Nov 19, 2010

प्रगतिशील बाजार का जनवादी लेखक

हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील तबके का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न संस्थानों में  है। इनमें से कई दिग्गजों का वेतन एक लाख रूपए प्रति महीने है। ये वही साहित्यकार हैं जो जनवादी लेखक संगठनों में हाय जनवाद करते रहते हैं और अपनी रचना में जनवाद की दावेदारी करते हैं।

अंजनी कुमार

हिन्दी साहित्य में उभर चुकी जिन प्रवृतियों के बारे में वरिष्ठ लेखक आनंद प्रकाश ने चिंता जाहिर की है उसके राजनीतिक अर्थशास्त्र की बात करते हुए, स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह उत्पादन की व्यवस्था के भीतर अन्य साधनों की तरह ही माल उत्पादक और संस्थागत हो चुका है।

अधिरचना का यह हिस्सा आधार के साथ सिर्फ अन्तरक्रिया ही नहीं कर रहा बल्कि हिन्दी को एक टूल की तरह प्रयोग में लाया गया और शिक्षण संस्थानों के बाहर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संस्थानों में राजभाषा कार्यालय खोले गए। इन सार्वजनिक संस्थानों की अपनी हिन्दी पत्रिका होती थी लेकिन इन कार्यस्थलों पर हिन्दी की उपस्थिति साहित्य सृजन के उद्देश्य से नहीं थी। यह भाषा सिर्फ बाजार को विस्तारित करते हुए बेचने की प्रक्रिया का हिस्सा बनी।

निश्चय ही इसके लिए पूंजी निवेश किया गया। इन संस्थानों को आपस में मिलाया गया। एक प्रक्रिया के तहत उसे साहित्य के अकादमिक जगत तक ले जाया गया। इस तरह के हिन्दी संस्थानों के चलते ही आज अनुवाद एक उद्योग बन चुका है जहां उत्पादन हमारी इच्छा से नहीं उनकी जरूरत के हिसाब से हो रहा है।

हिन्दी भाषा के इस कथित विकास में अंग्रेजी समानार्थी चयन के साथ ही वह सांस्कृतिक परिवेश निर्मित होना शुरू हुआ जहां से जनपदीय या राष्ट्रीय भाषाओं-व्यवहारों का निष्काशन लगातार जारी रहा। यह निष्काशन वहां के परिवेश व लोगों के प्रति भी बनता गया। अपने ही देश के विविध जीवन, समाज व राजनीति का यह निष्काषन इस हद तक गया कि राष्ट्रभाषा हिन्दी उलटकर हिन्दी भाषी राष्ट्र हो गया।

यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि वैश्वीकरण के ठीक आरम्भिक दौर में ही जनपदीय भाषा के प्रयोग के आधार पर चमत्कार पैदा करने वाले साहित्यकारों की बाढ़ आ गयी। शोध के संस्थान और हिन्दी अकादिमिशियनों की भरमार हो गई। जबकि उसके ठीक पहले के दशकों में स्थानियता का आरोप लगाकर उभर रहे रचनाकारों की मिट्टी पलीत की गयी। बहरहाल हिन्दी के इस राष्ट्रीय समाज के चिंतन के पीछे इस बाजार के इस अर्थशास्त्र के बारे में बात करना जरूरी था।

आमतौर पर यह स्वीकृत है कि साहित्य समाज का दर्पण है और इसके आगे चलने वाली मशाल है। इसके वर्गीय अवधारणा के आधार पर प्रगतिशील,जनवादी,जनसंस्कृति जैसे नाम देकर साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन बनाए गए। ये सांस्कृतिक संस्थान इस बात की स्वीकृति थे कि वे समाज को आगे ले जाने वाली सामुहिक चेतना,निर्णय व कार्यवाई के अगुआ हैं। कह सकते हैं कि ये ज्ञान की उस दोहरी प्रक्रिया के केन्द्र थे जहां से समाज की सामुहिक इच्छा को गतिशील और हालात को बदलने की वस्तुगत स्थितियां निर्मित होनी थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

ये एक ऐसे जड़ निर्णय के केन्द्र बनते गए जहां सारा जोर सरकारी साहित्य संस्थानों,हिन्दी विभागों और हिन्दी अखबारों पत्रिकाओं को प्रभावित करना बन गया। सारा जोर साहित्य,संस्थान व सम्मान के घालमेल से व्यक्ति व संगठन को मजबूत कर लेना बन गया। नए लेखकों का जमाव घनत्व प्रगतिशीलता की आड़ में विभिन्न संगठनों के बाजार में पहुंच के आधार पर बनने लगा। और सारा झगड़ा इसी के आसपास होने या रचा जाने लगा। यह भटकाव है,यह कहना सरलीकरण और इसे दुरूस्त करने की राह में दिवार खड़ा करने जैसा होगा।

हाल ही में उभरकर आए कथित रूप से चर्चित एक कवि का एक संकलन आया हैं। इस कवि ने सायास इराक, अमेरीका व वैश्वीकरण का जिक्र अपनी कविताओं में कई जगह किया है। वह जानता है कि इनका विरोध प्रगतिशीलता है। वह इस तरह प्रगतिशील युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कवि हो जाता है। वह प्रलेस से लेकर जलेस तक का हिस्सा बनता है और साथ ही विभिन्न रचनाकारों के लेख संपादित कर न केवल उन लेखकों का दिल जीतता है साथ ही वह रचनाकार व चिंतक के बतौर अपने नाम किताबों की एक लंबी फेहरिस्त हासिल कर लेता है।

वह एक ऐसा योग्य साहित्यकार है जो हिन्दी विभाग में प्रोफेसर, साहित्य संस्थान का सदस्य, किसी अखबार पत्रिका का साहित्य सलाहकार और प्रगतिशील चिंतन का अगुआ बन सकता है। उदाहरण के तौर पर उद्धृत कवि जितनी आसानी से वर्गीय अवधारणा से परे साहित्य संस्थानों में तैरते हुए आरपार जाता है उसके पीछे सिर्फ उसका अवसरवाद नहीं है। यह संस्थानों की वह भूमिका भी है जहां से बाजार के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन भी किया जा रहा है। और जिसके लिए साहित्यकार सृजन व जोड़तोड़ की होड़ लगाए हुए हैं कि विभाग के कोर्स में उसकी किताब लग जाय या प्र्र्र्रस्तावित पुस्तक सूची में उसका नाम आ जाय।

हिन्दी साहित्य के संस्थान मुख्यतः विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग,सरकारी साहित्य व समाज शोध संस्थान व प्रकाशन समूह एक ऐसे तंत्र को निर्मित करते हैं जिसके केन्द्र में राज्य व सरकार है और जिसका क्षेत्र वैश्वीकृत बाजार है। यहां मूल मसला लेखक व वर्गीय राजनीति का दावा करने वाले लेखक संगठनों का है कि वह इस बाजार और राज्य के तंत्र के बारे में क्या रवैया रखते हैं। इसे देखने के लिए उनके प्रकाशनों को देख सकते हैं। 1990 के बाद हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं व संगठनों ने समय समय पर वैश्वीकरण पर विशेषांक व लेख छापते रहे हैं। एक दो लेखकों को छोड़कर अधिकांश लेखकों ने वैश्वीकरण की तीखी आलोचना करते हुए विश्व बंधुत्व की अवधारणा पर जोर दिया और यह जताने का प्रयास किया कि प्राचीन भारतीय अवधारणा अमेरीका से श्रेष्ठ थी।

ज्ञान, चिंतन व संस्कृति के विकास में इसके अवदान पर सकारात्मक बातें की गई। विकास के लिए सही पूंजी निवेश के तर्क को रखा गया। और यह बड़े बड़े आंकड़ों व पूरे पेज के चार्ट से बताया गया कि वैश्वीकरण से किसान,दलित व मजदूर तबाह हो रहे हैं। साहित्य के गैर सरकारी व सरकारी संस्थान इस प्रचलित अवधारणा को स्वीकार करने, इस आधार पर सम्मानित करने व इसे बेचते हुए उस मानस को निर्मित कर रहे थे जो बाजार में रहते हुए उत्पादकों से अलगाव बनाए रखें। यह चिंतन की एक ऐसी खंडित प्रक्रिया थी जिसमें वस्तुगत स्थितियों का दुहराव व टिप्पणियां तो थी लेकिन ज्ञान व संवेदन के आपसी रिश्ते व प्रक्रिया का निष्काषन या अभाव था।

वैश्वीकरण की संपूर्ण व्यवस्था का नकार आम जन,उसकी सामुहिक चेतना,उसकी इच्छा व निर्णय और विश्व व राष्ट्रीय इतिहास को आगे ले जाने की पहलकदमी की मशाल बन जाने के लिए जिस संवेदनात्मक ज्ञान व ज्ञानात्मक संवेदन की दोहरी प्रकिया की जरूरत थी उसे ये संगठन या तो उसे बाजार के बर्फिले पानी में डुबो दिए या एक ऐसे अवसरवाद में फंस गए जहां उनका एक पैर सरकारी संस्थान में धंस चुका है जबकि दूसरे पर गांव की थोड़ी गर्द बाकी है।

इन्हीं हालातों के चलते किसान आदिवासी मजदूर दलित स्त्री बच्चे और गांव व शहर के बदलते जीवन को चित्रित करने वाली कविताओं,कहानियों उपन्यासों का अभाव होता गया। पूंजीवाद व इससे जनित युद्ध की तबाही से निकाल कर समाजवाद-साम्यवाद की मार्क्सवादी चिंतन को त्याग देने वालों की संख्या में लगातार इजाफा होता गया।

अंत में,आज हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील तबके का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न संस्थानों में है। ये आमतौर पर बड़े पदों पर हैं। वे तनख्वाह के बतौर मोेटी रकम उठाते हैं। इन संस्थानों का पदानुक्रम निश्चय ही जनवादी नहीं है-हो भी नहीं सकता। वेतन भी जनवादी तरीके का नहीं है-यह भी नहीं हो सकता। जीविका व संगठन के इस गैरजनवादी व्यवस्था में ये प्रगतिशील लेखक अपने निचले क्रम में काम करने वाले लोगों के प्रति इस ज्यादती के बारे में बोलना तो दूर एक लेख लिखना भी गवारा नहीं रखते। वेतन के इस जमीन आसमान के फर्क के बारे उन्हें कभी बोलते हुए नहीं सुना गया।

साहित्य के कई दिग्गजों का वेतन एक लाख रूपए प्रति महीने है। ये वहीं साहित्यकार हैं जो न सिर्फ जनवादी लेखक संगठनों हाय जनवाद करते हैं,बल्कि अपनी रचना में जनवाद की दावेदारी करते हैं और दूसरे के साहित्य में इसके अभाव पर टिप्पणी करते हैं। हिन्दी साहित्य में यह एक नई स्थिति है। जो निश्चय ही जटिल है। साहित्यकारों के बीच न केवल विचार का साथ ही भौतिक हालातों का फर्क भी तेजी से बढ़ रहा है। देखना है आवाज किधर से उठती है!



लेखक राजनितिक कार्यकर्त्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.उनसे anjani.dost@yahoo.co.inपर संपर्क किया जा सकता है.



Nov 17, 2010

पुरस्कारों का प्रताप और लेखक-संगठनों की सांस्कृतिक प्रासंगिकता

भाग- २

प्रत्येक लेखक को आवश्यक लगता है कि वह पुरस्कार से सम्मानित हो। ‘सम्मानित’शब्द का प्रयोग उन सभी वर्णनों में मिलेगा जो लेखक की निजी योग्यताओं और उपलब्धियों के बारे में किताब के फ्लैप पर छपते हैं। मन होता है कि ‘सम्मानित’को ‘अपमानित’ के अर्थ में पढ़ा जाए।

आनंद प्रकाश

जिस तरह सरकारी-अर्धसरकारी संस्थान साहित्यिक दुनिया को प्रभावित या अनुशासित करने लगे हैं,उसे देखकर किसी भी रचनाकार का चिंतित होना स्वाभाविक है। स्वयं लेखक भी अपना निजी प्रभाव इस्तेमाल करके संस्थाएं चलाते हैं,और बाध्य होकर वह सब करते हैं जो उनकी रुचि के अनुकूल नहीं है। जाने-अनजाने,व्यवस्था का यह दबाव अब अनेक लेखक झेलते हैं,जबकि सार्थक लेखन विद्यमान शासकीय अधिकार-तंत्र की तीखी आलोचना करता है। इस तरह लेखक होने का अर्थ अपने वक्त के अधिकार-तंत्र का आलोचक होना है। हिंदी के माहौल पर सोचें तो पाएंगे कि यह लेखकीय रवैया पिछले वर्षों में पूरी तरह खतम हो गया है।

आज प्रौढ़ हो चले और नये लेखक सुविधा के नियम से परिचालित हैं। लगता है जैसे चीजों से समझौता करना लेखकों का स्वभाव बन गया है। सामाजिक मुद्दों पर लेखक या तो चुप्पी साध लेते हैं,या काम-चलाऊ और निर्जीव-सा विरोध करते हैं। उनकी रचनाओं में भी मात्र भलमनसाहत, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक सद्भाव, अपने काम से काम रखना, आदि का तर्क प्रतिबिंबित होता है, मानों वो सब आम मेहनतकश जनता को मुहैया करा दिया गया है जो उनकी मूल जरूरत है।

वे चाहते हैं पुरस्कार :  आप पूछते हैं सरोकार 
 रचनाकार को मालूम ही नहीं है कि वर्तमान माहौल मेंसामाजिक गैर-बराबरी,अशिक्षा,नारी-शोषण,बेकारी, दलितों  का उत्पीड़न, गरीबी और सांस्कृतिक पतनशीलता निरंतर बढ़ रहे हैं। यह लेखकों की समझ का हिस्सा ही नहीं है कि गैर-बराबरी और सामाजिक अन्याय को ढंकने हेतु शासक वर्ग ने सद्भाव और सामंजस्य का सिद्धांत गढ़ा है। आज का सफल लेखक यह देखकर संतुष्ट है कि स्वयं उसके लिए पुरस्कार,प्रशासनिक स्वीकार्यता और छिटपुट सुविधाएं उपलब्ध हैं।
आज वही लेखक प्रभावी एवं स्वीकार्य है जो सरकारी-गैरसरकारी नौकरी पा गया है और संसाधनों पर कब्जा जमाने में सफल हुआ है। इसी लेखक की किताब-पर-किताब छपती है,रचनाएं चर्चित होती हैं,सामयिक टिप्पणियां और वक्तव्य प्रसारित होते हैं और उनकी मदद से साहित्यिक दुनिया में दबदबा बढ़ता है। गोष्ठियां तभी सफल होती हैं जब उन पर इस लेखक की मुहर लगी हो। यह लेखक अकेला या व्यक्ति नहीं है,बल्कि टाइप है और इस तरह अपने जैसों के बड़े समूह का हिस्सा है। वह प्रतिष्ठित तंत्र में शामिल है और उसे चलाता है।

इस प्रसंग में साहित्यिक पुरस्कारों पर स्वतंत्र टिप्पणी जरूरी है। प्रत्येक लेखक को आवश्यक लगता है कि वह पुरस्कार से सम्मानित हो। ‘सम्मानित’शब्द का प्रयोग उन सभी वर्णनों में मिलेगा जो लेखक की निजी योग्यताओं और उपलब्धियों के बारे में किताब के फ्लैप पर छपते हैं। मन होता है कि ‘सम्मानित’को ‘अपमानित’के अर्थ में पढ़ा जाए। मुझे पुरस्कार वितरण समारोहों में सदा अरुचि रही है। वहां जितनी दया का भाव लेखकों के लिए दिखता है,उससे कम उन लोगों के लिए नजर नहीं आता जो पुरस्कार देते हैं। मैं दो-तीन बार ही ऐसे समारोहों में शामिल हुआ हूं।

एक अवसर पर किसी मित्र लेखक को दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कार मिलना था। लगभग पचीस वर्ष पूर्व का वह दृश्य अब तक मेरी स्मृति में अंकित है। संभवतः विभिन्न श्रेणियों में बारह-पंद्रह पुरस्कार रहे होंगे, और संबंधित लेखकों को स्टेज के सामने खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी थी। एक-एक कर लेखकों ने पूरी नम्रता से झुकते हुए दिल्ली के प्रसिद्ध कांग्रेस नेता जगप्रवेश चंद्र के हाथों से पुरस्कार ग्रहण किया।

सभापति पति पद से बोलते हुए श्रीमान चंद्र ने कहा —“लोग चाहते हैं कि हम पुरस्कार की राशि बढ़ा कर पंद्रह हजार रुपये कर दें। बोलिए कर दें?या फिर क्या कहते हैं,इक्कीस हजार कर दें?”श्री चंद्र मुस्कुराते हुए विशेषकर लेखकों को मुखातिब हुए और व्याकरण बदल कर बोले —“कर दूं?”मेरे निकट विष्णु प्रभाकर बैठे थे। अचानक उनका लेखकीय खून खौल उठा। वह खड़े हुए और चिल्ला कर बोले —“साले,तेरे बाप का पैसा है क्या?हमारा ही तो पैसा है। कर दूं!”संयोगवश उसी समय करतल ध्वनि से चंद्र की घोषणा का स्वागत हुआ, और विष्णु जी की आवाज शोर में डूब गई।

सुनता रहा हूं कि राशि के हिसाब से पुरस्कारों की मूल्यवत्ता निर्धारित होती है। पुरस्कार पाने के लिए तैयारी भी की जाती है। कुछ सांस्थानिक अधिकार-प्राप्त लेखक एक दूसरे का खयाल रखते हुए संस्कृति के व्यावहारिक नियमों का पालन भी करते हैं। संबंधित बहस के दौरान तर्कों की कतर-ब्योंत का आलम यह होता है कि कभी जीवनी को साहित्य-रचना माना जाता है,कभी नहीं। इसी तरह हिंदी के कुछ लेखकों को दूसरी भाषा के लेखक की हैसियत से पुरस्कार मिलता है।

कभी अमुक लेखक को पुरस्कार इसलिए मिलता है कि वह बीमार है,अथवा किसी अन्य तरह पैसे के लिए जरूरतमंद है। फिर कुछ लेखकों ने अपनी माली हैसियत के नजरिये से यह भी चाहा है कि पांच-सात लाख तक का पुरस्कार कम है,राशि को एक करोड़ किया जा सकता है। इधर नया विचार आया है कि निजी कंपनियों को सरकारी संस्थानों में प्रवेश देकर राशि में इजाफा किया जाना अपेक्षित है। पूछा जा सकता है कि साहित्यिक सम्मान की बात कर रहे हैं या किसी विज्ञापन-अभियान की?

लेखक संगठनों का मसला ज्यादा पेचीदा है। वहां जनसमर्थक और शासकीय नजरियों के बीच टकराव यद्यपि प्रमुख है,लेकिन कभी-कभी टकराव की तीव्रता कम हो जाती है और रचना-संसार के सामने गंभीर विकृतियां उभरने की चुनौती आ खड़ी होती है। चिंता का विषय यह है कि हिंदी के लेखक-संगठन धीरे-धीरे अपनी भूमिका में क्षीण होने लगे हैं और इस प्रक्रिया में समकालीन लेखन के व्यापक हितों से कट रहे हैं।

अपनी प्रगति का विमर्श
यहां मुख्य रूप से वामपंथी लेखक संगठनों का व्यवहार संदर्भ के केंद्र में है। हिंदी में शासक वर्ग की विचारधारा के वाहक संगठन (मसलन कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ व्यक्ति-लेखकों द्वारा नियंत्रित संगठन)भी हैं जहां लेखकीय उठा-पटक और क्षुद्र अवसरवादिता का बोलबाला है। लेकिन हमारे संदर्भ में उम्मीद की किरण जगाने वाले तीन वामपंथी संगठनों की प्रारंभिक आभा भी मंद होने लगी है। इनमें सबसे कमजोर प्रगतिशील लेखन संगठन है।

यह वही संगठन है जिसके उद्घाटन के वक्त प्रेमचंद का प्रसिद्ध भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’समूचे हिंदी लेखन की आवाज बनकर गूंजा था। वहां प्रेमचंद ने साहित्य को समाज की संघर्ष-प्रक्रिया में आगे चलने वाली मशाल की संज्ञा दी थी। अब प्रलेस निष्क्रियता की कगार पर है और उसका वजूद ऐसे लोगों के हाथों में है जो अपनी सांस्कृतिक प्रासंगिकता कमोबेश खो चुके हैं। प्रलेस के व्यवहार और शासकीय-सांस्थानिक दुनिया से जुड़े अन्य नीति-निर्धारकों की वैचारिक गतिविधि में तात्विक अंतर नहीं है। प्रलेस का समन्वय-केंद्रित नजरिया अब किसी भी तरह अन्याय पर आधारित परिवेश में हस्तक्षेप नहीं करता,बल्कि इसके विपरीत वहां निजी हितों का ही प्रसार या विकास दिखता है।

लिखे को सुधार कर पढ़ें.                                                               

जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच इस प्रसंग में अनेक अपेक्षाएं जगाते हैं और नये रचनाकारों के लिए प्रेरणा का विषय बनकर उभरे हैं। दोनों की ही शुरूआत अस्सी के दशक में हुई और दोनों ने ही पूरी शिद्दत से लेखन के हितों की रक्षा को अपना लक्ष्य घोषित किया। लेकिन क्या वे घोषणाओं से आगे बढ़ पाए,और यदि बढ़ पाए तो कितना?यह सवाल उनके सामने तो है ही,ज्यादा गंभीर रूप में समकालीन रचनाकार के सामने है।

सत्तर के दशक का हिंदी लेखन इस अर्थ में पूर्व तथा बाद के दशकों से भिन्न था कि उसमें वामपंथी विचार के लिए उत्पन्न जिज्ञासा अधिक प्रामाणिक यद्यपि भावना-आधारित थी। यह जिज्ञासा अतीत को सवालिया नजरिये से देखती थी और भविष्य को उम्मीद से ताकती थी। इस जिज्ञासा ने तत्कालीन परिभाषाओं और समाधानों को नाकाफी पाया था,चाहे वे संसद को लेकर हों,संसदेतर संघर्ष के बारे में हों,या इन दोनों के बीच संभावित तालमेल की बात करते हों। इस जिज्ञासा के सामने तीनों ही रास्ते अमूर्त थे,यद्यपि यह स्पष्ट हो गया था कि तत्कालीन संकट की वैचारिक चुनौती को हल करना उपयोगी होगा।

अस्सी के दशक का शुरूआती काल जनवादी लेखक संघ की स्थापना के कारण एकबारगी महत्वपूर्ण हो चला था,शायद इसलिए कि इस काल की पृष्ठभूमि में 1977के चुनावों की अद्भुत घटना प्रेरणा-स्रोत का काम करती थी। जलेस के शुरूआती दौर में उस वक्त के अनेकानेक रचनाकार वामपंथ की ओर आकर्षित हुए थे – लेकिन तभी इसकी विरोधी प्रक्रिया भी शुरू हुई थी कि वामपंथ को अपनाना मध्यवर्गीय सफलता और आत्म-स्थापन का आसान रास्ता नजर आने लगा था।

 
कहाँ खोजें सरोकार
उधर जिन  लेखकों-रचनाकारों ने जलेस की बागडोर संभाली थी,उनमें से कई पुराने यांत्रिक ढंग से सोचते थे और कुछ नए ऐसे थे जो दल-विशेष की प्रभुता को जलेस की वैचारिकता पर आरोपित करना चाहते थे। परिणामतः जल्द ही जलेस को सीमित सोच द्वारा बंदी बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। तीन-चार साल में ही इन कठिनाइयों से उबरने के लिए वाम पंथ द्वारा वैकल्पिक मार्ग की परिकल्पना जन संस्कृति मंच के अधीन रूपायित हुई। अब स्थिति यह है कि जलेस बिखराव की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है,और जसम में एकाधिकारी नेतृत्व की कामना प्रबल हो रही है। इसके घातक परिणाम देखे जा सकते हैं।

यह हिंदी साहित्य के भीतर वैचारिक नेतृत्वहीनता का काल है,और नए-पुराने लेखक धीरे-धीरे शासकीय संस्कृति की रणनीतिक मुहिम का शिकार हो रहे हैं। यद्यपि उम्मीद का दामन छोड़ना उचित नहीं है, लेकिन हिंदी रचना किस तरह अपनी वास्तविक अस्मिता एवं संघर्षशील, समझौताविहीन भूमिका अर्जित कर पाएगी, यह समझ पाना मुश्किल लग रहा है।

(लेख का पहला भाग पढ़ने के लिए कर्सर नीचे ले जाएँ या देखें- वर्तमान प्रगतिशीलता का कांग्रेसी आख्यान )



दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य विभाग  में 2007 तक शिक्षक.  जार्ज लुकाच की पुस्तक 'द थियरी आफ द नावेल' का हिंदी में 'उपन्यास का सिद्धांत' शीर्षक से अनुवाद और 'हिंदी कहानी की विकास प्रक्रिया' पुस्तक प्रकाशित। सत्तर के दशक में दो पत्रिकाओं --मतांतर और युग परिबोध का संपादन। उनसे anand1040@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
 
 

Nov 15, 2010

वर्तमान प्रगतिशीलता का कांग्रेसी आख्यान


भाग- 1
हिंदी साहित्य के सरोकारों पर संवाद की शुरुआत करते हुए मंशा बस इतनी सी है कि साहित्य की सामाजिक उपयोगिता पर बात हो क्योंकि समाज में साहित्य की उपस्थिति लगातार कम होती  जा रही है. ऐसा क्यों हो रहा है को बताने वाले बहुतेरे पक्ष होंगे.हमारी कोशिश होगी सभी पक्ष पूरे तेवर और सरोकार के साथ सामने आयें. बहस की पहली कड़ी में वरिष्ठ लेखक और शिक्षक ...

आनंद प्रकाश

समकालीन हिंदी लेखन,जिससे मेरी मुराद पिछली सदी के अंतिम दो दशकों के लेखन से है,सीधे-सीधे चिंतन-विरोधी है। वह न केवल वर्तमान दौर या पिछले वक्त को समझने में यकीन नहीं रखता,बल्कि स्पष्ट रूप से समझने की क्रिया को ही अनुचित और गैरजरूरी मानता है।

इस लेखन से जुड़े रचनाकारों की चले तो विचार सामग्री पर प्रतिबंध ही लग जाए,और उसे समकालीन विमर्श से निष्कासित कर दिया जाए। फिर,विमर्श की व्याख्या भी इन दिनों अजीबोगरीब हो चली है —अब विमर्श को मात्र वह समझ माना जाता है जिसे रचनाकार अपने माहौल से तात्कालिक अर्थ में प्राकृतिक प्रक्रिया के अंतर्गत ग्रहण करता है। विमर्श,अर्थात सामान्य-बोध पर आधारित और लिखने-जीने के दौरान अर्जित किये गए विचार-बिंदु और मूल्य। सोचा जाता है कि बुद्धि की यही क्रिया वैचारिकता की मूल सामग्री है,और यह भी कि इससे अलग, याने लिखने-जीने से बाहर सामाजिक परिदृश्य से संबंधित विचार रचना के लिए कृत्रिम और बेमानी है। यह एक पक्ष है।

इसके विपरीत दूसरे पक्ष का संबंध मात्र परिदृश्य के बारे में कहने अथवा वक्तव्य देने के लिए किए गए लेखन से है। वह भी इन दिनों समकालीन श्रेणी के अंतर्गत खूब लिखा जा रहा है। समकालीन लेखन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारे दौर में तथाकथित ‘लघु’पत्रिकाओं की शक्ल में महंगे कागज पर छपी और नियमित समय पर निकलने वाली पत्रिकाओं के भीतर एक अलग तरह की विचार-सामग्री का अंबार लगा है।

इस सामग्री के तहत संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, चुनिंदे समाजशास्त्रीय विषयों पर लंबे उबाऊ लेख, इतिहास और कला पर विस्तृत टिप्पणियां,विश्वस्तर के कतिपय विचारकों का हिंदी में विशद विश्लेषण,आदि इस रूप में उपलब्ध है मानों अकस्मात किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के हाथों इसका उद्योग चल पड़ा हो। दिलचस्प है कि देखते-देखते पत्रिकाओं, महाविशेषांकों, विषय-केंद्रित अंकों से हिंदी साहित्य का बाजार पट गया है, जब सामान्य अंकों की पृष्ठ-संख्या डेढ़ सौ पृष्ठों से लेकर तीन सौ पृष्ठों तक हो गई है। साथ ही, ऐसे अनेक लेखकों ने साहित्य जगत में प्रवेश किया है, जिन्हें त्रिलोचन के शब्दों में ‘कविता का ककहरा’ नहीं मालूम, यद्यपि वे काव्य-चिंतन पर अथवा व्यापक साहित्य के सवालों पर विस्तार से लिखते-बोलते हैं। उनका आत्मविश्वास देखते बनता है।

ये दोनों पक्ष परस्पर-विरोधी जान पड़ते हैं,लेकिन असल में वे एक ही सचाई के दो पहलू हैं —साहित्य-लेखन को रचना तक ही महदूद रखना और इसके समानांतर विचार के नाम पर बड़ी मात्रा में गद्य-सामग्री को पाठकों के लाभार्थ उपलब्ध कराना। जो चीज इस परिदृश्य से गायब है,वह है सामान्य अकादमिक सामग्री से अलग गंभीर राजनीतिक विचार जिसे उत्तर आधुनिक चिंतकों ने ‘ग्रेंड नैरेटिव’ याने महा आख्यान कहा है। हिंदी लेखन और विमर्श से महा आख्यान को हटा दिया गया है —ऐसा विमर्श या व्यापक विचार जो चीजों के विभाजन को रोके,उन्हें एकसूत्रता प्रदान करे, और साथ ही सूत्रबद्ध वैचारिकता को समकालीन द्वंद्वों से जोड़े।

मुझे दो वर्ष पहले हुई एक गोष्ठी का प्रसंग याद आता है जब एकाध वक्ताओं को छोड़ कर सभी ने ऐसे यथार्थ की वकालत की जो वर्ग विभाजन से बाहर किसी अमूर्त आम आदमी का है और जिसमें कई विविधताएं और उनकी अपनी विशिष्ट संगतियां हैं। वक्ताओं का कहना था कि महा आख्यान अपना निजी अनुशासन उक्त आम आदमी की विविधता पर आरोपित करता है और उनकी चेतना को बंदी बनाता है। जाहिर है कि महा आख्यान से उनका तात्पर्य वर्गाधारित और मूलतः अंतर्राष्ट्रीय समाजवाद से था। उनकी राय में वर्तमान मनुष्यता का मुख्य शत्रु अंतर्राष्ट्रीय समाजवाद था।

आज हिंदी के उस पूरे लेखन में, अपवादों को छोड़ कर, जो पिछले तीस वर्षों में उभरा है यही विचार सक्रिय है और लेखक हैं कि किसी मिथकीय अनुशासन से लड़ने और उसका विरोध करने की प्रक्रिया में ‘आम आदमी’की स्वतंत्रता प्रतिष्ठित करने में लगे हैं। अनुमानतः वर्तमान कांग्रेस दल के विमर्श को इन लेखकों ने अपनी आत्मा का संवाहक सूत्र बना लिया है। कांग्रेस दल में आज आम आदमी से अलग कुछ भी गवारा नहीं,जो एकाधिकारी पूंजीवाद द्वारा पूर्व योजना के तहत अपनाया गया राजनीतिक विमर्श है। जिन महंगी पत्रिकाओं का ऊपर जिक्र हुआ है,उनमें यही आम आदमी द्वारा महा आख्यान से लड़ने वाली प्रवृत्ति हावी है।

पिछले पचीस-तीस वर्षों में लिखी-छपी रचनाओं पर गौर करें तो पाएंगे कि वहां वर्तमान राजनीतिक-विचारधारात्मक परिदृश्य की गंभीर समझ न के बराबर है। ऐसी बहुत कम रचनाएं हैं जिनमें पूंजीवादी प्रवृत्तियों तथा सांस्थानिक गतिविधियों पर तीखी चोट हो —यद्यपि सामान्य क्रोध अथवा असंतोष की मात्रा वहां पर्याप्त है। वहां प्रयुक्त मुहावरों को देख कर यह भी समझ आता है कि जो संकट सत्तर के दशक के बाद नये रूप में उभरा और जिसकी परिणति नब्बे-इक्यानवे की एकध्रुवीय घटना में हुई, उसने रचनाकार को हाशिये पर ला दिया।

देश का पूरा मध्य वर्ग पिछले बीस वर्षों से एकध्रुवीय दुनिया की चपेट में है। पूर्व दशकों में मध्य वर्ग के लिए नौकरी अहम चीज हुआ करती थी और उसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की पर्याप्त सार्थकता भी यह थी कि उसमें व्यक्ति आर्थिक स्थायित्व तथा सामाजिक गरिमा अर्जित कर सकता था। इन चीजों के बल पर मध्यवर्गीय तबका अपने वक्त की केंद्रीय गतिकी में किंचित हिस्सा ले सकता था। बुर्जुआ राजनीतिक दलों द्वारा परिकल्पित आर्थिक निजीकरण और शासक वर्गों द्वारा उसे मिली स्वीकृति ने मध्य वर्ग से स्थायित्व और गरिमा छीन ली, और उसे पूरी तरह समाज के धनाधारित प्रभाव-क्षेत्रों के हाथों सौंप दिया। अस्सी के दशक में यह प्रक्रिया शुरू हुई और धीरे-धीरे उसने 1990 के निकट एक भरीपूरी व्यवहार प्रणाली का रूप ग्रहण किया। परिणामतः रचनाकार एक लंबी प्रक्रिया के तहत अपने माहौल की अस्थिरता से दो-चार होने लगे। यह परेशानी पिछले वर्षों के लेखन में असंतोष का कारण बनी है।

आज हम पाते हैं कि समकालीन लेखन में वह उत्सवधर्मिता नहीं है,जिसकी बात कुछ चिंतक अतीतकामी नजरिया अपनाते हुए करते हैं। उत्सवधर्मिता दर असल सामाजिक परिवेश से उत्पन्न होती है,मानवता के किन्ही आंतरिक स्रोतों में नहीं,जैसा कि लेखन में इधर एकाध जगह माना जा रहा है। मूल बिंदु पर लौटें तो कह सकते हैं कि समकालीन रचना में उपस्थित असंतोष लेखकों का असंतोष केवल इस अर्थ में है कि मध्यवर्गीय व्यक्ति की हैसियत से हिंदी का रचनाकार एकध्रुवीयता,निजीकरण और पूंजीवादी भूमंडलीकरण का शिकार हुआ है। मात्र इस अर्थ में उसका दर्द वास्तविक है। फिर,रचनाकार उसे जाने-अनजाने केवल व्यक्त कर रहा है, उस पर तीखी वैचारिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर रहा। इसका ठोस कारण है।

साहित्य में जिन्हें हम माडल या आदर्श कहते हैं,वे इन दिनों पूरी तरह बदल गए हैं। बीसवीं सदी की शुरूआत जिस माडल से हुई थी,वह था —महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद का। द्विवेदी चिंतक थे और प्रेमचंद कथाकार। फिर,द्विवेदी को कथा की जानकारी थी और प्रेमचंद के लेखन का बड़ा हिस्सा चिंतनपरक था —यहां तक कि प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में समाजविषयक आलोचनात्मक टिप्पणियों की भरमार है। इसके बाद आया था निराला और मुक्तिबोध का माडल। निराला पूरी तरह बेलाग और निर्मम लेखक थे, जबकि मुक्तिबोध अंतर्मुखी, दुरूह और आत्मविश्लेषक थे। साथ ही, इसके समानांतर एक अन्य माडल जैनेंद्र और अज्ञेय का भी उभरा था। संभवतः उस वक्त कुछ अन्य प्रवृत्तियां भी जनवादी उभार की प्रतिक्रिया में सक्रिय हुई थी।

जैनेंद्र और अज्ञेय व्यक्तिवादी थे और सामाजिक सचाई को संदेह से देखते हुए अपनी चमत्कारी मानसिकता में रमते थे। आजादी के बाद की पीढ़ी साक्षी है कि शीतयुद्ध के चलते निराला और मुक्तिबोध अपने काल में असफल सिद्ध हुए थे। उन दिनों निराला और मुक्तिबोध की श्रेणी में शामिल नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, रांगेय राघव, आदि थे। सत्तर के दशक तक इनका स्थान भी साहित्य के हाशिये पर ही कहीं था। उनकी पंक्ति में यशपाल नामक केवल एक लेखक था,जिसने लोकप्रियता और स्वीकार्यता के स्तर पर बाकी बूर्जुवा लेखकों को टक्कर दी, और उद्देश्यपरक लेखन को प्रतिष्ठित किया।

इसके विपरीत अस्सी और नब्बे के दशकों का माडल देखें। नाम लेने की जरूरत नहीं है,क्योंकि इस माडल को रूपायित करने वालों की लंबी पांत है, जिसके सभी सदस्य सिंह, हंस, लाल और संत हैं। रोचक है कि यह नया माडल बड़ी पत्रिकाओं का संपादक, विश्वविद्यालय का नीतिनिर्धारी विभागाध्यक्ष, सरकारी संस्थान का आला अफसर और ऊंची कमेटी का सदस्य, तथा बड़े प्रकाशकों को लाभ देकर पुस्तक प्रकाशित कराने एवं खरीदवाने वाला सम्मानित-प्रभावी आयोजक-लेखक है। साथ ही,यहां पुरस्कार देना और पाना परस्पर जुड़ गए लगते हैं। इस माडल को देखकर जिस अपेक्षित लेखकीय व्यवहार की तस्वीर बनती है,नयी पीढ़ी का रचनाकार उसे ही अपनाने को बाध्य है। रचना भी निजी क्षेत्र की प्रकृति, उसके नियमों एवं सांस्थानिक हैसियत के मूल्यों से अपना रूपाकार ग्रहण करती है।

पिछले दशकों में श्रेष्ठ साहित्य की परिभाषा भी बदली है। आज श्रेष्ठ साहित्य उसे कहा जाता है जो चर्चा के केंद्र में हो, अर्थात जिसके विषय में सामान्य पाठक न केवल जानते हों, बल्कि जिसके उजले पक्षों पर लंबी बातें भी करते हों। इस संदर्भ में ‘जानने’ का अभिप्राय प्रचार से है और ‘उजले पक्षों पर लंबी बातें करने’ का अभिप्राय गोष्ठियों के आयोजन से। समकालीन साहित्यिक व्यवहार यह वो पक्ष है जिसकी विस्तृत व्याख्या आवश्यक है। जाहिर है, इससे लेखक संगठनों की भूमिका भी प्रभावित हुई है। एक पूरा मध्यवर्गीय तबका निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए लेखक संगठनों की ओर बढ़ने लगा है। इस सवाल पर भी सोचने की जरूरत है।
(अगला हिस्सा शीघ्र ही)


दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य विभाग  में 2007 तक शिक्षक.  जार्ज लुकाच की पुस्तक 'द थियरी आफ द नावेल' का हिंदी में 'उपन्यास का सिद्धांत' शीर्षक से अनुवाद और 'हिंदी कहानी की विकास प्रक्रिया' पुस्तक प्रकाशित। सत्तर के दशक में दो पत्रिकाओं --मतांतर और युग परिबोध का संपादन। उनसे anand1040@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Nov 14, 2010

... आप किसके लिए लड़ रहे हैं?

सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष बदलाव  और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उसी को आगे बढ़ाते हुए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन को उन्होंने एक पत्र लिखा है,जो बताने के लिए काफी है कि  न्याय बहाली की कोशिश में लगे लोगों के साथ सरकारी तंत्र कैसा बर्ताव कर रहा है...

हिमांशु  कुमार

प्रिय विश्वरंजन जी यह पत्र मैं आपको बिलकुल स्थिर चित्त से और आपकी परिस्थिति को समझते हुए लिख रहा हूँ. इस पत्र को लिखते समय मेरे मन पर उत्तेजना, क्रोध अथवा हताशा की कोई छाया नहीं है.

सिंगाराम फ़र्ज़ी मुठभेड़ को अदालत में ले जाने की सज़ा के तौर पर जब हमारा अठारह साल पुराना आश्रम सरकार द्वारा नष्ट कर दिया गया,उसके बाद किराए के मकान में हम आश्रम चला रहे थे.उसपर जनवरी २०१० में मेरे दंतेवाडा छोड़ने के बाद पुलिस ने मकान पर कब्ज़ा कर लिया था और अब एक महीने पहले ही आश्रम का बहुत सा सामान चोरी करके और आश्रम परिसर में खड़े वाहनों का तोड़ फोड़ कर पुलिस वापिस चली गई.

उसके बाद से वहां  दो आदिवासी महिलाएं व एक आदिवासी बूढ़ा रह रहे हैं.आपकी पुलिस नियमित रूप से जाकर इन तीनों कार्यकर्ताओं को डरा रही है और घर के भीतर घुसकर मुझे ढूंढती है तथा महिला कार्यकर्ताओं से कहती है कि आधी रात को आकर हम फिर तलाशी लेंगे.इन कार्यकर्ताओं के अंगूठे के निशान कोरे क़ागज़ों पर आपके पुलिस कर्मियों ने जबरन लिए हैं.हमारी महिला कार्यकर्ताएं मुझसे पूछ रही हैं कि पुलिस उन्हें कोई नुक्सान तो नहीं पहुंचाएगी,और मैं धड़कते दिल से उन्हें जवाब देता हूँ "नहीं,तुमने कौनसी ग़लती की है जो पुलिस तुम्हें नुकसान  पहुंचाएगी, तुम  आराम से रहो." पर मैं जानता हूँ कि मेरे आश्वासन बिल्कुल खोखले हैं.
सच तो यह है कि पुलिस आश्रम के मकान में रहने वाले इन तीनों कार्यकर्ताओं को कभी भी झूठे केस बनाकर, इन्हें नक्सली कमांडर घोषित करके जेल में डाल सकती है और बस फिर सब कुछ ख़त्म.बिल्कुल यही तो आपने कोपा कुंजाम के साथ किया था. पहले उसके घर जाकर उसको पीट कर डराने की कोशिश की.


वनवासी चेतना आश्रम: नेस्त्मबूद किया पुलिस ने
 जब वह नहीं डरा तो उसे जेल में डाल दिया.कोपा कुंजाम जोश से भरा हुआ एक आदिवासी नौजवान है जो आठ वर्ष तक गायत्री मिशन का पूर्णकालिक धर्मप्रचारक रहा और जो गेरुए वस्त्र पहन कर अपने आदिवासी समाज में शराब आदि के विरुद्ध प्रचार करता था.जब वनवासी चेतना आश्रम ने उसके क्षेत्र में प्रचार करना शुरू किया तो कोपा ने महसूस किया कि इस संस्था कि सोच ज़्यादा आधुनिक व वैज्ञानिक है.इसके बाद कोपा हमारे साथ जुड़ गया और पिछले तेरह वर्षों  में उसने महिलाओं और युवकों को संगठित करने का एक बड़ा काम किया.कोपा के प्रयत्नों से राशन की दुकानों पर चावल के घोटाले बंद होने लगे.शिक्षक,आंगनवाडी कार्यकर्ता, स्वास्थ्य विभाग के लोग गाँवों में जाने लगे, नरेगा (NREGA) में लोगों को पूरी मजदूरी दिलाई गई और कोपा के कार्यक्षेत्र में बच्चों की कुपोषण से मौतें रुकने लगीं.
लेकिन कोपा ने एक ग़लती कर दी.नरेगा के अंतर्गत सलवा  जुडूम कैम्पों में जबरन रखे गए आदिवासियों से भी काम करवाया जाता है और पूरे काम के बदले आधा पैसा दिया जाता है.आधे पैसे में सलवा  जुडूम के नेताओं और पुलिस की हिस्सेदारी होती है.आज भी होती है.कोपा इसके ख़िलाफ़ खड़ा हो गया और अनेकों जगह पूरी मजदूरी बांटनी पड़ी.यहीं से कोपा पुलिस की आँखों को खटकने लगा और उसे पुलिस ने "ह्त्या"का आरोप लगाकर एक साल से जेल में बंद किया हुआ है.मैंने ऊपर जो बातें कहीं हैं,उसके पूरे प्रमाण मेरे पास मौजूद हैं और यदि आप सिद्ध करने की चुनौती दें, तो मैं सार्वजनिक तौर पर इन सब बातों को सच सिद्ध कर दूंगा.
मुझे याद आ रहा है कोपा ने अपने आदिवासी साथियों के साथ मिलकर तीस से अधिक गाँवों को दोबारा बसाया था.ये वो उजड़े हुए गाँव थे जिन्हें आपकी पुलिस और सलवा जुडूम ने जलाकर महिलायों से बलात्कार कर निर्दोषों की ह्त्या कर उजाड़ दिया था.कोपा ने इन गाँवों में लोगों को जंगल से व आन्ध्र प्रदेश से वापस लाकर दोबारा बसाया,खेती शुरू करवाई और इन गाँवों में किसी को भी हथियार लेकर प्रवेश करने पर आम सहमती से रोक लगाई और वह इन सभी गाँवों को अहिंसक क्षेत्र बनाने की कोशिश कर रहा था.

इन गाँवों में वह स्कूल, आंगनवाडी, राशन दुकान,पंचायत दोबारा शुरू कराने की कोशिश कर रहा था और आप ही ने उसे जेल में डाल दिया? आपको क्या हासिल हुआ? कोपा के जेल में जाने और मेरे दंतेवाडा छोड़ने के बाद वहां हिंसा और ज़्यादा बढ़ गई.
आप दावा करते हैं कि आप साहित्यकार हैं और चाहते भी हैं कि लोग आपको वैसा सम्मान भी दें. पर आपको नहीं लगता कि साहित्यकार होने की पहली शर्त सत्य को देख पाना,उसे महसूस करना और उसकी सुन्दर अभिव्यक्ति होती है? लेकिन प्रतिदिन-प्रतिक्षण झूठ गढ़ना, एवं उसका ही सदैव चिंतन करना? क्या इस तरह आपके ह्रदय से किसी कालजयी या लोकहितकारी साहित्य का सृजन संभव है? लोक की तो छोड़िए,आप स्वयं भी अपने लिखे से मुग्ध नहीं हो पाते होंगे क्योंकि आपका ह्रदय जानता है कि आपने जो लिखा है,वह असत्य व बनावटी मनःस्थिति की उपज है.
आपको स्मरण होगा पिछली बार मैं जब आपसे मिला था,वो सलवा जुडूम का शुरूआती दौर था.मैंने आपसे तब कहा था, "विश्वरंजन जी, आप किसके लिए लड़ रहे हैं?देश के लिए या भ्रष्ट राजनेताओं के आर्थिक स्वार्थ के लिए?"मैंने यह भी कहा था कि पुलिस की यह नौकरी आपको संविधान और कानून की रक्षा के लिए दी गई है,और जिस दिन आप इस भ्रष्ट व लालची मुख्यमंत्री से कह देंगे कि,"मिस्टर चीफ़ मिनिस्टर,आदिवासिओं की ज़मीन लेने की क़ानूनी प्रक्रिया यह है, और अगर आपने इस क़ानून का उल्लंघन किया, तो मैं आपको उठाकर जेल में डाल दूंगा", और इस तरह जब पुलिस की बन्दूक ग़रीब के पक्ष में उठेगी,उस दिन नक्सलवाद स्वयं ही ग़ायब गो जाएगा.काश अभी भी आपको अपना कर्त्तव्य याद आ जाए.

अपराधों की लम्बी फेहरिस्त
 विश्वरंजन जी,आपने एक लेख लिखा था कि पुलिस को मानवाधिकारकर्ता शूद्र मानते हैं,और अछूतों जैसा व्यवहार करते हैं.लेकिन सच्चाई इससे ठीक उल्टी है.हमने कभी आपसे सम्बन्ध तोड़ने की कोशिश नहीं की.बल्कि अशांत क्षेत्रों में शान्ति स्थापना का काम करने के कारण लगभग सभी कार्यकर्ताओं को आपने झूठे इलज़ाम लगा कर या तो जेल में बंद कर दिया है,या उन्हें इलाक़ा छोड़ जाने के लिए मजबूर कर दिया.

आप दावा करते हैं कि आप एक महत्त्वपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं.चलिए,हमने आपकी बात को सच माना. पर आपकी इस लड़ाई में आपके साथी कौन हैं? लालची नेता, भ्रष्ट अधिकारी, सब्ज़ी बेचने वालीं ग़रीब औरतों और स्टेशन पर फेंकी हुई बोतलें इकठ्ठा करने वाले बच्चों से भी रिश्वत वसूलने वाले आपके पुलिस वाले?कहीं आप इन सब को साथ लेकर नक्सलवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई जीतने का सपना तो नहीं देख रहे?
आपको वो घटना भी याद होगी जिसमें दंतेवाडा के ग्राम टेकनार की आंगनवाडी चलाने वाली आदिवासी महिलाओं का पैसा एक सरकारी अधिकारिणी खा जाती थी. और हमारी संस्था के कार्यकर्ता की मदद से जब उनहोंने इस लूट का विरोध किया, तो आपके एस. पी. ने मेरे ही ख़िलाफ़ एक झूठी ऍफ़. आई. आर. दर्ज कर दी. और पिछली मुलाक़ात में मैंने आपसे कहा था कि जो पुलिस दूधमुंहे बच्चों का राशन बेचने वालों के साथ मिली हुई है,वह कभी भी समाज से नक्सलवाद दूर नहीं कर पाएगी. ऐसा सपना भी मत देखिएगा.
मैं यह मानता हूँ कि हम जहाँ पैदा होते हैं,उस वातावरण और स्थिति के अनुसार चीज़ों को सही या ग़लत मानते हैं. जैसे अगर हम हिन्दुस्तान में पैदा हुए हैं, तो पाकिस्तान को ख़राब मानते हैं. इसी तरह मैं अगर उस घर में पैदा होता जहाँ आप पैदा हुए हैं,और आप मेरे घर में पैदा होते, तो हमारे दोनों के विचार आज के हमारे विचारों के ठीक उल्टे होते. इसलिए यदि सत्य को जानना हो, तो स्वयं को सामने वाले की परिस्थिति में रखकर भी सोचना चाहिए. यही सत्य की ओर हमारा पहला क़दम होता है.अब आप स्वयं को दंतेवाडा ज़िले के एक आदिवासी के घर में रखकर सोचिये कि तब वहाँ आपके विचार, पुलिस, सरकार, और नक्सलियों के बारे में क्या वही रहते, जो आज एक डी. जी. पी. के नाते हैं?

ख़ैर अभी आप इन बातों को नहीं मानेंगे. पर जब आप इस नौकरी पर नहीं रहेंगे, तब आपको सच्चाई बहुत परेशान करेगी. और तब आप पछताएंगे कि आपने सही काम करने का मौका रहते हुए अंतर्रात्मा की आवाज़ को क्यों नहीं सुना और वो सब क्यों नहीं किया जो सचमुच ठीक था.

6 नवंबर 2010

Nov 13, 2010

पहला शशि भूषण स्मृति नाट्य लेखन पुरस्कार घोषित


युवा रंगकर्मी शशि भूषण वर्मा की याद में स्थापित  फाउंडेशन  ने उनकी पहली वर्षी  ४ नवम्बर को आयोजित कार्यक्रम में ‘शशि भूषण स्मृति नाट्य लेखन पुरस्कार’ की घोषणा  की। सम्मान हिंदी के चर्चित नाट्य लेखक,रंग समालोचक और कथाकार हृशीकेष सुलभ को दिया जायेगा. पिछले वर्ष 4नवंबर को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की लापरवाही की वजह से   शशि भूषण वर्मा की एक बीमारी दौरान मौत हो गयी थी. 


शशिभूषण को याद करते दोस्त: नहीं रूकेगा सफ़र

 शशि तब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रथम वर्ष के छात्र थे। इलाज में लापरवाही और अस्पताल प्रशासन की चूक की वजह से हमें इस विलक्षण प्रतिभा से वंचित होना पड़ा। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि) में दाखिला लेने के पूर्व शशि का रंगमंचीय सफर लगभग बीस सालों का था। वह बचपन में ही रंग आंदोलन में शामिल हुए और तमाम आर्थिक,सामाजिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने अपने रंगमंचीय सफर को निरंतर जारी रखा।

अपने बीस साल के रंगमंचीय सफर में शशि की बीहड़ प्रतिभा ने कई मुकाम पार किए और संघर्ष की वह जीवटता दिखलाई जो बहुत कम ही रंगकर्मियों में दिखती  है। बिहार की तपती जमीन से शुरू हुआ उसका रंगमंचीय सफर पटना, गया, मसौढ़ी, नौबतपुर जैसे इलाकों और गांव-ज्वार तक फैले खेत-खलिहानों से निकलकर गोवा, रायगढ़, कोलकात्ता, जयपुर, दिल्ली, मुंबई जैसे देश के बड़े शहरों तक गतिमान रहा। उसकी रंगमंचीय प्रतिभा एक साथ कई क्षेत्रों में सक्रिय रही। निर्देशन, अभिनय, संगीत, गायन, वाद्य आदि तमाम रंगमंचीय अवयवों में वह एक साथ सिद्धहस्त थे इसलिए उसकी पहचान एक संपूर्ण रंगकर्मी की थी। अफसोस की हमें इस संपूर्ण रंगमंचीय व्यक्तित्व से असमय ही वंचित होना पड़ा।

सम्मान: ऋषिकेश सुलभ

शशि भूषण की स्मृति में मित्रों,सहकर्मियों और रंगकर्मियों ने शशि भूषण फाउंडेशन की स्थापना की है जिसका मकसद शशि के रंगमंचीय अवदान को बरकरार रखना है. फाउंडेशन के मुताबिक नाट्य लेखकों  को पुरस्कृत कर  हिंदी रंगकर्म में हो रहे नए नाटकों के अभाव को दूर करना है। इस पुरस्कार के तहत नाट्य लेखक को 11,000 रु की राशि, एक शाल और एक स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। यह पुरस्कार हर साल १८ जुलाई को शशि की जन्मतिथि पर नाट्य लेखक को प्रदान किया जाएगा और उसी दिन लेखक के नाट्यलेख की प्रस्तुति भी की जाएगी। पुरस्कारों की घोषणा हर साल उसके निर्वाण दिवस 04 नवंबर को की जाएगी।

इस वर्ष के पुरस्कार की घोषणा पटना के वरिष्ठ रंगकर्मी परवेज अख्तर ने की। विगत तीन दशकों से कथा-लेखन,नाट्य लेखन, रंगकर्म के साथ-साथ हृशीकेष सुलभ की सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी रही है। अमली,बटोली और धरती आबा मौलिक नाटक, माटी गाड़ी (मृच्छकटिकम् की पुनर्रचना) और मैला आंचल (रेणु के उपन्यास का नाट्यांतर) तथा तीन रंग नाटक शीर्षक नाट्य संकलन प्रकाशित हुआ है. कथा लेखन के लिए इस वर्ष लंदन के अंतर्राष्ट्रीय कथा-सम्मान सहित कई दूसरे सम्मान मिल चुके हैं।




Nov 11, 2010

और वह आतंकवादी बन गया

ठीक 26वर्ष पहले 1984में 31अक्टूबर को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिक्खों का नरसंहार हुआ था। कांग्रेसियों की भागीदारी और निगरानी में हुए इस नरसंहार में तकरीबन दस हजार से अधिक लोग मारे गये और 50हजार से ज्यादा ने दिल्ली को असुरक्षिम मान अलविदा कहा। वहीं कुछ युवा रोष और नफ़रत की आग में खालिस्तानी हो गए, जिनमें एक नाम बचन का भी था...


हैनसन टी.के.

बचन सिंह पंजाब के एक साधारण किसान परिवार का करीब  23साल का सुंदर नौजवान था। रोजगार की तलाश में जब वह दिल्ली  आया तो जल्दी ही उसे एक टैक्सी स्टैंड पर ड्राइवर की नौकरी मिल गई । यह टैक्सी स्टैंड नई दिल्ली  के रफी मार्ग पर विठ्ठल भाई पटेल हाउस की चहर दिवारी के बाहर था ।

बचन बहुत ही हंसमुख लड़का था और जल्दी ही लोगों के साथ घुलमिल जाता था। विठ्ठल भाई  पटेल हाउस में रहने वाले कई नौजवानों से उसकी दोस्ती हो गई थी। अस्सी के दशक में डीवाईएफआई और एसएफआई दोनों के द़फ़्तर वीपी हाउस में ही थे। इन दोनों संगठनों के कई नौजवान कार्यकर्ता और खुद यह लेखक भी उन दिनों वीपी हाउस में ही रहा करता था। 

अन्याय के बढ़ते वर्ष : सरकार को नहीं मिले गुनहगार

 हर रोज़ शाम के समय हम लोग सामाजिक सरोकारों के विभिन्न  मुद्दों पर बहस करते थे। नुक्कड़ नाटक से लेकर फिल्म अभिनेत्री   रेखा तक,केंद्र सरकार से लेकर सर्वहारा क्रांति  और साम्राज्यवाद  तक सभी  विषयों पर चर्चा होती थी। जब बचन के पास काम नहीं होता तो वह भी  हमारे साथ शामिल होजाता था । वह प्रगतिशील विचारों का युवक था और लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रति  उसकी गहरी आस्था थी।  सिखों की  धार्मिक पहचान मानी जानी वाली पगड़ी भी वह केवल तभी  पहनता था जब उसे अपने गांव जाना होता था।

अस्सी के दशक के शुरूआती वर्षों में पंजाब में अलगाववादी खालिस्तानी आंदोलन अपने चरम पर था। पंजाब में तो हिंसा और हत्याओं का सिलसिला था ही उग्रवादियों ने दिल्ली  में भी  अपनी गतिविधियां शुरू कर दीं थी। शहर के अलग अलग हिस्सों में बम धमाके किये जा रहे थे। डीटीसी की बसों को ख़ासतौर पर निशाना बनाया जा रहा था। यूएनआई की कैंटीन चलाने वाला स्वामी भी  डीटीसी बस में हुये ऐसे ही एक बम धमाके में घायल हो गया था।

पंजाब का उग्रवाद 1984तक आमतौर पर शहरों और कस्बों तक ही सीमित था। लेकिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की क़िलेबंदी में रह रहे जरनैल सिंह भिंडरावालां और उसके साथी उग्रवादियों को खदेड़ने के लिये किये गये सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद हालात बदल गये थे। यह भी आरोप लगे कि जिस भिंडरावालां को कोई जानता तक नहीं था,वह कांग्रेस  की सरपरस्ती में ही सिख राजनीति के केंद्र में आया।

पंजाब में कांग्रेस का खोया वर्चस्व बहाल करने के लिये अकालियों में फूट डालने के इरादे से भिंडरावालां को शह दी जाती रही, लेकिन हालात कांग्रेस के हाथों से बाहर निकल गये और भिंडरावालां के नेतृत्व में उग्रवाद तेज़ी से फैलने लगा। मजबूर होकर सरकार को ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी बड़ी कार्रवाई करनी पड़ी। सिख लोग परंपरागत रूप से बहुत धार्मिक प्रवृति  के होते हैं और उन्हें लगा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार उनके धर्म पर हमला है।


84 के दंगे में एक सिख युवक

 सरकार की इस कार्रवाई से सिख समुदाय को बड़ा आघात लगा और उनकी इन्हीं आहत भावनाओं की परिणति इंदिरा गांधी की मौत में हुई,जिनकी हत्या उनके ही सुरक्षाकर्मी ने कर दी जो खुद भी सिख था। इंदिरा गांधी के हत्या के बाद देश में भयावह सांप्रदायिक दंगे हुये। लगातार दो दिन तक दिल्ली जलती रही। हजारों सिखों का क़त्लेआम हुआ, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और उनकी संपतियां लूट ली गईं। शहर पर उपद्रवियों का क़ब्जा हो गया था।

भीड़ ने वीपी हाउस के टैक्सी स्टैंड पर भी हमला किया,लेकिन हमने खतरे को भांपते हुये पहले ही उनकी टैक्सियां कंपाउंड के भीतर करवा ली थी और सिख ड्राइवरों को अपने यहां बुलाकर बचा लिया। उपद्रवियों ने टैक्सी स्टैंड के तंबू और बाकी सामान में आग लगाकर अपना गुस्सा निकाला। कई जगहों पर कांग्रेसी नेता हिंसा पर उतारू भीड़ की अगुवाई कर रहे थे।

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं ने भी हमलों में हिस्सा लिया। दिल्ली में हुये अगले चुनावों में आरएसएस ने कांग्रेसी उम्मीदवारों का खुलकर समर्थन किया। प्रशासन तंत्र को जान-बूझकर ठप कर दिया गया था। पुलिस को हिदायत थी कि भीड़ पर नियंत्रण करने की जरूरत नहीं है,बल्कि पुलिसकर्मी भी भीड़ को उकसाते हुये देखे गये। हिंसा का यह तांडव दो दिन तक निरंकुशता के साथ चलता रहा। तीसरे दिन सेना को बुलाया गया, लेकिन तब तक बहुत नुकसान हो चुका था।

कांग्रेसी नेतृत्व का यह तर्क सरासर खोखला था कि इंदिरा गांधी की हत्या की फौरी प्रतिक्रिया के तौर पर यह दंगे हुये। सच तो यह है कि पुलिस और प्रशासन ने समय रहते समुचित कदम उठाये होते तो काफ़ी हद तक नुकसान को टाला जा सकता था। उल्टे पुलिस और प्रशासन उपद्रव के दौरान निष्क्रिय बने रहे और राजनीतिक नेता भीड़ जुटाकर हमलों के लिये भड़काते रहे। राजीव गांधी का यह कुख्यात वक्तव्य ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती हैं।' उस दौर में व्याप्त निरंकुशता का परिचायक है।

अपने जीवन में पहली बार मैंने सांप्रदायिक दंगे अपनी आंखों से देखे। यह मेरी कल्पना से परे था कि सांप्रदायिक जुनून में लोग इतने वहशी भी हो सकते हैं कि लोगों के गले काट डालें। जब किसी तरह से सामान्य स्थिति बहाल हुई तो मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ दंगों से सबसे ज़्यादा प्रभावित क्षेत्रों में गया। वहां का दृश्य दिल दहलाने वाला था। सिख बस्तियों की तंग गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। इक्के दुक्के पुलिस वालों को छोड़कर कोई नजर नहीं आता था। पूरे इलाके की हवा में असहनीय दुर्गन्ध फैली हुई थी।

जब हम घरों के अंदर गये तो वहां डेरा डाल चुके आवारा कुत्ते बाहर निकलकर भागे। अंदर पड़ी लाशों में पहचान करना मुश्किल था कौन पुरूष और कौन स्त्री की है। ये लोग निश्चित ही किसी के माता, पिता, भाई, बहन, बेटा या बेटी रहे होंगे। सारा दृश्य भयावह था।

 आरोपी सज्जन कुमार : जनता के बीच अपराधी

कुछ दिनों के बाद शहर में स्थिति सामान्य होने लगी। टैक्सी स्टैंड वालों ने नया तंबू और लकड़ी का केबिन बना लिया था,लेकिन बचन सिंह कहीं नज़र नहीं आ रहा था। किसी को उसका अता पता मालूम नहीं था। कुछ लोगों का कहना था कि वह शायद वापस पंजाब चला गया। कुछ लोग उसके बारे में बात ही नहीं करना चाहते थे।

हम सबको बचन की बहुत याद आती थी। आखिर वह हमारा साथी था। समय बीतने के साथ लोग दंगों के दौरान की दर्दनाक घटनाओं को भूल गये । लगभग एक साल के बाद स्टैंड में काम करने वाले उसके एक साथी ने मुझे बताया कि बचन अब भारत में नहीं है। दिल्ली दंगों के बाद वह खालिस्तान आंदोलन में शामिल हो गया और इन दिनो तुर्की में एक आतंकवादी शिविर में था। वह आतंकवादी बन गया था। यह बात सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। मैं किसको दोषी कहूं,अपने साथी बचन सिंह को जिसके पूरे समुदाय को आग में झोंक दिया गया या बेरहम पुलिस और प्रशासन को,जो आंखें मूंदकर मौत का तांडव देखते रहे या उन नेताओं को,जो अपने समर्थकों को हत्या, लूट और बलात्कार के लिये भड़काते रहे।

खालिस्तान आंदोलन कब का खत्म हो चुका है और देश की राजनीति में भी कई बड़े बदलाव हो चुके हैं,लेकिन आंतकवाद पूरे देश में पसर चुका है। पंजाब से वह कश्मीर पहुंचा और अब देश के सभी हिस्सों में आतंकवादी घटनायें होती हैं। हिंदू कट्टरवाद वटवृक्ष बन चुका है और अब यह सांप्रदायिक तनाव पैदा कर लोगों को बांटने,अपने राजनीतिक धड़ों के लिये वोट जुटाने की राजनीतिक रणनीति बन चुका है।

मुसलमानों को निरंतर निशाना बनाया जा रहा है। पूरे मुस्लिम समुदाय को शैतान के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उन्हें शक की नज़र से देखा जा रहा है। अब तो उदारवादी मुसलमान भी गुस्साये हुये हैं। जानी मानी अभिनेत्री शबाना आजमी ने अभी हाल ही में बताया था कि मुस्लिम होने के कारण उन्हें मुंबई में किराये पर मकान नहीं मिल सका पुणे और देश के दूसरे शहरों में भी ऐसे वाकये हुए हैं।

 अब कर्नाटक और उड़ीसा जैसे राज्यों में ईसाई समुदाय पर हमला किया जा रहा है जिनकी आबादी महज़ 2फीसद है। इन राज्यों में भी प्रशासन पीड़ितों को सुरक्षा देने की बजाए मुंह फेरे रहता है और दंगाई उत्पात मचाते रहते हैं। हमें अपने अतीत से सबक़ लेना चाहिये कि असहाय और लाचार लोगों के मन में आतंकवाद घर कर लेता है। बचन सिंह का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है।



लेखक सीपीएम के सदस्य हैं और सामाजिक-राजनितिक मसलों पर लिखते हैं.यह लेख मूल अंग्रेजी से अनुदित  कर  प्रकाशित  किया जा रहा है. फिलहाल वह हिंदी पाक्षिक पत्रिका  द पब्लिक एजेंडा में प्रबंधक हैं,  उनसे  hanskris@gmail.com संपर्क किया जा सकता है)

Oct 31, 2010

विश्वविद्यालयों में क्यों नहीं भरे जा रहे हैं आरक्षित पद?

दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षण के कोटे को पूरा कराने के लिए संघर्षरत संगठनों की ओर से जारी पर्चे के संपादित अंश.
भारतीय संविधान लागू होने के बाद अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया. शुरू में यह केवल अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए क्रमश: 15 और 7.5 फीसदी था. इसके बाद समाज का एक वर्ग जो आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से कमजोर था उसे तात्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग के तहत 1991 में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण दिया. एक वर्ग जो अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्गों से भी दुर्बल है यानी विक्लांग, इन्हें सरकार ने 1995 में नौकरियों में तीन फीसदी आरक्षण देने की घोषणा.

आजादी के 63 साल बाद केंद्रीय, राज्य और मानद विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति/जनजाति के शिक्षकों को आरक्षण लंबी लड़ाई लड़ने के बाद 1997 में विश्लविद्यालय और कॉलेजों में आरक्षण लागू हुआ.पिछड़े वर्गों का आरक्षण विश्वविद्यालय और कॉलेजों में 2007 में व विक्लांगों को हई कोर्ट के आदेश के बाद 2005 में तीन फीसदी आरक्षण दिया गया.
सवाल यह उठता है कि दलितों, पिछड़ों और विक्लांगों के संदर्भ में आरक्षण को पूरी तरह लागू क्यों नहीं किया जा रहा है. शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक कारणों पर नजर डालने पर यह तथ्य सामने आता है कि आजादी के 63 साल बाद भी रूढ़िवाद ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा है. पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने पर जिस प्रकार का हंगामा हुआ, इस पर कुछ सवर्णों ने आत्महत्या तक कर ली, आखिर यह सब क्या दर्शाता है? आरक्षण के मुद्दे पर खासकर शिक्षा के क्षेत्र में सरकार केवल औपचारिकता से ही संतुष्ट हो जाना चाहती है. समाज के इस शोषित, वंचित वर्गों को दिए गए आरक्षण को सवर्ण पचा नहीं पा रहे हैं. आखिर इसका कारण क्या है?
आज भी अधिकांष दलित गरीब हैं. उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है. वोट बैंक की राजनीति में नारों और तुष्टीकरण की राजनीति हावी होती जा रही है. प्राचीनकाल में विक्लांगों को दया का पात्र समझा जाता था. आज भी नौकरशाह उन्हें अपनी रूढ़िवादी हथकंडों का उपयोग कर, विक्लांगों को अक्षम और बेकार साबित करने में लगे हुए हैं.
शिक्षा के क्षेत्र में एक ओर सरकार सबको शिक्षा का अधिकार देने की वकालत करती है, लेकिन दूसरी ओर आरक्षण का ब्योरा भरने के प्रति शातिर दिमाग का उपयोग किया जा रहा है. बार-बार दलितों, विक्लांगों, पिछड़े वर्ग का कोटा कागजों और फाइलों में पूरा कर दिया जाता है. वास्तव में ऐसा होता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के साल 2000 में आदेश  देने के बाद भी विक्लांगों के लिए (2005)  आरक्षण का कोटा तक पूरा नहीं किया गया.
दिल्ली विश्वविद्यालय में दस हजार शिक्षक कार्यरत हैं. आरक्षण के हिसाब से अनुसूचित जाति के लिए 1500 और जनजाति के लिए 750 सीटें आरक्षित हैं, लेकिन वर्तमान में लगभग 650 ही शिक्षक इन वर्गों के हैं. इसी तरह विक्लांगों के 300 पदों में केवल 115 ही भरे गए हैं. पिछड़े वर्गों के 2700 में से 100 शिक्षक ही लग पाए हैं. बाकी तीन श्रेणियों का बैकलॉग लंबे समय से खाली पड़ा है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय का कहना है कि हमने आरक्षण पूरा कर दिया है.
शिक्षा के क्षेत्र में उच्चवर्गीय मानसिकता के लेाग आरक्षण को समाप्त करना चाहते हैं. अगर आरक्षण का कोटा नहीं भरा गया तो परिस्थितियां और भी विकराल हो सकती हैं. अगर आर्थिक कारणों पर नजर डालें तो विभिन्न विश्विवद्यालयों और महाविद्यालयों में सवर्णों का लिखित आरक्षण है. आजादी के 63 साल बाद भी दलितों के प्रति घृणा की भावना ज्यों की त्यों बनी हुई है. अधिकांश दलित गरीब होने के कारण दबाव समूह नहीं बन पाते. प्रजातंत्र में दबाव समूह की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. आखिर मीडिया क्यों पिछड़े दलितों को महत्व दे रहा है? सामाजिक रूप से जातिवाद नए-नए रूप में सामने आ रहा है. चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, दलितों का मत प्राप्त करने के लिए आरक्षण का सवाल मजबूरी में रखा जा रहा है. सवर्ण हृदय से आरक्षण पसंद नहीं करते. राजनीतिक दृश्टि से नेताओं में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है. संसद में पहुंचने के बाद दलित नेता भी उदासीन हो जाते हैं. उन्हें केवल पद की चिंता रहती है. आज शिक्षा के क्षेत्र में पैसे का बोलबाला है. हमारा समाज जातियों और वर्गों में आज भी बंटा हुआ है.महंगी शिक्षा के कारण दलित, पिछड़े, विक्लांग उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं. केवल कुछ दलित, पिछड़ों, विक्लांगों की नियुक्तियों से यह कार्य पूरा नहीं होगा. इसके लिए विषेश प्रकार के आंदोलन की जरूरत है, जबतक कि नीचे के दलित संघर्ष के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक आरक्षण का कोटा नहीं भरा जा सकता.
शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के लिए एक आंदोलनधर्मी जीवन दर्शन की जरूरत है. ऐसे में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्तियां रास्ता दिखाती हैं, अधिकार खोकर बैठे रहना,  यह महादुश्कर्म है, न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है.
आज अगर शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण लागू नहीं हो पा रहा है तो हमें आज की परिस्थितियों का सही मूल्यांकन करते हुए संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा. समाज की पूरी मानसिकता को बदले बगैर इन परिस्थितियों पर काबू पाना कठिन है.

सौजन्य से
दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए संघर्षरत प्रगतिशील संगठनों का साझा मंच.
संपर्क सूत्र:  9210315231, 9958797409, 9868606210, 9313730069, 9968815757, 9868485583, 9868238186

                            

Oct 30, 2010

पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे

नर्मदा आंदोलन के पचीस वर्ष पूरे होने पर संघर्ष  को समर्पित एक गीत...


प्रशांत दुबे


देखो देखो देखो देखो, उजड़ गए गाँव रे ।

पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे॥

हम माझी बन खेते रहे, समय की धार को ।

जाने काये डुबो दई, हमरी ही नाव रे॥



खेत हमरा जीवन है, धरती हमरी माता है।

इनसे हमारा सात जन्मों का नाता है॥

बांध तुम बनाते हो, हमें क्यूँ डुबाते हो।

हमारे खेतों में क्यूँ, बारूदें बिछाते हो॥

अपने स्वार्थ को विकास कह के तुमने।

हमरा तो लगा दिया, जीवन ही दाँव रे॥

पेडों के साथ गई........................................।




पुरखों से जीव और, हम साथ रह रहे।

पत्थरों को चीर कर, प्रेम झरने बह रहे॥

हम जंगल में जीते हैं, हमें क्यूँ भगाते हो।

पर्यावरण के झूठे आंसू क्यों बहाते हो॥

हमरी रोजी,हमरी बस्ती छीन कर सरकार ने ।

अपनों से दूर कर, कैसा दिया घाव रे॥

पेडों के साथ गई........................................।



http://www.cgnetswara.org/   से साभार