Apr 25, 2011

बाघों के शिकार बनते ग्रामीण


वन क्षेत्रों में जो लोग जंगली जानवरों का शिकार हो रहे हैं उनकी सरकार नहीं सुन रही है। मीडिया भी चुप है क्योंकि सरकार और होटल-रेस्तरां मालिकों से विज्ञापन की टुकड़खोरी का सवाल है. इस हालात का जायजा ले रहे हैं रामनगर से...

सलीम मलिक  

उत्तराखंड  के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 121 पर रामनगर से करीब 14 किमी दूर सड़क के किनारे बसे सुन्दरखाल गांव में पिछले 12 नवम्बर से बाघों के हमले में अबतक 8 लोग मारे जा चुके  हैं। पहले से ही बदहाली की जिंदगी गुजार रहे सुंदरखाल के ग्रामीण एशिया के पहले नेशनल पार्क 'जिम कार्बेट' के चलते आयी इस नयी मुसीबत से दो-चार होने को मजबूर  हैं। पूरी दुनियां में जहां बाघों की तादात तेजी से घट रही है,वहीं कार्बेट नेशनल पार्क में और  इससे सटे इलाकों में बाघों की संख्या बढ़ रही है।

पर्यटकों   के इस अत्याचार का रेस्तरां वाले विशेष पॅकेज लेते
पिछली बार हुई बाघों की गणना के नतीजे तो वन्यजीव प्रेमियों को इतने मुफीद लगे थे कि उन्होने कार्बेट पार्क के इस इलाके को ‘बाघों की राजधानी’ जैसा शानदार नाम देने से गुरेज नही किया था। बाघों की इस गणना से उत्साहित वन्यजीव प्रेमियों की पहली चिन्ता यहां मौजूद बाघों की सुरक्षा के लिये है। बाघ विशेषज्ञों की मानें तो इस इलाके में उपलब्ध शिकार की अच्छी संख्या के चलते एक बाघ को अपने स्वच्छंद विचरण के लिये करीब 20 किलोमीटर का इलाका चाहिये।

अपनी इस टेरेटरी में बाघ आमतौर पर दूसरे बाघ का हस्तक्षेप किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करता। इलाके के वर्चस्व की इस लड़ाई में आमतौर पर बाघ आपस में ही भिड़ जाते हैं जिसमें से किसी के मैदान छोड़ने या प्रतिद्वंद्वी की मौत के बाद ही यह लड़ाई अपने मुकाम पर पहुंचती है। वैसे दिलचस्प बात यह है कि बाघ जहां अपने इलाके में दूसरे नर बाघ को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता, वहीं वह दो या तीन मादा बाघिन को अपने हरम में रहने की इजाजत देता है।

बाघों की बढ़ती आबादी के चलते उन्हें पार्क के अंदर वह प्राकृतिक एवं  स्वच्छंद वातावरण नहीं मिल रहा है जिसके की वह प्राकृतिक रुप से आदी है। इस कारण अब जगह की तंगी के चलते बाघों ने जंगल से निकलकर आबादी का रुख करना आरम्भ कर दिया है। ऐसी हालत में बाघों के आदमी पर हमले की घटनाओं में अचानक तेजी आ गई है।

बाघों के हमले में मारे गए लोग, जिनके विवरण उपलब्ध हो पाए :-
12 मार्च 2011  को सुंदरखाल में एक विक्षिप्त व्यक्ति
26 जनवरी 2011 को मालधन का युवक पूरन चन्द्र जो की सुंदरखाल रिश्तेदारी में आया था
10 जनवरी 20011 को गर्जिया की शान्ति देवी
31 दिसम्बर 2010 को सुंदरखाल देवीचौड़ की देवकी देवी
18 नवम्बर 2010 को चुकुम गांव की कल्पना देवी
12 नवम्बर 2010 को सुंदरखाल की ही नंदी देवी
फरवरी 2010 में सुंदरखाल की शान्ति देवी और ढिकुली निवासी भगवती देवी

पहले भी इस इलाके में बाघों का आदमी से आमना-सामना होता रहा है,लेकिन वह इतना कम था कि उसे अपवाद कहना ठीक होगा। लेकिन बीते साल  12नवम्बर को बाघ के हमले में मारी गई महिला के बाद तो इस क्षेत्र में बाघों के हमले बढ़ गये हैं। एक ही इलाके में बाघों के इन हमलों से जहां सुंदरखाल के ग्रामीण मौत के खौफ में जीने को अभिशप्त है,वहीं वन-विभाग से जुड़े अधिकारी भी परेशान हो गये है। इस साल की शुरुआत यानी 27जनवरी को बाघ के हमले में मारे गये युवक की मौत के बाद तो ग्रामीणों का गुस्सा वन-विभाग के प्रति अपने चरम पर था,जिसकी गम्भीरता को देखते हुये विभाग के अधिकारी तक मौके पर नहीं पहुंचे।

सिलसिलेवार हुई इन घटनाओं में हाल तक बाघ के हमले में अपनी जान गंवानें वालों की संख्या अधिकृत तौर पर आठ  हो चुकी है। अधिकृत इसलिये कि बाघ के हमले में मारे गये ग्रामीणों के बाद गांव वालों का ध्यान जब इस क्षेत्र में घुमने वाले विक्षिप्तों की ओर गया तो पता चला कि कई ऐसे विक्षिप्त लोग जो पहले क्षेत्र में ही घूमा करते थे,इन दिनों  दिखाई नहीं दे रहे हैं। ऐसे में गांव वालों का यह कहना भी है कि इस क्षेत्र के अनेक अज्ञात गायब विक्षिप्त भी बाघ का शिकार बन चुके हैं। विक्षिप्तों को लेकर कोई दावा नहीं करने वाला इसलिये उनके बारे में कोई शोर नहीं हुआ।

सुंदरखाल के ग्रामीण बीते चार दशकों से जंगलों पर ही आश्रित रहकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। गांव में चाय की दुकान चलाने वाले विशाल का कहना है कि ‘पहले गांव वाले अक्सर अकेले ही जंगल चले जाया करते थे। बाघ जंगल के रास्ते में मिल जाता था तो आदमी का रास्ता छोड़ झाड़ियों में दुबक जाता था। या बाघ शिकार खा रहा है तो फिर आदमी ही अपना रास्ता बदल लेते थे। आदमी और बाघ के बीच यह अनोखा तालमेल इतना मजबूत था कि इक्का-दुक्का की संख्या में जंगल जाने से भी बाघों के हमले की घटनायें अपवादस्वरूप हुआ करती थीं।

वह क्षेत्र जहाँ लोग बाघों का शिकार हो रहे हैं
इसके अलावा एक और खास बात यह थी कि यदि बाघ ने हमला कर भी दिया तो वह आदमी को खाता नहीं था। जिसका अर्थ है कि बाघ ने आदमी को अपने आहार के लिये नहीं मारा, बल्कि अपनी या अपने बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से मारा। लेकिन अब इन ताजा घटनाओं में बाघ न केवल आदमी को मार रहा है, बल्कि उसे खा भी रहा है। इस बारे में बाघों के व्यवहार पर अध्ययन करने वालों की राय है कि जंगल में बढ़ रहा मानवीय हस्तक्षेप बाघों के व्यवहार में आ रहे परिवर्तन की मुख्य वजह है।

आमतौर पर शांत फिजाओं  का निवासी यह वन्यजीव अपने वासस्थल पर इंसानी दखल के चलते अपने प्राकृतिक व्यवहार से दूर होता जा रहा है। विशेषज्ञों की इस राय को आधार बनाकर वन महकमा जंगल में ग्रामीणों की आवाजाही को शत-प्रतिशत बंद करने पर तुला हुआ है, लेकिन कार्बेट नेशनल पार्क में सैलानियों के माध्यम से हो रही इंसानी घुसपैठ को रोकने या इसे नियंत्रित करने पर वन विभाग जोर नहीं देता है। कार्बेट नेशनल पार्क की स्थापना की प्लेटिनम जुबली के मौके पर यहां आयोजित अंतर्राष्ट्रीय टाइगर मीट में कार्बेट पार्क और कोसी नदी के बीच होने के चलते सुंदरखाल को ऐसा अवरोध माना गया जिसकी वजह से अपनी प्यास बुझाने के लिये पानी के पास जा रहे वन्यजीवों जीवों से आदमी का टकराव बढ़ रहा है।

लेकिन गर्जिया नदी के उत्तरी किनारे से ढिकुली के दक्षिणी हिस्से तक कुकरमुत्ते की तरह उग आये उन रिसोर्ट की कोई चर्चा नहीं हुई जिनके कारण लगभग पांच किमी की यह पट्टी पूरी तरह से कार्बेट पार्क और कोसी नदी के बीच ‘ग्रेट चाइना वाल’ बन गई है। इसके अलावा जंगल को नजदीक से जानने वाले विशेषज्ञों के अनुसार इस बार प्रदेश में आई आपदा के चलते पार्क के ढिकाला जोन में रामगंगा नदी में इतना मलवा आ गया है कि वहां पर ग्रासलैण्ड पूरी तरह से नष्ट हो गई है। ग्रासलैण्ड के अभाव में वहां से हिरन सहित घास पर जिंदा रहने वाली वन्यजीवों की वह प्रजाति जो कि बाघ का शिकार है, अपना स्थान बदल लिया है। जिसका सीधा असर वहां पर रहने वाले बाघों पर भी पड़ा है। इस मामले में ग्रामीणों का इन रिसोर्ट वालों के खिलाफ एक सीधा आरोप भी है।

ग्रामीणों के मुताबिक रिसोर्ट वाले अपने सैलानियों को बाघ की साइटिंग (दर्शन) कराने के लिये सड़क के किनारे कार्बेट पार्क के हिस्से में मांस के टुकड़े डालते हैं। जिस कारण यह बाघ मांस के लालच में यहां आ रहे हैं तथा मांस न मिलने के कारण जंगली शिकार के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान शिकार आदमी को अपना निशाना बना रहे है। वन्यजीवों पर गहरा अध्ययन करने वाले सुमांतो घोष भी मानते है कि आदमी बाघ की आहार सूची में कभी भी शामिल नहीं रहा।


 दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' में रिपोर्टर , उनसे   maliksaleem732@gmail.com    पर संपर्क किया जा सकता है.

मिलिये मौलाना बिनायक सेन से


मैंने उनसे पूछा कि आपने ये हुलिया क्यों बनाया हुआ है कि लोग आपको मुसलमान समझते हैं? तो उनका जवाब था, दरअसल मैं मुसलमान की तरह इसलिए दिखना चाहता हूँ ताकि समझ सकूं कि हमारे अपने देश में अल्पसंख्यक होने का मर्म क्या होता है...

महताब आलम

पिछले शुक्रवार को सर्वोच्य न्यायालय ने देशद्रोह के आरोप में सजा काट रहे मशहूर नागरिक अधिकार कार्यकर्ता एवं चिकित्सक, डॉक्टर बिनायक सेन को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश सुनाया है और वो सोमवार को रिहा भी हो गए हैं.उन पर आरोप है कि उन्होंने देश की सत्ता और संप्रभुता के खिलाफ माओवादियों के साथ मिलकर षडयंत्र रचा और राष्ट्रद्रोही गतिविधियों में शामिल रहे. इन्हीं सब आरोपों के आधार पर पिछले वर्ष दिसंबर में छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

बीते तीन-चार वर्षों में डॉक्टर बिनायक सेन के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया है-- सकारात्मक और नकारात्मक दोनों. वर्ष 2007 के मई महीने में पहली बार गिरफ़्तारी के बाद मीडिया में विशेषकर 'मुख्यधारा' में जो चीजें आई वो ज़्यादातर नकारात्मक ही थी. लेकिन धीरे-धीरे ये सिलसिला रुका और सकारात्मक रूप लेने लगा. हाँ,ये और बात है कि छत्तीसगढ़ की मीडिया बिनायक को आज भी 'नक्सली डाकिया' ही मानती और लिखती है.

बिनायक के बारे में जो कुछ भी लिखा या कहा गया है उससे ये बात सामने उभरकर आती है कि डॉक्टर बिनायक सेन का  काम और उनकी सोच छत्तीसगढ़ या अविभाजित मध्य प्रदेश और आदिवासी समुदाय तक सीमित है.जो कि सरासर ग़लत है. ये सही है कि बिनायक छत्तीसगढ़ और वहां आदवासी समुदाय से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं लेकिन उन्हें फ़िक्र सारी दुनिया की रहती थी, खासतौर पर शोषित और अल्पसंख्यक वर्गों की.

बिनायक सेन पर आई एक नयी किताब "ए डॉक्टर टु डीफेंड : दी स्टोरी आफ बिनायक" में इसका प्रमाण भी मिलता है. इस किताब में ऐसी कई घटनाओं का ज़िक्र मिलता है जिनसे न सिर्फ उनके राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय व्यक्तित्व का पता चलता है, बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन के कई अनकहे और अनसुने पहलू मालूम पड़ते हैं,जो बुनियादी तौर उनकी छोटी से छोटी चीज़ के लिए संवेदनशीलता एवं प्रतिबद्धता को दिखाते हैं.

ये महज़ इत्तेफाक नहीं था कि बिनायक स्वास्थ्य का काम करते-करते मानवाधिकार का काम करने लगे, बल्कि ये उन्होंने सोच-समझकर किया था. इस समझ का कारण वो ये बताते हैं कि बहुत कम उम्र में ही उनको पता चल गया था कि स्वास्थ्य की एक पॉलिटिकल इकॉनोमी भी होती है और उसको संबोधित किये बिना स्वास्थ्य के मसलों को हल नहीं किया जा सकता.

यही नहीं, उनके दाढ़ी बढाने और कुरता-पायजामा पहने का भी खास कारण था. उनके मित्र डॉक्टर योगेश दीवान बताते हैं कि एक बार वे बिनायक के साथ पुरुलिया जा रहे थे. दोनों सेकेण्ड क्लास डब्बे में सफ़र कर रहे थे. तभी एक सज्जन ने आकर बिनायक से पूछा- "मौलाना साहब, क्या टाइम हुआ है ?" डॉक्टर योगेश आगे कहते हैं, 'बाद में जब मैंने उनसे पूछा कि आपने ये हुलिया क्यों बनाया हुआ है कि लोग आपको मुसलमान समझते हैं? तो उनका जवाब था, ’दरअसल मैं मुसलमान की तरह इसलिए दिखना चाहता हूँ ताकि समझ सकूं कि हमारे अपने देश में अल्पसंख्यक होने का मर्म क्या होता है.'

अभी हाल की एक मुलाकात में उनकी पत्नी प्रोफेसर इलीना सेन ने मुझे बताया कि ’जब बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का मामला जोरों पर था तो हम सपरिवार अयोध्या गए थे. वहां पहुँचने पर जब हमने अन्दर जाना चाहा तो सबको जाने दिया गया, लेकिन बिनायक को रोक दिया. जब हमने पूछा कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? तो उनका जवाब था 'हम बेहतर जानते हैं कि किनको अन्दर जाने देना है और किनको नहीं.' मतलब ये था कि बिनायक अन्दर इसलिए नहीं जा सकते हैं क्योंकि वो 'मुसलमान' हैं!’

किताब में इस बात का भी उल्लेख है कि पिछली बार जब वो जेल में थे और ग़ाज़ा में निहत्थे फिलिस्तीनियों के मारे जाने की खबर रेडियो पर सुनते थे, तो वहां के हालात को छत्तीसगढ़ के हालात से जोड़कर देखते थे. मुझे ऐसा लगता है जब वो इस बार जेल में थे और अरब देशो में हो रहे परिवर्तन के बारे में उनको खबर मिलती रही होगी तो वे ज़रूर इस पर सोच रहे होंगे कि इसके सकारात्मक असर दक्षिण एशिया पर क्या और कैसे पड़ेंगे? मुझे याद है कि पिछले वर्ष अगस्त के महीने जब मेरी उनसे राउरकेला में एक कार्यकम में मुलाकात हुयी तो बहुत देर तक झारखण्ड के हालात के बारे में मालूम करते रहे. वो वहां के हालात को लेकर खासे चिंतित थे.

इस सोमवार कोजेल से रिहाई के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी बिनायक ने ’शांति और न्याय’ के लिए लोगों को आगे आने का आह्वान किया. जेल से छूटते ही उनका पहला वाक्य था, “खुली हवा में सांस लेना अच्छा लग रहा है.” साथ ही उन्होंने यह भी आगाह किया कि भले ही ’राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय अभियानों और लोगों के सक्रिय समर्थन से वे रिहा हो गए हैं, लेकिन अभी भी छत्तीसगढ़ और देश के अन्य दूसरे हिस्सों में सैकड़ों-हज़ारों लोग उनकी ही तरह के फ़िल्मी और बेबुनियाद आरोपों के आधार पर क़ैद हैं, और हमें उन सभी लोगों की रिहाई के लिए इस अभियान के दायरे को बढ़ाना होगा.’

उपरोक्त तथ्य बिनायक की चिंताओं से रू-ब-रू तो कराते ही हैं, ये छत्तीसगढ़ सरकार के ’देशद्रोह’ के तुच्छ, वैमनस्य भरे और आपराधिक आरोपों की कलई भी खोलते हैं. जब बिनायक कहते हैं कि ’मैं अपने दिल से जानता हूं कि मैंने इस देश और देश की जनता के साथ कोई गद्दारी नहीं की’ तो उनकी इस बात पर अविश्वास करने के रत्ती भर भी कोई कारण नहीं है.अगर कोई सरकारों की ’आधिकारिक लाइन’ और उसके समर्थन में दी जाने वाली हास्यास्पद दलीलों का आलमबरदार हो तो तब की बात कुछ और है.


(लेखक  मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे activist.journalist@gmail.com     पर संपर्क किया जा सकता है.)



स्त्री शोषण की सुमंगली योजना


मजदूरों के होने वाले शोषण की तमाम बारीकियों से पाठक परिचित हैं.मगर यह पहली दफा होगा जब हमारे हिंदी के पाठक एक ऐसी योजना के बारे में जानेंगे, जिसे कंपनी मालिकों और सरकार ने मिलकर स्त्री उत्पीड़न की  बुनियाद पर खड़ा किया है और नाम सुमंगली योजना रखा है. जनज्वार के लिए यह पहली रिपोर्ट तमिलनाडु के तिरुपुर से लौटकर संतोष कुमार ने लिखी है,जो वहां मार्च महीने में गयी फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य भी रहे हैं.यह टीम मई के पहले सप्ताह में  तिरुपुर  में  काम के  हालात  और  सुमंगली योजना पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करेगी ... मॉडरेटर

संतोष कुमार

तमिलनाडु स्थित तिरुपुर कपड़ा उद्योग का फलता-फूलता केंद्र होने के साथ-साथ भूमंडलीकृत नवउदारवादी विश्व आर्थिक व्यवस्था का मॉडल है. यहां से वालमार्ट, फिला, रीबॉक, एडीडास, डीजल जैसे नामी-गिरामी ब्रांडों को यहां से उत्पादों की आपूर्ति की जाती है.

सुमंगली मजदूर : बंधुआ मजदूरी के नए शिकार
पर इस मॉडल का एक स्याह पक्ष यह  भी है कि पिछले दो सालों (2009-2010) के दौरान यहां 1,050 से भी ज्यादा आत्महत्याएं हुई हैं, जिनमें से अधिकतर फैक्टरी मजदूरों की हैं. जिस शहर को कभी डॉलर सिटी और निटवियर (knitwear) कैपिटल कहा जाता था, उसे आज आत्महत्याओं की राजधानी के रूप में जाना जाने लगा है.अकेले 2010 में ही 565 आत्महत्याएं हुई हैं.

एक तरफ 12000  करोड़ रुपयों के साथ निर्यात का सफलतम मॉडल और दूसरी तरफ प्रतिदिन तकरीबन बीस मजदूरों द्वारा आत्महत्या या आत्महत्या करने की कोशिश. शायद यह नवउदारवादी विश्व आर्थिक व्यस्था के अमानवीय परिणाम का भी मॉडल है, जिसमें हरेक डॉलर का मुनाफा किसी मजदूर के खून से सना है.

इन सारी स्थितियों को समझने के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने मार्च के पहले हफ्ते में तिरुपुर का दौरा किया. टीम ने तिरुपुर में चल रही सुमंगली योजना का जायजा लिया है. इसमें पता चला कि  मजदूरों की भलाई के नाम पर चल रही यह योजना किस तरह उनके और अधिक तथा गहरे शोषण के एक औजार के रूप में काम कर रही है.

दुनियाभर में कैंप कुली लेबर व्यवस्था को मजदूरों के आवास संबंधी सवाल का सबसे बुरा रूप माना जाता है. इस व्यवस्था में मजदूरों को कारखाने द्वारा या कारखाने में उपलब्ध होस्टल में रखा जाता है. यह व्यवस्था मालिकों को बहुत प्रिय है, क्योंकि इसकी खासियत है- मजदूरों से 12 या उससे ज्यादा घंटे काम कराया जाना, कम मजदूरी की अदायगी, किसी भी तरह के मनोरंजन से वंचित रखना, बाहर निकलने या अपनी मरजी से कहीं आने-जाने या किसी से मिलने-जुलने पर पाबंदी, हर समय मजदूरों को सुरक्षा गार्डों या मालिकों के आदमियों की नजर में रखा जाना, जिससे उनकी आजादी पर ही पहरा लग जाता है. इन्हीं वजहों से बहुत सारे श्रमिक कार्यकर्ता और अध्ययनकर्ता इस व्यवस्था को जेल लेबर कैंप और बंधुआ लेबर व्यवस्था भी कहते हैं.

तिरुपुर में कपड़ा मिल मालिकों ने एक बहुत ही ’आकर्षक’ योजना के तहत 14 से 19 वर्ष की किशोरियों के लिए इसी तरह की व्यवस्था तैयार की है, जिसे सुमंगली योजना के नाम से जाना जाता है. रोचक बात यह है कि इस योजना को भारतीय समाज के एक घटिया चलन दहेज को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है. इस योजना को 15 से 19 वर्ष की ग्रामीण और गरीब लड़कियों के लिए बनाया गया है, जो अपनी गरीबी की वजह से दहेज नहीं जुटा पातीं और उनकी शादी नहीं हो पाती.

ग्रामीणों की यह मजबूरी मिल मालिकों के लिए वरदान साबित हो रही है. मिल मालिक किशोरियों की ऊर्जा और कुशलता, जो कपड़ा उद्योग के लिए खासा महत्व रखती है, का अबाध शोषण कर अथाह मुनाफा बटोर रहे हैं. इस योजना में शामिल लड़कियों को कारखाने द्वारा उपलब्ध कराये गये होस्टल या कारखाने में ही 24 घंटे सुरक्षा गार्डों के निरीक्षण में रखा जाता है. इस योजना के तहत एक अनुबंध पर मालिकों, अभिभावकों और महिला मजदूरों के बीच हस्ताक्षर किया जाता है.

सुमंगली के लिए तमिल में लिखी लुभावनी
बातें जिसके चक्कर में महिला मजदूर फंसती हैं
कई सारी अमानवीय शर्तों वाले इस अनुबंध में सामान्यतः तीन साल के अंत में 30 से 50 हजार के बीच एक तयशुदा राशि देनी तय होती है. कारखाने में नौकरी के लिए भरती होते समय उन्हें एक पारिवारिक सामूहिक फोटो देना होता है और करार की पूरी अवधि के दौरान उस फोटो में शामिल लोगों के अलावा वे किसी से नहीं मिल सकती हैं. इसमें काम के बाद लड़कियों का होस्टल से जाना मना होता है. वे अपने अभिभावकों से भी एक नियत समय पर ही मिल सकती हैं, जो सामान्यतः महीने में सिर्फ दो घंटा होता है. इसके लिए भी पहले अभिभावकों को मालिकों से अनुमति लेनी होती है.

ये महिला मजदूर महीने में केवल चार घंटे के लिए बाजार जाकर अपनी जरूरत का सामान खरीद सकती हैं और वह भी महिला सुरक्षा गार्डों की निगरानी में, जो उनकी हर गतिविधि पर नजर रखती हैं. साल में एक बार पोंगल या दीवाली की छुट्टी में वे 4-5 दिन के लिए घर जा सकती हैं. उन्हें इस अवधि के भीतर ही वापस कारखाने लाने की जिम्मेदारी उन बिचौलियों की होती है, जिनके माध्यम से उन्हें कारखाने में नौकरी मिली होती है. तयशुदा समय में वापस न आने पर बिचौलिये का कमीशन और महिला मजदूरों की तयशुदा रकम का न दिया जाना आम बात है.

शोषण का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता. तीन सालों की अवधि के दौरान अगर कुछ भी नियत अनुबंध से इतर होता है तो मालिक पूरी तयशुदा राशि ही हड़प लेते हैं. इसके लिए मिल मालिक अक्सर विभिन्न तरकीबें अपनाते हैं. मजदूरों और उनके परिजनों से बातचीत करने पर फैक्ट फाइंडिंग टीम  को   एक तरकीब का पता लगा जिसके तहत ढाई या पौने तीन साल होने पर मिल मालिक घर के अभिभावकों को यह पत्र लिखते हैं कि उनकी बेटी का किसी साथी पुरुष मजदूर से शारीरिक संबंध है या इसी तरह की कुछ और ऊल-जुलूल बातें. 

ऐसी चिट्ठी पाने के बाद ज्यादातर मामलों में अभिभावक अपनी बेटियों को वापस ले जाते हैं और  करार की शर्तों को तोड़ देने का बहाना बनाकर मालिक सारी राशि का गबन कर लेता है. इस योजना के बारे में मालिकों की तरफ से दावा किया जाता है कि महिला मजदूरों को अच्छा खाना, रहने की अच्छी व्यवस्था, औद्योगिक प्रशिक्षण और करार के अंत में शादी के लिए मोटी रकम और रोजाना के खर्चों के लिए अलग से स्टाइपेंड मुहैया करायी जायेगी. पर वास्तव में होता इसके बहुत उलट है. 

करार की लुभावनी दिखने वाली हवाई शर्तों की ओट में महिला मजदूरों को बोनस, ईपीएफ, ईएसआई जैसे बुनियादी अधिकारों से तो वंचित किया ही जाता है, लड़कियों को रहने के लिए मुहैया कराये गये होस्टलों में स्वास्थ्य संबंधी कोई सुविधा नहीं होती है. यह पूरी योजना अप्रेंटिसशिप योजना के तहत चलायी जाती है, जिसमें एक नियत समय के लिए ही प्रशिक्षण के बाद नौकरी का प्रावधान है.

कपड़ा बनाने की तैयारी  में मजदूर                सभी फोटो - Frontline  
सुमंगली योजना के तहत लड़कियों की भरती के लिए कारखाना मालिकों ने मजदूर बिचौलियों का एक बहुत ही मजबूत नेटवर्क फैला रखा है.यह नेटवर्क आर्थिक रूप से पिछड़े दक्षिणी तमिलनाडु के जिलों मदुरै, थेनी, दिंदुगल एवं तिरुवन्नवेली के गांवों में पोस्टर, नोटिस एवं अखबारों में विज्ञापनों एवं अपने संपर्कों के जरिये काम करता है. लड़कियों को काम के लिए तिरुपुर लाने के लिए ये बिचौलिये गांव में इस योजना को बहुत ही खूबसूरती से पेश करके अभिभावकों को झांसा देते हैं. बिचौलिये मुख्यतः उन गरीब घरों पर नजर रखते हैं, जिनमें माता-पिता में से किसी एक का या दोनों का निधन हो गया हो, जिन परिवारों में पिता शराबखोरी करता हो या वैसे गरीब परिवार जिनमें बहुत सारी बेटियां हों.इन परिवारों से लड़कियों को कारखाने में ले आना आसान होता है.

कम मजदूरी, अमानवीय कार्यदिवस, बुनियादी अधिकारों का हनन, मनोरंजन का अभाव, शारीरिक एवं मानसिक शोषण के अलावा यौन शोषण ऐसे पहलू हैं जो इस सुमंगली योजना के तहत काम करनेवाली लड़कियों का जीवन दूभर करती हैं. 13 अक्तूबर, 2010 से 16 अक्तूबर, 2010 के बीच ’न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के चेन्नई संस्करण में सुमंगली योजना के तहत काम करनेवाली महिला मजदूरों के शारीरिक-मानसिक एवं यौन शोषण की रिपोर्टिंग विस्तृत रूप से की गयी है. इन रिपोर्टों के अनुसार 19 साल से कम उम्र की इन लड़कियों का ठेकेदारों, सुपरवाइजरों, सुरक्षा गार्डों और साथी मजदूरों द्वारा शारीरिक शोषण की बहुत सारी घटनाएं पायी गयी हैं. 

कई बार ऐसी घटनाओं में महिला मजदूरों की मौत तक हो जाती है या वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती हैं. पुलिस इन मौतों को दुर्घटना का रूप देने की भरपूर कोशिश करती है. एक रिपोर्ट के अनुसार पांडिश्वरी में तिरुपुर के एक सेंटमिल में काम करनेवाली 17साल की एक महिला मजदूर (लोगों का कहना है कि वह महज 12 साल की ही थी) की 3 दिसंबर को हुई रहस्यमयी मौत के बारे में सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि लड़की की मौत का कारण उसका लगातार यौन शोषण किया जाना था. दिंदुगल में हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि लड़की गंभीर यौन शोषण का शिकार हुई थी.

इस मामले से जिले में हुई आत्महत्या की अनेक घटनाओं के बारे में नये सिरे से संदेह पैदा होने लगे हैं. सामाजिक संगठनों का कहना है कि अधिकतर आत्महत्याएं कारखानों और काम की जगहों पर यौन शोषण की वजह से होती हैं. महिलाओं को दोहरा उत्पीड़न झेलना पड़ता है. जब वे इन घटनाओं का विरोध करती हैं या ठेकेदारों, सुपरवाइजरों, सुरक्षा गार्डों और साथी मजदूरों को मनमानी से मना करती हैं , तो ऐसे में  बहाना बना कर नौकरी से निकाल दिया जाना और तयशुदा रकम का न दिया जाना आम बात है. नतीजतन अधिकतर महिलाएं जो इस योजना के सुनहरे प्रचार को देखकर भरती होती हैं, वे अंत में स्वास्थ्य,आत्मसम्मान, गरिमा और इज्जत को खोकर गरीबी के उसी कुचक्र में वापस लौट जाती हैं.



श्रमिक मामलों के अध्येता और कार्यकर्ता.तिरुपुर गयी फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य हैं. उनसे   mazdoor.delhi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



Apr 24, 2011

ऊर्जांचल से फिर उजड़ने का खौफ


पावर प्लांट के सर्वे के लिए प्रशासन लेखपाल, कानूनगो और एसडीओ की टीम तो भेजता रहा है, लेकिन यहां के आदिवासियों और अन्य वन आश्रित जातियों को वनाधिकार कानूनों   के तहत हक देना उसे गैरजरूरी लगता  रहा है...

दिनकर कपूर

उत्तर प्रदेश  सरकार ने बभनी में 1980 मेगावाट का पावर प्लांट लगाने की घोषणा की है। इस पावर प्लांट के लिए बभनी गांव के डगडउआ टोला, देवना टोला, डूभा ग्रामसभा के सवंरा, डूभा, ग्वाहान टोला, बरवें ग्रामसभा के खैरा, झोझवां, बरवें टोला, सतवहनी ग्रामसभा का सालेनाल, और धधरी ग्रामसभा की करीब 625 हेक्टेयर यानी 2500 बीघा जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहित की जानी है।

उजड़ने का डर : संघर्ष ही रास्ता

सोनभद्र विद्युत उत्पादन निगम के नाम से गठित नयी कम्पनी द्वारा कोयला आधारित इस पावर प्लांट को पहले सरकार द्वारा पब्लिक प्राइवेट पाटर्नरषिप में बीजपुर के पास दोपहा में लगाने की योजना थी, पर केन्द्र सरकार द्वारा सिंगरौली क्षेत्र में नयी विद्युत परियोजना को लगाने से अनुमति देने से इंकार करने के बाद इस परियोजना को बभनी में लगाने का निर्णय किया गया। इस परियोजना के लिए सर्वे का कार्य शुरू होते ही ग्रामीणों और आदिवासियों ने इस परियोजना को लगाने से पूर्व विस्थापन नीति की घोषणा और धारा बीस की जमीन पर वनाधिकार कानून के तहत पट्टा देने की मांग पर जन संघर्ष मोर्चा के नेतृत्व में अपना विरोध भी शुरू कर दिया है।

पिछले दिनों बभनी में जन संघर्ष मोर्चा की ओर आयोजित कार्यक्रम में मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि देश   में आज भी अंग्रेजों द्वारा 1894में बनाया भूमि अधिग्रहण कानून ही काम कर रहा है। जिसके जरिए आजाद भारत की सरकारें किसानों से जबरन भूमि का अधिग्रहण कर रही है। लेकिन इस इलाके यह नहीं होने दिया जायेगा। इस कानून को रद्द कराने के लिए और बिना किसानों की सहमति से जमीन लेने के प्रयास के खिलाफ जनांदोलन खड़ा किया जायेगा।

इस पावर प्लांट से एक बार फिर इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों और आम नागरिकों के सामने विस्थापित होने का खतरा पैदा हो गया है। इस जनपद में पूर्व में रिहन्द बांध, अनपरा, ओबरा, हिण्ड़ालकों, बीजपुर, एनटीपीसी समेत तमाम परियोजनाएं लगायी गयी और इनसे लाखों की संख्या में आदिवासी और अन्य लोग विस्थापित हुए। आज स्थिति यह है कि उनसे किए लिखित समझौतें तक लागू नहीं किए गए। रिहन्द बांध बनते समय देष के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बांध से हुए विस्थापित परिवारों से वायदा किया था कि वह कहीं भी ऊंची जमीन देखकर वहां बस जाएं, उन जमीनों पर उन्हें  मालिकाना अधिकार मिल जायेगा, पर आज तक यह नहीं हुआ।

मौजूदा समय में भी रिहन्द विस्थापित परिवारों को गर्वमेंट ग्रांट के पट्टों से ही काम चलाना पड़ता है। म्योरपुर ब्लाक के चेरी, झिल्लीमहुआ, बडहोर जैसे करीब 13 गांव जिनमें रिहन्द विस्थापित बसे हैं तो आज भी वन गांव ही हैं। यहीं नही परियोजनाओं के लगने के बाद भी यहां के ग्रामीण क्षेत्र का विकास भी उपेक्षित ही रहा है। जबकि इस क्षेत्र के पिछड़ेपन के कारण यहां लगी औद्योगिक इकाइयों को तमाम तरह की सरकारी छूट भी मिलती रही है। हालत तो यह है कि पूरे देष को सर्वाधिक बिजली देने वाले इस दुद्धी तहसील के गांवों में आज भी बिजली नहीं है। वहीं इन परियोजनाओं से होने वाले प्रदूषण ने यहां के आमनागरिकों के जीवन को गहरे संकट में डाल दिया है।

स्थिति इतनी बुरी है कि इस क्षेत्र में पावर प्लांट के सर्वे के लिए प्रशासन लेखपालों,कानूनगो और एसडीओ की टीम तो भेजता रहा है, लेकिन यहां के आदिवासियों और अन्य वन आश्रित जातियों को वनाधिकार कानून के तहत हक देना नागवार गुजरता है। बड़े पैमाने पर वनाधिकार कानून के तहत जंगल की जमीन पर मालिकाना हक के लिए दाखिल आदिवासियों के दावों को प्रषासन ने खारिज कर दिया है। बसपा के स्थानीय विधायक सीएम प्रसाद तो जंगल की जमीन पर बसे इन आदिवासियों और रिहन्द विस्थापितों को अवैध अतिक्रमणकारी कहते हैं।

संसद से पारित कानूनों के लागू होने की हकीकत इन उदाहरणों से देखी जा सकती है। बभनी गांव में ही 850 लोगों ने वनाधिकार कानून के तहत दावा किया था जिसमें से मात्र 17 लोगों को ही पट्टा मिला वह भी उनके द्वारा कुल काबिज जमीन से बेहद कम। इसी गांव के विस्थापित होने वाले डगडउआ टोला की तो स्थिति और भी खराब है यहां मुख्यतः गोंड,खरवार आदिवासी जाति के परिवार है यहां 220 दावा फार्म भरा गया था जिसमें से मात्र 3 लोगों को पट्टा दिया गया।

सभा को संबोधित करते अखिलेन्द्र प्रताप

विस्थपित हो रहे रामनारायण गोंड कहते हैं कि ‘यदि हमें वनाधिकार कानून के तहत अधिकार नहीं मिला तो कल विस्थापन के समय हमें इन जमीनों का मुआवजा भी नहीं मिलेगा। गांव के बुजुर्ग गजराज सिंह गोंड कहते हैं कि हम आदिवासी तो पुरखों से इन जमीनों पर काबिज है जंगल विभाग कब मालिक बन बैठा हमें नही मालूम आज लम्बी लड़ाई के बाद इन जमीनों पर मालिकाना हक के लिए एक कानून भी बना तो उसें भी लागू करने को सरकार तैयार नही है।

इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जन संघर्ष मोर्चा के प्रदेष प्रवक्ता गुलाब चंद गोंड की राय में ‘बार-बार हुए अन्याय के कारण यहां के आदिवासी और नागरिक अपने अधिकारों के लिए इस पावर प्लांट के लगने से पूर्व सरकार से लिखित समझौता चाहते है।’

सम्मेलन में जुटे हजारों आदिवासियों ने दोनों हाथ उठाकर संकल्प लिया कि जब तक पावर प्लांट के लगने से पूर्व इस क्षेत्र में वनाधिकार कानून के तहत वन भूमि पर काबिज आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासियों को पट्टा,रिहंद विस्थापित परिवारों को काबिज जमीन पर भौमिक अधिकार,विस्थापित परिवार के सदस्य को परियोजना में स्थायी नौकरी,विस्थापित किसानों को परियोजना में शेयर और विस्थापित जमीन के बदले जमीन उपलब्ध कराने और मुआवजा को लेकर विस्थापन व पर्यावरण की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नीति की घोषणा नहीं की जायेगी तब तक किसी भी कीमत पर एक इंच जमीन नहीं दी जायेगी।



...और अब हर्षमंदर के अनुवादक भी गायब


जनज्वार. सुरक्षा बल के जवानों के अत्याचार से पीड़ित गांवों के हालात का जायजा  लेकर खाद्य सुरक्षा सलाहकार  हर्ष मंदर को आये अभी महीने दिन भी नहीं बीते थे कि  फिर एक बार उस क्षेत्र में आदिवासियों पर नए सिरे से जुल्म ढाए जाने का मामला उजागर हुआ है.

गाँधीवादी चिन्तक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के अनुसार 'सरकार की ओर से भेजी गयी राहत सामग्री को जहाँ सुरक्षा बलों ने लूट लिया है, वहीं हर्ष मंदर के दौरे के दौरान उनकी  सुविधा के लिए पीड़ितों की बातचीत का गोंडी भाषा से हिंदी में अनुवाद करने वाले दो लोग 6  अप्रैल के बाद से ही लापता हैं .इन दोनों का नाम नूपा मुत्ता और माडवी सुल्ला है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक लापता लोगों को सुरक्षा बल इसलिए उठा ले गए हैं क्योंकि उन्होंने हर्ष मंदर को यहाँ के हालात समझने में मदद की थी. साथ ही 11 से 16 मार्च के बीच सुरक्षा बलों के जवानों ने तीन महिलाओं के साथ नहीं, बल्कि 5 के साथ बलात्कार किया था.जिसमे तीन ताड्मेतला और दो मोरपल्ली गावों से हैं.' हिमांशु कुमार को यह जानकारी दंतेवाडा से आज ही लौटे उनके एक साथी ने दी.

मोरपल्ली गाँव में बलात्कार पीड़ित महिला  
 गौरतलब  है कि दंतेवाडा के चिंतलनार इलाके में सुरक्षा बलों के जवानों और सलवा जुडूम के हथियार बंद लोगों ने 11 से 16  मार्च के बीच ताड़मेटला, मोरपल्ली  और  तिम्मापुरम गाँव में हत्या,बलात्कार और आगजनी की थी.  जिसके बाद वहां राहत सामग्री ले जाने का पहला प्रयास सामाजिक कार्यकर्त्ता स्वामी अग्निवेश ने किया, मगर वह असफल रहे. कारण कि राहत सामग्री ले जा रही अग्निवेश की टीम पर पुलिस के इशारे पर सलवा जुडूम के लोगों ने हमला किया था. अबकी बार हर्ष मंदर जाने में इसलिए सफल रहे क्योंकि उनकी सुरक्षा में करीब तीन हजार सुरक्षाकर्मी लगे रहे और उन्होंने  पीड़ित गाँव के दर्शन हवाई मार्ग से किये.  

उसके बाद इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की गयी, जिसके बाद न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया और बतौर कमिश्नर हर्ष मंदर को दंतेवाडा भेजा गया. हर्ष मंदर ने वहां से लौटकर सौंपी गयी रिपोर्ट में बताया था कि उन गावों में भूख से मरने जैसे  हालात हैं, जिसके बाद राज्य सरकार ने उन क्षेत्रों में राहत सामग्री भेजी थी. उसी राहत सामग्री को सुरक्षा बलों ने लूट लिया है और हर्ष मंदर के सामने जुबान खोलने वालों पर हमले और गाँव में दुबारा लूटपाट शुरू हो गयी है.

हिमांशु कुमार के मुताबिक 'आज हमारे एक साथी ने इन गाँवों से लौटकर बताया है कि घटना में तीन आदिवासी महिलाओं के साथ नहीं, बल्कि पांच महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों द्वारा बलात्कार किया गया है.' दंतेवाडा जिले के मोरपल्ली.,ताड्मेताला और तिम्मापुरम गाँवों के करीब 300घरों को सलवा जुडूम के एसपीओ और सीआरपीएफ़ ने   मार्च  में  जला दिया  था. 

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री   रमन सिंह द्वारा दो अप्रैल को ताड्मेतला गाँव में नाममात्र की राहत सामग्री दी गयी, परन्तु उनके हेलीकोप्टर के वापस उडान भरते ही सुरक्षा बलों ने आदिवासियों को राहत में मिली हुई साड़ियाँ फाड़ दी और उसमे से काफी राहत सामग्री को लूट लिया.

इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर खाद्य सुरक्षा सलाहकार हर्षमंदर ने 6अप्रैल को मोरपल्ली का दौरा किया. हर्षमंदर के ग्रामीणों के साथ बातचीत की सरकार द्वारा वीडियोग्राफी कराई गयी और उनके लिए गोंडी से हिन्दी अनुवाद का काम करने वाले गांव के दो आदिवासियों को सरकार ने उसी दिन पकड़ लिया और वे दोनों आदिवासी अंतिम सूचना मिलने तक लापता हैं.

हर्ष मंदर : अब क्या कहते हैं   
 दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय के खाद्य सुरक्षा सलाहकार हर्षमंदर के हेलीकाप्टर के वापिस जाने पर भी कोया कमांडो ने आदिवासियों की बची हुयी खाद्य सामग्री को जम कर लूटा. इन हमलों के बाद तिम्मापुरम में एक अप्रैल को दो बच्चों की भूख से मौत हो गयी है. आसपास के गाँवों के आदिवासियों ने अपने गाँवों पर सरकारी हमले की आशंका से अपनी झोपड़ियों की छतें उतार दी हैं और अब महिलायें कड़ी धूप  में बिना छत के छोटे बच्चों को गोद में लेकर घर में रह रही हैं!

इस मामले में हर्ष मंदर से बातचीत के जनज्वार की ओर से दो बार प्रयास किये गए, मगर उनकी ओर से इस मामले में अब तक कोई सफाई नहीं आ सकी है.   

प्रार्थना कीजिये अब आत्हत्याओं का सिलसिला न शुरू हो


जनज्वार। राजनीतिक गलियारों से लेकर खेल के मैदान तक आजीवन फैले रहे ख्यात तांत्रिक सत्य साईं बाबा की आज सुबह साढे़ सात बजे मौत हो गयी। देश- दुनिया में बसे उनके लाखों भक्तों को बाबा के मरने का गहरा अफसोस है और वे मातम मना रहे हैं। लेकिन  कहीं यह मातम आत्महत्याओं में तब्दील ना हो, सरकार को इसका विशेष ध्यान  रखना पड़ेगा.   

आज सुबह बाबा की जांच कर रहे डाक्टरों ने साफ कह दिया था कि घटते ब्लड प्रेशर के कारण उनके अंग अब काम नहीं कर रहे हैं। उनके स्वास्थ्य को लेकर डॉक्टरों के हाथ खड़ा करने के बाद देष-दुनिया में फैले उनके भक्तों को सिर्फ बाबा के अंतिम समय का ही इंतजार रह गया था। हालांकि इनमें से बहुतों को उम्मीद थी कि बाबा कोई चमत्कार कर देंगे जिससे मौत उनके दरवाजे से लौट जायेगी, लेकिन सत्य साईं भक्तों की इस उम्मीद पर अपने जीवन के अंतिम समय में खरा नहीं उतर सके।

साईं की बिगड़ती हालत का समाचार सुनकर लाखों  की संख्या में पहुंचे भक्त जो थोड़ी देर पहले तक किसी चमत्कार की उम्मीद में आंध्र प्रदेष के पुट्टापर्थी स्थित आश्रम के आसपास प्रार्थना में जुटे थे,अब मातम मना रहे हैं। गौरतलब है कि साईं बाबा 28मार्च से साईं बाबा उच्च आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती थे।

अगर किसी के मरने के बाद सबसे प्रचलित टिप्पणी का सहारा लिया जाये तो कहा जा सकता है कि ‘भाग्य का लेखा कौन मिटा सकता है और एक न एक दिन सबको तो ये दुनिया छोड़ कर जाना ही है।’ जाहिर तौर पर मातम के माहौल में यह टिप्पणी दुखितों के लिए राहत का काम करती है।

मगर सवाल है कि क्या साईं से गहरे जुड़े भक्तों पर यह टिप्पणी कोई असर कर पायेगी या उनके कुछ सैकड़ा भक्त अपने आदि गुरू साईं के मरने के शोक में आत्महत्या करेंगे। आंध्र में ऐसी पिछली वारदात याद करें तो प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में मौत की खबर सुनकर कई सैकड़ा लोगों ने दुखित होकर आत्महत्याएं की थीं।

अब जबकि साईं मर चुके हैं और किसी भी राजनेता के मुकाबले उनके भक्तों की संख्या ज्यादा है, इसके मद्देनजर सरकार ने कोई एहतियात बरता है कि लोग आत्महत्या करने की मानसिकता में न जायें। कहीं ऐसा न हो कि बाबा की षव यात्रा के बाद या साथ में ही भक्तों की षवयात्राएं निकलें। इस संभावना से इसलिए भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अपने प्रिय लोगों की मौत के बाद उनको चाहने वालों की आत्महत्या का तमिलनाडू और आंध््रा में पुराना रिकार्ड है।

ऐसे में इस मानसिक दासता से भक्तों को उबारने का कोई उपाय सरकार और बाबा से जुड़ी संस्थाओं को करना चाहिए। संभव है वह कोई अपील आदि का तरीका हो। दूसरा अगर आम लोग आत्महत्याएं करेंगे तो उनके परिवार उजड़ जायेंगे।

बाबा तो अपने पीछे चालीस हजार करोड़ की संपत्ति छोड़ गये हैं, मगर उनके भक्तों के साथ तो यह सुविधा नहीं होगी। उपर से सरकार भी बाबा के दुख में मरने वाले परिवारों को कोई मुआवजा नहीं देगी। इसलिए कहीं ऐसा न हो कि बाबा के साथ मुक्ति की चाह में मरने वाले भक्तों के परिवार 40 रूपये के लिए भी तरसें।

Apr 23, 2011

एक डॉक्टर और हजारों डब्बा भूमिया


चीन एकाधिकारवादी देश है, जहां लेखक लियू जियाबाओ को सरकार के खिलाफ बयान देने के लिए 10 साल की सजा सुनाई है। लोकतांत्रिक भारत में एक अदालत ने इसी अपराध में विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई...

रामचन्द्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने विनायक सेन को जमानत दे दी। डॉक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को रायपुर की एक अदालत ने राष्ट्रद्रोह के इल्जाम में आजीवन कैद की सजा दी थी। डॉ.सेन पर नक्सलवादियों के हमदर्द होने का आरोप लगाया गया था और यह भी कहा गया था कि वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के संदेशवाहक की तरह काम कर रहे थे।

निचली अदालत के फैसले की तीखी आलोचना हुई, जहां अदालती कार्यवाही मजाक बन गई थी। छत्तीसगढ़ सरकार ने कोई ठोस सुबूत पेश करने की बजाय आरोपों और अफवाहों से ही काम चलाया। एक बार तो यह तक कहा गया कि डॉ.सेन के घर में कोई स्टैथोस्कोप नहीं पाया गया, इसलिए वह डॉक्टर नहीं, बल्कि माओवादी हैं।

अगर सुबूत मजबूत होता, तो भी सजा अतार्किक थी। चीन एकाधिकारवादी देश है, जहां लेखक लियू जियाबाओ को सरकार के खिलाफ बयान देने के लिए 10 साल की सजा सुनाई है। लोकतांत्रिक भारत में एक अदालत ने इसी अपराध में विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

विनायक सेन : और कितने अभी जेल में

डॉ. सेन को जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रक्रिया की भी आलोचना की, जिसके जरिये उन्हें सजा सुनाई गई थी। सुनवाई करने वाले दो जजों न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी और न्यायमूर्ति चंद्रमौली प्रसाद ने कहा कि किसी के पास माओवादी साहित्य मिल जाने से कोई माओवादी नहीं बन जाता, जैसे कि ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ रखने से कोई गांधीवादी नहीं हो जाता। फैसले को पढ़ते समय मुझे कई वर्ष पहले छत्तीसगढ़ की एक जेल का दौरा याद आ गया।

मई 2006 में मैं निष्पक्ष नागरिकों के एक दल के सदस्य की हैसियत से माओवादियों और सलवा जुडूम के बीच चल रहे गृहयुद्ध के नतीजों की पड़ताल करने गया था। सलवा जुडूम वह सशस्त्र गैरसरकारी समूह है, जिसे छत्तीसगढ़ सरकार ने बनवाया है। मैंने अपने कागजात निकालकर देखे, 21 मई 2006 को मैंने जगदलपुर जेल का दौरा किया था। सन 1919 में बनी उस जेल में विशाल, हवादार और रोशनी से भरपूर कमरे हैं। कमरे एक आंगन के चारों ओर बने हुए हैं, हरेक कमरे में लगभग 50 कैदी रखे गए थे।

वैसे तो भारतीय जेलें आमतौर पर संकरी, भीड़ भरी, अंधेरी और गंदी होती हैं। वह जेल एक अपवाद थी। उसी तरह उस जेल के अधीक्षक भी थे। एक लंबे कद के विचारवान और दयालु शख्स अखिलेश तोमर। तोमर साहब हर सप्ताह कैदियों की ओर से एक नृत्य और संगीत का कार्यक्रम करते थे। इसके अलावा भी मनोरंजन के कई साधन थे। जब हम उस जेल का दौरा कर रहे थे, तब हमने लोगों को कैरम खेलते देखा। उस वक्त जगदलपुर जेल में 1,337 कैदी थे।

सुपरी टेंडेंट के दफ्तर में लगे एक बोर्ड पर इनके नाम अलग-अलग शीर्षकों के तहत रखे गए थे। 184 पुरुष और एक महिला को ‘नक्सलवादी बंदी’ की श्रेणी में रखा गया था। तोमर साहब ने बताया कि यह वर्गीकरण बहुत मोटा-मोटा था। जो कैदी दंतेवाड़ा जिले से आए थे, उन्हें आमतौर पर नक्सलवादी कह दिया जाता था। अधीक्षक ने बताया कि इसका अर्थ यह नहीं कि वे सचमुच नक्सली ही थे।

जेल के दौरे के बाद हमारी टीम को कुछ कैदियों से अलग-अलग बात करने का मौका मिला। मैंने डब्बा भूमिया नामक एक कैदी से बात की, वह 20 से कुछ ऊपर का विनम्र आदिवासी नौजवान था। उसके गांव का नाम बामनपुर था, जो कि भोपालपट्टनम के करीब था। उसने बताया कि वह कैसे जगदलपुर जेल पहुंच गया।

दरअसल, वह एक लिफ्ट इरीगेशन परियोजना में मजदूर था। एक दिन जब वह काम पर था, तब उसे एक सड़क बनाने वाली टीम मिली,जिसने उससे भोपालपट्टनम पुलिस स्टेशन का पता पूछा। वह उनके साथ वहां चला गया, तो पुलिस ने उसे रोक लिया। पुलिस ने उससे उसके गांव में नक्सलियों की उपस्थिति के बारे में पूछताछ की। फिर उन्होंने उसे सलवा जुडूम में भर्ती होने के लिए कहा। उसने कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि उस पर पत्नी, दो छोटे बच्चों और एक विधवा मां की जिम्मेदारी है। इसके बाद उन्होंने उसे गिरफ्तार कर लिया।

इस घटना को तीन महीने हो गए थे। गिरफ्तारी के बाद डब्बा भूमिया को दंतेवाड़ा जेल भेजा गया, जहां से फिर उसे जगदलपुर लाया गया। गिरफ्तारी के बाद से उसने अपने परिवार को नहीं देखा था। मैंने उससे पूछा कि उसका अपने परिवार से संपर्क क्यों नहीं है, तो उसने कहा कि उसके परिजनों ने दंतेवाड़ा तक तो देखा नहीं है, ऐसे में वे जगदलपुर कैसे आ सकते हैं। बहरहाल, उसका एक वकील से संपर्क था, जो एक हफ्ते बाद अदालत में उसकी पैरवी करने वाला था। डब्बा भूमिया को उम्मीद थी कि उस पेशी के बाद उसे जमानत मिल जाएगी और वह अपने परिवार से मिल पाएगा।

मैं नहीं जानता कि उसे जमानत मिल पाई या वह अभी तक जेल में है। एक जानकार ने मुझे बताया कि अदालत में पेशियां अक्सर आखिरी मौके पर रद्द हो जाती हैं, क्योंकि जगदलपुर में फौजदारी अदालतों में कर्मचारियों की कमी है। इसके अलावा तथाकथित नक्सलवादियों के मामलों में विशेष सुरक्षा की जरूरत होती है और वह अक्सर नहीं मिल पाती। यह संभव है कि डब्बा भूमिया बहुत ही शानदार अभिनेता रहा हो, लेकिन मुझे तो वह दंतेवाड़ा के गृहयुद्ध का एक शिकार ही लगा।

रायपुर की अदालत की नजरों में डॉक्टर सेन का अपराध यह था कि वह माओवादी कैदियों से बात करते थे और अपने घर पर माओवादी साहित्य रखते थे। इस तरह उनका अपराध दूर की कौड़ी के जरिये मान लिया गया था। इसी दूर की कौड़ी ने डब्बा भूमिया को भी जेल पहुंचा दिया। यह सुना जाता है कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ की जेलों में हजारों डब्बा भूमिया सिर्फ इसलिए जेलों में हैं, क्योंकि वे उन जिलों में रहते हैं, जहां नक्सलवादी और पुलिस एक-दूसरे के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर कहा जाए, तो इन आदिवासियों ने माओ का पढ़ना तो दूर, उसका नाम तक नहीं सुना होगा। जब रायपुर के जज ने विनायक सेन को सजा सुनाई, तो गृहमंत्री ने कहा कि वह ऊंची अदालत में अपील कर सकते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के गृह युद्ध के शिकार आम आदिवासी यह नहीं कर सकते। वे एक क्रूर और मनमानी करने वाली पुलिस के रहमोकरम पर हैं और अदालतें भ्रष्टाचार और दबावों के नीचे झुकी पड़ी हैं।

डब्बा भूमिया जैसे लोगों के लिए नई दिल्ली तो जगदलपुर से भी बहुत दूर है। डॉ. विनायक सेन को जमानत देने के लिए निस्संदेह सुप्रीम कोर्ट की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में रहने वाले आम आदिवासियों की बदतर हालत के लिए भारतीय लोकतंत्र बधाई का हकदार नहीं हो सकता।

(हिन्दुस्तान  से  साभार) 

कभी रेलगाड़ी में भी झांकिये मिस बनर्जी

दशकों से रेल यात्री ट्रेनों में सरेआम यूं ही तरह-तरह के हथकंडों के द्वारा लुटते आ रहे हैं। कभी इन्हें सशस्त्र लुटेरे लूटते हैं तो कभी यात्रियों के रक्षक के रूप में दिखाई देने वाले सशस्त्र एवं बावर्दी लुटेरे...

निर्मल रानी

राष्ट्रीय स्तर की होनहार एवं उदीयमान वॉलीबाल एवं फुटबाल खिलाड़ी 24वर्षीया अरुणिमा उर्फ़ सोनू सिन्हा पर रेल यात्रा के दौरान लुटेरों द्वारा किए गए हमले के बाद एक बार पुन: रेल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई है। पिछले   11अप्रैल को सोनू सिन्हा को तीन लुटेरों ने पदमावती एक्सप्रेस में चलती ट्रेन में लूटने की कोशिश की। एक खिलाड़ी एवं निडर महिला होने के नाते उसने लूटपाट का विरोध किया तथा लुटेरों का मुकाबला करने की कोशिश की। आख़िरकार बदमाशों ने उसे बरेली तथा चेनहटी स्टेशनों के मध्य चलती ट्रेन  से बाहर धकेल दिया।

ठीक उसी समय दूसरे रेल ट्रैक पर दूसरी ओर से एक अन्य ट्रेन तेज़ी से आ रही थी जिसके नीचे सोनू का पैर आ गया और उसके सिर तथा दाहिने पैर में भी काफी चोटें आईं । डॉक्टरों को उसका जीवन बचाने में बायां पैर काटना पड़ा। यह होनहार महिला खिलाड़ी एक परीक्षा देने के लिए  दिल्ली जा रही थी। ज़ाहिर है इस हादसे के बाद इस उदीयमान महिला खिलाड़ी का कम से कम खेल संबंधी भविष्य तो अब चौपट हो ही गया।

वॉलीबाल खिलाडी सोनू : रेल सुरक्षा का हाल

सोनू सिन्हा जैसे हादसे भविष्य में न हों, इस पर चिंतन-मंथन करने के बजाए चिर-परिचित भारतीय राजनीति की परंपरा के अनुसार राजनीतिज्ञों में सोनू के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन करने की होड़ लगी दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश के खेल मंत्री अयोध्या प्रसाद पाल ने अस्पताल जाकर सोनू से मुलाकात की तथा उसे उत्तर प्रदेश के खेल मंत्रालय में नौकरी का प्रस्ताव दिया। केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन भी सोनू को देखने बरेली मेडिकल कॉलेज पहुंचे तथा उनकी संस्तुति पर सोनू को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती करा दिया गया।

केन्द्रीय मंत्री अजय माकन ने भी सोनू को रेलवे में नौकरी दिए जाने तथा दुर्घटना के बदले उचित मुआवज़ा दिए जाने के लिए रेलमंत्री ममता बैनर्जी को पत्र लिखा है। ज़ाहिर है नेताओं की यह दरियादिली एक ऐसे हादसे के बाद दिखाई दे रही है, जबकि सोनू अपना खेल कैरियर गंवा चुकी है तथा इस प्रकार के अर्थपूर्ण प्रस्ताव न तो उसके खेल कैरियर को पुन: वापस ला सकेंगे न ही उस पर गुज़रने वाली मानसिक पीड़ा की भरपाई कर सकेंगे। सोनू की पीड़ा को महसूस करते हुए भारतीय क्रिकेट टीम के युवराज तथा हरभजन सिंह जैसे खिलाडिय़ों ने भी उसे एक-एक लाख रूपये की आर्थिक सहायता दी है तथा सोनू के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति भी व्यक्त की है।

गौरतलब है कि  ममता बनर्जी ने जबसे रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला है तबसे यह आम चर्चा है कि वे अपना सारा समय और ध्यान रेल मंत्रालय संबंधी काम देखने के बजाए पश्चिम बंगाल की राजनीति पर ही केंद्रित रखती हैं । हो सकता है पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव परिणाम उन्हें प्रदेश की सत्ता तक पहुंचा भी दें और वे रेल मंत्रालय छोड़कर राइटर्स बिल्डिंग  की शोभा बढ़ाने लग जाएं। परंतु अपने रेलमंत्री रहते उन्होंने रेल यात्रियों की सुरक्षा संबंधी कोई उपाय नहीं किए, इस बात का शिकवा पश्चिम बंगाल राज्य के रेलयात्रियों सहित पूरे देश के उन सभी रेल यात्रियों को रहेगा जो अपनी यात्रा शुरु होने से लेकर यात्रा की समाप्ति तक स्वयं को घोर असुरक्षित महसूस करते हैं।

ममता ने रेल विकास के लिए निश्चित रूप से कई नई योजनाएं शुरु की हैं। नई दूरगामी तथा तीव्र गति से चलने वाली कई नई रेलगाडिय़ों से भी देश का परिचय कराया है। रेलवे के आधुनिकीकरण के भी काम हुए हैं तथा दुरंतो और महिला विशेष ट्रेन जैसे नए प्रयोग भी सफल हो रहे हैं। परंतु रेल यात्रियों की सुरक्षा संबंधी बुनियादी प्रश्र आज भी वैसा ही नज़र आ रहा है। यानी आज़ाद भारत के आज़ाद रेल यात्री और उन्हें लूटने वाले आज़ाद लुटेरे ट्रेनों में यात्रियों को बेखौफ लूट रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि रेल यात्रा में असुरक्षा का वातावरण कोई ममता बनर्जी या लालू यादव के ही कार्यकाल की बातें हो। दशकों से रेल यात्री ट्रेनों में सरेआम यूं ही तरह-तरह के हथकंडों के द्वारा लुटते आ रहे हैं। कभी इन्हें सशस्त्र लुटेरे लूटते हैं तो कभी यात्रियों के रक्षक के रूप में दिखाई देने वाले सशस्त्र एवं बावर्दी लुटेरे। कभी रेलगाडिय़ों में खाने-पीने का सामान बेचने वाले हॉकर यात्रियों को नकली, सड़ा-गला, मिलावटी, महंगा तथा अधिक कीमत लेकर कम सामान देकर पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर लूटते दिखाई देते हैं, तो कभी हिजड़ों का भेष बनाए बदमाश भीख मांगने के नाम पर यात्रियों से जबरन पैसे वसूलते हैं। यदि इन्हें कोई यात्री पैसे देने से मना करता है तो यह हिजड़े उसके मुंह पर थप्पड़ मारने तक से नहीं हिचकिचाते।

रेलगाडिय़ों में नकली पेय पदार्थ ठंडा और पानी की बोतल सबकुछ धड़ल्ले से यात्रियों के हाथों बेचा जाता है। लूट का आलम तो यहां तक है कि कई स्टेशन पर प्लेटफार्म पर ट्रेन आने के समय बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से गर्मी के दिनों में पीने के पानी की प्लेटफार्म पर होने वाली सप्लाई बंद कर दी जाती है। ऐसा केवल इसलिए किया जाता है ताकि गर्मी की शिद्दत और प्यास से परेशानहाल यात्री पानी न मिलने पर पानी की बोतलें या कोल्ड ड्रिंक्स खरीदने पर मजबूर हों। और जब यात्रियों को लूटने की योजनाएं इस स्तर तक बनने लगें, फिर आप स्वयं समझ लीजिए कि ऐसे स्टेशन पर आपको असली,  ब्रांडेड या शुद्ध पानी की बोतल अथवा कोल्ड ड्रिंक्स आखिर कैसे मिल सकता है?

चुनाव प्रचार में व्यस्त ममता : रेल को कौन संभाले  
 रहा सवाल रेलयात्रियों को नशीली वस्तुएं खिला-पिलाकर उनके सामान लूटने का, तो यात्रियों की लूट का यह फार्मूला तो बहुत पुराना और चिर-परिचित हो चुका है। इसके बावजूद ज़हरखुरानी नामक लूट का यह तरीका भी नियंत्रित होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कई ट्रेनों में जुआरी के भेष में ठगों का गिरोह सक्रिय रहता है। यह गिरोह पहले आपस में जुआ खेलता है, फिर आम यात्रियों को जुआ खेलने के लिए आकर्षित करता है तथा मिलीभगत कर उन्हें ठग लेता है।

सवाल यह है कि क्या भारतीय रेल विभाग के अधिकारियों तथा सुरक्षा संबंधी विभागों ने इस विषय पर नकेल कसने की कभी कोई गंभीर कोशिश की है? ऐसे में सोनू सिन्हा जैसी खिलाड़ी के साथ होने वाली घटना निश्चित रूप से भारतीय रेल में व्याप्त असुरक्षा और चोरी-डकैती के वातावरण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उजागर करती है। ऐसे में निश्चित रूप से देश की प्रतिष्ठा तथा साख का भी सवाल खड़ा होता है। लिहाज़ा रेल यात्रियों को उनके हाल पर भगवान भरोसे छोडऩे के बजाए उनकी सुरक्षा के  उपाय किए जाने की तत्काल ज़रूरत है।

इन उपायों में सर्वप्रथम तो पूरे देश में रेलवे स्टेशन सहित सभी रेलगाडिय़ों में भी सीसी टीवी कैमरा प्रत्येक डिब्बे में लगा होना तथा लगाने के बाद उसका चलते रहना अत्यंत ज़रूरी है। उसके पश्चात जीआरपी तथा आरपीएफ की  संयुक्त कमान में रेल यात्रियों की सुरक्षा के लिए प्रत्येक डिब्बे में कम से कम दो सशस्त्र पुलिसकर्मी तैनात किए जाने चाहिए। या फिर केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल(सीआईएसएफ) को भारतीय रेल यात्रियों की सुरक्षा की भी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। रेलवे में लूटपाट करने वाले तथा मिलावटी और नकली सामान बेचने वाले अपराधियों के विरुद्ध नए और सख्त कानून बनाने की सख्त जरुरत है.



लेखिका राजनीतिक-सामाजिक मसलों पर लिखती हैं और उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं.