Jul 20, 2011

समय से पहले हो सकते हैं यूपी चुनाव


खुफिया रिपोर्टों के अनुसार अगर बसपा सरकार निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवा लेती है तो वो दुबारा सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है...

 आशीष वशिष्ठ

प्रदेश की दिनोंदिन बदहाल होती कानून व्यवस्था और विपक्षी दलों के हमलों से परेशान मायावती ने इसी साल विधानसभा चुनाव करवाने का मन बना लिया है। सूत्रों की मानें तो सरकार ने अंदर ही अंदर इसकी तैयारी भी कर ली है और अगले माह मानसून सत्र के दौरान सरकार यूपी विधानसभा चुनाव की सिफारिश कर सकती है। कहा तो ये भी जा रहा है कि खुफिया रिपोर्टो के आधार पर सरकार ने निर्धारित समय से छह माह पूर्व ही चुनाव करवाने का मन बनाया है। राज्य सरकार पर लग रहे भष्टाचार, तीन सीएमओ की हत्या, रेप, दलित अत्याचार की बढ़ती घटनाओं और मजदूर, किसान का संघर्ष से बसपा सुप्रीमों की परेशानी बढ़ गई है। मायावती की परेशानी मंत्रियों, विधायकों और पदाधकारियों की हरकतें भी हैं। 

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार अगर बसपा सरकार निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवा लेती है तो वो दुबारा सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है। इस समय मायावती सरकार कई परेशानियों से घिरी हुई है। सत्ता विरोधी वातावरण और विरोधियों की चालों से निपटने के लिए मायावती ने निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवाने का इरादा कर लिया है। पिछले दिनों राहुल की किसान पंचायत के बाद माया ने पार्टी पदाधिकारियों की मीटिंग के दौरान बसपाइयों को राहुल की काट तो बताई ही थी, वहीं चुनाव के लिए कमर कसने का फरमान भी सुनाया था। अगर सब कुछ ठीकठाक रहा तो इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव का अखाड़ा सज जाएगा।

गौरतलब है कि राहुल गांधी यूपी सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। राहुल के साथ उनकी टीम मिशन 2012 में लगी हुई है। दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोशी, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदम्बिका पाल आदि कांग्रेसी नेता माया सरकार को घेरने का कोई मौका चूकते नहीं हैं। कांग्रेस के अलावा सपा, भाजपा, रालोद और पीस पार्टी भी चुनावी दंगल में कूदने को पूरी तरह से तैयार है। सपा, भाजपा और अन्य दल संभावित उम्मीदवारों की घोषणा आए दिन कर रहे हैं। प्रदेश में छोटे दलों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का मन बनाया है। अंदर ही अंदर सबकी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। 

भट्ठा-पारसौल की घटना से लेकर अलीगढ़ में किसान पंचायत तक से मायावती काफी परेशान हो गई हैं। सपा और रालोद भी अंदर ही अंदर यही चाहते हैं कि राहुल फैक्टर के और अधिक ऐक्टिव होने से पूर्व चुनाव उनकी सेहत के मुफीद होगा, क्योंकि अगर कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसकी ओर रूख करता है तो निश्चित तौर पर दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियों और किसानों की राजनीति करने वाले कई दलो की दुकानों के शटर डाउन हो जाएंगे, वहीं कांग्रेस सोशल इंजीनियरिंग के मुख्य घटक ब्राहाण वोट को भी प्रभावित करने में सक्षम है। मायावती ऊपर से कठोर और सख्त दिखाई देती हैं। अपने पहले तीन कार्यकाल में उनकी यही छवि आम जनमानस के दिलों में बसी थी। सूबे की नौकरशाही उनके सामने पड़ने से घबराती थी। अपराधी और काले कामों में लिप्त हाथ यूपी से बाहर अपना ठिकाना ढूंढते थे। लेकिन 2007 में पूर्ण बहुमत के दम पर अपनी सरकार बनाने के बाद से ही मायावती के तेवर बदल गए।

रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था और प्रशासन के मामले में सरकार हर मोर्च पर असफल रही है। पिछले चार सालों में प्रदेश में माफिया और ठेकेदारों का साम्राज्य मजबूत हुआ है। सरकार का लगभग हर मंत्री, विधायक और बसपा पदाधिकारियों पर तमाम आरोप लग रहे है। महिलाएं, बुजुर्ग, किसान, छात्र, शिक्षक, वकील, कर्मचारी अर्थात समाज का हर वर्ग इस समय परेशान है। कुछ समय पूर्व तक जो लोग ये कहा करते थे कि माया को टक्कर दे पाने की हिम्मत किसी दल में नहीं है, आज उनके सुर बदले हुये हैं।

अब ये चर्चा आम है कि माया के लिए ये चुनाव आसान नहीं होगा। राजनीतिक गलियारों और आम आदमी के बीच चल रही इन चर्चाओं और जमीन हकीकत से बसपा सुप्रीमों भी अनजान नहीं हैं, इसलिए स्थिति के बद से बदतर होने से पूर्व ही चुनाव करवाने का दांव चलकर मायावती अपने विरोधियों का धूल चटाने के मंसूबे बना रही हैं।


 

अब मुख्यमंत्री के लिए वोट देंगे मुस्लिम

कांग्रेस,सपा और बसपा को मुसलमान यह मानकर वोट देते रहे कि यही पार्टियां उनकी असल रहनुमा है,लेकिन  संकट में साथ नहीं आयीं। वहीं 2007 में मायावती की पूर्ण बहुमत से जीत मुसलमानों के लिए अप्रत्याशित थी और उनके लिए एक नयी सीख भी...

अजय प्रकाश

बात 1970 की है। लखनउ के अमीनाबाद चौराहे से मेहरा सिनेमा हाल की ओर जाने वाली सड़क पर जनसंघ का दफ्तर था और उसके ठीक सामने नाजियाबाद-मोहन मार्केट की ओर जाने वाली सड़क पर कांग्रेस का। मैं उस समय सोशलिस्ट पार्टी में था और पार्टी की जनसंघ से एकता हो चुकी थी। इधर से मैंने जैसे ही बोलने की शुरूआत की,उसी समय कांग्रेस दफ्तर पर लगी माइक से आवाज आयी, ‘यह मोहम्मद शोएब नहीं, घसीटे बोल रहा है।’ तो मैंने जवाब में कहा, ‘हां भाई मैं घसीटे ही हूं।’घसीटे का अर्थ प्यादा है और कांग्रेस को मंजूर नहीं था कि उसके मुकाबले किसी और का मुसलमान प्यादा बने। मुस्लिम उसी घसीटे के विशेषण से बाहर निकलने की अकुलाहट में है, अपना एक नेतृत्व बनाने की कोशिश में है। -उत्तर प्रदेश कचहरी बम धमाकों के आरोपियों का मुकदमा लड़ रहे लखनउ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद शोएब का यह उदाहरण मुस्लिम राजनीति के मौजूदा उभार को समझने का एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है, जो 2008 सितंबर के बाटला हाउस कांड के बाद फिर एक बार विमर्श और कोशिश के दायरे में है।

आजमगढ़ के संजरपुर में अपनी मुश्किलें बताते लोग

 अपने राजनीतिक नेतृत्व की तलाश मुसलमानों ने 2007 विधानसभा चुनाव के बाद ही शुरू कर दी थी, जब मुख्यमंत्री मायावती 206 (उपचुनावों के बाद 226)विधानसभा सीटों के साथ बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनायीं। बाद में सितंबर 2008 में हुए बाटला हाउस इनकाउंटर में आजमगढ़ के मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी-मुठभेड़,फिर दूसरे तमाम धमाकों में मुस्लिम युवकों की फर्जी गिरफ्तारियों ने मुस्लिमों की इस समझ को और पुख्ता किया।

जिस कांग्रेस,सपा और बसपा को मुसलमान यह मानकर वोट देते रहे कि यही पार्टियां उनकी असल रहनुमा है,इनमें से एक भी संकट में साथ नहीं आयीं। वहीं 2007में मायावती की पूर्ण बहुमत से जीत मुसलमानों के लिए अप्रत्याशित थी और उनके लिए एक नयी सीख की तैयारी भी। अप्रत्याशित इसलिए कि 11-12 फीसदी हरिजनों की रहनुमाई करने वाली मायावती मुख्यमंत्री बन जाती हैं और मुसलमान राजनीति के पेंदे में समा जाते हैं। इस चुनौती के मुकाबले में बड़हलगंज कस्बे के पेशे से सर्जन डॉक्टर अयूब की पीस पार्टी का उभार हुआ। इस पार्टी के उभार का पहला नारा बना, ‘हमारी पार्टी, हमारा मुख्यमंत्री।’ देश की यह पहली पार्टी बनी जिसका सीधा मकसद अपनी जाति का प्रदेश को मुख्यमंत्री देना था।

पीस पार्टी का प्रयोग नया था, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों खासकर पिछड़ी आर्थिक स्थिति वाले मुसलमानों ने इसे हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते 2009 के लोकसभा चुनावों में पीस पार्टी का उम्मीद से अधिक व्यापकता में उभार हुआ। इस पार्टी के साथ मुसलमानों के अलावा ब्राम्हण और अन्य पिछड़ी जातियों के लोग भी जुड़ने लगे। जिसके बाद आरोप लगा कि मुसलमानों की ताकत को कमजोर करने के लिए भाजपा ने पीस पार्टी बनाया है और डाक्टर अयूब उसके मोहरे हैं।

डॉक्टर अयूब पर आरोप लगाने वाले एक मुस्लिम नेता ने कहा कि भाजपा सिर्फ इतना चाहती है कि मुसलमान फैसला करने वाले वोटरों की श्रेणी से बाहर हो जायें। उस नेता ने यह भी बताया कि विधानसभा के उपचुनावों में अयूब ने लखीमपुर खीरी से जिस नामे महाराज को विधानसभा टिकट दिया था वह आरएसएस से जुड़ा रहा है। अयूब पर लग रहा यह आरोप कितना सही है यह तो समय बतायेगा लेकिन इतना तो साफ है कि नेतृत्व के उभार की कोशिश ने मुसलमानों को अगड़े और पिछड़े में बांट दिया है।

जानकार बताते हैं कि दिल्ली के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के बाद आजमगढ़ के मौलवी आमिर रशादी के नेतृत्व में उलेमा काउंसिल के उभार में अगड़े मुसलमान शामिल हैं,जबकि अयूब गरीब और पिछड़े मुसलमानों के अगुवा हैं। काउंसिल 2009लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ और लालगंज सीट पर दूसरे स्थान पर रही तो पीस पार्टी ने कई लोकसभा सीटों पर 50हजार से उपर वोट जुटाकर प्रदेष की बड़ी पार्टियों के पसीने छुड़ा दियें। उसी का असर है कि पीस पार्टी ने राश्ट्रीय लोकदल के साथ संयुक्त मोर्चा बना लिया है।

हालांकि इस नये गठजोड़ के बाद डॉक्टर अयूब के मुख्यमंत्री वाले नारे पर ग्रहण लग गया है कि लोकदल अध्यक्ष अजीत सिंह के होते अयूब कैसे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। ऐसे में अयूब इस गठबंधन को तोड़कर सपा या कांग्रेस से एकता बनाने की कोशिश में हैं। जमायते इस्लामी के आमिर अली कहते हैं,‘इन अनुभवों ने साफ कर दिया है कि मुसलमान भी नेतृत्कारी बन सकते हैं और दुम पकड़कर चलने की राजनीति से छुटकारा पा सकते हैं।’

मुस्लिमों द्वारा हुई ऐसी राजनीतिक कोशिशों के इतिहास में जायें तो पहला नाम मुस्लिम मजलिस के संस्थापक डॉक्टर फरीदी का आता है। फरीदी ने मजलिस का गठन कांग्रेस के मुकाबले में किया था। मुस्लिम मजलिस 1980तक सक्रिय रही और मुसलमानों का एक तबका हमेषा कांग्रेस का विरोधी रहा। विश्लेषक मानते हैं कि आज मुसलमानों ने जितनी भी राजनीतिक हैसियत हासिल की है उसमें डॉक्टर फरीदी का एक बड़ा योगदान है। उलेमा हिंद से जुड़े डॉक्टर फैयाज बताते हैं, ‘फरीदी के उभार से पहले तक पांच मुसलमान एक जगह बैठकर कोई बैठक नहीं कर सकते थे। कांग्रेस ने मुसलमानों की हालत उस वक्त अछूतों की कर दी थी। अब फिर एक बार मुसलमान फरीदी की राह चलने की तैयारी में हैं।’

उल्लेखनीय है कि इंदिरा गांधी ने मजलिस को उस समय आरएसएस का संगठन करार दिया था। जनता पार्टी में मजलिस भी शामिल थी,जिसका एक बड़ा घटक हिंदूवादी राजनीति का समर्थक जनसंघ भी था, लेकिन इस चुनाव में मजलिस के तीन सांसद जीते थे। वैसे में सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश के मुसलमान कभी भाजपा का दामन भी थाम सकते हैं।

इस पर  मुस्लिम नेता इलियास आजमी कहते हैं,‘इस संभावना को एकदम से इनकार नहीं किया जा सकता। नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात में किये गये मुस्लिम नरसंहार को छोड़ दें तो मुसलमानों के खिलाफ सारा अपराध कांग्रेस ने ही किया है। लेकिन लखनउ हाईकोर्ट के वकील मोहम्मद शोएब इन स्थितियों से सावधान करते हैं। वे याद दिलाते हैं कि,‘अच्छी शुरूआतों के बावजूद हर बार मुस्लिम नेतृत्व सांप्रदायिक राजनीति की ओर बहक गया है और फायदा कांग्रेस और भाजपा जैसे सांप्रदायिक ताकतों को ही हुआ है। इसलिए देखना यह है कि यह नया उभार धर्मनिरपेक्ष उसूलों के साथ कैसे आगे बढ़ता है।’



Jul 19, 2011

क्यों हटाया गया विधिभंजन को !


(इस रचना के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक है इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता मात्र संयोग है )


हिमांशु कुमार

एक राज्य था पच्चीसगढ़. उसका मुखिया था दमन सिंह. सेनापति का नाम था विधिभंजन. विधिभंजन राजा का मुंहलगा और अतिप्रिय था. वह राजा की खुशी के लिए राज्य के सुचारू संचालन हेतु बनाये गए सारे नियमों को तोड़ देता था. इसलिए राजा उसे बहुत पसंद करता था. एक बार राजा के दरबार में कुछ परदेसी व्यापारी आये.उन्होंने राजा को कीमती रत्न और माणिक भेंट किये और कहा की महाराज आपके राज्य के जंगलों में मिटटी के नीचे कुछ मूल्यवान धातुएं हैं.

अगर आप की कृपादृष्टी हो जाए तो हम लोग वो धातुएं खोद लेंगे और बदले में आपको कर भी दे देंगे. राजा ने उन व्यापारियों को ऐसा करने की अनुमति दे दी. व्यापारी अपने यन्त्र आदि लेकर जब धातुएं खोदने जंगल में पहुंचे तो देखा की जंगल में धातुओं के ऊपर तो जंगली लोग रहते हैं. विदेशी व्यापारियों ने राजा से कहा की क्या हम अपने देश से सेना लाकर इन जंगलियों को मार सकते हैं? राजा ने कहा कि नहीं इससे प्रजा में असंतोष फ़ैल जाएगा इसलिए आपका यह कार्य हमारी सेनाये कर देंगी. राजा ने सेनापति विधिभंजन को बुलाया और कहा की राज्य की सेना लेकर वन में जाओ और इन व्यापारियों के सुगम व्यवसाय हेतु वन में रहने वाले जंगलियों को उन धातुओं के ऊपर से हटा दो.

वैसे भी ये जंगली हमें ना तो कर देते हैं ना ये हमारी तरह सभ्य हैं.इनकी भाषा भी हमारे दरबार में कोई नहीं जानता. इन लोगों के साथ बातचीत भी करना मुश्किल है. इसलिए इन्हें इस राज्य से बाहर खदेड़ दो.सेनापति विधिभंजन ने अपनी सेनाओं की एक टुकड़ी को इन जंगलियों को वहां से खदेड़ने के लिए भेजा. जंगलियों ने अपनी शिकार करने की तकनीकों का प्रयोग करके सेनापति की सेना की टुकड़ी को मार गिराया.इस पर राजा ने क्रुद्ध होकर सेनापति को पूरी सेना लेकर इन जंगलियों के सफाए के लिए भेज दिया.

विधिभंजन स्वयं तो राजधानी में ही बैठा रहा और सैनिकों को जंगल में भेज दिया.सैनिकों ने कुछ जंगली युवकों को घेर कर पकड़ लिया और उनसे कहा की देखो तुमने हमारी सेना के कुछ सैनिकों को मार डाला है हम चाहें तो तुम्हें तत्काल मार सकते हैं, लेकिन अगर तुम हमारी मदद करोगे तो हम तुम्हें स्वर्ण मुद्राएँ भी देंगे.इसके अतिरिक्त तुम जंगलियों को लूट पाट कर जितना चाहो धन एकत्र कर लेना. जो भी तुम्हारे कृत्यों का विरोध करे उसका अथवा तुम जिसका चाहो वध भी कर सकोगे. राज्य तुम्हे इसके लिए कोई दंड नहीं देगा.

राज्य का दंड विधान तुम्हारे किसी भी अपराध पर लागू नही होगा. इसके उपरांत इन जंगली युवकों की मदद से विधिभंजन के सैनिको ने जंगलियों पर जोरदार हमला बोल दिया.राजा की सेना ने जंगलवासियों की झोपडीयों और बस्तियों में आग लगाना उनकी महिलाओं की अस्मत लूटना और और उनके घर का माल असबाब लूटना प्रारम्भ कर दिया.सैनिकों के इन अत्याचारों से बचने के लिए अनेकों जंगली लोगों ने अपनी बस्तियां छोड़ कर घने वनों में शरण ले ली. कुछ जंगली युवकों ने सैनिकों से लुटे हुए अस्त्र शस्त्रों की मदद से एक अपनी सशस्त्र टुकड़ी भी बना ली और घात लगा कर राजा के सैनिकों पर हमला करने लगे.

राजा ने एक कुटिल चाल खेली उसने नगर में रहने वाले नागरिकों से कहा की वन में रहने वाले ये जंगली लोग बगावत पर उतर आये हैं और स्वयं राजा बनने का सपना देख रहे हैं, इसलिए कोई भी सभ्य व्यक्ति इन वनों की तरफ नहीं जायेगा तथा इन जंगलियों के पक्ष में एक भी शब्द नहीं बोलेगा, अन्यथा ऐसे व्यक्ति को राजद्रोह का दंड मिलेगा. राज्य में एक एक वैद्य भी रहता था. उसका नाम था गजानन जेन. उसने इन जंगलियों और राजा के सैनिकों के बीच होने वाले युद्ध के विषय में सत्य जानने का निश्चय किया.वो अपने कुछ मित्रों के साथ राजा को सूचित किये बिना वन में गया. वहां उसने जंगलवासियों की जली हुई बस्तियां देखीं. उसने कुछ जंगलियों से बात भी की.

जंगलियों ने उस वैद्य को अपने ऊपर हुए अत्याचारों के विषय में बताया.वैद्य ने नगर में लौट कर एक बड़ी सभा बुलाई.उस सभा में वैद्य ने राजा को जंगलियों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी बताया और सेना को वनों में से वापिस बुलाने की मांग रखी. सभा में व्यापारियों के अनुचर और राजा के गुप्तचर भी उपस्थित थे.उन्होंने दरबार में जाकर राजा के कान भरे की ये वैद्य जंगली बागियों के साथ मिल कर आप का राज्य छीनने का षड़यंत्र कर रहा है.राजा ने तुरंत वैद्य को कारागार में डालने का आदेश दिया और उसे राजद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास का दंड दे दिया.

राजा का एक मंत्री था जिसका नाम था सनकी राम भंवर. उसका एक लम्पट पुत्र था. विदेशी व्यापारियों ने मंत्री व उसके पुत्र को स्वर्ण मुद्राओं और युवा कन्याओं के संसर्ग का प्रलोभन दिया. मंत्री और उसका पुत्र विदेशी व्यापारियों के व्यवसाय हेतु जंगलियो की भूमि कुटिल रीती से व्यापारियों के लिए षड़यंत्रपूर्वक हडपने लगा.मंत्री के पुत्र की इन गतिविधियों के विषय में सेनापति को सूचना मिली. सेनापति मन ही मन इस मंत्री के प्रति शत्रुता रखता था. उसे अपने पुराने शत्रु पर वार करने का अच्छा अवसर मिल गया.उसने अपने ही कुछ अनुचरों से कह कर मंत्री के पुत्र के विरुद्ध एक दंडनीय अपराध करने का प्रकरण बना कर मंत्री के उस पुत्र को कारागार में डालने का उपक्रम करने लगा.

मंत्री सनकी राम भंवर भी अति शक्तिशाली था .उसकी पहचान नाकपुर नगर में स्थित राजा के धर्मगुरु के आश्रम के पुरोहितों से भी थी.राजा के इस धर्मगुरु के आश्रम का नाम था "राजकीय सशत्र सेवक संघ". धर्मगुरु को जब अपने प्रिय शिष्य मंत्री सनकी राम भंवर के मुसीबत में पड़ने के विषय में पता चला तो तो उसने तत्काल राजा को सेनापती को पद से हटाने के लिए आदेश दिया. राजा सेनापती को हटाने का निर्णय लेने में भयभीत था,क्योंकि सेनापती को राजा की समस्त अनैतिक गतिविधियों की जानकारी थी.इसलिए राजा नहीं चाहता था की सेनापती राज्य छोड़ कर जाए. इसलिए राजा ने सेनापती को उसके पद से तो हटाया परन्तु उसे एक दूसरे लाभदायक पद पर नियुक्त कर दिया. ...क्रमश.


दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.




जीतन मरांडी रिहाई मोर्चा में शामिल हों !



रांची.वो जो कल तक आम लोगों के बीच मेहनतकश समुदाय के दुःख-दर्द और उनकी जिन्दगी के जद्दो-जहद को अपना सांस्कृतिक स्वर देता था............ खेत-खलिहान, कारखाने-खदान से लेकर गांव, देहात, कस्बों, शहरों में अपनी सांस्कृतिक मण्डली के साथ घूम-घूमकर, पतनशील व मानव विरोधी संस्कृति के बरखिलाफ जन संस्कृति के गीत गाता है.............जल-जंगल-जमीन तथा जीवन पर अधिकार के लिए हूल-उलगुलान के सपनों को शोषित-वंचित आदिवासी एवं मेहनतकश जन समुदाय के बीच जगाता रहा तथा लूट-झूठ की सत्ता से हताश, निराश और परेशान दिलों में अपनी धन-धरती पर अधिकार और मर्यादापूर्ण जीवन के लिए परिवर्तन का जोश भरता रहा ...........और रात के विरुद्ध प्रात के लिए, भूख के विरुद्ध भात के लिए नये राज-समाज गढ़ने के अभियान में चेतना का संगीत सजाता रहा .........उस जन कलाकार जीतन मरांडी को झूठे केस में फंसाकर कलाकर से कातिल ठहराया गया और फांसी का हुक्म सुनाया गया।

जीतन मरांडी ने अपसंस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृति के लिए सदैव मांदर, ढोल, नगाड़ा, बांसुरी और कलम-कूची को अपना हथियार बनाया,लेकिन उसे झूठे गवाहों के बल पर उग्रवादी साबित किया गया। एक जन कलाकार के रूप में उसने संस्कृतिकर्म की वही राह अपनायी जिसे कबीर, भारतेन्दू हरिश्चन्द्र से लेकर मुंशी प्रेमचन्द और नागार्जुन की रचना-सांस्कृतिक परम्परा ने दिखलायी। वही संकल्प रखा जिसे सिद्धू-कानू, बिरसा मुण्डा और भगत सिंह के आदर्शों ने सिखलाया। जो यही काली ताकतों को नहीं भाया। प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने वर्षों पूर्व लिखा था -

“भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की”

आज जीतन मरांडी के साथ यही चरितार्थ हो रहा है। उसने देश की सम्प्रभुता-स्वतंत्रता और लोकतंत्र का अपहरण करनेवाली शासन-व्यवस्था और सत्ता-संस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृतिकर्म की मशाल जलायी। आईये,जन कलाकार जीतन मरांडी को सही न्याय दिलाने तथा उसे फांसी की सजा से मुक्त कराने के जन अभियान में हर स्तर पर सक्रिय भूमिका में हम सब आगे आयें!

विभिन्न जनान्दोलनों में सक्रिय रहने वाले जनकलाकार जीतन मरांडी पर यों तो कई झूठे मुकदमे सरकार-प्रशासन द्वारा पहले ही लादे जाते रहे हैं। 2008 में गिरिडीह जिले के चिलखारी जनसंहार कांड के प्रमुख अभियुक्तों में स्थानीय प्रशासन व भ्रष्ट राजनेता-बिचौलियों ने साजिश कर जीतन मरांडी को फंसा दिया। 2009 में रांची से जीतन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। गिरीडीह की निचली अदालत में एकतरफा एवं झूठी गवाही दिलवाकर 23जून 2011 को फांसी की सजा सुनायी गयी। चूंकि जीतन मरांडी झारखण्ड में कोरपोरेट लूट और झूठ की सरकारों की जन विरोधी नीतियों संघर्ष की सांस्कृतिक आवाज बुलंद करते थे और ग्रामीण-आदिवासी जनता में लोकप्रिय थे। इसलिए वे लूट-झूठ की शक्तियों की आंखों की किरकिरी बन गये थे।



निवेदक
जन कलाकार जीतन रिहाई मंच
अनिल अंशुमन, संयोजक
प्रचारित-प्रसारित: झारखण्ड जन संस्कृति मंच, संपर्क: 09939081850, anshuman.anil@gmail.com

फैज उस्मानी की मौत की सीबीआई जांच हो



फैज़ उस्मानी
लखनऊ. मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल)ने मऊ जिले के ढिलई फिरोजपुर निवासी फैज उस्मानी की पूछताछ के दौरान हुई मौत पर सीबीआई जांच की मांग करते हुए पुलिस कर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। पीयूसीएल की उत्तर प्रदेश इकाई के मुताबिक फैज उस्मानी को उसके घर से उठाया गया और उसके बाद उसकी मौत हो गई,इससे जाहिर है कि पुलिस ने उसको गंभीर यातना दी थी। संगठन इस मुद्दे पर कल आजमगढ़ और मऊ में केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को संबोधित ज्ञापन सौंपेगा।

पीयूसीएल ने इसे हिरासत में हुई मौत बताते हुए महाराष्ट्र सरकार पर आरोप लगाया कि जब पुलिस ही हत्या की जिम्मेदार है तो फिर पुलिस कर्मियों से निर्मित सीआईडी जांच करवाकर वह दोषी पुलिस कर्मियों को बचाना चाहती है। पीयूसीएल नेताओं ने कहा कि जांच की अब तक की दिशा से स्पष्ट है कि सरकार मुसलमानों और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को ही संदेह के दायरे में रखकर उनको बदनाम करने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने कहा कि आखिर एटीएस या दूसरी जांच एजेंसियां मालेगांव,समझौता एक्सप्रेस,हैदराबाद मक्का मस्जिद जैसे विस्फोटों को अंजाम देने वाले हिन्दुत्वादी संगठनों को इस धमाके में शक के दायरे से क्यों बाहर रख रही हैं। क्या जांच एजेंसियां पूर्व की इन घटनाओं से सबक नहीं सीखना चाहती जब उन्होंने इन घटनाओं में शुरु में निर्दोष मुस्लिमों को फर्जी आतंकी संगठनों के नामों पर गिरफ्तार किया लेकिन बाद ये हिंदुत्वादी संगठनों की करतूतें निकलीं।

मुंबई धमाके की जांच की दिशा की अगंभीरता को देखते हुए पीयूसीएल नेताओं ने कहा कि जिस तरह समुदाय विशेष को पूरे देश में इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे कथित संगठन के नाम पर उत्पीडित किया जा रहा है, ऐसे में जरुरी हो जाता है कि सरकार इंडियन मुजाहिद्दीन पर श्वेत पत्र जारी करे।


अंकों के खेल में फंसी शिक्षा

असंतुलित विकास और राजनीतिक पूर्वाग्रह के चलते अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालय कुछ एक राज्यों, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, उत्तर पूर्व, और उत्तर प्रदेश, में सीमित हो कर रह गए है. इसी तरह राज्य और डीम्ड विश्वविद्यालय भी कुछ शहरों में ही केंद्रित है...

विष्णु शर्मा

दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए शत प्रतिशत अंक की मांग ने जितना हैरान किया उतने ही सवाल पैदा किये है.हालांकि पिछले कई वर्षो के परिक्षा परिणाम इस स्थिति तक पहुंच सकने का संकेत कर रहे थे लेकिन इसे मानने को तैयार कोई नहीं था! इस संकट ने भारत सरकार की उच्च शिक्षा नीति के दिवालियापन को उजागर किया है. यदि इसके बाद भी सरकार नींद से नहीं जागती है तो निकट भविष्य में स्थिति के और भी अधिक विस्फोटक होने से रोका नहीं जा सकेगा.

मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल चाहे लाख कोशिश करें इसकी जिम्मेदारी दिल्ली विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कालेज के प्रबंधन पर डालने की,लेकिन हकीकत यह है कि इसके लिए केंद्र सरकार मुख्य रूप से दोषी है.सरकार की कमजोर नीति,जो हर समस्या का इलाज निजीकरण में तलाशती है,के चलते आज लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग गया है.विगत वर्षों में साक्षरता दर को विश्वस्तर तक ले जाने के लिए सरकार ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर अच्छे प्रयास किये,लेकिन इसके परिणाम स्वरुप बढ़ने वाली उच्च शिक्षा की मांग की आपूर्ति करने में सरकार की ओर से लगभग न के बराबर प्रयत्न हुए.

पिछले दो दशक के दौरान उच्च शिक्षा की मांग में लगातार होती बढोतरी के बावजूद संस्थानों के विकास को सरकार नजरअंदाज करती रही,जिसके चलते मांग और आपूर्ति में अंतर बढ़ता गया। 1950 और 2007 के बीच विश्वविद्यालय की संख्या में 17 गुना बढोतरी तो हुई (आज भारत में 467 विश्वविद्यालय है),लेकिन तब भी यह मांग की तुलना में बहुत कम है। उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी मुख्यतः महाविद्यालयों के जिम्मे आ गई है जिनकी संख्या 2009 में 25951 है। उच्च शिक्षा में सरकार का यह निराशाजनक प्रदर्शन उस स्थिति में रहा जबकि सकल नामांकन दर (जी. ई. आर.) में हर साल इजाफा होता रहा। 1984-85 में जहां यह दर 2.9 प्रतिशत थी वही 2009 में यह बढ़ कर 7.2 प्रतिशत हो गई है.

असंतुलित विकास और राजनीतिक पूर्वाग्रह के चलते अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालय कुछ एक राज्यों, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, उत्तर पूर्व, और उत्तर प्रदेश, में सीमित हो कर रह गए है. इसी तरह राज्य और डीम्ड विश्वविद्यालय भी कुछ शहरों में ही केंद्रित है। विश्वविद्यालय की कमी का दुष्परिणाम यह है कि कई राज्यों में सैकड़ो कालेज एक विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है. एक जगह तो इसकी संख्या 890 है. इससे उच्च शिक्षा की स्तर में नकारात्मक प्रभाव पड़ना लाजमी है.

इसके अलावा महाविद्यालयों का भी असंतुलित वितरण है. पूरे देश में केवल दो ही राज्यों में प्रत्येक 1 लाख छात्रों के लिए 20 कालेज है और 10 राज्यों में यह अनुपात 5 कालेज प्रति 1 लाख छात्र से भी कम है! महाविद्यालयों की गुणवत्ता का आलम यह है कि 16000 महाविद्यालयों, जो यू. जी. सी. के अधिकार क्षेत्र में आते है, में से केवल 10000 ही ऐसे कालेज है जो उसके द्वारा प्रदान किये जाने वाले वार्षिक अनुदान के हकदार है. इसी तरह यू. जी. सी. के अधिकार क्षेत्र वाले 317 विश्वविद्यालय में से केवल 164 ही अनुदान प्राप्त करते है.इसका शिक्षा के गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ा है और कुछ चुनिंदा संस्थान जरूरत से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगे फलस्वरूप इन ‘ऐलीट’संस्थानों में दाखिले की होड छात्रों में बढ़ गई और इसी के चलते आज इन संस्थानों ने अपने यहां प्रवेश के लिए जरूरी अंक को इस हद तक बढ़ा दिया है.

उच्च शिक्षा क्षेत्र के स्तर को समझने के बाद होड़ के कारणों को समझना आसान हो जाता है. पिछले कुछ वर्षों के परिणाम बताते है कि शिक्षा बोर्ड (केद्रीय शिक्षा बोर्ड-सी.बी.एस.ई.- तथा राज्य शिक्षा बोर्ड) अंक बांटने में उदार हुए है. इस वर्ष केंद्रीय शिक्षा बोर्ड की परीक्षा पास करने वालों का प्रतिशत 81.71 प्रतिशत रहा। वही तमिलनाडू बोर्ड में यह 85.9 प्रतिशत, केरल में 82.5 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 80.14 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 76.54, पंजाब में 72.71, महाराष्ट्र में 70.69, बिहार में 67.21 और आंध्र प्रदेश में यह प्रतिशत 63.27रहा.इन सब राज्यों में केवल बिहार में पिछले साल के मुकाबले इस साल यह प्रतिशत घटा है ( पिछले वर्ष उत्तीर्ण होने वाले छात्रों का प्रतिशत 70.19 था)। बाकी अन्य राज्यों में इस प्रतिशत में 10 से 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. तमिलनाडु बोर्ड का तो यह आलम है वहां 99.12प्रतिशत तक अंक मिले है और श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में तो एक तिहाई सिर्फ यहीं के बच्चों ने दाखिला लिया हुआ है. यही हाल और भी तथाकथित एलीट कॉलेज का है.

इसके आलावा बहुत से छात्र ‘ऐलीट’ संस्थानों में दाखिला न मिल पाने के चलते विदेश की ओर रुख करते है. फोब्र्स पत्रिका में प्रकाशित एक एक रिपोर्ट के अनुसार विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 2006 में 1.23 लाख थी. 2009 में मात्र अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या 1 लाख से अधिक पहुंच गई थी. वहां पढ़ने आने वालों से उसे हर सार 13 बिलयन अमरीकी डालर (लगभग 6500 करोड रूपये) की आमदनी होती है. इस तरह सरकार अपनी आय का बहुत बड़ा हिस्सा भी हर साल गवांती है. भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

भारत सरकार की मंशा ही कुछ और है. सिवाए निजीकरण के उसे कुछ और नज़र आ ही नहीं रहा और इसके लिए उसने सारे दरवाजे खोल दिए है. लेकिन आंकडे़ बताते है कि यह यह नाकाफी होगा. एक शोध के अनुसार (बशीर 1997)शिक्षा के निजीकारण का भारत में असर नकारात्मक रहा है. निजी संस्थानों के मुकाबले सार्वजनिक शिक्षा संस्थान स्तरीय शिक्षा प्रदान करने में अधिक सफल रहे है. इसका कारण निजी संस्थानों में मुनाफे के लिए योग्य शिक्षकों के स्थान पर कम वेतन वाले शिक्षकों की भरती और मूलभूत सुविधाओं में कटौती है.

दूसरी तरफ निजी पूंजी निवेश ऐसे संस्थानों में नहीं होता जहां मुनाफा कम होता है.अब तक के आंकड़े बताते है कि शिक्षा क्षेत्र में निजी पूंजी के प्रवेश के बाद के वर्षों में पूंजी निवेश तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने वाले क्षेत्रों में ही अधिक हुआ है.कला एवं मानविकी के क्षेत्र में यह अत्यधिक कम है. तो ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि सरकार अब कौन सी ऐसी नीति ले कर आयेगी जिससे वह निजी पूंजी को इस क्षेत्र में निवेश के लिए आकर्षित कर सकेगी. सरकार यह जरूर कर सकती है कि वह निजी निवेशकों के लिए यह जरूरी कर दे कि तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के साथ साथ अपने संस्थानों में कला और मानविकी शिक्षा का भी बंदोबस्त करें लेकिन तब भी गुणवत्ता हासिल करना आसान नहीं होगा.यहां तक की निजी क्षेत्र तकनीकी और चिकित्सा क्षेत्र में भी गुणवत्ता के मामले में सार्वजानिक शिक्षा संस्थानों से लगातार पीछ होते गए है. और सार्वजानिक घाटा कम करने के बड़े बड़े वादों के बावजूद विश्वभर में निजी संस्थान आर्थिक रूप से सरकार पर अधिक आश्रित होते जा रहे है. इस लिहाज से मानविकी जैसे संवेदनशील विषयों को इनके भरोसे छोड़ना जोखिम भरा होगा.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. यहां भी मानविकी में पी. एच. डी. की पढाई की व्यवस्था है लेकिन बहुत कम ही छात्र इन संस्थानों को विकल्प के रूप में देखते है. इसका कारण है कि इन संस्थाओं में इस क्षेत्र के प्रति उपेक्षा का भाव रहता है.संस्थानों के पुस्तकालय में भी जरूरी पुस्तकों का आभाव शोध के विद्यार्थियों को लगातार हताश करता है.इसी कारण इतने वर्षों में भी कोई उन्नत शोध,इस क्षेत्र में,इन संस्थानों से नहीं हो पाया है. निजी संस्थानों में तो स्थिति और भी अधिक निराशाजनक है.यह संस्थान केवल पैसों की उगाही के लिए इस विभाग को चला रहे है। लगातार शोध में भारत के पिछड़ने के समाचार इस बात की सिद्ध करते हैं.

इस तरह यह दिखता है कि निजीकरण समस्या का सही समाधान नहीं है और इसके लिए सरकार को ही व्यवस्था करनी होगी। यूरोप का उदाहरण हमारे देश के लिए अच्छा माना जा सकता है. जहां के सार्वजनिक विश्वविद्यालय ने निजी संस्थानों के मुकाबले लगातार उन्नत प्रदर्शन किया हैं. टाइम्स पत्रिका के 2011के सर्वेक्षण के अनुसार यूरोप के 50विश्वविद्यालय में शीर्ष 10विश्वविद्यालय सार्वजानिक विश्वविद्यालय है.

इसके अलावा शिक्षा में निजी पूंजी निवेश उच्च शिक्षा में एकाधिकार की प्रवत्ति को जन्म देता है. इससे एक समय बाद फीस मंहगी हो जाती है और अध्यापकों का जबरदस्त शोषण होने लगता है, ऐसा हो भी रहा है. आज हालत यह है कि उच्च शिक्षा के लिए छात्र निजी कालेज में दाखिला लेने की बजाय अनियमित छात्र की हैसियत से पढ़ना अधिक सुविधाजनक मानते है.

भारत की जरूरत उपलब्ध संस्थानों को स्तरीय बनाते हुए सामान्य पाठ्यक्रम को सभी राज्यों में (जरूरी बदलाव के साथ) लागू करना है. इस तरह ‘ऐलीट’ संस्थानों के आकर्षण से भी मुक्ति मिलेगी और शिक्षा का विकेंद्रीकरण होगा.इसके साथ प्रत्येक राज्य का एक निश्चित कोटा तय कर एक संस्थान और राज्य के एकाधिकार को कम किया जाना चाहिए.लेकिन सबसे जरूरी है राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा का होना. इससे छात्र अलग अलग संस्थानों में दाखिले के लिए होने वाली परीक्षा से तो बचेंगे ही साथ ही ऊंचे प्रतिशत हासिल करने के दवाब और अपने सहपाठियों को शत्रु मानने और उनसे लगातार प्रतियोगिता करने की मानसिकता से भी मुक्त हो सकेंगे.

(समयांतर के जुलाई 2011 अंक से साभार)

Jul 18, 2011

यूपी का पत्रकार मतलब डिक्टेशन ब्वाय

हद तो यहां तक है कि मुख्यमंत्री मायावती की प्रेस कांफ्रेस का पूर्वाभ्यास किया जाता है और माननीया से पूर्व निर्धारित और रटाए गये प्रश्न ही पूछे जाते हैं। प्रेस कांफ्रेस में बड़े से बड़ा पत्रकार अपनी मर्जी से सवाल पूछने की हिमातक नहीं करता...

आशीष वशिष्ठ

बात 25अक्टूबर 1996की है। बसपा के संस्थापक कांशीराम के दिल्ली स्थित आवास के बाहर मीडिया का जमावड़ा था। असल में देशभर का मीडिया कांशीराम से यूपी में त्रिषंकु विधानसभा चुने जाने पर बसपा की भावी योजना और तमाम दूसरे सवालों के जवाब जानने के लिए जमा हुआ था। लेकिन पत्रकारों के प्रश्नों से झुंझलाए और तमतमाए कांशीराम और उनके सर्मथकों और सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। इस हमले में आज तक चैनल के पत्रकार आशुतोष गुप्ता और बीआई टीवी के पत्रकार इसार अहमद को छाती पर गहरी चोटें आई और उन्हें अस्पताल भर्ती कराना पड़ा। मौजूदा समय में भी उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता के कुछ ऐसे ही हालात दिखने लगे हैं.


डिक्टेशन पर उठा सवाल तो लो मैं उठ गयी


हालिया घटना में राजधानी लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के चेयरमैन प्रो० निशीथ राय के साथ घटी है। प्रो.राय के इलाहाबाद स्थित पैतृक निवास में सरकार के इशारे पर कई थानो की पुलिस ये कहकर कि उनके घर में धड़धड़ाते हुये घुसी कि उनके घर में अपराधी छिपे होने की खबर है। यूपी पुलिस को वहां कोई अपराधी नहीं मिला। गौरतलब है कि इस घर में प्रो. राय की वृद्व माताजी रहती हैं। प्रो0राय जनहित से जुड़े मुद्दों और मसलों पर पूरी ईमानदारी और सच्चाई से अपनी आवाज मुखर करते हैं।

असल में मायावती अपनी बुराई और आलोचना सुनने की क्षमता ही खो चुकी है। इसीलिए उनके षासन में प्रेस पर हमले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं और मायावती पार्टी जनों और नौकरशाहों के आचरण और व्यवहार को बदलने की कोशिश करने के स्थान पर अपने विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को डंडे के डर से चुप कराने के अलोकतांत्रिक तरीके का प्रयोग खुलकर कर रही हैं। जेल में बंद डा0 सचान की हत्या से जुड़े खुलासे प्रेस ने करने शुरू किये तो मायावती सरकार पूरी तरह से बौखला गई।

प्रेस के खुलासों और खोज से डा0सचान की आत्महत्या वाली थ्योरी झूठी साबित होने लगी तो सरकार के इशारे पर एएसपी और सीओ स्तर के अधिकारी ने आईबीएन 7चैनल के पत्रकार शलभमणि त्रिपाठी और मनोज राजन त्रिपाठी से दुर्व्यवहार और मारपीट की। मनोज तो किसी तरह से पुलिस की चंगुल से भाग निकले पर शलभ को पुलिस अधिकारी हजरतगंज थाने में ले आये और अपने मातहतों को उन्हें पीटने और झूठे आरोपों में बंद करने का हुक्म दिया। लेकिन पत्रकार बिरादरी के मुखर विरोध और प्रदर्शन से घबराई पुलिस ने शलभ को छोड़ दिया और मजबूरन सरकार को आरोपी पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर मुकदमा दर्ज करना पड़ा।

यूपी में पत्रकारिता दिनों-दिन जोखिम का काम साबित हो रहा है। 2007में बसपा सरकार बनने के बाद से ही प्रदेश में गिने-चुने चम्मच पत्रकारों को छोड़ अधिकतर पत्रकारों को सरकारी मकान से बेदखल करने और मान्यता समाप्त करने कार्यवाही चल री है। प्रदेश से छपने वाले बड़े-बड़े बैनर के अखबार सरकार की चम्मचागिरी और चरणवंदना में लगे हैं। चंद चंपू टाइप चाटुकार पत्रकारों के अलावा बसपा सरकार का मीडिया से मधुर संबंध नहीं है। हद तो यहां तक है कि सीएम की प्रेस कांफ्रेस का पूर्वाभ्यास किया जाता है और माननीया मुख्यमंत्री पूर्व निर्धारित और रटाए गये प्रष्न पूछे जाते है। प्रेस कांफ्रेस में बड़े से बड़ा पत्रकार हिमाकत करके अपनी मर्जी से सवाल पूछने का आजाद नहीं है।

एक तरह से मायावती पत्रकारों को जो डिक्टेट करती हैं और पत्रकार बंधु सुनते,समझते और छापते हैं। असल में मायावती हर काम को डंडे के जोर पर कराने की आदी है। ऐसे में वो प्रेस को अपने मनमुताबिक चलाना और हांकना चाहती है,और जो कलम या आवाज सच को जनता के सामने लाने का साहस करती है उसको प्रो0राय और शलभ की तरह सरकारी गुस्से का शिकार होना पड़ता है।

आंकड़ों का खंगाला जाय तो पूरे देश में ही पत्रकारों पर हमलों का आंकड़ा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। जेडे हत्याकाण्ड ने पूरे देश और पत्रकार बिरादरी को हिला कर रख दिया था। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो साल 2008 से लेकर जून 2011 तक देश में लगभग 181 पत्रकारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। दिसंबर 2010 में छत्तीसगढ़ में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक और जनवरी 2011 में नई दुनिया के पत्रकार उमे राजपूत, जुलाई 2010 में इलाहाबाद में इण्डियन एक्सप्रेस के पत्रकार विजय प्रताप सिंह, जुलाई 2010 में ही स्वतंत्र पत्रकार हेम चंद्र पाण्डेय की आंध्र प्रदेश में हुयी हत्याओं ने पूरे देश को यह सोचने को विवश कर दिया था कि क्या वास्तव में हम लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश का हिस्सा हैं।

प्रदेश में पत्रकारों का बोलना तो मायावती को अखर ही रहा है वहीं सरकार के विरोध में उठने वाले स्वर को दबाने के लिए सरकार ने सूबे में धरना,प्रदर्शन और आंदोलन की नियमावली बनाकर आम आदमी की आवाज को दबाने का कुत्सित प्रयास किया है। आज प्रदेश में सत्ताधारी दल के कई नेता अपना अखबार और पत्रिकाएं और चैनल चला रहे हैं।

राजधानी में पिछले दिनों शुरू हुये एक हिन्दी दैनिक को भी सत्ताधारी दल से जुड़ा बताया जा रहा है। सत्ताधारी दल से जुड़े अनेक प्रकाशन सरकारी विज्ञापनों के जरिये हर माह लाखो-करोड़ो की कमाई कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि सूबे में नयी-नवेली पत्र पत्रिकाओं की बाढ़ पिछले चार साल में आई है,लेकिन इन सब के बीच में पत्रकारिता कहीं खो या दब चुकी है।



स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक- सामाजिक मसलों के टिप्पणीकार.




 

 

आतंक की राजनीति की जद में फिर आया आजमगढ़


मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL)ने 13जुलाई को हुए मुंबई बम धमाकों की जांच पर मुंबई आतंकवाद निरोधी दस्ते के प्रमुख राकेश मारिया और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक बृजलाल के अंर्तविरोधी बयानों पर सवाल उठाया है। पीयूसीएल ने के प्रदेश संगठन सचिव शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा कि एक तरफ राकेश मारिया कह रहे हैं कि मुंबई एटीएस उत्तर प्रदेश भेजी जा चुकी है,वहीं बृजलाल कह रहे हैं कि मुंबई एटीएस नहीं आई है।


2007 धमाकों के आरोपी  का घर : ना जाने और कितने


 पीयूसीएल के मुताबिक अगर बृजलाल कहते हैं कि मुंबई एटीएस की कोई टीम यूपी नहीं आई है और मुंबई धमाकों का यूपी कनेक्सन नहीं मिला है,तब उन्हें मुंबई आतंकवाद निरोधी दस्ते के प्रमुख मारिया द्वारा लगातार आ रहे बयानों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्योंकि मुंबई एटीएस के यूपी आने और उसके द्वारा युवकों से पूछताछ और उठाने की खबर लगातार छापी जा रही है और इन खबरों का आधार मुंबई एटीएस और यूपी पुलिस और खूफिया विभाग हैं।

इसके साथ पीयूसीएल ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वो तत्काल कथित पुलिसिया और खूफिया स्रोतों द्वारा अखबारों में सांप्रदायिक मंशा से प्लांट की जा रही खबरों पर रोक लगाए। संगठन के मुताबिक दैनिक जागरण में आजमगढ़ से छपी खबर ‘एटीएस पहुंची आजमगढ़, एक को उठाया’ की सत्यता पर सवाल उठाया है। पीयूसीएल के मसीहुद्दीन संजरी,और तारिक शफीक ने कहा कि इस खबर के माध्यम से जिले में डर व दहशत का माहौल बनाने की कोशिश की गई है। संगठन  के  मुताबिक  हिंदी दैनिक अमर उजाला लखनऊ ने अपने १६ जुलाई के अंक में पहली लीड स्टोरी ‘‘संजरपुर के सैकड़ों मोबाइल फोन पर खूफिया निगाहें’’लगायी है,यह खबर न सिर्फ आजमगढ़ को बदनाम करने की शातिर कोशिश है बल्कि कई पहलुओं से तो हास्यास्पद भी बन गई है।

मसलन यह खबर अपने राजनीतिक और सांप्रदायिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए यहां तक कहती है ‘‘लखनऊ जेल में बद आईएम के आंतकी सलमान व तारिक कासमी से भी पूछताछ की गई है।’’ जबकि सच्चाई तो यह है कि सलमान जिसे कुछ महीनों पहले ही दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली विस्फोटों के आरोप से बरी कर दिया है और वह अब दूसरे आरोप में जयपुर की जेल में बंद है और जहां तक तारिक कासमी से पूछताछ की बात है तो उसकी सच्चाई यह है कि बकौल तारिक के ही उससे किसी ने इस मामले में पूछताछ नहीं की है। यह बात खुद तारिक कासमी से मिलकर आए उनके वकील और चर्चित मानवाधिकार नेता मो. शोएब ने इस झूठी खबर को पढ़ने के बाद पीयूसीएल की तरफ से जारी प्रेस नोट में कहा।

दरअसल कोर्ट ने यह पाया कि सलमान जिसे एटीएस ने उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर से गिरफ्तार करने का दावा किया था, के साथ पुलिस ने जिस नेपाली पासपोर्ट के बरामद होने का दावा किया था उसे वह कभी पेश नहीं कर पाई। दूसरे, पुलिस ने एक फर्जी फोटो स्टेट जिसमें सलमान की उम्र 27 साल दिखाई गई थी जबकि उसकी वास्तविक उम्र पन्द्रह साल थी को कोर्ट में पेश किया और तीसरे पुलिस ने सलमान के पास से जो सउदी अरब का हेल्थ कार्ड बरामद होने का दावा किया था वो भी फर्जी निकला।

कोर्ट ने पुलिस और एटीएस पर सलमान जैसे निर्दोष को फसाने के लिए पुलिसिया करतूतों की काफी आलोचना की और सख्त हिदायत दी कि पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाए। यहां दिलचस्प बात है कि सलमान की गिरफ्तारी के वक्त भी मीडिया द्वारा इन्हीं झूठे सुबूतों का पुलिंदा बनाकर उसकी एक खतरनाक छवि बनाने का प्रयास किया गया था। दरअसल सलमान के सहारे पुलिस और खूफिया एक मीडिया ट्रायल कर रहे हैं कि सलमान भले ही सुबूतों के आभाव में बरी हो गया है लेकिन वह आतंकवादी है।

यह राज्य की नीति  है कि वह अपने द्वारा अपने हितों के लिए पकड़े गए लोग जो न्यायालय से बरी भी हो गए हैं,उनको समाज में अस्वीकार बना दें। इसी खबर में कहा गया है कि सलमान जो की छोटी उम्र का है इसलिए उससे छोटी उम्र के लड़कों के बारे में जानकारी इकट्ठी की जा रही है के सहारे छोटी उम्र के आजमगढ़ के लड़कों पर जहां एक ओर मनोवैज्ञानिक रुप से दबाव बनाया जा रहा है। वहीं समाज के नजर में उन्हें एक संदिग्ध मुस्लिम पीढ़ी के बतौर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

आजमगढ़ के मुसलमानों के खिलाफ यह ऐसी साजिश बाटला हाउस के वक्त भी की गई थी जब 16साल के साजिद को बाटला हाउस (बाटला हाउस कांड को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी वेब साइट पर फर्जी मुठभेड़ो की लिस्ट में रखा है।)फर्जी मुठभेड़ में मारकर कांग्रेस ने आजमगढ़ के बच्चों पर यह आरोप मढ़ा कि वह आतंकवादी होते हैं। इस रणनीति से फायदा यह है कि हिंदुत्वादी दिशा अख्तियार कर चुके राजनीतिक माहौल में टेरर पालिटिक्स को लंबे समय तक जिन्दा रखा जा सकता है.