीं रहते?या वास्तव में अमेरिका लीबिया के विद्रोहियों के प्रति हमदर्दी का भाव रखता है?इस मुद्दे पर स्वयं गद्दाफी का यह कहना कि पश्चिमी देशों तथा कई यूरोपीय देशों की नज़रों में लीबिया के तेल भंडार खटक रहे हैं। और इसी जन विद्रोह के बहाने यह देश लीबिया में प्रवेश करना चाह रहे हैं।
गद्दाफी की इस बात को सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि 1990 से 2003 में इराक में प्रवेश करने तक अरब व मध्य-पूर्व क्षेत्र को लेकर अमेरिकी नीति को दुनिया बहुत गौर से देख रही है। इराक पर हमले के बाद तो पूरी दुनिया में अमेरिका को इसी नज़र से देखा जाने लगा है कि उसकी गिद्ध दृष्टि प्राय: तेल के भंडारों पर ही रहती है। ऐसे में गद्दाफी द्वारा अमेरिका को संदेह की नज़रों से देखना भी बिल्कुल गलत नहीं आंका जा सकता।

दूसरी तरफ समय बीतने के साथ-साथ लीबिया में गद्दाफी समर्थक सैनिकों तथा विद्रोहियों के बीच लगातार उतार-चढ़ाव तथा एक-दूसरे पर बढ़त लेने की भी खबरें प्राप्त हो रही हैं । ऐसा नहीं है कि लीबिया की शत-प्रतिशत जनता ही गद्दाफी के विरुद्ध हो। तमाम जगहों पर भारी तादाद में आम जनता भी गद्दाफी समर्थक सेना का साथ दे रही है। कई जगहों पर सेना, विद्रोहियों के कब्ज़े से कई कस्बों व शहरों को छुड़ा चुकी है। ज़ाबिया तथा रास लानुफ जैसे प्रमुख तेल उत्पादक शहर जिन पर कि पहले विद्रोहियों का कब्ज़ा था अब पुन:गद्दाफी समर्थकों व सेना के कब्ज़े में वापस आ गये हैं।

इससे यह साफ लगने लगा है कि गद्दाफी को सत्ता से हटाना उतना आसान नहीं है जितना कि दुनिया समझ रही है। परंतु साथ-साथ ऐसा भी महसूस किया जा रहा है कि शायद गद्दाफी को सत्ता मुक्त करने की जितनी जल्दी विद्रोही संगठन अर्थात् नेशनल लीबियन कौंसिल को है उससे भी कहीं ज्य़ादा जल्दी में फ्रांस जैसे देश दिखाई दे रहे हैं। संभवत:यही वजह है कि फ्रांस दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने कि एनएलसी अर्थात् नेशनल लीबियन कौंसिल को यह मान्यता दे दी है कि एनएलसी ही लीबिया वासियों का वैध प्रतिनिधित्व कर रही है।

 यह फैसला गत् दिनों फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोज़ी तथा एन एल सी के प्रतिनिधि मंडल के मध्य हुई एक बैठक में लिया गया। हालांकि यूरोपीय संघ सरकोज़ी की इस जल्दबाज़ी के पक्ष में नहीं है। यूरोपीय संघ का मानना है कि अभी लीबिया पर नज़रें रखने की ज़रूरत है तथा यह देखना ज़रूरी है कि विद्रोही कौन हैं, क्या चाहते हैं और यह वास्तव में सच्चे लीबियाई प्रतिनिधि हैं भी या नहीं। यूरोपियन यूनियन इस बात की भी पक्षधर है कि लीबिया के विषय पर अरब लीग के साथ मिलजुल कर काम किया जाए तथा उसकी सहमति से ही कोई निर्णय लिया जाए।

उपरोक्त सभी परिस्थितियों के मध्य लीबिया के ताज़ातरीन हालात यही हैं कि वहां गृह युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। इन्हीं हालात के परिणामस्वरूप तीन लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ 6लाख विस्थापितों हेतु सोलह करोड़ बीस लाख डॉलर जुटाने की अपील भी कर चुका है। इन सब के बावजूद लीबिया पर लगभग 42वर्षों तक सत्ता पर काबिज़ रहने वाले कर्नल गद्दाफी की पकड़ देश पर अभी भी उतनी कमज़ोर नहीं हुई है जितना कि गद्दाफी विरोधी शासक या देश उम्मीद कर रहे हैं।

वैसे भी राष्ट्रपति ओबामा चाहे लीबिया में नॉटो कार्रवाई के पक्षधर हों या वहां नो फ्लाई  ज़ोन बनाने के। परंतु राष्ट्रपति ओबामा के प्रमुख ख़ुफ़िया  सलाहकार जनरल जेम्स क्लेपर का आखिरकार  यही मानना है कि लीबिया में विद्रोहियों की जीत बहुत मुश्किल है। क्लेपर मानते हैं कि आखिरकार  जीत गद्दाफी की ही होगी। क्योंकि उनके सैनिक ज़्यादा अच्छी तरह से प्रशिक्षित हैं और उनके पास बेहतर हथियार भी हैं। साथ ही साथ न केवल गद्दाफी समर्थकों बल्कि गद्दाफी विरोधियों के मन में भी कहीं न कहीं यह बात समाई हुई है कि कहीं ऐसा न हो कि गद्दाफी को अपदस्थ करने के बहाने तथा विद्रोहियों को समर्थन देने की आड़ में अमेरिकी सेना लीबिया में प्रवेश कर जाए।

ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने से पूर्व ईरान भी अमेरिका को चेतावनी भरे लहज़े में अपना संदेश दे चुका है। कुल मिलाकर यही हालात कर्नल गद्दाफी को उर्जा प्रदान कर रहे हैं ऐसे में आसान नहीं है कर्नल गद्दाफी की बिदाई।




लेखक  हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय  मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.




बंदियों के परिजनों की जेल में पिटाई


जनज्वार. बरेली जेल में बंद आतंकवाद के आरोपियों से मिलने गए परिजनों को पुलिस द्वारा पिटे जाने का विरोध शुरू हो  गया है.सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय ने जारी विज्ञप्ति में इस घटना की निंदा की है और दोषी पुलिकर्मियों पर करवाई की मांग की है. वहीं  मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने पुरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए दोषी जेल और पुलिस अधिकारियों को तत्काल निलंबित करने की भी मांग की है।

पीयूसीएल के प्रदेश  संगठन सचिव राजीव यादव और शहनवाज आलम ने जारी विज्ञप्ति मे घटना के पीछे गहरी साजिश का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चुंकि पुलिस रामपुर सीआरपएफ कैम्प पर हुए कथित आतंकी हमले में गिरतार लोंगों के खिलाफ कोई  सुबूत कोर्ट में पेश नही कर पाई है इसलिए उसने निराशा में आरोपियों के परिजनों की, जो उनसे जेल में मिलनें आये थे, आधे घंटे तक बर्बर पिटाई की। जेल में हुई इस आपराधिक घटना के दौरान बच्चों सहित कई महिलाओं को चोट आई है. 

मानवाधिकार नेताओं का आरोप है कि पुलिस आरोपियो के परिजनों को मारपीट कर उनके  मनोबल को तोड़ना चाहती है ताकि वे ठीक से पैरवी ना कर सकें। वहीं,साम्प्रदायिकता के खिलाफ काम करने वाले संगठन डिबेट सोसायटी ने भी इस पुलिसिया कार्यवाही की आलोचना की है। संगठन के नेता रवि षेखर और एकता सिहं नें सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि रामपुर सी0आर0पी0एफ0 कैम्प की घटना की सत्यता  पर शुरू से ही सवाल उठते रहें हैं।

 यहाँ तक कि प्रदेश की कचहरियों में हुए धमाकों पर जब तत्कालीन केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश  जायसवाल नें सीबीआई जांच की मांग की थी तब प्रदेश  की मुख्यमंत्री ने उन्हें पहले रामपुर की घटना की सीबीआई जांच कराने की चुनौती दी थी। इसके बाद जांच का मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

Mar 13, 2011

जनता की फिक्र करे मीडिया

 
मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है.ऐसी स्थिति में जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए...


शनिवार की ढलती गुनगुनी दोपहर के बाद दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम का माहौल तल्ख था. देश के दिग्गज पत्रकारों ने मीडिया की वर्तमान भूमिका को जायज भी ठहराया तो उसकी खामियों को इंगित करते हुए आत्ममंथन की जरूरत भी बतायी.मौका था प्लानमैन मीडिया समूह की समाचार पत्रिका द संडे इंडियन और टाइम्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित “जनवाणी से जनता की वाणी” विषयक सेमिनार का.

दरअसल ठीक 25साल पहले सरकार नियंत्रित भारतीय दूरदर्शन पर शुरु हुआ था एक कार्यक्रम जनवाणी,जिसके माध्यम से पहली बार भारत में दर्शकों के राजनीतिज्ञों से सीधे सवाल पूछने का मौका मिला. उसके बाद सरकार की ओपन स्काई पॉलिसी आयी और शुरु हुआ निजी समाचार चैनलों का आगमन. और आज 25 साल बाद भारतीय आकाश में 600 से ज्यादा चैनल हैं, जो हर रोज सवाल पूछ रहें हैं. तो क्या 25 सालों में जनवाणी से शुरु हुए इस सफर में आज के चैनल जनता की वाणी बन गये हैं. या कहीं वे उच्छृंखल तो नहीं हो गये. ऐसे ही मौजूं सवालों पर आयोजित था यह विशेष राष्ट्रीय सेमिनार. जिसका उद्घाटन वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने किया.


बाएं से द संडे इंडियन के संपादक अरिंदम  चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला और
दीप प्रज्वलित करते  आज समाज के समूह संपादक राहुल देव

खचाखच भरे कमानी सभागार में आयोजित इस ऐतिहासिक सेमिनार का विषय प्रवर्तन  करते हुए द संडे इंडियन के प्रधान संपादक व मैनेजमेंट गुरु प्रो. अरिंदम चौधरी ने सवाल उठाया कि क्या वास्तव में आज की मीडिया जनता की आवाज है?उन्होंने कहा कि 25साल पहले देश में निजी समाचार चैनल नहीं थे, उस समय पहली बार दूरदर्शन पर “जनवाणी” कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें केंद्रीय मंत्री जनता के सवालों से रूबरू होते थे.

आज सैकड़ों की तादाद में समाचार चैनल और अखबार हैं,क्या वास्तव में हम जनता की आवाज उठाते हैं. श्री चौधरी ने कहा कि यह आत्ममंथन की घड़ी है, और जब हम अपने भीतर झांकते हैं तो पाते हैं कि वास्तव में हम अपनी दिशा भूल गये हैं. “जनवाणी” भले ही सरकार द्वारा आयोजित अपने प्रचार का माध्यम रहा, लेकिन उसने भारतीय मीडिया को एक नयी अवधारणा दी. उन्होंने कहा कि अब हमें अपनी दिशा तय करनी होगी और देश के आम लोगों की फिक्र करनी होगी,मीडिया में जनसरोकार वाले मुददों को प्रमुखता देनी होगी वरना हम यूं ही हाय-तौबा मचाते रहेंगे और अपने दायित्वों से मुंह छुपाते रहेंगे.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय निदेशक प्रभु चावला ने कहा कि आज हम जनता की आवाज नहीं उठाते, ये सही है. हम अपनी दिशा भूल गये हैं, यह भी सही है लेकिन मीडिया ही है, जिसने देश को,देश के लोकतंत्र को बचा कर रखा है.हमें अपनी खामियों को दुरुस्त करना होगा.बाजार के ताकतवर होने से हमारी नैतिकता कमजोर हुई है.

हमें अपनी साख को बरकरार रखते हुए जनोन्मुख होना होगा. “जनवाणी” की नियत अच्छी नहीं थी, लेकिन प्रयास बेहतर था. लेकिन हमें अच्छी नीयत के साथ अच्छे प्रयास करने होंगे.उन्होंने कहा कि यह सेमिनार इस मामले में सभी सेमिनारों से इतर है कि यहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया के सभी दिग्गज मौजूद हैं,ऐसी उपस्थिति तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आयोजित संपादकों की बैठक में भी नहीं थी.

सेमिनार की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने की.सेमिनार में दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई,आज समाज के समूह संपादक राहुल देव,अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय,आईबीएन 7के प्रबंध संपादक आशुतोष,दूरदर्शन के पूर्व डीडीजी एमपी लेले,टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन चंद्र पांडे,जी न्यूज के प्रसिद्ध एंकर व वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी,साधना न्यूज चैनल के प्रमुख व ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसियेशन के महासचिव एन के सिंह,इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली,एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल,न्यूज एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार,वरिष्ठ लेखक व चैनल पी 7के प्रोग्रामिंग हेड शरद दत्त,दूरदर्शन के पूर्व चीफ प्रोड्यूसर कुबेर दत्त और लेखिका व मीडिया समीक्षक वर्तिका नंदा भी मौजूद थीं.


पत्रकार और कवि लीलाधर मंडलोई : जनवाणी के पचीस वर्ष पुरे 

अतिथियों का स्वागत करते हुए प्लानमैन मीडिया के प्रबंध संपादक सुतनु गुरु ने कहा कि मीडिया जनता के लिए होती है और वह जनता प्रति जवाबदेह है और वह अपनी जवाबदेही से नहीं मुकर  सकती. वरिष्ठ   पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत में मीडिया अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है. अब इसके साख को बचाने का समय है. किसी लोकतंत्र में मीडिया इतनी मजबूर नहीं होनी चाहिए कि वह बाजार के सामने घुटने टेक दे.इस प्रवृति से बाहर आने की दिशा में कदम उठाने का समय है.

आईबीएन 7 के प्रबंध संपादक आशुतोष ने कहा कि हिंदुस्तान बदल रहा है, इस बदलाव के दौर में मीडिया भी बदल रही है लेकिन यह बदलाव सकारात्मक है.इस पर आंसू बहाने की जरुरत नहीं है. ये बात सच है कि 2004-05 और 2009 में मीडिया के कृत्यों से इसके साख पर बट्टा जरूर लगा. लेकिन इसने फिर खुद को संभाल लिया.दुनिया के जिस कोने में मीडिया स्वतंत्र है वहां मिस्र जैसे हालात पैदा नहीं हो सकते.  मीडिया ही है जिसने भारतीय समाज के मनोबल को ऊंचा रखा है.

आज समाज के समूह संपादक राहुल देव ने कहा कि मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है.ऐसी स्थिति में इससे ज्यादा उम्मीद की कल्पना कैसे की जा सकती है. सबसे पहली जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए, हालांकि यह दुरुह कार्य है. लेकिन उम्मीदें बाकी हैं.

अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय ने कहा कि भारतीय मीडिया अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करती, संतुलित है, लेकिन यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या नहीं, इस पर नये सिरे से मंथन करना होगा. मीडिया की जनपक्षधरता पर हमेशा से सवाल उठाये जाते रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है लेकिन यह भी सही है कि इन सारी चुनौतियों के बीच मीडिया जनता की आवाज को एक मंच जरुर देती है.

वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि आज मीडिया नफा-नुकसान के गणित को ध्यान में रख कर अपनी दिशा तय कर रही है.इसके लिए मीडिया को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता,पूरी व्यवस्था ही जिम्मेदार है. नैतिकता कहने की चीज हो गई है अपनाने की नहीं. वास्तव में वैकल्पिक बहस ही बंद हो गई है.

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज के चैनल हेड एन के सिंह ने कहा कि जहां ज्यादा पैसा है वहीं टैम मीटर लगे हैं और वही समाचार चैनलों की दिशा तय करते हैं. जब तक टीआरपी के झमेले से चैनल मुक्त नहीं होंगे.जनपक्षधरता हाशिये पर रहेगी. उन्होंने कहा कि जहां तक कंटेंट का सवाल है, तो दो वर्षों में भारतीय मीडिया के कंटेंट का स्तर काफी बेहतर होगा, इसका विश्वास दिलाता हूं.

इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली ने कहा कि देश मीडिया पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है. देश की जनता जागरूक है.एनडीए की फील गुड और शाइनिंग इंडिया को नकार कर अयोध्या मामले के फैसले के दिन देश में अमन रख कर जनता ने अपने जागरुक होने का सबूत दे दिया है.इस उपलब्धि में मीडिया का कोई रोल नहीं था.अब समय आ गया है कि मीडिया अपने साख और दायित्व तय करे.

एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल ने कहा कि अब खबरिया चैनलों को अपने कंटेंट पर ध्यान देना होगा,नहीं तो देश की जनता उन्हें नकार देगी और इसके साथ ही वे अपनी साख बरकरार नहीं रख पाएंगे.बाजार के दबाव और अपनी नैतिकता के बीच का कोई रास्ता निकालना होगा.

वरिष्ठ पत्रकार जफर आगा ने कहा कि वर्तमान दौर में टीआरपी ने समाचार चैनलों की दिशा तय कर दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता अब बेमतलब की चीज हो गई है.

मंच संचालन द संडे इंडियन हिंदी व भोजपुरी संस्करण के कार्यकारी संपादक तथा ब्रॉडकास्टर्स क्लब ऑफ इंडिया के कार्यकारी अध्यक्ष ओंकारेश्वर पांडेय ने किया.सेमिनार के समापन से पहले प्रो. अरिंदम चौधरी ने पूरी चर्चा का सार संक्षेप रखा और इस ऐतिहासिक आयोजन में सहभागी बनने के लिए टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन पांडेय तथा सेमिनार में आये मीडिया के दिग्गजों का आभार व्यक्त किया. आखिर में प्रो. अरिंदम चौधरी और श्री पूरन पांडेय ने सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर उन्हें सम्मानित किया.





पिकनिक पार्टी नहीं है महिला दिवस


महिला दिवस पर सौंदर्य प्रसाधन और तरह-तरह के वस्त्राभूषण बनाने वाली कंपनियाँ फैशन शो आयोजित करती हैं।  लेकिन ये समझना जरूरी है कि महिला दिवस सिर्फ औरतों के पहनने-ओढ़ने या सिर्फ पिकनिक-पार्टी का ही दिन नहीं है...


महिला दिवस के कार्यक्रमों की श्रृंखला में भारतीय महिला फेडरेशन और घरेलू कामकाजी महिला संगठन की इंदौर इकाई ने 11 मार्च 2011 को ‘कामकाजी महिलाओं के संघर्ष और उनकी ताकत’ विषय पर व्याख्यान,  नाटक और महिलाओं की रैली का आयोजन किया गया। अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता ने कहा कि एक तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लगातार टालती जा रही है तो   दूसरी तरफ अनाज को विशाल कंपनियों के चंगुल में फँसाना चाहती है, जिनका मुख्य मकसद गरीब जनता का पेट भरना नहीं बल्कि मुनाफा कमाना है।

जया मेहता ने जोर देते हुए कहा कि देश के लोगों की आधी आबादी को भरपेट अनाज  नसीब नहीं होता। देश की 45प्रतिशत महिलाएँ रक्ताल्पता यानी एनीमिया से पीड़ित हैं। कमजोर माएं  कमजोर बच्चों को जन्म देती हैं। नतीजा ये है कि हमारे देश में कुपोषित बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। इन कमजोर बच्चों का मस्तिष्क भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। जिन्हे भरपेट खाना तक नहीं मिल पाता, वे भला अमीर और मध्यम वर्ग के बच्चों के साथ किस तरह तरक्की की दौड़शामिल हो सकते हैं।

शहीद भवन पर आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए घरेलू कामकाजी महिला संगठन की ओर से सिस्टर रोसेली ने कहा कि महिलाओं को भी ये समझना चाहिए कि उनकी समस्याओं का हल धार्मिक जुलूसों में शामिल होने से नहीं निकलेगा। उन्हें संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। हमें उन्हें जोड़ने के और मजबूत उपाय करने चाहिए।

आँगनवाड़ी यूनियन की अनीता  ने कहा कि 21 बरस से लड़ते-लड़ते उन्होंने रु. 275 मासिक से 1500 और अब 3000 का वेतन हासिल हुआ है। ये लड़ाई जारी रखनी होगी नहीं  तो सरकार कुछ नहीं देने वाली। सभा को निर्मला देवरे और मनीषा वोह ने भी संबोधित करते हुए कहा कि हम मजदूर औरतों को एक-दूसरे की मदद के लिए साथ आना चाहिए.



कार्यक्रम की एक अन्य वक्ता  कल्पना मेहताने‘स्वास्थ्य की राजनीति का शिकार बनतीं महिलाएँ’ विषय पर बात रखी .कल्पना ने बताया कि  अमेरिका व अन्य विकसित देश भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों की महिलाओं पर तरह-तरह के गर्भ-निरोधक आजमाते हैं और अशिक्षित व जागरूकताहीन जनता की जिंदगी के साथ नेता,अफसर और कंपनियाँ खिलवाड़ करती हैं।

भारतीय महिला फेडरेशन की सचिव सारिका श्रीवास्तव ने गतिविधियों का ब्यौरा देते हुए पिछले वर्ष  दिवंगत हुए कॉमरेड अनंत लागू और कॉमरेड राजेन्द्र केशरी को सभा की ओर से श्रृद्धांजलि दी। सभा का संचालन पंखुड़ी मिश्रा ने किया।

सभा के अंत में महिला मजदूरों के संघर्षों पर आधारित एक नाटक की प्रस्तुति हुई जिसमें गारमेंट फैक्टरी में काम करने वालीं, बीड़ी बनाने वालीं, भवन निर्माण मजदूरी करने वालीं और जमीन से बेदखली की परेशानियों से लड़ने वाली आम मेहनतकश महिलाओं के जीवट और जोश की कहानियाँ थीं। नाटक का शीर्षक था ‘जब हम चिड़िया की बात करते हैं’। नाटक में पंखुड़ी, रुचिता, सारिका, नेहा, शबाना, रवि और आशीष ने अभिनय किया।




Mar 12, 2011

दोनों निर्दोष आज भी जेल में


गाँव वाले अगले दिन दोनों को चारपाई पर डाल कर सरपंच को साथ में लेकर दंतेवाडा पहुँच गए .हमने पत्रकारों को बुलाया और कहा कि  भाई इनकी भी सुन लो...


हिमांशु कुमार

विनायक तो सरकारी नज़रों में इसलिए नक्सली हो गए क्योंकि उन्होंने 'माओवादी के पत्र किसी को ले जाकर दिए'.  परन्तु सरकार ने एक बार अपना अपराध छिपाने की कोशिश के तहत मुझे भी नक्सलियों का इलाज कराने का इल्ज़ाम लगा कर फंसाने की कोशिश की थी. ऐसी ही एक मज़ेदार घटना बताता हूँ.

एक अख़बार में छपा कि  'बैलाडीला स्थित एस्सार के पाइप लाइन प्लांट के पास पुलिस ने दो नक्सलियों को एक एन्काउन्टर में मार गिराया है.'  परन्तु आस पास के ग्रामीणों का कहना था की पुलिस गप्प मार रही है. नंदनी सुन्दर भी दंतेवाडा आयी हुई थीं !हम दोनों ने घटना की सच्चाई जानने का फैसला किया . और पूछते हुए उनके गाँव पहुंचे . गाँव वालों ने बताया की असली कहानी यह है की खेती का मौसम हो रहा है और इस समय सभी आदिवासी अपने पशुओं को हल चलाने के लिए ढूँढते हैं.
किरंदुल थाने के बाहर इंतजार में परिजन
चार गाँव वाले अपने जानवर ढूंढ कर वापस लौट रहे थे. फ़ोर्स गश्त पर थी पुलिस ने अँधेरे में इन लोगों को देख कर गोली चला दी. दो लोग वही म़र गए. बाकी के दो लोगों में से एक की जांघ में और दूसरे की बाजू में गोली लगी .पुलिस ने फटाफट बयान दे दिया की उसने दो नक्सलियों को मार गिराया है.  बाकी बचे दोनों घायलों को पुलिस ने चुपचाप किरंदुल के सरकारी अस्पताल ले जाकर फर्स्ट ऐड करा कर घर भगा दिया.  

मैंने और नंदिनी ने ग्रामीणों के इस बयान की तस्दीक करने का फैसला किया और बताया की हम दोनों घायलों से मिलना चाहते हैं .गाँव वाले हमें उनके घर ले गए .गाँव वालों का विवरण बिलकुल सच था सच्चाई हमारे सामने पडी कराह रही थी. दोनों आदिवासियों के घावों से मवाद बह रहा था .

दोनों के पास किरंदुल के सरकारी अस्पताल में इलाज होने के सबूत के तौर पर वहां का परचा भी मौजूद था! हमने दोनों की ओर से दो पत्र बनाये. घटना का विवरण देते हुए जाँच की मांग करते हुए एक एसपी के नाम और दूसरा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नाम पर .शाम होने लगी थी हमने गाँव वालों से दोनों घायलों को अगले दिन दंतेवाडा लाने का आग्रह किया . गाँव वाले अगले दिन दोनों को चारपाई पर डाल कर सरपंच को साथ में लेकर दंतेवाडा पहुँच गए .हमने पत्रकारों को बुलाया और कहा कि  भाई इनकी भी सुन लो. अखबारों ने दोनों घायलों का बोला हुआ भी छाप दिया.

अब पुलिस घबराई . ये घायल आदिवासी हमारे आश्रम में सपरिवार रह रहे थे और हमारे कार्यकर्ता इनको रोज़ अस्पताल ले जाकर मरहम पट्टी करा कर वापिस आश्रम ले आते थे. एक दिन मैं कहीं से लौटा तो आश्रम में सारे कार्यकर्ता एक जगह खड़े होकर कुछ चर्चा कर रहे थे . पता चला थोड़ी देर पहले आदिवासियों की तरह लूंगी पहन कर एक आदमी आश्रम में आया था और दोनों घायल आदिवासी कहाँ हैं पूछ रहा था और कह रहा कि मैं इनका भाई हूँ और इन्हें घर ले जाने आया हूँ .
नंदिनी सुन्दर

परन्तु उनमें से एक की पत्नी वहीं थी उसने गोंडी भाषा में  बताया की ये तो थाने का पुलिस वाला साहब है,हमारा भाई नहीं है. कार्यकर्ताओं ने उससे कहा की अभी हिमांशु जी नहीं हैं आप थोड़ी देर में आना. और एक कार्यकर्ता उसके पीछे गया तो सचमुच थोड़ी दूर पर हथियारबंद लोगों से भरी पुलिस की एक जीप जंगल में छिप कर खड़ी की गयी थी . इसके बाद हमारे एक पत्रकार मित्र ने कहा की वो इन दोनों को वो बिलासपुर हाईकोर्ट तक ले जायेंगे और इनके विषय में एक रिट दायर करेंगे .

मैं तैयार हो गया दोनों आदिवासियों को उन्हें साथ ले जाने दिया . वो रायपुर गए वहां एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता ने उनसे कहा की इस मामले को वो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने ले जायेंगे और कोर्ट में ले जाने से न्याय मिलने में बहुत समय लग जायेगा .और वो पत्रकार बंधू उन्हें वहीं से वापिस ले आये और सीधे उन्हें उन के गाँव पहुंचा दिया .पुलिस तो सूंघ ही रही थी . उसने दोनों को पूछताछ के बहाने थाने बुलाया और फरार नक्सलियों का फर्जी केस बना कर दोनों को जेल में डाल दिया. दोनों निर्दोष आदिवासी आज भी जेल में हैं.

मेरा आश्रम टूटने के बाद दंतेवाडा के एस पी मुझसे बोले की हिमांशु जी आपका आश्रम तो हमने इसलिए तोडा की आप वहाँ फरार नक्सलियों को रख कर इलाज कराते थे.मैंने कहा आप मुझ पर केस करिए मैं अदालत में किरंदुल अस्पताल की पर्चियां पेश करूंगा,जिसमें आपने उन्हें फर्स्ट ऐड करा कर घर जाने दिया था.

क्या पुलिस नक्सलियों का फर्स्ट ऐड भी कराती है? और फिर उन्हें आराम से घर भी जाने देती है ? एस पी साहब चुप हो गए . और इस मामले में भी हम बाकी सारे मामलों की तरह उन दोनों निर्दोषों को कोई न्याय नहीं दिलवा पाए. अलबत्ता हमने उन बेचारे आदिवासियों की मुसीबतें और भी ज्यादा बढ़ा दीं थी.

 


दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.





Mar 11, 2011

पूंजीवादी गणतंत्र में वामपंथी विफलता



वामपंथियों को अपना सांगठनिक ढाँचा बदलना पडे़गा और उसे खुला और जनवादी बनाना पड़ेगा।  दूसरा भारत की बड़ी आबादी युवा है,उस युवा वर्ग को वामपंथ क्या ऑफर करता है, उसे देने के लिए क्या है...

 अनिल राजिमवाले

भारतीय सन्दर्भों में वामपंथ को समझना पडे़गा कि चूक कहाँ हुई है?उसने अवसरों का फायदा क्यों नहीं   उठाया? आजादी के बाद भारतीय राजनीति में वामपंथ का उभार एक शक्ति, एक विकल्प के रुप में हुआ जिसमें आगे चलकर ठहराव आ गया और अन्ततोगत्वा अब उसका जनाधार तुलनात्मक रूप से लगातार घट रहा है।

केरल में 1957 में कम्युनिस्ट दुनिया में पहली बार चुनकर सत्ता में आए यह वामपंथी आंदोलन के लिए नया अनुभव और भारतीय वामपंथ का दुनिया के कम्युनिस्ट इतिहास में बड़ा योगदान था।  पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार का चुना जाना और लम्बे समय तक शासन करना भी एक बड़ी उपलब्धि थी परन्तु भारतीय वामपंथ की यह उपलब्धियाँ देश की राजनीति में कोई विकल्प नहीं बन सकीं । हालाँकि  भूमि सुधार, कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने और साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने जैसे अच्छे काम भी किए।

दरअसल देश में वामपंथ को माडल बनाने के जो  मौके मिले जिसका कम्युनिस्ट फायदा नहीं उठा पाए। उन्हें समझना चाहिए था कि पूँजीवादी संविधान के दायरे में रहते हुए वे क्या बेहतर कर सकते थे, जिससे वामपंथ को देश की राजनीति में एक विकल्प के तौर पर उभरने का मौका मिल पाता। इसके अलावा हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारतीय संविधान की बहुत सारी बातें वाम जनवादी संघर्षों  का ही नतीजा हैं।

मसलन भारतीय संविधान और गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी स्वरूप जिसे आज दक्षिणपंथी शक्तियाँ और पूँजीवाद लाख कोशिशों के बाद भी बदलवाने में सक्षम नहीं हो सके हैं। इसी संविधान के दायरे में रहते हुए वामपंथ जहाँ वह सत्ता में है,विकास का एक नया एवं वैकल्पिक मॉडल   तैयार कर सकता था। उसके पास शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं  का एक सार्वजनिक तंत्र विकसित करने का अवसर हमेशा था जिसका वामपंथ ने लाभ नहीं उठाया। वे सत्ताधारी राज्यों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का एक बेहतरीन मॉडल  बनाकर पेश कर सकते थे। सार्वजनिक क्षेत्र की यातायात व्यवस्था का विकास किया जाना चाहिए था.

वामपंथी लैटिन अमरीकी माडल

लैटिन अमरीका के वामपंथ की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। उन्होंने पार्टी, सरकार और जनवाद से जुड़ी हुई कुछ स्थापित परम्पराओं और अवधारणाओं को छोड़ा है। लैटिन अमरीका में एक तरह से वामपंथ का नवीनीकरण हुआ है, विशेषतया चुनावों के संदर्भ में उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की है। कई वामपंथी नेता बार-बार चुनकर आ रहे हैं और उस पर कमाल यह कि लैटिन अमरीकी देशों की सेनाएँ भी उनका साथ दे रही हैं। इस वामपंथ की एक और विशेषता है कि इन बदलावों में युवा और महिलाओं की खास भागीदारी है।

पूरे लैटिन अमरीका के वामपंथी बदलाव में एक समान कारक भी हैं कि ये आंदोलन मूल रुप से साम्राज्यवाद विरोधी हैं। लैटिन अमरीकी घटनाएँ पूंजीवाद की भीतरी संभावनाओं का कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है,उसका नायाब उदाहरण हैं। ये वामपंथी आंदोलन पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने का नारा नहीं दे रहे हैं,केवल साम्राज्यवाद विरोध का नारा दे रहे हैं और यहाँ वामपंथ समाज का स्वाभाविक हिस्सा बनकर उभरा है.

दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ

दुनिया में वामपंथ के इन दो रूपों के अलावा वामपंथ का तीसरा प्रयोग दक्षिण अफ्रीका है। इस दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ की जडे़ं उसकी आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में हैं। दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ के अभिन्न अंग कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह कभी भी दक्षिणी अफ्रीकी राष्ट्रीय आंदोलन से अलग नहीं हुई.

राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी के प्रमुख हिस्से के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का हिस्सा रही है। सरकार संचालन और देश के विकास की नीतियों को प्रभावित करने के बाद भी कम्युनिस्ट पार्टी दक्षिण अफ्रीका के राजनैतिक जीवन का स्वाभाविक अंग बनी रही और उसने कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि कुछ भी असामान्य हो रहा है।


गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की यातायात व्यवस्था का अधिकांश हिस्सा निजी हाथों में है। आज दिल्ली की मेट्रो जो देशभर में चर्चा का विषय है. उसकी जगह उससे कहीं बहुत पहले बनी कलकत्ता की मेट्रो को अधिक विकसित करके देशभर के सामने एक उदाहरण  की तरह पेश किया जा सकता था। आज के बडे़-बड़े माल्स की जगह सुपर मार्केट्स का निर्माण किया जा सकता था जो पहले कईं जगह पर रहे भी हैं। वाम शासित राज्यों  खासतौर पर पश्चिमी बंगाल में बेहतर न्युनतम् वेतन देने और उसे ईमानदारी से लागू करवाने का विकल्प बनाकर देश के सामने एक प्रेरणाप्रद काम किया जा सकता था, जिसमें वामपंथ विफल रहा है।

असल में एक वामपंथी सरकार को एक मॉडल  की तरह होना चाहिए था। परन्तु अपनी कईं विशेषताओं के बावजूद पश्चिमी बंगाल दूसरे राज्यों से ज्यादा पिछड़ा राज्य बनकर रह गया। जिस कारण भ्रष्टाचार संस्थागत रूप धारण कर गया और एक विशेष सुविधा प्राप्त शासकीय वर्ग पैदा हो गया जिसने जनता को अन्ततोगत्वा अपना दुश्मन बना डाला। इससे यह भी सीख मिलती है कि एक सही वामपंथी मोर्चा और गलत वामपंथी मोर्चा चलाने में क्या फर्क होता है। वामपंथी मोर्चा केवल पार्टियों का नहीं आम तबको का, आम आदमी का मोर्चा होना चाहिए।

जब तक वामपंथ इस व्यवस्था की खूबियों और खामियों को नहीं समझेगा तब तक इस व्यवस्था को अपने पक्ष,अपने फायदे में प्रयोग करने में नाकाम रहेगा। इसी संसदीय व्यवस्था के तहत ही दक्षिणपंथी शक्तियों को कमजोर किया जा सकता है क्योंकि दक्षिणपंथ बुनियादी तौर पर लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संसदीय व्यवस्था के खिलाफ होता है। यही कारण है कि दक्षिणपंथ समय-समय पर लोकतंत्र व संसदीय व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष एवं जनवादी परम्पराओं और अवधारणाओ पर हमले करता है। 

 वामपंथ की जिम्मेदारी है कि वह संसदीय व्यवस्था की खूबियों का इस्तेमाल करे और दक्षिणपंथ को कमजोर करते हुए जनता के पक्ष में काम करने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग करे और उसकी कमियों को दूर करने के लिए संघर्ष भी करे। वामपंथी जब संसदीय व्यवस्था में शामिल होते हैं तो उनके लिए सारे संदर्भ बदल जाते हैं और इन्हीं नए संदर्भों में वामपक्ष को समझना पड़ेगा  कि उन्हें इस व्यवस्था में काम कैसे करना पडे़गा। 1957 में संसदीय राजनीति में आने के साथ ही सत्ता में आया वामपंथ अभी भी संसदीय जनतंत्र को समझने में पिछड़ रहा है।

गणतंत्र जनता का हथियार है और उसे जनता के अनुसार उसकी बेहतरी के लिए ही मास्टर करना पडे़गा क्योंकि जनता कोई काल्पनिक चीज नहीं है। इसके लिए वामपंथियों को अपना सांगठनिक ढाँचा भी बदलना पडे़गा और उसे खुला और जनवादी बनाना पडे़गा। कुछ भी छिपाकर आज के दौर में काम नहीं चलेगा. अब तो पूँजीवादी दल तक छिपा पाने में असमर्थ हैं। कुछ नेताओं और गुटों तक सांगठनिक सत्ता को नियन्त्रित एवं केंद्रित वाली कार्यप्रणाली को बदलना ही होगा। इसके अलावा भारत की बड़ी आबादी युवा है.अब सवाल यह है कि उस युवा वर्ग को वामपंथ क्या ऑफर करता है, उसे देने के लिए उसके पास क्या है। इन सवालों को हल किए बगैर वामपंथ आगे नहीं बढ़ सकता है।

इसके अलावा भ्रष्टाचार भी आज एक बड़ा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार चलाई जा सकती है। सी0अच्युतामेनन की सरकार ने 1969में यह करके दिखा दिया जिससे सीख ली जा सकती है। इसके अलावा जनहित में भी कईं काम अच्युतामेनन सरकार ने किए जिनसे सीख ली जा सकती है,जैसे पूर्ण भूमि सुधार,सबको शिक्षा की उपलब्धि और दलितों के लिए एक लाख आवास आदि।

(महेश राठी से बातचीत पर आधारित)  

 
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शिक्षा विभाग से संबद्ध और मार्क्सवादी बुद्धिजीवी. समय-समय पर मार्क्सवादी दर्शन को नए वैज्ञानिक विकास से जोड़कर विकसित करने की कोशिश.




बंद हो शादी के लिए पढाई


शिक्षा में आ रही बाधाओं के निराकरण के लिए जिला स्तर पर समिति का गठन हो और गांव में शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने के साथ ही तकनीकी शिक्षा से लड़कियों को जोड़ा जाये...

संजीव कुमार

पहले महिलाओं के लिए शिक्षा का उद्देश्य अच्छा वर पाने की संभावना और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए पढ़ाई करना ही था, जिसका रास्ता शादी के बाद रूक जाता था। लेकिन दशक भर से शिक्षा के प्रसार से गांव-देहात और शहरों के पिछडे -गरीब  परिवारों में स्कूल भेजने का चलन धीरे-धीरे बढ़ा है. दूसरा लोगों को भी लगने लगा है कि  महिलाओं के लिए शिक्षा का सशक्तिकरण ही समाज में बराबरी का असल तरीका है.


शिक्षित महिला : सशक्त समाज
 उन्हें घर में चौकाबर्तन और सिलाई, कढ़ाई, के कार्यों तक ही सीमित कर दिया जाता था। सन् 1946 में अविभाजित भारत के विश्वविद्यालयों में या उनके विभिन्न शाखाओं में 45000 स्त्रियां ही थी।उस समय की स्थिति के अनुसार विद्यार्थियों के प्रतिशत के हिसाब से 100पुरुष विद्यार्थियों के पीछे करीब 11 महिला विद्यार्थी ही शिक्षा ग्रहण कर रही थी। आठवें  दशक के अंत में शिक्षा ग्रहण करने वाली लड़कियों की संख्या आठ लाख तक पहुंच गयी।

देश की आजादी के बाद और पाकिस्तान के निर्माण के साथ ही यह अनुपात 11 से बढ़कर 29 तक पहुंचा। आज यहां देश में लड़कियां पारिवारिक व सामाजिक परम्पराओं को निभाती हुई कला, साहित्य, तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ रही है। वहीं महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बौद्धिक क्षेत्र. में कहीं भी पीछे नहीं है।

प्रशासनिक सेवा राजनीतिक क्षेत्र में तमाम ऐसे महिलाओं के व्यक्तित्व है जो महिला सशक्तिकरण के लिए मिसाल बने हुए हैं,लेकिन इन सब बढ़ोत्तरी के बाद भी संसार के सभी निरीक्षरों में भारत प्रमुख  है। इसमें महिलाएं सबसे अधिक है। महिला को साक्षर और शिक्षा के अभियान में अब तक जितना आगे आ जाने चाहिए था वह इतना आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

एसोसिएशन आफ इंडियन यूनिवर्सिटीज के आंकड़ों के अनुसार देश में 35 प्रतिशत महिलाएं जो कि 15 वर्ष से अधिक की है शिक्षा प्राप्त कर सकी है, जबकि दुनिया के अन्य देशों में यह आंकड़ा 85 और 90 प्रतिशत तक है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश में महिला निरीक्षरता आज भी अत्यधिक है। जबकि इनके मुकाबले केरल, हिमाचल, कर्नाटक, तमिलनाडू, गोवा में महिलाएं शिक्षा के सहारे आत्मनिर्भर बनी हुई है।

हाल ही में जनगणना अभियान 2011 द्वितीय चरण पूरा हुआ है। इस बार इस जनगणना के द्वारा देश भर के शैक्षिक सामाजिक और आर्थिक महिलओं से जुड़े हुए आंकड़े सामने आयेंगे। जनगणना 2001 के अनुसार महिला साक्षरता का राष्ट्रीय औसत 53.7 था। राष्ट्रीय स्तर पर जुटाये गये आंकड़ों के अनुसार नगरीय क्षेत्र में महिला साक्षरता दर जहां 72.9थी,वहीं ग्रामीण अंचलों में यह 46.1 प्रतिशत थी। यही स्थिति महिला कार्य सहभागिता दर के साथ ही लिंगानुपात में भी है।

महिला सशक्तिकरण के लिए सबसे पहले समाज में लिंग अनुपात में आ रहे असंतुलन को ठीक करना होगा। इसके लिए कन्या भ्रूण हत्या के विरूद्ध समाज की मानसिकता बदलनी होगी। क्योंकि बेटियां भी अपनी आंखों में लड़कों जैसे सपने रखती है और आत्मनिर्भर बनना चाहती है।

सरकारी स्तर पर महिलाओं के कल्याण के लिए संवैधानिक और नैतिक तरीकों से महिला सशक्तिकरण व उनके शिक्षा के सशक्तिकरण के लिए काम करने की अधिक आवश्यकता है। महिलाओं को शिक्षित करने के लिए उन्हें स्नातक स्तर तक अनिवार्य मुफ्त शिक्षा दी जाये। सामाजिक और पारिवारिक कारणों से शिक्षा में आ रही बाधाओं के निराकरण के लिए जिला स्तर पर समिति का गठन हो और गांव में शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने के साथ ही तकनीकी शिक्षा से लड़कियों को जोड़ा जाये।

लिंग समानता के साथ ही बालिकाओं के पोषण पर ध्यान दिया जाये। तभी समाज में महिला और बालिकाओं की शिक्षा में प्रगति होगी और महिला सशक्तिकरण का एक नया रूप देखने को मिलेगा।


(लेखक पत्रकार हैं, उनसे    goldygeeta@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.)