Sep 18, 2016

एक ब्रांडिंग मैटेरियल है 'माँ का आशीर्वाद'


प्रधानमंत्री मोदी के लिए माँ का आशीर्वाद भी एक ब्रांडिंग मैटेरियल है, इस बावत कल www.janjwar.com पर एक छोटी सी टिप्पणी छपी थी। उस छोटी सी टिप्पणी पर सैकड़ों बड़ी टिप्पणियां अबतक आ चुकी हैं।

उनमें से कइयों में गलियां हैं पर ज्यादातर लोगों ने इसे मोदी का प्रशंसनीय काम माना है और कहा है कि इससे नयी पीढ़ी को संस्कार मिलेगा और बुजुर्गों के प्रति उनके मन आदर बढ़ेगा।

गलियों का जवाब तो दे नहीं सकता पर संस्कारों और सम्मान को लेकर कुछ बातें आप हजारों लोगों से जरूर साझा करना चाहूंगा जिन्होंने जनज्वार पर छपी टिप्पणी पर गौर किया है।

* मोदी जी की ज़िन्दगी में कुल दो औपचारिक महिलाएं हैं, एक उनकी पत्नी और दूसरी उनकी मां।


  • पत्नी के प्रति उनके रवैये से दुनिया वाकिफ है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं। पर इतना जरूर कहना है कि आप सबों में से ज्यादातर की मां या दादी की वह उम्र होगी जो मोदी की पत्नी की है। क्या आपके पिता या दादा आपकी मां या दादी के साथ ऐसा व्यवहार करते तो आप उनके प्रति वही क़द्र रखते जो मोदी के प्रति आप रख पाए रहे हैं।


  • आप कहेंगे वह एक बड़ी जिम्मेदारी पर हैं। पर क्या बड़ी जिम्मेदारियां किसी को इस कदर गैर जिम्मेदार बना सकती हैं कि पत्नी , पति के साथ रहना चाहे, उसके भले के लिए दुआ करे और पति उसे परित्यक्तता की हालत में छोड़ दे। क्या दुनिया के दूसरे जिम्मेदार लोग भी ऐसा करते हैं।


  • मैं इस पहलू पर जिक्र नहीं करता पर नीचे के पोस्ट में आयी ज्यादातर टिप्पणियों में आप दोस्तों ने कहा है कि मोदी जी द्वारा माँ के पैर छूने की वायरल हुई तस्वीर नयी पीढ़ी को संस्कार देगी। ऐसे में मेरा सवाल यह कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ जो बर्ताव किया है वह देश की नयी पीढ़ी को कैसा संस्कार देगी। क्या इसे औरतों पर की जाने वाली हिंसा की श्रेणी में नहीं रखेंगे।
  •  मोदी जी की मां उनके जीवन की दूसरी औरत हैं। और अगर मोदी जी को अपनी माँ के प्रति इतना ही लगाव है तो वह दिल्ली में अपने साथ रखें। वे रोज आशीर्वाद लें। क्या समस्या है। एक नार्मल आदमी ऐसा ही तो करता है। हम सब करते हैं और कर रहे हैं। आप भी सक्षम होंगे और सुविधा होगी तो अपनी मां के साथ ही रहते होंगे।

आखिरी बात। गाली देना, धमकाना और कोसना ज्यादा आसान होता है बजाय की बात करने। अगर आप बात करने की कोशिश करेंगे तो हमें भी आपसे सीखने को मिलेगा।

Sep 17, 2016

देश का पहला आदमी जो मां के आशीर्वाद से पहले कैमरा खोजता है

सवा सौ करोड़ के भारत में सबके पास मां होगी पर शायद ही कोई आदमी होगा जो मां का आशीर्वाद लेने से पहले दरवाजे पर कैमरा लगवाता होगा। पर हमारे प्रधानमंत्री का जन्मदिन हो या मां से मिलने का कोई और मौका हमेशा वे  कैमरे के सामने ही मां से मिलते हैं और मां का पैर छूते हुए तस्वीर जरूर जारी करते हैं।

मां से मिलने के बाद बाद वह बकायदा खुद ही फोटो प्रसारित करते हैं। मानो की देश के दूसरे लोगों से कुछ अलग अंदाज में वह मां का पैर छूते हों या फिर कोई दूसरा पैर छूता ही न हो और वह इतिहास में पहली बार पैर छू रहे हों।  आज भी प्रधानमंत्री ने अपने जन्मदिन पर वही किया।

मां को कितनी असहजता महसूस होती होगी। मोदी जी की मां की दृष्टि से देखा जाए तो वह हर मां की तरह अपने बेटे से सहज और स्वाभाविक तरीके से मिलना चाहती होंगी। पर यहां तो मां का आशीर्वाद लेने से पहले कैमरा टीम को बकायदा इत्तला किया जाता होगा कि कैसे क्या करना है। संभव है यह भी हिदायत दी जाती हो कि इस तस्वीर को प्रधानमंत्री के अलावा कोई जारी नहीं करेगा।

तभी तो हर मौके पर खुद ही जारी करते हैं। अन्यथा जब वह मां से मिलते होंगे तो परिवार के कई सदस्य मौजूद रहते होंगे और वह भी फोटो अपनी वाल पर लगा या ट्विट कर सकता है। पर ऐसा होता कभी दिखता नहीं। हर बार मोदी जी मां से मिलने की एक्सक्लूसिव तस्वीर खुद के हाथों से ही जारी करते हैं। मानो मां से मिलना भी कोई राजनीतिक काम



आतंक के कुख्यात आरोपी के साथ अपने प्रधानमंत्री

जब तस्वीरों की राजनीति शुरू हो ही गयी है और उसी से तय होने लगा है कि कौन गलत है और कौन सही फिर इस बहस को मुकाम मिलना ही चाहिए। उसी मुकाम की ओर बढ़ते हुए जनज्वार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस तस्वीर को खोज लाया है जो आज के दिन बेहद प्रासंगिक है।

समझौता एक्सप्रेस, हैदाराबाद ब्लॉस्ट, मालेगांव व अजमेर दरगाह बम धमाकों के मुख्य आरोपी असीमानंद को कल एनआइए की विशेष अदालत ने जमानत दे दी है। ऐसे ही कुख्यात आतंकवादी के साथ प्रधानमंत्री मोदी की एक पुरानी तस्वीर है जिससे पता चलता है कि वह राजनीतिक जीवन में एक—दूसरे को जानते रहे होंगे। हालांकि असीमानंद की गिरफ्तारी के बाद आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी मनमोहन वैद्य ने प्रेस विज्ञप्ती जारी कर कहा था कि असीमानंद का उनके संगठन का कोई रिश्ता नहीं है।

पर अंग्रेजी पत्रिका कारवां में लीना रघुनाथ ने असीमानंद का जो साक्षात्कार किया था उसमें असीमानंद ने बताया था कि वह आरएसएस से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और धमाकों की अनुमति संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ही दी थी।

एनआइए अदालत द्वारा असीमानंद की जमानत मिलने के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि 67 लोगों के हत्या के आरोपी असीमानंद की रिहाई पर मीडिया कोई खबर क्यों नहीं ले रहा, क्या मीडिया के लिए यह खबर महत्वपूर्ण नहीं है।

समझौता बम धमाकों के तत्कालीन मुख्य जांचकर्ता रहे वीएन राय अपने फेसबुुक पर लिखते हैं क्या असीमानंद को जमानत देने वाली अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि उसकी समझौता ब्लास्ट में वही भूमिका रही थी जो फांसी पर लटकाये गये याकूब मेमन की मुम्बई धमाकों में और अफजल गुरु की संसद हमले में ?

इनपुट — TRUTH OF GUJRAT -  फोटो - लाल घेरे में प्रधानमंत्री मोदी और आतंक का आरोपी असीमानंद

Sep 16, 2016

पत्रकार की हत्या का आरोपी मोहम्मद कैफ क्या भाजपा नेता के साथ देशभक्ति कविताएं सुन रहा है?

यह तस्वीर मोहम्मद जाहिद के फेसबुक वाल से साभार है। उन्होंने अपने वाल पर कहा है कि केंद्रीय संसदीय राज्य मंत्री और भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी के साथ खड़ा यह वही शख्स है जिसके साथ खड़े होने पर पूर्व सांसद और कई जघन्य अपराधों में सजायाफ्ता शहाबुद्दीन को दुबारा जेल भेजने और बिहार सरकार के मंत्री और लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप सिंह यादव से इस्तीफा मांगा जा रहा है। गौरतलब है कि बंटी उर्फ मोहम्मद कैफ सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या में आरोपी है।

सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी वॉल पर लगातार लिखने वाले मोहम्मद जाहिद ने मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा है, 'इसी व्यक्ति की अब केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के साथ चित्र प्रस्तुत है। मीडिया और भक्त क्या अब नकवी से इस्तीफा माँगेंगे।

इस सवाल के मद्देनजर देखें तो मोदी सरकार के चेहरे पर वही कालिख पुति नजर आ रही है जो अबतक लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप पर लगी नजर आ रही थी।

फिर मीडिया मुख्तार अब्बास का इस्तीफा क्यों नहीं मांग रही, क्यों नहीं उनको गुंडों की पार्टी का अगुआ कहा जा रहा है, प्रधानमंत्री मोदी को इस मसले पर क्यों नहीं घेरा जा रहा। या जब मोहम्मद कैफ तेज प्रताप के साथ खड़ा होता है तो शूटर दिखता है और भाजपा मंत्री के साथ खड़ा हो वह देशभक्ति कविताओं का वाचन करता है।

 दोनों ही तस्वीरों में मुख़्तार अब्बास नकवी के ठीक पीछे मोहम्मद कैफ उर्फ़ बंटी

इस तस्वीर से आगे की कहानी कौन कहेगा

पिछले तीन चार दिनों में हजारों पेज लिखे जा चुके हैं, दर्जनों घंटे टीवी वाले बर्बाद कर चुके हैं पर इस तस्वीर के आगे सब फीके और जड़ हैं। इस पूरे घटनाक्रम में इस तस्वीर से सटीक कुछ भी नहीं है। 

उत्तर प्रदेश की सियासत पर लंबी—लंबी हवाई फेहरिस्त लिखने वाले अबतक कहानी का एक पैरा भी इससे आगे नहीं बढ़ा सके हैं। उनके पास चचा—भतीजा, सपा के परिवार में गृहयुद्ध, बंटा परिवार जैसे चलताउ जुमले हैं पर किसी एक के पास कोई ऐसी तथ्यगत बात नहीं है जिससे कहानी इतनी आगे बढ़ती हो जितनी यह एक तस्वीर कह जाती है। 

अगर किसी ने बढ़ाई हो वह यहां मैदान में आए। सपा के अंतरकलह को लेकर स्टोरी के नाम पर ब्रेकिंग करने वाले चंपकों को फोटो खिंचने वाले इस इंडियन एक्सप्रेस के फोटोग्राफर की स्टोरी करनी चाहिए और उसी से फोटो की उस खास वक्त की अंतरकथा सुननी चाहिए। 

Aug 25, 2016

देश पर दाग है यह शख्स

आप इस शख्स को ध्यान से देखिए। कैसे यह विकसित होते भारत को बदनाम कर रहा है। मरी हुई बीवी को कंधे पर लाद के ले जा रहा है। वह भी 10 किलोमीटर। इसे गौर से पहचान लीजिए। यह उसी कालाहांडी का है जहां भूख से मरने वालों ने देश की समृद्धि पर दाग लगाई थी, हमारी सभ्यता को दागदार किया था। हो सके तो इसे देश निकाला देने के लिए अभियान चलाइए। और यकीन कीजिए यह मोदी या नवीन पटनायक की तरह चार घंटे नहीं सोता होगा। न ही अंबानी, अडानी या टाटा की तरह हाड़तोड़ मेहनत करता होगा। मेहनत करने वाले कहीं ऐसे मरते हैं। यह दुर्गति तो मुफ्त में रोटियां तोड़ने वालों की ही होती है। अन्यथा इसकी पत्नी सरकारी अस्पताल में भगवान भरोसे क्यों मरती। अगर मर भी जाति तो सरकार की हजारों एंबुलेंस क्या इसे घर तक छोड़ के नहीं आतीं। जरूर इसने मदद नहीं मांगी होगी। किसी नेता से फोन भी नहीं कराया होगा। पक्का बदमिजाज होगा। मरे हमें क्या!

वोट बैंक नहीं होता सवर्ण

दलित वोट बैंक, पिछड़ा वोट बैंक, मुस्लिम वोट बैंक।
लेकिन आपने कभी सवर्ण वोट बैंक का नाम सुना है।
नहीं न!
सवर्ण समझदार वोटर होते हैं। ये वोट बैंक नहीं है। हो भी नहीं सकते। यह पढ़े—लिखे और खानदानी होते हैं। यह जाति, पैसे, क्षेत्र और विचारधारा के आधार पर वोट नहीं देते। सिर्फ विकास, शांति, सुरक्षा, सुविधा, रोजगार देने वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं। सही और अच्छे प्रत्याशी चुनते हैं।
लेकिन दलित, पिछड़े और मुसलमान वोट देने में पैसा, जाति, क्षेत्र, गोत्र, संप्रदाय, विचाारधारा देखते हैं। वह पिछड़ेपन, दंगा, हिंसा, असुरक्षा, असुविधा, महंगाई, बीमारी और बलात्कार फैलाने वाले नेताओं और पार्टियों को वोट देते हैं।
अब आप पूछेंगे, ये कौन कहता है?
भारतीय मीडिया कहता है जी। उन दफ्तरों में बैठे पत्रकार कहते हैं जी। जिसको भरोसा न हो वह हिंदी पत्रकारों की एक खुली डिबेट रखे पता चल जाएगा कि हमारी पत्रकारिता और पत्रकार किस खेत की मूली है।

Jul 14, 2016

क्या आप इस खबर को देश की खबर बनाएंगे


देश की सबसे बड़ी इलेक्ट्रानिक कंपनियों में शुमार 'एलजी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' की नोएडा यूनिट में 11 तारीख से करीब 620 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कर्मचारियों ने हड़ताल प्रबंधन की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ की है। 

लेकिन एक लाइन भी किसी मीडिया में कोई खबर नहीं है। हड़ताल में शामिल दर्जनों माएं, बहनें कई दिनों से अपने घर नहीं लौटी हैं, इनमें कई छोटे बच्चों की मांए भी हैं। एलजी कर्मचारी मनोज कुमार से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने स्थानीय मीडिया को बुलाया भी पर किसी ने कोई एक पंक्ति की खबर नहीं लिखी। 

कर्मचारी और प्रबंधन के बीच टहराहट बहुत मामूली मांगों को लेकर है। कर्मचारियों की मांग है कि उनकी शिफ्ट 8 घंटे की जाए जो कि अभी 12 से 13 घंटे की है। साथ ही कर्मचारी चाहते हैं कि डीए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया जाए।

कर्मचारियों का कहना है कि इस मांग को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने एक यूनियन बनाने की कोशिश की। मगर एलजी प्रबंधन ने रजिस्ट्रार को पैसा खिलाकर उनकी यूनियन का रजिट्रेशन रद्द कर दिया।

प्रबंधन यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कराने के बाद जो 11 लोग यूनियन के अगुआ थे उनका ट्रांसफर नोएडा से हैदराबाद, जम्मू, मध्यप्रदेश आदि जगहों पर कर दिया। ऐसे में अब कर्मचारियों की पहली मांग है कि पहले उनके नेताओं का ट्रांसफर रद्द हो और फिर उनकी सभी मांगों पर प्रबंधन वार्ता करे और निकाले।

पर प्रबंधन इस पर कान देने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वह विज्ञापन देकर मीडिया को खरीद चुका है। मगर क्या हम आप तो नहीं बिके हैं, इसे आप अपनी खबर बनाईए और कर्मचारियों की आवाज बनिए, उनके आंदोलन का समर्थन कीजिए।