May 27, 2011

अग्निवेश की बात दूर तलक गयी

दो वर्ष पूर्व ग्लोबल वार्मिंग के चलते जब श्री अमरनाथ गुफा में यात्रा के समय प्राकृतिक रूप से शिवलिंग निर्माण नहीं हो सका फिर वहां नकली शिवलिंग बनाने की क्या ज़रूरत थी...

निर्मल रानी 
पिछले दिनों सामाजिक कार्यकर्ता और  बंधुआ मज़दूर मुक्ति आंदोलन के अगुवा स्वामी अग्निवेश  ने जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता सैय्यद अलीशाह गिलानी से हुई एक मुलाकात के दौरान अमरनाथ यात्रा पर अमर्यादित टिप्पणी कर डाली। उस  टिप्पणी   का  नतीजा  इस  रूप  में सामने आया   कि   गुजरात के अहमदाबाद  शहर  में  नित्यानद  नाम  के  संत  ने  उन्हें सरेआम  चांटा  मारा  और  उनकी  पगड़ी  उछाल  दी. संत नित्यानंद अग्निवेश की अमरनाथ यात्रा पर की गयी टिप्पणी से विचलित था.  

स्वामी अग्निवेश  ने अमरनाथ यात्रा को पाखंडपूर्ण आयोजन कऱार दिया था । उनका तर्क था कि दो वर्ष पूर्व ग्लोबल वार्मिंग के चलते जब श्री अमरनाथ गुफा में यात्रा के समय प्राकृतिक रूप से शिवलिंग  निर्माण नहीं हो सका फिर वहां नकली शिवलिंग बनाने  की क्या ज़रूरत थी? अग्निवेश ने इसे पाखंड का ही एक रूप  बताया।

इसमें कोई शक नहीं कि शिवलिंग की संरचना चाहे वह पत्थरों की हो या बर्फ की यह सभी आकृतियां प्राकृतिक रूप से ही गढ़ी जाती हैं। लिहाज़ा शिवलिंग अथवा किसी अन्य देवी-देवता की आकृति के निर्माण में प्रकृति के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन  प्रश्न यह है कि जिस जनमानस का गहन विश्वास अमरनाथ गुफा में बनने वाले शिवलिंग से जुड़ा  है उसे जागरुक करने के नाम  पर  भड़काने  की क्या  आवश्यकता है ?

ऐसे में जहां देश के लाखों श्रद्धालू अमरनाथ यात्रा के प्रति इतना भावुक, गंभीर व समर्पित रहते हों वहां स्वामी अग्रिवेश की अमरनाथ यात्रा के प्रति की गई टिप्पणी पर उन भक्तजनों का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। अग्निवेश   की इस अमर्यादित एवं आपत्तिजनक टिप्पणी ने कई अतिवादियों को भी प्रचारित होने को मौका दे दिया है। ऐसे ही किसी व्यक्ति ने अग्निवेश  का सिर क़लम किए जाने तथा ऐसा काम करने वाले को इनाम दिए जाने का फतवा भी दे दिया है। अदालतों में भी अग्निवेश के विरुद्ध इसी मुद्दे को लेकर मुकद्दमे दर्ज किए जाने के भी समाचार हैं।
धार्मिक यात्राओं के दौरान यदि आप वैष्णोंदेवी, बद्रीनाथ, केदारनाथ,अमरनाथ, गंगोत्री अथवा यमनोत्री जैसे प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों की ओर जाएं तो आप देख सकते हैं   कि कई भक्तजन दंडवत करने जैसी अति कष्टदायक मुद्रा में ही सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर अपने परम ईष्ट के समक्ष शीर्ष झुकाने पहुंचते हैं।

इसी  तरह  कहीं किसी समुदाय के लोग तलवारों व बर्छियों से अपनी छाती तथा पीठ पर वार कर इस कद्र लहू बहाते हैं कि पूरी ज़मीन रक्तरंजित हो जाती है। ईरान, इराक,पाकिस्तान तथा भारत जैसे कई देशों में शिया समुदाय के लोग दसवीं मोहर्रम के दिन अपने इमाम हज़रत इमाम हुसैन की याद में पूरी दुनिया में सैकड़ों टन खून बहा देते हैं। देखने वाला हो सकता है उनकी इस कुर्बानी को अंधविश्वास की संज्ञा दे।
लेकिन इस प्रकार सडक़ों पर खून बहाना,हुसैन की याद में खुद को घायल करना तथा रोना-पीटना व मातमदारी करना  हज़रत हुसैन के प्रति उनकी गहन श्रद्धा व भक्ति का एक अहम हिस्सा है। बेशक इस प्रकार के खतरनाक  तथा लहूलुहान कर देने वाले आयोजन में कई लोग अपनी जान भी गंवा बैठते हैं। परंतु इसके  बावजूद आस्थावानों का यही विश्वास होता है कि इस प्रकार से मरने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से स्वर्ग का ही अधिकारी है।

इसी प्रकार अन्य समुदायों व कबीलों में कोई लोहे की छड़ को अपनी जीभ के आर-पार  कर देता है तो कोई लोहे की छड़ों से अपने दोनों गालों को भेद डालता है। शरीर पर चोट व कष्ट पहुंचाने वाले इस प्रकार के सैकड़ों रीति-रिवाज पूरे विश्व में सदियों से प्रचलित हैं। यहां तक कि इन समुदायों व रीति-रिवाजों से जुड़े लोगों की यही ख्वाहिश होती है कि उनकी यह परंपराएं,रीति-रिवाज तथा धार्मिक विरासतें आगे भी हमेशा $कायम रहें। ऐसे लोग जो अपनी ऐसी धार्मिक परंपराओं के प्रति इस हद तक समर्पित हों वे आखिर  अपनी इन्हीं धार्मिक परंपराओं व रीति-रिवाजों के विरुद्ध एक भी शब्द कैसे सुन सकते हैं?

दुनिया अक्सर देखती रहती है कि कभी कुरान शरीफ को जलाए जाने की घटना को लेकर विश्वव्यापी विरोध प्रदर्शन किए जाने की खबरें आती हैं तो कभी कुछ सिरफिरे लोग पैगम्बर का कार्टून बनाकर मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम करते हैं। पिछले दिनों आस्ट्रेलिया में एक फैशन शो में भारतीय देवी-देवताओं के चित्रों को  लेडीज़ बिकनी,ब्रा व चप्पलों पर उकेरा हुआ देखा गया। ऐसी घटनाएं पहले भी कई बार हो चुकी हैं। मकबूल फि़दा हुसैन जैसे प्रतिष्ठित भारतीय पेंटर स्वयं धार्मिक भावनाएं भडक़ाने वाली एक पेंटिंग को लेकर विवादों में घिर चुके हैं। क्या किसी भी विश्वास व धर्म के लोगों की भावनाओं को इस प्रकार से ठेस पहुंचाने को हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर ऐसी बातों को दरगुज़र या नज़रअंदाज़ कर सकते हैं?

पिछले दिनों अन्ना हज़ारे ने जनलोकपाल विधयेक संसद में लाए जाने की मांग को लेकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब आंदोलन छेड़ा उस समय स्वामी अग्रिवेश को पूरे देश ने अन्ना हज़ारे के खास सहयोगी के रूप में देखा। इसके पूर्व भी अग्निवेश  को पूरा देश एक समर्पित,गरीबपरवर, मज़दूरों व दीन-दुखियों के हितैषी तथा एक वास्तविक त्यागी के रूप में जानता, मानता व पहचानता है। अंधविश्वास का विरोध करने वालों के रूप में भी उनकी पहचान बन चुकी है। परंतु किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणी कर अग्निवेश   विवादों में घिर गए हैं  और  उनपर  गुजरात  के  एक महात्मा  ने  हमला  किया  है . 

बेहतर होता यदि अग्निवेश  जैसा साफ-सुथरी तथा बेदाग छवि का व्यक्ति ऐसी अमर्यादित टिप्पणी न करता. और यदि उन्होंने ऐसा कह भी दिया है तो एक योगी होने के नाते उन्हें स्वयं ऐसी अशोभनीय टिप्पणी के पर क्षमा मांग लेनी चाहिए.


 लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.


प्रचंड ! कल की सुबह साँझ की या उजाले की

मोहन वैद्य  का पक्ष  है कि यहाँ से नेपाल की राजनीती को आगे ले जाने का रास्ता खुलता है. वे इसे अवसरों से भरी चुनौती मानते है जबकि प्रचंड इसे प्राणघाती समझते है...

विष्णु शर्मा

नेपाल की संविधान सभा का कल  28  मई को पूरा हो रहा कार्यकाल बढ जाना तय है,लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि   यह किन शर्तो पर होता है. हालत लगभग पिछले साल जैसी ही है.सत्ता पक्ष कार्यकाल बढाना चाहता है और विपक्ष इसके लिये  तैयार नहीं है. फर्क 'सिर्फ' इतना है कि इस बार कांग्रेस प्रतिपक्ष में है.

ये शहादतें अब किस सपने के लिए                            फोटो - अजय प्रकाश

कांग्रेस की शर्त है कि माओवादी अपने लड़ाकुओं के समायोजन का एक निश्चित प्रस्ताव पेश करें  और साथ ही तात्कालिक तौर पर हथियारों को सरकार के सुपुर्द कर दें. लड़ाकुओं के समायोजन का कांग्रेस का प्रस्ताव वही है जो हाल में सेना ने प्रस्तुत किया था. इसके तहत पुलिस, सेना और माओवादी जनसेना की एक मिलेजुले दस्ते का निर्माण किया जायेगा और इस दस्ते को आंतरिक विकास कार्य का जिम्मा दिया जाएगा. दस्ते में माओवादी लाड़ाकों की संख्या अभी तय नहीं की गयी है लेकिन माना जा रहा है कि यह संख्या 5000 से 8000 के बीच होगी.

इसका मतलब है कि लगभग 15000 लाड़ाकों को माओवादी पार्टी को छोड़ना होगा. माओवादी पार्टी के अध्यक्ष प्रचंड के पिछले कुछ समय के बयानों को देखे तो ऐसा लगता है कि वे इस प्रस्ताव से सहमत है,लेकिन पार्टी के दुसरे बड़े नेता और उपाध्यक्ष मोहन वैद्य  इसके खिलाफ लगातार बोलते रहे है.उनका मानना है कि माओवादी सेना की कमांड पार्टी के हाथ में होनी चाहिए और साथ ही इसका जिम्मा सीमा सुरक्षा का होना चाहिए.प्रचंड के सामने मुश्किल यह है कि यदि वे कांग्रेस के प्रस्ताव को मान लेते है तो वह पार्टी को नहीं बचा सकते. और यदि वे नहीं मानते तो संविधान सभा को.

प्रचंड के लिए संविधान सभा पार्टी से ज्यादा अहम है और इस आशय का बयान उनके निकट माने जाने वाले केंद्रीय सदस्य हरिबोल गुजुरेल ने दिया भी है जब उन्होंने कहा कि 'अध्यक्ष जोखिम भरा निर्णय ले सकते है'. ऐसे में सवाल यह है कि अगर कार्यकाल नहीं बढता तब नेपाल का राजनीतिक भविष्य का क्या होगा? माना जाता है कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति सत्ता अपने हाथ में ले सकते है. चूँकि अंतरिम संविधान में ऐसी किसी स्थिति का उल्लेख नहीं है इसलिए राष्ट्रपति के इस कदम को 'कू' के रूप में देखा जाएगा. यह स्थिति  माओवादियों पर अधिक असर डालेगी और  उन्हें इसके खिलाफ आन्दोलन में जाना पड़ेगा.यानि वे शांति समझौते के पहले जैसी स्थिति में पहुँच जायेंगे और ठीक यही वह परिस्थिति है जिस पर माओवादी नेतृत्व में विवाद है.

मोहन वैद्य  का पक्ष  है कि यहाँ से नेपाल की राजनीती को आगे ले जाने का रास्ता खुलता है. वे इसे अवसरों से भरी चुनौती मानते है जबकि प्रचंड इसे प्राणघाती समझते है.उनका मानना है कि इस तरह अब तक  प्राप्त की गई उपलब्धियां संकट में पड़ती है और पार्टी के सामने वैधता का संकट पैदा होता है.लेकिन वे इस बात का उत्तर नहीं देते कि पार्टी को किसकी वैधता चाहिए? यदि उनका इशारा पश्चिम के अपने पडोसी भरता की ओर है तो फिर नेपाल के दस साल के जनयुद्ध का औचित्य नहीं रह जाता.

सवाल यह भी है कि अगर  वैधता इतनी जरूरी चीज़ है तो फिर राजतन्त्र और गणतंत्र में फर्क क्या रह जाता है?  इस लिहाज़ से आज नेपाल की माओवादी पार्टी के सामने राजनीतिक और वैचारिक संकट दोनों है. कांग्रेस और अन्य दलों के लिए अपनी बात मनवाने का यह सबसे अच्छा समय है और वे यहाँ चुकेंगे ऐसा नहीं लगता.चाहे जो भी हो इस बार का 28मई माओवादियों की असल हार को (यदि वे कांग्रेस की शर्तों को स्वीकार करते है) दिखा ही देगा, जिसे वे अब तक छिपाते आये है.




और दलित बध का सिलसिला कभी नहीं थमा


मैंने पत्रकारों द्वारा किये जा रहे इस कृत्य का विरोध किया, लेकिन मेरी ज़बान और कलम दोनों को रोक दिया गया। पत्रकारों और पुलिस के इस बेमेल गठजोड़ ने दो परिवारों के घरों की खुशियां चन्द मिनट में ही छीन लीं...  किस्त 2

सोनभद्र से विजय विनीत  

गौरतलब है कि यह घिनौना और नृंशस कार्य केवल पुलिस की ही उपज नहीं थी  । इसके लिये जिले के पत्रकारों के एक वर्ग ने पुरज़ोर तरीके से पुलिस का साथ दिया था। यह सच इस फैसले के बाद उजागर हुआ है। पुलिस अधीक्षक ने मुठभेड़ के पहले रेनुकूट के एक अतिथिगृह में कुछ पत्रकारों के साथ बैठक कर उनसे मुठभेड़ में इन दोनों युवकों को मारने के लिये सहयोग की अपील की थी। इनमें से कुछ पत्रकारों ने दोनों युवकों को गोली मारने की हामी भी भरी थी।

इस घटना का मैं खुद चश्मदीद गवाह हूं। मैंने पत्रकारों द्वारा किये जा रहे इस कृत्य का विरोध किया, लेकिन मेरी ज़बान और कलम दोनों को रोक दी गयी. पत्रकारों और पुलिस के इस बेमेल गठजोड़ ने दो परिवारों के घरों की खुशियां चन्द मिनट में ही छिन लीं। वह कलम जो अन्याय का विरोध करने की क्षमता रखती थी, स्वयं खूनी बन गयी। तब मुझे लगा था कि हमारे जैसे लोगों के हाथ में रहते हुए पहली बार कलम हार गयी थी। चाहकर भी किसी बड़े अखबार ने घटना की सच्चाई उजागर नहीं की थी। फिर भी पत्रकारों के इस घिनौने कृत्य को इलाहाबाद से छपने वाले एक साप्ताहिक अखबार ' न्यायाधीश' ने मेरी रिर्पोट को छापा।

यह पहली बार हुआ है कि रनटोला मामले में सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए इतने अहम फैसले के बाद मानवाधिकार संगठनों,  बुद्धिजीवियों,  प्रगतिशील समुदायों की तरफ से यह मांग उठाई जा रही है कि उन पत्रकारों को भी तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के साथ सह अभियुक्त बनाया जाये, जिन्होंने उस बैठक में हिस्सा लिया था जहां दो मासूमों की हत्या करने का फैसला हुआ। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वर्तमान में सोनभद्र के पड़ोसी जिले मीरजापुर में तैनात है। मगर इस मुद्दे पर वह मीडिया से कोई बात नहीं करना चाहते।

मृतक प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव इस फैसले पर खुश हैं,लेकिन इसे वह आधी जीत बताते हैं। उनका कहना है कि जब तक तत्कालीन एसपी को सज़ा नहीं होगी तब तक वे चैन से नहीं बैंठेगे, न ही उनके बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी। इस मुठभेड़ में दोषी अधिकारियों और पत्रकारों को सज़ा मिलने से लल्लन प्रसाद के बेटे की आत्मा को तो शांति मिलेगी, लेकिन जिले के ही   ऐसे सैकड़ों मां-बाप को कब शांति मिलेगी जिनके बच्चों को भी यहां की पुलिस ने बेरहमी से मुठभेड़ दिखा मौत के घाट उतार दिया।

रनटोला मुठभेड़ तो मात्र एक नमूना है सोनभद्र पुलिस के चाल, चलन और चरित्र का। इस इलाके में इस तरह की ऐसी पचासों मुठभेड़ें  हुई हैं, जिनमें  पुलिस ने दलितों और आदिवासियों  को गोलियों से भून डाला। यह हत्यायें अति नक्सल प्रभावित सोनभद्र,चन्दौली और मीरजापुर जिले में तथाकथित माओवादियों को मार गिराने के नाम पर हुई हैं। इन तीनों जिलों में आदिवासी -दलित काफी संख्या में हैं। एक समय में इन जंगलों पर जिन आदिवासियों का राज हुआ करता था,आज वही शोषण, उत्पीड़न के  शिकार हैं।

इस इलाके में जितनी संख्या दलित-आदिवासियों की है,उससे कहीं अधिक संख्या उनके उत्पीड़न, शोषण और अन्तहीन दुःख-दर्द की है। जब इस शोषण,उत्पीड़न और अपने हकों को लेकर दलित-आदिवासी अपनी आवाज़ बुलंद करने लगे तो उन्हें नक्सली करार देकर उनके तमाम हकों को छीनने और जनवादी ताकतो को समाप्त करने का काम किया गया।

पिछले एक दशक से इस समूचे आदिवासी इलाके में हजारों निरीह सत्तापोषित कुचक्र का शिकार बने हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ सरकारें बदलती रहीं, उनका नजरिया और कार्यप्रणाली एक जैसे रहे। प्रदेश की बागडोर भाजपा, सपा व बसपा के बीच हस्तांतरित होती रही। मुख्यमंत्री के रूप में रामराज की बात करने वाले राजनाथ सिंह,दलितों की शुभचिंतक मायावती और समाजवाद के पोषक मुलायम सिंह प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते रहे। मगर किसी भी सरकार के कार्यकाल में दलित बध का सिलसिला रूका नहीं।

इसके साथ ही अनेक परिवारों पर नक्सलियों का शरणदाता होने का आरोप लगा। किसी घर में अगर हथियारबन्द दस्ते के लोगों ने जबरिया घुसकर खाना खाया तो वह भी जेल गया। इन सरकारों के कार्यकाल में पुलिसिया कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया। जिसने पुलिस की मुखबिरी नहीं की, उसके परिवार की महिलाओं और लड़कियों  को नक्सली बताकर जेल भेजा गया। शायद सोनभद्र प्रदेश का पहला ऐसा जिला होगा,  जहाँ जनवादी तरीके से हक-हकूक की बात करने वाली महिलाओं पर रासुका और गैंगेस्टर की कार्यवाही हुई।

फर्जी मुठभेड़ों का यह सिलसिला वर्ष 2001 से शुरू हुआ। सोनभद्र पुलिस ने 21 जनवरी 2001 को पन्नूगंज थाना क्षेत्र के खदरा गांव से रामेश्वर नामक दलित युवक जो अपनी ससुराल आया था,को उठाकर धंधरौल बांध के पास गोली मार दी। इस पर भाकपा (माले) ने एक पखवाड़े तक जिला मुख्यालय पर क्रमिक अनशन किया। उस समय बहुजन समाज पार्टी ने भी इस मुद्दे पर खूब  हो-हल्ला मचाया। अभी यह शोरगुल थमा भी नहीं था कि सोनभद्र पुलिस ने चन्दौली के एक किसान नेता गुलाब हरिजन को चुर्क पहाड़ी पर 8 फरवरी 2001 को मुठभेड़ में मार गिराया।

गुलाब के मारे जाने से सोनभद्र, चन्दौली और मीरजापुर के लोग भौचक्के रह गये। गुलाब इन जिलों में जनवादी किसान नेता के रूप मे जाने जाते थे। वह जिला पंचायत का चुनाव भी लड़ चुके थे। पुलिस ने उनका सम्बन्ध माओवादी संगठन से होना बताया। इस पर भाकपा (माले) के तत्कालीन राज्य सचिव कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिह ने पुलिस को माओवादियों और गुलाब के सम्बन्ध उजागर करने की चुनौती दी थी। बसपा सरकार के वर्तमान मंत्री इन्द्रजीत सरोज राबर्ट्सगंज सदर तहसील में आयोजित इस धरने में शामिल हुये थे।

वर्तमान विधायक सत्य नारायण जैसल, पूर्व विधायक परमेश्वर दयाल, भदोही के पूर्व सांसद नरेन्द्र कुशवाहा, रमेश वर्मा, जिलाध्यक्ष बसपा समेत तमाम कार्यकर्ताओं ने रामेश्वर की मुठभेड़ को हत्या बताया था और इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के नाम पत्र लिखकर पूरे घटनाक्रम  की सीबीआई जॉंच की मांग की गयी थी। लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा इन मुठभेड़ों की जांच करने की कोई भी कार्यवाही में नहीं की गई। इसके बाद तो मानो  पुलिस को फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देने लाईसेंस मिल गया। 

वर्ष 2002 में मीरजापुर के भवानीपुर में तीनों जनपदों की पुलिस ने होलिका दहन के दिन 16 दलितों और आदिवासियों को नक्सली बताकर उनके खून से होली खेली। जिन डेढ़ दर्जन लोगों को पुलिस ने निर्ममता से गोली मारी उसमें एक 11वर्षीय बालक कल्लू भी था। मारे गये लोगों में पुलिस रिकार्ड में खूंखार नक्सली के रूप में देवनाथ और लालब्रत का भी नाम शामिल था। पुलिस ने सभी शवों का आनन-फानन में मीरजापुर में परीक्षण कराया। इसलिये शव परिजनों को न सौंपकर गंगा नदी के हवाले कर दिये गये।

सके बाद पुलिस ने दस मृतकों के नामों की सूची जारी की और शेष को अज्ञात बताया। इस सूची मे जिस सुरेश बियार को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था, उसने घटना के एक सप्ताह बाद यानी  14 मार्च 2002 को मीरजापुर कचहरी में भवानीपुर हत्याकाण्ड के विरोध में बुलाई गयी सभा में उपस्थित होकर पुलिस को अपने जिन्दा होने का सबूत दिया। इसके बाद तो पीयूसीयूएल ,पीयूएचआर ,पीयूडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों ने इस मुठभेड़ की परतें और पुलिस की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी थी। 


विजय विनीत  उन पत्रकारों में हैं,जो थानों पर नित्य घुटने टेकती पत्रकारिता के मुकाबले विवेक को जीवित रखने और सच को सामने लाने की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं.





किस्त 1 -  फर्जी मुठभेड़ के 14 बहादुरों को आजीवन कारावास



फर्जी मुठभेड़ के 14 बहादुरों को आजीवन कारावास


पिछले वर्ष  उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले की अदालत ने फर्जी मुठभेड़ में शामिल 14 पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा देकर न्याय और समाज, दोनों की दृष्टि में महत्वपूर्ण काम किया. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए  हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने फर्जी मुठभेड़ों में शामिल पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा देने की सिफारिश की है. ऐसे  में 'रनटोला  मुठभेड़' को लेकर  सोनभद्र की अदालत द्वारा दिया गया फैसला फर्जी मुठभेड़ों में अपने परिजनों और नेताओं को गवां चुके लोगों और संगठनों के लिए मील का पत्थर साबित होगा. इसी उम्मीद से जनज्वार  डॉट कॉम  रनटोला  मुठभेड़ कांड समेत  इस क्षेत्र में हुए अन्य मुठभेड़ों में चली और चल रही लम्बी जाँच, एक के बाद एक आये नए मोड़ और अंत में परम्परा  से हटकर (रनटोला) मामले में हुए  फैसले की विस्तृत रिपोर्ट चार  किस्तों  में प्रकाशित कर रहा है...मॉडरेटर

पुलिसिया मुठभेड़ की कहानी किसी भी परिस्थिति में विश्वास किये जाने योग्य नहीं थी। दोनों मृतकों को आयी चोटों से साबित हो गया कि केवल 10-15 फीट की दूरी से गोली चलायी गयी थी। अतः10-15 फीट की दूरी पर मौजूद ऐसी पुलिस टीम जिसके पास ए.के.47 एवं एस.एल.आर.जैसे असलहे हों, पर दो बदमाश जिनके पास एक देशी कट्टा और 303 बोर का कट्टा हो, द्वारा हमला करने की कल्पना नहीं की जा सकती...

सोनभद्र से विजय विनीत

एक वर्ष पहले देश में जब रूचिका छेड़छाड़ मामले में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एस.के.राठौर चर्चाओं में थे और उनके द्वारा किये गये घिनौने कुकृत्य की देश भर में भर्त्सना की जा रही थी, उसी समय उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में छः वर्ष पूर्व हुई मुठभेड़ को स्थानीय फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फर्जी करार देते हुए उसमें शामिल 14पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। इस फैसले से पूरे देश में एक बार फिर पुलिस की वर्दी शर्मसार और खून के छींटों से लाल हुई, वहीं न्यायालय के प्रति भी लोगों का विश्वास बढ़ा।

इससे न्याय प्रक्रिया और जनवादी ताकतों की जीत हुई। सोनभद्र की अदालत के इस फैसले ने सिर्फ रनटोला मुठभेड़ ही नहीं,बल्कि तमाम मुठभेड़ों पर सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में देश में  प्रथम पायदान पर है। सोनभद्र में हुई यह मुठभेड़ कोई पहली घटना नहीं थी,जिस पर उंगली उठी हो। जौनपुर के वर्तमान बसपा सांसद धनंजय सिंह को भदोही पुलिस ने चार बदमाशों समेत आठ वर्ष पूर्व मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। इसी तरह मीरजापुर जिले के भवानीपुर में 9 मार्च 2001 को 16 लोगों को पुलिस ने मारा था और कहा था कि मारे गये सभी नक्सली थे। इसमें जिस खूंखार नक्सली देवनाथ,लालब्रत,सुरेश,को पुलिस ने ढेर दिखाया था,वह सभी जीवित निकले। उस मुठभेड़ की जॉंच सीबीआई कर रही है।

सोनभद्र उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक अशिक्षित और पिछड़े जनपदों में शुमार है। पिछले एक दशक से यह जिला प्रदेश के अति नक्सल प्रभावित जिलों में भी शामिल हो गया है। देश का यह पहला जनपद है जिसकी सीमाएं चार-चार राज्यों बिहार,झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से लगती है। यह जिला ऊर्जा राजधानी के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यहां देश की सर्वाधिक बिजली पैदा की जाती है। वहीं दूसरी ओर यही जिला देश का सबसे गरीब,पिछड़ा और भूमि विवादों में सबसे ऊपर है, जहां सर्वाधिक आबादी आदिवासियों की है।

सोनभद्र में 2 सितम्बर 2003 को पिपरी थाना क्षेत्र के रनटोला के जंगल में खुद को जांबाज़ कहने वाली पुलिस ने दो युवकों को लुटेरा बताकर मुठभेड़ में मार गिराया था। मारे गये दोनों युवक पड़ोसी प्रान्त झारखण्ड के गढ़वा जनपद के मेराल कस्बे के रहने वाले थे। इसमें एक प्रभात कुमार श्रीवास्तव उर्फ अरूण इलाहाबाद में बीए प्रथम वर्ष का छात्र था। उसके पिता लल्लन प्रसाद श्रीवास्तव राजकीय माध्यमिक विद्यालय मेराल में प्रधानाचार्य थे। दूसरा युवक रमाशंकर साहू पुत्र बंशीधर साहू था। दोनों युवक एक ही गॉंव के थे।
फर्जी मुठभेड़ में मारे  गए प्रभात और रमाशंकर
इस मुठभेड़ के बाद मानवाधिकार संगठन पीयूएचआर, भाकपा माले, राष्ट्रीय वन श्रमजीवी मंच समेत तमाम जन संगठनों ने इस फर्जी मुठभेड़ की जांच की आवाज तेज़ की। मारे गये छात्र प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव ने भी उच्च न्यायालय,मानवाधिकार आयोग समेत कई जगह गुहार लगाई। अन्ततः उनकी फरियाद रंग लायी और तत्कालीन जिलाधिकारी ने मजिस्ट्रेट जॉंच का आदेश ज़ारी कर दिये। मजिस्ट्रेट जांच अपर जिलाधिकारी ने की, जिन्होंने सर्वप्रथम मुठभेड़ स्थल देखा और फिर उन तमाम पहलुओं का बारीकी से निरीक्षण किया जिसने इस मुठभेड़ को अंजाम दिया।

पोस्टमार्टम की रिर्पोट पर अध्ययन करने पर उन्होंने अपनी रिर्पोट में लिखा कि शरीर पर जिस तरह से गोली के निशान बने हुये हैं, वह 60 से 70 फीट से चलाई गयी गोली से नहीं बन सकते हैं, बल्कि गोली बहुत ही पास से चलाई गई। अपर जिलाधिकारी की यही रिर्पोट सीबीसीआईडी के जांच का आधार बनी।

पुलिस ने मुठभेड़ की कहानी में दर्शाया था कि लुटेरे लूट के बाद उसी स्थान पर माल बांटने आये थे। माल बांटने के लिए वह फुसफुसाहट में बातचीत कर रहे थे, जिसे 60-70 फीट की दूरी से सुना गया। उनकी फुसफुसाहट सुनकर जब पुलिस ने उन्हें देखा और आत्मसमर्पण के लिए कहा तो लुटेरों ने फायर शुरू कर दिया। आत्मरक्षार्थ पुलिस ने भी गोली चलायी, जिससे दोनों युवक मारे गये।

अपर मजिस्ट्रेट ने 17 जनवरी 04 को अपनी जाँच आख्या में लिखा था कि कथित बदमाशों को पकड़ कर लाया गया था और बाद में मुठभेड़ में मारा गय। इसी खुलासे के बाद जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गयी। जॉंच के दौरान मुठभेड़ से सम्बन्धित तमाम पहलुओं पर विचार किया गया। जांच दल मारे गये दोनों युवकों के पिता और उन तमाम लोगों से मिले जहां से इस घटना से सम्बन्धित बातें जुड़ी थी।

जांच के बाद सीबीसीआईडी के निरीक्षक ने घटना से सम्बन्धित थाना क्षेत्र पिपरी में 21फरवरी 2006 को 15 पन्द्रह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए हत्या समेत विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करा दी। इसमें दुद्धी कोतवाली क्षेत्र के तत्कालीन एसएसआई जयनाथ मिश्र, बभनी थानाध्यक्ष रामेश्वर नाथ, बीजपुर थानाध्यक्ष कमलेश्वर प्रताप सिंह, चौकी इंचार्ज म्योरपुर राजेश कुमार सिंह, कांस्टेबल राजेश सिंह , केश बिहारी, शाहजहां खॉं, अशोक कुमार, प्रमोद कुमार, दिनेश, सतीश कुमार, चन्द्रिका यादव, राणा प्रताप सिंह, शिवशंकर सिंह और रविन्द्रनाथ मौर्य शामिल थे।

सीबीसीआईडी द्वारा दर्ज करायी गयी प्राथमिकी में उल्लेख किया गया कि मारे गये युवक प्रभात कुमार,रमाशंकर और दो अन्य युवक रामप्रवेश तथा जयशंकर झारखण्ड से ट्रेन पकड़कर अपनी रिश्तेदारी में जा रहे थे। झारोखास रेलवे स्टेशन पर रेल की क्रासिंग होने के कारण जब ट्रेन रूकी, इसी बीच पुलिस वहां पहुंच गयी और इन्हें पकड़ लिया। पुलिस रामप्रवेश और जयशंकर को पुनः बस में बैठाकर वहां से 50किमी दूर डाला चौकी पर ले गयी,जहां से बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। प्रभात और रमाशंकर को ट्रेन से 25 किमी दूर रेनुकूट लाया गया। फिर रेनुकूट से 9 किमी दूर रनटोला के जंगल में इस मुठभेड़ को अंजाम दिया गया।

अपराध शाखा की विवेचना से भी मृतक प्रभात कुमार और रमाशंकर को झारोखास रेलवे स्टेशन से पकड़कर ले जाने की बात प्रमाणित हुई है जिससे पुलिस द्वारा बनायी गयी मुठभेड़ की कहानी फर्जी पायी गयी। इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद एक-एक कर 14 पुलिसकर्मियों ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि एक दरोगा जयनाथ मिश्र अदालत का फैसला आ जाने के एक साल बाद भी फरार चल रहे हैं।

इस पूरे मामले में कुल 16 गवाहों का बयान हुआ। 4 जनवरी 2010 को अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट का कक्ष खचाखच भरा हुआ था। परिसर में भी मीडियाकर्मी व तमाम लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे। सभी को इस चर्चित काण्ड के फैसले का इन्तजार था। न्यायाधीश ने जैसे ही सभी नामजद पुलिसकर्मियों पर अपराध साबित किया, मृतक के पिता लल्लन प्रसाद की ऑंखों से ऑंसू निकल पड़े, वहीं अदालत में मौजूद कुछ पुलिसकर्मी फफककर रो पड़े। शायद उन्हें अपने किये का आभास हो चुका था।

इस मामले में अदालत ने सभी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सुनाई। गोली चलाने वालों पर एक-एक लाख तथा अन्य पर 50.-50 हजार रूपये का अर्थदण्ड भी लगाया। आजीवन कारावास के दौरान तीन साल सश्रम कारावास की सजा भी सुनाई गयी। रनटोला फर्जी मुठभेड़ मामले में अपने फैसले में सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट ने यह साफ लिखा है 'कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह साबित है कि उक्त चारों व्यक्तियों को एक साथ पकड़ा गया था तथा दोनों मृतकों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। मुठभेड़ स्थल से दोनों मृतकों को आयी चोटें यह साबित कर रही हैं कि जिस तरह से पुलिस मुठभेड होना बता रही है, वह फर्जी है।
जाहिर है पुलिसिया मुठभेड़ की कहानी किसी भी परिस्थिति में विश्वास किये जाने योग्य नहीं थी। दोनों मृतकों को आयी चोटों से साबित हो गया कि केवल 10-15 फीट की दूरी से गोली चलायी गयी थी। अतः10-15 फीट की दूरी पर मौजूद ऐसी पुलिस टीम जिसके पास ए.के.47 एवं एस.एल.आर.जैसे असलहे हों, पर दो बदमाश जिनके पास एक देशी कट्टा और 303 बोर का कट्टा हो, द्वारा हमला करने की कल्पना नहीं की जा सकती।

परिस्थितियां यह साबित कर रही थीं  कि पुलिस ने सुनियोजित ढंग से मृतकों की हत्या की। आरोपी पुलिसकर्मियों ने अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत न कर अपने आत्म बचाव के तर्कों को साबित नहीं किया । इससे न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वाकई दिनांक 02-09-03को रनटोला के जंगल में जो पुलिस मुठभेड़ बतायी जा रही है, वह मुठभेड़ फर्जी थी। यही नहीं सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी करने के दृष्टिकोण से पुलिस की जी.डी.में भी उलटफेर किया । इस मामले पर न्यायाधीश ने गंभीर टिप्पणी करते हुए लिखा कि ''अभियुक्तों द्वारा कारित यह कृत्य घोर निन्दनीय एवं गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। जब रक्षक ही भक्षक हो जायेगा तो जन सामान्य की सुरक्षा व्यवस्था असंभव हो जायेगी तथा जन सामान्य का विश्वास इस एजेन्सी से उठ जायेगा।'

सीबीसीआईडी के लोक अभियोजक में तो अपनी मांग में कहा था कि जिस संस्था पर जन सामान्य की रक्षा करने का दायित्व है, उसी के द्वारा दो लोगों को पकड़कर उनकी हत्या की गयी है, इस तरह से इन दोषी अभियुक्तो को मृत्युदण्ड से कम सज़ा नहीं देनी चाहिये। अब जब मुठभेड के लगभग छः साल बाद यह फैसला आया है और दोषी पुलिसकर्मियों को सजा हो गयी है,तो तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के. सत्यनारायणा पर भी हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है।

विजय विनीत जैसे पत्रकार  देश के उन पत्रकारों में हैं,जो  थानों पर नित्य घुटने टेकती पत्रकारिता के मुकाबले  विवेक को जीवित रखने  और सच को सामने लाने की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं.





May 26, 2011

चुटका परमाणु संयंत्र के खिलाफ आदिवासी-किसान

एक बार वे बरगी बांध के लिये विस्थापन का दंश भोग चुके है और अब दूसरी बार उन्हें फिर विस्थापित किया जा रहा है जो उनकी सहन सीमा से बाहर है.उनका कहना है कि बरगी बांध निर्माण के दौरान विस्थापन के बाद से वे अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हैं...

        
चैतन्य भट्ट 

तकरीबन पच्चीस साल से भी ज्यादा के उहापोह के बाद जबलपुर से 60 किलोमीटर दूर मंडला जिले की सीमा में बरगी बांध के जलग्रहण क्षेत्र के नर्मदा तट पर बसे गावं  चुटका में दो हजार मेगावाट के प्रस्तावित परमाणु बिजली घर पर एक बार फिर शनि का साया पडता नजर आ रहा है.मंडला और सिवनी जिलों के पचास से अधिक गांवों में रहने वाले किसानों ने जिनमें बडी संख्या में आदिवासी शामिल है ने किसी भी हालत में अपना घर,आंगन और खेत छोडने से इंकार कर दिया है.इन किसानों ने संकल्प लिया है कि वे मर जायेंगे पर अपनी जमीन परमाणु बिजली घर के लिये नहीं देंगे.किसानों और आदिवासियों के इन तेवरों ने जिला प्रषासन के साथ साथ ‘न्यूक्लियर पॉवर  कॉरपोरेषन ऑफ इंडिया’ भी सकते में आ गई है.

आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला रोड पर टिकरिया से 27किलोमीटर दूर बरगी बांध रिजरवायर के किनारे बसे ग्राम चुटका और कुंडा के बीच 700- 700 मेगावाट की दो इकाईयां लगनी हैं। 20 हजार करोड़ लागत वाले इस परमाणु बिजली घर के लिये 3000एकड़ जमीन की आवश्यकता ता होगी जिसके लिये मंडला जिला प्रशासन के सहयोग से ‘न्यूक्लियर  पॉवर कारपोरेशन’ने सर्वे का काम भी शुरू किया था.जिसका स्थानीय स्तर पर वहां के लोगों ने विरोध किया,लेकिन सर्वे का काम जारी रहा.तब इससे नाराज होकर गांव वालों ने इकठ्ठे होकर सर्वे करने वाली टीम को खदेड़ दिया.

चुटका में परमाणु बिजली घर के लिये तीन हजार एकड़ जमीन के अधिग्रहण के लिये तेजी लाने के उददेष्य से न्यूक्लियर पावर कारपोरेषन ने जैसे ही नये साल के पहले दिन जबलपुर में अपना दफतर खोला उसके तीसरे ही दिन ‘भारत नवनिर्माण जनक्रांति’के बैनर तले मंडला और सिवनी जिले के 54 गांवों के किसानों और आदिवासियों ने इकठ्ठे होकर अपनी जमीन देने से साफ इंकार करते हुये यह संकल्प लिया कि भले ही उनकी जान चली जाये पर वे अपनी एक बीता जमीन भी परमाणु बिजली धर के लिये नहीं देंगे.

हजारों किसानो और आदिवासियों की इस भारी भीड ने शासन प्रशासन के अलावा परमाणु बिजली घर की स्थापना से जुडी तमाम एजेन्सियों को चिन्ता में डाल दिया है इस संबंध में ‘भारत नव निर्माण जनक्रांन्ति’के संस्थापक आदर्श  मुनि त्रिवेदी का कहना है कि अधिग्रहित कियेजाने वाले दो जिलो के समस्त 54 गांव कृषि योग्य 35 हजार हेक्टेयर भूमि विषाल प्राकृतिक  वन को तबाह किया जा रहा है वे सभी संविधान की 5वी अनुसूचि के अन्तर्गत आने वाले क्षेत्र है जिनमें आदिवासियों को सुरक्षा, उनकी जमीन, जंगल, और जल को बचाने की संवैधानिक गारंटी प्राप्त है त्रिवेदी कहते हैं कि बरगी बांध के विस्थापन के बाद उनका दोबारा विस्थापन भारत के संविधान पर तथाकथित विकास के नाम पर अरबो रूपयों की काली कमाई का सपना देखने वाले ठेकेदारों,दलालों और राजनैतिक व्यक्तियों का सीधा सीध हमला है जिसे वे हर कीमत पर रोकने के लिये संकल्प ले चुके हैं .

केन्द्र सरकार के परमाणु उर्जा विभाग ने सन् 1984 में राज्य में दो हजार मेगावाट उत्पादन क्षमता के परमाणु विद्युत संयत्र को सैद्वान्तिक रूप से विचारार्थ स्वीकार करते हुये उपयुक्त स्थल के खोज की प्रक्रिया शुरू की थी.उस वक्त इसकी अनुमानित लागत दो सौ करोड़ रूपये के आसपास थी. मध्यप्रदेष विद्युत मंडल के ‘सर्वेक्षण और अनुसंधान केन्द्र’’ने इस केन्द्र की स्थापना के लिये षिवपुरी जिले के किसलौनी गांव के राजपुर  और जबलपुर के निकट चुटका गांव को उपयुक्त ठहराया. सर्वेक्षण टीम ने इन स्थानों के बारे में अपनी रिपोर्ट ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ और ‘परमाणु उर्जा आयोग’को भेजी.इस रिपोर्ट के आधार पर भाभा अनुसंधान केंद्र की एक टीम ने सन 86 में प्रस्तावित स्थलों का दौरा किया.चूंकि उस वक्त मध्यभारत के प्रभावषाली नेता केन्द्रीय रेल मंत्री माधवराव सिंधिया जिन्दा थे,इसलिये उन्होंने इस बात के लिये जोर लगाया कि परमाणु बिजली घर शिवपुरी  में ही स्थापित हो.इसके लिए उन्होंने इस टीम की खासी आवभगत की थी और उन्हें अपने महल में भी ठहराने  के बाद प्रस्तावित स्थल के मुआयने के लिये टीम को हेलीकाप्टर भी मुहैया करवाया था.

टीम की निगाह में बरगी के निकट चुटका इसके लिये सबसे ज्यादा उपयुक्त था,क्योंकि परमाणु केंद्र  की स्थापना के लिये पानी की सबसे बडी जरूरत थी. षिवपुरी जिले के दो उपयुक्त स्थलों में यदि परमाणु बिजली घर की स्थापना की जाती तो वहां पहले बांध की जरूरत थी, जबकि चुटका के पास  बरगी बांध एक बहुउद्देशीय योजना थी,जिसके पानी का सीधा सीधा उपयोग आसानी से परमाणु बिजली घर में किया जा सकता था.लेकिन माधवराव सिंधिया का केंद्र और राज्य में राजनैतिक कद जबलपुर के जनप्रतिनिधियों की तुलना में काफी बड़ा था,इसलिये चुटका का सर्वाधिक उपयुक्त होने के बाद भी इसे स्वीकृति नही मिल पाई और परमाणु बिजली घर की स्थापना की फाइल दब कर रह गई.

पिछले कुछ सालों में जब बिजली का संकट बढा और मांग और आपूर्ति के बीच का फासला काफी बढ़ने लगा तब एक बार फिर परमाणु बिजली घर की फाईल को पंख लगे ‘‘न्यूक्लियर पॉवर  कॉरपोरेशन’’ ने फिर पुरानी रिपोर्ट खंगालनी शुरू की. कारपोरेशन के अफसरों ने चुटका गांव का कई बार दौरा किया पर इस बीच एक बार इसको लेकर क्षे़त्रीयता की राजनीति गरमा गई. इसे चुटका की बजाय विदिशा,रायसेन और भीमपुर ले जाने का कुचक्र शुरू हो गया पर चुटका प्रोजेक्ट के पक्ष में जो सबसे बडी बात थी वो थी गरमी के दिनों में भी डेढ लाख घनमीटर पानी की उपलब्धता जो और कहीं मिल पाना संभव नही था.इसलिये न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरशन ने स्पष्ट कर दिया कि परमाणु बिजली घर यदि कहीं स्थापित होगा तो वो स्थान चुटका ही होगा.

न्यूक्लियर पॉवर कारपोरेशन के अध्यक्ष एस0 के जैन का कहना है कि इस परियोजना की स्थापना के बाद मंडला जिले के सुदूर इलाके के आदिवासियों के साथ साथ गौंड़वाना और महाकोशल के एक बड़े हिस्से का कायाकल्प हो जायेगा इतना ही नहीं इससे यह पूरा क्षेत्र हाईटेक के ग्लोबल मैप पर भी अंकित हो जायेगा. वहीँ  ग्रामीणों  का कहना है कि एक बार वे बरगी बांध के लिये विस्थापन का दंश भोग चुके है और अब दूसरी बार उन्हें फिर विस्थापित किया जा रहा है जो उनकी सहन सीमा से बाहर है. उनका कहना है कि बरगी बांध निर्माण के दौरान विस्थापन के बाद से वे अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हैं. उन्हें विस्थापन के दौरान जो भी आष्वासन दिये गये थे वे पूरे नहीं हुये. उन्हें न तो वैकल्पिक जमीन मिली न ही रोजगार जिसका उन्हें आष्वासन दिया गया था. जैसे तैसे उन्होंने अपने रहने का ठिकाना बनाया है कि फिर से उन्हें उजाड़ने की कोशिश  की जा रही है.

चुटका परियोजना प्रभावित संघ के अध्यक्ष भोलेसिंह गठोरिया    संघर्ष में साथ दे रहे पत्रकार नलिकांत बाजपेई का कहना है कि परमाणु उर्जा पर्यावरण और जल विषेषज्ञों ने वैज्ञानिक आंकड़ो के माध्यम से यह बताया है कि विष्व का कोई भी परमाणु बिजली घर पूरी तरह से विकिरण मुक्त नहीं है.यदि नर्मदा तट पर चुटका परियोजना को अनुमति दी गई तो अमरकंटक से लेकर खम्भात  की खाडी तक का जल विकिरण युक्त होकर विषाक्त हो जायेगा.यही कारण है कि अमेरिका फ्रांस व रूस सहित अनेक विकसित देषो ने परमाणु बिजली घर बनाने बंद कर दिये हैं.





राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।




May 25, 2011

रमन सिंह को अब कानून की याद सताये !


बिनायक सेन के योजना आयोग में शामिल होते ही छत्तीसगढ़ सरकार को अचानक देश के सारे क़ानून याद आ गए. और इतने ज्यादा कानून याद आ गए कि प्रधानमंत्री को भी क़ानून पढ़ाने चढ़ बैठे...

हिमांशु कुमार

बड़े-बूढों ने कितना सही कहा है कि उसके घर में देर है अंधेर नहीं. हम अब तक छत्तीसगढ़ की सरकार को पानी पी-पीकर कोस रहे थे कि इन्हें कानून की कोई फ़िक्र नहीं है, लेकिन रमन सिंह ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर हमारे सारे आरोपों को एक झटके में हवा में उड़ा दिया. बिनायक सेन के योजना आयोग में शामिल होते ही छत्तीसगढ़ सरकार को अचानक देश के सारे क़ानून याद आ गए. और इतने ज्यादा कानून याद आ गए कि प्रधानमंत्री को भी क़ानून पढ़ाने चढ़ बैठे. और उन्हें समझा दिया की प्रधानमंत्री ने कितना बड़ा गैरकानूनी काम कर दिया है.
विनायक सेन

आज मेरा दिल खुशी से हवा में जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है. वाह! अब हमारे स्वर्णिम छत्तीसगढ़ में सारे काम क़ानून से होंगे.मजदूरों को अब सरकारी मजदूरी दो साल बाद नहीं, बल्कि कानून के मुताबिक पंद्रह दिन में मिल  जाया करेगी. बस्तर में सरकार ने जिन आदिवासियों के घरों की 'सलवा जुडूम' यज्ञ में आहुति दी थी, अब कानून का पालन करके सरकार उन सबको जले मकानों का मुआवजा देगी.
 
अब जिन आदिवासी लड़कियों के बलात्कारी रमन सिंह जी को मिल ही नहीं रहे थे (हालाँकि वही लोग अभी भी नए गाँवों को जलाकर जमीनें उद्योगपतियों के लिए खाली कर रहे थे, स्वामी अग्निवेश और पत्रकारों पर हमला कर रहे थे) वो सब अब मिल जायेंगे. और रमन सिंह जी उन लगातार तनख्वाह ले रहे, पर फरार चल रहे पुलिसवालों और एसपीओ को क़ानून का पालन सुनिश्चित करते हुए क़ानून के हवाले कर देंगे. वाह!  मज़ा आ जायेगा. अब तो कोई भी पत्रकार दंतेवाडा जा सकेगा. आदिवासियों से मिल सकेगा. अब छत्तीसगढ़ में भारत का संविधान फिर लागू हो गया रे!  दुःख भरे दिन बीते रे भैय्या...
 
 

May 24, 2011

प्रतिबंध सिर्फ इंडोसल्फान पर ही क्यों ?


पंजाब के खेतों में रसायनिक उर्वरक और रसायनिक कीटनाशी का प्रयोग बहुत ज्यादा चलन में है। यही वजह है कि यहां के खेत-खलिहान के साथ मनुष्य और पशुओं को बड़ी-बड़ी बीमारियां लग रही हैं...

स्वतंत्र मिश्र                              

विवादास्पद कीटनाशी इंडोसल्फान पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एसएच कपाडिया की अगुवाई वाली खंडपीठ ने 13 मई 2011 को अगले आठ हफ्तों के लिए पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि मनुष्य का जीवन सर्वोपरि है और वह किसी भी अन्य बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। खंडपीठ का निर्देश है कि अगले आदेश तक इस विवादास्पद कीटनाशी के उत्पादकों को आवंटित किए गए लाइसेंस भी जब्त कर लिए जाएं। खंडपीठ ने अगले दो हफ्तों के दौरान दो समिति को इस कीटनाशी के मनुष्य जीवन और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर के अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (आईसीएमआर) के महानिदेशक और कृषि आयुक्त इन समितियों के प्रमुख होंगे। खंडपीठ ने विशेषज्ञ समिति से अपनी अंतरिम रिपोर्ट में इंडोसल्फान के प्रतिकूल प्रभावों और उसके विकल्पों पर चर्चा करने का निर्देश दिया है। विशेष समिति मुख्यतः इन तीनों बिन्दुओं पर इंडोसल्फान पर प्रतिबंध लगाने, इसके मौजूदा स्टॉक को कई चरणों में समाप्त करने या इसके विकल्प क्या हो सकते हैं, पर चर्चा करेगी।  समिति को अपनी रिपोर्ट इन्हीं आठ हफ्तों यानि मध्य जुलाई तक सौंपनी है। यहां कुछ सवालों पर गौर करना जरूरी होगा। इंडोसल्फान पर प्रतिबंध क्यों लगाया जाना चाहिए? इसका मानव जीवन और पर्यावरण पर क्या प्रतिकूल असर पड़ रहा है? क्या दूसरे कीटनाशी मानव जीवन और पर्यावरण के लिहाज से ठीक हैं? क्या इंडोसल्फान के विकल्प सुरक्षित हैं? इंडोसल्फान की भारतीय बाजार में कितनी हिस्सेदारी है? क्या उस हिस्सेदारी पर कब्जा करने की साजिश के तौर पर तो इसपर प्रतिबंध की बात नहीं की जा रही है?

भारत में इंडोसल्फान के निर्माण में लगी कंपनियां इस कीटनाशी को 200-250 रुपये प्रति लीटर उपलब्ध करा रही हैं। लेकिन इसके विकल्प के तौर पर जिन कीटनाशकों की पैरवी की जा रही है, उसकी कीमत 3200 रुपये प्रति लीटर है। क्या भारत सहित उन गरीब मुल्कों के किसान जहां इंडोसल्फान को उपयोग में लाया जा रहा है, इन महंगे विकल्पों की कीमत चुका पाएंगे? मेरा मानना है कि मानव जीवन और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह किसी भी कीटनाशी पर प्रतिबंध जरूर लगाया जाना चाहिए। लेकिन साथ उसके विकल्प सस्ते और मानकों पर सही उतरने वाले होने चाहिए। अन्यथा, ऐसे प्रतिबंधों के पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की षड्यंत्रों की संभावना नजर आने लगती है।

इंडोसल्फान के जोखिमों को देखते हुए कुल 87 देशों में प्रतिबंध लगाया जा चुका है। अमेरिका और यूरोपीय संघ में इस रसायन पर ही पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। कुछ देशों में धान की खेती में इसके इस्तेमाल पर रोक लगाया गया है तो कुछ देशों में दूसरे फसलों की खेती में। एक अनुमान के अनुसार, भारत में इसका कुल कारोबार 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑक्यूपेशनल हेल्थ (एनआईओएच) ने केरल के कासरगॉड जिले में आयोजित किए गए एक अध्ययन के आधार पर रिपोर्ट तैयार करके केंद्र सरकार को सौंपी थी। एनआईओएच की रिपोर्ट के अनुसार, कासरगॉड जिले में इंडोसल्फान के इस्तेमाल से बच्चों में मंदता, बौद्धिक पिछड़ापन, सुनने की दिक्कतें आदि की समस्याएं पैदा होने लगीं हैं।

इसके अलावे कई अन्य अध्ययनों में यह पाया गया कि यह मानव जीवन और जलीय जीवन (खासकर मछियों) पर नकारात्मक असर डालती है। केरल में इस कीटनाशी की वजह से अबतक 400 से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं। मनुष्य और पशुओं में जन्म के समय विकलांगता या अन्य किस्म की दिक्कतें शुरू हो जाती है। इसका जहर कैंसर जैसे जानलेवा रोग को जन्म दे रहा है। पंजाब के भठिंडा, मानसा और फरीदकोट जिले में कैंसर के व्यापक प्रसार की वजहों में से रसायनिक कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल लाया जाना है। भठिंडा के पुहली गांव के किसान और पंजाबी के कथाकार बंत सिंह चट्टा का कहना है, ‘‘राजस्थान में बीकानेर के पास अबोहर में कैंसर अस्पताल के लिए एक स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है, जिसे कैंसर टेªन के नाम से ही इस इलाके में पुकारा जाता है।

पंजाब के खेतों में रसायनिक उर्वरक और रसायनिक कीटनाशी का प्रयोग बहुत ज्यादा चलन में है। यही वजह है कि यहां के खेत-खलिहान के साथ मनुष्य और पशुओं को बड़ी-बड़ी बीमारियां लग रही हैं। कैंसर, नंपुसकता जैसी बीमारियां यहां के लोगों को अपने गिरफ्त में ले रही हैं। इंडोसल्फान ही नहीं बल्कि सभी रसायनिक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और जैविक खाद और जैविक कीटनाशी के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।’’ 

दरअसल, इंडोसल्फान पर प्रतिबंध लगाने और उसकी जगह दूसरे रसायनिक कीटनाशकों के प्रयोग की बात जिनेवा सम्मेलन (25 अप्रैल 2011) में किए जाने के पीछे के उद्देश्यों को समझने की कोशिश होनी चाहिए। जैविक खाद और जैविक कीटनाशी के चलन को खत्म करके उसकी जगह रसायनिक खाद व उर्वरकों के उपयोग के जरिये सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां खेती को उद्योग में तब्दील करना चाहती है।

खेती के जरिये जीवन जीने के लिए जरूरी फसलों को उगाने की बजाय बहु-राष्ट्रीय कंपनियां नकदी फसलों के उत्पादन, उसमें सस्ते और आसानी से उपलब्ध खाद और कीड़ों को मारने के उपायों की जगह त्वरित असर के नाम पर रसायनों को बढ़ावा दे रही है। क्योंकि रसायनों के बढ़ते चलन से उनका व्यापार बढ़ रहा है। बाजार में हिस्सेदारी बढ़ रही है। इसलिए सरकार को आम किसानों के हित की परवाह करते हुए इस लूट के खेल को समाप्त करने के उपायों पर गौर करना होगा।



पत्रकारिता में जनपक्षधर रूझान के साथ सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन और सामाजिक सक्रियता.

    




मजदूर आत्महत्याओं पर रिपोर्ट जारी


कारखानों में नवयुवतियों को बतौर मजदूर तीन साल के लिए ठेके पर काम दिया जाता है.ठेका अवधि की समाप्ति पर 30000 से 60000 के बीच एक मुश्त रकम दहेज़ के लिए इन नवयुवतियों को थमा दी जाती है...

विष्णु शर्मा

कमिटी ऑफ कंसर्न्ड सिटीजन-स्टुडेंट्स एंड यूथ द्वारा 22मई को दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में जारी  तिरुपुर रिपोर्ट वहां के मजदूरों की दुर्दशा जानने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है.तमिलनाडू का तिरुपुर शहर कपड़ा उत्पादन के लिए विश्व  प्रसिद्ध है. यह शहर वालमार्ट, सी एंड ए, डीज़ल, फिला रीबौक अदि जैसे बड़े अंतरारष्ट्रीय ब्रांडो के लिए कपड़ों की आपूर्ति करता है.लेकिन दूसरी ओर इसी शहर में पिछले दो सालों में 800से अधिक मजदूरों ने आत्महत्या की है ओर हर रोज आत्महत्या की 20 कोशिश होती है. रिपोर्ट के अनुसार इसके लिए उत्पीडन की वह परिस्थियाँ जिम्मेदार हैं जो अत्यधिक मुनाफे कमाने के लिए वहा के कारखाना मालिकों ने उत्पन्न की हैं.

रिपोर्ट जारी होने के बाद अपनी बात रखते टीम के सदस्य

तिरुपुर के कारखाना मालिकों ने उत्पीडन के नए नए प्रयोग किये है.इसमें से एक है सुमंगली योजना. यह योजना विवाह योग्य लड़कियों के लिए है. कारखानों में नवयुवतियों को बतौर मजदूर तीन साल के लिए ठेके पर काम दिया जाता है. ठेका अवधि की समाप्ति पर 30000 से 60000 के बीच एक मुश्त रकम दहेज़ के लिए इन नवयुवतियों को थमा दी जाती है. यदि इस अवधि में इन में से कोई बीमारी या किन्ही कारणोंवश काम में उपस्थित नहीं हो पता तो मालिक रकम देने से इनकार कर सकता है. ठेके की अवधि के दौरान लड़कियां हॉस्टल में रहती है ओर अपने निकट के परिचितों (जिनका नाम और फोटो उनके रजिस्टर में दर्ज है) के आलावा किसी से नहीं मिल सकती. उनके बहार जाने में पाबन्दी होती है.हॉस्टल में घटिया किस्म का खाना दिया जाता है जो लगातार इनके स्वस्थ पर बुरा असर डालता है. सुमंगली के रूप में काम करने वाली लड़कियों को 'प्रशिक्षार्थी' या 'प्रशिक्षु' में वर्गीकृत किया जाता है और इस तरह वे नियमित मजदूरी दरों की हकदार नहीं होती.

एक अन्य 'कैम्प कूली' व्यवस्था के तहत श्रम ठेकेदार बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा तथा राजस्थान से सस्ते मजदूर लाते है.ठेकेदार इन मजदूरों पर नज़र रखते है तथा प्रबंधन ठेकेदारों के माध्यम से मजदूरों के साथ सम्बन्ध रखते है. यह मजदूर फेक्टरी मालिक द्वारा उपलब्ध शयनशाला में रखे जाते है. ये मजदूर युनियन से नहीं जुड़ सकते. इस तरह तिरुपुर के करीब 4 लाख मजदूरों में से केवल 10 प्रतिशत ही युनियन के सदस्य है. यहाँ के मजदूरों को सप्ताह में करीब 1710 रु की मजदूरी मिलती है और ये अन्य किसी प्रकार की सुविधा के हकदार नहीं है.यहाँ के मजदूर अलगाव का जीवन जीने को मजबूर है. ये अपने परिवार के साथ नहीं रह सकते सप्ताह में 6 दिन १२ से १८ घंटे के बीच काम करना पड़ता है.

रिपोर्ट के अनुसार, 'तिरुपुर की कामयाबी मजदूरों की लूटखसोट पर आधारित है. तिरुपुर के कपडा उद्योग के मजदूरों के रहने-सहने वा काम करने की परिस्थितियाँ उनके जीवन को भारी नुक्सान पहुचती है. मजदूरों को न केवल उद्योग से सम्बंधित पेशागत जोखिम उठाना पड़ता है बल्कि उनसे जो अत्यधिक काम किया जाता है उसके चलते कम उम्र में ही उनके काम करने की क्षमता का ह्रास हो जाता है.'

कार्यक्रम में बोलते हुए अशोक ने कहा कि यह घटना तिरुपुर की नहीं बल्कि पूरे देश की है. देश के राजनीतिज्ञ, साहित्यकार देश को विकसित देश बताते है जबकि वे उत्पीडन की इन परिस्थितियों को नजरंदाज करते है. उन्होंने कहा कि देश में जहाँ भी विकास हुआ है वहां उसकी की कीमत किसानो और मजदूरों को चुकानी पड़ रही है.बिहार के रोहतास को धन का कटोरा कहा जाता है और वहां लोग बेरोजगार हो गये है. बिहार में कहावत है कि 'नरेगा जो करेगा वो मरेगा' इसका मतलब है कि नरेगा योजना के अंतर्गत काम करने वालों को 2वर्षों तक भुगतान नहीं किया जाता.और जब भुगतान होता है तो आमदनी का 30 प्रतिशत सरकारी अधिकार ले लेते है.

संतोष ने इस अवसर पर कहा कि आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों ने हमें दो वक्त से एक वक्त का खाना खाने की स्थिति में पंहुचा दिया है.और अब सरकार यह कह रही है कि एक वक्त का खाना खाने वाले गरीब नहीं है! राजनितिक कार्यकर्त्ता  अंजनी कुमार ने बताया कि तिरुपुर में जो हालत है उसका एक कारण मजदूर आन्दोलन का न होना है और किसानों के लिए भी ऐसा ही कहा जा सकता है.उन्होंने कहा कि मजदूरों और किसानों के बीच अंतर सम्बन्ध है और हमें सही दिशा में आन्दोलन को ले जाने के लिए इस लिंक को समझना होगा.उन्होंने कहा कि गुडगाँव और अन्य जगह के आंदोलनों से पता चलता है कि वहां के मजदूरों के बीच एकता पुराने ट्रेड युनियन के खिलाफ बनी है.इन आन्दोलनों में जो मांगे प्रमुखता से उठी है वे है, एक संगठन, ऊँची मजदूरी और मजदूरों के बीच बराबरी.जो मजदूर संगठन खुद को वामपंथी मानते है वे मजदूरों की मांगो पर काम करने की बजाये आंदोलनों को अपनी सुविधा के अनुसार आगे ले जाना चाहते है.

 
पीडीएफआई के संयोजक अर्जुन सिंह ने कहा कि देश के कपडा उद्योग में बहुत बदलाव आया है. कानपुर पूरी तरह उजाड़ गया है और सूरत, कोयंबटूर के हालत भी ख़राब है. मजदूर एकता कमिटी के सतीश ने कहा कि इस रिपोर्ट को विस्तार से लोगो के पास ले जाना चाहिए. नागरिक पत्रिका के संपादक श्यामवीर ने कहा की फक्ट्रियों में युनियन बनाना मुश्किल है.ठेकेदारी प्रथा का बोल बाला है. मजदूरों के साथ मार पीट, गली गलौज आम चलन है. भारत में पूंजीवाद, सामंतवाद, दास प्रथा सब घुल मिल गई है.कम्युनिस्ट  ग़दर पार्टी की कामरेड रेखा ने कहा कि आज के दौर में मजदूर और किसानों को एक साथ खड़े होना होगा.इस कार्यक्रम के शुरू  में पार्थ  सरकार ने तिरुपुर रिपोर्ट को प्रस्तुत किया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन जाँच समिति के  के संतोष ने दिया.