Aug 20, 2010

वे अनन्य हैं, पुरुषोत्तम हैं और आलोचनाओं से परे हैं


'सहारा' अख़बार ने कात्यायनी के लिए जब मादा शब्द का इस्तेमाल किया था तब आपने इतना बड़ा आन्दोलन चला दिया कि जेल हुई,लाठियां चली,खून बहा लेकिन नोयडा में एक महिला साथी  का प्रयोग  आपने जिस तरह किया उससे क्या आपका परिवारवाद और स्त्री विरोधी चरित्र का पता नहीं चलता.

अरुण  यादव 

मेरे बेबाक -बेलौस साथियों,
आपने बड़ी सफाई से अपने को क्रन्तिकारी साबित करने का प्रयास किया है.साथ ही मेरे हिजड़े वाले साहस से मेरी नैतिक घटियाई के बारे में जानने की जुगुप्सा भी आप लोगों में काफी बलवती हो उठी है.ऐसे मसाले से राजनीति को कमान में रखने की शशिप्रकाश की पुरानी लाइन है,इसका सबसे बड़ा उदाहरण सम्मेलन था.जिसमें शशि प्रकाश ने अपनी एक महिला साथी से अपने ही राजनीतिक गुरु की नैतिकता पर आरोप लगवा दिया था.

ये चरित्र-चित्रण आपको मुबारक और इसके बिना यदि गैस बाहर न निकल पा रही हो तो राजेन्द्र यादव की तरह अपनी पत्रिकाओं में नैतिक पतन पर एक कालम चला दें.उसमें हम अपना जवाब जरुर भेज देंगे.संगठन से बाहर होने वाले सभी पर चूँकि आपका ये आरोप है तो 'हिजड़ों'और 'मऊगों'के नैतिक पतन पर आपको काफी सामग्री मिल जाएगी.शशिप्रकाश कात्यायनी के साथ आप लोग अपने नैतिक पतन पर लिखेंगे तो मर्दानों और गैर मऊगों के नैतिक पतन के बारे में भी लोग समझ पाएंगे.

आइये! थोड़ी उस इतिहास की भी चर्चा कर ली जाय, जिसे आपने छोड़ दिया है :-

गोरखपुर,करावल नगर और लुधियाना के आन्दोलन के व्यापक प्रचार-प्रसार में अपने ही बीस सालों के आन्दोलन की नाकामी को आप लोग जिस सफाई से छुपा ले गये हैं उस भोली अदा पे मर जाने को जी चाहता है.थोड़ी बानगी देखते हैं -बिगुल जून 2005 में इस्टर खटीमा आन्दोलन पर आपने लिखा है -इस आन्दोलन में दोनों सहयोगी संगठनों की अलग अलग लाइनों की टकराहट खुल कर सामने आई.

एक थी क्रन्तिकारी सर्वहारा लाइन जिसकी नुमाइंदगी  बिगुल मजदूर दस्ता कर रहा था और दूसरी थी आपके  अनुसार  निम्न बुर्जुआ (मध्यवर्गीय )क्रांतिकारिता की लाइन जिसकी नुमाइंदगी क्रन्तिकारी लोकाधिकार संगठन कर रहा था .कदम कदम पर दोनों लाइने टकरा रही थी .........समूचे आन्दोलन के दौरान क्रालोस ने जो अपनी लाइन चलाई ...अर्थवाद और अराजकतावादी संघधिपत्यवादी की लाइन है.

यह वही आन्दोलन है जिसमें मुकुल शशि प्रकाश के साथ थे और इस आन्दोलन की अगुआई कर रहे थे,लेकिन जब मुकुल इनके संगठन से बाहर निकल गये तब इसी आन्दोलन पर शशि प्रकाश के सदविचार सुन लीजिये जिसे उन्होंने बिगुल के अगस्त-सितम्बर 2008में लिखा था -''2005में जब खटीमा में इस्टर कारखाने के मजदूरों का आन्दोलन चल रहा था तो गतिरोध तोड़कर नई दिशा देने के लिए का.अरविन्द वहां गये ....मुकुल की लम्बे समय से जारी घिसी-पिटी अर्थवादी वादी ट्रेड यूनियनवादी लाइन के विरुद्ध संघर्ष को तीखा बनाकर निर्णायक मुकाम पर पहुंचा दिया.'' इस  आन्दोलन में  140 महिला पुरुष साथियों में एक महिला सहित चार साथी बिगुल के थे. जेल में आठ दिनों तक अनशन चला था लेकिन इस दौरान अगर क्रालोस के साथी जेल में चीजे नहीं पहुचाते तो बिगुल के साथी गमछा और साबुन भी नहीं पाते क्योकि शशि प्रकाश केवल धुल धुसरती आलोचना कर सकते थे मदद नहीं ..

'सहारा' अख़बार ने कात्यायनी के लिए जब मादा शब्द का इस्तेमाल किया था तब आपने इतना बड़ा आन्दोलन चला दिया कि जेल हुई,लाठियां चली,खून बहा लेकिन नोयडा में समीक्षा का प्रयोग अपने बचाव में आपने जिस तरह किया उससे क्या आपका परिवारवाद और स्त्री विरोधी चरित्र का पता नहीं चलता.का.अरविन्द की शादी के बाद लगभग पन्द्रह साल तक संगठन में प्रेम हत्यायों का शानदार इतिहास भी आपके नाम दर्ज है.हरियाणा के एक साथी की शादी हुई भी तो आपने उनका बच्चा नहीं आने दिया इस बीच अपना पोता आप जरुर खिलाने लगे. महाशय दोहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक आचरण के ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे आपकी नीयत और चरित्र दोनों को समझा जा सकता है.

अब आइये,थोडा और पीछे चलते हैं.इंडियन रेलवे टेक्नीकल एंड आर्टीजन इम्प्लाइज एशोसिएसन और 'बगावत रंग लाएगी' नाम और नारा आप भूले नहीं होंगे. इसी समय आपने लम्बी-चौड़ी घोषणाएं की थी और 7 दिसम्बर को लखनऊ में रेल मजदूर अधिकार मोर्चा का गठन भी कर दिया गया था.इसकी असफलता का ठीकरा भी संगठनकर्ताओं के सर पर डालकर शशि प्रकाश साफ बचकर निकल गये.जनता को आपका क्या जवाब है जरुर बताइयेगा.

अब नोएडा आन्दोलन की भी बात कर ली जाये जहाँ झुग्गी से फैक्ट्री घेरने की पूरी तैयारी के साथ प्रकाश उतरे थे.वहाँ के कामों के मुख्य जिम्मेदार का.अरविन्द सिंह थे,लेकिन याद कीजिये सम्मलेन जिसमें शशि प्रकाश ने अपने ही मुखार बिन्दुओं में कहा था कि अरविन्द ने नोएडा के काम को दलदल में फंसा दिया था.

अरविन्द सिंह: मारे गए
इसी सम्मलेन में सुखविंदर ने अरविन्द की आलोचना करते हुए कहा था कि अरविन्द सिंह पुनर्जागरण प्रबोधन पर चार लाइन से ज्यादा नहीं बोल सकते और उनके कार्यक्षेत्र में जाते हैं तो सोते रहते हैं.इस आलोचना के बाद उन्हें उत्तरांचल के आन्दोलन में भेज दिया गया.जिसके बारे में आप ऊपर जान चुके हैं और फिर सीधे उन्हें गोरखपुर भेज दिया गया.वे अपने कपडे तक दिल्ली से नहीं ले सके थे. गोरखपुर में भी वे काफी परेशानी से गुजर रहे थे.ये बात मै खुद जानता हूँ,क्योंकि मैं खुद उनके साथ वहाँ था और इस बात की पुष्टि बेबाक बेलौस के साथियों ने मेरे निकलने के बाद मुझसे और मुकुल से खुद की थी.

उसी समय शशि प्रकाश,कात्यायनी और मीनाक्षी को जिन जिन गालियों से इन लोगों ने नवाजा था वह भी जान लीजियेगा,आपके साथ ही हैं.इस हालातों को जानने के बाद जय सिंह के 'मऊगा'वाली परिभाषा पर पाठक खुद विचार कर लें.मुझे कुछ नहीं कहना.हाँ विवेक उसी समय गोरखपुर में अरविन्द से मिले थे और उसी आधार पर उन्होंने अरविन्द की परेशानियों को शेयर किया था.ये फिर भी पुनर्जागरण प्रबोधन वाली लाइन के प्रैक्टिस का सवाल था,लेकिन असली सवाल इससे आगे नोएडा के काम पर है.अरविन्द को वहाँ से हटाने के वाद वहाँ के कामों की जिम्मेदारी खुद शशि प्रकाश ने अपने एक कुशल चंदाजुटाऊ भक्त के साथ ली थी.क्या हुआ उस काम का ?उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?ये न तो सवाल बनेगा और न ही इसकी जिम्मेदारी शशि प्रकाश लेंगे.न किसी कार्यकर्ता की हिम्मत है कि उनसे पूछ सकता है. वे अनन्य हैं, पुरुषोत्तम हैं, आलोचनाओं  से परे है.

अनुराग ट्रस्ट के नाम पर गोरखपुर में मोहल्ला में आधार बनाने और नई पीढ़ी को क्रन्तिकारी बनाने की थीसिस का क्या हुआ?अपने साथियों के बच्चों को भी आप नहीं रोक पाए और वे उस घुटन से अपने अपने घर चले गये. उन पर आप किस नैतिक पतन का आरोप तय करेंगे,ये आप खुद सोच लीजियेगा.मोहल्लाकरण के नाम पर कात्यायनी की पैतृक दाई ही आपको जानती है जिसके साथ आप उस टीन वाले एक कमरे का मुकदमा लड़ रहें है. शेष मुहल्ले के लिए संस्कृति कुटीर रहस्य ही है.

अब आइये 'हरी अनंत हरी कथा अनंता'वाले अभियान लोक स्वराज्य पर.इस अभियान का मुख्य मकसद लोक स्वराज्य पंचायतों का गठन और उनके माध्यम से क्रांतिकारी काम को आगे बढ़ाना था, लेकिन पिछले लगभग पंद्रह सालों में एक भी लोक स्वराज्य पंचायत नहीं बनी. मगर यह अभियान लगातार जारी है. पैसे आने लगातार जारी हैं. कहाँ जाते हैं, किसी को नहीं मालूम ...ठीक यही हाल पिछले तीन साल चले स्मृति संकल्प यात्रा का भी है .प्रचार-प्रसार के साथ मूल रूप में यह पैसे जुटाने और नए चंदा जुटाने वाले भक्तों की तलाश का ही अभियान था ...

बेबाक बेलौस के साथियों का पेट फूल रहा होगा कि उनके आरोपों का जवाब मैंने अभी तक नहीं दिया.आइये! आपके राजनीतिक आरोपों को थोडा समझने का प्रयास कर लिया जाये. आप लिखते हैं :- अपने को 'दिशा' का पूर्व संयोजक बताने वाले अरुण कुमार यादव को कुछ समय के लिए वि. वि. इकाई का संयोजक बनाया गया था जिसमें मैं महीनो छुट्टी पर था.

पर माफ़ कीजियेगा मुझे याद नहीं कि मुझे ये पद कब दिया था और किसने दिया था.इस पर हमें सिर्फ ये कहना है कि शशि प्रकाश के बेटे अभिनव सिन्हा को 'दिशा'का राष्ट्रीय संयोजक किसने बनाया,किस चुनावी प्रक्रिया से उन्होंने ये पद धारण किया और छोटे में कहें तो आपके सभी जन संगठनो का चुनाव कैसे होता है, कहाँ होता है, कौन कर्ता हैं, जरुर बता दे ....

दूसरा आरोप कि मुझे किन नैतिक आरोपों के तहत निकाला गया था, तो मेरे 'हिजड़े' साहस से ये भी जान लें.

1 . आठ साल के राजनीतिक जीवन में मैंने कुछ नहीं किया.
2 . मैंने संगठन विरोधी बयान दिया था.
3 . मेरा सांस्कृतिक स्तर नीचा है

यही तीन आरोप लगाकर मुझे 6 महीने के लिए निकाला गया था. शर्त थी अगर इस दौरान मै पतितों, भगोड़ों और गद्दारों से नहीं मिला और स्वदेश की दुकान पर नहीं गया तो लिखित आत्मालोचना के साथ मेरी वापसी हो सकती है ये आरोप क्यों लगे थे, आप लोगों सहित पाठक भी समझदार हैं ./..

बदलाव के औजार बनने थे,   धंधे बन गए.
अपने आठ सालों में मैंने चंदा माँगा था.ट्रेन में डेली चलने वाले यात्रियों की गालियां सुनी थी. आप लोगों को जोड़ने के काम में भूमिका निभाई थी और सारा पैसा शशि प्रकाश के ब्लैकहोल में जमा कर दिया था . जहाँ तक विरोधी बयान की बात है उसका एकमात्र उदाहरण ये था कि उत्तराखंड, हरियाणा की पूरी इकाई और ढेरों साथियों के बाहर होने के कारण मैंने कहा था कि एक एक विकेट गिर रहें है.इन्कलाब कैसे होगा और तीसरा सवाल जिसके साथ आपकी जुगुप्सा जुड़ी है उसका मैंने उचित मंच आपको बता दिया है. शुरू करें जबाब मिल जायेगा. वैसे आपके नेता की लाइन है जो भी बाहर जाये उस पर चरित्र हनन और गबन का आरोप जरुर लगा देना चाहिए और इसका पालन अनवरत जारी है.इसके नया उदाहरण हैं गोरखपुर इकाई से उदयभान और दिल्ली से राकेश.राकेश चूँकि शशि के सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हैं इसलिए उन्हें हलाल करने के बजाय आजकल अज्ञातवास में रखा गया है.
पूरे देश में चलने वाले राजनीतिक संघर्षो में आप कहा खड़े हैं. इसकी बानगी तो आपको डॉ. विवेक ने अपने लेख में दे दी है. लेकिन आप लोग छाती पीट रहें है कि हम राजनितिक बहस नहीं कर रहे बल्कि कुत्सा प्रचार कर रहे हैं. वैसे आप लोगों को याद होगा कि आपके यहाँ किसी साथी की गैस भी निकल जाये उस पर मीटिंग और बात शुरू हो जाती है.वह भी शशि प्रकाश राजनीतिक ही मानते हैं.मीनाक्षी जी हमारे और आपकी पोस्टों से जनता को फैसला करने दें, क्या राजनीतिक है क्या गाली है. याद आ गया. एक उदाहरण भी सुन लीजिये आपको गोरखपुर में वकीलों के बीच काम करने के लिए भेजा गया था. आप वहां से यह कहते हुए भाग आई थी कि वकील बदबूदार गैस छोड़ते हैं...आप जिन साथियों को इतनी गालिया दे रही हैं उन्होंने आपका जितना सम्मान किया,वह अपने आपमें एक मिसाल है यह सिर्फ एक स्त्री होने के नाते आपको मिला था. आप उनकी राजनीतिक गुरु नहीं थी.
आप आर्थिक सहयोग सिर्फ पॉँच स्रोतों से जुटाने पर इतना घमंड दिखा रही हैं. उसके अंदर की बानगी भी लोगों को बता दीजिये.आप अपने पार्टी लेबी और नाटक नौटंकी द्वारा प्रचार के जरिये निकाल लिए गये रुपयों का अनुपात निकाल लें. आपकी राजनीतिक लाइन का असली रूप निकल जायेगा. आपके यहाँ जनता की जेब से रूपया निकालने की कला सिखाई जाती है. इसकी सबसे मजेदार मशक्कत ट्रेनों में कोई भी देख सकता है .
अब आप लोगों को साफ हो जाना चाहिए कि आपके हजारों रहस्यों को ठीक से जान लेने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि आप लोग क़ानूनी धंधा फ़ैलाने वाले जनता और आन्दोलन के अपराधी लोग हैं.इसलिए सांगठनिक बहस की सीमा लगाने का भी कोई कारण नहीं है.तात्कालिक प्रदर्शनों पर इतराकर अतीत पर गोली मत दागिए. बीस सालों के इतिहास में एक कार्यकता सम्मलेन है, वो भी आनन फानन में इसलिए कर लिया गया था कि विरोधी आप पर सवाल खड़ा करने लगे थे.इस बहस का एक ही दुखद परिणाम है कि जवाब कार्यकर्ताओ से दिलाकर आप उनसे कुछ ज्यादा समय तक चंदा जुटवा सकेंगे भरोसा रखिये,अभी तमाम रहस्य खुलने बाकी हैं. जरुरत पड़ने पर वो भी खोले जायेंगे.डरिए मत,हम इंसानी गरिमा की सीमा हिजड़े वाले साहस के साथ बनाये रखेंगे.


मतभेदों को गालियों से पाटने की परम्परा


सत्यव्रत महोदय ने छि:थू धिक्कार के शीर्षक से कवि लीलाधर जगूडी को खरी-खोटी सुनाते हुए मुझ पर भी सरे-राहे दो-चार छींटे उछाल दिये थे.इसलिये यह सोच कर चुप रहा कि यह तो आप लोगों का,वाम तरीका है.लेकिन जब मीनाक्षी जी का पत्र पढ़ा तो लगा कि कुछ बातें कहनी ज़रूरी हो गयी हैं.

संदेशा शशिप्रकाश का वे कम्युनिस्ट नहीं "मउगा"हैं, कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब, विरोधियों को कहा 'हिज़डा'और छिछोरों की मुंशीगीरी में साहित्यकार लगे हैं के जवाब में साहित्यकार  नीलाभ की एक संक्षिप्त टिप्पणी


प्रिय जय सिंह जी,

कई दिन पहले मेरे ई मेल पर आपका पत्र आया था जिसमें आपने मेरी निन्दा और लानत-मलामत करने के साथ-साथ अन्य बहुत से लोगों को काफ़ी जली-कटी सुनायी थी.मैं ने जवाब न देने की सोची थी.इसलिये नहीं कि मैं लाजवाब हो गया, बल्कि इसलिये कि मैं नहीं आप के कुछ पुराने साथी जवाब के तलबगार थे.

दूसरी बात यह कि पहले भी किन्हीं सत्यव्रत महोदय ने छि:थू धिक्कार के शीर्षक से लीलाधर जगूडी को खरी-खोटी सुनाते हुए मुझ पर भी सरे-राहे दो-चार छींटे उछाल दिये थे.इसलिये यह सोच कर चुप रहा कि यह तो आप लोगों का,वाम तरीका है.लेकिन जब मीनाक्षी  जी का पत्र पढ़ा तो लगा कि कुछ बातें कहनी ज़रूरी हो गयी हैं.

आपने मेरे नाम अपने पत्र में उन लोगों को "हिजड़ा" और "मऊगा" कहा है जिनका साथ मैं दे रहा हूं. मीनाक्षी जी ने कुछ साथियों पर समलैंगिकता क आरोप लगाया है.

हमारे यहां मऊगा उस मर्द को कहतें हैं जो स्त्रियों जैसा व्यवहार करे.यह शब्द बड़ी हिकारत से इस्तेमाल होता है और एक सामन्ती दिमाग़ का परिचायक है जो मर्दानगी को पुरुष-प्रधान नज़रिये से देखता है और हार्मोन सम्बन्धी गड़्बड़ियों से नावाकिफ़ है.

रही बात हिजड़ों की तो इसे गाली की तरह इस्तेमाल करके आपने अपनी विकृत मानसिकता का ही परिचय दिया है.क्या आपके "वैज्ञानिक"संगठन ने आपमें यही समझ पैदा की है ?क्या कम्यूनिज़्म आने पर आपका संगठन हिजड़ों पर पाबन्दी लगा देगा या वे पैदा ही नहीं होंगे ?

रही बात  समलैंगिकता की तो अब उसके पीछे भी वैज्ञानिकों  ने प्राकृतिक कारणों की शिनाख्त की है.इसलिए यौन व्यवहार को दकियानूसी ढंग से नहीं बल्कि वैज्ञानिक नज़रिये से देखने की ज़रूरत है.वरना आप हर मतभेद को गालियों से ही नवाज़ते रहेंगे और अपने आलोचकों के सवालों को गालियां दे कर या प्रत्यारोप लगा कर उनसे कतराते रहेंगे.

मुझे लगता है कि आपके संगठन में एक सामन्ती अवशेष अब भी बचा हुआ है जो आपकी गालियों से भी उजागर  होता है और आपके और मीनाक्षी जी के यौन सम्बन्धी नज़रिये से भी.यौन शुचिता का यह यह नज़रिया वैज्ञानिक  होने की बजाय सनातन धर्मियों जैसा है और आर एस एस जैसे संगठनों को ही फबता है.

मेरा मानना है कि यौन सम्बन्ध दो व्यकियों की रज़ामन्दी का मामला है.जहां रज़ामन्दी न हो वहां यौन सम्बन्ध बलात्कार की कोटि में आता है.यही नहीं बल्कि अगर कहीं विकृति नज़र आये तो उस पर हिकारत से थू-थू करने की बजाय उसे समझदारी से हल करने की ज़रूरत है.हम वैसे ही एक रुग्ण और  हिंसक समाज में रह रहे हैं उसे और रुग्ण और हिंसक मत बनाइये और साथियों के सवालों का जवाब दीजिये.


 
आपका
नीलाभ


Aug 19, 2010

परिवार से बाहर का बुद्धिजीवी गिनाएं

पार्टी के प्रवक्ता जय सिंह ने एक जगह कहा है कि जवाब वह  लिख रहे हैं,तो फिर जनज्वार में कात्यायिनी,शशिप्रकाश का नाम क्यों छापा जा रहा है.जयपुष्प बताएँगे कि संगठन में किसी कार्यकर्त्ता को धरना प्रदर्शन में शामिल होने भर कि भी इजाजत है?सांस्कृतिक प्रबोधन पर पारिवारिक एकाधिकार की खुन्नस तो देखिये ! के   बाद  पवन मेराज की  टिप्पणी

पवन मेराज, भोपाल से

जनचेतना के जय सिंह जी,सबसे पहले आपको बता दूँ....जनज्वार के पत्र कम्युनिज्म को बदनाम करने के लिए नहीं हैं बल्कि उस बदबदाती गन्दगी को साफ करने के लिए हैं  जिससे कि आज भी वहां परेशां होंगे.रही बात आप कार्यकर्ताओं द्वारा भेजे गए जवाब की तो,गुरु भरोसा करो हमलोग भी ऐसे ड्रामा में कई बार फंस चुके हैं जब संगठन कि इज्ज़त के नाम पर बहुत कुछ कराया जाता था जो हम नहीं करना चाहते थे.

कोई ग़लतफ़हमी मत पालिए की आप लोग कम्युनिस्ट हैं....न ही आपको ये मुगालता होना चाहिए कि पूरे क्रन्तिकारी खेमे में लोग ऐसा समझते है.हालाँकि जबतक सवाल उठाने वाले आपके वहां  थे तो उन्हें भी लगता था कि 'हमसे बड़ा कोई क्रांतिकारी काम नहीं कर रहा है',लेकिन बाहर आते ही लगता था कि हम जहाँ थे वह तो एक सुखा कुआँ था जिसकी नियति या फिर भटने की  थी,नहीं तो हमारे मरने की.  

आप लोग बस कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रसार के नाम पर एक प्रकाशन चलाते हैं.आप प्रकाशकों में क्रन्तिकारी हो सकते हैं,लेकिन क्रांतिकारियों में आप प्रकाशक ही हैं.व्यक्तिगत स्तर पर मुझे ऐसे प्रकाशनों से गुरेज नहीं है,ऐसे प्रकाशन होने चाहिए.

पर दिक्कत ये है कि आप लोग तो पूंजीपतियों से भी गये-गुजरे हैं.पूंजीपति सरप्लस का एक बड़ा हिस्सा चट कर जाता है,लेकिन फिर भी श्रमिकों को कुछ तनख्वाह तो देता ही है. लेकिन आप के संगठन के पुरोधाओं ने तो श्रमिकों कि वो तनख्वाह भी मार ली. उनको भ्रम में रखा कि ये सब क्रांति के लिए हो रहा है इसलिए बलिदान-बलिदान.......और युवा भी कैसा मतवाला होता है चल पड़ता है आप के पीछे परिवर्तन के नाम पर.

आप लोगों ने युवा दिल की खुद को दूसरों में बिखेर देने की हसरत का फायदा उठाया है बस.इसीलिए आपके संगठन को ठग कहा जाता है. कितना अच्छा होता आप लोग सिर्फ प्रकाशक कि भूमिका में खुले तौर पर आ जाते, यकीन जानिए तब क्रन्तिकारी खेमा भी एक प्रकाशक के बतौर आपकी भूमिका को स्वीकार करता.लेकिन नहीं, शशिप्रकाश एंड कंपनी के पास पूँजी कहाँ थी... वो जुटाई गई कार्यकर्ताओं के खून और पसीने से. इसलिए आप लोग अपराधी हैं.

ठगी का एक वैकल्पिक मॉडल: अब यह भी उजागर हो गया है.

जरा सोचिये तो जो युवा वाकई बलिदान देते रहे वो कहाँ हैं...और जो उनसे बलिदान मांग रहा था वो कहाँ है. कार्यकर्ताओं से साथ जो हुआ उसका वर्णन बहुत से साथी कर चुके हैं,थोड़ा श्रम लगेगा,लेकिन उन पत्रों को दुबारा पढ़ लें.
जनचेतना का शुमार उभरते हुए हिंदी के बड़े प्रकाशनों में किया जाता है.कात्यायनी को कम से कम मैंने दो समारोहों में इसी परिचय के साथ शिरकत करते हुए पाया.ग्वालियर वाले समारोह में तो उनसे मुलाकात भी हुई थी. मजे की बात यह कि आयोजन किसी जैन सभा ने करवाया था.खैर ये सच है कात्यायनी ने बाद में दूसरे साथियों से खेद भी व्यक्त किया था कि उनको नहीं पता था की आयोजक कौन लोग हैं.

पर ये भी सच है की एसी कम्पार्टमेंट से सफ़र करते हुए वो दिल्ली से ग्वालियर ख़ुशी ख़ुशी आईं भी थीं.  मैं अदना सा व्यक्ति उनके बारे में क्या कहूँ, वो बड़ी लेखिका हैं.लेकिन कात्यायिनी ये बताएं कि क्या ये सच नहीं है कि आपके संगठन में जब भी किसी को कविता-कहानी लिखते हुए पाया जाता तो उसे यही समझाया जाता ये सब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की तुच्छतायें हैं...इसलिए ये सब छोडो,क्रांति के काम में जुट जाओ ...मतलब किताबें बेचो,प्रकाशन के लिए चंदा जुटाओ.

लेकिन आप,आपका बेटा अभिनव और पति शशिप्रकाश जो कि सत्यव्रत  के भी नाम से लिखते हैं यह अधिकार किसने दिया.इतने वर्ष बीत गए अभिनव,सत्यम,मीनाक्षी,कात्यायिनी,  शशि प्रकाश (सत्यव्रत)आदि पारिवारिक सदस्यों के अलावा  भी कोई लेखक बना क्या,उसकी गिनती कितनी है और वह कौन है.

यानी बुद्धि का केंद्रीय कार्यभार आप ही लोगों के पास पिछले २० वर्षों से अटका हुआ है,आखिर क्यों ?बाकि कार्यकर्ता भगत सिंह जैसा जीवन जीने और क़ुरबानी से लबरेज जज्बे के साथ चाय-बिस्किट खाकर ट्रेनों, बसों,ऑफिसों,नुक्कड़ों चंदा मांग क्रांति के भ्रम में जीते रहते हैं.आपके पार्टी के प्रवक्ता जय सिंह ने एक जगह कहा है कि वह जवाब लिख रहे हैं,तो फिर जनज्वार में कात्यायिनी,शशिप्रकाश का नाम क्यों छापा जा रहा है.जयपुष्प   बताएँगे कि जो संगठन किसी कार्यकर्त्ता को धरना प्रदर्शन में जाने की इजाजत नहीं देता वह उन्हें लेख लिखने देगा इसका हमें कोई मुगालता नहीं.

पर खैर अब तो प्रकाशन भी चल निकला है और बड़े नेता लोग दिल्ली में प्रगट तौर पर अंडरग्राउंड होकर रह रहे हैं.दिल्ली विश्विद्यालय में बेटे, पत्नी, बहु, नाती के साथ कई बार टहलते हुए देखे गए शशिप्रकाश कभी दिल्ली के किसी कार्यक्रम में दिखें हों तो कोई बताये.मतलब गुड खाएं गुलगुले से परहेज.प्रगट दुनिया के लिए और अंडरग्राउंड कार्यकर्ताओं के लिए.

फायदा?इससे क्रांति का भ्रम बनाये रखने में मदद मिलती है और कार्यकर्ताओं के मानस में एक रहस्यमय दुनिया बनती है जिसके तिलिस्म से वो लम्बे समय तक निकल ही नहीं पाते.जब तक निकलते हैं तब तक नए लोग भरती हो जाते हैं ... उफ़ ये युवा भी.

क्रांति के लिए बलिदान मांगने वाले बच्चों ने ख़ूब बढ़िया बढ़िया जगहों से शिक्षा पाई.उदाहंरण के लिए अभिनव. (क्या ये सच नहीं है की आपके संगठन में जब भी कोई पढाई-लिखाई में एकाग्र होने कि कोशिश करता है तो उससे कहा जाता है कि ये सब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की तुच्छतायें हैं...इसलिए ये सब छोडो क्रांति के काम में जुट जाओ ...मतलब किताबें बेचो,प्रकाशन के लिए चंदा जुटाओ. क्या यह सच नहीं सारी आधुनिक सुविधाएँ बेटा अभिनव के लिए जुताई जाति हैं और बाकी कार्यकर्ताओं को बलिदान का पाठ पढाया जाता है.ताज़ा उदाहरण बिगुल के संपादक की बेटी  समीक्षा और जनार्दन का है जो
ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं जो बताते हैं कितना अंतर है बलिदान मांगने वालों और बलिदान देने वालों में. क्या इस फर्क को इस वाक्य के साथ जोड़कर देखा जा सकता है -अमीरों की चमक-दमक गरीबों के खून पसीने से आती है.जब श्रमिक आपना हिस्सा मांगता है तो उन पर लाठियां भांजी जाती हैं. पर आप तो उनसे भी गए गुजरे हैं आप लोगों ने तो सब हड़प कर लिया और जब इन खून-पसीने से सीचने वालों या उनके जानने वालों ने आप से कुछ तर्कतः जवाब मांगे तो वो 'मउगा' और 'हिजड़े' हो गए. इन शब्दों को गालियों के रूप में इस्तेमाल करने से एक बात और स्पष्ट हो गई कि विभिन्न समूहों  के बारे में आपके विचार कितने घटिया और पिछड़े हुए हैं.

 जरा पढ़िए, लिखिए, देखिये, दुनिया के पैमाने पर लेफ्ट खेमे में इन पहचानों को लेकर क्या बहस चल रही है. इंसान नहीं बन सकते,कम से कम कोशिश तो कर सकते हैं.खैर ये बहस आपके आदमियत कि तरफ बढ़ने के बाद....फिलहाल तो  आपने उनको जवाब देने कि बजाए 'छि पतित थू विघटित' कहना शुरू कर दिया. अब क्या करें आप लाठी तो चला नहीं सकते. या आपमें इतनी हिम्मत है. ......?




सांस्कृतिक प्रबोधन पर पारिवारिक एकाधिकार की खुन्नस तो देखिये !

 
कात्यायिनी के संगठन की कार्यप्रणाली और तरीके पर रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत) से जुड़े रहे पार्टी कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाये थे और कहा था कि वामधारा की यह पार्टी पारिवारिक कुनबा बन गयी है. प्रमाण के तौर पर कहा भी गया था कि सात सदस्यीय  केंद्रीय समिति में एक ही परिवार से पांच लोग हैं जिनका असली मकसद पैसा इकठ्ठा कर पारिवारिक पूंजी खड़ा करना है.

सवाल उठाने वाले कार्यकर्ताओं और पार्टी सदस्यों को उन्होंने जवाब भिजवाना शुरू किया है. तीन चिट्ठियों  के पहले क्रम में कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब,विरोधियों को कहा 'हिज़डा' लेख में जनचेतना  के संचालक और रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत) के सचिव शशिप्रकाश ने पार्टी  प्रवक्ता और अरविन्द सिंह न्यास के सदस्य जय सिंह उर्फ़ जयपुष्प  के माध्यम से, अपनी पार्टी का स्टैंड भिजवा दिया है,जिससे पाठक परिचित हैं. इस पार्टी के प्रवक्ता जयपुष्प उर्फ़ जय सिंह ने इस बहस को शुरू करने वाले विवेक कुमार के लेख 'वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर' पर प्रतिक्रिया में 'मऊगा' कहा है और जोर कम होता देख उन्होंने खुद के नाम से एक कमेन्ट भी किया है.


विवेक कुमार

आपके पत्र में एक रवानगी है। कई बार पढ़ा। कतई बोरियत नहीं हुई। कई सारे पेंच खुलते हुए नजर आये। खड़खड़ाती कार के भीतर के मंजर को तो हमने जनज्वार पर आयी पिछली पोस्टों में देखा था,  अब आपके माध्यम से बाहरी शक्ल की हकीकत का कुछ खुलासा होता दिख रहा है।

जयपुष्प उर्फ़ जयसिंह आप जिसके हिस्सेदार व तरफदार हैं उससे आपकी वाकिफियत कम दिखती है। बहरहाल, मेरा लिखना उस संगठन से आपको वाकिफ कराना नहीं है। मैं उस दरार को दिखाना चाहता हूँ जहाँ  आप खड़े हैं और खतरनाक निष्कर्ष व आकलन निकालने में कतई कोताही नहीं बरत रहे हैं। आपकी रौ में जो मर्दानगी है (जो कात्यायिनी और शशिप्रकाश की कविताओं में है), आपके निष्कर्षों व आकलन के साथ मिलकर जो शक्ल निर्मित करती है वह काफी डरावनी है।

आप 'हिजड़ा' नहीं हैं, आप 'मऊगा' नहीं हैं इसलिए आप नीलाभ को इनकी  संगत से बच निकलने की सलाह देते हैं। आप स्त्री नहीं हैं, पुरूष हैं।  एक ऐसा पुरूष जो स्त्री पर दंड भेद इत्यादि का तरफदार है। शायद इसीलिए बीबी से डरने वालों के प्रति आपमें सख्त धिक्कार है। प्रबुद्ध सांस्कृतिक मर्दवादी साथी- समय बदल गया है। इस पोपली जमीन पर खड़े होने से शंकराचार्य भी बचने लगे हैं। मगर आप और आपके भाई साहब (शशिप्रकाश) इस जमीन पर जिस तरह खड़े हैं उससे यह मसला कुछ खतरनाक दिशा संकेत करता है। ठीक वैसे ही जिस तरह आप और आपके भाईसाहब के निष्कर्ष व आकलन। आइए, इनके भीतर की दरारों के बारे में बात करें:


दूसरे प्रकाशकों से मूल और अनुवाद के चोरी आरोप
आपने जनज्वार पर लिखने वालों को 'हिजड़ा' और बहस ले आने की कार्यवाई को 'नंगई' की संज्ञा दी है। साथ ही पूछा है कि क्या 'फैसला करने का सबसे उपयुक्त मंच ब्लाग ही है।' आप निष्कर्ष निकालते हैं कि 'कोई भी व्यक्ति ब्लॉग पर गरमागरम बातें लिखकर और पैसिव रैडिकलिज्म की लीद फैलाकर बुद्धिजीवी होने का तमगा हासिल कर सकता है।' आप जमीनी आदमी हैं। ठोस बात करने का आपका दावा है।

कृपया ऐसे बुद्धिजीवी का नाम बतायें जिन्होंने लीद फैलाकर तमगा हासिल किया हो। आपको क्यों लगता है कि आप इस टूल का प्रयोग क्रांति के लिए कर रहे हैं और दूसरे लीद फैलाने के लिए कर रहे हैं? अजय प्रकाश  जनज्वार के माध्यम से बस्तर,बुंदेलखंड,आजमगढ़, हरियाणा के आम हालात तथा राजेन्द्र यादव, विश्वरंजन और  वीएन राय की साहित्यिक हकीकत को जिस तरह सामने लाये  उसकी हमारे समाज में क्या कोई उपयोगिता नहीं है?

यानी आपके साथ जो नहीं है उसका लेखन लीद है। आपके ब्लॉग पर पसंदीदा  किताबों की लिस्ट में सिवाय कात्यायिनी और शशिप्रकाश के दूसरा कोई भारतीय लेखक शामिल नहीं है,यह कैसा साहित्यिक दायरा है.  यह मर्दवादी अमेरिकी तर्क ही है जिसके तले आप 'विरोधी लाइन वाले संगठनों' को चिन्हित करते हैं और षडयंत्र का फरेब रचते हैं। आपके संगठन ने इंटरनेट टूल का प्रयोग किस क्रांतिकारी काम में किया है? आपकी सारी किताबें व पत्रिकाएं ठीक उसी तरह इंटरनेट पर क्यों नहीं उपलब्ध हैं जिस तरह हजारों संगठनों और लोगों ने ऑनलाइन  कर रखा है?

पार्टी सचिव शशिप्रकाश का ब्लॉग 'बात दूर तलक जायेगी' चुप है और सत्यम वर्मा अपने ब्लॉग से अनुवाद के फलक पर दूर तक फैले हुए हैं। सत्यम वर्मा टाइप  लिंकलिडेन  जॉब प्रोफाइल वेबसाइट देखिये तो पता चलेगा की असल एनजीओ कहा है और फिर 'एनजीओ एक खतनाक साम्राज्यवादी' के कुचक्र का असली दर्शन कामरेड की कोठरी में ही होगा.  तब जाकर आपको पता चलेगा कि  छटे -छमासे किसी कार्यक्रम में दिखने वाले सत्यम कार्यक्रम ख़त्म होने से पहले ही  टिकट कटाकर  कितना तेज कम्प्यूटरी आन्दोलन चलाते हैं। अन्य प्रयोगों  में आपके प्रेस रिलीज़ और चंदा उगाहने वाले अभियान से हर कोई वाकिफ है।

आपने ब्लॉग को बहस के लिए मंच के प्रयोग पर सवाल उठाया है। इससे महत्वपूर्ण बात है कि आप इसके लिए किस तरह के मंच का प्रयोग करते हैं। आपने सरकारी संस्थान से रजिस्टर्ड पत्रिका व प्रकाशन से लगातार न केवल चारू मजूमदार व अन्य नेतृत्व के खिलाफ बल्कि नक्सलबाडी से निकली धाराओं के खिलाफ भी लगातार मुहिम छेड़ रखी है। सीपीआई माओवादी के खिलाफ 'आतंकवाद विभ्रम व यथार्थ' पुस्तिका लिखकर आपने बंटवा दी, वह भी तब, जबकि बुर्जुआ सरकार ने भी पार्टी को आतंकवादी नहीं कहा था, आखिर आपके सचिव को  चिलमन में छुपने की  इतनी बेसब्री क्यों थी। फिर क्या यह बहस के लिए उपयुक्त तरीका व मंच था ?

फोटो कट पेस्ट : संगठन में भी काम का यही तरीका
दरअसल, जनज्वार पर आपके संगठन की आलोचना सामने आई। इस तरह की सार्वजनिक आलोचना व आत्मालोचना कोई नई बात नहीं है। माध्यम बदलते गये हैं। आज इस संदर्भ में ब्लॉग व इंटरनेट का प्रयोग खूब हुआ है और हो रहा है। कुछ उदाहरण पेश हैं। इपीडब्ल्यू में सीपीआई माओवादी पार्टी पर बहस व आजाद का रीज्वाइंडर। संहति में लालगढ़ पर विभिन्न संगठनों की बहस। सीजीनेट,ए वर्ल्ड टू वीन इत्यादि ढेरों उदाहरण हैं। तब आपकी आपत्ति क्या है, जनज्वार, अजय प्रकाश या हिन्दी?

आपने नीलाभ को समझाया है कि संगठन से निकले लोग फिसड्डी साबित हो चुके हैं। साथ ही आपने अपने गुप्तकाम के प्रकट रूप के तीन उदाहरण दिये हैं- लुधियाना, करावल नगर और गोरखपुर। क्या आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि जब ये फिसड्डी आपके संगठन में थे उनके सारे काम इतिहास से बेदखल कर देने हैं? मैंने अपने पिछली पोस्ट में इसी बात की शंका जाहिर करते हुए लिखा था कि कामरेड अरविन्द को न्यास व मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान के तले उनके जन आंदोलनकर्ता के रूप को भुला दिया जायेगा।

उत्तराखंड में हीरो होंडा का मजदूर आंदोलन, नोइड़ा में झुग्गी बस्ती बचाने का आंदोलन, मर्यादपुर के मल्लाह समुदाय का आंदोलन इत्यादि को आप किस श्रेणी में रखते हैं? डॉ.  विश्वनाथ व डॉ. दूधनाथ से लेकर जनार्दन तक को फिसड्डी साबित करते हुए, इतिहास पर पोछा मारते हुए आप दरअसल आप अपने भाईसाहब की कारस्तानियों के इतिहास को ही दुहरा रहे हैं। उन्होंने भी नेतृत्व व सहयोगी साथियों को फिसड्डी घोषित कर इतिहास पर पोछा मारने के काम को अभियान के तौर पर लिया था। यह अनुभव देवब्रत,रामनाथ और गैरी से जान लीजियेगा और न समझ में आये तो कुछ और का नाम पूछ लीजियेगा.

आपने जिन तीन आंदोलनों का जिक्र किया है उसके अंत के बारे में भी आपको जरूर बताना चाहिए। मसलन, गोरखपुर में मजदूर आंदोलन फैक्टरी बंद होने के ठप पड़ गया। उसके आगे की योजना जाहिरा तौर पर फैक्टरी को मजदूर अपने हाथ में लेकर चलाने की होनी चाहिए। यह काम हीरो होंडा, उत्तराखंड में एक हद तक हुआ। क्या यह गोरखपुर में हुआ? नहीं। करावल नगर में सिर्फ आप नहीं थे। एटक की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, जिसके खिलाफ आप लोगों ने प्रचार अभियान चलाया।

बादाम मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने में आपकी सराहनीय भूमिका है। आपके पर्चों, लेखों के हिसाब से यह अर्थवाद की मंजिल है। इन मजदूरों को संबोधित पर्चें में आवास कब्जेदारी से लेकर फैक्टरी प्रबंधन की कब्जेदारी के नारे क्यों गुम हैं?आपके पर्चें दिल्ली जनवादी अधिकार मंच के पर्चों से किस तरह भिन्न हैं? लुधियाना के हाल मैं नहीं जानता। इतना जानता हूँ कि सारा मामला राष्ट्रीयता के तनाव के बीच सुलझाया गया, जिसमें नेता व फैक्टरी मालिक ही निर्णायक बने। यह चुनौतीपूर्ण व दुखद घटना है। बहरहाल, मुझे यह बताना था कि आप संगठन के इतिहास में कहां खड़े हैं।

आप जिस आधार पर संगठन से निकले साथियों को फिसड्डी घोषित कर रहे हैं उस आधार पर आपके यहां फिसड्डियों की भरमार है। मसलन, कात्यायनी ने आज तक कितने लेखकों व साहित्यकारों को तैयार किया। सत्यम वर्मा ने कितने साहित्यकार पत्रकार बनाये। शशिप्रकाश ने अपने बेटे अभिनव  को छोड़ कितने लोगों को 'क्रांतिकारी मार्क्सवादी' बनाया। बहरहाल,बात इससे इतर है। संगठन से निकलने के बाद इन साथियों ने अभी तक कोई और संगठन ज्वाइन नहीं किया। इनकी मार्क्सवाद में आस्था है। ये नक्सलबाडी की धारा को  मानते हैं। यह वह आधार है जहॉ से आलोचना आत्मालोचना करते हुए एक नई शुरूआत हो सकती है।

लेकिन यहाँ  तो गति ही भिन्न है। इन्हें झूठा, फरेबी, मक्कार, चुगलखोर, षडयंत्रकारी और आपके पार्टी सचिव के लिखित शब्दों में 'पेटीकोटजीवी' घोषित कर आप अपने को इस कदर विद्रूप बना रहे हैं कि लम्पटों के सरदार भी आपसे मुआफी मांग लें। क्या यह कुछ वैसा ही नहीं है जैसा एक सरमाएदार मजदूर के प्रति रवैया अपनाता है। यह तर्कशैली आपने कहां से उधार ले रखी है?उम्मीद है आप इस पर जरूर सोचेगें। नई शुरूआत परम्परा तोड़ने से होती है। फिसड्डियों की हकीकत से रू-ब-रू होइए।

आपने लिखा है, 'आज के हमारे प्रगतिशील लेखक, कवि और बुद्धिजीवी भारत की गरीब जनता के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुके हैं।' आइए, कात्यायनी की कविता पर थोड़ी चर्चा करें। इनके चार संग्रह का समय 80 के दशक के अंत से आज तक का है। इस दौर में मजदूर, किसान, दलित, स्त्री, मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यक, राष्ट्रीयताएं, आदिवासी व युवा समुदाय के खिलाफ सरकार ने एक के बाद एक अपराधों को अंजाम दिया।

इस पूरे दौर में साम्प्रादायिकता पर कुल चार कवितायेँ हैं। वर्ष 1992 में एक और 2002 में तीन। सबसे अधिक प्रेम पर, उसके बाद कवियों पर और फिर स्त्रियों पर। शेष समुदाय कविता से निर्वासित है। मजदूर कविता से नदारद है। उनके प्रेम के सार्वजनिक पक्ष के पार्श्व में कार्यकर्ता हैं, बेनाम। यह ऐतिहासिक विश्वासघात की श्रेणी में आता है या नहीं?

किसकी कवयित्री कात्यायिनी
आपकी यह क्रांतिकारी कवियत्री लिखती हैं: 'बदला जमाना,पर बदले नहीं रामधनी, गुजरा समय उनका, वे भी गुजर गये।' उत्तर प्रदेश में कहार, धोबी, बुनकर, मुसहर जैसी सैकड़ों जातियां मौत व भूखमरी की तरफ ठेल दी गयीं। सांप्रदायिकता व जातिवाद की राजनीति में यह प्रदेश उबलता रहा। इस हालात के प्रति इस कवियत्री की काव्यात्मक संवेदना निष्ठुर उदासीनता में अभिव्यक्त होती है।

ठीक इसी तरह की रचनाएं आपकी पुस्तिकाओं, पत्रिकाओं में आयीं। जिसका निष्कर्ष था कि धनी किसान मर रहा है तो यह उसकी नीयति है, आदिवासी उजड़ रहा है तो यह उसकी नीयति है। यह सचमुच कोहेकॉफ में सिम्फनी जैसा है, मौत-उजाड़ के प्रति निष्ठुर उदासीनता पर अहमन्यता की लंबी तान। यदि आप इस लंबी तान से उबरेगें तो पाएंगे कि इन विश्वासघातों से बाहर जन के कवि, लेखक और बुद्धिजीवी  हैं। जिनके गीत गाये जाते हैं। जिन्होंने जन के लिए मौत का वरण किया।

बंगाल, बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों के सांस्कृतिक आंदोलन को गौर से देखिये। यहां नाम गिनाना जरूरी नहीं लगता, लेकिन यह बताना जरूरी लगता है कि यूपी में हाल में हुई गिरफतारियों के खिलाफ बुद्धिजीवियों  ने ही धरना-प्रदर्शन और अन्य सहयोग किया। बुद्धिजीवी ही थे जो हेम पांडे और आजाद की हत्या के खिलाफ खड़े हुए। यही लोग थे जिन्होंने सलवा जुडुम के खिलाफ अभियान चलाया। यही हैं जिन्होंने पोस्को नर्मदा से लेकर डाभोल परियोजना के खिलाफ खड़े होकर संघर्ष चलाया।

यही वह बुद्धिजीवी  समुदाय है जिसके खिलाफ सरकार षड़यंत्र  कर उन्हें सलाखों के पीछे डाल देना चाहती है या मार डालना चाहती है। इसी ने एक पीढ़ी भी तैयार की है जो विभूतीनारायण, आलोक मेहता या विश्वरंजन को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। राजनीतिक कार्यकर्ता महोदय! एक बार आप अपने संगठन के गिरेबान में झांककर देखिये कि वहां लेखक, कवि और बुद्धिजीवियों के प्रति रवैया क्या था?

आपके लिए रामकृष्ण पांडेय जी ने अनुवाद किया। बदले में आपने उन्हें क्या दिया? उनकी कविताएं पढ़ी जाती हैं, लेकिन आपने नहीं छापा। उनका संग्रह कहीं और से छपा। उन्होंने न्गुगी व थ्यांगो की पुस्तक पेन प्वाइंट गन प्वाइंट का अनुवाद किया। आप उसे दबाकर बैठ गये क्योंकि यह आपके लिए उपयुक्त नहीं है। उनके अनुवादित किताबों की कितनी रायल्टी उनके घर पहुँचायी  गयी? जबकि उनके परिवार में कोई कमाने वाला नहीं रहा।

ऐसी कई कहानियां हैं। मूल मसला यह देखना है कि विश्वासघात किधर से हुआ है, गोरख पांडे की ओर से या दूसरी ओर से, रामकृष्ण पांडे की ओर से या आपकी ओर से, रामधनी की ओर से या कवियत्री कात्यायनी की ओर से। आप किन लेखकों, बुद्धिजीवियों, कवियों, संस्कृतिकर्मियों के बीच रहते हैं जो उच्च मध्यवर्ग जीवनशैली जी रहे हैं। यदि आप ऐसों के बीच हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना। हां,यह जरूर कहना है कि आज भी इसी दिल्ली में आलू और सोयाबीन पर, मठठी और चाय पर जिदंगी गुजारते हुए सांस्कृतिक कर्म करने वालों की जमात काफी है और जिनके सृजन से एक उम्मीद बनती है।

अनुवाद ही आन्दोलन  
इस संदर्भ में आप यह जरूर बताएं कि आपका संगठन अस्तित्व में आने के साथ ही लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों के पीछे गालियों के भंडार के साथ क्यों पिल पड़ा? सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे बुद्धिजीवियों ने आपकी लाइन का मार्ग प्रशस्त किया है, उन्हें हिलफर्डिंग का तमगा आपने पकड़ाया है,फिर भी आप छाती पीटे जा रहे हैं। यह तो अदभुत उलटबासी  है। यदि बात साफ नहीं है तो साम्राज्यवाद पर दायित्वबोध क लेख और अपने प्रकाशन की पुस्तिका जरूर देखें।

आपने जिन नखादा बुर्जुआ प्रकाशकों से नाउम्मीदी जाहिर की है उसी में से एक राजकमल ने आपकी संपादित पुस्तकों को छापा है। आकार प्रकाशन बड़े पैमाने पर  मार्क्सवाद की मौजूं किताबें छाप रहा है। दानिश भी लगा हुआ है। गार्गी, अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन, रेडिकल पब्लिकेशन जैसे ढेरों प्रकाशक इस काम में लगे हुए हैं। कृपया बताये कि 'मां' जैसी कौन सी किताब है जिसे कोई छापने के लिए कोई तैयार नहीं है और वितरण के लिए तैयार नहीं है। यदि यह कल्पना में है तो उसे जल्द से जल्द हकीकत में उतारिये।

अपने देश में हर साल हजारों किताबें बिना रजिस्टर्ड प्रकाशन के छपती और बिकती हैं। आपकी 'मां' जैसी किताब भी जरूर छपेगी और वितरित होगी। लेकिन अभी तो आप वही छाप रहे हैं जो दूसरे प्रकाशनों ने छाप रखी है। मसलन, तरुणाई  का तराना -यांग मो उपन्यास एआईआरएसएफ नाम के छात्र संगठन ने छापी थी और इसकी पच्चीस हजार प्रतियां उस समय अत्यंत कम दाम पर वितरित हुईं। इसे आप युवा के गीत के नाम से छापकर बेच रहे हैं। आपके प्रकाशन का 90 प्रतिशत हिस्सा दूसरे प्रकाशन का पुनर्मुद्रण ही है।

 चंद हेरफेर से आप मूल अनुवादक बन जाते हैं। आप पूर्ववर्ती प्रकाशकों, अनुवादकों को धन्यवाद भी ज्ञापित करने से बच निकलते हैं। आपसे यह बताने की गुजारिश है कि डाइसन कार्टर की पुस्तक पाप और विज्ञान का अनुवाद अन्य प्रकाशनों से किस तरह भिन्न है और गार्गी व पीपीएच के द्वारा इसके प्रकाशन के बावजूद आपने इसे क्यों छापा? आप यह बताएं कि आप और गार्गी प्रकाशन से छपी टर्निंग प्वाइंट इन चाइना के बीच अनुवाद में गुणात्मक फर्क क्या है और छपे होने के बावजूद आपने इसे क्यों छापा? इसी तरह पीपीएच व आपके प्रकाशन से छपे अन्ना करेनिना के अनुवाद के फर्क के बारे में जरूर बताएं। और यह भी बताएं कि इससे भारत की क्रांति में कौन सी अड़ंगेबाजी आ रही थी। वह कौन से शब्द व व्याकरण की गलतियां हैं जिसके होने से भारतीय क्रांति के कार्यक्रम में फर्क आ जाता?

आप भाषा और व्याकरण को जिस सांस्कृतिक प्रबोधन की जमीन को  रच रहे हैं वह मूलतः यूरोपीय और लातिनी है। इसकी हिन्दी बनावटी व आत्मा से हीन है। जब राजेन्द्र यादव ने आपकी इस हिन्दी के अनुवाद का आग्रह किया तो निश्चय ही वे गलत नहीं थे। आपकी यह हिन्दी जनपदीय भाषा के विस्तार व पहुँच  का निषेध करती है। आपकी भाषा वर्चस्व के मूल्य से प्रस्थान करती है। यह मर्दवादी तर्कशैली से काम करती है। फुसफुसाहट व व्याख्या के सहारे संवाद कायम करती है। एक संकुचित घेरे को निर्मित करती है।

दरअसल,समस्या यहां नहीं है जहां आप उलझते हुए नीलाभ को समझा रहे हैं। समस्या न्यास, प्रकाशन और संगठन के ऐसे गठनजोड़ की है जिसके केन्द्र में सांस्कृतिक प्रबोधन की राजनीति और उसके शीर्ष पर एक परिवार की कब्जेदारी है। यह कब्जेदारी राजनीतिक, सांगठनिक और सांस्कृतिक स्तर पर है। जो छपी पुस्तकों का पुनर्मुद्रण कर रहा है। इस बारे में काफी कुछ पिछले पोस्ट में लिखा जा चुका है। दुहराना ठीक नहीं लग रहा।

इतना लिखना जरूरी लग रहा है कि आपके संगठन ने प्रकाशन व न्यास वगैरह का काम मजबूरी में नहीं, बल्कि संगठन की मूल योजना के तहत लिया हुआ है। सांस्कृतिक प्रबोधन के दस्तावेज को आप जरूर पढ़ें, ताकि कम से कम आप प्रकाशन के काम में 'मजबूर' न रहें। आप हथियार खरीदने और किताब खरीदने के बीच लेखकों  को खड़ा कर एक ऐसी कल्पना में मशगूल हैं जिसमें सिर्फ तरंगें हैं, जमीन नदारद है। बहरहाल,आपको एक ठोस जमीन मयस्सर हो।

मैं आपके संगठन की दलित, स्त्री, मुसलमान, आदिवासी मुददों पर पोजीशन जानने का इच्छुक हूँ। आपका संगठन हिजड़ों व समलैंगिकता पर क्या विचार रखता है, यह जरूर बतायें। हिजड़ा शारीरिक श्रम कर सकता है और करता है। मसला अवसर का है। शारीरिक आधार पर भेदभाव करना, उसे गाली में बदल देना ठीक वैसे ही है जैसे स्त्रियों के मामले में किया गया। आप यह जरूर मानते होंगे कि स्त्री पुरूष बराबर हैं। ऐसे में आपके द्वारा पति से पत्नी पर दबंगई की मांग उपरोक्त का निषेध नहीं है। यह मसला सिर्फ आपका नहीं है। आपका नेतृत्व इससे भी गंदी भाषा का प्रयोग करता है। सांस्कृतिक प्रबोधन का अभियान चलाने वाले संगठन की यह भाषा, व्यवहार उसके भीतर की हकीकत को ही दिखाता है।  उम्मीद है कि कुछ सार्थक हस्तक्षेप करने वाले हाथ जरूर आगे आयेंगे।




Aug 18, 2010

छिछोरों की मुंशीगीरी में साहित्यकार लगे हैं


जनज्वार  पर हमारे खिलाफ इतना छपने के बाद   चुप्पी को देखकर वाकई कहा जा सकता है कि भारत के बुद्धिजीवी समाज के अंतर्विवेक को लकवा मार गया है। संजीव जैसे 'नारसिसस कांप्लेक्स' से ग्रस्त लेखक को पटाकर (जिन्हें मठाधीश बनने के लिए भी राजेंद्र यादव का उतारा हुआ जूता ही मिला) 'हंस' में 'जनचेतना' और 'राहुल फाउण्डेशन' पर टिप्पणी करा लें, इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. इसी सोच के तहत राहुल फ़ाउंडेशन, अनुराग ट्रस्‍ट, परिकल्‍पना आदि खड़े किये गये हैं और डेढ़ दशक से अपने लक्ष्‍य को साकार करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं। इसे ये छिछोरे जानते हैं- मीनाक्षी, रिवोलुशनरी कोम्युनिस्ट लीग (भारत) की केन्द्रीय समिति सदस्य


शशिप्रकाश और कात्यायिनी ने तीसरा जवाब भी भेज दिया है. उसमें भी उन्होंने कमोबेश वही बातें कहीं हैं जो वह कहते आये हैं. उनका सारा संकट आकर शरीर के मध्य क्षेत्र में अटक गया है. एक  दूसरी श्रेणी उन्होंने मुंशियों, पागलों आदि की भी बना ली है, लेकिन पूछे गए किसी सवाल का जवाब नहीं भेजा है, शायद अगले जवाब में कात्यायिनी कुछ कहें. अब उन्होंने अगली रणनीति के तहत हिंदी साहित्कारों और बुद्धिजीवियों को लताड़ना शुरू कर दिया है. 


मीनाक्षी
मीनाक्षी: हिंदी में लकवा ग्रस्त बुद्धिजीवी हैं

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग जगत के धोबीघाट पर कम्युनिस्ट आन्दोलन को कलंकित करने के लिए एक जमात अपनी समझ से कम्युनिस्ट आन्दोलन के गन्दे कपड़े धो रही है, जबकि वास्तव में वह अपने ही गन्दे कपड़ों को कछार कर अपनी कुत्सित मानसिकता को बेनक़ाब कर रही है।

इनके व्यक्तिगत आक्षेपों-आरोपों-लांछनों का जवाब देना बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता अगर हम एक जिम्मेदार,संजीदा समय में जी रहे होते। लेकिन आज जैसे गतिरोध,विपर्यय और ठहराव-बिखराव से उपजी निराशा के दौर में गाली-गलौज को भी लोग 'बहस' का नाम देने में सफल हो जाते हैं। आज वामपंथी आंदोलन की जो हालत है,उसमें आश्‍चर्य नहीं कि कुछ बुद्धिजीवी अपने को तटस्थ दिखाते हुए भी यहाँ-वहाँ चिमगोइयाँ लेने से बाज़ न आ रहे हों। आखिर स्तालिन ने यूँ ही नहीं कहा था कि एशियाई देशों की क्रान्तियाँ झूठ-फरेब, चुगली, साज़िशों और दुरभिसंधियों से भरी होंगी।

मैं अरविन्द की कामरेड और जीवनसाथी हूँ और मुझे फ़ख़्र है कि उनके जाने के बाद भी उसी रास्ते पर अडिग हूँ जिस पर हमने साथ-साथ चलने की कसम खायी थी। आज कुछ लोग बार-बार अरविन्द, उनके संगठन और व्यक्तिगत रूप से मुझे निशाना बनाकर निहायत शर्मनाक और गन्दे आक्षेप लगा रहे हैं। कम्युनिस्ट हर समाज में तमाम तरह की गालियाँ सुनते रहे हैं और इनसे कभी विचलित नहीं होते, लेकिन अगर किसी दिवंगत साथी को इस तरह से लांछित किया जाये तो चुप नहीं रहा जा सकता।


जो लोग अरविंद के जीवित रहते उनके ख़ि‍लाफ़ घटिया से घटिया आक्षेपों और दुष्‍प्रचारों में लगे हुए थे, वही उनकी मृत्‍यु के बाद भी अरविंद को बदनाम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहे हैं। वे कह रहे हैं कि अरविंद को सज़ा के तौर पर गोरखपुर में अलग-थलग छोड़ दिया गया था, कि उनसे लोगों को बाहर निकलवाने का काम कराया जाता था, आदि-आदि।

पहला सवाल तो यह है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के अधिकांश लोग अरविन्द से परिचित हैं। क्या वे नहीं जानते कि अरविन्द ऐसे डोसाइल और कमज़ोर व्यक्ति नहीं थे कि उनसे उनकी मर्जी के बगैर कोई भी कुछ भी करवा सकता था।1986 में समाजवादी क्रान्ति की लाइन के दस्तावेज़ को लेकर देशभर के अनेक क्रान्तिकारी वाम संगठनों के नेतृत्व से अरविन्द ने मुलाकात की थी। फिर 1990 में मार्क्‍सवाद ज़िन्दाबाद मंच के पाँच दिवसीय सेमिनार के दौरान और विभिन्न क्रान्तिकारी संगठनों से मिलने के लिए दो बार की लम्बी यात्राओं के दौरान आन्दोलन के ज़िम्मेदार लोगों का उनसे नज़दीक से परिचय हुआ। नेपाल में हुए अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान भी भारत और नेपाल के क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों से उनके रिश्ते बने। बनारस, गोरखपुर, लखनऊ और दिल्ली में काम करते हुए और देशभर में विभिन्न आयोजनों में वे जिन लोगों से मिले, वे क्या इस बात में यकीन करेंगे कि अरविन्द ऐसे व्यक्ति थे जिनसे कुछ भी करा लिया जाये?

दूसरा सवाल। एक तथ्य रेखांकित करना ज़रूरी है कि इस जमात के अधिकांश व्यक्ति वे हैं जिन्हें पिछले 5-6 वर्षों के दौरान अलग-अलग आरोपों में खुद अरविन्द द्वारा ही निष्कासित/निलम्बित किया गया था। ये स्वतः किसी मतभेद के कारण या किसी राजनीतिक मसले के कारण अलग नहीं हुए और न ही एक साथ संगठन से गये। इनमें से कुछ तो वे हैं जो 10-12 साल पहले ही यह कहते हुए घर बैठ गये थे कि इतना कठिन जीवन हमारे बस का नहीं है। कुछ को नैतिक कदाचार के आरोप में निलम्बित किया गया था। अगर इनमें दम है तो बतायें कि नोयडा की टीम से अजय प्रकाश, प्रदीप और घनश्याम को किस वजह से निलम्बित किया गया था? अगर 'जनज्वार' के संचालक में ज़रा भी कमिटमेंट है तो उन्हें यह सब छोड़कर भारत में समलैंगिक आन्दोलन को बढ़ाने में लग जाना चाहिए।

कात्यायिनी: बहन मीनाक्षी को उतारा
मुकुल,जिसके अर्थवाद और मुंशीगीरी के विरुद्ध संगठन में लम्बे समय से संघर्ष था, वह ज़रा बताये कि तराई क्षेत्र में उसके कामों की क्या आलोचना रखी गयी थी? अगर खटीमा आन्दोलन के दौरान अरविन्द डेढ़ महीने तक वहाँ न रहे होते तो पता ही न चलता कि उसके अर्थवाद ने कामों और संगठन की छवि को कितना नुकसान पहुँचाया है। अपनी हरकतों की वजह से उस आन्दोलन में साथ रहे बिरादर संगठन की नज़रों में मुकुल की छवि एक तिकड़मबाज और मुंशीगीरी करने वाले व्यक्ति की थी, न कि एक साहसी क्रान्तिकारी कार्यकर्ता की। लेनिन ने कहा है कि कम्युनिस्ट को ट्रेड यूनियन सेक्रेटरी जैसा नहीं बन जाना चाहिए, लेकिन यह तो उससे भी नीचे, अर्थवादी यूनियनों के जोड़-तोड़ करने वाले नेताओं जैसे आचरण पर उतर चुका था। इसके व्यवहार से तंग आकर एक मज़दूर संगठनकर्ता 40 पृष्ठ का शिकायती पत्र लिखकर पहले ही संगठन छोड़ गया था और लखनऊ से उसकी मदद के लिए भेजे गये एक युवा संगठनकर्ता आशीष निरन्तर मानसिक तनाव में रहा करते थे। उसकी कार्यशैली और जीवनशैली की आलोचना के बाद मुकुल जब भागा तो वह कुछ राजनीतिक सवालों का धुँआ छोड़ते हुए भागा, लेकिन बाकी तो नैतिक कदाचार, षड्यंत्र, गबन आदि के कारण अलग-अलग समयों में निकाले गये या 'हमारे बस का नहीं' कहकर घर बैठ गये।

आदेश कुमार सिंह नामक वह शख़्स जो नेपाल की तराई के एक धनी किसान का बेटा है और लम्बे समय तक डिप्रेशन का इलाज कराता रहा,रेल मज़दूर अधिकार मोर्चा तथा इंडियन रेलवे टेक्निकल एंड आर्टीज़न स्‍टाफ एसोसिएशन में अपने घनघोर अर्थवाद और व्यक्तिवाद के बावजूद बार-बार अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से पैदा हुई वैयक्तिक कुंठाओं का रोना रोकर छूट लेता रहा। वह तो भोकार छोड़ते रोते हुए संगठन से यह कहकर गया था कि अपनी कमजोरियों के चलते जा रहा है, मगर 'साथी तो उसे बहुत प्रिय हैं।' वह भी आज ब्लॉग पर चुटपुटिया छोड़ रहा है और समझ रहा है कि धमाके कर रहा है।

सत्येंद्र कुमार साहू नाम का व्यक्ति तो लम्बे समय से छुट्टी लेकर 'सम्पत्ति और परिवार' को व्यवस्थित करने में लगा था, इसके साथ तो संगठन मानो एक प्रयोग कर रहा था कि क्या कई पीढ़ी के सूदखोर खानदान से आये एक वर्गशत्रु को रगड़-घिसकर कम्युनिस्ट बनाया जा सकता है? दरअसल, इसका असली मक़सद तो था अपनी तीन बेटियों को आधुनिक बनाना। संगठन के साथ लगकर इसका यह प्रोजेक्ट जब पूरा हो गया तो उसे संगठन में रहना भारी लगने लगा। इसके निखट्टूपन और हर जगह वर्ग सहयोग तथा बनियागीरी करने की आलोचनाएँ इसे बुरी लगने लगीं। पिछले दो वर्ष से अधिक समय से यह छुट्टी पर था और संगठन के साथ मज़बूती से खड़ी अपनी एक बेटी (शालिनी) को घरेलू जीवन में लौट आने के लिए कनविंस करने की कोशिश में लगा रहा। ये इन कुत्साप्रचारकों की मंडली का फाइनेंसर भी है और अपने मूर्खतापूर्ण और घटिया आरोपों की एक पुस्तिका भी छपवाकर बाँटता रहा है।

ज़रा देखिये कि ये आखिर कह क्या रहे हैं। किस व्यक्ति को किस नाम से पुकारा जाता है, कौन किसका क्या लगता है? ये कौन-सी राजनीतिक बात है? मतभेद के नाम पर जो लोग यह छापकर बाँट रहे हैं कि किसी संगठन ने फलां सरकारी गेस्टहाउस में कांफ्रेस या मीटिंग की, क्या उन्हें राज्यसत्ता का एजेंट नहीं माना जाना चाहिए? यह तो कोई राजनीतिक मसला नहीं है। वाम क्रान्तिकारी धारा के संगठन गेस्टहाउस, रेस्टहाउस या होटल में भी ज़रूरत के अनुसार मीटिंगें करते रहे हैं। प्रश्न यह भी नहीं कि ऐसी किसी जगह मींटिंग/कांफ्रेंस हुई या नहीं हुई। प्रश्न तो यह है कि अगर कोई संगठन ऐसा करता भी है और इस तथ्य को कुछ लोग छापकर बड़े पैमाने पर सर्कुलेट करते हैं तो उन्हें क्या माना जाना चाहिए? क्या ऐसे लोगों की बातों को संजीदगी से लिया जाना चाहिए?

ग्वालियर में बैठकर इस कीचड़फेंक मुहिम में अपनी गन्दगी जोड़ने में लगे अशोक कुमार पाण्डेय की भी सुन लीलिए। लखनऊ में एक अखबार के गुण्डों ने जब 1995 में उसके दफ्तर पर धरना दे रहे राहुल फाउण्डेशन के कार्यकर्ताओं पर हमला किया था,जिसमें सैकड़ों की भीड़ के सामने गुण्डों की फौज से दो दर्जन कार्यकर्ता आधे घण्टे तक भिड़ते रहे थे, आधा दर्जन से ज्यादा महिलाओं सहित दर्जन भर लोगों के सिर फटे थे, तो गोरखपुर से टोली के साथ गया एक शख्स था जिसकी डर के मारे पैंट गीली हो गयी थी और वह अपने साथियों को छोड़कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ था। जिस वक्त जेल से बाहर रह गये साथी लखनऊ के बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर इस घटना के खिलाफ कार्रवाई की तैयारियाँ कर रहे थे,यह व्यक्ति बहाना बनाकर गोरखपुर लौट गया और फिर किनारा कर गया। यह वही व्यक्ति है। वैसे संगठन में रहने के दौरान इसने ज्ञान की जो पंजीरी ग्रहण की थी उसे ही ब्लॉग पर बाँटते हुए यह भी छोटा-मोटा बुद्धिजीवी बन गया है। मठ बनाने की तो इसकी औकात नहीं है,पर छोटी-मोटी कुटिया बनाकर बैठने लायक ज्ञान तो यह पा ही गया था। भला हो गुण्डों के हमले का -पैंट भले ही गीली हो गयी, मगर सिर पर पाँव रखकर भागने का अवसर तो मिल ही गया। इसकी राजनीतिक बहस का स्टैंडर्ड यही है कि संगठन में किसी को भाई जी, भाई साहब, चाचा आदि-आदि क्या कहा जाता है। ये अपने आप में भला कौन-सा मुद्दा है?

इस सब के बाद भी छाई चुप्पी को देखकर वाकई कहा जा सकता है कि भारत के बुद्धिजीवी समाज के अंतर्विवेक को लकवा मार गया है।

इन सब लोगों की वर्ग-अवस्थिति तो इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि क्रान्तिकारी कामों के लिए जनता से स्रोत-संसाधन जुटाने को ये 'भीख माँगना' कहते हैं। हम गर्व से कहते हैं कि इतने विपरीत, ठण्डे, बेरहम समय में, पाँच स्रोतों (सरकार या सरकारी विभागों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और पूंजीपति घरानों तथा उनके ट्रस्टों, चुनावी पार्टियों और विदेशी फंडिंग एजेंसियों) से किसी प्रकार का अनुदान लिये बिना केवल जनसहयोग के दम पर हम अपने कामों को संचालित कर रहे हैं। हम अपनी पत्र-पत्रिकाओं के घाटे के भरपाई के लिए अभियान चलाते हैं, मज़दूर अखबार के लिए मज़दूरों के बीच नियमित रूप से कूपन काटते हैं, व्‍यवस्‍था-विरोधी आम राजनीतिक प्रचार के लिए 'क्रान्तिकारी लोकस्वराज अभियान' चलाते हैं और इसकी गतिविधियों के लिए सहयोग जुटाते हैं, वैकल्पिक जन मीडिया खड़ा करने के प्रयासों के लिए 'हमारा मीडिया अभियान' के तहत घर-घर, दफ्तर-दफ्तर जाकर एक-एक व्यक्ति से बात करके सहयोग लेते हैं। इसे कोई ''कार्यकर्ताओं से भीख मँगवाना'' कहे तो उसकी घटिया सोच का ही पता चलता है।

आज अपनी हुआँ-हुआँ का शोर मचा रहे ये सारे गीदड़ और चमगादड़ एनजीओ और प्रिंट मीडिया के भीटों और मांदों में रहते हैं, इनमें लोगों के बीच जाने का साहस कहाँ। ये ब्लॉग पर चाहे जितना विषवमन कर लें,संजीव जैसे 'नारसिसस कांप्लेक्स' से ग्रस्त किसी लेखक को पटाकर (जिन्हें मठाधीश बनने के लिए भी राजेंद्र यादव का उतारा हुआ जूता ही मिला)'हंस'में 'जनचेतना'और 'राहुल फाउण्डेशन' पर टिप्पणी करा लें, इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। इन बातों से फर्क पड़ना होता तो 1990 से अब तक बार-बार कहा जाता रहा कि हम एक पारिवारिक मंडली हैं, कुर्सीतोड़ बुद्धिजीवी हैं, घरों में भागने के लिए सुरक्षित रास्ता तलाश रहे हैं, केवल किताब बेचते हैं, वगैरह-वगैरह -- हम तो कब के मिट गये होते। पुरानी कहावत है, कुत्ते भौंकते रहते हैं, हाथी अपनी राह चलता जाता है।

हमें अपने बोल्शेविक होने पर गर्व है,और जिनके बीच रहकर हम लड़ रहे हैं उन पर भरोसा है। सोचना तो उन बुद्धिजीवियों को है जो बहस के नाम पर मचाई जा रही इस गंदगी पर चुप हैं या अन्दर-अन्दर मज़ा ले रहे हैं, या आन्दोलन को नसीहतबाज़ी की मुद्रा अपनाये हुए हैं। सोचना उन्हें है कि वे किस तरह के लोगों के साथ खड़े हैं और किस तरह की राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।

जो लोग संजीदगी के साथ इस मसले पर सोचते हैं (बहुत से लोगों ने हमें फोन करके कहा कि हमें इनका जवाब देना चाहिए), उनसे हमारा कहना है कि ज़रा सोचें, अलग-अलग समयों में संगठन से निकाले या बैठ गये इन तमाम लोगों का एक ही कॉमन एजेंडा कैसे हो गया?मुकुल तो फिर भी कुछ राजनीतिक मुद्दों का स्मोकस्क्रीन खड़ा करता हुआ भागा था,बाकी ने तो न संगठन में रहते कभी कोई सवाल उठाया न बाद में उनका कोई राजनीतिक सवाल था।

हमारे लिए यह सब कोई आश्चर्य की बात नहीं है, मगर बुद्धिजीवियों और राजनीतिक संगठनों के लोगों को देखना चाहिए कि ऐसी बातें करने वाले लोग कौन हैं, क्या कर रहे हैं, और इनका अपना सकारात्मक एजेंडा क्या है, या कुछ है भी या नहीं। हम तो मार्क्‍सवाद की इस बात में विश्वास करते हैं, जिसे लेनिन ने बार-बार दोहराया है कि किसी संगठन की राजनीतिक लाइन ग़लत होने से यदि उसके लोगों के व्यक्तिगत आचरण का भी पतन होता है, या कुछ लोगों के व्यक्तिगत पतन की वजह से भी यदि राजनीतिक लाइन ग़लत होती है,तो कम्युनिस्ट पहले राजनीतिक लाइन को ही निशाना बनाता है। जो लोग राजनीतिक लाइन के बजाय इन चीजों की बात करते हैं वे स्वतः अपने चरित्र को नंगा करते हैं क्योंकि कुत्सा-प्रचार की अपनी एक विचारधारा और राजनीति होती है।

आज के दौर में विभिन्न प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं खड़ी करके राज्यसत्ता के सामाजिक अवलंबों के बरक्स जनक्रान्ति के सामाजिक अवलंबों का विकास करना क्रान्ति का एक ज़रूरी उद्यम है --यह हमारी सुस्पष्ट और घोषित राजनीतिक सोच है। इसी सोच के तहत राहुल फ़ाउंडेशन, अनुराग ट्रस्‍ट, परिकल्‍पना आदि खड़े किये गये हैं और डेढ़ दशक से अपने लक्ष्‍य को साकार करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं। इसे ये छिछोरे जानते हैं। फिर भी, महज़ गाली देने के लिए यह कहना कि हम लोग राहुल सांकृत्यायन, अरविंद आदि के नाम पर पैसे बटोरने के लिए यह सब कह रहे हैं, कितनी घटिया बात है। हां, हम गर्वपूर्वक घोषित करते हैं कि हमारी राजनीति में वह ताकत है कि सच्चे लेनिनवादी अर्थों में पेशेवर क्रान्तिकारी सभी संपत्ति-संबंधों से निर्णायक विच्छेद करते हैं। इसी प्रकार की सामाजिक संस्थाओं के लिए अनेक पेशेवर क्रान्तिकारियों ने अपने घर-बार भी दिये हैं। जिन्हें महज़ गाली देने का बहाना चाहिए और जिनकी औकात ही नहीं है कि अपने बूते पर कोई संस्था खड़ी करने का सपना भी देख सकें, वे अगर इन उपक्रमों को संपत्ति खड़ी करने के उपक्रम के रूप में देखते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। इनके द्वारा प्रचारित एक सफेद झूठ के विरुद्ध हम सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि तकनीकी-क़ानूनी कारणों से एकाध अपवाद को छोड़कर हमारे बीच किसी पूरावक़्ती कार्यकर्ता की कोई निजी संपत्ति नहीं है।

सच्चा कम्युनिस्ट पड़ोसी के बच्चों से पहले अपनी पत्‍नी, बच्चों और परिवार को क्रान्ति से जोड़ता है। हम गर्वपूर्वक कहते हैं कि अपने परिवार को क्रान्ति की आंच से सुरक्षित रखने वाले भारत के बहुतेरे कम्युनिस्टों के विपरीत हमने अपने स्वजनों, परिजनों, संबंधियों, घनिष्ठ मित्रों को क्रान्तिकारी कामों से जोड़ा है या उनसे रिश्ते तय कर लिए हैं। संगठन के बहुत से साथियों ने सामाजिक परंपराओं को तोड़कर एक-दूसरे का जीवनसाथी बनने का कदम उठाया है। अगर कोई इसे संगठन में परिवार बढ़ाना कहता है तो इस निकृष्ट सोच को क्या कहा जाए? हमारे राजनीतिक जीवन में इन रिश्तों की कोई अहमियत कभी नहीं रही है। कुनबापरस्ती का आरोप लगाने वाले ये गीदड़ यह क्यों नहीं बताते कि विचारधारा और राजनीति के मतभेदों पर हमारे बीच कितने ही परिवार टूटे भी हैं। भाई-भाई, बाप-बेटे/बेटी, घनिष्ठतम मित्र तक उसूलों के सवाल पर दो जगह खड़े हैं।

जो किसी भी कम्युनिस्ट के लिए गर्व की बात हो सकती है, उसे जो लोग कलंकित और लांछित करने का प्रयास करते हैं, उनकी नस्ल पहचानना ज़रूरी है।






संदेशा शशिप्रकाश का 'वे कम्युनिस्ट नहीं "मउगा" हैं ?'


कोई सच्‍चा कम्‍युनिस्‍ट कभी भी कठिन हालात,अकेलापन,जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्‍कार से त्रस्‍त नहीं होता। जो इन चीजों से त्रस्‍त होते हैं उन्‍हें कम्‍युनिस्‍ट नहीं मउगा कहा जाता है- कात्यायिनी और सत्यम वर्मा की पार्टी रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत ) की ओर से अधिकृत प्रवक्ता जय सिंह के विचार.


कुछ महीने पहले जनज्वार ने ‘ठगी का एक सामाजिक अभियान’लेख प्रकाशित किया था कि कैसे एनजीओ वाले पीड़ितों के उत्थान के नाम पर फरेब रचते हैं। यह लेख हिंदी की प्रमुख वेबसाइट रविवार समेत कुछ अन्य भी वेब माध्यमों पर प्रमुखता से छपा था। सच पढ़ एनजीओ के कर्ताधर्ता ने जवाब में पहली ही लाइन में दर्ज किया कि ‘आप जैसे लोग दारू और सिगरेट पीकर सामाजिक बात करते है!’बहरहाल इन पंक्तियों को पढ़ हम चकित नहीं हुए क्योंकि हमारा मानना है कि इनका सेवन करने वाला भी सामाजिक परिवर्तन की बात कर सकता है। बहरहाल इत्मिनान से हम पूरा लेख इस उम्मीद से पढ़ गये कि चलो कहीं तो कोई बात कही गयी होगी जो हमारे सवालों के बरक्स होगी।



पर ऐसा नहीं हुआ। रविवार के संपादक समेत वेब माध्यमों के ज्यादातर जनपक्षधर पाठक परिचित हैं कि एनजीओ के कर्ताधर्ता महोदय ने दर्जनों लेख तो भेजे मगर किसी एक लेख में भी वह नहीं बता पाये कि जो सवाल जनज्वार ने उठाये थे वो कहां गये। तब हमने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ‘वह चाहता था कि हम सुचिता में फंसकर कुछ उलुल-जुलूल-जैसे कि हम नहीं पीते हैं,तुम्हारे पास क्या सबूत है,यह व्यक्तिगत आरोप है आदि कहें और बात मूल सवाल से कोसो दूर वहां अटक जाये कि लोग कहें ‘आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास।’



कुछ ऐसा ही प्रपंच शशिप्रकाश का कुनबा यहाँ भी रच रहा है.सवालों को भटकाने के मकसद से यहाँ भी  क्रांति के दुकानदारों के  मेंठ  का पेट जब  हिजड़ा कहने से नहीं भरा तो उन्होंने हमें मऊगा कहा कि हम हिजड़ा और  मऊगा न होने का प्रमाण देनें में लग जाएँ. बहरहाल हम उनके दोनों आरोपों को तहेदिल से जगह देते हैं और मानते हैं कि हिजड़ा और मऊगा यानी गे लोगों को भी सवाल उठाने का बराबर का ही अधिकार है और उनके हकों के लिए जनज्वार हमेशा आगे रहेगा.रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत ) के प्रवक्ता जय सिंह इतने अधीर हो जाते हैं कि खुद के ब्लॉग अपने ही नाम से कमेन्ट कर बताते हैं कि वह तो मऊगा  है.

शशिप्रकाश के चलन के मुताबिक अब विरोधियों से निपटने के लिए मारपीट कर चुप कराने की कोशिश होगी जो हर बार इनका अंतिम रास्ता रहा है.गार्गी प्रकाशन से जुड़े दिगंबर,पत्रकार देवेन्द्र और भी ऐसे कई लोग इसके जीवित उदहारण हैं जबकि बिगुल के संपादक की बेटी उन तमाम गवाहों में से एक है और प्रमाण नोएडा के सेक्टर २४ में आज भी सुरक्षित है. बस हरबार की तरह चालाकी यह बरती गयी कि कुनबे का कोई नहीं हो.

बगैर किसी काट-छांट के  रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत )के प्रवक्ता और अरविन्द सिंह न्यास के सदस्य जय सिंह के विचार और पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर जारी एक पत्र...

जवाब भाग- २  'जनज्वार' की कुत्‍सा-प्रचार मुहिम के पीछे का सच...

हिन्दी के एक ब्लॉग पर पिछले दिनों क्रान्तिकारी वाम धारा से जुड़े एक संगठन और उससे जुड़े कुछ व्यक्तियों तथा संस्थाओं के खिलाफ घिनौने कुत्सा-प्रचार की एक मुहिम छेड़ दी गयी थी। 'जनज्वार' नाम के इस ब्लॉग पर 22 से 28 जुलाई तक प्रकाशित इन पोस्टों और उन पर डाली/डलवायी गयी टिप्पणियों को पढ़कर कोई भी संजीदा व्यक्ति यह समझ सकता है कि इनका मकसद किन्हीं राजनीतिक-सामाजिक सवालों को उठाना नहीं है, जैसाकि कुछ पोस्टों में दिखाने की कोशिश की गयी है। इनका एकमात्र मकसद है कुछ लोगों, संस्थाओं, विचारों पर कीचड़ उछालना और इसके लिए घटिया से घटिया झूठे आरोपों,फर्जी मनगढ़न्त किस्सों और अनर्गल व्यक्तिगत आक्षेपों का धुआँ छोड़ने और अपनी कुण्ठाओं का विषवमन करने में वे सारी सीमाओं को पार कर गये हैं।

सत्यम वर्मा : कुछ तो बोलो, मुंह तो खोलो
दरअसल,पिछले दो दशकों के दौरान आन्दोलन से भागे या संगठनों से निकाले गये लोगों की यह प्रतिशोधी जमात पिछले चार साल से कुत्सा-प्रचार की इस मुहिम में लगी हुई है। देशभर में तमाम व्यक्तियों-संगठनों को पत्रों के पुलिन्दे भेजने से लेकर पुस्तिका छपाकर बाँटने और छद्म नामों से सरकारी तंत्र के पास शिकायतनामे भेजकर जनसंगठनों के दफ्तरों पर छापे-तलाशी करवाने जैसी गलीज़ हरकतों के बाद अब बौखलाहट में इन्होंने अपना सारा बदबूदार कचरा ब्लॉग पर सार्वजनिक कर दिया है। हम लोगों ने कभी इस गन्दे अभियान का जवाब देने की कोशिश नहीं की क्योंकि एक तो हम ऐसी नीचता का जवाब देना किसी भी क्रान्तिकारी सामाजिक कार्यकर्ता की शान के खिलाफ समझते हैं, दूसरे,हमें बुद्धिजीवियों के विवेक पर भरोसा था। ब्लॉग पर इस मुहिम के शुरू होने पर भी हम इस पर ध्यान दिये बिना दूसरी अरविंद स्मृति संगोष्ठी के आयोजन में लगे रहे क्योंकि हमें लगा कि बुद्धिजीवी समुदाय में से कोई तो इसका प्रतिवाद करेगा। मगर अन्ततः हमें जवाब देने का फैसला करना पड़ा क्योंकि ये लोग केवल कुछ व्यक्तियों या संगठनों को ही नहीं बल्कि कम्युनिस्ट आदर्शों को, क्रान्तिकारी विचारों और तौर-तरीकों को, सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य के लिए समर्पण और कुर्बानी के जज़्बे को ही बदनाम करने में लगे हैं।

इसकी शुरुआत गोरखपुर से बिगुल मज़दूर दस्ता, दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के युवा कार्यकर्ताओं की टीम द्वारा भेजे पत्र से की जा रही है।

का. अरविंद की स्‍मृति को लांछित-कलंकित करने वालों की असलियत पहचानिए...

जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में जिस वक्‍त हम लोग अपने प्‍यारे कामरेड अरविंद की याद में दूसरी अरविंद स्‍मृति संगोष्‍ठी के आयोजन की तैयारियों में व्‍यस्‍त थे तभी हमें पता चला कि कई साल से संगठन को गरियाते घूम रहे लोगों ने अब अपना गाली पुराण ब्‍लॉग पर फैला दिया है। स्‍पष्‍ट था कि ऐन संगोष्‍ठी के पहले शुरू की गई इस कार्रवाई का मकसद इस आयोजन में विघ्‍न डालना है। बाद में हमें पता चला कि इन लोगों ने तो बाकायदा संगोष्‍ठी के बहिष्‍कार का नारा दे रखा था। बहरहाल,इनके मुंह पर तमाचा जड़ते हुए संगोष्‍ठी शानदार तरीके से संपन्‍न हुई। तीन दिनों के पांच सत्रों में 'इक्कीसवीं सदी में भारत का मजदूर आन्दोलनः निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएँ,समस्याएँ और चुनौतियाँ'विषय पर चार विस्‍तृत आलेख पढ़े गए जिन पर गंभीर और विचारोत्तेजक बातचीत हुई। प्रथम सत्र में अरविंद स्‍मृति न्‍यास और अरविंद मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान की स्‍थापना और इनके जरिए किए जाने वाले कामों पर विचार किया गया। बाहर से आए और स्‍थानीय लोगों को मिलाकर कुल करीब 500 लोगों ने आयोजन में शिरकत की जिनमें अच्‍छी-खासी संख्‍या गोरखपुर में विभिन्‍न उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों की थी। पिछले एक साल के दौरान चले मजदूर आंदोलन के क्रम में राजनीतिक रूप से शिक्षित-दीक्षित इन अगुआ मजदूरों ने न सिर्फ संगोष्‍ठी में बहुत दिलचस्‍पी से हिस्‍सा लिया बल्कि कुछ ने बहस में भी हस्‍तक्षेप किया।

जो लोग न जानते हों उन्‍हें हम बताना चाहते हैं कि दशकों बाद गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हुई मजदूर आंदोलन की इस नई शुरुआत की नींव कामरेड अरविंद ने ही रखी थी और उन्‍हीं के नेतृत्‍व में काम करते हुए हम युवा कार्यकर्ताओं ने विचारधारा,संगठन और आंदोलन की बुनियादी शिक्षा-दीक्षा पायी थी। हम उन्‍हीं के शुरू किए हुए काम को आगे बढ़ा रहे हैं और हम खुद को का.अरविंद का मानसपुत्र मानते हैं। ऐसे साथी के जीवन और व्‍यक्तित्‍व पर कीचड़ उछालने और कलंकित करने की कोशिश ने हमें गहरे क्षोभ और ऐसा करने वालों के प्रति घृणा से भर दिया है। ये वे लोग हैं जो जीते जी का.अरविंद के पीठ पीछे कुत्‍साप्रचार करते रहे और फिर उनकी मृत्‍यु को भी अपनी गंदी मुहिम के लिए इस्‍तेमाल करने से बाज नहीं आ रहे हैं। का.अरविंद के हमदर्द बनने का पाखंड कर रहे इन लोगों को तो ये भी मालूम नहीं कि उनका निधन कैसे हुआ,ब्‍लॉग में लिख मारा कि उनकी मृत्‍यु अल्‍सर से हुई। ये ऐसे लोग हैं जिन्‍होंने उसी रात से अपना घिनौना प्रचार शुरू कर दिया था जिस रात उनका निधन हुआ। हम लोग जो आखिरी सांस तक उनके साथ रहे, गोरखपुर में का. अरविंद के राजनीतिक और सामाजिक मित्र और संगठन के साथी अच्‍छी तरह जानते हैं कि लंबे समय से स्‍वास्‍थ्‍य की परेशानियों के बावजूद वे लगातार कामों में लगे हुए थे और एक बार लगकर पूरा इलाज कराने के लिए साथियों के दबाव को ''कुछ ज़रूरी काम पूरे करने तक'' टालते रहते थे। फिर भी किसी को ये उम्‍मीद नहीं थी कि अचानक ऐसा कुछ अप्रत्‍याशित घट जाएगा। 24 जुलाई की उस काली रात से करीब एक महीने पहले भूमि अधिग्रहण के विरोध में कुशीनगर में हुए सम्‍मेलन में जाने के लिए हमारी टोली की करीब 55किलोमीटर की साइकिल यात्रा का उन्‍होंने नेतृत्‍व किया था। गोरखपुर में सफाई कर्मचारियों के जुझारू आंदोलन में वे अगुआ भूमिका निभा रहे थे और जब एक उद्दंड प्रशासनिक अधिकारी ने वार्ता के दौरान कह दिया कि आप लोग मजदूरों को भड़काकर अनशन करवा रहे हो, आप खुद क्‍यों नहीं अनशन पर बैठ जाते, तो का. अरविंद हम लोगों के विरोध के बावजूद तत्‍काल भूख हड़ताल पर बैठ गए। निश्चित तौर पर इसने भी उनके शरीर को और कमजोर किया लेकिन उस वक्‍त तो आंदोलन को एक नई ताकत मिल गई थी। इन कुत्‍साप्रचारकों की नीयत तो हमारे सामने शुरू से साफ रही है लेकिन हम यह नहीं समझ पाते कि पिछले दो साल के दौरान इनकी बातें सुनकर जो बुद्धिजीवी यहां-वहां जुमलेबाजियां करते रहे हैं उनमें से किसी ने भी कभी भी हमसे संपर्क करने और सच जानने की कोशिश क्‍यों नहीं की।

बजा बिगुल तू अब तो जाग
आज का.अरविंद के शुभचिंतक बन रहे इनमें से अधिकांश लोग वे हैं जिन्‍हें खुद का. अरविंद ने चारित्रिक पतन से लेकर संगठन के लक्ष्‍यों के खिलाफ आचरण करने जैसी हरकतों के कारण निष्‍कासित किया था या निलंबित किया था जिसके बाद वे लौटकर ही नहीं आए। इस तथ्‍य से सामना होते ही ये फट से कह देते हैं कि अरविंद तो संगठन के नेतृत्‍व के कहने पर लोगों को निकाल देते थे। मानो का. अरविंद एक दब्‍बू, विवेकहीन, रीढ़विहीन व्‍यक्ति थे जो नेतृत्‍व के कहने पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे। का. अरविंद के जीते-जी भी ये छिछोरे उनके खिलाफ घटिया आरोप लगाते रहे और उनके जाने के बाद भी उन्‍हें लांछित करने में लगे हुए हैं। अपने को दिशा छात्र संगठन का पूर्व संयोजक बताने वाला अरुण कुमार यादव दरअसल गोरखपुर में दिशा की विश्‍वविद्यालय इकाई का कुछ समय के लिए संयोजक बनाया गया था और उसमें भी महीनों तक तो वह छुट्टी पर था और राजनीतिक जीवन की कठिनाइयों से थका-हारा जिंदगी की गोटी सेट करने की तिकड़मों में लगा था। इस शख्स में अगर जरा भी नैतिक साहस है तो वह बताए कि उसे का.अरविंद ने किस नैतिक घटियाई के कारण संगठन से बाहर किया था।

और 'जनज्‍वार' चलाने वाले अजय प्रकाश को यह बताना चाहिए कि उसे, घनश्‍याम और प्रदीप को नोएडा की टीम से अरविंद ने किस कारण से 3महीने के लिए सस्‍पेंड किया था जिसके बाद ये तीनों अपने को बदलने के बजाय चुपचाप किनारे हो गए।

एक शख्‍स है सतेंद्र कुमार जिसने ब्‍लॉग पर अपना परिचय परिकल्‍पना प्रकाशन और जनचेतना वैन के ''मालिक'' के रूप में दे रखा है। इसी के दिए परिचय से हमें पता चला कि यह सूदखोर का बेटा है। पूछने पर मालूम हुआ कि किसी ऐसे-वैसे सूदखोर का नहीं, ये तो नक्‍सलबाड़ी के इलाके के गरीब किसानों का कई पीढ़ी तक खून चूसने वाले सूदखोर खानदान से आता है। कई साल संगठन में रहने के बाद भी इसकी मानसिकता यही है कि ये लिखता है ''जनचेतना के मजदूर, बेगार करें भरपूर''। बेशक, हम जनचेतना के मजदूर हैं, क्रांतिकारी आंदोलन के मजदूर हैं, हम अपने को मजदूरों के प्रतिनिधि मानते हैं और इस देश के आम मजदूरों की ही तरह अपने लक्ष्‍य के लिए 12-14 घंटे काम करते हैं। और हमें इस पर गर्व है। लेकिन मालिक की मानसिकता से ग्रस्‍त इस व्‍यक्ति को क्रांतिकारी विचारों का प्रचार-प्रसार ''बेगारी'' लगता है और मजदूर शब्‍द को ये गाली की तरह इस्‍तेमाल करता है।

हिंदी कवि   कात्यायिनी  : जवाब प्रवक्ता ही देगा
हमें इस बात पर नाज है कि हम अपने तमाम कामों के लिए किसी तरह की संस्‍थागत,सशर्त मदद लिए बिना केवल और केवल जनता से जुटाए गए संसाधनों पर भरोसा करते हैं,और इसके लिए नियमित रूप से लोगों के बीच सहयोग जुटाने जाते हैं। इसे ये लोग ''भीख मांगना'' कहते हैं तो सिर्फ हमें नहीं इस देश के उन तमाम जनसंगठनों को गाली देते हैं जो एनजीओ या सरकारी अनुदानों के बजाय अपने कामों के लिए जनता से संसाधन इकट्ठा करते हैं।

गोरखपुर में मई दिवस 2010 को मजदूरों की रैली

इनकी बदनीयती और बेईमानी तो इसी बात से जाहिर हो जाती है कि ये अपने मनगढ़त आरोपों का पहाड़ खड़ा करने के लिए सिर्फ साहित्‍य के प्रकाशन और उसे लोगों के बीच ले जाने की बात करते हैं जो हमारे कामों का बेहद अहम मगर केवल एक हिस्‍सा है। ये कभी भी इस बात की चर्चा नहीं करते कि गोरखपुर जैसे सांप्रदायिक ताकतों के गढ़ में धमकियों-हमलों-साजिशों का मुकाबला करते हुए किस तरह हम लोग लगातार उन्‍हें चुनौती देते रहे हैं। ये भयंकर शोषण और बर्बर उत्‍पीड़न में जी रहे गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों को संगठित करने के हमारे कामों की कभी चर्चा नहीं करते। ये गोरखपुर के जुझारू मजदूर आंदोलन की,योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व में गोरखपुर के उद्योगपतियों द्वारा हमें ''आतंकवादी'' साबित करने की मुहिम, उनके खिलाफ महीनों चले आंदोलन, हमारे साथियों की गिरफ्तारी और फर्जी एनकांउटर में मारने की साजिश, और पहली बार गोरखपुर में योगी, उद्योगपतियों और प्रशासन के गंठजोड़ को मिली शिकस्‍त की कोई चर्चा नहीं करते। ये दिल्‍ली के करावल नगर में 25,000 असंगठित बादाम मजदूरों के बीच वर्षों से जारी हमारे काम की और बादाम मजदूरों की 16दिन चली जबर्दस्‍त हड़ताल का कभी जिक्र नहीं करते। ये दिल्‍ली मेट्रो में ठेके पर काम करने वाले हजारों सफाई कर्मचारियों, कामगारों और मेट्रो फीडर बस सेवा के कर्मचारियों को संगठित करने के हमारे प्रयासों और आंदोलनों की कभी बात नहीं करते, लुधियाना में मजदूरों के बीच हमारे कामों और संघर्षों की कभी चर्चा नहीं करते। करें भी कैसे। ऐसा करते ही झूठों की बुनियाद पर खड़ा उनका सारा प्रचार अभियान भरभराकर ध्‍वस्‍त नहीं हो जाएगा। हम तो ये जानते हैं और मार्क्‍सवाद यही सिखाता है कि अगर किसी की जीवनशैली गलत है तो उसकी राजनीति और विचार को भ्रष्‍ट होते देर नहीं लगती। सिर्फ कार्यकर्ताओं से पैसे इकट्ठा करवाने और उसपर ऐश करने वाला नेतृत्‍व एक कायर और काहिल संगठन ही खड़ा कर सकता है,साहस के साथ जनता को संगठित और आंदोलित करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं के जुझारू दस्‍ते नहीं। दरअसल, खुद इन भगोड़ों की सोच इनकी जीवनशैली से निकली है। ये सब के सब आज कहीं भी जमीनी कामों में नहीं लगे हैं, कई तो एनजीओ की चाकरी कर रहे हैं, कुछ ''बुद्धिजीवी'' बनने की लालसा में छुटभैये पत्रकार बने फिर रहे हैं, तो कुछ को कोई काम करने की जरूरत ही नहीं है, उड़ाने के लिए बहुत कुछ पड़ा हुआ है जिसके दम पर घूम-घूम कर वे अपना कचड़ा फैलाने और कम्‍युनिज्‍म को बदनाम करने में जुटे हैं।
गांव में कहा जाता है कि जब सांप का अंडा खराब हो जाता है तो उसमें से लरछुत नाम का घिनौना, चिपकू कीड़ा पैदा होता है। ऐसे तत्‍व दरअसल कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन के लरछुत ही हैं।

-- प्रशांत, प्रमोद, अवधेश, अपूर्व, राजू, बबलू, बीरेश, समर

बिगुल मजदूर दस्‍ता, दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा, गोरखपुर के कार्यकर्ता

प्रस्तुतकर्ता बेबाक-बेलौस पर जय सिंह. ६:०३ पूर्वाह्न इसे ईमेल करें इसे ब्लॉग करें! Twitter पर साझा करें Facebook पर साझा करें Google Buzz पर शेयर करें 2 टिप्पणियाँ:

JAI SINGH ने कहा…  

जनज्‍वार पर टिप्‍पणी करने वालों का स्‍टैंडर्ड क्‍या है यह उन्‍हीं के शब्‍दों में देखिए।

एक कोई डा.विवेक कुमार है जिसकी आत्‍मा की तरह लेखनी ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। का. अरविंद के बारे में वह लिखता है कि वे 'कठिन हालात, अकेलापन, जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्कार से त्रस्त'थे। अब इस छिछोरे को कौन बताए कि कोई सच्‍चा कम्‍युनिस्‍ट कभी भी कठिन हालात,अकेलापन, जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्‍कार से त्रस्‍त नहीं होता। जो इन चीजों से त्रस्‍त होते हैं उन्‍हें कम्‍युनिस्‍ट नहीं मउगा कहा जाता है जैसा कि डा.विवेक कुमार पर एकदम फिट बैठता है।

August 16, 2010 12:07 PM

GP ने कहा…
I agree with the content of the text. It is important that all attempts to slander is timely and suitably replied.




Aug 17, 2010

कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब, विरोधियों को कहा 'हिज़डा'


पाठक जानते हैं कि पिछले दिनों हिंदी की कवयित्री कात्यायिनी अपने पति शाशिप्रकाश और बेटे अभिनव सिन्हा के संग मिलकर जिस रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत )नाम की क्रांतिकारी पार्टी चलातीहैं,उसपरइस  पार्टी सेजुड़े  रहे कार्यकर्ताओं  ने सवाल  उठाये  थे.उनके सवाल इसी वेब  की पिछली पोस्टों पर जाकर पढ़े जा सकते हैं.

 कार्यकर्ताओं ने साफ कहा था कि यह पार्टी एक पारिवारिक कुनबा है,जिसकाबुनियादी काम हर कीमत पर चंदा इकठ्ठा करना और किताबें छापना है.कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि क्रांति और सामाजिक बदलाव के नाम पर कैसे यह संस्थाएं,निजी संपत्ति और पारिवारिक कुनबा खड़े कर रहे हैं.बातें बहुत तीखे अंदाज़ में कहीं गयीं थीं क्योंकि इनमें से ज्यादातर ने अपनी जवानी के महत्वपूर्ण साल शशिप्रकाश के चंगुल में बर्बाद किये थे.जाहिरा तौर पर एक के बाद एक लेखों के छपने से क्रांति की दुकान में खलबली मचनी ही थी,सो मची.इसके बाद हमें और शशिप्रकाश के कुनबे को  जानने वालों ने इनसे और हमसे पूछा कि यह कैसी गंध है.हमने जानने वालों से कहा" आपको इतने पर मिचली आती है,और हम हैं कि आदर्शवाद के नाम पर यह सच छुपाये हुए थे."कुछ ने मुखामुखी यह भी कहा कि इससे वामपंथ का नुकसान होगा, पर वह सामने नहीं आये.हालाँकि जिन्होंने शुरू में यह आशंका जाहिर कि थी कि इससे वामपंथ का नुकसान होगा,वह लेखों को देख हमारे साथ आये, कई वामपंथी संगठनों ने शुक्रिया कहा कि चलो दुकान की गन्दगी सामने तो आयी.

अपने पहले जवाबी लेख में कात्यायिनी के कुनबे के मुखिया शशिप्रकाश ने पहले जवाब में कवि नीलाभ को जिस तरह निशाना बनाया है,उसका मकसद सिर्फ साहित्यकारों को धमकाना है कि सामने आये तो 'प्रगतिशील' बना देंगे.

अब रहा हमारा सवाल तो उन्होंने हिजड़ा और बीबियों से डरने वाला कहा है.हमें उम्मीद है कि अगले जवाबों तक वह दो कदम आगे बढकर नैतिक चारित्रिक तौर पर पतित कहें क्योंकि इसके आलावा इनके पास कोई जवाब नहीं है.हम इन आरोपों से नहीं डिगने वाले हैं क्योंकि साहस  हमें समाज से मिल रहा है,जहाँ से हमारे काम और चरित्र दोनों पर कोई सवाल नहीं है. बहरहाल यह शशिप्रकाश की चौधराहट की  खीझ  से निकले  आरोप हैं. हमें याद है कि जब संगठन में हमलोग किसी कि संगठन छोड़ने पर पूछते  तो आरोप नैतिक ही लगाया जाता.जैसे फलां लाइन मारता  था, उसके पीछे पड़ा था, लड़कियों की सेवाटहल  ज्यादा करता था, लड़कीबाज था, किसी एक लड़की पर ठहरा ही नहीं और जब यह कहना नहीं बनता था तो शशिप्रकाश हंस कर कहतेकि 'उसकी ना पूछिए उसके  चारित्रिक पतन को यहाँ सह पाना अशंभव था...आदि.'

हमारी राय तो शशिप्रकाश को यह है कि वह आरोप नाम लेकर लगायें जिससे उनकी कलम को और ताकत मिलेगी.साथ ही उन्हें लड्किबाजों, गांडबाजों,पेटीकोट के भीतर घुसे रहने वालों कि गिनती में आसानी होगी और इसके लिए किसी को रातभर उनके साथ रूकना नहीं होगा.

पाठक माफ़ करेंगे.शशिप्रकाश ज्यादातर बार इसी तरह की पदवियों से नवाजते रहते हैं....प्रमाण की जरूरत होगी तो उसे भी हम प्रकाशित करेंगे.जनज्वार की कोशिश रहेगी कि यह बहस व्यापक परिप्रेक्ष्य में हो.

हालाँकि हमें कम उम्मीद है कि शशिप्रकाश,उनकी पत्नी कात्यायिनी,बेटा अभिनव,अभिनव के मौसा सत्यम वर्मा, मौसी रूबी, दूसरी मौसी मीनाक्षी (अरविन्द सिंह की पत्नी), तीसरी मौसी कविता और एक मौसी जिनका नाम याद  नहीं आ रहा है,यह लोग जवाब में यौन सुचिता के आरोप से आगे जायेंगे सम्भावना काम है.दरअसल रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग का (भारत ) में पार्टी विरोधियों से निपटने की  यही परंपरा है.


कात्यायिनी की ओर से जवाब

 जनज्‍वार पर पिछले दिनों एक कुत्सित बहस चलाई गई थी,उसमें 'प्रगतिशील' कवि नीलाभ ने भी अपने विचार प्रकट किए थे। उनकी बातों से मेरे मन में कुछ सवाल उठे,इसलिए  जनज्‍वार के संचालक को यह पोस्‍ट भेजी जा रही है ताकि वे अन्‍य प्रायोजित पोस्‍ट्स के साथ इस अप्रायोजित पोस्‍ट को भी स्‍थान दें।



कवयित्री कात्यायिनी
प्रिय नीलाभ जी,


जनज्‍वार के माध्‍यम से पता चला कि आप राजनीतिक दलों के न्‍यास आदि बनाने को सही नहीं मानते। आपने अपनी टिप्‍पणी में अपने इस विचार के पीछे कोई तर्क नहीं पेश किया है। यह जानने की बहुत इच्‍छा हो रही है कि राजनीतिक दलों को न्‍यास आदि क्‍यों नहीं बनाना चाहिए। क्‍या न्‍यास में ऐसे कीटाणु बसते हैं जो राजनीतिक दलों को भ्रष्‍ट कर देते हैं। क्‍या इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि न्‍यास का उद्देश्‍य क्‍या है उसको कैसे संचालित किया जाता है और उसमें कौन लोग काम करते हैं। बस न्‍यास बना नहीं कि आप किसी राजनीतिक दल को विपथगामी घोषित कर देंगे। आपकी बात इतनी मजेदार है कि मेरी यह जानने की उत्‍सुकता बढ़ती ही जा रही है कि आप और किन-किन कामों को राजनीतिक दलों के करने योग्‍य नहीं समझते।

जहां तक मेरा राजनीतिक ज्ञान है मैं समझता हूं कि एक समूह उन सभी (या अधिकतर) कामों को ज़्यादा बेहतर ढंग से संचालित कर सकता है जिन्‍हें कोई व्‍यक्ति अकेला करता है। इन कामों में राजनीतिक काम भी आ सकते हैं और कला-संस्‍कृति के क्षेत्र के काम भी आ सकते हैं और अकादमिक काम भी।आज दिल्‍ली के अधिकतर प्रगतिशील कवि, लेखक, संस्‍कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी मध्‍य वर्ग या उच्‍च मध्‍यवर्ग की जीवनशैली जी रहे हैं। आज कितने लेखक, कवि,बुद्धिजीवी हैं जो बाल्‍जाक की तरह काली काफी पीकर पेरिस के अभिजात समाज को अपनी कलम से नंगा कर देने की चुनौती देने का माद्दा रखते हैं।

आज के प्रगतिशील लेखकों में से किसको आप भारत का टामस पेन और लू शुन कहेंगे। मां उपन्‍यास लिखने के बाद गोर्की ने जब लेनिन से मुलाकात की तो लेनिन ने कहा कि यह मजदूरों के लिए एक जरूरी किताब है और इसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाओ। क्‍या आपको लगता है कि अगर 'मां' जैसी कोई किताब आज लिखी जाती है तो आज के बुर्जुआ प्रकाशक उसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाएंगे। निश्‍चय ही नहीं करवाएंगे। बुर्जुआ प्रकाशक तो क्‍या खुद को प्रगतिशील कहने वाले कवि, लेखक और बुद्धिजीवी भी यह काम नहीं करेंगे। सही बात तो यह है कि प्रतिष्‍ठा, पुरस्‍कार, रॉयल्‍टी अगर मिलती रहे तो हमारे लेखकों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनकी किताबें वास्‍तव में पढ़ी भी जा रही हैं या नहीं। आज कितने ऐसे लेखक हैं जो 20 रुपये से कम पर जीने वाले भारत के 77 प्रतिशत लोगों की जिंदगी से करीबी से जुड़े हों या करीबी जुड़ाव महसूस करते हों। आज प्रगतिशील लेखकों/बुद्धिजीवियों और सर्वहारा जनता के बीच की खाई गणेशशंकर विद्यार्थी और प्रेमचंद के जमाने से कई गुना चौड़ी हो गई है।

 यह कहने में कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि आज के हमारे प्रगतिशील लेखक,कवि और बुद्धिजीवी भारत की गरीब जनता के साथ ऐतिहासिक विश्‍वासघात कर चुके हैं। वास्‍तव में समाजवाद से उनका कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है,उनका समाजवाद तो कब का आ चुका है।और इसीलिए जो काम प्रगतिशील लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्‍कृतिकर्मियों को करना चाहिए था, यानी कि समाज में गंभीर राजनीतिक और गैर राजनीतिक साहित्‍य का एक सचेत पाठकवर्ग तैयार करने और ऐसे साहित्‍य के फलने-फूलने का माहौल तैयार करने का काम,उसे मजबूरी में क्रान्तिकारी दल (दलों) को करना पड़ रहा है। आप शायद समझ नहीं पा रहे हैं कि यह राजनीतिक दलों की इच्‍छा नहीं बल्कि उनकी मजबूरी है। हालांकि अगर वे अपनी चाहत से भी ऐसा करते हैं तो इसमें गलत क्‍या है यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। शायद आप समझने में मेरी मदद करेंगे।आपने सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन घुमा फिराकर कुछ प्रकाशनों पर आरोप लगाया है कि उन्‍होंने साधन को साध्‍य बना लिया है। तो उपरोक्‍त बातों के मद्देनजर सबसे पहले तो यह आरोप प्रगतिशील लेखकों पर लगाया जाना चाहिए जिनमें आप स्‍वयं भी शामिल हैं। अपनी किताबें छपवाने में बहुतेरे लोग आगे रहते हैं लेकिन लू शुन की तरह किसी ने यह क्‍यों नहीं सोचा कि अपने देश के लोगों का परिचय विश्‍व की तमाम मूल्‍यवान साहित्यिक धरोहरों से कराया जाए। आज मार्क्‍सवाद की कितनी किताबें हैं जो सही और सटीक अनुवाद के साथ हिन्‍दी में उपलब्‍ध हैं। और यदि नहीं है तो यह काम कौन करेगा। क्‍या यह काम राजकमल और वाणी जैसे बुर्जुआ प्रकाशनों के भरोसे छोड़ दिया जाए या भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के भरोसे या नीलाभ प्रकाशन के भरोसे। मार्क्‍सवाद की जिन किताबों के हिंदी अनुवाद हैं भी उन्‍हें संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता है। और रामविलास शर्मा जी ने यूं तो किताबें लिखकर रैक भर दिये हैं लेकिन उनके माध्‍यम से मार्क्‍सवाद समझने वालों का खुदा ही मालिक हो सकता है।


ऐसे में अगर कोई राजनीतिक संगठन प्रकाशन तंत्र और न्‍यास संगठित करके हिंदी भाषी लोगों को अपनी भाषा में विश्‍वस्‍तरीय साहित्‍य और मार्क्‍सवाद की पुस्‍तकें उपलब्‍ध कराने के इन बेहद ज़रूरी कामों को करता है तो इसके लिए उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए या गालियां?हालांकि आज भी बहुत बड़ी संख्‍या ऐसे लोगों की है जिनके लिए दुनिया माओ के बाद से आगे ही नहीं बढ़ी है और निश्चित ही उन्‍हें किताबों की और बहस-मुबाहिसे की उतनी जरूरत भी नहीं है। वैसे मजेदार बात तो यह भी है कि हथियार खरीदने के लिए चंदा मांगने को बुद्धिजीवी लोग जायज समझते हैं लेकिन पुस्‍तकें छापने के लिए चंदा मांगने को वे गलत समझते हैं और कोई तर्क पेश किए बिना साधन और साध्‍य जैसे बौधिक जुमलों के द्वारा अपना काम चला लेते हैं। वैसे 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी और नव जनवादी क्रांति (एनडीआर) की लाइन ने भी तमाम बौद्धिकों की पौ बारह कर दी है। आज कोई भी व्‍यक्ति ब्‍लॉग पर गरमागरम बातें लिखकर और पैसिव रैडिकलिज्‍म की लीद फैलाकर क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी होने का तमगा हासिल कर सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे कम्‍युनिज्‍म की समझदारी है भी या नहीं या कम्‍युनिज्‍म के प्रति उसका समर्पण है भी या नहीं। मध्‍यवर्गीय रूमानी फिलिस्‍टाइन को इससे कोई मतलब भी नहीं है। वह स्‍वयं को एक नायक की तरह देखना पसंद करता है और निजी जीवन में क्रान्ति से भले ही उसका कभी साबका न पड़ा हो और सामाजिक कामों के लिए चंदा देते समय भी बीवी से डरता हो लेकिन बौद्धिक जगत में हल्‍ला मचाने का साधन उसकी पहुंच में आ गया है और वह शहीदाना अंदाज में पोस्‍ट पर पोस्‍ट लिखे जाता है। हो सकता है कि उसने वह चौराहा भी देख रहा हो जहां ''मुक्‍त क्षेत्र'' बनने के बाद उसकी मूर्ति लगाई जाएगी। स्‍तालिन ने यों ही नहीं कहा था कि एशियाई देशों की क्रान्तियां झूठ-फरेब,मक्‍कारी,चुगली और षडयंत्रों से भरी होंगी।

जनज्‍वार पर आकर आपने और आपके सहयोगियों ने न सिर्फ स्‍तालिन की बात को पुष्‍ट कर दिया बल्कि अपने ही कृत्‍यों से न्‍यास और प्रकाशन संगठित करने की जरूरत को बल प्रदान कर दिया है। आपने भी बस यही साबित किया है कि आज के पके पकाये बुद्धिजीवियों से रैडिकल चिंतन और व्‍यवहार की उम्‍मीद करना वैसा ही है जैसे जरसी गाय से युद्धाश्‍व के कारनामों की उम्‍मीद पालना। इसीलिए नये साहसी, रैडिकल, युवा, कर्मठ बौद्धिक तत्‍वों की तैयारी का काम और भी ज़रूरी है। जनज्‍वार के अपने जिन साथियों की बातों का आपने समर्थन किया है (हालांकि यह समर्थन आपने नसीहतों की आड़ में किया है) उनके साथ मैं पिछले 10-12 सालों से जमीनी स्‍तर पर काम कर चुका हूं। अपने राजनीतिक और निजी जीवन में इन लोगों की पतनशीलता का मुझे प्रत्‍यक्ष अनुभव है और ये सारे के सारे जमीनी कार्यों में एकदम फिसड्डी साबित हो चुके हैं। जो इस बात से भी साबित होता है कि संगठन से निकाले जाने के बाद इनमें से किसी भी शख्‍स की जमीनी कार्रवाइयों में किसी प्रकार की कोई भागीदारी नहीं रही है। अपनी हर असफलता को दूसरों के मत्‍थे मढ़ने की इनकी आदत और नीयत जनज्‍वार पर लिखे इनके ही पोस्‍टों से जाहिर हो जाती है। आज आपको इन हिजड़ों की संगत पसंद आ रही है तो आपको सोचना चाहिए कि आप कहां पहुंच गये हैं। जनज्‍वार ने अपनी नंगई के द्वारा साबित कर दिया है कि भारत के कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन की पश्‍चगति अभी अपने मुकाम तक नहीं पहुंची है और इसमें तमाम तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और (आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए)विरोधी लाइन वाले कतिपय संगठनों के कुछ लोग अपनी तरफ से पूरा सहयोग दे रहे हैं। चलिये देखते हैं कि यह पश्‍चगति कहां जाकर थमती है।

आपने साधन के साध्‍य बन जाने की बात अपनी पोस्‍ट में उठाई है। मेरे ख्‍याल से साधन के साध्‍य बना जाने की बात तब लागू होती है अगर किसी के सिद्धांत और व्‍यवहार में अंतर हो। जहां तक परिकल्‍पना और राहुल फाउण्‍डेशन की बात है,तो अगर आप कविताएं लिखने से फुरसत लेकर इनके प्रकाशनों को पढ़ेंगे तो आपको स्‍पष्‍ट पता चल जाएगा कि ये किन अर्थों में नये सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन की बात करते हैं और इनका व्‍यवहार इनके सिद्धांत की पूर्णत: संगति में है। यदि इन्‍होंने अपने वास्‍तविक विचारों को स्‍पष्‍ट रूप से जाहिर किए बिना लोगों से सहयोग लिया हो और केवल यही करते रहे हों तो आप यह कह सकते हैं कि साधन ही हमारा साध्‍य बन गया है। अगर साधन ही हमारा साध्‍य है तो करावलनगर, गोरखपुर और लुधियाना के मजदूरों के आन्‍दोलनों में हमारी भूमिका के बारे में आपके क्‍या विचार हैं।

कवि महोदय आप शायद जानते होंगे कि न्‍यास बनाना और किताबें छापना ऐसे काम हैं जो शुरू से ही नजर आते हैं। वहीं लोगों को संगठित करना एक ऐसा काम है जिसका आउटपुट तत्‍काल नजर नहीं आता। वर्तमान परिस्थितियों का हमारा मूल्‍यांकन और इसलिए हमारे काम का तरीका भी थोड़ा अलग है जो महानगरों के बुद्धिजीवियों को समझ में नहीं आता है। चूंकि हम समय-समय पर ''ऐक्‍शन'' नहीं करते रहते और थोड़ा काम करके बहुत गाते नहीं, इसलिए जमीन से कटे बुद्धिजीवियों को लगता है कि हम बस किताबें ही छाप रहे हैं। वैसे क्‍या ये सरासर बेईमानी और बदनीयती नहीं है कि जानबूझकर किसी संगठन के कामों के एक हिस्से को अपने झूठे आरोपों का निशाना बनाया जाए और उसके कामों के बड़े और मुख्‍य पहलू की चर्चा ही न की जाए! तो कविवर ऐसी स्थिति में अत्‍यावश्‍यक है कि आंखें फाड़कर घूरती सच्‍चाईयों को समझने और उनके अनुरूप अपने सिद्धान्‍त और व्‍यवहार में परिवर्तन करने के लिए कम्‍युनिस्‍टों को प्रेरित करने हेतु ज़रूरी कामों के लिए मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान और प्रकाशन जैसी संस्‍थाएं स्‍थापित की जाएं। आज जबकि ''भूतपूर्व'' और स्‍वनामधन्‍य कम्‍युनिस्‍टों की जमात बढ़ती जा रही है जिसने कम्‍युनिज्‍म के बुनियादी उसूलों, मर्यादाओं और गुणों का परित्‍याग कर दिया है तो ऐसी संस्‍थाएं बेहद ज़रूरी हैं जो कम्‍युनिज्‍म के आदर्शों को बचाए रखने और नई पीढ़ियों को इस विरासत से शिक्षित-दीक्षित करने का काम करें। बेशक जिन्‍हें लगता है कि परिस्थितियां बदली ही नहीं हैं और जो कुछ लिखना पढ़ना था सब लिखा पढ़ा और कहा जा चुका है और बस आंख मूंदकर लकीर पर लाठी पीटते रहना है उन्‍हें न्‍यास और प्रकाशन की जरूरत न तो है और न समझ में आयेगी।

नीलाभ जी आप भोलेपन की मिसाल कायम करते हुए लिखते हैं कि कात्‍यायनी,सत्‍यम और शशिप्रकाश के खिलाफ उनके ही कुछ पुराने साथियों ने आरोप लगाए हैं। इससे आप हतप्रभ भी हैं और उदास भी। जाहिर है आप हतप्रभ और उदास इसलिए हैं क्‍योंकि आप इन आरोपों को जायज और ईमानदारी की जमीन से उठाया गया समझते हैं। पर आप ऐसा क्यों समझते हैं। क्‍या आपने जानना चाहा कि इन लोगों के खिलाफ दूसरे पक्ष के क्‍या आरोप हैं। क्‍या आपने कभी जानना चाहा कि ये लोग जिन कार्यकर्ताओं के साथ काम करते थे उनके इनके बारे में क्‍या विचार हैं। आपने तो भोलेपन की इंतहा ही कर दी और आपने मान लिया कि जनज्‍वार के टिप्‍पणीकार ही सही हैं और दूसरा पक्ष गलत है। इस एकांगीपन की वजह क्‍या है नीलाभ जी। क्‍यों आपको लगता है कि संगठन/समूह ही हमेशा गलत होता है और आरोप लगाने वाला कार्यकर्ता हमेशा सही होता है। और क्‍या आपको लगता है कि इन सब बातों का फैसला करने का सबसे उपयुक्‍त मंच ब्‍लॉग ही है। क्‍या ब्‍लॉग जैसे सशक्‍त टूल ने नीलाभ को गैरजिम्‍मेदार बना दिया है या यह पुरानी खुन्‍नस निकालने का एक जरिया है। --

एक नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ता, दिल्‍ली