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Aug 20, 2010

वे अनन्य हैं, पुरुषोत्तम हैं और आलोचनाओं से परे हैं


'सहारा' अख़बार ने कात्यायनी के लिए जब मादा शब्द का इस्तेमाल किया था तब आपने इतना बड़ा आन्दोलन चला दिया कि जेल हुई,लाठियां चली,खून बहा लेकिन नोयडा में एक महिला साथी  का प्रयोग  आपने जिस तरह किया उससे क्या आपका परिवारवाद और स्त्री विरोधी चरित्र का पता नहीं चलता.

अरुण  यादव 

मेरे बेबाक -बेलौस साथियों,
आपने बड़ी सफाई से अपने को क्रन्तिकारी साबित करने का प्रयास किया है.साथ ही मेरे हिजड़े वाले साहस से मेरी नैतिक घटियाई के बारे में जानने की जुगुप्सा भी आप लोगों में काफी बलवती हो उठी है.ऐसे मसाले से राजनीति को कमान में रखने की शशिप्रकाश की पुरानी लाइन है,इसका सबसे बड़ा उदाहरण सम्मेलन था.जिसमें शशि प्रकाश ने अपनी एक महिला साथी से अपने ही राजनीतिक गुरु की नैतिकता पर आरोप लगवा दिया था.

ये चरित्र-चित्रण आपको मुबारक और इसके बिना यदि गैस बाहर न निकल पा रही हो तो राजेन्द्र यादव की तरह अपनी पत्रिकाओं में नैतिक पतन पर एक कालम चला दें.उसमें हम अपना जवाब जरुर भेज देंगे.संगठन से बाहर होने वाले सभी पर चूँकि आपका ये आरोप है तो 'हिजड़ों'और 'मऊगों'के नैतिक पतन पर आपको काफी सामग्री मिल जाएगी.शशिप्रकाश कात्यायनी के साथ आप लोग अपने नैतिक पतन पर लिखेंगे तो मर्दानों और गैर मऊगों के नैतिक पतन के बारे में भी लोग समझ पाएंगे.

आइये! थोड़ी उस इतिहास की भी चर्चा कर ली जाय, जिसे आपने छोड़ दिया है :-

गोरखपुर,करावल नगर और लुधियाना के आन्दोलन के व्यापक प्रचार-प्रसार में अपने ही बीस सालों के आन्दोलन की नाकामी को आप लोग जिस सफाई से छुपा ले गये हैं उस भोली अदा पे मर जाने को जी चाहता है.थोड़ी बानगी देखते हैं -बिगुल जून 2005 में इस्टर खटीमा आन्दोलन पर आपने लिखा है -इस आन्दोलन में दोनों सहयोगी संगठनों की अलग अलग लाइनों की टकराहट खुल कर सामने आई.

एक थी क्रन्तिकारी सर्वहारा लाइन जिसकी नुमाइंदगी  बिगुल मजदूर दस्ता कर रहा था और दूसरी थी आपके  अनुसार  निम्न बुर्जुआ (मध्यवर्गीय )क्रांतिकारिता की लाइन जिसकी नुमाइंदगी क्रन्तिकारी लोकाधिकार संगठन कर रहा था .कदम कदम पर दोनों लाइने टकरा रही थी .........समूचे आन्दोलन के दौरान क्रालोस ने जो अपनी लाइन चलाई ...अर्थवाद और अराजकतावादी संघधिपत्यवादी की लाइन है.

यह वही आन्दोलन है जिसमें मुकुल शशि प्रकाश के साथ थे और इस आन्दोलन की अगुआई कर रहे थे,लेकिन जब मुकुल इनके संगठन से बाहर निकल गये तब इसी आन्दोलन पर शशि प्रकाश के सदविचार सुन लीजिये जिसे उन्होंने बिगुल के अगस्त-सितम्बर 2008में लिखा था -''2005में जब खटीमा में इस्टर कारखाने के मजदूरों का आन्दोलन चल रहा था तो गतिरोध तोड़कर नई दिशा देने के लिए का.अरविन्द वहां गये ....मुकुल की लम्बे समय से जारी घिसी-पिटी अर्थवादी वादी ट्रेड यूनियनवादी लाइन के विरुद्ध संघर्ष को तीखा बनाकर निर्णायक मुकाम पर पहुंचा दिया.'' इस  आन्दोलन में  140 महिला पुरुष साथियों में एक महिला सहित चार साथी बिगुल के थे. जेल में आठ दिनों तक अनशन चला था लेकिन इस दौरान अगर क्रालोस के साथी जेल में चीजे नहीं पहुचाते तो बिगुल के साथी गमछा और साबुन भी नहीं पाते क्योकि शशि प्रकाश केवल धुल धुसरती आलोचना कर सकते थे मदद नहीं ..

'सहारा' अख़बार ने कात्यायनी के लिए जब मादा शब्द का इस्तेमाल किया था तब आपने इतना बड़ा आन्दोलन चला दिया कि जेल हुई,लाठियां चली,खून बहा लेकिन नोयडा में समीक्षा का प्रयोग अपने बचाव में आपने जिस तरह किया उससे क्या आपका परिवारवाद और स्त्री विरोधी चरित्र का पता नहीं चलता.का.अरविन्द की शादी के बाद लगभग पन्द्रह साल तक संगठन में प्रेम हत्यायों का शानदार इतिहास भी आपके नाम दर्ज है.हरियाणा के एक साथी की शादी हुई भी तो आपने उनका बच्चा नहीं आने दिया इस बीच अपना पोता आप जरुर खिलाने लगे. महाशय दोहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक आचरण के ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे आपकी नीयत और चरित्र दोनों को समझा जा सकता है.

अब आइये,थोडा और पीछे चलते हैं.इंडियन रेलवे टेक्नीकल एंड आर्टीजन इम्प्लाइज एशोसिएसन और 'बगावत रंग लाएगी' नाम और नारा आप भूले नहीं होंगे. इसी समय आपने लम्बी-चौड़ी घोषणाएं की थी और 7 दिसम्बर को लखनऊ में रेल मजदूर अधिकार मोर्चा का गठन भी कर दिया गया था.इसकी असफलता का ठीकरा भी संगठनकर्ताओं के सर पर डालकर शशि प्रकाश साफ बचकर निकल गये.जनता को आपका क्या जवाब है जरुर बताइयेगा.

अब नोएडा आन्दोलन की भी बात कर ली जाये जहाँ झुग्गी से फैक्ट्री घेरने की पूरी तैयारी के साथ प्रकाश उतरे थे.वहाँ के कामों के मुख्य जिम्मेदार का.अरविन्द सिंह थे,लेकिन याद कीजिये सम्मलेन जिसमें शशि प्रकाश ने अपने ही मुखार बिन्दुओं में कहा था कि अरविन्द ने नोएडा के काम को दलदल में फंसा दिया था.

अरविन्द सिंह: मारे गए
इसी सम्मलेन में सुखविंदर ने अरविन्द की आलोचना करते हुए कहा था कि अरविन्द सिंह पुनर्जागरण प्रबोधन पर चार लाइन से ज्यादा नहीं बोल सकते और उनके कार्यक्षेत्र में जाते हैं तो सोते रहते हैं.इस आलोचना के बाद उन्हें उत्तरांचल के आन्दोलन में भेज दिया गया.जिसके बारे में आप ऊपर जान चुके हैं और फिर सीधे उन्हें गोरखपुर भेज दिया गया.वे अपने कपडे तक दिल्ली से नहीं ले सके थे. गोरखपुर में भी वे काफी परेशानी से गुजर रहे थे.ये बात मै खुद जानता हूँ,क्योंकि मैं खुद उनके साथ वहाँ था और इस बात की पुष्टि बेबाक बेलौस के साथियों ने मेरे निकलने के बाद मुझसे और मुकुल से खुद की थी.

उसी समय शशि प्रकाश,कात्यायनी और मीनाक्षी को जिन जिन गालियों से इन लोगों ने नवाजा था वह भी जान लीजियेगा,आपके साथ ही हैं.इस हालातों को जानने के बाद जय सिंह के 'मऊगा'वाली परिभाषा पर पाठक खुद विचार कर लें.मुझे कुछ नहीं कहना.हाँ विवेक उसी समय गोरखपुर में अरविन्द से मिले थे और उसी आधार पर उन्होंने अरविन्द की परेशानियों को शेयर किया था.ये फिर भी पुनर्जागरण प्रबोधन वाली लाइन के प्रैक्टिस का सवाल था,लेकिन असली सवाल इससे आगे नोएडा के काम पर है.अरविन्द को वहाँ से हटाने के वाद वहाँ के कामों की जिम्मेदारी खुद शशि प्रकाश ने अपने एक कुशल चंदाजुटाऊ भक्त के साथ ली थी.क्या हुआ उस काम का ?उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?ये न तो सवाल बनेगा और न ही इसकी जिम्मेदारी शशि प्रकाश लेंगे.न किसी कार्यकर्ता की हिम्मत है कि उनसे पूछ सकता है. वे अनन्य हैं, पुरुषोत्तम हैं, आलोचनाओं  से परे है.

अनुराग ट्रस्ट के नाम पर गोरखपुर में मोहल्ला में आधार बनाने और नई पीढ़ी को क्रन्तिकारी बनाने की थीसिस का क्या हुआ?अपने साथियों के बच्चों को भी आप नहीं रोक पाए और वे उस घुटन से अपने अपने घर चले गये. उन पर आप किस नैतिक पतन का आरोप तय करेंगे,ये आप खुद सोच लीजियेगा.मोहल्लाकरण के नाम पर कात्यायनी की पैतृक दाई ही आपको जानती है जिसके साथ आप उस टीन वाले एक कमरे का मुकदमा लड़ रहें है. शेष मुहल्ले के लिए संस्कृति कुटीर रहस्य ही है.

अब आइये 'हरी अनंत हरी कथा अनंता'वाले अभियान लोक स्वराज्य पर.इस अभियान का मुख्य मकसद लोक स्वराज्य पंचायतों का गठन और उनके माध्यम से क्रांतिकारी काम को आगे बढ़ाना था, लेकिन पिछले लगभग पंद्रह सालों में एक भी लोक स्वराज्य पंचायत नहीं बनी. मगर यह अभियान लगातार जारी है. पैसे आने लगातार जारी हैं. कहाँ जाते हैं, किसी को नहीं मालूम ...ठीक यही हाल पिछले तीन साल चले स्मृति संकल्प यात्रा का भी है .प्रचार-प्रसार के साथ मूल रूप में यह पैसे जुटाने और नए चंदा जुटाने वाले भक्तों की तलाश का ही अभियान था ...

बेबाक बेलौस के साथियों का पेट फूल रहा होगा कि उनके आरोपों का जवाब मैंने अभी तक नहीं दिया.आइये! आपके राजनीतिक आरोपों को थोडा समझने का प्रयास कर लिया जाये. आप लिखते हैं :- अपने को 'दिशा' का पूर्व संयोजक बताने वाले अरुण कुमार यादव को कुछ समय के लिए वि. वि. इकाई का संयोजक बनाया गया था जिसमें मैं महीनो छुट्टी पर था.

पर माफ़ कीजियेगा मुझे याद नहीं कि मुझे ये पद कब दिया था और किसने दिया था.इस पर हमें सिर्फ ये कहना है कि शशि प्रकाश के बेटे अभिनव सिन्हा को 'दिशा'का राष्ट्रीय संयोजक किसने बनाया,किस चुनावी प्रक्रिया से उन्होंने ये पद धारण किया और छोटे में कहें तो आपके सभी जन संगठनो का चुनाव कैसे होता है, कहाँ होता है, कौन कर्ता हैं, जरुर बता दे ....

दूसरा आरोप कि मुझे किन नैतिक आरोपों के तहत निकाला गया था, तो मेरे 'हिजड़े' साहस से ये भी जान लें.

1 . आठ साल के राजनीतिक जीवन में मैंने कुछ नहीं किया.
2 . मैंने संगठन विरोधी बयान दिया था.
3 . मेरा सांस्कृतिक स्तर नीचा है

यही तीन आरोप लगाकर मुझे 6 महीने के लिए निकाला गया था. शर्त थी अगर इस दौरान मै पतितों, भगोड़ों और गद्दारों से नहीं मिला और स्वदेश की दुकान पर नहीं गया तो लिखित आत्मालोचना के साथ मेरी वापसी हो सकती है ये आरोप क्यों लगे थे, आप लोगों सहित पाठक भी समझदार हैं ./..

बदलाव के औजार बनने थे,   धंधे बन गए.
अपने आठ सालों में मैंने चंदा माँगा था.ट्रेन में डेली चलने वाले यात्रियों की गालियां सुनी थी. आप लोगों को जोड़ने के काम में भूमिका निभाई थी और सारा पैसा शशि प्रकाश के ब्लैकहोल में जमा कर दिया था . जहाँ तक विरोधी बयान की बात है उसका एकमात्र उदाहरण ये था कि उत्तराखंड, हरियाणा की पूरी इकाई और ढेरों साथियों के बाहर होने के कारण मैंने कहा था कि एक एक विकेट गिर रहें है.इन्कलाब कैसे होगा और तीसरा सवाल जिसके साथ आपकी जुगुप्सा जुड़ी है उसका मैंने उचित मंच आपको बता दिया है. शुरू करें जबाब मिल जायेगा. वैसे आपके नेता की लाइन है जो भी बाहर जाये उस पर चरित्र हनन और गबन का आरोप जरुर लगा देना चाहिए और इसका पालन अनवरत जारी है.इसके नया उदाहरण हैं गोरखपुर इकाई से उदयभान और दिल्ली से राकेश.राकेश चूँकि शशि के सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हैं इसलिए उन्हें हलाल करने के बजाय आजकल अज्ञातवास में रखा गया है.
पूरे देश में चलने वाले राजनीतिक संघर्षो में आप कहा खड़े हैं. इसकी बानगी तो आपको डॉ. विवेक ने अपने लेख में दे दी है. लेकिन आप लोग छाती पीट रहें है कि हम राजनितिक बहस नहीं कर रहे बल्कि कुत्सा प्रचार कर रहे हैं. वैसे आप लोगों को याद होगा कि आपके यहाँ किसी साथी की गैस भी निकल जाये उस पर मीटिंग और बात शुरू हो जाती है.वह भी शशि प्रकाश राजनीतिक ही मानते हैं.मीनाक्षी जी हमारे और आपकी पोस्टों से जनता को फैसला करने दें, क्या राजनीतिक है क्या गाली है. याद आ गया. एक उदाहरण भी सुन लीजिये आपको गोरखपुर में वकीलों के बीच काम करने के लिए भेजा गया था. आप वहां से यह कहते हुए भाग आई थी कि वकील बदबूदार गैस छोड़ते हैं...आप जिन साथियों को इतनी गालिया दे रही हैं उन्होंने आपका जितना सम्मान किया,वह अपने आपमें एक मिसाल है यह सिर्फ एक स्त्री होने के नाते आपको मिला था. आप उनकी राजनीतिक गुरु नहीं थी.
आप आर्थिक सहयोग सिर्फ पॉँच स्रोतों से जुटाने पर इतना घमंड दिखा रही हैं. उसके अंदर की बानगी भी लोगों को बता दीजिये.आप अपने पार्टी लेबी और नाटक नौटंकी द्वारा प्रचार के जरिये निकाल लिए गये रुपयों का अनुपात निकाल लें. आपकी राजनीतिक लाइन का असली रूप निकल जायेगा. आपके यहाँ जनता की जेब से रूपया निकालने की कला सिखाई जाती है. इसकी सबसे मजेदार मशक्कत ट्रेनों में कोई भी देख सकता है .
अब आप लोगों को साफ हो जाना चाहिए कि आपके हजारों रहस्यों को ठीक से जान लेने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि आप लोग क़ानूनी धंधा फ़ैलाने वाले जनता और आन्दोलन के अपराधी लोग हैं.इसलिए सांगठनिक बहस की सीमा लगाने का भी कोई कारण नहीं है.तात्कालिक प्रदर्शनों पर इतराकर अतीत पर गोली मत दागिए. बीस सालों के इतिहास में एक कार्यकता सम्मलेन है, वो भी आनन फानन में इसलिए कर लिया गया था कि विरोधी आप पर सवाल खड़ा करने लगे थे.इस बहस का एक ही दुखद परिणाम है कि जवाब कार्यकर्ताओ से दिलाकर आप उनसे कुछ ज्यादा समय तक चंदा जुटवा सकेंगे भरोसा रखिये,अभी तमाम रहस्य खुलने बाकी हैं. जरुरत पड़ने पर वो भी खोले जायेंगे.डरिए मत,हम इंसानी गरिमा की सीमा हिजड़े वाले साहस के साथ बनाये रखेंगे.