Dec 22, 2010

कवि निकानोर पार्रा सान्दोवाल


कवि और अनुवादक नीलाभ ने अपने ब्लॉग 'नीलाभ का मोर्चा '  पर जानकारी दी है कि वे देश-विदेश के जाने-माने कवियों की रचनाओं के लगातार अनुवाद पेश करेंगे.इसी कड़ी में पढ़िए चीले के कवि  निकानोर पार्रा सान्दोवाल की कविता...


युवा कवि

चाहे जैसा लिखो,
जो भी शैली तुम्हें पसन्द हो, अपना लो
बहुत ज़्यादा ख़ून बह चुका है
पुल के नीचे से
यह मानते रहने के लिए
कि सिर्फ़ एक ही रास्ता सही है
कविता में हर बात की इजाज़त है
शर्त बस यही है
तुम्हें बेहतर बनाना है कोरे पन्ने को

नामों का परिवर्तन

साहित्य-प्रेमियों को
मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
मैं कुछ चीज़ों के नाम बदलने जा रहा हूँ।
मेरी मान्यता यह है :
कवि अपने क़ौल का सच्चा नहीं
अगर वह चीज़ों के नाम नहीं बदलता।

क्या कारण है कि सूरज को
हमेशा सूरज ही कहा जाता रहा है ?
मैं कहता हूँ कि उसे
एक डग में चालीस कोस नापते जूतों वाली
बिल्ली कहा जाय।

मेरे जूते ताबूतों जैसे लगते हैं ?
तो जान लीजिए कि आज के बाद
जूतों को ताबूत कहा जायेगा।

बता दीजिए, सूचित कर दीजिए,
प्रकाशित कर दीजिए इसे -
कि जूतों का नाम बदल दिया गया है :
अब से उन्हें ताबूत कहा जायेगा।

ख़ैर, रात तो ख़ासी लम्बी है।
अपना सम्मान करने वाले हर मूर्ख के पास
उसका एक अपना शब्द-कोश तो होना ही चाहिए

और इससे पहले कि मैं भूल जाऊँ
ईश्वर को भी तो अपना नाम बदलवाना पड़ेगा
हर कोई उसे जो नाम देना चाहे दे दे
यह एक निजी समस्या है।

रोलर कोस्टर

आधी सदी तक
कविता
गम्भीर मूर्खों का स्वर्ग थी
जब तक कि मैंने आ कर
अपना रोलर कोस्टर नहीं बनाया
सवार हो जाओ अगर तुम्हारा जी चाहे
लेकिन अगर तुम नाक और मुंह
फोड़वा कर उतरो
तो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है

मेरा प्रस्ताव है कि बैठक स्थगित कर दी जाय

देवियो और सज्जनो
मेरे पास सिर्फ़ एक सवाल है:
क्या हम सूर्य की सन्तान हैं या धरती की ?
क्योंकि अगर हम केवल धरती हैं
तो मुझे इस फ़िल्म की शूटिंग
जारी रखने में कोई तुक नहीं नज़र आता।
मेरा प्रस्ताव है कि बैठक स्थगित कर दी जाय।

रस्में

हर बार
जब मैं लौटता हूँ अपने देश
लम्बी यात्राओं के बाद
सबसे पहले मैं
उन लोगों के बारे में पूछता हूँ
जो दिवंगत हो गये हैं:
महज़ मौत की सरल-सी क्रिया से
सभी लोग नायक हैं
और नायक ही हमारे शिक्षक हैं
फिर मैं पूछता हूँ
घायलों के बारे में।
इसके बाद ही,
जब यह छोटी-सी रस्म पूरी हो जाती है
मैं माँग करता हूँ जीवन के अपने अधिकार की :
खाता हूँ, पीता हूँ, आराम करता हूँ
आँखें मूँदता हूँ ताकि और भी साफ़ देख सकूं
और गाता हूँ मैं विद्वेष-भरे स्वर में
इस सदी के आरम्भिक दिनों का कोई गीत

अधूरा प्रेमी

एक नव विवाहित जोड़ा
आ कर रुकता है एक क़ब्र के पास
वधू मातमी सफ़ेद लिबास में लिपटी है
उनके देखे बिना उन पर नज़र रखने के लिए
मैं एक खम्भे के पीछे छिप जाता हूँ
गहरी उदासी में डूब कर जब वधू
अपने पिता की कब्र से घास साफ़ करती है
उसका अधूरा प्रेमी बड़ी तन्मयता से
पत्रिका पढ़ता रहता है

घड़ियाँ

सान्तियागो, चिली में
दिन बेहद लम्बे होते हैं :
एक दिन में अनेक सदियाँ
खच्चरों पर सवार
सागर-सिवार के फेरी वालों की तरह
तुम उबासी लेते हो -
फिर-फिर उबासी लेते हो

लेकिन हफ़्ते बहुत छोटे होते हैं
महीने सरपट गुज़रते हैं
और वर्षों ने तो जैसे पंख उगा लिये हैं

कविता मेरे साथ ख़त्म होती है

मैं किसी चीज़ को ख़त्म नहीं कर रहा
मुझे इस बारे में कोई भ्रम नहीं है
मैं कविताएँ रचते रहना चाहता था
लेकिन प्रेरणा ही चुक गयी।

कविता पूरी तरह खरी उतरी
मेरा ही चाल-चलन बहुत ख़राब रहा
यह कहने से मुझे क्या फ़ायदा है
कि मैं खरा उतरा
और कविता ने बुरा आचरण किया
जब सभी जानते हैं दोष मेरा है ?
मूर्ख बस इसी लायक होता है
कविता पूरी तरह खरी उतरी है
मैंने ही बहुत बुरा आचरण किया
कविता मेरे साथ ख़त्म होती है।

अनजान औरत को लिखे गये पत्र

जब बरसों बीत जायें, जब कई साल
बीत जायें और हवा
तुम्हारी और मेरी आत्मा के बीच
खाई खोद चुकी हो, जब कई बरस
गुज़र जायें और मैं
महज़ वह आदमी रह जाऊँ
जिसने प्यार किया,
जो केवल एक क्षण के लिए
तुम्हारे होंटों पर टिका,

वह बेचारा आदमी
जो बाग़ों में टहलते-टहलते
थक गया हो
जब तुम कहाँ होगी?
कहाँ होगी तुम
ओ मेरे चुम्बनों की बेटी।
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निकानोर पार्रा सान्दोवाल का जन्म 5सितम्बर 1914को चीले (दक्षिण अमेरिका ) के शहर चिलैन के पास सान फ़ैबिअन दे अलीचो नामक स्थान में हुआ. वे कवि के साथ-साथ गणितज्ञ भी हैं.लातीनी अमेरिका में वे बहुत प्रसिद्ध हैं और जाने-माने काव्य आन्दोलन "ऐण्टी पोएट्री"के जनक हैं जिसका आधुनिक लातीनी अमेरिकी  ही नहीं,अमेरिकी  और यूरोपीय कविता पर गहरा असर पड़ा है.उनकी कविता का सारा उद्देश्य व्यर्थ के अलन्करणों से कविता को मुक्त करके पाठक को सम्बोधित करना है,जिसका मतलब है कि उनकी कविता अधिक देसी प्रभावों से युक्त है.उनका पहला ही कविता संग्रह "पोएमास ई ऐण्टीपोएमास" अब लातीनी अमेरिकी साहित्य का एक गौरव ग्रन्थ बन चुका है.

दलितों पर अत्याचार


पिछड़े-दलितों के साथ हो रही सामाजिक गैरबराबरी उत्तराखंड में कभी मुकम्मिल सवाल के तौर पर सामने नहीं आ सकी। न ही वहां होने वाली ज्यादतियां दूसरे राज्यों की तरह मुद्दा बन पाती हैं। इसे आंकड़ों में नहीं, घटनाओं के जरिये बता रहे हैं...

राजा राम विद्यार्थी

आदमी को अपने ढंग से जीने का अधिकार है और यह अधिकार वहां तक है,जब तक वह दूसरों के जीने के ढंग में दखल नहीं करता। अगर वह दखल करता है,तो उसके लिए कानून-व्यवस्था है परन्तु कानून-व्यवस्था भी आज या तो कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली है,या औने-पौने दामों में बिकने वाली वस्तु हो गयी है। खासकर उत्तर-भारत में तो कानून-व्यवस्था दबंगो की रखैल बनकर रह गयी है। वर्ष 1985से लेकर 2005तक घटी कुछ ऐसी घटनाओं का ब्योरा मैं उत्तराखंड से दे रहा हूं जिसमें मैं खुद किसी न किसी तरह से शामिल रहा।

पहली घटना नैनीताल जिले के कोस्याकुटोली तहसील,विकासखण्ड बेतालघाट,पट्टी मल्ला कोस्यां का एक गांव है चड्यूला। चड्यूला गांव में एक परिवार ब्राह्मण तथा एक परिवार शिल्पकार रहता है। शेष पूरा का पूरा गांव ठाकुरों का है। ब्राह्मण और शिल्पकार परिवार यहां के लोगों ने अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बसाया है,ताकि ब्राह्मण विशेष आयोजनों में पूजा-पाठ आदि करेगा और, एक परिवार शिल्पकार जो की ठाकुरों का सारा काम लुहार, बढ़ई, दर्जी आदि जितने भी शिल्प हैं उन सबको करेगा। इस कारण यहां निवास करने वाला शिल्पकार परिवार सारे शिल्पों में पारंगत रहता है।

चड्यूला गांव एक दुर्गम पहाड़ी पर बसा है। कोसी नदी के किनारे होते हुए भी इस गांव से कोसी दो किलोमीटर गहराई में है। चड्यूला से कोसी तक जाना सहज आसान नहीं है। गांव में मात्र प्राइमरी स्कूल है। इण्टर कालेज यहां से 10किमी की दूरी पर बेतालघाट में है, जो कि पहले नहीं था। इसलिए यहां शिक्षा का स्तर काफी गिरा हुआ है। पूरे गांव में हाईस्कूल या इण्टर पास शायद खोजने पर ही मिलेगा।


चड्यूला में जो शिल्पकार परिवार है कभी इस परिवार में दो भाई हुआ करते थे। बड़ा भाई गंगाराम और छोटा भाई दयाल राम। गंगाराम गांव के लोगों का सभी काम करता था और दयाल राम भी मेहनत-मजदूरी करता था। गंगाराम जहां अपना मेहनताना मांगने में झिझकता था वहीं दयालराम अपने मेहनताना मांगने के लिए लड़-मरने को तैयार रहता था। प्रकृति ने दयालराम को स्वस्थ और मजबूत देह प्रदान की थी। चार आदमी मिलकर भी उसका बालबांका नहीं कर सकते थे।

इस कारण सवर्णों को एक दलित के हाथ से पिटना नागवार गुजरता था। अगर कोई भी सवर्ण उससे या उसके भाई से अन्याय करने की सोचता तो वह उससे भिड़ जाता और ठाकुरों को मुंह की खानी पड़ती। उसके शरीर की बलिष्ठता एवं सुन्दरता से कई सवर्ण स्त्रियां उसकी आशक्त हो गयी थी। जिस कारण चड्यूला के ठाकुरों ने उसकी हत्या की योजना बना ली। लेकिन परेशानी इस बात की थी कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?क्योंकि कोई भी सवर्ण ठाकुर या ब्राह्मण उसके बाहुबल के आगे नहीं टिकता था।

इसलिए सभी सवर्णों ने मिलकर उसके घर को चारों और से घेर लिया। दो तगड़े सवर्ण लड़कों ने उसे बाहर से ललकारा कई सारे सवर्ण उसके मकान की छत,जो कि पाथरों (पत्थरों से ढंकी)गयी थी,के ऊपर चढ़ गये। दयालराम की दो पत्नियां थी। एक गोठ (ग्राउण्ड फ्लोर)में रहती थी,दूसरी अन्दर (फर्स्ट फ्लोर)में रहती थी। दयालराम उनकी ललकार सुनकर बाहर जाने को तत्पर होने लगा तो पत्नियों ने उसे रोका भी,लेकिन बार-बार के ललकारने पर वह बाहर आकर उनसे भिड़ गया।

सारे ठाकुर उसे पत्थरों से कुचल-कुचल कर मार डालते हैं। यह घटना शाम के समय घटती है। दयालराम मर जाता है और हत्यारे वहां से फरार हो जाते हैं। रात के नौ बजे करीब उसकी पत्नी जो कि गोठ में रहती थी,अपने दो बच्चों को लेकर चड्यूला से लगभग 25कि0मी0दूर मामले ही जानकारी देने पटवारी चौकी जो कि गरमपानी में थी, वहां को निकल पड़ती है। रात के 12 बजे वह गरमपानी पहुंच कर पटवारी चौकी में  अपने पति की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराती है।

चड्यूला से गरमपानी तक का रास्ता बीहड़,जंगल से होकर जाता है और पहाड़ में भूत-प्रेत का अंधविश्वास भी चरम पर होता है। जंगली हिंसक जानवर भी होते हैं, उन सब से निडर होकर या यूं कहें पति के हत्यारों को सजा दिलाने का जज्बा उसे इतनी रात में चड्यूला से गरम पानी तक ले आया। किन्तु पुलिस-प्रशासन तथा न्याय-विभाग ने दयालराम के हत्यारों को सजा देने की बजाय चन्द रुपियों में ही छोड़ दिया। आज भी दयालराम के हत्यारे बेखौफ घूम रहे है तथा बेतालघाट क्षेत्र के दलित शिल्पकार आज भी उस गांव में जाने से डरते हैं।

बेतालघाट क्षेत्र में जातिवाद चरम पर है। सवर्णों की दबंगई से यहां के दलित शिल्पकार परेशान रहते हैं। बेतालघाट के ही नजदीकी ग्राम अमेल में 1991में हुई हीरालाल सुनार के लड़के की शादी में प्याऊ से पानी खुद पी लेने के कारण पूरी बारात को लाठी-डण्डों से सवर्णों द्वारा पीटा गया था जिसमें अधिकांश बाराती लहूलुहान हो गये थे। उसकी कोई भी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी। जिस कारण सवर्ण दबंगों के हौसले हमेशा ही बुलंद रहने लगे हैं। 1993में अमेल के ही मोतीराम की लड़की माधवी की शादी में भी बारातियों की खूब जमकर पिटाई की गयी थी। जिसमें से एक बाराती का सिर फोड़ दिया गया था। उसके सिर पर 10टांके लगे थे। इसमें भी भयाक्रान्त शिल्पकारों के द्वारा कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी थी।


उत्तराखण्ड के रहने वाले राजाराम विद्यार्थी दलित चिंतक और साहित्यकार है। लेखों,कहानियों और कविताओं के माध्यम से दलितों-पिछड़ों से जुड़े विषयों को उठाते है।





Dec 21, 2010

'तुम्हारे घर में घुसकर मारा जायेगा'


मां दंतेश्वरी आदिवासी स्वाभिमानी मंच,दंतेवाड़ा की ओर से एक पर्चा प्रसारित हुआ है। इसके प्रसारित किये जाने का मकसद माओवादियों के एजेंट एनजीओ और उन पत्रकारों की असलियत बताना है जो बस्तर में मानवाधिकार का ढोंग रचते हैं। अपनी मूल भावना के साथ, प्रस्तुत है बगैर संपादित पर्चा...

प्रिय जनता

बस्तर के भाकपा(माओवादी)की दरभा डिविजन कमेटी शाखा दंतेवाड़ा की निर्दोष जनता को डरा धमकाकर उनका आर्थिक, शारीरिक, मानसिक शोषण कर रही है। रात के अंधेरों में मासूम जनता के घरों में घुस कर उन्हें बंदूकों की नोक पर गलत काम करवाकर अपना उल्लू सीधा कर रही है।

आंध्र प्रदेश से आकर तथाकथित कामरेडों का चोला ओढ़कर ये नक्सली बस्तर की जनता को गुमराह कर उन्हें विकास से कोसों दूर ले जा रहे हैं। आज बस्तर की जनता इन आतंकी रूपी नक्सलियों के कारण 17वीं शताब्दी में जीने को मजबूर हैं।

ये नक्सली स्कूल तोड़कर बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीन रहे हैं। निर्दोष लोगों को मारकर आतंक के साए में जीने का मजबूर कर रहे हैं,रात को जब जनता चैन की नींद सोना चाहती है तो ये कुत्तों की तरह सारी रात जागकर क्षेत्र में आतंक और अशांति फैलाकर ये राक्षस रूपी माओवादी क्या साबित करना चाहते हैं यह तो समझ से परे है। ये भ्रष्ट शोषक  लोग जनता को लूट कर अपना घर भर रहे हैं और अपने बच्चों को बड़ी-बड़ी शिक्षा के लिए दिल्ली, हैदराबाद, बैंगलोर जैसे शहरों में भेज रहे हैं।

मगर बस्तर के के भोले-भाले आदिवासी अपने बच्चों को स्कूल की शिक्षा तक अपने गांव में इन नक्सलियों के कारण नहीं ले पाते हैं। एनएमडीसी,एस्सार और बड़े-बड़े ठेकेदारों से पैसों की मांग कर उनके कामों को बंद करने की धमकी,रात को गाड़ियों की आवाजाही बंद कर लूटपाट का ठेका इन्हीं माओवादियों ने ले रखा है। कथित माओवादियों ने बस्तर की निर्दोष जनता से जीने का हक छीन लिया है।

पर्चे की मूल प्रति: सरकार का गैर सरकारी संगठन


एक कहावत है कि एक अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता मगर जब से डीआईजी कल्लूरी साहब पदस्थ हुए हैं तब से इन नक्सलियों का दिन में चैन और रात को नींद उड़ चुकी है। कल्लुरी जैसे जांबाज अधिकारी जिन्हें आज नहीं तो कल दंतेवाड़ा से जाना है फिर भी वे जनता के हित में इन नक्सलियों से मोर्चा ले रहे हैं।

ये दलाल माओवादी जिनकी रोजी-रोटी दलाली से,लोगों को लूटकर, आतंक फैलाकर, बसों में लूटपाट कर चल रही है। इन माओवादियों को समझ लेना चाहिए कि अब से बस्तर के अमन पर ज्यादा दिनों तक डाका डाल नहीं पाएंगे। आज कोई भी नेता या अफसर क्षेत्र के विकास के बारे में सोचकर जनता की सेवा करना चाहता है तो उन्हें गांवों में ना जाने का फरमान जारी कर जनता से दूर रख ये
माओवादी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।


किसी भी नेता-अफसर को मारने का फरमान जारी कर ये ज्यादा दिनों तक डरा धमका नहीं सकते। अगर तुममें दम है तो अपना नाम, अपने मांबाप का नाम-पता अगर है तो बताओ, तुम्हें तुम्हारे घर में घुसकर मारा जायेगा। ये क्षेत्र की जनता का दावा है।

तथाकथित पत्रकारों एनजीओ के पिटठू नक्सलियों तुम चाहे हिमांशु कुमार हो या अधुरती राय(अरूंधती राय),चाहे एनआर पिल्लई हो चाहे अनिल यादव या यशवंत मिश्रा सबका एक ना एक दिन हिसाब कर दिया जायेगा। मानव अधिकारी कार्यकर्ता की आड़ में तुम ज्यादा दिन तक खैर नहीं मना सकते, तुम्हें जल्द ही बस्तर छोड़ना होगा। नहीं तो कुत्ते की मौत मारे जाओगे।

 
मां दंतेश्वरी
आदिवासी स्वाभिमानी मंच
दंतेवाड़ा

सुरक्षा बलों के शुक्रगुजार हों नक्सली!

दंतेवाड़ा में NEREGAके पैसे से पुलिस के आदेश पर सड़क किनारे का सैंकड़ों किलोमीटर जंगल साफ़ कर दिया गया था.लाखों सागौन के कीमती पेड़ काट डाले गए.उन पेड़ों की लकड़ी से सुरक्षा बलों के अधिकारियों ने फर्नीचर बनवा कर ट्रकों में कर अपने घर यूपी,राजस्थान,हरियाणा भिजवा दिया.


हिमांशु कुमार

केंद्र  सरकार   और प्रधानमंत्री की ओर से चिदंबरम साहब ने घोषणा की है,' नक्सल प्रभावित जिलों में विकास को बढ़ा कर नक्सलवाद को समाप्त किया जायेगा.जिसके लिए नक्सल प्रभावित,प्रत्येक जिले को पहले साल में पच्चीस करोड़ रुपिया दिया जाएगा.'इन जिलों में दंतेवाड़ा भी शामिल है. अभी हम इस बात की बिलकुल चर्चा नहीं करेंगे की इसके साथ ही साथ उन्होंने छत्तीसगढ़ में कितने सौ करोड़ रुपये हथियार खरीदने के लिए भी बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप दे दिए जबकि पच्चीस करोड़ का व्यापक प्रचार किया गया.

पच्चीस करोड़ की इस घोषणा को सुनते समय मेरे मन में दंतेवाडा घूमने लगा ओर इस पैसे का वहां कैसे इस्तेमाल किया जाएगा इस की तस्वीर मेरे सामने बनने लगी.दंतेवाडा इस समय पुलिस और सुरक्षा बलों की छावनी बना हुआ है.वहां क्या काम हो सकता है,कहाँ काम किया जायेगा ,कौन करेगा आदि बातें ये बंदूकधारी एजेंसियां तय करती हैं . अब जो गाँव नक्सल प्रभावित है, यानी जहां के लोग सलवा जुडूम कैम्पों में नहीं आये या जो पुलिस के पास जाकर नक्सलियों की मुखबिरी नहीं करते वो सब नक्सल गाँव मान लिए गए हैं.

इन गावों को ये सरकारी सुरक्षा बंदूकधारी एजेंसियां बदमाश गाँव कहती हैं और वहां कोई भी काम जो लोगों को राहत देने वाला हो वो नहीं होने देतीं, जैसे स्कूल, राशन दूकान,स्वास्थ्य सुविधाएं आदि. इसके पीछे वो ये तर्क भी देती हैं की ये राहत गाँव वालों के मार्फ़त नक्सलियों तक पहुँच जायेगी. तो अब पहले तो ये पच्चीस करोड़ की राशि नक्सल प्रभावित गावों में खर्च ही नहीं होगी और गैर नक्सल प्रभावित गावों में इस मद का प्रयोग दिखाया जायेगा. खर्च दिखाई जायेगी. यानी सरकार के मंसूबे पहले कदम पर ही ओंधे मुंह गिर जायेंगे.और नक्सलियों का इससे कोई नुकसान नहीं होगा, (नक्सलियों को इसके लिए सरकारी बलों का शुक्रगुजार होना चाहिए).

दूसरा ये नक्सल उन्मूलन का पैसा खर्च कौन करेगा?ये फैसला भी सुरक्षा बल ही करेंगी.और इन सुरक्षा बलों के कुछ अपने कुछ ख़ास लोग होते हैं. ये वो लोग होते हैं जिनका काम सलवा जुडूम में ना जुड़े गाँव वालों, सलवा जुडूम को पसंद ना करने वाले आदिवासी जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध सुरक्षा बलों के कान भरते रहते हैं. कान भरने वाले यही चुगलखोर सरकार के मित्र माने जाते हैं.

ये लोग मुख्यतः गैर आदिवासी हैं और बस्तर में बाहर से आये हैं. ये लोग सलवा जुडूम के नेता हैं, कुछ कांग्रेस में जुड़े हैं, कुछ भाजपा में. इनमें से कई उद्योगपतियों के लिए दलाली का भी काम करते हैं और मुख्यतः ठेकेदारी करते हैं.यही लोग साइड बिजनेस के रूप मैं पत्रकारिता का भी काम करते हैं और सरकार का गुणगान करते हैं और जनता की तकलीफों से जुडी खबरों को छिपाने का काम करते हैं.

नक्सल उन्मूलन का ये पच्चीस करोड़ रुपिया इन्ही लोगों के मार्फ़त खर्च किया जाएगा और वास्तविकता में विकास के लिए तरसते लोग तरसते ही रह जायेंगे.ये जनता के दुश्मन लोग और पैसे वाले हो जायेंगे.लोगों का गुस्सा सरकार के प्रति और बढेगा,आदिवासी और अधिक नक्सलियों की तरफ चले जायेंगे.तो सोचा तो ये गया था की इन पच्चीस करोड़ से नक्सलवाद कम होगा, लेकिन इन पच्चीस करोड़ के खर्च का परिणाम उल्टा आएगा.

अन्य आदिवासी इलाकों की तरह दंतेवाड़ा में भी सरकारी भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाले गैर सरकारी संगठन योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिए गए हैं और जो भी सरकारी गड़बड़ियों के बारे मैं प्रश्न करता है उसे नक्सली कह कर जेलों में डाल दिया जाता है. कोपा कुंजाम,करतम जोगा और बहुत सारे जन नेता जेलों में बंद कर दिए गए हैं. तो इस पच्चीस करोड़ रुपयों की बंदरबांट पर अब बोलने वाला कोई नहीं बचा. सारा पैसा पुलिस, अधिकारी और सलवा जुडूम के नेता मिल कर डकार जायेंगे और नक्सलवाद पहले ही की तरह चलता रहेगा.

मुझे याद है दंतेवाड़ा में NEREGAके पैसे से पुलिस के आदेश पर सड़क किनारे का सैंकड़ों किलोमीटर जंगल साफ़ कर दिया गया था. लाखों सागौन के कीमती पेड़ काट डाले गए. उन पेड़ों की लकड़ी से सुरक्षा बलों के अधिकारियों ने फर्नीचर बनवा कर ट्रकों में कर अपने घर यु पी, राजस्थान, हरियाणा भिजवा दिया और कागजों में वृक्षारोपण का काम दिखा दिया गया.तो इस पच्चीस करोड़ से मुझे पूरा विश्वास है पुलिस के फायदे का काम ही किया जाएगा जनता के फायदे का तो बिलकुल नहीं. इसलिए श्रीमान चिदंबरम साहब जनता की आँखों मैं धूल मत झोंकिये और जनता को ये पता चलने दीजिये की जिन्हें वो अपना रक्षक मानती है,वही उसकी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.

अभी तो विकास का पैसा डकारने का एक नया तरीका दंतेवाडा में इजाद किया गया है.अब वहां विकास के काम क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी पुलिस का एसपी खुद ही ले लेता है और आदिवासी विकास का पैसा एसपी को दे दिया जाता है.जो निश्चित न्यूनतम मजदूरी एक सौ के बजाय बीस रूपये रोज में सलवा जुडूम कैम्प में रहने वाले आदिवासियों से काम करवा कर देता है.

उदाहरण के लिए बीजापुर से गंगलूर की सीसी रोड बनाने की एजेंसी बीजापुर का एसपी था.ये वही लायक एसपी थे जिनके संरक्षण में 12महूआ बीनते हुए लोगों को कुल्हाड़ी से काट दिया गया था.संतसपुर-पोंजेर कांड के नाम से जो नरसंहार मशहूर हुआ था,पहले तो इन एसपी साहब ने सरकार की पालतू मीडिया के मार्फ़त प्रचार किया था की पुलिस ने 12नक्सलियों को मार दिया है मगर लाशें नक्सली उठा कर ले गए.

हमारी संस्था के कार्यकर्ताओं ने जाकर जाँच की और एक मित्र पत्रकार को भी ले गए जिसके वीडियो में सलवा जुडूम से जुड़ा सरपंच जो इस हत्याकांड में शामिल था,वह सच बयान करते हुए कैमरे पर दिख रहा है.बाद में जब और ज्यादा शोर हुआ तो कांग्रेस ने अपना जाँच दल वहां भेजा था,अंत में राज्य मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर इन्ही एसपी साहब को गाँव में जाकर वही लाशें खोदनी पडीं जिसे वो नक्सलियों द्वारा ले जाया गया बता चुके थे. उस समय गाँव वालों ने साफ़ साफ़ बयान दिया था कि उनके रिश्तेदारों को पुलिस ने मारा है.जबकि इन्ही एसपी साहब ने एफ़आईआर में लिख दिया था कि गाँव वालों का कहना है कि अज्ञात वर्दीधारियों द्वारा हमारे रिश्तेदारों की हत्या की गयी है.

वो मामला आज तक दबा ही हुआ है,और पुरस्कार स्वरुप इन एसपी साहब को राज्य मानवाधिकार आयोग का सचिव बना दिया गया था.इन्ही एसपी साहब ने सलवा जुडूम के एक नेता मधुकर राव को आदिवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता कोपा कुंजाम को मारने की सुपारी दी थी और कोपा ने इस पर इन्ही एसपी साहब के खिलाफ एक एफआईआर भी दर्ज कराई थी और जिसके परिणाम स्वरुप कोपा जेल में है. ऐसे राज्य में विकास का पचीस करोड़ किसके हाथों में जायेगा, यह जरूरतमंद पहले से ही बखूबी जानते हैं हैं.


दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



Dec 20, 2010

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी


हमारे समय के सर्वाधिक चर्चित कहानीकारों में शुमार उदय प्रकाश को इस वर्ष का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई है।


उदय प्रकाश

जनज्वार से हुई बातचीत में उदय प्रकाश ने बताया कि पुरस्कार दिये जाने की जानकारी बधाई संदेशों से हुई है, जो उन्हें दिये जा रहे हैं। अभी साहित्य अकादमी प्रबंधन की ओर से पुरस्कार दिये जाने की औपचारिक पुष्टि संदेश उदय प्रकाश तक नहीं पहुंच सका है।

साहित्यकार उदय प्रकाश को संभावना है कि यह पुरस्कार उनकी कहानी ‘मोहनदास’ या कविता संग्रह ‘एक भाषा हुआ करती थी’ पर मिला होगा। उनसे यह पूछने पर कि ज्यादा संभावना किस रचना के पुरस्कार मिलने पर है तो उन्होंने ‘मोहनदास’का जिक्र किया।

मोहनदास का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और इस कहानी पर आधारित एक फिल्म भी बन चुकी है जिसका निर्देशन मजहर कामरान ने किया था.लम्बे समय बाद कहानीकार निर्मल वर्मा के बाद कहानी में साहित्य अकादमी पुरस्कार उदय प्रकाश को दूसरी बार दिया जायेगा।

मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के सीतापुर गांव से आनेवाले उदय प्रकाश लंबे समय से दिल्ली में रह रहे हैं। आलोचक और प्रशंसक मानते हैं कि उदय प्रकाश ने अपनी कहानियों में नये आयाम और बिंब गढ़े हैं।

Dec 19, 2010

बलात्कारी सेना, हत्यारी फौज


संभव है यह विडियो देख आप अपने बच्चों की आंखें ढंक लें,परिवार के दूसरे सदस्यों को भी देखने से मनाही करें और खुदा से कहें कि वह आपको इस शोक  से उबरने का साहस दे। शोक और घृणा से भर देने वाला यह विडियो उस श्रीलंकाई सेना की जीत का है जिसकी खुशी में साझीदार हमारी सरकार भी रही है।

यह विडियो लिट्टे विद्रोहियों के 25साल पूराने संघर्ष के खात्मे और 70 वर्ष पूराने इतिहास के छिन्न-भिन्न किये जाने का है जिसकी खुशी हमारे देश के शासकों को भी है। केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने तो बकायदा बयान दिये कि आतंकियों से निपटने में श्रीलंका ने मिसाल कायम की है। गृहमंत्री का यह उत्साही बयान भारतीय संदर्भों में अधिक चिंताजनक है। क्योंकि हमारे देश में भी माओवादी-व्यवस्था परिवर्तन के लिए सरकार के खिलाफ हथियार बंद संघर्ष चला रहे हैं और पूर्वोत्तर और कश्मीर में अलगाववादियों के संघर्ष चरम पर हैं।

लिट्टे विद्रोहियों पर श्रीलंकाई सेना की फैसलाकून जीत की घोषणा के तीन महीने बाद लंदन स्थित चैनल फोर ने यह विडियो प्रसारित किया था। तब श्रीलंका की सरकार ने इसे फर्जी करार दिया था। मगर बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ की जांच  में प्रसारित विडियो का सही पाया गया।



दुबारा यह विडियो पहले के मुकाबले ज्यादा विस्तार से इस वर्ष नवंबर माह में चैनल ने उस समय प्रसारित किया जब श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे लंदन पहुंचे। राजपक्षे लंदन में इस बार व्यक्तिगत कारणों से आये थे। विडियो में साफ सुना जा सकता है कि कैसे मृत नंगी महिलाओं का विडियो बनाते हुए श्रीलंकाई सेना के जवान गालियां दे रहे हैं और उन्हें इसी काबिल बता रहे हैं।

चैनल 4न्यूज के विदेश संवाददाता जोनाथन मिलेर कहते हैं कि ‘हमने पांच मिनट तीस सेकेंड का विडियो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों को भेजा था जिसे देख उन्होंने राय जाहिर किया कि इसकी ‘अंतराष्ट्रीय युद्ध अपराध’के तहत जांच होनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संस्था एमनेस्टी इंटरनेशल के सैम जैरिफी ने कहा कि ‘हमने नये विडियो में कुछ नये तथ्य ये पाये हैं। विडियों में दिखायी दे रही दो महिला कैदियों की स्थिति देख लग रहा है कि उनके साथ यौन अपराध हुआ है।’जबकि इस विडियो को श्रीलंका के उच्चायोग ने फर्जी बताया है और विडियो को पश्चिम के लिट्टे और अलगाववादी समर्थकों की करतूत करार दिया है।

यह विडियो लंबे समय तक यूट्यबू पर भी था। बाद में इसे कश्मीर में सेना की ज्यादतियों को लेकर जारी विडियो के साथ ही वहां से हटा दिया गया। विडियो देख साफ हो जाता है कि श्रीलंकाई सरकार गृहयुद्ध में अपने ही देश के नागरिकों के विद्रोह से कैसे निपटी।

ऐसे में सवाल है कि क्या हमारे देश में भी विद्रोहियों से निपटने का यही तरीका अपनाया जायेगा या अपनाया जा रहा है। क्योंकि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने तमिल विद्राहियों के खिलाफ श्रीलंकाई सरकार और सेना की कार्यवाही की वाहवाही की थी और उसे कार्रवाई का जायज तरीका बताया था।

Dec 17, 2010

और मैं ठगी रह गयी !


करीब तीन घंटे के बाद मेरे नंबर पर घंटी बजी। एक अनजान नंबर देख मेरी उत्सुकता वैसी ही थी जैसी उस अनजान व्यक्ति के दरवाजा खटकाने पर हुई थी...


विभा सचदेवा

जब भी  किसी घर का दरवाजा खुलता है तो दरवाजा खोलने वाले को उत्सुकता होती है कि आखिर कौन है। वही उत्सुकता मुझे भी हुई। दरवाजा खोलते ही मैंने पूछा, ‘कौन, किससे मिलना है?’

जवाब में सामने वाले ने कहा,मैडम मैं आपके दूधवाले का भाई हूं। मैं बताने आया था हमारी मां बहुत बीमार हो गई है और हमलोग मां को आल इंडिया मेडिकल (एम्स)ले जा रहे हैं। उसने मुझसे बताया है चार-पांच दिन नहीं आ पाएगा, तब तक आप कहीं और से दूध ले लेना।

तब मेरे मन में ख्याल आया कि अब थैली वाला दूध पीना पड़ेगा। दूसरे ही पल मेरे मन की भावनाऐं उस बीमार मां के प्रति जाग उठी और वो बोली,‘कोई बात नहीं भईया, हम मैनेज कर लेंगे।’ ये सुनते ही उस आदमी ने कहा ‘मैडम अपना फोन नंबर दे दीजिए,वो आने से पहले आपको बता देगा’। तब मैंने एक पल के लिए सोचा कि नम्बर दूँ की नहीं, फिर   दूसरे ही पल में फोन नंबर दे दिया और वह नंबर लेकर चला गया।

करीब तीन घंटे के बाद मेरे नंबर पर घंटी बजी। एक अनजान नंबर देख मेरी उत्सुकता वैसी ही थी जैसी उस अनजान व्यक्ति के दरवाजा खटकाने पर हुई थी। मेरे फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘मैडम मैं आपका दूध वाला बोल रहा हूं,मेरी मां बहुत बीमार है। प्लीज आप मेरे भाई को कुछ पैसे दे दीजिएगा,बाकी मैं आकर हिसाब कर लूंगा।’ मैंने ठीक है कह, फोन रख दिया। थोड़ी देर बाद वही आदमी आया जो सुबह आया था।

उसे देख मैं बटुआ लेने चली गयी। बटुआ खोलते वक्त मैं दुविधा में रही कि इसको कितने पैसे दूं। एक तरफ दिमाग आ रहा था उतना ही दूं जितने दूध के बनते हैं तो दूसरी तरफ दिल बोल रहा था,‘बेचारे को जरूरत है,इतने से उसका क्या होगा।’ दिल और दिमाग दोनों के इस द्वंद में मैंने अपनी सुनी और 600 रुपये निकालकर दे दिए। बाहर जाकर उसके ये बोलने की देर थी कि पैसा, तो मैंने कहा ये लो भईया। हाथ में नोट लेते हुए उसने कहा ‘मैडम बस इतने से,इतने में तो कुछ नहीं होगा।’

थोडे और दे दीजिए।’ फिर मैंने 500 रुपये और निकाल कर उसे दे दिये। पहले के छह सौ रूपये और अभी दिये 500 रुपये और मिलते ही वह व्यक्ति वहां से छूमंतर हो गया और मैं भी संतुष्टि की भावना के साथ अंदर चली गई। अंदर जाते ही बाहर से किसी के आने की आवाज आई। बाहर की तरफ देखा तो मेरी मां थी। मैंने पूरी बात मां को बताई तो उन्होंने पूछा ‘उसको फोन नंबर कैसे पता चला हमने तो कभी दिया नहीं था।’तब मैंने मां को बताया कि आज ही सुबह मैने ही दिया था। उसके बाद पूरी बात बतायी।

मां चौंकते हुए बोली,‘तुझे कैसे पता वो दूधवाला ही था? तूने पहले कभी उसकी आवाज फोन पर सुनी है।’इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैंने उस नंबर पर फोन मिलाया जिससे उस दूधवाले का फोन आया था। लेकिन जो जवाब मुझे मिला उससे मैं ठगी रह गयी। जिस नंबर से फोन आया था वो मेरी गली के अगली गली में स्थित एसटीडी का नंबर था। जबकि दूधवाला तो शहर से 25 किलोमीटर किसी गांव से आत है।

फोन रखते ही मेरी मां ने पूछा और जवाब सुनने के बाद बोली,‘इतने पढ़े-लिखे होने के बाद भी तेरे में अकल नहीं आई। लड़की के अंदर की अच्छी लड़की जैसे टूट-सी गई थी और बुरी लड़की उसको बार-बार कह रही थी कि देख लिया मेरी बात न मानने का नतीजा। फिर भी उस लड़की ने अपने मन को तसल्ली दी और वो यही दुआ करती रही कि,‘हे भगवान कल दूधवाला न आये और मेरा शक  झूठा साबित हो।

सुबह रोज की तरह आज भी दरवाजा खटकने की आवाज आयी। मैं झट से उठकर बाहर की तरफ भागी तो देखती हूं सामने कि दूधवाला खड़ा है। तभी मेरी मां भी बाहर आ गयी और बोलने लगी ‘और करो अच्छाई। ये कलयुग है रामयुग नहीं, किसी दिन इस अच्छाई के चक्कर मे घर मत लूटवा देना।

इतना बोल मां ने दूधवाले के सामने बर्तन रख दिया। दूधवाला भी मां के गुस्से को ताड़ गया और पूछा,‘अरे क्यों डांट रहीं हैं बीटिया को।’उसके पूछते ही मां षुरू हो गयीं। पूरा किस्सा सुनते ही वह जोर-जोर से हंसने लगा। उसके बाद दूधवाले ने ठगी के ऐसे इतने मामले बताये कि मुझे एकबारगी लगने लगा कि भले लोगों की जगह समाज में बहुत कम रह गयी है। हालांकि मन में द्वंद भी था कि अगर मैंने इसे मान्यता बना ली तो वह बहुतेरे लोग जिन्हें कभी मदद की जरूरत होगी वे भी वंचित रह जायेंगे. 


  •      पुणे स्थित इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ ब्रोडकास्टिंग एंड जर्नलिज्म से इसी वर्ष पत्रकारिता  कर लेखन की शुरुआत. सामाजिक विषयों  और फ़िल्मी  लेखन  में रूची.उनसे sachdeva.vibha@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Dec 16, 2010

सपा और कांग्रेस की शांति में 'पीस पार्टी ' का दखल

मुसलमानों के पक्ष में उलेमा काउंसिल बनी, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी(नेलोपा) ने लड़ाई लड़ी और अब भविष्य की उम्मीदें लेकर पीस पार्टी उभरी है। मुसलमानों को लगता है कि इन तीनों पार्टियों के नेतृत्वकर्ता मुस्लिम है,इसलिए वह समुदाय को संदिग्ध बनाने की कोशिश के खिलाफ मैदान में उतरेंगे।

अजय प्रकाश की रिपोर्ट

बाटला हाउस कांड के बाद उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में राजनीतिक नेतृत्व की चाहत पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर ढंग से उभर कर आयी है। यह चाहत उत्तर प्रदेश में उन दलों के लिये चुनौती साबित होने जा रही है जो अपने को धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अलंबरदार कहते रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से मुसलमानों का भरोसा उठने के तर्कसंगत कारण हैं और अब उनके बीच यह साफ हो चुका है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जवाब एक नया मुस्लिम ध्रुवीकरण ही है।

मुस्लिम समुदाय ने प्रदेश के दो विधानसभा सीटों के लिए हाल ही में हुए उपचुनावों में पीस पार्टी को मुकाबले में खड़ाकर और कांग्रेस को लड़ाई से बाहर कर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। वहीं दोनों सीटों डुमरियागंज और लखीमपुरपर जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी भी इस नये राजनीतिक उभार से सकते में है और आरोप लगा रही है कि पीस पार्टी को गोरखपुर के मठाधीश और सांसद आदित्यनाथ से शह मिल रही है।

मुस्लिम समुदाय की इस तरह की चाहत के कारण पहले भी उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में ऐसी कई पार्टियों या संगठनों का उदय होता रहा है जो मुसलमानों का हिमायती होने की कोशिश में लगे रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में पंजीकृत कुल एक हजार पार्टियों में मुसलमानों की हिमायती करीब 35हैं। केवल उत्तर प्रदेश में पीपुल्स डेमोके्रटिक फ्रंट,   पीस पार्टी ऑफ  इंडिया, मजलिस ए मशवरत, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, भारतीय परचम पार्टी,इंसान दोस्त पार्टी सक्रिय हैं।

मगर दोबारा से इस अहसास को मुकम्मिल जमीन बाटला हाउस कांड ने दी। कारण कि अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पहला मौका था जब उत्तर प्रदेश (खासकर पूर्वी)के मुसलमानों को लगा कि उन्हें नागरिक नहीं मुसलमान समझा जाता है।

आजमगढ़ के युवाओं को जब दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी होने के आरोप में जामिया इलाके के बाटला हाउस में मार गिराया और गिरफ्तार किया था तो मुस्लिमों की नुमांईदगी का दावा करने वाली सपा और कांग्रेस ने खुफिया एजेंसियों के दावों के करीब खड़ा होना मुनासिब समझा। यहां तक कि पार्टियों के स्थानीय और छोटे नेताओं ने आजमगढ़ और आसपास के जिलों से पार्टी समर्थक मुसलमानों से बातचीत बंद कर दी और दिल्ली में बैठे बड़े नेता किंतु-परंतु में बयान देते रहे और फायदा आखिरकार खुफिया एजेंसियों और पुलिस को ही होता रहा।

दिल्ली में 13 सितंबर को हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में शामिल रहने के संदेह में 19 सितंबर 2008 को बाटला हाउस में मारे गये साजिद और आतिफ,और उसके बाद एक टीवी चैनल के बाहर से गिरफ्तार आरोपी सैफ की वजह से पूरे आजमगढ़ की तस्वीर तकरीबन आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर उभरने लगी।

राजधानी दिल्ली में इस घटना के बाद मुसलमानों को खासकर आजमगढ़ से ताल्लुक रखने वालों को हर स्तर पर सामाजिक बहिष्कार और लानत-मलानत झेलनी पड़ी। दिल्ली में रहकर पढ़ाई और नौकरी कर रहे ज्यादातर युवा अपने घर भाग गये,या गुमनाम होने को मजबूर हुए। प्राइमरी स्कूल के शिक्षक परवेज अहमद बताते हैं कि ‘इस पूरे घटनाक्रम ने धर्मनिरपेक्ष और न्याय की आस रखनेवालों को संदेह भर दिया और मुस्लिमों ने मजबूरी में ही सही मुस्लिम नेतृत्व को फिर गले लगाया।’

आजमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता मसीउद्दीन के मुताबिक,‘भारत के जिन नागरिकों के परिजन देश की उन्नती और विकास में सदियों से लगे रहे उन्हें इन आरोपों ने जब संदिग्ध बना दिया तो उनकी अंतिम उम्मीद उन जनप्रतिनिधियों पर टिकी जो उनसे वोट लेते हैं। मगर वह भी ताल ठोककर खुफिया एजेंसियों के गलत तौर-तरीकों के खिलाफ मैदान में नहीं उतरे। यहां तक कि सैफ की गिरफ्तारी के बाद जब यह उजागर हुआ कि उसके पिता समाजवादी पार्टी के नेता हैं तो तत्काल प्रभाव से सपा ने इससे इनकार कर दिया था।’

'जनप्रतिनिधियों का नार्को टेस्ट हो'
राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अयूब  



पीस पार्टी की कई वैकल्पिक मांगों में से एक ‘नार्को टेस्ट’भी है। पीस पार्टी का मानना है-धार्मिक ग्रंथों  पर हाथ रख नेता झूठी कसमें-वादे करते हैं। इसलिए सभी पार्टियों के अध्यक्षों का नार्को जांच हो कि उनके पार्टी चलाने का मकसद देशहित है या माफियाहित।



ऐसे समय में मुसलमानों के पक्ष में उलेमा काउंसिल बनी,नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी(नेलोपा)ने लड़ाई लड़ी और भविष्य की उम्मीदें लेकर पीस पार्टी उभरी। आजमगढ़ के संजरपुर गांव के तारिक कहते हैं,‘मुसलमानों को लगता है कि इन तीनों पार्टियों के नेतृत्वकर्ता मुस्लिम है,इसलिए वह समुदाय को संदिग्ध बनाने की कोशिश के खिलाफ मैदान में उतरेंगे।’

आज यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम प्रतिनिधित्व वाली इन तीनों पार्टियों को राजनीतिक विश्लेषक इसे एक नयी बयार के रूप में देख रहे हैं। हालांकि इन पार्टियों की एक दूसरी ऐतिहासिक सच्चाई कुछ ही दिन मैदान में बने रहने की भी है, जिसका फायदा अंततः दूसरी बड़ी चुनावी पार्टियों को ही होता रहा है।

बाटला हाउस के बाद एक मात्र भरोसेमंद बनी उलेमा काउंसिल के निर्माण के दो साल भी नहीं बीते कि वह खंडित हो गयी और काउंसिल के प्रमुख सदस्य डॉक्टर जावेद अलग हो चुके हैं। आजमगढ़ से  पत्रकार अंबरीश राय कहते हैं,-काउंसिल मुसलमानों का कितना भला कर सकेगी इसका अंदाजा संसदीय चुनाव में आजमगढ़ से भाजपा की जीत से लगाया जा सकता है। जो भाजपा यहां से कभी नहीं जीती थी वह मुस्लिम विरोधी होते हुए भी यहां से पहली बार जीती और सपा हार गयी।’उलेमा काउंसिल के महासचिव असद हयात कहते हैं,‘सपा की हार का कारण काउंसिल नहीं बल्कि सपा का जातिवादी और मुसलमानों को ठगने का इतिहास रहा है।’

उलेमा काउंसिल ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की पांच सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये थे जिनमें लालगंज और आजमगढ़ सीट पर सपा को हारने का कारण बनी। वहीं पीस पार्टी ने पिछले लोकसभा में कुल इक्कीस प्रत्याशी खड़े किये थे और उसे इन क्षेत्रों में चार फीसदी मतदाताओं ने वोट दिये। जाहिर तौर पर ये दोनों पार्टियां सर्वाधिक नुकसान सपा का करने वाली हैं।

 इसलिए इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। पर इस नजरिये से नेलोपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरसद खान ऐतराज रखते हैं। उनकी राय में ‘मुस्लिमों और समाज के कमजोर तबके को सभी पार्टियाँ  ठगती रहीं हैं,इसलिए मुस्लिम नेतृत्व का खालिस मतलब यह न निकाला जाये कि हम सिर्फ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करेंगे।’

आगामी चुनावों में मुस्लिम नेतृत्व की मांग करने वाली इन पार्टियों का प्रदर्शन कैसा होगा,यह तो अभी परखा जाना है। मगर इतना तो साफ है कि पीस पार्टी की बढ़ती ताकत के मद्देनजर बसपा,कांग्रेस और इनसे भी बढ़कर सपा पेरशान है कि प्रदेश में वह अपने को मुसलमानों की हितैषी मानती है।

(पाक्षिक पत्रिका द पब्लिक  एजेंडा से साभार व संपादित)